बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥
सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥
bahu bidhi mohi prabodhi sukha deī| lage karana sisu kautuka teī||
sajala nayana kachu mukha kari rūkhā| citai mātu lāgī ati bhūkhā||
Meaning मुझे बहुत प्रकारसे भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकोंके खेल करने लगे। नेत्रोंगें जल भरकर और मुखको कुछ रूखा [-सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा-- [और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है॥ ३॥
देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥
गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥
dekhi mātu ātura uṭhi dhāī| kahi mṛdu bacana lie ura lāī||
goda rākhi karāva paya pānā| raghupati carita lalita kara gānā||
Meaning यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छातीसे लगा लिया। वे गोदमें लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी (उन्हीं ) की ललित लीलाएँ गाने लगीं॥ ४॥
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुं संतत मगन॥ ८८ (क )॥
jehi sukha lāgi purāri asubha beṣa kṛta siva sukhada|
avadhapurī nara nāri tehi sukha mahuṃ saṃtata magana|| 88 (ka )||
Meaning जिस सुखके लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजीने अशुभ वेष धारण किया, उस सुखमें अवधपुरीके नर-नारी निरन्तर निमग्र रहते हैं॥ ८८ (क)॥
ई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहूँ लहेउ।
ते नहिं गनहिं खगेस ब्रहासुखहि सज्जन सुमति॥ ८८ ( ख )॥
ī sukha lavalesa jinha bāraka sapanehūm̐ laheu|
te nahiṃ ganahiṃ khagesa brahāsukhahi sajjana sumati|| 88 ( kha )||
Meaning उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्रमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रहासुखको भी कुछ नहीं गिनते॥ ८८ (ख)॥
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥
राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥
maiṃ puni avadha raheum̐ kachu kālā| dekheum̐ bālabinoda rasālā||
rāma prasāda bhagati bara pāyaum̐| prabhu pada baṃdi nijāśrama āyaum̐||
Meaning मैं और कुछ समयतक अवधपुरीमें रहा और मैंने श्रीरामजीकी रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजीकी कृपासे मैंने भक्तिका वरदान पाया। तदनन्तर प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट आया॥ १॥
तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥
यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥
taba te mohi na byāpī māyā| jaba te raghunāyaka apanāyā||
yaha saba gupta carita maiṃ gāvā| hari māyām̐ jimi mohi nacāvā||
Meaning इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजीने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरिकी मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा॥ २॥
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा॥
राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥
nija anubhava aba kahaum̐ khagesā| binu hari bhajana na jāhi kalesā||
rāma kṛpā binu sunu khagarāī| jāni na jāi rāma prabhutāī||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़ ! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती;॥ ३॥
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥
jāneṃ binu na hoi paratītī| binu paratīti hoi nahiṃ prītī||
prīti binā nahiṃ bhagati diṛhāī| jimi khagapati jala kai cikanāī||
Meaning प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं॥ ४॥
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥ ८९ ( क )॥
binu gura hoi ki gyāna gyāna ki hoi birāga binu|
gāvahiṃ beda purāna sukha ki lahia hari bhagati binu|| 89 ( ka )||
Meaning गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है ? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है ? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है ?॥ ८९ (क)॥
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ॥ ८९ ( ख )॥
kou biśrāma ki pāva tāta sahaja saṃtoṣa binu|
calai ki jala binu nāva koṭi jatana paci paci maria|| 89 ( kha )||
Meaning हे तात! स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी ] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है ?॥ ८९ (ख)॥
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥
binu saṃtoṣa na kāma nasāhīṃ| kāma achata sukha sapanehum̐ nāhīṃ||
rāma bhajana binu miṭahiṃ ki kāmā| thala bihīna taru kabahum̐ ki jāmā||
Meaning संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्रमें भी सुख नहीं हो सकता। और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं ? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है ?॥ १॥
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥
binu bigyāna ki samatā āvai| kou avakāsa ki nabha binu pāvai||
śraddhā binā dharma nahiṃ hoī| binu mahi gaṃdha ki pāvai koī||
Meaning विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है ? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश (पोल) पा सकता है ? श्रद्धाके बिना धर्म [का आचरण] नहीं होता। क्या पृथ्वीतत्त्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है?॥ २॥
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥
binu tapa teja ki kara bistārā| jala binu rasa ki hoi saṃsārā||
sīla ki mila binu budha sevakāī| jimi binu teja na rūpa gosāī||
Meaning तपके बिना क्या तेज फैल सकता है? जल-तत्त्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है ? हे गोसाई! जैसे बिना तेज ( अपग्रि-तत्त्व) के रूप नहीं मिलता॥ ३॥
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥
nija sukha binu mana hoi ki thīrā| parasa ki hoi bihīna samīrā||
kavaniu siddhi ki binu bisvāsā| binu hari bhajana na bhava bhaya nāsā||
Meaning निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है ? वायु-तत्त्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है ? इसी प्रकार श्रीहरिकि भजन बिना जन्म-मृत्युके भयका नाश नहीं होता॥ ४॥
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ ९० (क )॥
binu bisvāsa bhagati nahiṃ tehi binu dravahiṃ na rāmu|
rāma kṛpā binu sapanehum̐ jīva na laha biśrāmu|| 90 (ka )||
Meaning बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्रमें भी शान्ति नहीं पाता॥ ९० (क)॥
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ ९० (ख )॥
asa bicāri matidhīra taji kutarka saṃsaya sakala|
bhajahu rāma raghubīra karunākara suṃdara sukhada|| 90 (kha )||
Meaning हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुबीरका भजन कीजिये॥ ९० (ख)॥
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥
कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥
nija mati sarisa nātha maiṃ gāī| prabhu pratāpa mahimā khagarāī||
kaheum̐ na kachu kari juguti biseṣī| yaha saba maiṃ nija nayananhi dekhī||
Meaning हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्तिसे बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब अपनी आँखों देखी कही है॥ १॥
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥
निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥
mahimā nāma rūpa guna gāthā| sakala amita anaṃta raghunāthā||
nija nija mati muni hari guna gāvahiṃ| nigama seṣa siva pāra na pāvahiṃ||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं। मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिके गुण गाते हैं। वेद, शेष और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते॥ २॥
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥
तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥
tumhahi ādi khaga masaka prajaṃtā| nabha uṛāhiṃ nahiṃ pāvahiṃ aṃtā||
timi raghupati mahimā avagāhā| tāta kabahum̐ kou pāva ki thāhā||
Meaning आपसे लेकर मच्छरपर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाशमें उड़ते हैं, किन्तु आकाशका अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात ! श्रीरघुनाथजीकी महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है ?॥ ३॥
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥
सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥
rāmu kāma sata koṭi subhaga tana| durgā koṭi amita ari mardana||
sakra koṭi sata sarisa bilāsā| nabha sata koṭi amita avakāsā||
Meaning श्रीरामजीका अरबों कामदेवोंके समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रोंकें समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशोंके समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है॥ ४॥
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।
ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥ ९१ ( क )॥
maruta koṭi sata bipula bala rabi sata koṭi prakāsa|
sasi sata koṭi susītala samana sakala bhava trāsa|| 91 ( ka )||
Meaning अरबों पवनके समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्योंके समान प्रकाश है। अरबों चन्द्रमाओंके समान वे शीतल और संसारके समस्त भयोंका नाश करनेवाले हैं॥ ९१ (क)॥
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।
धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥ ९१ ( ख )॥
kāla koṭi sata sarisa ati dustara durga duraṃta|
dhūmaketu sata koṭi sama durādharaṣa bhagavaṃta|| 91 ( kha )||
Meaning अरबों कालोंके समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं। वे भगवान् अरबों धूमकेतुओं ( पुच्छल तारों) के समान अत्यन्त प्रबल हैं॥ ९१ (ख)॥
प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥
तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥
prabhu agādha sata koṭi patālā| samana koṭi sata sarisa karālā||
tīratha amita koṭi sama pāvana| nāma akhila agha pūga nasāvana||
Meaning अरबों पातालोंके समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं। अनन्तकोटि तीर्थोंके समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाला है॥ १॥
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥
कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥
himagiri koṭi acala raghubīrā| siṃdhu koṭi sata sama gaṃbhīrā||
kāmadhenu sata koṭi samānā| sakala kāma dāyaka bhagavānā||
Meaning श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल (स्थिर) हैं और अरबों समुद्रॉंकें समान गहरे हैं। भगवान् अरबों कामधेनुओंके समान सब कामनाओं (इच्छित पदार्थों) के देनेवाले हैं॥२॥
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥
बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥
sārada koṭi amita caturāī| bidhi sata koṭi sṛṣṭi nipunāī||
biṣnu koṭi sama pālana kartā| rudra koṭi sata sama saṃhartā||
Meaning उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता है। अरबों ब्रह्माओंके समान सृष्टिचनाकी निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रोंकें समान संहार करनेवाले हैं॥ ३॥
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥
भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥
dhanada koṭi sata sama dhanavānā| māyā koṭi prapaṃca nidhānā||
bhāra dharana sata koṭi ahīsā| niravadhi nirupama prabhu jagadīsā||
Meaning वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान् और करोड़ों मायाओंके समान सृष्टिकि खजाने हैं। बोझ उठानेमें वे अरबों शेषोंके समान हैं। [ अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातोंमें ] सीमारहित और उपमारहित हैं॥ ४॥
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।
जिमि कोटि सत खटद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥
एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।
प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥
nirupama na upamā āna rāma samāna rāmu nigama kahai|
jimi koṭi sata khaṭadyota sama rabi kahata ati laghutā lahai||
ehi bhām̐ti nija nija mati bilāsa munīsa harihi bakhānahīṃ|
prabhu bhāva gāhaka ati kṛpāla saprema suni sukha mānahīṃ||
Meaning श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य [ प्रशंसाको नहीं वरं] अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है (सूर्यकी निन््दा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीधर श्रीहरिका वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।
रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।
संतन्ह सन जस किछ सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ़॥ ९२ (क )॥
rāmu amita guna sāgara thāha ki pāvai koi|
saṃtanha sana jasa kicha suneum̐ tumhahi sunāyaum̐ soi|| 92 (ka )||
Meaning श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है ? संतोंसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥ ९२ (क)॥
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन॥ ९२ (ख )॥
bhāva basya bhagavāna sukha nidhāna karunā bhavana|
taji mamatā mada māna bhajia sadā sītāravana|| 92 (kha )||
Meaning सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये॥ ९२ (ख)॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥
नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥
suni bhusuṃḍi ke bacana suhāe| haraṣita khagapati paṃkha phulāe||
nayana nīra mana ati haraṣānā| śrīraghupati pratāpa ura ānā||
Meaning भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमानन्दके आँसुओंका] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजीका प्रताप हृदयमें धारण किया॥ १॥
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना॥
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा॥
pāchila moha samujhi pachitānā| brahma anādi manuja kari mānā||
puni puni kāga carana siru nāvā| jāni rāma sama prema baṛhāvā||
Meaning वे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछताने लगे कि मैंने अनादि ब्रहमको मनुष्य करके माना। गरुड़जीने बार-बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया॥ २॥
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥
gura binu bhava nidhi tarai na koī| jauṃ biraṃci saṃkara sama hoī||
saṃsaya sarpa graseu mohi tātā| dukhada lahari kutarka bahu brātā||
Meaning गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो। [गरुड्जीने कहा--] हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती हैं, वैसे ही ] बहुत-सी कुतर्करूपी दु:ख देनेवाली लहरें आ रही थीं॥ ३॥
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥
तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना॥
tava sarūpa gāruṛi raghunāyaka| mohi jiāyau jana sukhadāyaka||
tava prasāda mama moha nasānā| rāma rahasya anūpama jānā||
Meaning आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँपका विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया। आपकी कृपासे मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजीका अनुपम रहस्य जाना॥ ४॥
ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाइ कर जोरि।
बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि॥ ९३ ( क )॥
tāhi prasaṃsi bibidhi bidhi sīsa nāi kara jori|
bacana binīta saprema mṛdu boleu garuṛa bahori|| 93 ( ka )||
Meaning उनकी ( भुशुण्डिजीकी ) बहुत प्रकारसे प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले--॥ ९३ (क)॥
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझऊें स्वामी तोहि।
कृपासिंधु सादर कहट्ठु जानि दास निज मोहि॥ ९३ (ख )॥
prabhu apane abibeka te būjhaūेṃ svāmī tohi|
kṛpāsiṃdhu sādara kahaṭṭhu jāni dāsa nija mohi|| 93 (kha )||
Meaning हे प्रभो ! हे स्वामी ! मैं अपने अविवेकके कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपाके समुद्र ! मुझे अपना 'निज दास' जानकर आदरपूर्वक (विचारपूर्वक) मेरे प्रश्नका उत्तर कहिये॥ ९३ (ख)॥
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥
ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥
tumha sarbagya tanya tama pārā| sumati susīla sarala ācārā||
gyāna birati bigyāna nivāsā| raghunāyaka ke tumha priya dāsā||
Meaning आप सब कुछ जाननेवाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता हैं, अन्धकार (माया) से परे, उत्तम बुद्धिसे युक्त, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञानके धाम और श्रीरघुनाथजीके प्रिय दास हैं॥ १॥
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥
राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥
kārana kavana deha yaha pāī| tāta sakala mohi kahahu bujhāī||
rāma carita sara suṃdara svāmī| pāyahu kahām̐ kahahu nabhagāmī||
Meaning आपने यह काकशरीर किस कारणसे पाया ? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी ! हे आकाशगामी ! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये॥ २॥
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥
मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई॥
nātha sunā maiṃ asa siva pāhīṃ| mahā pralayahum̐ nāsa tava nāhīṃ||
mudhā bacana nahiṃ īsvara kahaī| sou moreṃ mana saṃsaya ahaī||
Meaning हे नाथ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर (शिवजी) कभी मिध्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मनमें सन्देह है॥ ३॥
अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥
अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥
aga jaga jīva nāga nara devā| nātha sakala jagu kāla kalevā||
aṃḍa kaṭāha amita laya kārī| kālu sadā duratikrama bhārī||
Meaning [क्योंकि] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् कालका कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है॥ ४॥
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन।
मोहि सो कह कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥ ९४ ( क )॥
tumhahi na byāpata kāla ati karāla kārana kavana|
mohi so kaha kṛpāla gyāna prabhāva ki joga bala|| 94 ( ka )||
Meaning [ ऐसा वह] अत्यन्त भयड्भर काल आपको नहीं व्यापता (आपपर प्रभाव नहीं दिखलाता) इसका क्या कारण है ? हे कृपालु ! मुझे कहिये, यह ज्ञानका प्रभाव है या योगका बल है ?॥ ९४ (क)॥
प्रभु तब आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।
कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग॥ ९४ (ख,॥
prabhu taba āśrama āem̐ mora moha bhrama bhāga|
kārana kavana so nātha saba kahahu sahita anurāga|| 94 (kha,||
Meaning हे प्रभो ! आपके आश्रममें आते ही मेरा मोह और श्रम भाग गया। इसका क्या कारण है? हे नाथ! यह सब प्रेमसहित कहिये॥ ९४ (ख)॥
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥
धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥
garuṛa girā suni haraṣeu kāgā| boleu umā parama anurāgā||
dhanya dhanya tava mati uragārī| prasna tumhāri mohi ati pyārī||
Meaning हे उमा! गरुड्जीकी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेमसे बोले-हे सर्पोंक शत्रु! आपकी बुद्धि धन्य है! धन्य है! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे॥ १॥
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई॥
सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥
suni tava prasna saprema suhāī| bahuta janama kai sudhi mohi āī||
saba nija kathā kahaum̐ maiṃ gāī| tāta sunahu sādara mana lāī||
Meaning आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मोंकी याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तारसे कहता हूँ। हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये॥ २॥
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥
सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥
japa tapa makha sama dama brata dānā| birati bibeka joga bigyānā||
saba kara phala raghupati pada premā| tehi binu kou na pāvai chemā||
Meaning अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मनको रोकना), दम (इन्द्रियोंको रोकना ), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता॥ ३॥
एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥
जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥
ehi tana rāma bhagati maiṃ pāī| tāte mohi mamatā adhikāī||
jehi teṃ kachu nija svāratha hoī| tehi para mamatā kara saba koī||
Meaning मैंने इसी शरीरसे श्रीरामजीकी भक्ति प्राप्त की है। इसीसे इसपर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उसपर सभी कोई प्रेम करते हैं॥ ४॥
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सजन कहहिं।
अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ ( क )॥
pannagāri asi nīti śruti saṃmata sajana kahahiṃ|
ati nīcahu sana prīti karia jāni nija parama hita|| 95 ( ka )||
Meaning हे गरुड़जी! वेदोंगें मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीचसे भी प्रेम करना चाहिये॥ ९५ (क)॥
पाट कीट तें होड़ तेहि तें पाटंबर रुचिर।
कृमि पालड़ सबु कोड परम अपावन प्रान सम॥ ९५ ( ख )॥
pāṭa kīṭa teṃ hoṛa tehi teṃ pāṭaṃbara rucira|
kṛmi pālaṛa sabu koḍa parama apāvana prāna sama|| 95 ( kha )||
Meaning रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीसे उस परम अपवित्र कीड़ेको भी सब कोई प्राणोंके समान पालते हैं॥ ९५ (ख)॥
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा।
मन क्रम बचन राम पद नेहा॥
svāratha sām̐ca jīva kahum̐ ehā| mana krama bacana rāma pada nehā||
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा।
जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥
soi pāvana soi subhaga sarīrā| jo tanu pāi bhajia raghubīrā||
Meaning जीवके लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीरको पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय॥ १॥
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥
rāma bimukha lahi bidhi sama dehī| kabi kobida na prasaṃsahiṃ tehī||
rāma bhagati ehiṃ tana ura jāmī| tāte mohi parama priya svāmī||
Meaning जो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजीके समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीरसे मेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसीसे हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है॥ २॥
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥
प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥
tajaum̐ na tana nija icchā maranā| tana binu beda bhajana nahiṃ baranā||
prathama moham̐ mohi bahuta bigovā| rāma bimukha sukha kabahum̐ na sovā||
Meaning मेरा मरण अपनी इच्छापर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदोंने वर्णन किया है कि शरीरके बिना भजन नहीं होता। पहले मोहने मेरी बड़ी दुर्दशा की। श्रीरामजीके विमुख होकर मैं कभी सुखसे नहीं सोया॥ ३॥
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥
nānā janama karma puni nānā| kie joga japa tapa makha dānā||
kavana joni janameum̐ jaham̐ nāhīṃ| maiṃ khagesa bhrami bhrami jaga māhīṃ||
Meaning अनेकों जन्मोंमें मैंने अनेकों प्रकारके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किये। हे गरुड़जी! जगत्में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [ बार-बार] घूम-फिरकर जन्म न लिया हो॥ ४॥
देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई॥
सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥
dekheum̐ kari saba karama gosāī| sukhī na bhayaum̐ abahiṃ kī nāī||
sudhi mohi nātha janma bahu kerī| siva prasāda mati moham̐ na gherī||
Meaning हे गुसाई! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब (इस जन्म) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। हे नाथ! मुझे बहुत-से जन्मोंकी याद है। [ क्योंकि] श्रीशिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको मोहने नहीं घेरा॥ ५॥
प्रथम जन्म के चरित अब कहरँ सुनह बिहगेस।
सुनि प्रभु पद रति उपजट् जातें मिटहिं कलेस॥ ९६ ( क )॥
prathama janma ke carita aba kaharam̐ sunaha bihagesa|
suni prabhu pada rati upajaṭ jāteṃ miṭahiṃ kalesa|| 96 ( ka )||
Meaning हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥ ९६ (क)॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥ ९६ ( ख )॥
pūruba kalpa eka prabhu juga kalijuga mala mūla|
nara aru nāri adharma rata sakala nigama pratikūla|| 96 ( kha )||
Meaning हे प्रभो! पूर्वक एक कल्पमें पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेदके विरोधी थे॥ ९६ (ख)॥
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई॥
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥
tehi kalijuga kosalapura jāī| janmata bhayaum̐ sūdra tanu pāī||
siva sevaka mana krama aru bānī| āna deva niṃdaka abhimānī||
Meaning उस कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें जाकर शूद्रका शरीर पाकर जनमा। मैं मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन््दा करनेवाला अभिमानी था॥ १॥
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥
dhana mada matta parama bācālā| ugrabuddhi ura daṃbha bisālā||
jadapi raheum̐ raghupati rajadhānī| tadapi na kachu mahimā taba jānī||
Meaning मैं धनके मदसे मतवाला, बहुत ही बकवादी और उमग्रबुद्धिवाला था; मेरे हदयमें बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजीकी राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी॥ २॥
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई॥
aba jānā maiṃ avadha prabhāvā| nigamāgama purāna asa gāvā||
kavanehum̐ janma avadha basa joī| rāma parāyana so pari hoī||
Meaning अब मैंने अवधका प्रभाव जाना। वेद, शास्त्र और पुराणोंने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्ममें जो कोई भी अयोध्यामें बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजीके परायण हो जायगा॥ ३॥
अवध प्रभाव जान तब प्रानी।
जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥
avadha prabhāva jāna taba prānī| jaba ura basahiṃ rāmu dhanupānī||
सो कलिकाल कठिन उरगारी।
पाप परायन सब नर नारी॥
so kalikāla kaṭhina uragārī| pāpa parāyana saba nara nārī||
Meaning अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदयमें निवास करते हैं। हे गरुड़जी ! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पाप- परायण (पापोंमें लिप्त) थे॥ ४॥
कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।
दंभिन््ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥ ९७ ( क )॥
kalimala grase dharma saba lupta bhae sadagraṃtha|
daṃbhinha nija mati kalpi kari pragaṭa kie bahu paṃtha|| 97 ( ka )||
Meaning कलियुगके पापोंने सब धर्मीको ग्रस लिया, सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये, दम्भियोंने अपनी बुद्धिसे कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये॥ ९७ (क)॥