परिचय
श्रावण मास हिन्दू पंचांग का पाँचवाँ महीना है और भगवान शिव की उपासना के लिए वर्ष का सबसे पवित्र काल माना जाता है। उत्तर भारत में इसे ‘सावन’ कहा जाता है। इस मास का नाम श्रवण नक्षत्र से पड़ा है, क्योंकि इस महीने की पूर्णिमा प्रायः श्रवण नक्षत्र में पड़ती है। वर्षा ऋतु का यह महीना प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है — और शिव भक्ति की दृष्टि से पूरे वर्ष का शिखर।
इस पूरे मास में शिवालयों में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र अर्पण और ‘ॐ नमः शिवाय’ का अखंड जप चलता रहता है। काशी विश्वनाथ, बैद्यनाथ धाम, महाकालेश्वर, सोमनाथ और त्र्यंबकेश्वर सहित समस्त ज्योतिर्लिंगों में श्रावण भर विशेष आयोजन होते हैं।
कब आता है
श्रावण मास ग्रेगोरियन कैलेंडर में प्रायः जुलाई–अगस्त में पड़ता है। इसका आरंभ पंचांग-भेद से अलग-अलग होता है:
- पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड) — श्रावण आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन आरंभ होता है।
- अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु) — श्रावण अमावस्या के अगले दिन आरंभ होता है, अर्थात् लगभग पंद्रह दिन बाद।
दोनों ही परंपराओं में मास का समापन श्रावण पूर्णिमा को होता है, जिस दिन रक्षाबंधन और श्रावणी उपाकर्म मनाया जाता है।
पौराणिक महत्व
श्रावण की महिमा समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी है। मंथन के समय सर्वप्रथम हलाहल विष प्रकट हुआ, जिसके ताप से समस्त सृष्टि व्याकुल हो उठी। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष स्वयं पी लिया। माता पार्वती ने उनका कंठ अवरुद्ध कर दिया, जिससे विष कंठ में ही रुक गया और शिव ‘नीलकंठ’ कहलाए।
विष के ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर निरंतर जल अर्पित किया। परंपरा मानती है कि यह घटना श्रावण मास में घटी — इसीलिए इस मास में शिवलिंग पर जल, दूध और गंगाजल चढ़ाने की परंपरा को सर्वाधिक फलदायी माना गया है। कांवड़ यात्रा इसी भाव का विस्तार है, जिसमें भक्त गंगोत्री, गौमुख, हरिद्वार या सुल्तानगंज से गंगाजल कांवड़ में भरकर पैदल चलते हुए अपने आराध्य शिवालय में अर्पित करते हैं।
श्रावण सोमवार व्रत
सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, और श्रावण के सोमवार सर्वाधिक पुण्यदायी माने जाते हैं।
- व्रती प्रातः स्नान कर शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घृत, मधु और शर्करा से पंचामृत अभिषेक करते हैं।
- बेलपत्र (तीन दलों वाला बिल्व पत्र), धतूरा, आक के पुष्प, श्वेत पुष्प और भस्म अर्पित किए जाते हैं। शिवलिंग पर तुलसी और केतकी का पुष्प वर्जित माना गया है।
- दिन भर उपवास रखकर सायंकाल प्रदोष बेला में पूजा के पश्चात एक बार फलाहार या सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।
- सोलह सोमवार व्रत का आरंभ प्रायः श्रावण के प्रथम सोमवार से किया जाता है।
मंगला गौरी व्रत
श्रावण के प्रत्येक मंगलवार को विवाहित स्त्रियाँ माता पार्वती (मंगला गौरी) का व्रत रखती हैं। यह व्रत अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और संतान की कुशलता की कामना से किया जाता है। पूजा में सोलह प्रकार की सामग्री — सोलह माला, सोलह लड्डू, सोलह सुहाग सामग्री — अर्पित करने की परंपरा है।
पूजा विधि
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- शिवलिंग या शिव-परिवार की प्रतिमा का जलाभिषेक करें, फिर पंचामृत से अभिषेक करके पुनः शुद्ध जल चढ़ाएँ।
- बेलपत्र, श्वेत पुष्प, चंदन, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें।
- रुद्राभिषेक करते हुए श्री रुद्रम् (नमकम्–चमकम्) का पाठ करें, अथवा शिव चालीसा और रुद्राष्टकम् का पाठ करें।
- ‘ॐ नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र का यथासंभव जप करें — कम से कम एक माला (१०८ बार)।
- आरती कर प्रसाद वितरित करें और अपने सामर्थ्य अनुसार अन्न-दान करें।
इस मास के प्रमुख पर्व
- हरियाली अमावस्या — श्रावण अमावस्या; वृक्षारोपण और पितृ-तर्पण का दिन।
- हरियाली तीज — श्रावण शुक्ल तृतीया; शिव-पार्वती के मिलन का उत्सव।
- नाग पंचमी — श्रावण शुक्ल पंचमी; नाग देवता की पूजा।
- श्रावण पुत्रदा एकादशी — श्रावण शुक्ल एकादशी; इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं।
- श्रावण शिवरात्रि — श्रावण कृष्ण चतुर्दशी; सावन की शिवरात्रि, कांवड़ यात्रा का चरम।
- रक्षाबंधन एवं श्रावणी उपाकर्म — श्रावण पूर्णिमा; भाई-बहन का पर्व तथा यज्ञोपवीत परिवर्तन का दिन।
आहार और संयम
श्रावण वर्षा ऋतु का मास है, जब पाचन शक्ति स्वाभाविक रूप से मंद पड़ जाती है। इसी कारण परंपरा में इस मास में मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज तथा हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज़ का विधान है। सात्त्विक आहार, संयमित दिनचर्या, नित्य जप और शिव-कथा श्रवण — यही श्रावण की साधना का सार है।
ॐ नमः शिवाय