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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

सकट चौथ (तिल चौथ) व्रत कथा

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सकट चौथ (तिल चौथ) का व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी को समर्पित होता है। नीचे इस व्रत से जुड़ी पारम्परिक कथाएँ दी गई हैं।

तिल चौथ कथा

सकट चौथ का व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। इस दिन गणेश जी और चाँद की पूजा की जाती है। कहीं-कहीं इसे तिल चौथ भी कहा जाता है।

एक साहूकार दम्पती थे, जिनके कोई संतान नहीं थी। एक दिन साहूकार की पत्नी अग्नि लेने पड़ोस के घर में गई। वहाँ उसने देखा कि पड़ोसन एवं अन्य महिलाएँ पूजन कर कथा सुन रही हैं। यह देख उसने पूछा — आप सब किसकी पूजा एवं व्रत कर रही हो तथा इस व्रत के करने से क्या फल मिलता है? पड़ोसन ने साहूकार की पत्नी को बताया कि यह चतुर्थी की पूजा है। इस दिन व्रत करने तथा कथा कहने-सुनने से बिछड़े हुए मिल जाते हैं। सुख-समृद्धि एवं संतान की मनोकामना पूरी होती है। यह सुनकर साहूकारनी ने वहीं संकल्प किया कि यदि मेरे कोई संतान हो जाएगी तो मैं भी सवा सेर का तिलकुटा चढ़ाऊँगी।

सकट चौथ माता ने उसकी मनोकामना पूरी की तथा उसे पुत्ररत्न हुआ, पर वह तिलकुटा चढ़ाना भूल गई। इसके बाद उसके छह बेटे और हुए, फिर भी उसे तिलकुटा चढ़ाने की याद नहीं आई। सातों बेटे बड़े होने लगे। उसने बड़े बेटे के विवाह के लिए फिर से मन्नत माँगते हुए कहा — यदि मेरे बेटे का विवाह हो जाए तो सवा मन का तिलकुटा चढ़ाऊँगी। विवाह की सभी तैयारियाँ होने लगीं, फिर भी साहूकारनी तिलकुटा चढ़ाना भूल गई।

जब उसका बेटा फेरों में बैठ गया तो चौथ माता विनायक ने सोचा कि साहूकारनी हर बार तिलकुटा बोल तो देती है लेकिन चढ़ाती एक बार भी नहीं। अब तो इसके बेटे का विवाह भी सम्पन्न होने जा रहा है। अगर हम इसे चमत्कार नहीं दिखाएँगे तो हमें कौन मानेगा। इतना कह चौथ माता ने दूल्हे को फेरों से उठाकर गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। दूल्हे के अचानक इस तरह फेरों पर से गायब हो जाने से वहाँ विवाह में शामिल लोगों में हाहाकार मच गया। सभी तरफ दूल्हे को खोजा गया, पर वह कहीं नहीं मिला और दिन बीतते गए।

जब गणगौर पूजन के लिए गाँव के बाहर लड़कियाँ दूब लेने जातीं तो वह लड़की भी उनके साथ जाती जिसका पति फेरों से गायब हो गया था। सब सहेलियाँ जब राह में एक पीपल के समीप से गुजरतीं तो पीपल पर बैठा उसका दूल्हा उसे देखकर कहता — आए म्हारी अद ब्याही हुई। यह आवाज सुनकर वह लड़की चिन्तित होती। इसी चिन्ता से वह दुबली होती जा रही थी। तब माँ ने दुबली होने का कारण पूछा तो बेटी ने बताया कि — मैं जब भी गणगौर पूजने के लिए दूब लेने जाती हूँ तो पीपल में से एक आदमी बोलता है — आए म्हारी अद ब्याही हुई। उसने दूल्हे के कपड़े पहन रखे हैं, हाथों में मेहंदी लगा रखी है और कंगना बाँध रखा है, सिर पर सेहरा बाँध रखा है, आँखों में काजल लगा रखा है।

बेटी की बात सुनकर माँ उस पेड़ को देखने आई। माँ ने देखा वह तो उसी का दामाद है जो फेरों पर से अचानक गायब हो गया था। उसने अपने दामाद से वहाँ बैठने का कारण पूछा तो दूल्हे ने बताया — मैं चौथ माता के यहाँ गिरवी हूँ। मेरी माँ ने तिलकुटा बोला था और चढ़ाया नहीं। इस कारण चौथ माता नाराज हैं और उन्होंने मुझे यहाँ बैठा रखा है। दामाद की बात सुनकर सास उसी समय उसकी माँ के पास गई और सारी बातें बताईं। साहूकारनी ने उसी दिन ढाई मन का तिलकुटा चढ़ाकर चौथ माता के भोग लगाया और पूजा की। इससे चौथ माता खुश हुईं। उसने गिरवी रखे बेटे को छोड़ दिया और विवाह सम्पन्न हुआ। इसके बाद साहूकारनी हर चौथ का व्रत करने लगी।

सकट चौथ व्रत कथा

माघ कृष्ण चतुर्थी को सकट का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सकट हरण गणपति गणेश जी का पूजन होता है। इस व्रत को करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और समस्त इच्छाओं व कामनाओं की पूर्ति होती है। इस दिन स्त्रियाँ दिन भर निर्जल व्रत रखकर शाम को फलाहार लेती हैं। दूसरे दिन सुबह सकट माता को चढ़ाए गए पूरी-पकवानों को प्रसाद रूप में ग्रहण करती हैं। तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूट लिया जाता है। तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा तिलकुट के बकरे की गर्दन काट देता है। सबको इसका प्रसाद दिया जाता है। पूजा के बाद कथा सुनते हैं।

किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आँवा लगाया तो आँवा पका ही नहीं। हारकर वह राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगा। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा तो राजपंडित ने कहा कि हर बार आँवा लगाते समय बच्चे की बलि देने से आँवा पक जाएगा। राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह परिवार अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता।

इसी तरह कुछ दिनों बाद सकट के दिन एक बुढ़िया के लड़के की बारी आई। बुढ़िया के लिए वही जीवन का सहारा था। राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुःखी बुढ़िया सोच रही थी कि मेरा तो एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझसे जुदा हो जाएगा। बुढ़िया ने लड़के को सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा देकर कहा — “भगवान का नाम लेकर आँवा में बैठ जाना, सकट माता रक्षा करेंगी।” बालक आँवा में बिठा दिया गया और बुढ़िया सकट माता के सामने बैठकर पूजा करने लगी।

पहले तो आँवा पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आँवा पक गया था। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया — आँवा पक गया था। बुढ़िया का बेटा तथा अन्य बालक भी जीवित एवं सुरक्षित थे। नगरवासियों ने सकट की महिमा स्वीकार की तथा लड़के को भी धन्य माना। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सकट चौथ (तिल चौथ) व्रत कथा, पृष्ठ 2–5

    पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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