श्रीराहुकवचम्
मंगलाचरण 1
विनियोग 1
ध्यानम् 1
कवच 5
फलश्रुति 1
समापन 1
परिचय
श्रीराहुकवचम् नवग्रहों में से छाया-ग्रह राहु का रक्षा-कवच है, जो महाभारत के द्रोणपर्व में धृतराष्ट्र-सञ्जय संवाद के अन्तर्गत वर्णित है। इसमें साधक राहु के विविध नामों — नीलाम्बर, सैंहिकेय, स्वर्भानु, धूम्रवर्ण, भुजङ्गेश, विधुन्तुद, ग्रहपति आदि — का स्मरण कर शिर से चरण तक अपने प्रत्येक अंग की रक्षा का वरण करता है, और अन्त में इसके नित्य पाठ का पुण्यफल — कीर्ति, श्री, आयु, आरोग्य एवं आत्मविजय — कहा गया है।
संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः प्रस्तुत है; अर्थ व्याख्यात्मक हैं। शुद्ध उच्चारण एवं विधि हेतु योग्य आचार्य का मार्गदर्शन श्रेयस्कर है।
स्रोत 2
- Sanskrit Documents — राहुकवचम् — rAhukavach, proofread ITRANS (Ravin Bhalekar)
संस्कृत मूल पाठ इसी प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; अर्थ व्याख्यात्मक। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।
- Hindupedia — Rahu Kavacham — English verse-by-verse meaning (body-part protection + phalashruti)
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।