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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

शनिवार प्रदोष व्रत कथा

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सूतजी बोले कि हे ऋषियो! पुत्र-प्राप्ति की कामना से शनिवार प्रदोष व्रत करना चाहिए। इस व्रत में भगवान शिव का विधिवत् पूजन करना चाहिए। अब आप लोग इस व्रत की कथा श्रवण करें—

कथा

एक समय की बात है कि एक नगरसेठ के पास अकूत संपदा थी। वह दयालु स्वभाव का था। उसके यहाँ से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को मुक्तहस्त से दान दिया करता था। उसका जीवन सुखमय था, लेकिन दुःख केवल इस बात का था कि वह निःसंतान था। इसी दुःख के कारण दोनों पति-पत्नी दुखी रहते थे।

एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निर्णय लिया। निर्णय के अनुसार उन्होंने सारा कामकाज अपने नौकरों को सौंप दिया और अगले ही दिन तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े। नगर से कुछ दूर आगे जाने पर उन्हें एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक महात्मा समाधि में लीन दिखाई दिए।

दोनों पति-पत्नी ने विचार किया कि महात्मा से आशीर्वाद लेकर ही आगे की यात्रा करनी चाहिए। इसलिए दोनों महात्मा के निकट जाकर, हाथ जोड़कर बैठ गए और महात्मा की समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम हो गई और फिर रात हो गई, लेकिन महात्मा की समाधि नहीं टूटी। वे दोनों पति-पत्नी भी हाथ जोड़े धैर्यपूर्वक महात्मा के समक्ष बैठे रहे।

महात्मा की समाधि अगले दिन सवेरे टूटी तो उन पति-पत्नी को देखकर मंद-मंद मुस्कराते हुए आशीर्वाद देने की मुद्रा बनाकर बोले कि वत्स! तुम्हारे मन की बात मैं जान चुका हूँ। तुम्हारे धैर्य व भक्तिभाव से मैं अति प्रसन्न हूँ।

तत्पश्चात् महात्मा ने उन दंपति को संतान-प्राप्ति हेतु शनिवार प्रदोष व्रत की विधि बताते हुए कहा कि भगवान शिव का पूजन करके इस प्रकार वंदना करें—

शिव वंदना

हे रुद्रदेव शिव नमस्कार। शिव भोले तुम्हें नमस्कार॥

हे नीलकंठ त्रिपुरारी नमस्कार। शशि मौली चंद्र धारी नमस्कार॥

हे उमापति शिव नमस्कार। उग्रत्व रूप मम नमस्कार॥

हे ईशान ईश प्रभु नमस्कार। विश्वेश्वर प्रभु-शिव नमस्कार॥

वे दोनों कुछ दिनों बाद तीर्थयात्रा करके घर लौट आए और नियमपूर्वक शनिवार प्रदोष व्रत करने लगे। व्रत के प्रभाव से सेठानी गर्भवती हो गई और समय आने पर उन्हें सुंदर पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।

इस प्रकार शनिवार प्रदोष व्रत करते रहने से उनकी संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण हो गई। भविष्य में भी वे शनिवार प्रदोष व्रत करते रहे और सर्व सुखों को भोगते हुए आनंद से रहने लगे तथा भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति भी बढ़ गई।

आरती

पूजन के अंत में श्री शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा का गायन करें।

व्रत की सम्पूर्ण विधि, माहात्म्य एवं उद्यापन विधि के लिए देखें — प्रदोष व्रत कथा एवं पूजन विधि

स्रोत 1

  • प्रदोष व्रत कथा — पवन पॉकेट बुक्स, दिल्ली (मुद्रित पुस्तिका) — प्रदोष व्रत कथा (पूजन विधि, सातों वारों की प्रदोष कथाएँ, माहात्म्य, उद्यापन विधि व आरती सहित), पवन पॉकेट बुक्स, 4537 नई सड़क, दिल्ली-110006; पृष्ठ 2–23

    पाठ मुद्रित पुस्तिका के पृष्ठ-चित्रों से मिलाकर उतारा गया है — दिया गया लिंक प्रकाशक का सूची-पृष्ठ है, पाठ का स्रोत नहीं। स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियों में ‘चैत्ररथ’ को प्रसंगानुसार ‘चित्ररथ’ और सम्बोधन ‘है देवेंद्र’ को ‘हे देवेंद्र’ रखा गया है।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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