ॐ नमो भगवते॑ रुद्रा॒य ॥
नम॑स्ते रुद्र म॒न्यव॑ उ॒तोत॒ इष॑वे॒ नमः॑ ।
नम॑स्ते अस्तु॒ धन्व॑ने बा॒हुभ्या॑मु॒त ते॒ नमः॑ ॥
अर्थ ॐ, भगवान् रुद्र को नमस्कार। हे रुद्र, आपके मन्यु (क्रोध) को नमस्कार और आपके बाण को भी नमस्कार। आपके धनुष को नमस्कार हो, तथा आपकी दोनों भुजाओं को भी नमस्कार।
या त॒ इषुः॑ शि॒वत॑मा शि॒वं ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
शि॒वा श॑र॒व्या॑ या तव॒ तया॑ नो रुद्र मृडय ।
अर्थ आपका जो बाण अत्यन्त कल्याणकारी है, आपका जो धनुष शिव (मंगलमय) हो गया है, और आपका जो तूणीर कल्याणकारी है — हे रुद्र, उसी से हमें सुखी कीजिए।
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूरघो॒राऽपा॑पकाशिनी ।
तया॑ नस्त॒नुवा॒ शंत॑मया॒ गिरि॑शंता॒भिचा॑कशीहि ॥
अर्थ हे रुद्र, आपका जो कल्याणमय स्वरूप है — अघोर, जो पाप को प्रकट नहीं करता — हे गिरिशन्त, उसी अत्यन्त शान्तिदायक स्वरूप से हमें देखिए।
यामिषुं॑ गिरिशंत॒ हस्ते॒ बिभ॒र्ष्यस्त॑वे ।
शि॒वां गि॑रित्र॒ तां कु॑रु॒ मा हिग्ं॑सीः॒ पुरु॑षं॒ जग॑त्॥
अर्थ हे गिरिशन्त, जिस बाण को आप फेंकने के लिए हाथ में धारण करते हैं — हे गिरित्र, उसे कल्याणकारी बना दीजिए; मनुष्य और जगत् की हिंसा न कीजिए।
शि॒वेन॒ वच॑सा त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑ वदामसि ।
यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्मग्ं सु॒मना॒ अस॑त् ॥
अर्थ हे गिरिश, हम कल्याणकारी वाणी से आपकी स्तुति करते हैं, जिससे हमारा यह सम्पूर्ण जगत् रोगरहित और प्रसन्नचित्त हो।
अध्य॑वोचदधिव॒क्ता प्र॑थ॒मो दैव्यो॑ भि॒षक् ।
अहीग्॑श्च॒ सर्वां᳚जं॒भय॒न्-थ्सर्वा᳚श्च यातुधा॒न्यः॑ ॥
अर्थ देवताओं के प्रथम वैद्य, हमारे पक्षधर, हमारे लिए बोल चुके हैं — समस्त सर्पों और समस्त अभिचारिणी शक्तियों का नाश करते हुए।
अ॒सौ यस्ता॒म्रो अ॑रु॒ण उ॒त ब॒भ्रुस्सु॑मं॒गलः॑ ।
ये चे॒माग्ं रु॒द्रा अ॒भितो॑ दि॒क्षु श्रि॒ताः स॑हस्र॒शोऽवै॑षा॒ग्ं॒ हेड॑ ईमहे ॥
अर्थ जो वह ताम्रवर्ण, अरुण और बभ्रु वर्ण वाले परम मंगलमय हैं, तथा जो रुद्रगण चारों ओर दिशाओं में सहस्रों की संख्या में स्थित हैं — उनके क्रोध को हम शान्त करने की प्रार्थना करते हैं।
अ॒सौ यो॑ऽव॒सर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवो॒ विलो॑हितः ।
उ॒तैनं॑ गो॒पा अ॑दृश॒न्नदृ॑शन्नुदहा॒र्यः॑ ।
उ॒तैनं॒-विँश्वा॑ भू॒तानि॒ स दृ॒ष्टो मृ॑डयाति नः ॥
अर्थ जो नीलकण्ठ और अत्यन्त लोहितवर्ण वाले चलते हैं — उन्हें गोपालों ने देखा, जल भरने वाली स्त्रियों ने देखा, और समस्त प्राणियों ने देखा। इस प्रकार दर्शन दिए हुए वे हमें सुख प्रदान करें।
नमो॑ अस्तु॒ नील॑ग्रीवाय सहस्रा॒क्षाय॑ मी॒ढुषे᳚ ।
अथो॒ ये अ॑स्य॒ सत्त्वा॑नो॒ऽहं तेभ्यो॑ऽकर॒न्नमः॑ ॥
अर्थ नीलकण्ठ, सहस्राक्ष और वर्षा करने वाले (उदार) को नमस्कार हो। तथा जो इनके गण हैं, उन्हें भी मैंने नमस्कार किया है।
प्रमुं॑च॒ धन्व॑न॒स्त्वमु॒भयो॒रार्त्नि॑ यो॒र्ज्याम् ।
याश्च॑ ते॒ हस्त॒ इष॑वः॒ परा॒ ता भ॑गवो वप ॥
अर्थ आप अपने धनुष के दोनों कोटियों से प्रत्यंचा को उतार दीजिए, और आपके हाथ में जो बाण हैं — हे भगवन्, उन्हें दूर फेंक दीजिए।
अ॒व॒तत्य॒ धनु॒स्त्वग्ं सह॑स्राक्ष॒ शते॑षुधे ।
नि॒शीर्य॑ श॒ल्यानां॒ मुखा॑ शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ॥
अर्थ हे सहस्राक्ष, सौ तूणीरों वाले, आप अपने धनुष को उतारकर और बाणों के अग्रभागों को कुण्ठित करके हमारे लिए शिव और प्रसन्नचित्त हो जाइए।
विज्यं॒ धनुः॑ कप॒र्दिनो॒ विश॑ल्यो॒ बाण॑वाग्ं उ॒त ।
अने॑शन्न॒स्येष॑व आ॒भुर॑स्य निषं॒गथिः॑ ॥
अर्थ जटाधारी के धनुष की प्रत्यंचा उतरी हुई हो और उनका बाण-समूह शल्यरहित हो। उनके बाण नष्ट हो गए, उनका तूणीर रिक्त हो गया।
या ते॑ हे॒तिर्मी॑ढुष्टम॒ हस्ते॑ ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
तया॒ऽस्मान्, वि॒श्वत॒स्त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑ब्भुज ॥
अर्थ हे परम उदार, आपके हाथ में जो आयुध है और जो आपका धनुष है — उस रोगरहित (हितकारी) आयुध से आप हमें सब ओर से सुरक्षित रखिए।
नम॑स्ते अ॒स्त्वायु॑धा॒याना॑तताय धृ॒ष्णवे᳚ ।
उ॒भाभ्या॑मु॒त ते॒ नमो॑ बा॒हुभ्यां॒ तव॒ धन्व॑ने ॥
अर्थ आपके उस आयुध को नमस्कार हो जो अनातत (प्रत्यंचारहित) और धृष्ट है। तथा आपकी दोनों भुजाओं और आपके धनुष को भी नमस्कार।
परि॑ ते॒ धन्व॑नो हे॒तिर॒स्मान् वृ॑णक्तु वि॒श्वतः॑ ।
अथो॒ य इ॑षु॒धिस्तवा॒रे अ॒स्मन्निधे॑हि॒ तम् ॥ 1 ॥
अर्थ आपके धनुष का अस्त्र हमें सब ओर से छोड़ दे (हमसे दूर रहे)। और आपका जो तूणीर है, उसे हमसे दूर रख दीजिए।
श्री शंभ॑वे॒ नमः॑ ॥
नम॑स्ते अस्तु भगवन्-विश्वेश्व॒राय॑ महादे॒वाय॑ त्र्यंब॒काय॑ त्रिपुरांत॒काय॑ त्रिकाग्निका॒लाय॑ कालाग्निरु॒द्राय॑ नीलकं॒ठाय॑ मृत्युंज॒याय॑ सर्वेश्व॒राय॑ सदाशि॒वाय॑ [शंक॒राय॑] श्रीमन्-महादे॒वाय॒ नमः॑ ।
अर्थ श्री शम्भु को नमस्कार। हे भगवन्, आपको नमस्कार हो — विश्वेश्वर, महादेव, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक, त्रिकाग्निकाल, कालाग्निरुद्र, नीलकण्ठ, मृत्युंजय, सर्वेश्वर, सदाशिव, शंकर, श्रीमान् महादेव — आपको नमस्कार।
नमो॒ हिर॑ण्य बाहवे सेना॒न्ये॑ दि॒शां च॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ स्वर्णबाहु, सेनापति तथा दिशाओं के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ वृ॒क्षेभ्यो॒ हरि॑केशेभ्यः पशू॒नां पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ हरे पत्तों वाले वृक्षों को तथा पशुओं के अधिपति को नमस्कार।
नमः॑ स॒स्पिंज॑राय॒ त्विषी॑मते पथी॒नां पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ नवीन तृण के समान पिंगलवर्ण, तेजस्वी तथा मार्गों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ बभ्लु॒शाय॑ विव्या॒धिनेऽन्ना॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ वृषभ पर आरूढ़ बभ्रुवर्ण, भेदन करने वाले तथा अन्नों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॒ हरि॑केशायोपवी॒तिने॑ पु॒ष्टानां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ हरितकेश, यज्ञोपवीतधारी तथा पुष्ट प्राणियों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ भ॒वस्य॑ हे॒त्यै जग॑तां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ भव के आयुध को तथा समस्त जगत् के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ रु॒द्राया॑तता॒विने॒ क्षेत्रा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ प्रत्यंचा चढ़ाए हुए रुद्र को तथा क्षेत्रों के अधिपति को नमस्कार।
नम॑स्सू॒तायाहं॑त्याय॒ वना॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ सारथि, अवध्य तथा वनों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॒ रोहि॑ताय स्थ॒पत॑ये वृ॒क्षाणां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ रोहित (रक्तवर्ण), स्थपति तथा वृक्षों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ मं॒त्रिणे॑ वाणि॒जाय॒ कक्षा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ मन्त्री, वणिक् तथा झाड़ियों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ भुवं॒तये॑ वारिवस्कृ॒ता-यौष॑धीनां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ भुवन्ति, सुख देने वाले तथा ओषधियों के अधिपति को नमस्कार।
नम॑ उ॒च्चैर्घो॑षायाक्रं॒दय॑ते पत्ती॒नां पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ उच्च घोष करने वाले, शत्रुओं को रुलाने वाले तथा पदातियों के अधिपति को नमस्कार।
नमः॑ कृत्स्नवी॒ताय॒ धाव॑ते॒ सत्त्व॑नां॒ पत॑ये॒ नमः॑ ॥ 2 ॥
अर्थ सर्वत्र व्याप्त, वेग से चलने वाले तथा समस्त प्राणियों के अधिपति को नमस्कार।
नमः॒ सह॑मानाय निव्या॒धिन॑ आव्या॒धिनी॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ सहनशील, प्रहार करने वाले तथा आक्रमणकारी सेनाओं के अधिपति को नमस्कार।
नमः॑ ककु॒भाय॑ निषं॒गिणे᳚ स्ते॒नानां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ श्रेष्ठ, खड्गधारी तथा चोरों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ निषं॒गिण॑ इषुधि॒मते॒ तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ खड्गधारी, तूणीरयुक्त तथा तस्करों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॒ वंच॑ते परि॒वंच॑ते स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ छल करने वाले, सब ओर से छलने वाले तथा गुप्त चोरों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ निचे॒रवे॑ परिच॒रायार॑ण्यानां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ गुप्त रूप से विचरने वाले, चारों ओर घूमने वाले तथा अरण्यों के अधिपति को नमस्कार।
नमः॑ सृका॒विभ्यो॒ जिघाग्ं॑सद्भ्यो मुष्ण॒तां पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ आयुधधारियों, वध की इच्छा वालों तथा लूटने वालों के अधिपति को नमस्कार।
नमो॑ऽसि॒मद्भ्यो॒ नक्तं॒चर॑द्भ्यः प्रकृं॒तानां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ खड्गधारियों, रात्रि में विचरने वालों तथा काट डालने वालों के अधिपति को नमस्कार।
नम॑ उष्णी॒षिणे॑ गिरिच॒राय॑ कुलुं॒चानां॒ पत॑ये॒ नमो॒
अर्थ उष्णीषधारी, पर्वतों में विचरने वाले तथा घरों को लूटने वालों के अधिपति को नमस्कार।
नम॒ इषु॑मद्भ्यो धन्वा॒विभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ बाणधारियों तथा धनुर्धारियों — आप सबको नमस्कार।
नम॑ आतन्-वा॒नेभ्यः॑ प्रति॒दधा॑नेभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ धनुष तानने वालों तथा बाण सन्धान करने वालों — आप सबको नमस्कार।
नम॑ आ॒यच्छ॑द्भ्यो विसृ॒जद्भ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ प्रत्यंचा खींचने वालों तथा बाण छोड़ने वालों — आप सबको नमस्कार।
नमोऽस्य॑द्भ्यो॒ विध्य॑द्भ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ बाण फेंकने वालों तथा बेधने वालों — आप सबको नमस्कार।
नम॒ आसी॑नेभ्यः॒ शया॑नेभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ बैठे हुओं तथा लेटे हुओं — आप सबको नमस्कार।
नमः॑ स्व॒पद्भ्यो॒ जाग्र॑द्भ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ सोने वालों तथा जागने वालों — आप सबको नमस्कार।
नम॒स्तिष्ठ॑द्भ्यो॒ धाव॑द्भ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ खड़े रहने वालों तथा दौड़ने वालों — आप सबको नमस्कार।
नमः॑ स॒भाभ्यः॑ स॒भाप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ सभाओं तथा सभापतियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॒ अश्वे॒भ्योऽश्व॑पतिभ्यश्च वो॒ नमः॑ ॥ 3 ॥
अर्थ अश्वों तथा अश्वपतियों — आप सबको नमस्कार।
नम॑ आव्या॒धिनी᳚भ्यो वि॒विध्यं॑तीभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ आक्रमण करने वाली शक्तियों तथा नाना प्रकार से बेधने वालियों — आप सबको नमस्कार।
नम॒ उग॑णाभ्यस्तृग्ं-ह॒तीभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ उग्र गणों तथा संहार करने वालियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ गृ॒त्सेभ्यो॑ गृ॒त्सप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ निपुण जनों तथा उनके अधिपतियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॒ व्राते᳚भ्यो॒ व्रात॑पतिभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ समूहों तथा समूहपतियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ ग॒णेभ्यो॑ ग॒णप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ गणों तथा गणपतियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॒ विरू॑पेभ्यो वि॒श्वरू॑पेभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ विरूपों तथा विश्वरूपों — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ मह॒द्भ्यः॑, क्षुल्ल॒केभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ महान् तथा क्षुद्र — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ र॒थिभ्यो॑ऽर॒थेभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ रथियों तथा रथरहितों — आप सबको नमस्कार।
नमो॒ रथे᳚भ्यो॒ रथ॑पतिभ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ रथों तथा रथपतियों — आप सबको नमस्कार।
नमः॒ सेना᳚भ्यः सेना॒निभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ सेनाओं तथा सेनानायकों — आप सबको नमस्कार।
नमः॑, क्ष॒त्तृभ्यः॑ संग्रही॒तृभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ सारथि-सहायकों तथा रथ हाँकने वालों — आप सबको नमस्कार।
नम॒स्तक्ष॑भ्यो रथका॒रेभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ बढ़इयों तथा रथकारों — आप सबको नमस्कार।
नमः॒ कुला॑लेभ्यः क॒र्मारे᳚भ्यश्च वो॒ नमो॒
अर्थ कुम्हारों तथा लोहारों — आप सबको नमस्कार।
नमः॑ पुं॒जिष्टे᳚भ्यो निषा॒देभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ बहेलियों तथा निषादों — आप सबको नमस्कार।
नम॑ इषु॒कृद्भ्यो॑ धन्व॒कृद्भ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ बाण बनाने वालों तथा धनुष बनाने वालों — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ मृग॒युभ्यः॑ श्व॒निभ्य॑श्च वो॒ नमो॒
अर्थ आखेटकों तथा श्वानपालकों — आप सबको नमस्कार।
नम॒-श्श्वभ्य॒-श्श्वप॑तिभ्यश्च वो॒ नमः॑ ॥ 4 ॥
अर्थ श्वानों तथा श्वानपतियों — आप सबको नमस्कार।
नमो॑ भ॒वाय॑ च रु॒द्राय॑ च॒
अर्थ भव को तथा रुद्र को नमस्कार।
नमः॑ श॒र्वाय॑ च पशु॒पत॑ये च॒
अर्थ शर्व को तथा पशुपति को नमस्कार।
नमो॒ नील॑ग्रीवाय च शिति॒कंठा॑य च॒
अर्थ नीलग्रीव को तथा शितिकण्ठ को नमस्कार।
नमः॑ कप॒र्दिने॑ च॒ व्यु॑प्तकेशाय च॒
अर्थ जटाधारी को तथा मुण्डितकेश को नमस्कार।
नमः॑ सहस्रा॒क्षाय॑ च श॒तध॑न्वने च॒
अर्थ सहस्राक्ष को तथा सौ धनुष वाले को नमस्कार।
नमो॑ गिरि॒शाय॑ च शिपिवि॒ष्टाय॑ च॒
अर्थ गिरिश को तथा शिपिविष्ट को नमस्कार।
नमो॑ मी॒ढुष्ट॑माय॒ चेषु॑मते च॒
अर्थ परम उदार को तथा बाणधारी को नमस्कार।
नमो᳚ ह्र॒स्वाय॑ च वाम॒नाय॑ च॒
अर्थ ह्रस्व को तथा वामन को नमस्कार।
नमो॑ बृह॒ते च॒ वर्षी॑यसे च॒
अर्थ बृहत् को तथा अतिशय महान् को नमस्कार।
नमो॑ वृ॒द्धाय॑ च सं॒वृँध्व॑ने च॒
अर्थ वृद्ध को तथा वर्धमान को नमस्कार।
नमो॒ अग्रि॑याय च प्रथ॒माय॑ च॒
अर्थ अग्रगण्य को तथा प्रथम को नमस्कार।
नम॑ आ॒शवे॑ चाजि॒राय॑ च॒
अर्थ शीघ्रगामी को तथा चपल को नमस्कार।
नमः॒ शीघ्रि॑याय च॒ शीभ्या॑य च॒
अर्थ शीघ्र प्रवाह में स्थित को तथा वेगवती धाराओं में स्थित को नमस्कार।
नम॑ ऊ॒र्म्या॑य चावस्व॒न्या॑य च॒
अर्थ तरंगों में स्थित को तथा शान्त जल में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ स्रोत॒स्या॑य च॒ द्वीप्या॑य च ॥ 5 ॥
अर्थ स्रोतों में स्थित को तथा द्वीपों में स्थित को नमस्कार।
नमो᳚ ज्ये॒ष्ठाय॑ च कनि॒ष्ठाय॑ च॒
अर्थ ज्येष्ठ को तथा कनिष्ठ को नमस्कार।
नमः॑ पूर्व॒जाय॑ चापर॒जाय॑ च॒
अर्थ पूर्वज को तथा अपरज को नमस्कार।
नमो॑ मध्य॒माय॑ चापग॒ल्भाय॑ च॒
अर्थ मध्यम को तथा अपरिपक्व को नमस्कार।
नमो॑ जघ॒न्या॑य च॒ बुध्नि॑याय च॒
अर्थ अन्त में उत्पन्न को तथा मूल में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ सो॒भ्या॑य च प्रतिस॒र्या॑य च॒
अर्थ संसार में स्थित को तथा प्रतिकूल गति वाले को नमस्कार।
नमो॒ याम्या॑य च॒ क्षेम्या॑य च॒
अर्थ यम-सम्बन्धी को तथा क्षेम-सम्बन्धी को नमस्कार।
नम॑ उर्व॒र्या॑य च॒ खल्या॑य च॒
अर्थ उर्वर क्षेत्रों में स्थित को तथा खलिहानों में स्थित को नमस्कार।
नमः॒ श्लोक्या॑य चाऽवसा॒न्या॑य च॒
अर्थ स्तुतियोग्य को तथा अवसान में स्थित को नमस्कार।
नमो॒ वन्या॑य च॒ कक्ष्या॑य च॒
अर्थ वनों में स्थित को तथा झाड़ियों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ श्र॒वाय॑ च प्रतिश्र॒वाय॑ च॒
अर्थ शब्द को तथा प्रतिध्वनि को नमस्कार।
नम॑ आ॒शुषे॑णाय चा॒शुर॑थाय च॒
अर्थ शीघ्रगामी सेना वाले को तथा शीघ्रगामी रथ वाले को नमस्कार।
नमः॒ शूरा॑य चावभिंद॒ते च॒
अर्थ शूर को तथा शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले को नमस्कार।
नमो॑ व॒र्मिणे॑ च वरू॒थिने॑ च॒
अर्थ कवचधारी को तथा रथ-रक्षक से युक्त को नमस्कार।
नमो॑ बि॒ल्मिने॑ च कव॒चिने॑ च॒
अर्थ शिरस्त्राणधारी को तथा कवचधारी को नमस्कार।
नमः॑ श्रु॒ताय॑ च श्रुतसे॒नाय॑ च ॥ 6 ॥
अर्थ विख्यात को तथा विख्यात सेना वाले को नमस्कार।
नमो॑ दुंदु॒भ्या॑य चाहन॒न्या॑य च॒
अर्थ दुन्दुभि में स्थित को तथा उसके दण्ड में स्थित को नमस्कार।
नमो॑ धृ॒ष्णवे॑ च प्रमृ॒शाय॑ च॒
अर्थ धृष्ट को तथा विचारपूर्वक कार्य करने वाले को नमस्कार।
नमो॑ दू॒ताय॑ च॒ प्रहि॑ताय च॒
अर्थ दूत को तथा प्रेषित को नमस्कार।
नमो॑ निषं॒गिणे॑ चेषुधि॒मते॑ च॒
अर्थ खड्गधारी को तथा तूणीरधारी को नमस्कार।
नम॑स्ती॒क्ष्णेष॑वे चायु॒धिने॑ च॒
अर्थ तीक्ष्ण बाणों वाले को तथा आयुधधारी को नमस्कार।
नमः॑ स्वायु॒धाय॑ च सु॒धन्व॑ने च॒
अर्थ उत्तम आयुध वाले को तथा उत्तम धनुष वाले को नमस्कार।
नमः॒ स्रुत्या॑य च॒ पथ्या॑य च॒
अर्थ पगडण्डियों में स्थित को तथा मार्गों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ का॒ट्या॑य च नी॒प्या॑य च॒
अर्थ सँकरे मार्गों में स्थित को तथा निम्न भूमि में स्थित को नमस्कार।
नमः॒ सूद्या॑य च सर॒स्या॑य च॒
अर्थ कीचड़ में स्थित को तथा सरोवरों में स्थित को नमस्कार।
नमो॑ ना॒द्याय॑ च वैशं॒ताय॑ च॒
अर्थ नदियों में स्थित को तथा तालाबों में स्थित को नमस्कार।
नमः॒ कूप्या॑य चाव॒ट्या॑य च॒
अर्थ कूपों में स्थित को तथा गड्ढों में स्थित को नमस्कार।
नमो॒ वर्ष्या॑य चाव॒र्ष्याय॑ च॒
अर्थ वर्षा में स्थित को तथा अवर्षा में स्थित को नमस्कार।
नमो॑ मे॒घ्या॑य च विद्यु॒त्या॑य च॒
अर्थ मेघों में स्थित को तथा विद्युत् में स्थित को नमस्कार।
नम ई॒ध्रिया॑य चात॒प्या॑य च॒
अर्थ शरद् के मेघों में स्थित को तथा आतप में स्थित को नमस्कार।
नमो॒ वात्या॑य च॒ रेष्मि॑याय च॒
अर्थ वायु में स्थित को तथा आँधी में स्थित को नमस्कार।
नमो॑ वास्त॒व्या॑य च वास्तु॒पाय॑ च ॥ 7 ॥
अर्थ गृहों में निवास करने वाले को तथा वास्तु के रक्षक को नमस्कार।
नमः॒ सोमा॑य च रु॒द्राय॑ च॒
अर्थ सोम को तथा रुद्र को नमस्कार।
नम॑स्ता॒म्राय॑ चारु॒णाय॑ च॒
अर्थ ताम्रवर्ण को तथा अरुणवर्ण को नमस्कार।
नमः॑ शं॒गाय॑ च पशु॒पत॑ये च॒
अर्थ कल्याणकारी को तथा पशुपति को नमस्कार।
नम॑ उ॒ग्राय॑ च भी॒माय॑ च॒
अर्थ उग्र को तथा भीम को नमस्कार।
नमो॑ अग्रेव॒धाय॑ च दूरेव॒धाय॑ च॒
अर्थ सम्मुख से संहार करने वाले को तथा दूर से संहार करने वाले को नमस्कार।
नमो॑ हं॒त्रे च॒ हनी॑यसे च॒
अर्थ संहारक को तथा अत्यन्त संहारक को नमस्कार।
नमो॑ वृ॒क्षेभ्यो॒ हरि॑केशेभ्यो॒
अर्थ हरे पत्तों वाले वृक्षों को नमस्कार।
नम॑स्ता॒राय॒
अर्थ तारक (प्रणव) स्वरूप को नमस्कार।
नम॑श्शं॒भवे॑ च मयो॒भवे॑ च॒
अर्थ सुख उत्पन्न करने वाले को तथा आनन्द उत्पन्न करने वाले को नमस्कार।
नमः॑ शंक॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒
अर्थ कल्याण करने वाले को तथा आनन्द करने वाले को नमस्कार।
नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॒
अर्थ शिव को तथा शिवतर को नमस्कार।
नम॒स्तीर्थ्या॑य च॒ कूल्या॑य च॒
अर्थ तीर्थों में स्थित को तथा तटों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ पा॒र्या॑य चावा॒र्या॑य च॒
अर्थ उस पार स्थित को तथा इस पार स्थित को नमस्कार।
नमः॑ प्र॒तर॑णाय चो॒त्तर॑णाय च॒
अर्थ पार उतारने वाले को तथा ऊपर उठाने वाले को नमस्कार।
नम॑ आता॒र्या॑य चाला॒द्या॑य च॒
अर्थ पार पहुँचाने वाले को तथा फल भोगने वाले को नमस्कार।
नमः॒ शष्प्या॑य च॒ फेन्या॑य च॒
अर्थ नवीन तृण में स्थित को तथा फेन में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ सिक॒त्या॑य च प्रवा॒ह्या॑य च ॥ 8 ॥
अर्थ बालू में स्थित को तथा प्रवाह में स्थित को नमस्कार।
नम॑ इरि॒ण्या॑य च प्रप॒थ्या॑य च॒
अर्थ ऊसर भूमि में स्थित को तथा राजमार्गों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ किग्ंशि॒लाय॑ च॒ क्षय॑णाय च॒
अर्थ पथरीली भूमि में स्थित को तथा निवासस्थान में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ कप॒र्दिने॑ च पुल॒स्तये॑ च॒
अर्थ जटाधारी को तथा पुलस्ति को नमस्कार।
नमो॒ गोष्ठ्या॑य च॒ गृह्या॑य च॒
अर्थ गोशालाओं में स्थित को तथा गृहों में स्थित को नमस्कार।
नम॒स्तल्प्या॑य च॒ गेह्या॑य च॒
अर्थ शय्या में स्थित को तथा भवनों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ का॒ट्या॑य च गह्वरे॒ष्ठाय॑ च॒
अर्थ कँटीली झाड़ियों में स्थित को तथा गुफाओं में स्थित को नमस्कार।
नमो᳚ ह्रद॒य्या॑य च निवे॒ष्प्या॑य च॒
अर्थ गहरे जलाशयों में स्थित को तथा ओस में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ पाग्ं स॒व्या॑य च रज॒स्या॑य च॒
अर्थ धूलि में स्थित को तथा रज में स्थित को नमस्कार।
नमः॒ शुष्क्या॑य च हरि॒त्या॑य च॒
अर्थ शुष्क में स्थित को तथा हरित में स्थित को नमस्कार।
नमो॒ लोप्या॑य चोल॒प्या॑य च॒
अर्थ उजाड़ भूमि में स्थित को तथा कोमल तृणों में स्थित को नमस्कार।
नम॑ ऊ॒र्व्या॑य च सू॒र्म्या॑य च॒
अर्थ उर्वर भूमि में स्थित को तथा तरंगों में स्थित को नमस्कार।
नमः॑ प॒र्ण्या॑य च पर्णश॒द्या॑य च॒
अर्थ पत्तों में स्थित को तथा झड़े हुए पत्तों में स्थित को नमस्कार।
नमो॑ऽपगु॒रमा॑णाय चाभिघ्न॒ते च॒
अर्थ शस्त्र उठाने वाले को तथा प्रहार करने वाले को नमस्कार।
नम॑ आख्खिद॒ते च॑ प्रख्खिद॒ते च॒
अर्थ पीड़ा देने वाले को तथा अत्यन्त पीड़ा देने वाले को नमस्कार।
नमो॑ वः किरि॒केभ्यो॑ दे॒वाना॒ग्॒म्॒ हृद॑येभ्यो॒
अर्थ देवताओं के हृदयस्वरूप, वर देने वाले आप सबको नमस्कार।
नमो॑ विक्षीण॒केभ्यो॒ नमो॑ विचिन्व॒त्केभ्यो॒
अर्थ क्षीण करने वालों को नमस्कार, तथा विवेचन करने वालों को नमस्कार।
नम॑ आनिर् ह॒तेभ्यो॒ नम॑ आमीव॒त्केभ्यः॑ ॥ 9 ॥
अर्थ दूर करने वालों को नमस्कार, तथा रोग हरने वालों को नमस्कार।
द्रापे॒ अंध॑सस्पते॒ दरि॑द्र॒न्नील॑लोहित ।
ए॒षां पुरु॑षाणामे॒षां प॑शू॒नां मा भेर्माऽरो॒ मो ए॑षां॒ किंच॒नाम॑मत् ।
अर्थ हे द्रापि, हे अन्न के स्वामी, हे दरिद्ररूप, हे नीललोहित! इन मनुष्यों और इन पशुओं में से किसी को भय न हो, कोई पीड़ित न हो, और इनमें से किसी को कोई रोग न हो।
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूः शि॒वा वि॒श्वाह॑भेषजी ।
शि॒वा रु॒द्रस्य॑ भेष॒जी तया॑ नो मृड जी॒वसे᳚ ॥
अर्थ हे रुद्र, आपका जो कल्याणकारी स्वरूप है, जो सदा सबका औषध है, रुद्र की जो मंगलमयी भेषज-शक्ति है — उससे हमें जीवन के लिए सुखी कीजिए।
इ॒माग्ं रु॒द्राय॑ त॒वसे॑ कप॒र्दिने᳚ क्ष॒यद्वी॑राय॒ प्रभ॑रामहे म॒तिम् ।
यथा॑ न॒श्शमस॑द्द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॒ विश्वं॑ पु॒ष्टं ग्रामे॑ अ॒स्मिन्नना॑तुरम् ।
अर्थ बलवान्, जटाधारी, वीरों के अधिपति रुद्र के लिए हम यह स्तुति प्रस्तुत करते हैं, जिससे हमारे द्विपदों और चतुष्पदों का कल्याण हो, और इस ग्राम में सब कुछ पुष्ट तथा रोगरहित रहे।
मृ॒डा नो॑ रुद्रो॒त नो॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधेम ते ।
यच्छं च॒ योश्च॒ मनु॑राय॒जे पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तौ ।
अर्थ हे रुद्र, हमें सुखी कीजिए और हमें आनन्द प्रदान कीजिए। वीरों के अधिपति आपकी हम नमस्कार से आराधना करते हैं। पिता मनु ने यजन द्वारा जो शान्ति और आरोग्य प्राप्त किया था, वही हम आपके नेतृत्व में प्राप्त करें।
मा नो॑ म॒हांत॑मु॒त मा नो॑ अर्भ॒कं मा न॒ उक्षं॑तमु॒त मा न॑ उक्षि॒तम् ।
मा नो॑ऽवधीः पि॒तरं॒ मोत मा॒तरं॑ प्रि॒या मा न॑स्त॒नुवो॑ रुद्र रीरिषः ।
अर्थ हमारे बड़े को और हमारे छोटे को, हमारे बढ़ते हुए को और हमारे बड़े हो चुके को न मारिए। हमारे पिता को और माता को न मारिए, तथा हे रुद्र, हमारे प्रिय शरीरों को क्षति न पहुँचाइए।
मा न॑स्तो॒के तन॑ये॒ मा न॒ आयु॑षि॒ मा नो॒ गोषु॒ मा नो॒ अश्वे॑षु रीरिषः ।
वी॒रान्मा नो॑ रुद्र भामि॒तोऽव॑धीर्ह॒विष्मं॑तो॒ नम॑सा विधेम ते ।
अर्थ हमारी सन्तान और पौत्रों में, हमारी आयु में, हमारी गौओं में और हमारे अश्वों में हमें क्षति न पहुँचाइए। हे रुद्र, क्रुद्ध होकर हमारे वीरों का वध न कीजिए; हम हविष्मान् होकर नमस्कार से आपकी आराधना करते हैं।
आ॒रात्ते॑ गो॒घ्न उ॒त पू॑रुष॒घ्ने क्ष॒यद्वी॑राय सु॒म्नम॒स्मे ते॑ अस्तु ।
रक्षा॑ च नो॒ अधि॑ च देव ब्रू॒ह्यधा॑ च नः॒ शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हाः᳚ ।
अर्थ गौओं का और मनुष्यों का वध करने वाला आपका रूप हमसे दूर रहे। हे वीराधिप, हमारे लिए आपकी कृपा हो। हे देव, हमारी रक्षा कीजिए, हमारे पक्ष में बोलिए, और द्विगुण बल से हमें सुख प्रदान कीजिए।
स्तु॒हि श्रु॒तं ग॑र्त॒सदं॒-युँवा॑नं मृ॒गन्न भी॒ममु॑पह॒त्नुमु॒ग्रम् ।
मृ॒डा ज॑रि॒त्रे रु॑द्र॒ स्तवा॑नो अ॒न्यंते॑ अ॒स्मन्निव॑पंतु॒ सेनाः᳚ ।
अर्थ उस विख्यात, रथ पर विराजमान, युवा, सिंह के समान भयंकर, संहारक और उग्र रुद्र की स्तुति करो। हे रुद्र, स्तुति किए जाने पर स्तोता पर कृपा कीजिए; आपकी सेनाएँ हमसे भिन्न किसी अन्य पर आक्रमण करें।
परि॑णो रु॒द्रस्य॑ हे॒तिर्वृ॑णक्तु॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒ति र॑घा॒योः ।
अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्भ्य-स्तनुष्व॒ मीढ्व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृडय ।
अर्थ रुद्र का अस्त्र हमें छोड़ दे, और उस तेजस्वी के पापपूर्ण कोप की दुर्मति भी हमसे दूर रहे। हे उदार, यजमानों के लिए अपने दृढ़ धनुष को शिथिल कीजिए, और हमारी सन्तान तथा पौत्रों पर कृपा कीजिए।
मीढु॑ष्टम॒ शिव॑तम शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ।
प॒र॒मे वृ॒क्ष आयु॑धन्नि॒धाय॒ कृत्तिं॒-वँसा॑न॒ आच॑र॒ पिना॑कं॒ बिभ्र॒दाग॑हि ।
अर्थ हे परम उदार, हे परम कल्याणकारी, हमारे प्रति शिव और प्रसन्नचित्त हो जाइए। दूर के वृक्ष पर अपना आयुध रखकर, मृगचर्म ओढ़े हुए पधारिए, पिनाक धारण किए हुए आइए।
विकि॑रिद॒ विलो॑हित॒ नम॑स्ते अस्तु भगवः ।
यास्ते॑ स॒हस्रग्ं॑ हे॒तयो॒न्यम॒स्मन्निव॑पंतु॒ ताः ।
अर्थ हे विकिरिद, हे विलोहित, हे भगवन्, आपको नमस्कार हो। आपके जो सहस्रों अस्त्र हैं, वे हमसे भिन्न किसी अन्य पर गिरें।
स॒हस्रा॑णि सहस्र॒धा बा॑हु॒वोस्तव॑ हे॒तयः॑ ।
तासा॒मीशा॑नो भगवः परा॒चीना॒ मुखा॑ कृधि ॥ 10 ॥
अर्थ आपकी भुजाओं में सहस्रों प्रकार से सहस्रों अस्त्र हैं। हे भगवन्, उनके अधीश्वर होकर उनके मुख हमसे विपरीत दिशा में कर दीजिए।
स॒हस्रा॑णि सहस्र॒शो ये रु॒द्रा अधि॒ भूम्या᳚म् ।
तेषाग्ं॑ सहस्रयोज॒नेऽव॒धन्वा॑नि तन्मसि ।
अर्थ जो सहस्रों प्रकार से सहस्रों रुद्र इस पृथ्वी पर स्थित हैं, उनके धनुषों की प्रत्यंचा हम सहस्र योजन दूर उतार देते हैं।
अ॒स्मिन्म॑ह॒त्य॑र्ण॒वे᳚ऽंतरि॑क्षे भ॒वा अधि॑ ।
नील॑ग्रीवाः शिति॒कंठाः᳚ श॒र्वा अ॒धः, क्ष॑माच॒राः ।
अर्थ इस महान् अन्तरिक्ष-सागर में जो स्थित हैं — नीलग्रीव, शितिकण्ठ, शर्व — तथा जो नीचे पृथ्वी पर विचरण करते हैं।
नील॑ग्रीवाः शिति॒कंठा॒ दिवग्ं॑ रु॒द्रा उप॑श्रिताः ।
ये वृ॒क्षेषु॑ स॒स्पिंज॑रा॒ नील॑ग्रीवा॒ विलो॑हिताः ।
अर्थ नीलग्रीव और शितिकण्ठ रुद्र जो द्युलोक का आश्रय लिए हुए हैं; तथा जो वृक्षों में नवीन तृण के समान पिंगलवर्ण, नीलग्रीव और अत्यन्त लोहितवर्ण हैं।
ये भू॒ताना॒मधि॑पतयो विशि॒खासः॑ कप॒र्दिनः॑ ।
ये अन्ने॑षु वि॒विध्यं॑ति॒ पात्रे॑षु॒ पिब॑तो॒ जनान्॑ ।
ये प॒थां प॑थि॒रक्ष॑य ऐलबृ॒दा॑ य॒व्युधः॑ ।
ये ती॒र्थानि॑ प्र॒चरं॑ति सृ॒कावं॑तो निषं॒गिणः॑ ।
य ए॒तावं॑तश्च॒ भूयाग्ं॑सश्च॒ दिशो॑ रु॒द्रा वि॑तस्थि॒रे ।
तेषाग्ं॑ सहस्रयोज॒नेऽव॒धन्वा॑नि तन्मसि ।
अर्थ जो भूतों के अधिपति हैं, शिखारहित अथवा जटाधारी हैं; जो अन्नों में और पात्रों में पान करते हुए जनों को बेधते हैं; जो मार्गों के रक्षक, अन्न देने वाले और युद्ध करने वाले हैं; जो तीर्थों में आयुध और खड्ग लिए विचरते हैं; और जो इतने तथा इससे भी अधिक रुद्र दिशाओं में व्याप्त हैं — उन सबके धनुषों की प्रत्यंचा हम सहस्र योजन दूर उतार देते हैं।
नमो॑ रु॒द्रेभ्यो॒ ये पृ॑थि॒व्यां-येँ᳚ऽंतरि॑क्षे॒ ये दि॒वि येषा॒मन्नं॒-वाँतो॑ व॒र्ष॒मिष॑व॒स्तेभ्यो॒ दश॒ प्राची॒र्दश॑ दक्षि॒णा दश॑ प्र॒तीची॒-र्दशो-दी॑ची॒-र्दशो॒र्ध्वास्तेभ्यो॒ नम॒स्ते नो॑ मृडयंतु॒ ते यं द्वि॒ष्मो यश्च॑ नो॒ द्वेष्टि॒ तं-वोँ॒ जंभे॑ दधामि ॥ 11 ॥
अर्थ उन रुद्रों को नमस्कार जो पृथ्वी पर हैं, जो अन्तरिक्ष में हैं, जो द्युलोक में हैं, जिनका अन्न वायु और वर्षा है, तथा जिनके बाण हैं — उनके लिए दस पूर्व दिशा में, दस दक्षिण में, दस पश्चिम में, दस उत्तर में और दस ऊर्ध्व दिशा में नमस्कार। वे हमें सुख प्रदान करें। जिससे हम द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है, उसे मैं आपके मुख में समर्पित करता हूँ।
त्र्यं॑बकं-यँजामहे सुगं॒धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् ।
उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बंध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ माऽमृता᳚त् ।
अर्थ हम त्र्यम्बक की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित और पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। जैसे ककड़ी अपने बन्धन से मुक्त हो जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु से मुक्त होऊँ, अमृतत्व से नहीं।
यो रु॒द्रो अ॒ग्नौ यो अ॒प्सु य ओष॑धीषु॒ यो रु॒द्रो विश्वा॒ भुव॑ना वि॒वेश॒ तस्मै॑ रु॒द्राय॒ नमो॑ अस्तु ।
अर्थ जो रुद्र अग्नि में हैं, जो जल में हैं, जो ओषधियों में हैं, और जो रुद्र समस्त भुवनों में प्रविष्ट हैं — उन रुद्र को नमस्कार हो।
तमु॑ ष्टुहि॒ यः स्वि॒षुस्सु॒धन्वा॒ यो विश्व॑स्य॒ क्षय॑ति भेष॒जस्य॑ ।
यक्ष्वा᳚म॒हे सौ᳚मन॒साय॑ रु॒द्रं नमो᳚भिर्दे॒वमसु॑रं दुवस्य ।
अर्थ उनकी स्तुति करो जो उत्तम बाण और उत्तम धनुष वाले हैं, जो समस्त औषधों के अधीश्वर हैं। सौमनस्य के लिए हम रुद्र का यजन करते हैं; नमस्कारों से उस बलशाली देव की आराधना करो।
अ॒यं मे॒ हस्तो॒ भग॑वान॒यं मे॒ भग॑वत्तरः ।
अ॒यं मे᳚ वि॒श्वभे᳚षजो॒ऽयग्ं शि॒वाभि॑मर्शनः ।
अर्थ मेरा यह हाथ भगवान् है, यह मेरा हाथ इससे भी अधिक भगवत्स्वरूप है। यह मेरा हाथ सर्वऔषधरूप है, यह शिव का स्पर्श कराने वाला है।
ये ते॑ स॒हस्र॑म॒युतं॒ पाशा॒ मृत्यो॒ मर्त्या॑य॒ हंत॑वे ।
तान् य॒ज्ञस्य॑ मा॒यया॒ सर्वा॒नव॑ यजामहे ।
मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॑ मृ॒त्यवे॒ स्वाहा᳚ ।
अर्थ हे मृत्यु, मरणधर्मा मनुष्य का वध करने के लिए आपके जो सहस्रों और अयुत पाश हैं, उन सबको हम यज्ञ की सामर्थ्य से दूर करते हैं। मृत्यु के लिए स्वाहा, मृत्यु के लिए स्वाहा।
ॐ नमो भगवते रुद्राय विष्णवे मृत्यु॑र्मे पा॒हि ॥
प्राणानां ग्रंथिरसि रुद्रो मा॑ विशां॒तकः ।
तेनान्नेना᳚प्याय॒स्व ॥
नमो रुद्राय विष्णवे मृत्यु॑र्मे पा॒हि ॥
अर्थ ॐ, भगवान् रुद्र और विष्णु को नमस्कार; हे मृत्यु, मेरी रक्षा कीजिए। आप प्राणों की ग्रन्थि हैं; अन्तक रुद्र मुझमें प्रवेश न करें। उस अन्न से आप तृप्त हों। रुद्र और विष्णु को नमस्कार; हे मृत्यु, मेरी रक्षा कीजिए।
ॐ शांतिः॒ शांतिः॒ शांतिः॑ ।
अर्थ ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।