Skip to content
वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

साझा करें

गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित पर्व है, जो हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। नीचे इस पर्व का परिचय एवं पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।

गणेश चतुर्थी

हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करनेवाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का आविर्भाव हुआ था। भगवान विनायक के जन्मदिवस पर मनाया जानेवाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्षोल्लास पूर्वक और भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। इस महापर्व पर लोग प्रातःकाल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। पूजन के पश्चात् नीची नज़र से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

एक बार भगवान् श्री शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद माता पार्वती ने स्नान करते समय अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया तथा उसमें प्राण डाल दिए। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा।

फिर पार्वती जी ने गणेश जी से एक मुद्गर लेकर दरवाजे पर जाकर तब तक पहरा देने के लिए कहा जब तक वह स्नान न कर लें।

कुछ समय बाद भगवान् श्री शंकर स्नान करके वापिस आए और घर के भीतर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जी ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक दिया। इस पर भगवान् श्री शंकर बहुत क्रोधित हो उठे और उन्होंने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले गए।

माता पार्वती ने जब भगवान् श्री शंकर को क्रोधित अंदर आते हुए देखा तो उन्हें लगा कि भोजन में विलम्ब होने के कारण शिव जी नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तुरन्त ही भोजन परोस कर भगवान् शंकर को खाने के लिए बुलाया।

दो थालियों में भोजन लगा देखकर भगवान् श्री शंकर ने माता पार्वती जी से दूसरी थाली किसके लिए है पूछा। इस पर माता पार्वती ने कहा यह हमारे पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर दरवाजे पर पहरा दे रहा है।

यह सुनकर शिवजी आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीति पूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया।

यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — गणेश चतुर्थी व्रत कथा, पृष्ठ 259–260

    पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

संबंधित सामग्री 1

और देखें 13