ऋषभ उवाच ---
नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ १॥
अर्थ ऋषभ बोले — विश्वव्यापी ईश्वर महादेव को नमस्कार करके मैं मनुष्यों की सर्वरक्षा करने वाला शिवमय कवच कहता हूँ।
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः ।
जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥ २॥
अर्थ पवित्र स्थान में यथाविधि आसन पर बैठकर, इन्द्रियों एवं प्राणों को वश में कर, साधक अविनाशी शिव का चिन्तन करे।
हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं
स्वतेजसा व्याप्तनभोऽवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं
ध्यायेत् परानन्दमयं महेशम् ॥ ३॥
अर्थ हृदय-कमल के भीतर विराजमान, अपने तेज से आकाश को व्याप्त करने वाले, इन्द्रियातीत, सूक्ष्म, अनन्त, आदि तथा परमानन्दमय महेश का ध्यान करे।
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध-
श्चिरं चिदानन्दनिमग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास समाहितात्मा
शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥ ४॥
अर्थ ध्यान से समस्त कर्म-बन्धनों को दूर कर, चिरकाल तक चिदानन्द में निमग्न चित्त वाला एवं षडक्षर-न्यास से एकाग्र साधक इस शैव कवच से अपनी रक्षा करे।
मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा
संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं परमन्त्रमूलं
धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥ ५॥
अर्थ समस्त देवताओं के आत्मा वह देव मुझे गहरे संसार-कूप में गिरे हुए से बचावें; उनका दिव्य नाम, जो परम मन्त्र का मूल है, मेरे हृदय में स्थित समस्त पाप को धो डाले।
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति-
र्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा ।
अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः
स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥ ६॥
अर्थ ज्योतिर्मय, आनन्दघन, चिदात्मा, अणु से भी सूक्ष्म तथा महान् शक्ति वाले एकमात्र विश्वमूर्ति ईश्वर सर्वत्र मेरी रक्षा करें और समस्त भय से बचावें।
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं
पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः ।
योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति
संजीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ७॥
अर्थ जो भू-रूप से समस्त विश्व को धारण करते हैं, वे अष्टमूर्ति गिरीश मुझे पृथ्वी (के भय) से बचावें; और जो जल-रूप से प्राणियों को संजीवन देते हैं, वे मुझे जल (के भय) से बचावें।
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा
सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्ने-
र्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ८॥
अर्थ कल्प के अन्त में समस्त भुवनों को जलाकर जो अनेक लीलाओं से नृत्य करते हैं, वे कालरुद्र मुझे दावाग्नि, आँधी आदि के भय तथा समस्त तापों से बचावें।
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो
विद्यावराभीतिकुठारपाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः
प्राच्यां स्थितो रक्षतु मामजस्रम् ॥ ९॥
अर्थ प्रदीप्त बिजली एवं स्वर्ण के समान आभा वाले, हाथों में विद्या, वर, अभय एवं कुठार धारण करने वाले, चतुर्मुख, त्रिनेत्र तत्पुरुष पूर्व दिशा में स्थित होकर मेरी निरन्तर रक्षा करें।
कुठारखेटाङ्कुशशूलढक्का-
कपालपाशाक्षगुणान्दधानः ।
चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ १०॥
अर्थ कुठार, ढाल, अङ्कुश, शूल, ढक्का (डमरू), कपाल, पाश एवं अक्षमाला धारण करने वाले, चतुर्मुख, नीलवर्ण, त्रिनेत्र अघोर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें।
कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकावभासो
वेदाक्षमालावरदाभयाङ्कः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः
सद्योऽधिजातोऽवतु मां प्रतीच्याम् ॥ ११॥
अर्थ कुन्द, चन्द्र, शङ्ख एवं स्फटिक के समान आभा वाले, वेद, अक्षमाला, वर एवं अभय के चिह्न वाले, त्रिनेत्र, चतुर्मुख, महाप्रभावशाली सद्योजात पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें।
वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः
सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां
पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥ १२॥
अर्थ हाथों में वर, अक्षमाला, अभय एवं टङ्क धारण किए हुए, कमल-केसर के समान वर्ण वाले, त्रिलोचन, सुन्दर चतुर्मुख वामदेव उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें।
वेदाभयेष्टाङ्कुशटङ्कपाश-
कपालढक्काक्षरशूलपाणिः ।
सितद्युतिः पञ्चमुखोऽवतान्मां
ईशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥ १३॥
अर्थ वेद, अभय, इष्ट, अङ्कुश, टङ्क, पाश, कपाल, ढक्का, अक्षमाला एवं शूल धारण करने वाले, श्वेत कान्ति वाले, पञ्चमुख, परम प्रकाशस्वरूप ईशान ऊर्ध्व दिशा में मेरी रक्षा करें।
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलि-
र्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ।
नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी
नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥ १४॥
अर्थ चन्द्रमौलि मेरे मस्तक की, भालनेत्र (ललाट में नेत्रधारी) मेरे ललाट की, भगनेत्रहारी मेरे नेत्रों की तथा विश्वनाथ सदा मेरी नासिका की रक्षा करें।
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः
कपोलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो
जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥ १५॥
अर्थ श्रुतियों में जिनकी कीर्ति गाई जाती है वे मेरे कानों की, कपाली मेरे कपोलों की, पञ्चवक्त्र मेरे मुख की तथा वेदजिह्व मेरी जिह्वा की सदा रक्षा करें।
कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः
पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ।
दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहु-
र्वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात् ॥ १६॥
अर्थ नीलकण्ठ गिरीश मेरे कण्ठ की, पिनाकपाणि मेरे दोनों हाथों की, धर्मबाहु मेरे भुजमूलों (कन्धों) की तथा दक्ष-यज्ञ के अन्तक मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें।
ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा
मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं
पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरो मे ॥ १७॥
अर्थ गिरीन्द्रधन्वा (मेरु को धनुष बनाने वाले) मेरे उदर की, मदनान्तक मेरे मध्यभाग की, हेरम्ब (गणेश) के पिता मेरी नाभि की तथा धूर्जटि ईश्वर मेरी कटि की रक्षा करें।
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो
जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् ।
जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्यात्
पादौ ममाव्यात्सुरवन्द्यपादः ॥ १८॥
अर्थ कुबेर के मित्र मेरी दोनों जाँघों की, जगदीश्वर मेरे दोनों घुटनों की, वृषभध्वज (पुङ्गवकेतु) मेरी दोनों पिंडलियों की तथा देववन्दित चरणों वाले मेरे पैरों की रक्षा करें।
महेश्वरः पातु दिनादियामे
मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः ।
त्रिलोचनः पातु तृतीययामे
वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥ २०॥
अर्थ दिन के प्रथम प्रहर में महेश्वर, मध्य प्रहर में वामदेव, तृतीय प्रहर में त्रिलोचन तथा दिन के अन्तिम प्रहर में वृषध्वज मेरी रक्षा करें।
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां
गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे ।
गौरीपतिः पातु निशावसाने
मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥ २१॥
अर्थ रात्रि के आरम्भ में शशिशेखर, अर्धरात्रि में गङ्गाधर, रात्रि के अन्त में गौरीपति तथा सर्वकाल में मृत्युञ्जय मेरी रक्षा करें।
अन्तःस्थितं रक्षतु शंकरो मां
स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ।
तदन्तरे पातु पतिः पशूनां
सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ २२॥
अर्थ भीतर स्थित मुझको शंकर, बाहर स्थित मुझको स्थाणु, दोनों के मध्य पशुपति तथा सब ओर से सदाशिव मेरी रक्षा करें।
तिष्ठन्तमव्याद् भुवनैकनाथः
पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः ।
वेदान्तवेद्योऽवतु मां निषण्णं
मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ २३॥
अर्थ खड़े हुए मुझको भुवनैकनाथ, चलते हुए को प्रमथाधिनाथ, बैठे हुए को वेदान्तवेद्य तथा सोते हुए मुझको अव्यय शिव रक्षा करें।
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः
शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः ।
अरण्यवासादि महाप्रवासे
पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥ २४॥
अर्थ मार्गों में नीलकण्ठ, पर्वत आदि दुर्गम स्थानों में त्रिपुरारि तथा वन-वास एवं महायात्रा में उदार-शक्ति मृगव्याध मेरी रक्षा करें।
कल्पान्तकालोग्रपटुप्रकोप-
स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः ।
घोरारिसेनार्णवदुर्निवार-
महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥ २५॥
अर्थ कल्पान्त-काल की उग्र प्रचण्ड कोपाग्नि से प्रकट अट्टहास द्वारा ब्रह्माण्ड-कोश को कँपा देने वाले वीरभद्र, भयंकर शत्रु-सेना-सागर से उत्पन्न दुर्निवार महाभय से मेरी रक्षा करें।
पत्त्यश्वमातङ्गरथावरूथिनी-
सहस्रलक्षायुत कोटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां
छिन्द्यान्मृडो घोरक्ठार धारया ॥ २६॥
अर्थ पैदल, अश्व, गज एवं रथ की सेना से युक्त, सहस्र-लक्ष-अयुत-कोटि संख्या में भीषण, आततायियों की सौ अक्षौहिणियों को मृड अपनी घोर कुठार-धारा से छिन्न कर दें।
निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्-
ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य ।
शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्
संत्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥ २७॥
अर्थ त्रिपुरान्तक का प्रलयाग्नि की ज्वालाओं से जलता हुआ त्रिशूल दस्युओं का नाश करे, और ईश का पिनाक धनुष बाघ, सिंह, रीछ, भेड़िये आदि हिंसक जन्तुओं को भयभीत कर दे।
दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्य-
दुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि ।
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिं
व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २८॥
अर्थ जगत् के अधीश्वर मेरे दुःस्वप्न, अपशकुन, दुर्गति, दौर्मनस्य, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुःसह दुर्यश, उत्पात, ताप, विष-भय, दुष्ट ग्रहों की पीड़ा तथा समस्त व्याधियों का नाश करें।