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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीनारायणकवचम्

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न्यास 4

कवच 42

समापन 1

परिचय

श्रीनारायणकवच श्रीमद्भागवत महापुराण (षष्ठ स्कन्ध, अष्टम अध्याय) का प्रसिद्ध रक्षा-कवच है, जिसे त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप ने देवराज इन्द्र को उपदेश किया था। इसमें भगवान् नारायण के मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन, राम आदि विविध अवतारों तथा उनके शंख-चक्र-गदा आदि आयुधों का आवाहन कर दिशा, काल एवं अंग-प्रत्यंग की रक्षा की प्रार्थना है। इसी कवच से सुरक्षित होकर इन्द्र ने असुरों को जीतकर त्रैलोक्य-लक्ष्मी का भोग किया।

संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; अर्थ व्याख्यात्मक हैं।

स्रोत 2

  • Sanskrit Documents — श्रीनारायणकवचम् — nArAyaNakavacham (Bhagavata Purana 6.8), proofread ITRANS

    संस्कृत मूल पाठ इसी प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; प्रारम्भिक न्यास १३-कवचसंग्रह से लिया गया है (मूल भागवत-कवच में न्यास-पद्धति नहीं)। अर्थ व्याख्यात्मक (site sArtha अनुवाद से मिलान)। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।

  • Sanskrit Documents — नारायणकवच सार्थ (meaning) — verse-by-verse Sanskrit–English meaning (sArtha)

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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