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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

शिव सोमवार व्रत कथा

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व्रत का महत्व

सोमवार का दिन भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। श्रद्धा से सोमवार व्रत करने वाला भक्त शिवजी और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करता है। यह व्रत मन की शांति, पारिवारिक सुख, उत्तम संकल्प और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

श्रावण मास के सोमवारों का विशेष महत्व है, परंतु भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार किसी भी सोमवार से यह व्रत आरंभ कर सकते हैं। कई परिवारों में सोलह सोमवार व्रत का भी संकल्प लिया जाता है।

यह पाठ सोमवार व्रत की लोक-प्रचलित कथा का संपादित रूप है। इसे वैदिक मंत्र या किसी एक निश्चित पुराण-पाठ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है; व्रत-कथाओं में क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार छोटे पाठांतर मिलते हैं।

पूजा विधि

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव का ध्यान करें। शिवलिंग या शिव-पार्वती के चित्र के सामने दीपक और धूप जलाएं। जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, धतूरा, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।

पूजा में ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें। शिव चालीसा, रुद्राष्टकम् या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ भी किया जा सकता है। अंत में शिवजी की आरती करें और व्रत कथा सुनें या पढ़ें। व्रत रखने वाले भक्त दिन में फलाहार कर सकते हैं या अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास रख सकते हैं।

शिव सोमवार व्रत कथा

एक नगर में एक धनवान साहूकार रहता था। उसके घर में धन और वैभव की कोई कमी नहीं थी, परंतु संतान न होने के कारण वह बहुत दुखी रहता था। संतान-प्राप्ति की इच्छा से वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता, शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धापूर्वक पूजा करता।

एक दिन माता पार्वती ने साहूकार की भक्ति देखकर भगवान शिव से कहा, “नाथ, यह भक्त बड़ी श्रद्धा से आपकी पूजा करता है। कृपा करके इसकी मनोकामना पूर्ण कीजिए।”

भगवान शिव ने कहा, “देवि, संसार में प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों का फल भोगता है। इसके भाग्य में संतान-सुख नहीं है, फिर भी तुम्हारे आग्रह और इसकी भक्ति से मैं इसे पुत्र का वर देता हूँ। परंतु उस पुत्र की आयु केवल बारह वर्ष होगी।”

साहूकार मंदिर में बैठा यह सब सुन रहा था। पुत्र प्राप्ति की बात सुनकर भी वह बहुत अधिक प्रसन्न नहीं हुआ, क्योंकि उसे पुत्र की अल्पायु का भी ज्ञान हो गया था। फिर भी उसने अपना सोमवार व्रत और शिवपूजन पहले की तरह जारी रखा।

कुछ समय बाद साहूकार के घर पुत्र जन्मा। घर में आनंद छा गया, पर साहूकार मन ही मन शांत रहा। जब बालक ग्यारह वर्ष का हुआ, तब साहूकार ने उसे शिक्षा के लिए काशी भेजने का निश्चय किया। उसने अपने साले को बुलाकर धन दिया और कहा कि बालक को काशी ले जाओ। मार्ग में जहाँ भी ठहरो, यज्ञ कराओ और ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा दो।

मामा और भांजा यात्रा पर निकल पड़े। रास्ते में वे एक नगर पहुँचे जहाँ राजा की कन्या का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से उसका विवाह होना था, वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने यह दोष छिपाने के लिए साहूकार के पुत्र को कुछ समय के लिए दूल्हा बनाकर विवाह मंडप में बैठा दिया। विवाह की विधि पूरी हो गई, पर साहूकार का पुत्र ईमानदार था। अवसर पाकर उसने राजकुमारी के दुपट्टे पर लिख दिया कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, जिसे तुम्हारे साथ भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है, और मैं काशी पढ़ने जा रहा हूँ।

राजकुमारी ने वह बात पढ़कर अपने माता-पिता को बता दी। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया और बारात लौट गई। उधर मामा और भांजा काशी पहुँचे। वहाँ बालक ने विद्या-अध्ययन आरंभ किया और मामा ने धर्म-कर्म जारी रखा। जिस दिन बालक बारह वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था। बालक ने मामा से कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। मामा ने उसे भीतर जाकर विश्राम करने को कहा। शिवजी के पूर्व वरदान के अनुसार कुछ ही समय बाद बालक के प्राण निकल गए। मामा दुख से विलाप करने लगे।

उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ से गुजरे। माता पार्वती ने करुणा से कहा, “नाथ, इसके रोने का स्वर सहन नहीं होता। कृपा करके इसका दुख दूर कीजिए।” भगवान शिव ने बालक को देखकर कहा, “यह उसी साहूकार का पुत्र है जिसे मैंने बारह वर्ष की आयु दी थी। अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है।” माता पार्वती ने फिर प्रार्थना की कि इस बालक के वियोग में इसके माता-पिता भी प्राण त्याग देंगे। तब भगवान शिव ने कृपा करके बालक को जीवनदान दिया। बालक जीवित हो उठा।

विद्या पूरी करके मामा और भांजा अपने नगर लौटने लगे। रास्ते में वे उसी नगर पहुँचे जहाँ राजकुमारी का विवाह हुआ था। वहाँ उन्होंने फिर यज्ञ कराया। राजा ने साहूकार के पुत्र को पहचान लिया, आदर-सत्कार किया और अपनी पुत्री को विधिपूर्वक उसके साथ विदा कर दिया।

इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो वे भी प्राण त्याग देंगे। पुत्र को जीवित और सकुशल लौटते देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “हे श्रेष्ठी, तेरे सोमवार व्रत और व्रत कथा के श्रवण से प्रसन्न होकर मैंने तेरे पुत्र को दीर्घायु दी है। इसी प्रकार जो श्रद्धा से सोमवार व्रत करता है और कथा सुनता या पढ़ता है, उसके दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।”

कथा का भाव यह है कि श्रद्धा, संयम और भगवान शिव में अटूट विश्वास से कठिन कर्म भी शुभ फल देने लगते हैं। जो भक्त श्रद्धापूर्वक सोमवार व्रत करता है, शिवजी उसकी रक्षा करते हैं और उसके जीवन में कल्याण का मार्ग खोलते हैं।

व्रत के नियम

व्रत में सत्य, संयम और सात्त्विक आचरण रखें। क्रोध, कटु वचन और निंदा से बचें। अपनी क्षमता के अनुसार दान करें और शिवजी से सभी जीवों के कल्याण की प्रार्थना करें। किसी भी व्रत में स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखना चाहिए; असमर्थ होने पर मानसिक संकल्प और साधारण पूजा भी फलदायी मानी जाती है।

स्रोत 2

  • Navbharat Times - Somvar Vrat Katha — Popular Somvar Vrat Katha recension

    कथा के मुख्य प्रसंगों — साहूकार, बारह वर्ष की आयु, काशी यात्रा, विवाह प्रसंग और शिव-कृपा से पुनर्जीवन — से मिलान किया गया।

  • Times of India - Somvar Vrat 101 — Somvar Vrat observance and puja rules

    पूजा-विधि और सोमवार/श्रावण में शिव उपासना के सामान्य व्यवहार से मिलान किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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