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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

शुक्रवार प्रदोष व्रत कथा

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सूतजी बोले कि हे ऋषियो! शुक्रवार प्रदोष व्रत के प्रभाव से सौभाग्य व सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है, अतः स्त्रियों को सौभाग्य वृद्धि के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए। इससे सकल पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की भी प्राप्ति होती है।

व्रत विधि

इसकी पूजन-विधि सोमवार प्रदोष व्रत के समान है तथा आहार में श्वेत वस्तु व वस्त्र भी श्वेत होने चाहिए। अब आप लोग एक प्राचीन कथा का श्रवण करें।

कथा

प्राचीन काल की बात है कि किसी नगर में तीन मित्र रहते थे। उनमें से एक क्षत्रिय (राजकुमार), दूसरा ब्राह्मणपुत्र और तीसरा वणिकपुत्र था। राजकुमार व ब्राह्मणपुत्र पहले से ही विवाहित थे। जबकि वणिकपुत्र का विवाह कुछ दिनों पूर्व हुआ था, लेकिन गौना नहीं हुआ था।

एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों के विषय में चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मणपुत्र ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि स्त्री रहित घर एक प्रकार से भूतों का डेरा होता है। वणिकपुत्र ने ऐसा सुना तो उसने अपनी पत्नी को शीघ्र ही लाने का निर्णय कर लिया। घर पहुँचकर उसने यह बात अपने माता-पिता को बताई तो माता-पिता ने उसे समझाते हुए कहा कि अभी शुक्र तारा डूबा हुआ है। ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवाकर लाना शुभ नहीं होता।

लेकिन वणिकपुत्र नहीं माना और अगले दिन ही ससुराल जा पहुँचा। ससुराल पक्ष के लोगों ने भी उसे बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। अन्ततः माता-पिता को विवश होकर अपनी कन्या को विदा करना पड़ा।

ससुराल से विदा होकर जब वणिकपुत्र नगर के बाहर निकला ही था कि उसकी बैलगाड़ी का पहिया निकलकर दूर जा पड़ा और बैल की भी एक टाँग टूट गई। पति-पत्नी दोनों को काफी चोट पहुँची। जैसे-तैसे कुछ दूर और आगे गए तो रास्ते में उन्हें डाकू मिल गए। डाकुओं ने उनका सारा धन लूट लिया। दोनों रोते-धोते घर पहुँचे।

घर पहुँचने पर वणिकपुत्र को सर्प ने डस लिया। उसके माता-पिता ने वैद्य को बुलवाया तो वैद्य ने वणिकपुत्र की तीन दिन में मृत्यु की घोषणा कर दी।

ब्राह्मणपुत्र को जब यह समाचार मिला तो वह उसे देखने के लिए शीघ्र उसके घर आया। उसने उसके माता-पिता को शुक्रवार प्रदोष व्रत करने का परामर्श देते हुए कहा कि इसे पत्नी सहित वापस ससुराल भेज दें। सारी विपदाएँ इसीलिए आई हैं, क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त काल में पत्नी को उसके पीहर से विदा करा लाया है। यदि यह वहाँ जाएगा तो अवश्य ही बच जाएगा।

ब्राह्मणपुत्र की बात वणिकपुत्र के माता-पिता को भा गई, अतः उन्होंने उसका अनुसरण किया। वणिकपुत्र जब ससुराल पहुँचा और कुछ दिन वहाँ रहा तो सर्प के विष का प्रभाव समाप्त होकर वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया और शुक्रवार प्रदोष व्रत के प्रभाव से उसके सभी कष्ट दूर हो गए।

आरती

पूजन के अंत में श्री शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा का गायन करें।

व्रत की सम्पूर्ण विधि, माहात्म्य एवं उद्यापन विधि के लिए देखें — प्रदोष व्रत कथा एवं पूजन विधि

स्रोत 1

  • प्रदोष व्रत कथा — पवन पॉकेट बुक्स, दिल्ली (मुद्रित पुस्तिका) — प्रदोष व्रत कथा (पूजन विधि, सातों वारों की प्रदोष कथाएँ, माहात्म्य, उद्यापन विधि व आरती सहित), पवन पॉकेट बुक्स, 4537 नई सड़क, दिल्ली-110006; पृष्ठ 2–23

    पाठ मुद्रित पुस्तिका के पृष्ठ-चित्रों से मिलाकर उतारा गया है — दिया गया लिंक प्रकाशक का सूची-पृष्ठ है, पाठ का स्रोत नहीं। स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियों में ‘चैत्ररथ’ को प्रसंगानुसार ‘चित्ररथ’ और सम्बोधन ‘है देवेंद्र’ को ‘हे देवेंद्र’ रखा गया है।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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