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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत कथा

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सूतजी बोले कि हे ऋषियो! बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत के प्रभाव से शत्रुओं का नाश होता है और उनसे किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। अब आप लोग यह कथा श्रवण करें—

कथा

एक बार देवराज इंद्र और वृत्र नामक असुर की सेनाओं के मध्य घोर संग्राम छिड़ गया। देव सेना ने दैत्य सेना को बुरी तरह परास्त करके नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। अपनी सेना को नष्ट होते देख वृत्र क्रोधित होकर स्वयं युद्ध के लिए युद्ध-भूमि में कूद पड़ा। उसने युद्ध के दौरान अपनी मायावी शक्ति से भीषण रूप धारण कर लिया।

उसके उस भीषण रूप को देखकर देवता देवगुरु बृहस्पति की शरण में गए और अपना कष्ट उनसे कहा तब बृहस्पतिजी ने कहा कि हे देवेंद्र! वृत्र नामक इस असुर के बारे में सुनो। यह असुर पूर्वजन्म में बड़ा तपस्वी था। इसने गंधमादन पर्वत पर घोर तप करके भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया। पूर्व जन्म में यह चित्ररथ नामक राजा था। तुम्हारे समीप ही जो सुरम्य वन है यह इसी का राज्य था, लेकिन आजकल यह मुनियों का आनंदस्थल है तथा भगवान के दर्शन की अति मनोरम भूमि है।

हे देवराज! एक बार चित्ररथ अपने स्वेच्छाचारी विमान में बैठकर कैलाश पर्वत जा पहुँचा। कैलाश पर्वत पर उस समय भगवान शिव के वामांग में माता पार्वती विराजमान थीं। चित्ररथ ने उनका उपहास करते हुए कहा कि हे प्रभो! हम तो माया के वशीभूत होकर विषय भोगों में फँसे रहने के कारण स्त्रियों के वश में रहते हैं, लेकिन देवलोक में मुझे ऐसा कोई भी दिखाई नहीं दिया जो स्त्री से आलिंगनबद्ध होकर सभा में बैठता हो।

चित्ररथ का ऐसा वचन सुनकर भगवान शिव मुस्कराते हुए बोले कि हे राजन्! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण कुछ अलग है। मैंने मृत्यु के दाता कालकूट महाविष पिया है, फिर भी तुम सामान्य लोगों की तरह मेरा उपहास करते हो।

फिर माता पार्वती क्रोधित होकर चित्ररथ को संबोधित करती हुई बोलीं कि अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरा भी उपहास किया है। अतः मैं तुझे शाप देती हूँ कि तू इसी समय विमान से नीचे गिरकर धरती पर राक्षस हो जाए।

माता पार्वती के शापवश चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया। फिर त्वष्टा नामक ऋषि के तप से उत्पन्न हुआ। यह वही वृत्र असुर है। यह बचपन से ही शिवभक्त रहा है, अतः हे देवराज! यह सरलता से नहीं मरेगा। इसके लिए तुम बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत करके भगवान शिव को प्रसन्न करो।

देवगुरु बृहस्पति की आज्ञानुसार देवराज इंद्र ने बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से इंद्र ने वृत्र नामक असुर पर विजय प्राप्त कर ली। इस प्रकार देवलोक में सर्वत्र शांति व्याप्त हो गई।

आरती

पूजन के अंत में श्री शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा का गायन करें।

व्रत की सम्पूर्ण विधि, माहात्म्य एवं उद्यापन विधि के लिए देखें — प्रदोष व्रत कथा एवं पूजन विधि

स्रोत 1

  • प्रदोष व्रत कथा — पवन पॉकेट बुक्स, दिल्ली (मुद्रित पुस्तिका) — प्रदोष व्रत कथा (पूजन विधि, सातों वारों की प्रदोष कथाएँ, माहात्म्य, उद्यापन विधि व आरती सहित), पवन पॉकेट बुक्स, 4537 नई सड़क, दिल्ली-110006; पृष्ठ 2–23

    पाठ मुद्रित पुस्तिका के पृष्ठ-चित्रों से मिलाकर उतारा गया है — दिया गया लिंक प्रकाशक का सूची-पृष्ठ है, पाठ का स्रोत नहीं। स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियों में ‘चैत्ररथ’ को प्रसंगानुसार ‘चित्ररथ’ और सम्बोधन ‘है देवेंद्र’ को ‘हे देवेंद्र’ रखा गया है।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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