Skip to content
वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

लिङ्गाष्टकम्

साझा करें
आकार
प्रदर्शन
फलश्रुति

परिचय

लिङ्गाष्टकम् भगवान सदाशिव के लिङ्गस्वरूप की स्तुति में रचा गया आठ श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक ‘तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्’ — “उस सदाशिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ” — इस ध्रुवपद पर समाप्त होता है।

स्तोत्र में लिङ्ग को ब्रह्मा-विष्णु तथा समस्त देवताओं से पूजित, जन्म-मरण के दुःख का नाशक, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी और परात्पर परमात्मस्वरूप कहा गया है। रचयिता का नाम मूल पाठ में नहीं मिलता; परम्परा में इसे प्रायः आदि शङ्कराचार्य से जोड़ा जाता है, किन्तु यह अनुश्रुति है, प्रमाणित तथ्य नहीं।

अन्त का फलश्रुति श्लोक कहता है कि शिव के सान्निध्य में इसका पाठ करने वाला शिवलोक को प्राप्त होता है।

पाठ विधि

  • सोमवार, प्रदोष, श्रावण मास तथा महाशिवरात्रि को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • शिवलिङ्ग के समक्ष अथवा उसका मानसिक ध्यान करके पाठ करें।
  • अभिषेक अथवा बिल्वपत्र अर्पण के समय इसका पाठ प्रचलित है।
  • शुद्ध उच्चारण तथा शान्त भक्तिभाव के साथ आठों श्लोकों का क्रमशः पाठ करें।

स्रोत 2

  • liNgAShTakaM (sanskritdocuments.org) — doc_shiva/lingashh.itx — encoded and proofread by Srinivas Sunder

    Canonical ITRANS witness for the eight verses and the closing phalashruti couplet.

  • sArtha liNgAShTakaM (sanskritdocuments.org) — doc_shiva/lingashhMean.itx — verse text with English gloss

    The Devanagari here follows this annotated file, which marks anusvara (लिङ्गं) mid-pada and keeps म् at the pada break. Only compound word-spacing was normalised — the akshara sequence is unchanged. Verse 1 pada 1 has the variant reading निर्मलभाषित for निर्मलभासित; verse 7 pada 3 has विनाशित for विनाशन.

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

संबंधित सामग्री 4

और देखें 34