भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।
सुनु हरिजान ग्यान निधि कहर कछुक कलिधर्म॥ ९७ ( ख )॥
bhae loga saba mohabasa lobha grase subha karma|
sunu harijāna gyāna nidhi kahara kachuka kalidharma|| 97 ( kha )||
Meaning सभी लोग मोहके वश हो गये, शुभकर्मोको लोभने हड़प लिया। हे ज्ञानके भण्डार! हे श्रीहरिके वाहन! सुनिये, अब मैं कलिके कुछ धर्म कहता हूँ॥ ९७ (ख)॥
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥
barana dharma nahiṃ āśrama cārī| śruti birodha rata saba nara nārī||
dvija śruti becaka bhūpa prajāsana| kou nahiṃ māna nigama anusāsana||
Meaning कलियुगमें न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेदके विरोधमें लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदोंके बेचनेवाले और राजा प्रजाको खा डालनेवाले होते हैं। वेदकी आज्ञा कोई नहीं मानता॥ १॥
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
māraga soi jā kahum̐ joi bhāvā| paṃḍita soi jo gāla bajāvā||
mithyāraṃbha daṃbha rata joī| tā kahum̐ saṃta kahai saba koī||
Meaning जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पण्डित है। जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और जो दम्भमें रत है, उसीको सब कोई संत कहते हैं॥ २॥
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
soi sayāna jo paradhana hārī| jo kara daṃbha so baṛa ācārī||
jau kaha jhūm̐ṭha masakharī jānā| kalijuga soi gunavaṃta bakhānā||
Meaning जो [जिस किसी प्रकारसे। दूसरेका धन हरण कर ले, वही बुद्धिमानू है। जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल््लगी करना जानता है, कलियुगमें वही गुणवान् कहा जाता है॥ ३॥
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥
nirācāra jo śruti patha tyāgī| kalijuga soi gyānī so birāgī||
jākeṃ nakha aru jaṭā bisālā| soi tāpasa prasiddha kalikālā||
Meaning जो आचारहीन है और वेदमार्गको छोड़े हुए है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुगमें प्रसिद्ध तपस्वी है॥ ४॥
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेड़ जोगी तेड़ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं॥ ९८ ( क )॥
asubha beṣa bhūṣana dhareṃ bhacchābhaccha je khāhiṃ|
teṛa jogī teṛa siddha nara pūjya te kalijuga māhiṃ|| 98 ( ka )||
Meaning जो अमज़ल वेष और अमड़ल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं, वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुगमें पूज्य हैं॥ ९८ (क)॥
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मन क्रम बचन लबार तेड़ बकता कलिकाल महुँ॥ ९८ (ख )॥
je apakārī cāra tinha kara gaurava mānya tei|
mana krama bacana labāra teṛa bakatā kalikāla mahum̐|| 98 (kha )||
Meaning जिनके आचरण दूसरोंका अपकार (अहित) करनेवाले हैं, उन्हींका बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मानके योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्मसे लबार (झूठ बकनेवाले) हैं, वे ही कलियुगमें वक्ता माने जाते हैं॥ ९८ (ख)॥
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई॥
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥
nāri bibasa nara sakala gosāī| nācahiṃ naṭa markaṭa kī nāī||
sūdra dvijanha upadesahiṃ gyānā| meli janeū lehiṃ kudānā||
Meaning हे गोसाई! सभी मनुष्य स्त्रियोंके विशेष वशमें हैं और बाजीगरके बंदरकी तरह [उनके नचाये ] नाचते हैं। ब्राह्मणोंको शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥ १॥
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥
saba nara kāma lobha rata krodhī| deva bipra śruti saṃta birodhī||
guna maṃdira suṃdara pati tyāgī| bhajahiṃ nāri para puruṣa abhāgī||
Meaning सभी पुरुष काम और लोभमें तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंके विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणोंके धाम सुन्दर पतिको छोड़कर परपुरुषका सेवन करती हैं॥ २॥
सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥
गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥
saubhāginīṃ bibhūṣana hīnā| bidhavanha ke siṃgāra nabīnā||
gura siṣa badhira aṃdha kā lekhā| eka na sunai eka nahiṃ dekhā||
Meaning सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणोंसे रहित होती हैं, पर विधवाओंके नित्य नये श्रृज्धार होते हैं। शिष्य और गुरुमें बहरे और अंधेका-सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरुके उपदेशको सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहीं है)॥ ३॥
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥
मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥
harai siṣya dhana soka na haraī| so gura ghora naraka mahum̐ paraī||
mātu pitā bālakanhi bolābahiṃ| udara bharai soi dharma sikhāvahiṃ||
Meaning जो गुरु शिष्यका धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरकमें पड़ता है। माता-पिता बालकोंको बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥ ४॥
बत्रहमा ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥ ९९ (क )॥
batrahamā gyāna binu nāri nara kahahiṃ na dūsari bāta|
kauṛī lāgi lobha basa karahiṃ bipra gura ghāta|| 99 (ka )||
Meaning स्त्री-पुरुष ब्रह्जज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ)के लिये ब्राह्मण और गुरुकी हत्या कर डालते हैं॥ ९९ (क)॥
बादहिं सूद्र द्विजन्द सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानड़ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि॥ ९९ (ख )॥
bādahiṃ sūdra dvijanda sana hama tumha te kachu ghāṭi|
jānaṛa brahma so biprabara ām̐khi dekhāvahiṃ ḍāṭi|| 99 (kha )||
Meaning शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करते हैं [और कहते हैं] कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। [ऐसा कहकर] वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥ ९९ (ख)॥
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने॥
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर॥
para triya laṃpaṭa kapaṭa sayāne| moha droha mamatā lapaṭāne||
tei abhedabādī gyānī nara| dekhā meṃ caritra kalijuga kara||
Meaning जो परायी स्त्रीमें आसक्त, कपट करनेमें चतुर और मोह, द्रोह और ममतामें लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुगका यह चरित्र देखा॥ १॥
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥
कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥
āpu gae aru tinhahū ghālahiṃ| je kahum̐ sata māraga pratipālahiṃ||
kalpa kalpa bhari eka eka narakā| parahiṃ je dūṣahiṃ śruti kari tarakā||
Meaning वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं; जो कहीं सन्मार्गका प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेदकी निन््दा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरकमें पड़े रहते हैं॥ २॥
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी॥
je baranādhama teli kumhārā| svapaca kirāta kola kalavārā||
nāri muī gṛha saṃpati nāsī| mūṛa muṛāi hohiṃ sanyāsī||
Meaning तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण्मिं नीचे हैं, स्त्रीके मरनेपर अथवा घरकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥ ३॥
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥
te bipranha sana āpu pujāvahiṃ| ubhaya loka nija hātha nasāvahiṃ||
bipra niracchara lolupa kāmī| nirācāra saṭha bṛṣalī svāmī||
Meaning वे अपनेको ब्राह्मणोंसे पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपड़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जातिकी व्यभिचारिणी स्त्रियोंके स्वामी होते हैं॥ ४॥
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥
sūdra karahiṃ japa tapa brata nānā| baiṭhi barāsana kahahiṃ purānā||
saba nara kalpita karahiṃ acārā| jāi na barani anīti apārā||
Meaning शूद्र नाना प्रकारके जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यासगद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५॥
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।
करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥ १०० ( क )॥
bhae barana saṃkara kali bhinnasetu saba loga|
karahiṃ pāpa pāvahiṃ dukha bhaya ruja soka biyoga|| 100 ( ka )||
Meaning कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर और मर्यादासे च्युत हो गये। वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरूप] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तुका] वियोग पाते हैं॥ १०० (क)॥
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥ १०० (ख )॥
śruti saṃmata hari bhakti patha saṃjuta birati bibeka|
tehiṃ na calahiṃ nara moha basa kalpahiṃ paṃtha aneka|| 100 (kha )||
Meaning वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं॥ १०० (ख)॥
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥
bahu dāma sam̐vārahiṃ dhāma jatī| biṣayā hari līnhi na rahi biratī||
tapasī dhanavaṃta daridra gṛhī| kali kautuka tāta na jāta kahī||
Meaning संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया। तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती॥ १॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥
kulavaṃti nikārahiṃ nāri satī| gṛha ānihiṃ cerī niberi gatī||
suta mānahiṃ mātu pitā taba lauṃ| abalānana dīkha nahīṃ jaba lauṃ||
Meaning कुलवती और सती स्त्रीको पुरुष घरसे निकाल देते हैं और अच्छी चालकों छोड़कर घरमें दासीको ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक स्त्रीका मुँह नहीं दिखायी पड़ा॥ २॥
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥
sasurāri piāri lagī jaba teṃ| riparūpa kuṭuṃba bhae taba teṃ||
nṛpa pāpa parāyana dharma nahīṃ| kari daṃḍa biḍaṃba prajā nitahīṃ||
Meaning जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुट्म्बी शत्रुरूप हो गये। राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजाको नित्य ही [बिना अपराध] दण्ड देकर उसकी विडम्बना (दुर्दशा) किया करते हैं॥ ३॥
धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥
नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो॥
dhanavaṃta kulīna malīna apī| dvija cinha janeu ughāra tapī||
nahiṃ māna purāna na bedahi jo| hari sevaka saṃta sahī kali so||
Meaning धनी लोग मलिन (नीच जातिके) होनेपर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विजका चिह्न जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वीका। जो वेदों और पुराणोंको नहीं मानते, कलियुगमें वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥ ४॥
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥
कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥
kabi bṛṃda udāra dunī na sunī| guna dūṣaka brāta na kopi gunī||
kali bārahiṃ bāra dukāla parai| binu anna dukhī saba loga marai||
Meaning कवियोंके तो झुंड हो गये, पर दुनियामें उदार (कवियोंका आश्रयदाता) सुनायी नहीं पड़ता। गुणमें दोष लगानेवाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्नके बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं॥ ५॥
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।
मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रहांड॥ १०१ (क )॥
sunu khagesa kali kapaṭa haṭha daṃbha dveṣa pāṣaṃḍa|
māna moha mārādi mada byāpi rahe brahāṃḍa|| 101 (ka )||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ (दुराग्रह ), दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये (छा गये)॥ १०१ (क)॥
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान।
देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान॥ १०१ (ख )॥
tāmasa dharma karahiṃ nara japa tapa brata makha dāna|
deva na baraṣahiṃ dharanīṃ bae na jāmahiṃ dhāna|| 101 (kha )||
Meaning मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भावसे करने लगे। देवता (इन्द्र) पृथ्वीपर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥ १०१ (ख)॥
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा॥
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता॥
abalā kaca bhūṣana bhūri chudhā| dhanahīna dukhī mamatā bahudhā||
sukha cāhahiṃ mūṛha na dharma ratā| mati thori kaṭhori na komalatā||
Meaning स्त्रियोंके बाल ही भूषण हैं (उनके शरीरपर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं।) वे धनहीन और बहुत प्रकारकी ममता होनेके कारण दुखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्ममें उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है; उनमें कोमलता नहीं है॥ १॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥
nara pīṛita roga na bhoga kahīṃ| abhimāna birodha akāranahīṃ||
laghu jīvana saṃbatu paṃca dasā| kalapāṃta na nāsa gumānu asā||
Meaning मनुष्य रोगोंसे पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा॥ २॥
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥
kalikāla bihāla kie manujā| nahiṃ mānata kvau anujā tanujā||
nahiṃ toṣa bicāra na sītalatā| saba jāti kujāti bhae magatā||
Meaning कलिकालने मनुष्यको बेहाल ( अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटीका भी विचार नहीं करता। [ लोगोंमें] न सन्तोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगनेवाले हो गये॥ ३॥
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता॥
सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए॥
iriṣā paruṣācchara lolupatā| bhari pūri rahī samatā bigatā||
saba loga biyoga bisoka hue| baranāśrama dharma acāra gae||
Meaning ईर्ष्या (डाह), कड़॒वे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गयी। सब लोग वियोग और विशेष शोकसे भरे पड़े हैं। वर्णाश्रम-धर्मके आचरण नष्ट हो गये॥ ४॥
दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी॥
तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे॥
dama dāna dayā nahiṃ jānapanī| jaṛatā parabaṃcanatāti ghanī||
tanu poṣaka nāri narā sagare| paraniṃdaka je jaga mo bagare||
Meaning इन्द्रियोंका दमन, दान, दया. और समझदारी किसीमें नहीं रही। मूर्खता और दूसरोंको ठगना यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीरके ही पालन-पोषणमें लगे रहते हैं। जो परायी निनन््दा करनेवाले हैं, जगतमें वे ही फैले हैं॥ ५॥
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।
गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥ १०२ ( क )॥
sunu byālāri kāla kali mala avaguna āgāra|
gunau bahuta kalijuga kara binu prayāsa nistāra|| 102 ( ka )||
Meaning हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर है। किन्तु कलियुगमें एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है॥ १०२ (क)॥
कृतजुग त्रेतों द्वापर पूजा मख अरु जोग।
जो गति होड़ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥ १०२ (ख )॥
kṛtajuga tretoṃ dvāpara pūjā makha aru joga|
jo gati hoṛa so kali hari nāma te pāvahiṃ loga|| 102 (kha )||
Meaning सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योगसे प्राप्त होती है, वही गति कलियुगमें लोग केवल भगवान्के नामसे पा जाते हैं॥ १०२ (ख)॥
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥
kṛtajuga saba jogī bigyānī| kari hari dhyāna tarahiṃ bhava prānī||
tretām̐ bibidha jagya nara karahīṃ| prabhuhi samarpi karma bhava tarahīṃ||
Meaning सत्ययुगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरिका ध्यान करके सब प्राणी भवसागरसे तर जाते हैं। त्रेतामें मनुष्य अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं और सब कर्मोंको प्रभुके समर्पण करके भवसागरसे पार हो जाते हैं॥ १॥
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥
dvāpara kari raghupati pada pūjā| nara bhava tarahiṃ upāya na dūjā||
kalijuga kevala hari guna gāhā| gāvata nara pāvahiṃ bhava thāhā||
Meaning द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है। और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं॥ २॥
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥
kalijuga joga na jagya na gyānā| eka adhāra rāma guna gānā||
saba bharosa taji jo bhaja rāmahi| prema sameta gāva guna grāmahi||
Meaning कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है,॥ ३॥
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥
soi bhava tara kachu saṃsaya nāhīṃ| nāma pratāpa pragaṭa kali māhīṃ||
kali kara eka punīta pratāpā| mānasa punya hohiṃ nahiṃ pāpā||
Meaning वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है। कलियुगका एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते॥ ४॥
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाड़ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास १०३ ( क )॥
kalijuga sama juga āna nahiṃ jauṃ nara kara bisvāsa|
gāṛa rāma guna gana bimala bhava tara binahiṃ prayāsa 103 ( ka )||
Meaning यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है। [क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [रूपी समुद्र] से तर जाता है॥ १०३ (क)॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महूँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥ १०३ (ख )॥
pragaṭa cāri pada dharma ke kali mahūm̐ eka pradhāna|
jena kena bidhi dīnheṃ dāna karai kalyāna|| 103 (kha )||
Meaning धर्मके चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलिमें एक [ दानरूपी ] चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है॥ १०३ (ख)॥
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे॥
सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥
nita juga dharma hohiṃ saba kere| hṛdayam̐ rāma māyā ke prere||
suddha satva samatā bigyānā| kṛta prabhāva prasanna mana jānā||
Meaning श्रीरामजीकी मायासे प्रेरित होकर सबके हृदयोंमें सभी युगोंके धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मनका प्रसन्न होना, इसे सत्ययुगका प्रभाव जाने॥ १॥
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा॥
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस॥
satva bahuta raja kachu rati karmā| saba bidhi sukha tretā kara dharmā||
bahu raja svalpa satva kachu tāmasa| dvāpara dharma haraṣa bhaya mānasa||
Meaning सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मोमें प्रीति हो, सब प्रकारसे सुख हो, यह त्रेताका धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मनमें हर्ष और भय हो, यह द्वापरका धर्म है॥ २॥
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा॥
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं॥
tāmasa bahuta rajoguna thorā| kali prabhāva birodha cahum̐ orā||
budha juga dharma jāni mana māhīṃ| taji adharma rati dharma karāhīṃ||
Meaning तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुगका प्रभाव है। पण्डित लोग युगोंके धर्मको मनमें जान (पहिचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्ममें प्रीति करते हैं॥ ३॥
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥
नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥
kāla dharma nahiṃ byāpahiṃ tāhī| raghupati carana prīti ati jāhī||
naṭa kṛta bikaṭa kapaṭa khagarāyā| naṭa sevakahi na byāpai māyā||
Meaning जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज ! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट-चरित्र (इन्द्रजाल ) देखनेवालोंके लिये बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नटके सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती॥ ४॥
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं॥ १०४ ( क )॥
hari māyā kṛta doṣa guna binu hari bhajana na jāhiṃ|
bhajia rāma taji kāma saba asa bicāri mana māhiṃ|| 104 ( ka )||
Meaning श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिकि भजन बिना नहीं जाते। मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये॥ १०४ (क)॥
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउं अवध बिहगेस।
परेउ दुकाल बिपति बस तब में गयउँ बिदेस॥ १०४ ( ख )॥
tehiṃ kalikāla baraṣa bahu baseuṃ avadha bihagesa|
pareu dukāla bipati basa taba meṃ gayaum̐ bidesa|| 104 ( kha )||
Meaning हे पक्षिराज ! उस कलिकालमें मैं बहुत वर्षोतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्तिका मारा विदेश चला गया॥ १०४ (ख)॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥
गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई॥
gayaum̐ ujenī sunu uragārī| dīna malīna daridra dukhārī||
gaem̐ kāla kachu saṃpati pāī| taham̐ puni karaum̐ saṃbhu sevakāī||
Meaning हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये। मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ १॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा॥
परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक॥
bipra eka baidika siva pūjā| karai sadā tehi kāju na dūjā||
parama sādhu paramāratha biṃdaka| saṃbhu upāsaka nahiṃ hari niṃdaka||
Meaning एक ब्राह्मण वेदविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे, वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन्दा करनेवाले न थे॥ २॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता॥
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं॥
tehi sevaum̐ maiṃ kapaṭa sametā| dvija dayāla ati nīti niketā||
bāhija namra dekhi mohi sāīṃ| bipra paṛhāva putra kī nāīṃ||
Meaning मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीतिके घर थे। हे स्वामी ! बाहरसे नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्रकी भाँति मानकर पढ़ाते थे॥ ३॥
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा॥
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई॥
saṃbhu maṃtra mohi dvijabara dīnhā| subha upadesa bibidha bidhi kīnhā||
japaum̐ maṃtra siva maṃdira jāī| hṛdayam̐ daṃbha ahamiti adhikāī||
Meaning उन ब्राह्मणश्रेष्ठने मुझको शिवजीका मन्त्र दिया और अनेकों प्रकारके शुभ उपदेश किये। मैं शिवजीके मन्दिरमें जाकर मन्त्र जपता। मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार बढ़ गया॥ ४॥
पमैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।
हरिजन द्विज देखें जरउं करउँ बिष्नु कर द्रोह॥ १०५ ( क )॥
pamaiṃ khala mala saṃkula mati nīca jāti basa moha|
harijana dvija dekheṃ jarauṃ karaum̐ biṣnu kara droha|| 105 ( ka )||
Meaning मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरिके भक्तों और द्विजोंको देखते ही जल उठता और विष्णुभगवानसे द्रोह करता था॥ १०५ (क)॥
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
मोहि उपजड़ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥ १०५ (ख )॥
gura nita mohi prabodha dukhita dekhi ācarana mama|
mohi upajaṛa ati krodha daṃbhihi nīti ki bhāvaī|| 105 (kha )||
Meaning गुरुजी में आचरण देखकर दुखित थे। वे मुझे नित्य ही भलीभाँति समझाते, पर [मैं कुछ भी नहीं समझता, उलटे] मुझे अत्यन्त क्रोध उत्पन्न होता। दम्भीको कभी नीति अच्छी लगती है ?॥ १०५ (ख)॥
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥
eka bāra gura līnha bolāī| mohi nīti bahu bhām̐ti sikhāī||
siva sevā kara phala suta soī| abirala bhagati rāma pada hoī||
Meaning एक बार गुरुजीने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकारसे [ परमार्थ] नीतिकी शिक्षा दी कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका फल यही है कि श्रीरामजीके चरणोंमें प्रगाढ़ भक्ति हो॥ १॥
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥
rāmahi bhajahiṃ tāta siva dhātā| nara pāvam̐ra kai ketika bātā||
jāsu carana aja siva anurāgī| tātu droham̐ sukha cahasi abhāgī||
Meaning हे तात! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजीको भजते हैं [फिर] नीच मनुष्यकी तो बात ही कितनी है? ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणोंके प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है ?॥ २॥
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥
hara kahum̐ hari sevaka gura kaheū| suni khaganātha hṛdaya mama daheū||
adhama jāti maiṃ bidyā pāem̐| bhayaum̐ jathā ahi dūdha piāem̐||
Meaning गुरुजीने शिवजीको हरिका सेवक कहा। यह सुनकर हे पक्षिराज! मेरा हृदय जल उठा। नीच जातिका मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलानेसे साँप॥ ३॥
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती॥
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा॥
mānī kuṭila kubhāgya kujātī| gura kara droha karaum̐ dinu rātī||
ati dayāla gura svalpa na krodhā| puni puni mohi sikhāva subodhā||
Meaning अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता। गुरुजी अत्यन्त दयालु थे, उनको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता। [ मेरे द्रोह करनेपर भी] वे बार-बार मुझे उत्तम ज्ञानको ही शिक्षा देते थे॥ ४॥
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥
jehi te nīca baṛāī pāvā| so prathamahiṃ hati tāhi nasāvā||
dhūma anala saṃbhava sunu bhāī| tehi bujhāva ghana padavī pāī||
Meaning नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसीको मारकर उसीका नाश करता है। हे भाई! सुनिये, आगसे उत्पन्न हुआ धुआँ मेघकी पदवी पाकर उसी अग्रिको बुझा देता है॥ ५॥
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई॥
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई॥
raja maga parī nirādara rahaī| saba kara pada prahāra nita sahaī||
maruta uṛāva prathama tehi bharaī| puni nṛpa nayana kirīṭanhi paraī||
Meaning धूल रास्तेमें निरादरसे पड़ी रहती है और सदा सब [राह चलनेवालों ] के लातोंकी मार सहती है। पर जब पवन उसे उड़ाता (ऊँचा उठाता) है, तो सबसे पहले वह उसी (पवन) को भर देती है और फिर राजाओंके नेत्रों और किरीटों (मुकुटों) पर पड़ती है॥ ६॥
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा॥
कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती॥
sunu khagapati asa samujhi prasaṃgā| budha nahiṃ karahiṃ adhama kara saṃgā||
kabi kobida gāvahiṃ asi nītī| khala sana kalaha na bhala nahiṃ prītī||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, ऐसी बात समझकर बुद्धिमान्ू लोग अधम (नीच) का संग नहीं करते। कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्टसे न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही॥ ७॥
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥
udāsīna nita rahia gosāīṃ| khala pariharia svāna kī nāīṃ||
maiṃ khala hṛdayam̐ kapaṭa kuṭilāī| gura hita kahai na mohi sohāī||
Meaning हे गोसाई! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये। दुष्टको कुत्तेकी तरह दूरसे ही त्याग देना चाहिये। मैं दुष्ट था, हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी। [ इसीलिये यद्यपि] गुरुजी हितकी बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी॥ ८॥
एक बार हर मंदिर जपत रहेउं सिव नाम।
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कौन्ह प्रनाम॥ १०६ ( क )॥
eka bāra hara maṃdira japata raheuṃ siva nāma|
gura āyau abhimāna teṃ uṭhi nahiṃ kaunha pranāma|| 106 ( ka )||
Meaning एक दिन मैं शिवजीके मन्दिरमें शिवनाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया॥ १०६ (क)॥
दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस।
अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥ १०६ ( ख )॥
dayāla nahiṃ kaheu kachu ura na roṣa lavalesa|
ati agha gura apamānatā sahi nahiṃ sake mahesa|| 106 ( kha )||
Meaning गुरुजी दयालु थे, [ मेरा दोष देखकर भी] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदयमें लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरुका अपमान बहुत बड़ा पाप है; अत: महादेवजी उसे नहीं सह सके॥ १०६ (ख])॥
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥
maṃdira mājha bhaī nabha bānī| re hatabhāgya agya abhimānī||
jadyapi tava gura keṃ nahiṃ krodhā| ati kṛpāla cita samyaka bodhā||
Meaning मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख ! अभिमानी ! यद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्तके हैं और उन्हें [पूर्ण तथा] यथार्थ ज्ञान है,॥ १॥
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥
tadapi sāpa saṭha daihaum̐ tohī| nīti birodha sohāi na mohī||
jauṃ nahiṃ daṃḍa karauṃ khala torā| bhraṣṭa hoi śrutimāraga morā||
Meaning तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [ क्योंकि] नीतिका विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। अरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय॥ २॥
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥
je saṭha gura sana iriṣā karahīṃ| raurava naraka koṭi juga parahīṃ||
trijaga joni puni dharahiṃ sarīrā| ayuta janma bhari pāvahiṃ pīrā||
Meaning जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं। फिर (वहाँसे निकलकर) वे तिर्यक (पशु, पक्षी आदि) योनियोंमें शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मोंतक दुःख पाते रहते हैं॥ ३॥
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥
महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥
baiṭha rahesi ajagara iva pāpī| sarpa hohi khala mala mati byāpī||
mahā biṭapa koṭara mahum̐ jāī| rahu adhamādhama adhagati pāī||
Meaning अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पापसे ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और अरे अधमसे भी अधम! इस अधोगति (सर्पकी नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़के खोखलेमें जाकर रह॥ ४॥
हाहाकार कोन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥ १०७ ( क )॥
hāhākāra konha gura dāruna suni siva sāpa|
kaṃpita mohi biloki ati ura upajā paritāpa|| 107 ( ka )||
Meaning शिवजीका भयानक शाप सुनकर गुरुजीने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप उत्पन्न हुआ॥ १०७ (क)॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्पुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ ( ख )॥
kari daṃḍavata saprema dvija siva sanpukha kara jori|
binaya karata gadagada svara samujhi ghora gati mori|| 107 ( kha )||
Meaning प्रेमसहित दण्डवत् करके वे ब्राह्मण श्रीशिवजीके सामने हाथ जोड़कर मेरी भयड्टर गति (दण्ड) का विचार कर गदूद वाणीसे विनती करने लगे--॥ १०७ (ख)॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥
namāmīśamīśāna nirvāṇarūpaṃ| vibhuṃ vyāpakaṃ brahma vedasvarūpaṃ||
nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ| cidākāśamākāśavāsaṃ bhaje'haṃ||
Meaning हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशाके ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूपमें स्थित ( अर्थात् मायादिरहित), [ मायिक] गुणोंसे रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाशको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले दिगम्बर [अथवा आकाशको भी आच्छादित करनेवाले] आपको मैं भजता हूँ॥ १॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥
nirākāramoṃkāramūlaṃ turīyaṃ| girā gyāna gotītamīśaṃ girīśaṃ||
karālaṃ mahākāla kālaṃ kṛpālaṃ| guṇāgāra saṃsārapāraṃ nato'haṃ||
Meaning निराकार, ओड्ारके मूल, तुरीय (तीनों गुणोंसे अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल, महाकालके भी काल, कृपालु, गुणोंके धाम, संसारसे परे आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥
tuṣārādri saṃkāśa gauraṃ gabhīraṃ| manobhūta koṭi prabhā śrī śarīraṃ||
sphuranmauli kallolinī cāru gaṃgā| lasadbhālabālendu kaṃṭhe bhujaṃgā||
Meaning जो हिमाचलके समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर नदी गड़्ाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और गलेमें सर्प सुशोभित हैं॥ ३॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
calatkuṃḍalaṃ bhrū sunetraṃ viśālaṃ| prasannānanaṃ nīlakaṃṭhaṃ dayālaṃ||
mṛgādhīśacarmāmbaraṃ muṇḍamālaṃ| priyaṃ śaṃkaraṃ sarvanāthaṃ bhajāmi||
Meaning जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्मका वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करनेवाले] श्रीशड्रजीको मैं भजता हूँ॥ ४॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥
pracaṃḍaṃ prakṛṣṭaṃ pragalbhaṃ pareśaṃ| akhaṃḍaṃ ajaṃ bhānukoṭiprakāśaṃ||
trayaḥ śūla nirmūlanaṃ śūlapāṇiṃ| bhaje'haṃ bhavānīpatiṃ bhāvagamyaṃ||
Meaning प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योके समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकारके शूलों (दुःखों ) को निर्मूल करनेवाले, हाथमें त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीके पति श्रीशड्टरजीको मैं भजता हूँ॥ ५॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
kalātīta kalyāṇa kalpāntakārī| sadā sajjanānandadātā purārī||
cidānaṃda saṃdoha mohāpahārī| prasīda prasīda prabho manmathārī||
Meaning कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करनेवाले, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरके शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोहको हरनेवाले, मनको मथ डालनेवाले कामदेवके शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये॥ ६॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥
na yāvad umānātha pādāravindaṃ| bhajaṃtīha loke pare vā narāṇāṃ||
na tāvatsukhaṃ śānti santāpanāśaṃ| prasīda prabho sarvabhūtādhivāsaṃ||
Meaning जबतक पार्वतीके पति आपके चरणकमलोंको मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोकमें सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापोंका नाश होता है। अत: हे समस्त जीवोंके अंदर (हृदयमें ) निवास करनेवाले प्रभो ! प्रसन्न हूजिये॥ ७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥
na jānāmi yogaṃ japaṃ naiva pūjāṃ| nato'haṃ sadā sarvadā śaṃbhu tubhyaṃ||
jarā janma duḥkhaugha tātapyamānaṃ| prabho pāhi āpannamāmīśa śaṃbho||
Meaning मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो ! बुढ़ापा तथा जन्म [मृत्यु] के दुःखसमूहोंसे जलते हुए मुझ दुखीकी दुःखसे रक्षा कीजिये। हे ईधर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ८॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥ ९॥
rudrāṣṭakamidaṃ proktaṃ vipreṇa haratoṣaye|
ye paṭhanti narā bhaktyā teṣāṃ śambhuḥ prasīdati|| 9||
Meaning भगवान् रुद्रकी स्तुतिका यह अष्टक उन शड्रजीको तुष्टि (प्रसन्नता) के लिये ब्राह्मणद्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं॥ ९॥
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥ १०८ ( क )॥
suni binatī sarbagya siva dekhi bripra anurāgu|
puni maṃdira nabhabānī bhai dvijabara bara māgu|| 108 ( ka )||
Meaning सर्वज्ञ शिवजीने विनती सुनी और ब्राह्मणका प्रेम देखा। तब मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ ! वर माँगो॥ १०८ (क)॥
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥ १०८ (ख )॥
jauṃ prasanna prabhu mo para nātha dīna para nehu|
nija pada bhagati dei prabhu puni dūsara bara dehu|| 108 (kha )||
Meaning [ ब्राह्मणने कहा--] हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीनपर आपका स्रेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये॥ १०८ (ख)॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान॥ १०८ (ग)॥
tava māyā basa jīva jaṛa saṃtata phirai bhulāna|
tehi para krodha na karia prabhu kṛpā siṃdhu bhagavāna|| 108 (ga)||
Meaning हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी मायाके वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपाके समुद्र भगवान् ! उसपर क्रोध न कीजिये॥ १०८ (ग)॥