Skip to content
वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

कार्तिक स्नान पूजा कथा

साझा करें

कार्तिक मास में गंगा स्नान का विशेष महत्व माना गया है। नीचे कार्तिक स्नान की पारम्परिक व्रत कथा दी गई है, जो सच्ची भक्ति और श्रद्धा का फल दर्शाती है।

कार्तिक स्नान पूजा कथा

कार्तिक मास के व्रत आसोज की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक किये जाते हैं। इन दिनों गंगा स्नान का विशेष महत्व है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक सास-बहू ने कार्तिक स्नान करने का निश्चय किया। सास कार्तिक नहाने तीर्थराज जाने लगी तो बहू ने भी साथ जाने की इच्छा व्यक्त की। सास ने बहू को यह कहते हुए मना कर दिया कि अभी तुम्हारी कार्तिक नहाने की उम्र नहीं है, तुम बाद में जाना। यह कह कर सास तीर्थ चली गई। सास के जाने के बाद बहू ने कुम्हार के यहां से तैंतीस मिट्टी के कुण्ड मंगवा कर रख लिए। वह रोजाना रात में एक कुण्ड पानी से भर कर रख लेती और सवेरे जल्दी उठ स्नान कर कुण्ड को छत पर उल्टा रख कर विधि-विधान से पूजा करती।

इधर एक दिन सास की नथ नहाते हुए गंगा जी में गिर गई। उधर बहू हमेशा की तरह नहाते समय बोली — “सास नहाए उड़ै मैं नहाऊं कुण्डे।” उसी समय अचानक गंगा जी की धारा बहू के कुण्ड में आई। उसी में उसकी सास की नथ भी आ गई। बहू ने कुण्ड में आई नथ को देखा तो वह पहचान गई कि यह तो सास की है। इस तरह दोनों को नहाते हुए पूरा एक महीना बीत गया।

सास जब वापस लौट कर अपने घर आई तो बहू ने सास की खूब आवभगत की। उसी समय सास ने देखा कि उसकी गंगा में खोई हुई नथ बहू ने पहन रखी है तो पूछा — यह नथ तुम्हारे पास कहां से आई? बहू ने उत्तर देते हुए वह पूरी घटना सास को बता दी कि जब कुण्ड में गंगा जी की धारा के साथ नथ आ गई थी। सास को इस घटना पर बहुत अचरज हुआ लेकिन वह चुप रही।

कार्तिक स्नान के बाद सास ने पंडितों को भोजन कराने की इच्छा व्यक्त करते हुए बहू से कहा — मुझे पंडितों को भोजन कराना है। इस पर बहू ने सास से विनती की कि माँ जी, आप चार पंडितों को भोजन कराना चाहती हैं तो मेरे भी दो जोड़ दें क्योंकि मैंने भी कार्तिक स्नान किया है। बहू की बात सुन कर सास ने कहा — तुम कहां कार्तिक नहाई हो, गंगा तीर्थ तो मैं जाकर आई हूं। तब बहू ने सास को छत पर ले जाकर वह कुण्ड दिखाए जिसमें उसने कार्तिक स्नान किया था।

सास ने देखा कि मिट्टी के वे कुण्ड सोने के हो गए हैं। यह देख सास ने बहू से कहा — बहू, तुम्हारा भाग्य अच्छा है जो गंगा की धारा कुण्ड में आ गई, सारे कुण्ड सोने के हो गए। मैं अहंकार वश तीर्थ गई थी लेकिन वहां भी मुझे कुछ नहीं मिला। तुमने सच्ची भक्ति भाव से कार्तिक स्नान किया है इसलिए भगवान ने तुम्हें इतना सब कुछ यहीं दे दिया।

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कार्तिक स्नान पूजा कथा, पृष्ठ 243

    पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

संबंधित सामग्री 4

और देखें 7