एकादशी व्रत कथा
उपवास की आवश्यकता
हमारे देश में सामान्यतः सब लोग उपवास करते हैं। सप्ताह के कौन से तो दिन उपवास का व्रत रखते हैं और उसके द्वारा विविध देवताओं को प्रसन्न करने की इच्छा होती है। इस व्रत के पीछे कोई तो उद्देश्य निश्चित ही होता है। साधारणतः धन प्राप्ति के हेतु, बीमारी से ठीक होने के लिए, राजनीति में पद के लिए, अच्छी नौकरी, पत्नी या पति प्राप्ति के लिए लोग उपवास करते हैं।
भौतिक इच्छा प्राप्ति के लिए उपवास करने से बहुत बार फल मिलता है। पर यह फल भौतिक होने से सिर्फ क्षणिक होता है। ऐसे व्रत करना मतलब भगवान से किया हुआ सौदा ही है। हमारी इच्छा पूरी होते ही व्रत समाप्त करके हम भूल जाते हैं। ‘जरूरत खत्म होते ही वैद्य की गुंजाइश नहीं रहती!’ श्रील प्रभुपाद ऐसे अनुष्ठानों को ‘भौतिक धर्म’ कहते थे।
भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त भी एकादशी, जन्माष्टमी, रामनवमी, गौर पौर्णिमा, नरसिंह जयंती, व्यासपूजा या और अन्य वैष्णव तिथियों को उपवास करते हैं, व्रत रखते हैं। इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य होता है? वस्तुतः भक्तों की कोई भी भौतिक कामना नहीं होती। भक्त अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह व्रत करते हैं। व्रत का पालन करना यह मूल सिद्धांत न होकर, भगवान् के प्रति अपनी श्रद्धा बढ़ाना यह कारण है। उपवास करने से मन शुद्ध होता है, मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा बढ़ाना यह कारण है। मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण की सेवा उत्तम प्रकार से करने के लिए उपवास सहायक होता है।
एकादशी के दिन अन्न का त्याग करके, शारीरिक आवश्यकताएँ कम करके श्रवण-कीर्तन के द्वारा भगवान् की अधिक से अधिक सेवा करना यही उपवास का उद्देश्य है। इससे भगवान संतुष्ट होते हैं। भारत में अनादि काल से एकादशी के व्रत का पालन किया जाता है। लेकिन अभी लोगों को अध्यात्म के प्रति कोई रुचि नहीं है। अगर कोई एकादशी व्रत रखना चाहता है तो घर के लोग नाराज होते हैं। एकादशी व्रत का पालन बड़े-बुजुर्ग लोगों को करना है, जवानों को तो खा-पीकर मौज करनी चाहिए — ऐसा उपदेश दिया जाता है।
श्रील प्रभुपाद एकादशी तथा अन्य उत्सवों के वक्त व्रत रखने को आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं। वे कहते हैं, “यह सभी विधि-विधान हमारे महान आचार्यों ने उन लोगों के लिए बनाए हैं जो दिव्य जगत् में भगवान् का संग पाने के इच्छुक हैं। महात्मागण इन सभी विधि-विधानों को मानते हैं, इसलिए उन्हें फल मिलता है।”
— प्रकाशक
प्रस्तावना
बहुत सारे भक्तों के आग्रह पर यह पुस्तक लिखने का प्रयास किया है। श्रील व्यासदेवजी ने पुराणों में एकादशीव्रत का माहात्म्य अनेक स्थानों पर किया है। इस पुस्तक में हर एकादशी माहात्म्य का वर्णन कथारूप में किया गया है। कथा पढ़ने के बाद किसी को ऐसा प्रतीत हो कि इस पालन से भौतिक लाभ होता है, इसलिए यह व्रत केवल भौतिक लाभहेतु हो। किंतु वैसा नहीं है, जो वैष्णव है, उनके लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है। एकादशी भगवान् श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, इसलिए उसको हरिवासर कहते हैं।
‘उपवास’ इस शब्द का अर्थ है पास रहना। हमें अगर भगवान के निकट रहना है, तो उपवास करना आवश्यक है। इसीलिए एकादशी के दिन सभी भौतिक इंद्रियतृप्ति के कार्य से दूर रहकर भगवान के नामस्मरण में अधिक-से-अधिक समय बिताना चाहिए। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि —
उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह। उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः॥
उपवास का मतलब सभी पापों से और इंद्रियतृप्ति के कार्यों से दूर रहना। निश्चित ही एकादशी व्रत के पालन से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनकी प्राप्ति तो होती है, पर उसके साथ पंचम पुरुषार्थ भगवद्भक्ति अथवा कृष्णप्रेम भी प्राप्त होता है।
श्री हरिभक्ति विलास नामक ग्रंथ में बताया गया है कि —
एकादशीव्रतं नाम सर्वकामफलप्रदम्। कर्तव्यं सर्वदा विप्रैः विष्णुप्रीणनकारणम्॥
भगवान् श्रीविष्णु की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को एकादशी व्रत का पालन करना चाहिए। यह उनका कर्तव्य है। इसीलिए हर एक व्यक्ति को भगवान की प्रसन्नता के लिए इस व्रत का पालन करना चाहिए। भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न होने से सुख और समृद्धि अपने आप प्राप्त होती है।
ॐ विष्णुपाद नित्यलीला प्रविष्ट सच्चिदानंद भक्तिविनोद ठाकुर अपने एक गीत में लिखते हैं —
माधव तिथि भक्ति जननी, जानते पालन करी।
माधव तिथि अर्थात एकादशी, जन्माष्टमी इ. व्रत, भक्तिजननी का मतलब हमारे हृदय में भक्ति निर्माण करने वाली है। इसलिए वे कहते हैं कि हमें प्रयत्नपूर्वक उसका पालन करना चाहिए।
संत शिरोमणि श्री तुकाराम महाराज कहते हैं —
ज्यासी नावडे एकादशी। तो जिताची नरकवासी। ज्यासी नावडे हे व्रत। त्यासी नरक तोहि भीत। ज्यासी घडे एकादशी। जाणे लागे विष्णुपाशी। तुका म्हणे पुण्यराशी। तोचि करी एकादशी॥
जिसे यह एकादशी अच्छी नहीं लगती, वो जीते जी नरक में रहने वाला व्यक्ति है। जिसे यह व्रत पसंद नहीं उससे नरक भी डरते हैं, क्योंकि वह व्यक्ति महापापी माना जाता है। जो एकादशी व्रत का पालन करता है, उसे निश्चित वैकुंठ प्राप्ति होती है। इसीलिए तुकाराम महाराज कहते हैं जिसने पूर्वजन्मों में पुण्यों की राशियाँ इकट्ठी की हैं, वे ही केवल एकादशी व्रत का पालन करते हैं।
एकादशी को अन्नग्रहण करने से क्या होता है इसका वर्णन तुकाराम महाराज इस प्रकार करते हैं —
एकादशीस अन्नपान। जे नर करिती भोजन। श्वान विष्ठेसमान। अधम जन ते एक। तया देही यमदूत। जाले तयाचे अंकित। तुका म्हणे व्रत। एकादशी चुकलिया॥
जो लोग एकादशी को अन्नग्रहण करते हैं, भोजन करते हैं वह बहुत ही पतित जीव हैं। उन्हें अधम माना जाता है, क्योंकि वे जो भोजन करते हैं वह श्वान की विष्ठा जैसा होता है। जो यह व्रत नहीं करता, उसके लिए यमदूत ही हैं, वो नरकगामी बनता है।
एकादशी के दिन पापपुरुष अन्न में वास करता है, इसलिए अन्नग्रहण नहीं करना चाहिए। जिसे अपना हित करना हो उसे निम्नलिखित अन्न का एकादशी के दिन त्याग करना चाहिए —
- चावल तथा उससे बने पदार्थ,
- गेहूँ, ज्वार, मक्का इनसे बने हुए पदार्थ,
- दाल — मूँग, मसूर, तूर, चना, मटर इत्यादि,
- जौ,
- राई और तिल का तेल।
भूल से भी इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, अन्यथा व्रत भंग होता है।
भक्ति में प्रगति करने के इच्छुक व्यक्ति को इनका पालन करना चाहिए। एक ही दिन दो तिथि आती हो तो वैष्णव उस दिन का व्रत अथवा उत्सव दूसरे दिन करते हैं। इसलिए हम स्मार्त और भागवत यह दो एकादशी देखते हैं। हरिभक्ति विलास इस ग्रंथ में कहा गया है, हे ब्राह्मण, सूर्योदय से पूर्व 96 मिनट के पहले एकादशी शुरू होती है उस एकादशी को शुद्ध एकादशी कहना चाहिए। गृहस्थों को इस एकादशी का पालन करना चाहिए।
एकादशी करने वाले या करने की इच्छा होने वाले हर एक व्यक्ति को इस ग्रंथ को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए।
— संग्राहक
१. उत्पन्ना एकादशी
उत्पन्ना एकादशी का महात्म्य भविष्योत्तर पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण अपने सखा अर्जुन को बताते हैं।
नैमिष्यारण्य में एकत्रित हुए सभी ऋषियों को सूत गोस्वामी बताते हैं, “भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताये अनुसार जो नियमपूर्वक एकादशीव्रत करता है, उसे इस जन्म में आनंद और अगले जन्म में वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।”
एक बार अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! एकादशी के दिन पूरा उपवास करने से, या केवल रात को खाने से, या केवल दोपहर में प्रसाद लेने से क्या लाभ मिलता है?”
तब भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन! हेमंत ऋतु के प्रारंभ के मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी करनी चाहिए। प्रात:काल उठकर इसका प्रारंभ करे। दोपहर में स्नान करके शुद्ध होना चाहिए। स्नान करते हुए पृथ्वीमाता की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए —
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिका हर मे पापं यन्मया पूर्वसंचितम्॥
“हे अश्वक्रान्ते! हे रथक्रान्ते! हे विष्णुक्रान्ते! हे वसुंधरे! हे मृत्तिके! हे पृथ्वीमाता! पूर्वजन्मों के मेरे सभी पापों को नष्ट कर दो, जिससे मैं उच्चध्येय (भगवत्धाम) की प्राप्ति कर सकूं।”
उसके बाद भगवान श्रीगोविंद की पूजा करनी चाहिए।
एक बार देवराज इंद्र सब देवताओं के साथ श्रीविष्णु के पास गये और इस तरह प्रार्थना करने लगे, “हे जगन्नाथ! हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्! हमारा प्रणाम स्वीकार करें। आप सबके आश्रय हैं। आप ही सबके माता-पिता हैं। आप सभी का सृजन, पालन, विनाश करनेवाले हैं। आप धरती, आकाश समेत सभी ब्रह्मांडों का हित करनेवाले हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। यज्ञ, तपस्या और वैदिक मंत्रों के स्वामी तथा भोक्ता आप हैं। इस जगत में ऐसी कोई भी (चराचर) वस्तु नहीं जिसपर आपका नियंत्रण न हो। संपूर्ण जगत् के चर-अचर वस्तु के स्वामी तथा नियंत्रक आप ही हैं। हे पूर्ण पुरुषोत्तम! हे देवेश्वर! हे शरणागत वत्सल! हे योगेश्वर! दानवों ने सभी देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया है और भय से उन्होंने आपके चरणों की शरण ली है। कृपया उनकी रक्षा करें। हे जगन्नाथ! स्वर्ग से इस भूलोक पर पतन होकर हम इस दु:खसागर में डूब रहे हैं। कृपया हम पर आप प्रसन्न होईये।”
इस प्रकार इंद्र की दया की प्रार्थना सुनने पर भगवान् श्रीविष्णु ने पूछा, “ऐसा कौनसा अविजयी दानव है, जिससे देवता पराजित हो रहे हैं? उसका नाम क्या है? उसकी शक्ति का स्रोत क्या है? हे इंद्र, निर्भय होकर सभी जानकारी हमें कहो।”
इंद्र ने कहा, “हे देवेश्वर! हे भक्तवत्सल! हे पुरुषोत्तम! देवताओं में भय और चिंता निर्माण करनेवाला असुर नंदीजंघ ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है। उसके जैसा ही उसका बलशाली और कुप्रसिद्ध मूर नामका बेटा है। चंद्रावती नाम का भव्य नगर मूर राक्षस की राजधानी है। इसी मूर राक्षस ने सब देवताओं को स्वर्ग से निकालकर स्वयं वहाँ निवास कर रहा है। इंद्र, अग्नि, चंद्र, वरुण, यम, वायु और ईश — ये सभी देवताओं के अधिकार उसने छीन लिए हैं। हम सब देवता मिलकर भी उसे पराजित नहीं कर सके। हे विष्णु! आप कृपया उसका अंत करके देवताओं की रक्षा कीजिए।”
इंद्र के यह शब्द सुनते ही देवताओं को कष्ट देनेवाले मूर राक्षस के प्रति श्रीविष्णु को क्रोध आया और वे कहने लगे, “हे देवराज! मैं स्वयं उस शक्तिशाली दानव का वध करूँगा। आप सब चंद्रावती नगर चलिए।” सब देवता भगवान के कहे अनुसार चंद्रावती नगरी में जाकर अनेक प्रकार के शस्त्र जमा करने लगे।
दानवों के सामर्थ्य से पहले ही सभी देवता भयभीत थे। पर अब भगवान श्रीविष्णु के नेतृत्व में निर्भय होकर देवता रणभूमि में पहुँचे। उन्हें देखकर राक्षस क्रोधित हो गये। भगवान् ने सभी असुरों को पराजित किया, परंतु मूर को पराजित करना कठिन लगने लगा। अनेक अस्त्र-शस्त्र का उपयोग करने पर भी भगवान् मूर राक्षस को मार नहीं सके। दस हजार वर्ष तक दोनों में बाहुयुद्ध चला, अंत में मूर राक्षस को पराजित करके भगवान बद्रिकाश्रम में हेमवती नामक गुफा में विश्राम करने पधारे।
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, “हे अर्जुन! उस असुर ने गुफा तक पीछा करके उसमें प्रवेश किया और श्रीविष्णु को निद्रावस्था में मारने का विचार किया। उस समय उनके शरीर से एक तेजस्वी कन्या बाहर निकली। वह शस्त्रों से परिपूर्ण थी, उसने मूर राक्षस से बहुत समय तक युद्ध करके उसका वध किया। शेष दानव भयभीत होकर पाताल लोक में गये। श्रीविष्णु ने निद्रा से जागकर मूर राक्षस का शव और उनके सामने हाथ जोड़के खड़ी हुई कन्या देखी तो आश्चर्य से पूछने लगे, “तुम कौन हो?”
उस देवी ने उत्तर दिया, “हे भगवान! मैं आपके शरीर से उत्पन्न हुई हूँ और इस असुर का मैंने वध किया है! आपको निद्रावस्था में देखकर मारने के लिए आनेवाले इस असुर का मुझे वध करना पड़ा!”
भगवान श्रीविष्णु ने कहा, “हे देवी! आपके इस कार्य से मैं प्रसन्न हूँ। तुम मनचाहा वरदान माँग लो।” जब देवी ने वरदान मांगा तब भगवान् श्रीविष्णु ने कहा, “तुम मेरी आध्यात्मिक शक्ति हो, एकादशी दिन उत्पन्न होने के कारण तुम्हारा नाम एकादशी होगा। जो भी एकादशी व्रत करेगा उसे अक्षय सुख की प्राप्ति होगी।”
“उस दिन से एकादशी दिन विश्व में पवित्र दिन जाना जाता है। हे अर्जुन! जो इसका पालन करेगा उसे मैं परम (उच्च) गति प्रदान करता हूँ! हे अर्जुन! एकादशी और द्वादशी एक ही तिथि में होने पर उस एकादशी को सर्वोच्च माना गया है। एकादशी दिन मैथुन, अन्न, मद्य, मांस, रसोई में कांस्य के बर्तन, शरीर को तेल लगाना वर्जित है। जो इसका महात्म्य जानकर व्रत करेगा उसे अधिक फलप्राप्ति होगी।“
२. मोक्षदा एकादशी
ब्रह्मांड पुराण में मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष में आनेवाली मोक्षदा एकादशी का महात्म्य भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं।
युधिष्ठिर महाराज ने पूछा, “हे देवदेवेश्वर! मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी का क्या नाम है? उसे किस प्रकार करना चाहिए, किस देवता को पूजना चाहिए? कृपया इस विषय पर विस्तार से कहें!”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी मोक्षदा कहलाती है। इसकी महिमा सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह एकादशी पापहरण करती है। हे राजन्! इस दिन तुलसी मंजरी और धूप-दीप के साथ भगवान दामोदर की पूजा करनी चाहिए। बड़े-बड़े पातकों को नष्ट करनेवाली मोक्षदा एकादशी की रात्रि में मेरी प्रसन्नता के लिए नृत्य, कीर्तन तथा कथा करके जागरण करना चाहिए। जिनके पूर्वज नरक में हैं, वे इस एकादशी के पुण्य को पूर्वजों को दान करने से उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है।”
प्राचीन काल में वैष्णव निवासित रमणीय चम्पक नगर में वैखानस महाराज राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का संतान की भाँति पालन करते थे। एक रात को उन्होंने स्वप्न में देखा कि उनके पितर नीच नरक योनि में हैं। अपने पितरों की इस अवस्था से आश्चर्यचकित होकर अगले प्रात:काल में ब्राह्मणों को बुलाकर उस स्वप्न के बारे में कहा।
महाराज ने कहा, “हे ब्राह्मणो! मैंने अपने पितरों को नरक में देखा है। बारबार रुदन-क्रंदन करते हुए मुझे कह रहे थे — तुम हमारे तनुज हो, तुम ही हमें इस स्थिति से निकाल सकते हो। हे द्विजवर! मैं उनकी इस अवस्था से अत्यंत विचलित हूँ। क्या करना चाहिए? कहाँ जाना चाहिए? कुछ समझ में नहीं आता। हे द्विजश्रेष्ठ! कौनसा व्रत, तप या योग करने से मेरे पूर्वजों का नरक से उद्धार होगा, कृपया मुझसे कहिए। मेरे जैसा बलवान और साहसी पुत्र होते हुए भी मेरे माता-पिता नरक में हों, तो मेरा जीवन व्यर्थ है?”
ब्राह्मण कहने लगे, “राजन्! निकट ही पर्वतमुनि का आश्रम है, उन्हें भूत-भविष्य ज्ञात है। हे नृपश्रेष्ठ! आप उनके पास जाईये।”
ब्राह्मणों की बात सुनकर तत्काल राजा पर्वतमुनि के आश्रम में गये और मुनि को दंडवत करके उनके चरणस्पर्श किए। मुनि ने भी राजा का कुशलक्षेम पूछा।
महाराज कहने लगे, “स्वामिन्! आपकी कृपा से राज्य में सब कुशल है। किंतु मैंने स्वप्न में देखा कि मेरे पूर्वज नरक में हैं। कौनसे पुण्य से उनको मुक्ति मिलेगी कृपया आप कहिए।”
राजा के वचन सुनकर मुनि कुछ काल ध्यानस्थ हुए और राजा से कहा, “महाराज! मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष को मोक्षदा एकादशी आती है। उस व्रत का आप सभी पालन करके उसका पुण्य पूर्वजों को दान कीजिए। उस पुण्य के प्रभाव से उनकी नरक से मुक्ति होगी।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! मुनि के वचन सुनते ही राजा ने घर लौटकर एकादशी व्रत को धारण करके उसका पुण्य अपने पितरों को दान किया। उस पुण्य के दान करते ही आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। वैखानस महाराज के पिता-पूर्वज नरक से बाहर निकल के आकाश में आए और राजा को कहा, “पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो!” इस आशीर्वाद को देकर वे सब स्वर्ग में गए।
इस प्रकार जो कोई चिंतामणिसमान इस एकादशी का व्रत करेगा उसे मृत्यु के बाद मोक्ष मिलेगा। जो इस महात्म्य को सुनेगा, पढ़ेगा उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होगी।
३. सफला एकादशी
ब्रह्मांड पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद में सफला एकादशी का महात्म्य बताया गया है। युधिष्ठिर महाराज ने पूछा, “हे स्वामिन्! पौष महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? यह व्रत किस प्रकार करते हैं? किस देवता की पूजा करते हैं? इसके बारे में आप विस्तार से कहिए?”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “राजेन्द्र! बहुत बड़े-बड़े यज्ञ करने से जो आनंद प्राप्त होता है, उससे अधिक आनंद इस व्रत का पालन करनेवाले से मुझे होता है। यथाशक्ति विधिपूर्वक हर एक व्यक्ति को यह व्रत करना चाहिए। भगवान् नारायण की पूजा करें। जिस तरह सर्पों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्रीविष्णु और मानवों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब व्रतों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है। हे राजन! सफला एकादशी के दिन नाममंत्र का उच्चारण करते हुए नारियल, सुपारी, आम, नींबू, अनार, आँवला, लवंग, बेर आदि फलों को अर्पण करके श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए। धूप-दीप से भगवान की अर्चना करनी चाहिए। सफला एकादशी को विशेष करके दीपदान करने का भी विधान है। रात को वैष्णवों के साथ भगवत्-कथा, कीर्तन करते हुए जागरण करे। हजारों वर्षों की तपस्या से भी इस रात्रि के जागरण के फल की तुलना नहीं की जा सकती।”
“हे नृपश्रेष्ठ! अब इस सफला एकादशी की शुभदायी कथा सुनो। प्राचीन काल में चम्पावती नामक सुंदर नगरी महाराज माहिष्मता की राजधानी थी। उन्हें पांच पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र हमेशा पापकर्म करते हुए परस्त्री संग और वेश्यासक्त था। अपने पिता का धन पापकर्मों में नष्ट किया। वह दुराचारी ब्राह्मण, वैष्णव, देवताओं की निंदा करता था। उसके इन पापकर्मों को देखकर राजा ने उसका नाम लुभ्भक रखा। कुछ दिनों पश्चात पिता और दूसरे भाईयों ने उसे राज्य से निकाल दिया। लुभ्भक गहन वन में चला गया। वन में रहते हुए लुभ्भक यात्रियों को लूटने लगा। एक दिन नगर में चोरी करने लुभ्भक गया, तो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। अपने पिता का नाम कहने पर सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया। वह वापस वन में गया और मांस, फलहार पर जीवन-निर्वाह करने लगा। वह दुष्ट प्राचीन बरगद पेड़ के नीचे विश्राम करता था। वह पेड़ अत्यंत प्राचीन होते हुए उस वन में उस वृक्ष को महान देवता माना जाता था।”
बहुत दिनों पश्चात संचित पुण्यप्रभाव से उसने एक दिन अनजाने एकादशी व्रत का पालन किया। पौष महीने की कृष्ण पक्ष की दशमी को लुभ्भक वृक्ष के फल खाकर और वस्त्रहीन रहने से रातभर ठंडी में सो नहीं सका। लगभग वह बेहोश हो चुका था। ‘सफला’ एकादशी दिन भी वह बेहोश ही रहा। दोपहर में उसे होश आया। उठकर अथक प्रयास से चलते हुए, भूख से व्याकुल वह गहन वन में गया। जब फलों को साथ वह लौटा तब सूर्यास्त हो रहा था। इसलिए उस फलों को वृक्ष के मूल में रखा और प्रार्थना की, कि भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु इन फलों का स्वीकार करें। ऐसा कहकर लुभ्भक उस रात भी नहीं सोया। इससे अनजाने में उसने व्रतपालन किया।
उस समय आकाशवाणी हुई, “हे राजकुमार! ‘सफला’ एकादशी के फल के प्रसाद से तुम्हें राज्य और पुत्र प्राप्ति होगी।” तब उसका मन परिवर्तन हुआ। उस समय से उसने अपनी बुद्धि भगवान् विष्णु के भजन में लगायी। उसके बाद वह अपने पिताश्री के पास लौट गया, पिता ने उसे राज्य दिया, अनुरूप राजकन्या के साथ विवाह करके बहुत वर्षों तक उत्तम राज्य करता रहा। भगवान विष्णु के वरदान से उसे ‘मनोज’ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। मनोज जब राज्य संभालने योग्य हुआ तब लुभ्भक ने आसक्तिरहित होकर राज्य त्याग दिया और भगवान् श्रीकृष्ण के शरणागत हो गया। इस प्रकार से सफला एकादशी के व्रत प्रभाव से इस जन्म में उसे सुख प्राप्त हुआ, साथ ही मृत्यु पश्चात मोक्ष की भी प्राप्ति हुई। सफला एकादशी के पालन से तथा महिमा सुनने से मनुष्य को राजसूय यज्ञ की प्राप्ति होती है।
४. पुत्रदा एकादशी
भविष्योत्तर पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण तथा महाराज युधिष्ठिर के संवाद में पुत्रदा एकादशी के महात्म्य का वर्णन मिलता है।
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा, “हे श्रीकृष्ण! कृपा करके मुझे पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का वर्णन करे। उस व्रत की विधि क्या है? तथा कौनसे देवता की पूजा की जाती है?”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “जगत कल्याण के लिए इस एकादशी का मैं वर्णन करूँगा। अन्य एकादशी की तरह इस एकादशी को व्रत करे। इसे ‘पुत्रदा’ कहते हैं। सब पापों का हरण करनेवाली यह सर्वोत्तम तिथि है। कामना तथा सिद्धि को पूर्ण करनेवाले भगवान् इस तिथि के अधिदेवता हैं। पूरे त्रिलोक में यह सबसे उत्तम तिथि है।”
“एक दिन घोड़े पर सवार होकर महाराज सुकेतुमान गहरे वन में चले गये। पुरोहित और दूसरे लोगों को इसकी कल्पना नहीं थी। पशु-पक्षियों से भरे हुए इस गहरे वन में महाराज भ्रमण कर रहे थे। दोपहर होते ही, महाराज को भूख और प्यास लगी। जल की तलाश में महाराज इधर-उधर घूम रहे थे। पूर्वजन्म के पुण्य से उन्हें एक जलाशय दिखाई दिया। उस जलाशय के पास ही एक मुनि का आश्रम था। अनेक शुभ शकुन होने लगे, उनकी बाँयी आँख और बायाँ हाथ फड़कने लगा। शुभ घटना की आशा में राजा आश्रम में गये। उन्हें देखकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई। घोड़े से उतरकर राजा ने सभी मुनियों को प्रणाम किया, तब उन मुनियों ने कहा, “हे राजन! हम आप पर प्रसन्न हैं।”
राजा ने कहा, “हे मुनिगण! आप कौन हैं? आपके नाम क्या हैं? आप यहाँ पर किस उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं? कृपया हमें सत्य बताईये।”
मुनि ने कहा, “राजन! हम विश्वदेव हैं। आज से आनेवाली पाँचवी तिथि से माघ मास प्रारंभ होगा। आज ‘पुत्रदा’ एकादशी है। जो कोई भी यह एकादशी करता है उसे पुत्रप्राप्ति अवश्य होती है।”
राजा ने कहा, “विश्वदेवगण! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे कृपया पुत्रप्राप्ति हो!”
मुनि ने कहा, “राजन! आज ‘पुत्रदा’ एकादशी है। आज आप इसका पालन करे, भगवान केशव के प्रसादरूप आपको पुत्रप्राप्ति होगी।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! इस प्रकार मुनियों के कहने पर राजा ने एकादशी व्रत किया। द्वादशी को व्रत संपूर्ण करके (पारण करके) मुनियों का आशीर्वाद लेकर राजा वापस आया। उसके पश्चात् रानी गर्भवती हुई और एकादशी के पुण्य से राजा को तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसने अपने उत्तम गुणों से अपने पिता को संतोष दिया, वह उत्तम प्रजापालक था। इसलिए, हे राजन! ‘पुत्रदा’ व्रत अवश्य करना चाहिए। जो कोई भी इस व्रत का पालन करता है उसे पुत्र की प्राप्ति होकर वह मनुष्य स्वर्गप्राप्त करता है।”
“जो इस व्रत की महिमा पढ़ेगा, सुनेगा या कहेगा उसे अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति होगी।“
५. षट्तिला एकादशी
भविष्योत्तर पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर महाराज के संवाद में षट्तिला एकादशी महात्म्य का वर्णन है।
युधिष्ठिर ने पूछा, “हे जगन्नाथ! हे श्रीकृष्ण! हे आदिदेव! हे जगत्पते! माघ मास के कृष्ण पक्ष में कौनसी एकादशी आती है? उसे किस प्रकार करना चाहिए? उसका फल क्या होता है? हे महाप्राज्ञ! कृपया इस विषय में आप कुछ कहिए।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे नृपश्रेष्ठ! माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘षट्तिला’ नाम से विख्यात है। सब पापों को हरण करनेवाली एकादशी की कथा मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दाल्भ्य को कही थी। वह कथा तुम भी सुनो।”
दाल्भ्य ने पूछा, “हे मुनिवर्य! मृत्यु लोक में रहनेवाला हर एक जीव पापकर्म में रत है। उन्हें नरक यातना से बचाने के लिए कौनसा उपाय है, कृपया वह आप कथन करें।”
पुलस्त्य कहने लगे, “हे महाभाग! आपने अच्छी बात पूछी है, तो सुनो। माघ मास में मनुष्य को स्नान करके इंद्रियों को संयम में रखकर काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और निंदा का त्याग करना चाहिए। देवाधिदेव! भगवान् का स्मरण करते हुए पानी से पैरों को धोकर भूमि पर गिरा हुआ गाय का गोबर इकट्ठा करके उसमें तिल और कपास मिलाकर एकसौ आठ पिंड बनाने चाहिए। माघ मास में आर्द्रा मूल नक्षत्र आते ही कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत धारण करे। स्नान से पवित्र शुद्धभाव से श्रीविष्णु की पूजा करे। अपराध क्षमा के लिए श्रीकृष्ण नाम का उच्चारण करें। रात में होम, जागरण करे। चंदन, कर्पूर, अरभजा और भोग दिखाकर शंख, चक्र, पद्म और गदा धारण करनेवाले श्रीहरि की पूजा करें। बारंबार श्रीकृष्ण के नाम के साथ कुम्हड़, नारियल और बिजौरे के फल अर्पण करके विधिपूर्वक अर्घ्य दे। दूसरी सामग्री का अभाव हो तो सौ सुपारियों का उपयोग करके भी पूजन और अर्घ्यदान किया जा सकता है।
अर्घ्य मंत्र इस प्रकार है :—
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव। संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरूषोत्तम॥ नमस्ते पुंडरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन। सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरूष पूर्वज॥ गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते।
सच्चिदानंद श्रीकृष्ण आप बड़े दयालु हैं। हम अनाथ जीवों के आश्रयदाता आप हो। हे पुरुषोत्तम! हम इस संसार सागर में डूब रहे हैं, कृपया हम पर प्रसन्न हो, हे विश्वभावन! हमारा आपको वंदन है। हे कमलनयन! आपको प्रणाम है। हे सुब्रह्मण्यम! हे महापुरुष! हे सभी के पूर्वज! आपको प्रणाम है। हे जगत्पते! लक्ष्मी के साथ आप इस अर्घ्य को स्वीकार करे।
उसके पश्चात ब्राह्मणों की पूजा करके, उन्हें पानी से भरा घड़ा देना चाहिए। साथ में छाता, चप्पल और वस्त्र भी अर्पण करें। ‘इस दान द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न हों’ यह कहते हुए दान करना चाहिए। अपनी परिस्थिति अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मण को काली गाय दान में देनी चाहिए। हे द्विजश्रेष्ठ! विद्वान पुरुष ने तिल से भरा हुआ पात्र दान करना चाहिए। तिल के दान से व्यक्ति हजारों वर्ष स्वर्ग में वास करता है।
तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी। तिलदाता च भोक्ता च षट्तिला पापनाशिनी॥
तिल से स्नान करना, तिल का उबटन लगाना, तिल का हवन करना, तिल डाला हुआ जल पीना, तिल दान करना, तिल का भोजन में उपयोग करना — इस प्रकार छ: कार्यों में तिल का उपयोग करने से इसे ‘षट्तिला’ एकादशी माना जाता है, जो पापहारिणी है।
एक बार षट्तिला एकादशी की महिमा सुनने देवर्षि नारद भगवान् श्रीकृष्ण के पास आए। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “एक ब्राह्मण स्त्री थी। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वह भगवान् की आराधना करती थी। अनेक प्रकार की तपस्याओं के कारण वह बहुत दुर्बल हो गई थी। उसने बहुत दान दिए, परंतु उसने ब्राह्मण और देवताओं को अन्नदान नहीं किया था। अनेक प्रकार के व्रत और तपस्या करने से वह शुद्ध हो गयी थी, परंतु भूखे लोगों को कभी अन्नदान नहीं किया था। हे ब्राह्मण! उसकी परीक्षा लेने मैं ब्राह्मण के रूप में उस साध्वी के घर जाकर भिक्षा माँगी।
तभी उस ब्राह्मणी ने पूछा, “हे ब्राह्मण! सत्य कहें कि आप कहाँ से आए हैं?” मैंने सुनकर अनजान बनते हुए उसे उत्तर नहीं दिया। उसने क्रोध में भिक्षापात्र में मिट्टी डाली। उसके बाद मैं अपने धाम लौट आया। अपनी तपस्या के प्रभाव से ब्राह्मणी मेरे धाम वापस आई। उसे संपत्ति हीन, सुवर्ण हीन, धान्य हीन सिर्फ एक सुंदर महल मिला। उस महल में कुछ न पाकर वह अस्वस्थ और क्रोधित होकर मेरे पास आई, पूछने लगी, “हे जनार्दन! सब व्रत और तपस्या करके मैंने श्रीविष्णु की आराधना की, परंतु मुझे धनधान्य क्यों प्राप्त नहीं हुआ?”
मैंने कहा, “हे साध्वी! तुम भौतिक विश्व से यहाँ आई हो। अब तुम अपने घर लौट जाओ। तुम्हें देखने देवताओं की पत्नियाँ आयेंगी, उन्हें षट्तिला एकादशी की महिमा पूछकर पूरा सुनने के बाद ही दरवाजा खोलना अन्यथा नहीं।” यह सुनकर ब्राह्मणी घर वापस आई।
एक बार ब्राह्मणी दरवाजा बंद करके अंदर बैठी थी, तब देवपत्नियाँ वहाँ पर आकर कहने लगी, “हे सुंदरी! हे ब्राह्मणी! हम तुम्हारे दर्शन करने आए हैं, कृपया दरवाजा खोले।” तब ब्राह्मणी ने कहा, “आपको मुझे देखने की इच्छा है तो कृपया षट्तिला एकादशी की महिमा का वर्णन करे तभी मैं दरवाजा खोलूंगी।” उस समय एक देवपत्नी ने उसे वह महात्म्य बताया। महात्म्य सुनने के बाद ब्राह्मणी ने दरवाजा खोला, देवपत्नियाँ उसके दर्शन से बहुत प्रसन्न हुई।
देवपत्नियों के कहने अनुसार ब्राह्मणी ने षट्तिला एकादशी का व्रत किया। जिसके प्रभाव से उसे धनधान्य, तेज, सौंदर्य प्राप्त हुआ। धनधान्य संपादन करने के लोभदृष्टि से यह व्रत नहीं करना चाहिए। इस व्रत के पालन से अपने आप गरीबी-दुर्भाग्य नष्ट हो जाता है। जो कोई भी इस तिथि को तिल दान करेगा वह सब पापों से मुक्त हो जाएगा।
६. जया एकादशी
भविष्योत्तर पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद में इस एकादशी का वर्णन आता है। युधिष्ठिर महाराज ने पूछा, “हे जनार्दन! माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या संबोधन है? यह व्रत कैसे करे? किस देवता की पूजा करनी चाहिए?”
भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “राजेन्द्र! सुनो! माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। सब पापों का हरण करके मोक्ष देनेवाली यह उत्तम तिथि है। जो कोई भी इस व्रत का पालन करेगा उसे पिशाच योनि प्राप्त नहीं होगी, इसलिए प्रयत्नपूर्वक इस ‘जया’ एकादशी का पालन करना चाहिए।”
प्राचीन काल में स्वर्ग में देवराज इंद्र का राज था। देवगण अप्सराओं के साथ पारिजात वृक्ष से शोभित नंदनवन में विहार कर रहे थे। पचास करोड़ गंधर्वों के नायक देवराज इंद्र ने अपनी इच्छा से वन में विहार करते हुए नृत्य का आयोजन किया था। गंधर्वों में प्रमुख पुष्पदंत, चित्रसेन और उसका पुत्र — ये तीन थे।
चित्रसेन की पत्नी का नाम ‘मालिनी’ था। मालिनी और चित्रसेन की कन्या ‘पुष्पवन्ती’ थी। पुष्पदन्त गंधर्व का पुत्र ‘माल्यवान्’ था। माल्यवान् पुष्पवन्ती के सौंदर्य पर मोहित हुआ था। ये दोनों भी इंद्र की प्रसन्नता के लिए नृत्य करने आए थे। यह दोनों भी अन्य अप्सराओं के साथ आनंद में गायन कर रहे थे। किंतु एक दूसरे पर अनुराग दृष्टि के कारण वे मोहित हो गये और उनका मन विचलित हो गया, इससे वे शुद्ध गायन नहीं कर सके। कभी ताल गलत तो कभी गायन रुकता। इस बात से क्रोधित और अपमानित होकर इंद्र ने श्राप दिया, “आप दोनों पतित हैं। मूर्ख हैं। तुम्हारा धिक्कार हो। मेरी आज्ञाभंग करने के फलस्वरूप आप पति-पत्नी के रूप में पिशाच योनि में जन्म लेंगे।”
इंद्र से ऐसा श्राप मिलते ही दोनों बहुत दुखी हुए। हिमालय में जाकर पिशाच योनि को प्राप्त होकर भयंकर दुख भोगते रहे। शारीरिक पातक से प्राप्त हुई इस योनि से पीड़ित वे पर्वत की गुफा में भ्रमण कर रहे थे। एक दिन पिशाच पति ने अपनी पत्नी को पूछा, “हमने ऐसा कौनसा पाप किया है जिसके लिए हमें ये योनि मिली? नरक यातनाएँ तो दुखदायक हैं, पर पिशाच योनि में भी दुख बहुत भयानक है। इसलिए पूर्ण प्रयत्न से इस पाप से छुटकारा प्राप्त करना चाहिए।”
दोनों चिंता में मग्न थे। किंतु भगवान् की कृपा से उन्हें माघ महीने की एकादशी तिथि प्राप्त हुई। ‘जया’ नाम से प्रसिद्ध यह तिथि सब तिथियों में उत्तम है। इस तिथि को उन्होंने अन्न ग्रहण नहीं किया, जल ग्रहण नहीं किया, किसी जीव की हत्या भी नहीं की और कोई फल भी नहीं खाया। दुख से व्याकुल सूर्यास्त तक वे बरगद के वृक्ष के नीचे बैठे रहे। भयानक रात उनके सामने उपस्थित हुई पर उन्हें निद्रा तक नहीं आई। कौनसे भी प्रकार का सुख और कामसुख भी उन्होंने नहीं भोगा। रात्र समाप्त होकर सूर्योदय हुआ। द्वादशी का दिन निकला। उनसे ‘जया’ एकादशी के व्रत का पालन हुआ था, उन्होंने रातभर जागरण किया था। व्रत के प्रभाव से और भगवान विष्णु की शक्ति के कारण दोनों इस योनि से मुक्त होकर अपने पूर्वरूप को प्राप्त हुए।
उनके हृदय में फिर से पहले का अनुराग उत्पन्न हुआ। अलंकार से शोभित होकर विमान में विराजमान होकर स्वर्गलोक में गए। देवराज इंद्र के सामने प्रसन्नतापूर्वक जाकर उन्हें सादर प्रणाम किया। उन्हें पूर्वरूप में देखकर इंद्र को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा, “किस पुण्य के प्रभाव से आप पिशाच योनि से मुक्त हुए? मुझसे श्राप पाकर भी आप कौनसे देवता के आश्रय से श्राप मुक्त हो गए?”
माल्यवान ने कहा, “हे स्वामी! भगवान् वासुदेव की कृपा से तथा ‘जया’ एकादशी के व्रत से हम पिशाच योनि से मुक्त हुए।”
देवराज इंद्र ने कहा, “अब मेरे कहने अनुसार आप दोनों सुधापान कीजिए। जो लोग भगवान् वासुदेव की शरण लेते हैं और एकादशी का पालन करते हैं वह हमें भी पूजनीय हैं।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! इसलिए एकादशी का व्रत करना चाहिए। हे नृपश्रेष्ठ! ‘जया’ एकादशी ब्रह्महत्या के पातक से भी मुक्त करती है। जिसने ‘जया’ एकादशी के व्रत का पालन किया, उसने सभी प्रकार का दान तथा यज्ञों का अनुष्ठान करने जैसा है। इसकी महिमा पढ़ने अथवा सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।“
७. विजया एकादशी
स्कंद पुराण में इस एकादशी की महिमा का वर्णन किया गया है।
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा, “हे वासुदेव! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में कौनसी एकादशी आती है? कृपया आप मुझे बताइये।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! एक बार कमल पर विराजमान ब्रह्माजी को नारदजी ने पूछा, ‘हे सुरश्रेष्ठ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में विजया एकादशी आती है। उसका पालन करने से कौनसा पुण्य प्राप्त होता है इसके बारे में आप मुझे बताइये।’
ब्रह्मदेव ने कहा, “हे नारद! सुनो, मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ, जो सब पापों का हरण करनेवाली है। यह व्रत बहुत प्राचीन और पवित्र है। यह विजया एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करनेवाली है। बहुत पहले जब राजा रामचंद्र चौदह वर्षों के लिए वन में गए थे, तो पंचवटी में सीता और लक्ष्मण के साथ निवास कर रहे थे। वहाँ से रावण ने सीताहरण किया। इस दुख से उन्हें व्याकुलता हुई। सीताजी की तलाश में वन-वन भटकते हुए उन्हें जटायु मिला जो मरणासन्न था। उसके पश्चात उन्होंने वन में कबन्ध राक्षस का वध किया। सुग्रीव से मित्रता करके श्रीरामचन्द्रजी ने वानरसेना को संगठित किया। हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की मुद्रा लेकर लंका गए और सीताजी की तलाश करके लौट आए। वहाँ से लौटते ही लंकाकथन के पश्चात सुग्रीव से अनुमति लेकर श्रीरामचन्द्रजी ने लंका जाना निश्चित किया। सागरतीर आने पर वे लक्ष्मण से कहने लगे, “हे सुमित्रानंदन! इस अगाध सागर में अनेक भयानक जीवजंतु है। इसे सुगमता से कैसे पार करें, कौनसा भी उपाय सूझ नहीं रहा है।”
लक्ष्मण ने कहा, “महाराज! आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम है। आपसे कुछ भी छिपाना असंभव है। इस द्वीप में प्राचीन काल से बकदाल्भ्य मुनि रहते है। पास में ही उनका आश्रम है। हे रघुनन्दन! उन्हें इस समस्या का समाधान पूछते है।”
लक्ष्मण के कथनानुसार प्रभु रामचंद्रजी मुनिवर्य बकदाल्भ्य के पास मिलने उनके आश्रम गए, उन्हें सादर प्रणाम किया। तब मुनिवर्य ने पहचाना कि यही परमपुरुषोत्तम श्रीराम है। अत्यंत आनंदपूर्वक उन्होंने पूछा, “श्रीराम, आपका आगमन किस हेतु हुआ?”
रामचंद्रजी ने कहा, “हे मुनिवर्य! रावण का संहार करने मैं यहाँ आया हूँ। कृपा करके यह सागर पार करने का उपाय बताएँ।”
बकदाल्भ्यजी ने कहा, “हे श्रीराम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी के पालन से विजय मिलता है। हे राजन! इस व्रत की विधि इस प्रकार है। दशमी दिन सोने, चांदी, पीतल, तांबा अथवा मिट्टी के एक कलश की स्थापना करे। उसमें पानी भरके पत्ते डाले। उस पर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करे। एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करे। उसके बाद पुष्पमाला, चंदन, सुपारी, नारियल अर्पण करके उस कलश की पूजा करनी चाहिए। दिनभर कलश के सामने बैठकर कथा करनी चाहिए, साथ ही जागरण भी करना चाहिए। घी का दीपक जलाने से व्रत की अखंड सिद्धि प्राप्त होती है। उसके पश्चात द्वादशी के दिन नदी या तालाब के किनारे उस कलश की विधिवत पूजा करके वो कलश ब्राह्मण को दान करना चाहिए। महाराज! कलश के साथ और भी बड़े बड़े दान करने चाहिए। हे श्रीराम! आप इस व्रत का पालन कीजिए, इससे आपको विजय प्राप्त होगी।”
ब्रह्माजी कहने लगे, “हे नारद! मुनिवर्य के कहे अनुसार प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने विजया एकादशी का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से श्रीरामचंद्रजी विजयी हुए। हे पुत्र! इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को इस जीवन में विजय प्राप्त होता है और अक्षय परलोक प्राप्त होता है!”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “इस एकादशी का पालन करना चाहिए! इसका महात्म्य सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।“
८. आमलकी एकादशी
इस एकादशी का महात्म्य ब्रह्मांड पुराण में कहा गया है।
युधिष्ठिर महाराज ने पूछा, “हे श्रीकृष्ण! फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? यह व्रत किस प्रकार से करना चाहिए कृपया आप बताइये।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे धर्मनन्दन! प्राचीन काल में मान्धाता राजा ने वशिष्ठ ऋषि को इसके बारे में पूछा था। इसे आमलकी एकादशी कहते है और जो कोई भी इस व्रत का पालन करता है उसे विष्णुलोक या वैकुंठ की प्राप्ति होती है।”
राजा मान्धाता ने पूछा, “हे ऋषिवर्य! पृथ्वी पर इसका कभी आरंभ हुआ इस विषय में आप मुझे बताइये।”
वशिष्ठ ऋषि कहने लगे, “हे महाभाग! पृथ्वी पर इस आमलकी के प्रारंभ की कथा सुनो। आमलकी महान वृक्ष है जो सब पापों का नाश करता है। भगवान विष्णु की थूक से एक चंद्रमा समान बिंदु प्रकट हुआ। वह बिंदु पृथ्वी पर गिरा उसमें से वृक्ष उत्पन्न हुआ जिसे आमलकी नाम मिला। सब वृक्षों में यह आदिवृक्ष माना जाता है। उसी वक्त सारी सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी की भी उत्पत्ति हुई। उन्हीं से सब प्रजा की सृष्टि हुई जिसमें देवता, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा पवित्र और शुद्ध हृदय वाले महर्षियों का जन्म हुआ। उनमें से देवता और ऋषिलोक विष्णुप्रिया आमलकी वृक्ष के पास आए। हे महाभाग्यवान! उस वृक्ष को देखते ही देवताओं को काफी आश्चर्य हुआ और एक दूसरे को देखकर वो विचार करने लगे, पलाश आदि वृक्षों को हम जानते है, पर इस वृक्ष को हम प्रथम बार देख रहे है। उन्हें इस स्थिति में देखकर आकाशवाणी हुई, “हे महर्षि, यह आमलकी वृक्ष है, जो श्रीविष्णु को अति प्रिय है। केवल इसके स्मरण से गोदान का पुण्य प्राप्त होता है। हमेशा आँवला खाना चाहिए। सब पापों को नाश करनेवाला यह वैष्णव वृक्ष है।”
तस्या मूले स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्वं च पितामहः।
स्कन्धे च भगवान रुद्रः संस्थितः परमेश्वरः॥
शाखासु मुनयः सर्वे प्रशाखासु च देवताः॥
पर्णेषु वसवो देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा॥
प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेव व्यवस्थिताः।
सर्वदेवमयी ह्येषा धात्री च कथिता मया॥
इस वृक्ष के मूल में विष्णु, अग्रभाग में ब्रह्माजी, स्कन्ध में शिवजी, शाखाओं में मुनि, प्रशाखा में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुतगण तथा फलों में सब प्रजापती वास करते है। इसलिए आमलकी वृक्ष को सर्वदेवमय कहा जाता है। इसलिए यह सब विष्णुभक्तों को प्रिय है।
ऋषि ने कहा, “हे अव्यक्त महापुरुष, आप कौन है? हम आपको क्या देवता समझे? कृपया आप हमें बताइये।”
फिर से आकाशवाणी हुई, “जो सभी जीवों का कर्ता, सब भुवनों का स्रोत है और विद्वान पुरुषों को भी अगम्य मैं वही विष्णु हूँ।” देवादिदेव भगवान विष्णु का कथन सुनने से सभी ब्रह्मपुत्र आश्चर्यचकित होकर बड़े भक्तिभाव से श्रीविष्णु की स्तुति करने लगे।
ऋषि ने कहा, “सभी जीवों के आत्मभूत आत्मा एवं परमात्मा आपको प्रणाम करते है। जिनका कभी पतन नहीं होता उन अच्युत को हम नमस्कार करते है। दामोदर, यज्ञेश्वर और परमपरमेश्वर आपको हमारा प्रणाम है। आप मायापति और संपूर्ण विश्व के स्वामी है आपको हमारा वंदन है।”
इस प्रकार ऋषियों ने की हुई स्तुति सुनने से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और कहने लगे, “हे महर्षि! मैं आपको कौनसा अभीष्ट वरदान दूँ।”
ऋषि ने कहा, “हे भगवान! आप सचमुच हमारे ऊपर प्रसन्न है तो जिस व्रत को करने से मोक्ष मिलता है वो हमें कहें।”
श्रीविष्णु ने कहा, “हे महर्षियों! फाल्गुन शुक्ल पक्ष में अगर पुष्य नक्षत्रयुक्त द्वादशी होगी तो वो सब पापों को नष्ट करनेवाली होगी। हे द्विजवर! उस दिन विशेष कर्तव्य करना चाहिए उसके बारे में सुनिए। आमलकी एकादशी को रातभर आमलकी वृक्ष के पास जाकर जागरण करना चाहिए। उससे मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति साथ ही उसे सहस्र गाय दान करने का पुण्य भी मिलता है। हे विप्रगण! सभी व्रतों में ये उत्तम व्रत है।”
ऋषियों ने पूछा, “हे भगवान! कृपया इस व्रत की विधि बताये। इसे कैसे पूर्ण करे? इसके अधिष्ठाता कौन है? इस दिन स्नान, दान आदि विधि किस प्रकार करनी चाहिए? पूजा की विधि क्या है? उसके लिए मंत्र क्या है? कृपया यथार्थ रूप से इसका वर्णन करे।”
भगवान श्रीविष्णु ने कहा, “हे द्विजवर सुनिए! एकादशी दिन प्रातःकाल जल्दी उठे। दंतधावन करने के बाद संकल्प करना चाहिए कि, हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! आज मैं निराहार एकादशी करके कल भोजन ग्रहण करूँगा। कृपया मुझे अपने चरणों में आश्रय दीजिए।” इस प्रकार से नियम ग्रहण करने के बाद पापी, पतित, चोर, पाखंडी, दुराचारी, मर्यादा भंग करनेवाले, गुरु पत्नीगामी इन व्यक्तियों से वार्तालाप न करें। अपने मन को वश में रखकर नदी, तालाब, कुआँ या घर में स्नान करे। स्नान करने से पूर्व शरीर को मिट्टी लगानी चाहिए। मिट्टी लगाते समय इस मंत्र को कहना चाहिए।
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम्॥
हे वसुंधरा! आप के ऊपर अश्व तथा रथों का चलना हमेशा सहन करती है। भगवान वामन देव ने भी अपने पैरों से आपको नापा है। हे मृत्तिके, मैंने करोड़ों जन्मों में अनेक पाप किए है कृपया उन सभी पापों का आप हरण कीजिए।
स्नान मंत्र
त्वं मातः सर्वभूतानां जीवनं तत्तु रक्षकम्।
स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसनां पतये नमः॥
स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु हृदयप्रस्रवणेषु च।
नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत्॥
हे जल अधिष्ठात्री देवी! हे माते! तुम सभी जीवों का जीवन हो। वही जीवन जो स्वेदज और उद्भिज जाति के जीवों का रक्षक है। तुम रस स्वामिनी हो, तुम्हें हमारा वंदन है। आज मैंने सब तीर्थों में, कुंड में, तालाब में और देवतासंबंधी सरोवर में स्नान किया है। मेरा ये स्नान उपर कहे हुए सभी स्नानों का फल देनेवाला हो।
विद्वान पुरुष को परशुराम की सोने की प्रतिमा बनानी चाहिए। वो चाहे अपनी शक्ति के अनुसार एक अथवा आधे तोले की हो। स्नान के पश्चात घर में पूजा और हवन करे। उसके बाद पूजा की सभी सामग्री लेकर आमलकी वृक्ष के पास जाएँ। वृक्ष के पास की जगह की साफ-सफाई करके गोबर से लेपना चाहिए। इस प्रकार शुद्ध भूमि पर मंत्र पठन द्वारा नये कुंभ की स्थापना करे। उस कलश में पंचरत्न तथा चंदन छोड़कर श्वेत चंदन से उसे सजाए। कंठ में फूलों की माला डालकर सुगंधित धूप अर्पण करना चाहिए। दीपक प्रज्वलित करे इसका उद्देश्य यही कि सभी प्रकार का मनोहर, सुशोभित दृश्य निर्माण हो। पूजा के लिए नया छाता, जूता तथा वस्त्र ले। कलश पर एक बर्तन रखकर उसमें दिव्य लाजों को भरे। उसके उपर सुवर्णमय परशुरामजी की स्थापना करे। विशोकाय नमः कहकर उनके चरणों की, विश्वरूपिणे नमः कहकर उनके घुटनों की, उग्राय नमः कहकर उनके जंघा की, दामोदराय नमः कहकर उनके कटिभाग की, पद्मनाभाय नमः से उदर की, श्रीवत्सधारिणे नमः से वक्षस्थल की, चक्रिणे नमः से उनके बायें हाथ की, गदिने नमः से दाएँ हाथ की, वैकुण्ठाय नमः से कंठ की, यज्ञमुखाय नमः से मुख की, विशोकनिधये नमः से नासिका की, वासुदेवाय नमः से आंखों की, वामनाय नमः से ललाट की, सर्वात्मने नमः से मस्तक तथा सभी अंगों की पूजा करनी चाहिए।
नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोऽस्तु ते।
गृहणार्घ्यमिमं दत्तमामलक्या युतं हरे॥
हे देवदेवेश्वर! हे जमदग्निनंदन! आपको मेरा सादर वंदन है। आमलकी के साथ इस अर्घ्य का आप स्वीकार करे।
उसके पश्चात भक्तिभाव से जागरण करे। नृत्य, संगीत, वाद्य, धार्मिक उपाख्यान तथा श्रीविष्णु के संबंध की कथा-वार्ता करते हुए वो रात गुजारनी चाहिए। भगवान विष्णु का नामस्मरण करते हुए आमलकी वृक्ष की १०८ अथवा २८ परिक्रमाएँ करे। प्रातःकाल होते ही श्रीहरि की आरती करनी चाहिए। श्री परशुराम के स्वरूप में विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न रहे इस भावना के साथ ब्राह्मणों की पूजा करके वहाँ की सभी सामग्री उन्हें दान देनी चाहिए।
उसके पश्चात आमलकी वृक्ष की परिक्रमा करके स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन खिलाना चाहिए। उसके बाद परिवार के साथ स्वयं भोजन ग्रहण करे। ऐसा करने से जो पुण्य प्राप्त होता है उस विषय में सुनिए। सभी तीर्थों में स्नान करने से, सभी प्रकार का दान करने से जो प्राप्त होता है वही पुण्य उपर्युक्त विधि का पालन करने से प्राप्त होता है। सभी यज्ञों को पूर्ण करने से जो पुण्य मिलता है उससे भी अधिक पुण्यप्राप्ति इस व्रत से होती है। इसमें किंचित भी संशय नहीं। वशिष्ठ ऋषि ने कहा, “हे राजन! इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गये। तब सभी महर्षियों ने इस व्रत का पालन किया। उसी प्रकार से आपको भी इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन्! यह दुर्धर्षव्रत सभी पापों से मनुष्य को मुक्त करता है।“
९. पापमोचनी एकादशी
भविष्योत्तर पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवादों में पापमोचनी एकादशी का वर्णन आता है।
एक बार युधिष्ठिर महाराज भगवान श्रीकृष्ण को कहने लगे, “हे केशव! आमलकी एकादशी के वर्णन के पश्चात चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली पापमोचनी एकादशी का कृपया कथन करें।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! बहुत वर्ष पहले लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को इस पापमोचनी एकादशी की महिमा सुनायी थी। इस एकादशी व्रत के पालन से मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है और जीवन के अनेक प्रकार के बुरे अनुभव से मुक्त होकर अष्टसिद्धि प्राप्त करता है।”
लोमश ऋषि ने कहा, “बहुत पहले देवताओं का कोषाध्यक्ष कुबेर का अतिशय सुंदर चैतरथ नाम एक मनोहर उपवन था। विशेष करके पूरे वर्षभर वसंत ऋतु के जैसा उस उपवन का वातावरण था। इसीलिए स्वर्गकन्या, किन्नर, अप्सरा और गंधर्व हमेशा विहार के लिए वहाँ आते थे। विशेष करके देवेंद्र और अन्य देवता भी वहाँ आकर आनंद और प्रेम का आदान-प्रदान करते थे। उसी उपवन में शिवजी के परमभक्त मेधावी नामक ऋषि तपस्या करते थे जिनकी तपस्या अनेक प्रकार से भंग करने का प्रयत्न स्वर्ग की अप्सराएँ करती थी।
मंजुघोषा अप्सरा ने उनका तपोभंग करने का निश्चय किया। उसने ऋषि के आश्रम के समीप ही कुटिया बांधी और बहुत ही मधुर स्वर में गाना गाने लगी। उसी समय शिवजी का शत्रु कामदेव भी शिवभक्त मेधावी ऋषि को जीतने का प्रयत्न करने लगे। शिवजी ने कामदेव को एकबार भस्म किया था उसी का प्रतिशोध लेने के लिए कामदेव ने ऋषि के शरीर में प्रवेश किया। शुभ्र उपवीत धारण किए हुए मेधावी ऋषि च्यवन महर्षि के आश्रम में वास करते थे। कामदेव के शरीर में प्रवेश से मेधावी ऋषि भी कामदेव जैसे ही सुंदर दिखने लगे। उसी वक्त कामासक्त मंजुघोष उनके सामने आई। मेधावी ऋषि भी काम से घायल हो गए। उन्हें शिवजी की उपासना का विस्मरण हुआ और स्त्री संग में पूरी तरह मग्न रहे। स्त्री-संग में उन्हें दिन-रात का भी विस्मरण हो गया। इस प्रकार अनेक वर्ष मेधावी ऋषि ने काम क्रीडा में बिताए।
उसके पश्चात मंजुघोष ने जाना कि मेधावी ऋषि का पतन हो चुका है और उसे अब स्वर्ग लौटना चाहिए। प्रणय में मग्न ऋषि को वह कहने लगी, “हे ऋषिवर! कृपया मुझे स्वर्गलोक में लौटने की अनुमति दीजिए।” उस पर मेधावी ऋषि ने उत्तर दिया, “हे सुंदरी! आज संध्या को तुम मेरे पास आयी हो, आज रात यहाँ पर रहकर सुबह तुम लौट जाना।” मंजुघोषा इस तरह और कुछ वर्ष वहाँ रही जो ५७ वर्ष ९ महीने ३ दिन का काल था, परंतु ऋषि के लिए यह काल केवल अर्धरात्रि समान था। पुनः स्वर्ग जाने की अनुमति लेने पर ऋषि ने कहा, “हे सुंदरी! अब प्रातः हो रही है, मेरी प्रातःविधी के पश्चात तुम जाना।” तभी अप्सरा हँसते हुए कहने लगी, “हे ऋषिवर! प्रातःविधी को आपको कितना समय लगेगा? अभी तक आपको तृप्ति नहीं आई? मेरे संग में आपने कितने वर्ष गुजारे है? इसलिए कृपया समय का ध्यान करें।”
ये शब्द सुनते ही मेधावी ऋषि ने वर्षों की गणना की और कहा, “अरेरे! हे सुंदरी! मैंने अपने जीवन के ५७ वर्ष व्यर्थ गँवा दिए। तुमने मेरे जीवन और तपस्या इन दोनों का नाश किया।” ऋषि के आँखों में आंसू आए और उन्होंने मंजुघोष को शाप दिया, “हे दुष्टे! तुम्हें धिक्कार है! तुमने मेरे साथ चुड़ैल जैसा व्यवहार किया है, इसलिए तुम चुड़ैल बनो।”
ऋषि से शाप मिलने के बाद मंजुघोषा ने कहा, “हे द्विजवर! कृपया ये कठोर शाप आप वापस लीजिए। आप बहुत समय हमारे साथ रहे। हे स्वामी! कृपया दया कीजिए।” इस पर मेधावी ऋषि कहने लगे, “हे देवी! मैं अब क्या करूँ? तुमने मेरी तपोशक्ति तथा तपोधन का नाश किया है। फिर भी इस शाप से मुक्त होने का उपाय सुनो। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जो पापमोचनी एकादशी आती है उस दिन इस एकादशी व्रत का कठोर पालन करने से इस पिशाच योनि से तुम्हें मुक्ति मिलेगी।”
इतना कहकर मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम लौट आए। अपने पतित पुत्र को देखकर च्यवन ऋषि को बहुत दुःख हुआ। वे कहने लगे, “हे पुत्र! तुमने ये क्या किया? एक स्त्री के लिए अपनी तपस्या नष्ट की। अपना ही नाश कर लिया?” उस पर मेधावी ऋषि ने कहा, “मैंने दुर्भाग्य से एक अप्सरा का संग करके बहुत बड़ा पातक किया। कृपा करके इस पाप का योग्य प्रायश्चित्त बताएँ।” पश्चातापदग्ध पुत्र के शब्द सुनने के बाद च्यवन महर्षि ने कहा, “चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी के व्रत पालन से तुम पापमुक्त हो जाओगे।”
“उत्साह और कठोरता से मेधावी ऋषि ने उस व्रत का पालन किया जिसके प्रभाव से वे सभी पापों से मुक्त हुए। मंजुघोष को भी इस व्रत के पालन करने से अपने पूर्वरूप की प्राप्ति हो गई जिससे वह स्वर्गलोक चली गई।”
यह कथा कहने के पश्चात लोमश ऋषि ने मान्धाता राजा को कहा, “हे प्रिय राजन! केवल इस व्रत पालन से सभी पाप नष्ट हो जाते है। इस एकादशी के महात्म्य पढ़ने से अथवा सुनने से हजार गाय दान करने का पुण्य प्राप्त होता है। इस एकादशी व्रत का पालन करने से अनेक पापों का, जैसे कि भ्रूणहत्या, ब्रह्महत्या, मद्यपान, परस्त्रीसंग, गुरुपत्नीसंग, इनका नाश हो जाता है।“
१०. कामदा एकादशी
वराह पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद में कामदा एकादशी का महात्म्य कहा गया है।
महाराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण को कहने लगे, “हे यदुवर, कृपया मेरा प्रणाम स्वीकार करे। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का वर्णन करे। इस व्रत की विधि और उसका पालन करने से होनेवाले लाभ का वर्णन करें।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “प्रिय युधिष्ठिर महाराज! पुराणों में वर्णित एकादशी का महात्म्य सुनो। एक बार प्रभु रामचंद्र के पितामह महाराज दिलीप ने अपने गुरु वसिष्ठ को यही प्रश्न पूछा था।”
वसिष्ठजी ने कहा, “हे राजन! निश्चित आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। इस एकादशी को कामदा कहते है। इस व्रत के पालन से सभी पाप जलकर भस्म हो जाते हैं और व्रत के पालन करने वाले को पुत्रप्राप्ति होती है।”
बहुत वर्ष पहले रत्नपुर (भोगीपुर) राज्य में पुण्डरीक राजा अपनी प्रजा गंधर्व, किन्नर के साथ रहते थे। उसी राज्य में अप्सरा ललिता अपने गंधर्व पति ललित के साथ रहती थी। उनका एक दूसरे पर बहुत प्रेम था। प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि एक क्षण भी एक दूसरे के बगैर वे नहीं रहते।
एक बार पुण्डरीक राजा की सभा में सब गंधर्व नृत्य और गायन कर रहे थे। उसमें ललित गंधर्व भी था। पत्नी सभा में न होने के कारण उसका नृत्य और गायन ताल में नहीं था। वहाँ प्रेक्षकों में कर्कोटक नामका सर्प भी था। उसने ललित के विसंगत नृत्य और गायन का रहस्य जाना और राजा को उसी प्रकार बताया। राजा बहुत क्रोधित हुए, उन्होंने ललित को शाप दिया, “हे पापात्मा! अपने स्त्रीपति कामासक्ति के कारण तुमने नृत्यसभा में विसंगति निर्माण की है। इसलिए मैं तुम्हें नरभक्षक बनने का शाप देता हूँ!”
पुण्डरीक से शाप मिलते ही ललित को भयंकर नरभक्षक राक्षस का रूप मिला। अपने पति का भयानक रूप देखकर ललिता को बहुत दुःख हुआ। फिर भी सभी मर्यादायें छोड़कर वह अपने पति के साथ वन में रहने लगी।
वन में भ्रमण करते हुए विंध्य पर्वत के शिखर पर पवित्र शृंगी ऋषि का आश्रम ललिता ने देखा और तुरंत आश्रम में जाकर ऋषि के सामने उसने प्रणाम किया।
उसे देखकर शृंगी ऋषि ने पूछा, “तुम कौन हो? तुम्हारे पिता कौन है? तुम यहाँ किस कारण से आयी हो?” ललिता ने कहा, “हे ऋषिवर! मैं ललिता, वृंदावन गंधर्व की कन्या हूँ। अपने शापित पति के साथ मैं यहाँ आयी हूँ। गंधर्व राजा पुण्डरीक के शाप से मेरे पति राक्षस बने है। उनका यह रूप देखकर मुझे बहुत दुख हो रहा है। कृपया इस शाप से मुक्ति मिलने का उपाय कथन करें जिस प्रायश्चित्त से मेरे पति की राक्षसी योनि से मुक्तता हो।” ललिता की नम्र विनंती सुनकर शृंगी ऋषि ने कहा, “हे गंधर्वकन्या! कुछ ही दिनों में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी आएगी। इस व्रत का तुम कठोर पालन करो और तुम्हें मिलनेवाला सभी पुण्य अपने पति को अर्पण करो। जिससे वह इस शाप से मुक्त हो जाएंगे। ये एकादशी सभी इच्छा पूर्ण करनेवाली है।”
“हे राजन! ऋषि के कहे अनुसार ललिता ने आनंदपूर्वक और कठोरता से इस व्रत का पालन किया। द्वादशी के दिन भगवान वासुदेव और ब्राह्मणों के समक्ष उसने कहा, “मैंने अपने पति की शाप से मुक्तता कराने के लिए इसका पालन किया है। इस व्रत के प्रभाव से मेरे पति शापमुक्त हो जाएँ।” और क्या आश्चर्य, नरभक्षक ललित पुनः गंधर्व बना। उसके बाद ललिता और ललित सुख से रहने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर महाराज! हे राजेश्वर! जो कोई भी इस अद्भुत कथा का श्रवण करेगा और अपनी क्षमता के साथ इसका पालन करेगा वह ब्रह्महत्या के पातक से और आसुरी शाप से मुक्त हो जाएगा।“
११. वरुथिनी एकादशी
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली वरुथिनी एकादशी का महात्म्य भविष्योत्तर पुराण में श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद में कहा गया है।
एक बार युधिष्ठिर महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे वासुदेव! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? और इस एकादशी व्रत का पालन करने से क्या फल प्राप्त होता है और उसका महात्म्य क्या है?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे प्रिय राजन! इस एकादशी का नाम वरुथिनी है जिसको करने से इस जन्म और अगले जन्म में भी सौभाग्य प्राप्त होता है। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होता है, साथ ही उसे वास्तविक आनंद की प्राप्ति होकर वह भाग्यवान बनता है। और जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिलकर उसे भगवान की भक्ति प्राप्त होती है। इस व्रत के पालन से मान्धाता राजा को मुक्ति मिली। उसी प्रकार अनेक राजा महाराजा जैसे कि महाराज धुन्धुमार भी मुक्त हुए। केवल वरुथिनी एकादशी के व्रत से दस हजार वर्ष तपस्या का फल प्राप्त होता है। तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र पर ४० किलो सुवर्णदान का फल इस व्रत को करने से मिलता है।”
“हे राजन! गजदान ये अश्वदान से श्रेष्ठ है, भूमिदान ये गजदान से श्रेष्ठ माना जाता है और तिलदान ये भूमिदान से भी श्रेष्ठ है। सुवर्णदान ये तिलदान से श्रेष्ठ है तथा अन्नदान ये सुवर्णदान से भी श्रेष्ठ है। हे राजन! अन्नदान करने से पूर्वज, देवता और सभी प्राणी प्रसन्न होते है। बुद्धिमान लोगों का यह विचार है कि, कन्यादान भी अन्नदान इतना ही पुण्यकार्य है। स्वयं भगवान कहते है कि अन्नदान ये गोदान इतना ही श्रेष्ठ है। परंतु सर्वश्रेष्ठ विद्यादान ही है।”
केवल वरुथिनी एकादशी व्रत के पालन से सभी प्रकार के दान देने जैसा पुण्य प्राप्त होता है। अपने चरितार्थ के लिए जो अपनी कन्या को बेचता है वो सबसे नीच मनुष्य माना जाता है और प्रलय तक उस व्यक्ति को नरक में दुःख भोगना पड़ता है। इसलिए किसी को भी अपनी कन्या के बदले में कभी धन स्वीकार नहीं करना चाहिए। और जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे अगला जन्म बिल्ली का मिलता है। परंतु अपनी क्षमता से जो व्यक्ति सुवर्णालंकार से सुशोभित करके योग्य वर को अपनी कन्या प्रदान करता है उस व्यक्ति के पुण्यों का लेखाजोखा यमराज के सचिव चित्रगुप्त भी नहीं कर सकते।
इस एकादशी के व्रत का पालन करनेवालों को कुछ बातें वर्जित है वह है :- कांसे के बर्तन में न खाऐं। मांसाहार न करें। मसूर की दाल, हरी सब्जियाँ, मटर ना खाऐं। अभक्त के हाथ का बनाया हुआ न खाऐं। दशमी, एकादशी दिन मैथुन वर्जित है। जुआ ना खेलें। पान न खाऐं। दांत की सफाई न करे (दंतमंजन करना वर्जित है)। प्रजल्प न करे। झूठ ना बोलें। किसी की भी निंदा न करे। पापी व्यक्ति से बात न करे। दिन में न सोये। किसी पर भी क्रोध ना करे। शहद न खायें। दशमी, एकादशी और द्वादशी के दिन नाखून, बाल ना काटें। दाढ़ी भी न करे। दशमी, एकादशी और द्वादशी के दिन शरीर को तेल न लगाऐं। सावधानीपूर्वक इन सब बातों का पालन करने से उत्तम प्रकार से एकादशी व्रत का पालन होता है और पालन करनेवाले को जीवन के सर्वोच्च ध्येय की प्राप्ति होती है। एकादशी के दिन जागरण करने से सभी पाप क्षय हो जाते है और उसे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है। इस एकादशी की महिमा को जो कोई भी सुनता है अथवा पढ़ता है उसे एक सहस्र गोदान का पुण्य मिलता है और वह भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति करता है।“
१२. मोहिनी एकादशी
सूर्य पुराण में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली मोहिनी एकादशी की महिमा का वर्णन है।
महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण को पूछा, “हे जनार्दन! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी का नाम क्या है? इस व्रत का पालन कैसे करे? इसे करने से क्या पुण्य प्राप्त होता है, कृपया आप विस्तार से कहिए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे धर्मपुत्र! ध्यान से सुनिए! जो कथा वशिष्ठ मुनि ने प्रभु रामचंद्र को सुनायी थी वह मैं आपको कहता हूँ।”
पूर्व काल में प्रभु रामचंद्र वशिष्ठ महाराज को पूछने लगे, “हे आदरणीय ऋषिवर! सीताजी के विरह से मैं अत्यंत निराश हूँ। कृपया आप हमें ऐसा व्रत बताईये जिसके प्रभाव से सब पापों से और दुःखों से मुक्ति मिले।”
प्रभु रामचंद्रजी के आध्यात्मिक गुरु वशिष्ठजी ने कहा, “प्रिय राम! आप बहुत बुद्धिमान है! आपके पवित्र नाम से ही सभी प्राणियों के दुःख दूर होते है, उनका जीवन मंगलमय होता है। फिर भी सभी जीवों के उद्धार के लिए पूछा गया यह प्रश्न प्रशंसनीय है। अब मैं आपको इस व्रत की विस्तारपूर्वक कथा कहता हूँ। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में मोहिनी एकादशी आती है। वो बहुत ही मंगलकारक है, इस व्रत के पालन से व्यक्ति संसार के दुःखों से, अनेक पापों से तथा भौतिक भ्रम से मुक्त होता है।”
“प्राचीन काल में सरस्वती नदी के किनारे रम्य भद्रावती नामक राज्य था। धृतिमान नामक राजा वहाँ राज्य करता था। चंद्रवंश में जन्मा यह राजा सहिष्णु और सत्यवादी था। उसी शहर में धनपाल नामक एक वैश्य था जो बहुत ही पुण्यवान वैष्णव था। जनहित हेतु उस भक्त धनपाल ने नगर में अनेक धर्मशाला, रुग्णालय, बड़े मार्ग, पाठशाला, बाजार और भगवान विष्णु के मंदिर की स्थापना की थी। पीने के पानी के कुएँ, शुद्ध जल का तालाब तथा अन्नछत्र पूरे नगर में बनाए थे। इस प्रकार जनकल्याण के लिए अपने धन का उपयोग योग्य तरीके से करते हुए अपना नाम धनपाल सचमुच सार्थक किया। सबका हित चिंतनेवाला, सब के उपर प्रेम रखनेवाले इस वैष्णव के पाँच पुत्र थे। समन, द्युतिमन, मेधावी, सुकीर्ति और धृष्टबुद्धि ये उनके नाम थे। इन सभी में धृष्टबुद्धि बहुत पापी और दुराचारी था। दुष्ट व्यक्तियों का संग, व्यभिचारी स्त्रियों का संग, निष्पाप पशु की हत्या, मांस, मदिरापान करना इन सब पाप कृत्यों से वह अत्यंत पापी और दुराचारी बना था। अपने परिवार के लिए वो कलंक था। देवता, ब्राह्मण, बुजुर्ग तथा अतिथियों को कभी आदर नहीं देता, सदा पाप करने में रत था।
एक दिन मार्ग पर वेश्या के कंधे पर हाथ रखकर जाते हुए उसे उसके पिता धनपाल ने देखा और उन्हें बहुत दुःख हुआ। उसी दिन उन्होंने धृष्टबुद्धि को घर से बाहर निकाला। इसलिए धृष्टबुद्धि अपने माता-पिता, भाई, रिश्तेदार और वैश्य समाज से अलग हुआ और हर एक के तिरस्कार का विषय बना। पिता के निकालने से धृष्टबुद्धि घर से बाहर जाकर ज्यादा पापकृत्यों में व्यस्त हुआ। खुद के वस्त्र और धन बेचकर जो भी मिला वो सभी उसने पापकृत्यों में लगाया। अंत में जब धन खत्म हुआ तो निर्धनता के कारण उसकी हालत भिखारी जैसी हुई। अन्न न मिलने से उसका शरीर कमजोर हो गया, उसके सभी धूर्त मित्रों ने बहाने बनाकर उसका त्याग किया।
धृष्टबुद्धि को अतिशय चिंता हो रही थी, भुख से वह व्याकुल हो रहा था। अब मुझे क्या करना चाहिए। अन्न और धन कहाँ से प्राप्त होगा? इन प्रश्नों को सोचकर वह अशांत हो रहा था। आखिर उसने चोरी करने का निश्चय किया और शुरुआत भी की। बहुत बार राजा के सिपाही उसे पकड़ने के बाद भी, उसके पिता का मान और बड़प्पन देखकर छोड़ देते। फिर भी उसने चोरी करना बंद नहीं किया। एक बार विशेष चोरी करते समय वह पकड़ा गया। तब राजा ने उसे कहा, “हे मूर्ख, आज तुम इस राज्य में नहीं रह सकते क्योंकि तुम महापापी हो। मैं तुम्हें अभी छोड़ रहा हूँ, तुरंत इस राज्य के बाहर चले जाओ। तुम्हें जहाँ जाना है तुम जा सकते हो।”
फिर से सजा मिलने के भय से धृष्टबुद्धि राज्य के बाहर गहन वन में गया। अविवेक के कारण निष्पाप प्राणियों की हत्या करके उनका कच्चा मांस वह खाने लगा। किसी शिकारी की भाँति हाथ में धनुष्य लेकर वह वन में पापकृत्य करते भटकने लगा।
धृष्टबुद्धि हर समय दुःखी और चिंतित रहता। परंतु एक दिन उसके पिछले जन्म के पुण्यकर्म के प्रभाव से, वह एक ऋषि के आश्रम में पहुँचा। उस आश्रम में कौण्डिन्य नामक बड़े तपस्वी रहते थे। वैशाख मास था और कौण्डिन्य मुनि गंगास्नान से लौट रहे थे। दुःखों से परेशान धृष्टबुद्धि ने अनजाने में ऋषि के वस्त्र से टपकते जल को स्पर्श किया और आश्चर्यम्! वह अपने सभी पापों से मुक्त हो गया। उसी समय उसने ऋषि को दंडवत प्रणाम करके विनम्रता से पूछा, “हे ऋषिवर! मैं बहुत पापी व्यक्ति हूँ। ऐसा कौनसा भी पाप नहीं है जो मैंने नहीं किया हो। कृपया ऐसा व्रत बताईये जिसके प्रभाव से मैं सभी पापों से मुक्त हो जाऊँ। अमर्याद पापकृत्यों के कारण मैं अपने कुटुंब से, मित्रों से, समाज से दूर हो गया हूँ साथ ही मैं मानसिक दुःख के खाई में गिरा हूँ।”
यह सब सुनते ही परदुःखदुखी होनेवाले कौण्डिन्य ऋषि ने कहा, “सुनो! मेरु पर्वत से भी अधिक प्रचंड पापों की राशि को नष्ट करनेवाले व्रत के बारे में मैं तुम्हें कहता हूँ। उस व्रत के पालन से कुछ ही क्षणों में तुम्हारे पापों का नाश हो जाएगा। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी का पालन करते ही तुम सभी पापों से मुक्त हो जाओगे।”
ऋषि के आदेश से धृष्टबुद्धि ने इस व्रत का कठोर पालन किया। हे राजन! इस व्रत के पालन से वह सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य शरीर प्राप्त करके गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक चला गया। हे रामचंद्र! इस व्रत से सभी पापों से, भ्रम से व्यक्ति मुक्त होता है। इस व्रत से प्राप्त होनेवाला फल तीर्थ में स्नान करने से अथवा यज्ञ करने से प्राप्त होनेवाले से भी श्रेष्ठ है।
अपरा (अचला) एकादशी
कृष्ण पक्ष के ज्येष्ठ मास की एकादशी को अपरा अथवा अचला एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। इसके करने से कीर्ति, पुण्य तथा धन की वृद्धि होती है तथा भूत-प्रेत जैसी निकृष्ट योनियों से मुक्ति मिलती है। इस दिन चंदन, कपूर, गंगाजल सहित भगवान विष्णु की पूजा की जानी चाहिए।
पुलकित मन से भगवान श्री कृष्ण को नमस्कार करने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की — हे महाराज! अब मेरी इच्छा ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के नाम, महात्म्य, पूजा-विधान आदि के बारे में विस्तारपूर्वक जानने की है। सो आप कृपा करके सुनाइये।
श्री कृष्ण भगवान कहने लगे — हे राजन्! इस एकादशी का नाम अपरा है। यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते है, संसार में उनको यश तथा कीर्ति की प्राप्ति होती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, भूत, योनि तथा पर-निन्दा आदि तक के सब पाप दूर हो जाते है। इस व्रत से पर-स्त्री-गमन, झूठी गवाही देना, असत्य भाषण, कल्पित शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी, झूठा वैद्य बनना आदि तक के पाप नष्ट हो जाते है। जो क्षत्रिय होकर युद्ध से भाग जाते है, वे नरकगामी होते है, परन्तु अपरा एकादशी का व्रत करने से उन्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते है और बाद में उनकी निंदा करते है, वे अवश्य नरक में पड़ते है, परन्तु अपरा एकादशी का व्रत करने से वह भी इस पाप से मुक्त हो जाते है।
जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि व्रत से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ या बद्रिकाश्रम की यात्रा, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान, स्वर्ण अथवा हाथी-घोड़ा दान करने से अथवा नव-प्रसूता गौ दान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है। यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि, पापरूपी अंधेरे के लिए सूर्य के समान है। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णुलोक को जाता है।
हे राजन्! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है, इसके पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है इसमें संदेह नहीं है।
निर्जला एकादशी
वर्ष की चौबीस एकादशियों में ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली है। इस एकादशी का व्रत रखने से ही वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त हो जाता है। इस एकादशी में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक जल भी न ग्रहण करने का विधान होने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। ज्येष्ठ मास में दिन बहुत बड़े होते है और प्यास भी बहुत अधिक लगती है। ऐसी दशा में इतना कठिन व्रत रखना सचमुच बड़ी साधना का काम है।
व्रत का विधि-विधान
इस व्रत के दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। जल-पान निषेध होने पर भी इस व्रत में फलाहार के पश्चात दूध पीने का विधान है। इस एकादशी का व्रत करने के पश्चात द्वादशी को ब्रह्म-बेला में उठकर स्नान कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देना चाहिए। इस एकादशी के दिन अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को अनाज, वस्त्र, छत्री, फल, जल से भरे कलश और दक्षिणा देने का विधान है। सभी व्यक्ति प्रायः मिट्टी के घड़े अथवा सुराहियों, पंखों और अनाज का दान तो करते ही हैं, इस दिन मीठे शर्बत की प्याऊ भी लगवाते हैं।
निर्जला एकादशी माहात्म्य
श्रीसूत जी बोले — हे ऋषियो! अब सर्व व्रतों में श्रेष्ठ, सर्व एकादशियों में उत्तम निर्जला एकादशी की कथा सुनो।
एक बार पाण्डव पुत्र भीमसेन ने वेदव्यास जी से पूछा — हे महाज्ञानी पितामह! मेरे चारों भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता कुन्ती तथा भार्या द्रौपदी एकादशी के दिन कभी भोजन नहीं करते, वे मुझे भी सदैव ऐसा करने को कहते रहते है, मैं उनसे कहता हूँ कि मुझ से तो भूख सही नहीं जाती, मैं दान और विधिवत भगवान की पूजा आराधना करूँगा, सो कृपापूर्वक ऐसा उपाय बताइए कि उपवास किए बिना मुझे एकादशी के व्रत का फल प्राप्त हो सके, तो व्यास जी बोले, यदि स्वर्ग भला और नरक बुरा प्रतीत होता है तो हे भीमसेन! दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करो। तब भीम ने निवेदन किया, हे महामुनि! जो कुछ मैं कहता हूँ वह भी सुनो, यदि दिन में एक बार भोजन न मिले तो मुझ से नहीं रहा जाता, मैं उपवास कैसे करूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि का निवास है, बहुत सा भोजन करने से मेरी भूख शान्त होती है, हे मुनि! मैं वर्ष भर केवल एक ही व्रत कर सकता हूँ, सो आप कृपा करके केवल एक व्रत बताइए जिसे विधिपूर्वक करके मैं स्वर्ग को प्राप्त हो सकूं, वह निश्चय करके कहिए जिससे मेरा कल्याण हो। व्यास जी ने कहा, हे भीमसेन! मनुष्यों के लिए सर्वोत्तम वेद का धर्म है, किन्तु कलियुग में भी उस धर्म पर चलने की शक्ति किसी में नहीं है। इसलिए थोड़े धन और थोड़े कष्ट से होने वाला सरल उपाय जो पुराणों में लिखा है वह मैं तुमको बताता हूँ। दोनों पक्षों की एकादशियों में जो मनुष्य भोजन नहीं करते वे नरक नहीं जाते।
यह वचन सुनकर महाबली भीमसेन पहले तो पीपल पत्र की भांति कांपने लगे, फिर डरते हुए बोले, हे पितामह! मैं उपवास करने में असमर्थ हूँ, इसलिए हे प्रभो निश्चय करके बहुत फल देने वाला एक व्रत मुझ से कहिए। तो व्यास जी बोले — वृष मिथुन राशि के सूर्य में ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका निर्जला व्रत यत्न से करना उचित है। स्नान और आचमन करने से जलपान वर्जित, केवल एक घूंट जल से आचमन करे, अधिक पीने से व्रत खण्डित हो जाता है। एकादशी के सूर्य उदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे और न भोजन करे तो बिना परिश्रम ही सभी द्वादशी युक्त एकादशियों का फल मिल जाता है। द्वादशी को प्रातःकाल स्नान करके स्वर्ण और जल ब्राह्मणों को दान करे, फिर ब्राह्मणों सहित भोजन करे। हे भीमसेन! इस विधि से व्रत करने से जो फल मिलता है वह सुनो, सारे वर्ष में जो एकादशियां आती है उन सब का फल निःसन्देह केवल इस एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है। शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु ने स्वयं वह मुझ से कहा है कि सब त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ और सुन, एकादशी निराहार व्रत करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है, सब तीर्थों की यात्रा तथा सब प्रकार के दानों में जो फल मिलता है वह सब इस एकादशी के व्रत से मिल जाता है। कलियुग में दान देने से भी ऐसी सद्गति नहीं होती, अधिक क्या कहूं, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जल और भोजन न करे। हे वृकोदर! इस व्रत से जो फल मिलता है उसको सुनो! सब एकादशी व्रतों से जो धन-धान्य व आयु आरोग्यता आदि की वृद्धि होती है वे सब फल निःसन्देह इस एकादशी के व्रत से प्राप्त होते है। हे नरसिंह भीम! मैं तुझ से सत्य कहता हूँ कि इसके करने से अति भयंकर काले पीले रंग वाले यमदूत, भय देने वाला दंड और फांसी सहित उस मनुष्य के पास नहीं आते, बल्कि पीताम्बर धारी हाथों में चक्र लिए हुए मोहिनी मूर्ति विष्णु के दूत अन्त समय में विष्णु लोक में ले जाने को आ जाते है, अतः जल रहित व्रत करना उचित है, फिर जल और गोदान करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
वैशम्पायन जी कहते है — हे जनमेजय! तब से भीमसेन यह व्रत करने लगे और तभी से इसका नाम भीमसेनी हुआ। हे राजन्! इसी प्रकार तुम सब पाप दूर करने के लिए उपवास करके विष्णु की पूजा करो और इस प्रकार प्रार्थना करो कि हे भगवान्! मैं आज निर्जल व्रत करूंगा। हे देवेश अनन्त! द्वादशी को भोजन करूंगा। यह कहकर सब पापों की निवृत्ति के लिए श्रद्धा से इन्द्रियों को वश करके व्रत करे। स्त्री व पुरुष के मन्दराचल पर्वत के समान (बड़े से बड़े) पाप भी इस एकादशी के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं, यदि गाय दान न कर सके तो वस्त्र में बांधे स्वर्ण के साथ घड़ा दान करे, निर्जला एकादशी को स्नान, दान, तप, होमादि जो धर्मकार्य मनुष्य करता है सो सब अक्षय हो जाता है। हे राजन्! जिसने एकादशी का विधिवत व्रत कर लिया उसे और धर्माचार करने की क्या आवश्यकता है? सब प्रकार के व्रत करने से विष्णुलोक प्राप्त होता है और हे कुरुश्रेष्ठ! एकादशी के दिन जो मनुष्य अन्न भोजन करते है वह पापी है। इस लोक में चाण्डाल होते और अन्त में दुर्गति को पाते हैं, इस एकादशी का व्रत करके दान देने वाले मोक्ष को प्राप्त होंगे। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी, गुरु से द्वेष और मिथ्या (झूठ) बोलना यह सब महापाप द्वादशयुक्त एकादशी का व्रत करने से क्षय हो जाते है, हे कुन्तीपुत्र भीम! अब इस व्रत की विधि सुनो। यह व्रत स्त्री व पुरुषों को अत्यन्त श्रद्धा से इन्द्रियों को वश में करके करना चाहिए। क्षीरशायी भगवान की पूजा करके गोदान करे। दूध देने वाली गौ, मिष्ठान और दक्षिणा सहित विधिपूर्वक दान करे। हे श्रेष्ठ भीम! इस प्रकार भली भांति ब्राह्मणों के प्रसन्न होने से श्रीविष्णु भगवान संतुष्ट होते है। जिसने यह महाव्रत नहीं किया उसने आत्मद्रोह किया। वह दुराचारी है और जिसने यह व्रत किया उसने अपने एक सौ अगले सम्बन्धियों को अपने सहित स्वर्ग पहुंचा दिया और मोक्ष को प्राप्त हुआ। जो मनुष्य शांति से दान और पूजा करके रात्रि को जागरण करते है और द्वादशी के दिन अन्न, जल, वस्त्र, उत्तम शय्या व कुण्डल सुपात्र ब्राह्मण को दान करते है वह निःसन्देह स्वर्ण के विमान पर बैठ कर स्वर्ग को प्राप्त होते है। जो फल नाशनी अमावस्या अथवा सूर्यग्रहण में दान-पुण्य करके मिलता है वही फल इसके सुनने से मिलता है। दंत धावन कर विधि अनुसार बिना अन्न तथा जल के व्रती मनुष्य इस एकादशी का व्रत और आचमन जल के न पीकर द्वादशी के दिन देवदेवेश त्रिविक्रम भगवान् की पूजा करे। जल, पुष्प, धूप, दीप अर्पण कर यथाविधि पूजन करके प्रार्थना करे कि हे देवेश! हे हृषीकेश, हे संसार सागर से पार कराने वाले! इस घड़े के दान करने से मुझे मोक्ष प्राप्त हो। हे भीमसेन! फिर अपनी सामर्थ्य अनुसार अन्न, वस्त्र, छत्र, फल आदि घड़े पर रखकर ब्राह्मणों को दान देवे, तत्पश्चात श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करवाकर आप भी मौन हो कर भोजन करे। इस प्रकार जो इस व्रत को यथा विधि करते है सब पापों से छूट कर मुक्त हो जाते है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — एकादशी माहात्म्य एवं चौदह एकादशी व्रत कथाएँ, पृष्ठ 62–97 एवं 48–54
एकादशी माहात्म्य एवं व्रत कथाएँ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से अक्षरशः उतारी गईं और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गईं।
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।