Skip to content
वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

सोमवती अमावस्या व्रत कथा

साझा करें

जिस महीने की अमावस्या सोमवार को पड़ती है उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। यह तिथि स्नान, दान, पितृ-तर्पण एवं पीपल पूजन के लिये विशेष मानी जाती है। नीचे इसका महत्व एवं पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।

सोमवती अमावस्या का महत्व

किसी भी महीने की अमावस्या जब सोमवार को होती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। सोमवती अमावस्या पितरों के तर्पण कार्यों के लिये सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस व्रत को करने के लिये इस दिन उपवासक को पीपल के पेड़ के नीचे शनि देव के बीज मंत्र का जाप करना विशेष रूप से कल्याण करने वाला कहा जाता है। वर्ष 2011 में पूरे वर्ष में केवल एक सोमवती अमावस्या आ रही है। यह अमावस्या भाद्रपद माह 29 अगस्त की रहेगी।

सोमवती अमावस्या के दिन स्नान, दान करने का विशेष महत्व कहा गया है। सोमवती अमावस्या के दिन मौन रहने का सर्वश्रेष्ठ फल कहा गया है। देव ऋषि व्यास के अनुसार इस तिथि में मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्त्र गौ दान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

इसके अतिरिक्त इस दिन पीपल की 108 परिक्रमा कर, पीपल के पेड़ और श्री विष्णु का पूजन करने का नियम है। मुख्य रूप से इस सोमवती अमावस्या के व्रत को स्त्रियों के द्वारा किया जाता है। व्रत करने के बाद और पीपल की प्रदक्षिणा करने के बाद अपने सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देना शुभ होता है। 29 अगस्त की सोमवती अमावस्या पर हजारों की संख्या में हरिद्वार तीर्थ स्थल पर डुबकी लगाई जाने की संभावनाएं बन रही हैं।

इस दिन कुरुक्षेत्र के ब्रह्मा सरोवर में डुबकी लगाने का भी बहुत अधिक पुण्य फल कहा गया है। इस स्थान पर सोमवती अमावस्या के दिन स्नान और दान करने से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक की अवधि में पवित्र नदियों पर स्नान करने वालों का तांता सा लगा रहेगा। स्नान के साथ भक्तजन भाल पर तिलक लगवाते हैं और पवित्र श्लोकों की गूंज चारों ओर सुनाई देती है। यह सब कार्य करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

सोमवती अमावस्या का व्रत करने वाली स्त्रियों को व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए। व्रत की कथा इस प्रकार है।

सोमवती अमावस्या व्रत कथा

एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। उसने सभी लड़कों का विवाह कर दिया था, परन्तु लड़की का अभी विवाह नहीं हुआ था। साहूकार के घर एक साधु प्रतिदिन भिक्षा मांगने आता था और बदले में आशीर्वाद देकर जाता था। वह साधु जो आशीर्वाद बहुओं को देता था और जो आशीर्वाद वह साहूकार की बेटी को देता था, उन दोनों में अंतर होता था। बहुओं को वह सुहाग का आशीर्वाद देता था, और बेटी को भाइयों से सुख की बात करता था।

एक दिन बेटी ने यह बात अपनी माता से कही, मां भी इस बात को जानकर दुखी हुई। दूसरे दिन उसकी माता ने साधु से पूछा कि वे उसकी बेटी को ऐसा आशीर्वाद क्यों देते हैं। साधु ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और वे चले गये। यह देखकर माता की चिन्ता और बढ़ गई।

माता ने तुरन्त पण्डित जी को बुलाया और उन्हें अपनी बेटी की जन्मपत्रिका देखने के लिये कहा। पण्डित जी ने जन्म पत्रिका देखकर कहा कि उनकी बेटी के भाग्य में विधवा होना लिखा है। यह बात सुनकर माता को और भी दुख हुआ। पण्डित जी से उपाय जानने के बाद यह निश्चित हुआ कि सात समुद्र पार एक धोबन के पास जाकर उसकी मांग का सिन्दूर मांगकर अपनी मांग में लगाने से और सोमवती अमावस्या के व्रत करने से यह अशुभ योग भंग हो जायेगा।

यह सुनकर माता ने अपने पुत्रों से उसकी बेटी के साथ जाने का आग्रह किया, छोटे पुत्र के अलावा अन्य सभी पुत्रों ने साथ जाने के लिये मना कर दिया। दोनों भाई-बहन धोबिन से कहानी सुनने के लिये चल दिये। चलते-चलते दोनों समुद्र किनारे आ गये और समुद्र कैसे पार किया जाये, इसका विचार करने लगे। विचार करने के लिये दोनों जिस पेड़ के नीचे बैठे थे, उस पेड़ पर एक गिद्ध और गिद्धनी रहती थी।

जब भी गिद्धनी के बच्चे होते थे, एक सांप आकर उनके बच्चों को खा जाता था। उस दिन भी ऐसा ही हुआ, गिद्ध-गिद्धनी दोनों बाहर गये हुए थे कि सांप आया और गिद्धनी के बच्चे चिल्लाने लगे। साहूकार की बेटी समझ गई, उसने साहस से सांप को मार दिया। सायंकाल में जब गिद्ध और गिद्धनी वापस आये, तो उन्हें अपने बच्चों को जीवित देखकर खुशी हुई। दोनों ने लड़की को धोबिन के घर ले जाने में सहायता की। लड़की कई माह तक छुपकर धोबिन की सेवा करती रही। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर धोबिन ने अपनी मांग का सिन्दूर उसकी मांग में लगा दिया। इसके बाद वह निर्जल ही अपने घर की ओर चल दी। रास्ते में पीपल के पेड़ की परिक्रमा की, और उसके बाद जल ग्रहण किया। पीपल के पेड़ का पूजन करने और सोमवती अमावस्या का व्रत करने से उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सोमवती अमावस्या व्रत कथा, पृष्ठ 237–238

    पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

संबंधित सामग्री 4

और देखें 25