कालभैरवाष्टकम्
परिचय
कालभैरवाष्टकम् भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव की स्तुति में रचा गया आठ श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक ‘काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे’ — “काशीपुरी के अधिनाथ उन कालभैरव को मैं भजता हूँ” — इस ध्रुवपद पर समाप्त होता है।
काल भैरव काशी के कोतवाल माने जाते हैं; परम्परा के अनुसार काशी में उनकी अनुमति के बिना कोई प्रवेश नहीं पाता, और वे ही नगरवासियों के पुण्य-पाप का लेखा रखते हैं। स्तोत्र उन्हें सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, कपालमाला से विभूषित, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, काल के भी काल और मृत्यु के दर्प का नाश करने वाला कहता है।
यह स्तोत्र आदि शङ्कराचार्य की कृति माना जाता है और उनकी सम्पूर्ण रचनावली (खण्ड १८, पृष्ठ ८९) में संकलित है। शिवरहस्य में इसी स्तोत्र का एक मिलता-जुलता पाठ भी मिलता है, जिसमें श्लोकों का क्रम तथा कुछ पाठभेद भिन्न हैं।
अन्त का फलश्रुति श्लोक कहता है कि इसका पाठ करने वाला शोक, मोह, दीनता, लोभ और क्रोध के ताप से मुक्त होकर कालभैरव के चरणों के सान्निध्य को प्राप्त करता है।
पाठ विधि
- कालाष्टमी (प्रत्येक कृष्ण पक्ष की अष्टमी) तथा मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को पड़ने वाली भैरव अष्टमी अर्थात् कालभैरव जयन्ती को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
- रविवार और मंगलवार भी काल भैरव की उपासना के लिए प्रशस्त माने जाते हैं।
- सायंकाल अथवा रात्रि में दीपक जलाकर पाठ करने की परम्परा है।
- शुद्ध उच्चारण तथा शान्त भक्तिभाव के साथ आठों श्लोकों का क्रमशः पाठ करें, अन्त में फलश्रुति का पाठ करें।
स्रोत 2
- kAlabhairavAShTakaM (sanskritdocuments.org) — doc_shiva/kaalabhairava.itx — encoded by Narayanaswami Pallasena, proofread with Sunder Hattangadi
Canonical witness for the Shankaracharya recension, traced there to Complete Works of Shankaracharya, Volume 18, page 89. The Devanagari here reproduces that file akshara-for-akshara, including its anusvara spellings (पावनांघ्रि, दिगंबरं, कालकालमंबुजाक्ष, शूलटंक, निरंजनम्, संततिं, पठंति). The file also records variant readings, omitted from the verse text above: v4 स्थिरम् for स्थितं and निक्वणन् for विनिक्वणन्; v5 नाशनं for नाशकं and केशपाश / निर्मलं for शेषपाश / मण्डलं; v6 भूषणं for मोक्षदं; v8 काशिवासि for काशिवास; phalashruti लोभदैन्य for दैन्यलोभ, and the closing pada as ते प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं ध्रुवम्.
- kAlabhairavAShTakam from shivarahasya (sanskritdocuments.org) — doc_shiva/kAlabhairavAShTakam1.itx — Shivarahasya, mahAdevAkhya amsha 11, adhyaya 34.53-61
A second, near-identical recension of the same hymn, spoken by Ishvara to Parvati. It shares the refrain and most padas but reorders the verses and differs in several readings — consulted as a cross-check, not as the text reproduced here. Note that the separate file named kAlabhairavAShTakam.itx is a different hymn altogether (the Shringeri one, refrain शृङ्गशैलवासिनं नमामि कालभैरवम्).
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।