नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥
ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥
nātha ihām̐ kachu kārana ānā| sunahu so sāvadhāna harijānā||
gyāna akhaṃḍa eka sītābara| māyā basya jīva sacarācara||
Meaning हे नाथ ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान्के वाहन गरुड़जी ! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड-चेतन सभी जीव मायाके वश हैं॥ २॥
जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥
माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी॥
jauṃ saba keṃ raha gyāna ekarasa| īsvara jīvahi bheda kahahu kasa||
māyā basya jīva abhimānī| īsa basya māyā gunakhānī||
Meaning यदि जीवोंको एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा ? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम--इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशभमें है॥ ३॥
परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥
मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥
parabasa jīva svabasa bhagavaṃtā| jīva aneka eka śrīkaṃtā||
mudhā bheda jadyapi kṛta māyā| binu hari jāi na koṭi upāyā||
Meaning जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान्के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता॥ ४॥
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूछ बिषान॥ ७८ ( क )॥
rāmacaṃdra ke bhajana binu jo caha pada nirbāna|
gyānavaṃta api so nara pasu binu pūcha biṣāna|| 78 ( ka )||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींगका पशु है॥ ७८ (क)॥
राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ ( ख )॥
rākāpati ṣoḍasa uahiṃ tārāgana samudāi|
sakala girinha dava lāia binu rabi rāti na jāi|| 78 ( kha )||
Meaning सभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाय़्ि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती॥ ७८ (ख)॥
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥
aisehiṃ hari binu bhajana khagesā| miṭai na jīvanha kera kalesā||
hari sevakahi na byāpa abidyā| prabhu prerita byāpai tehi bidyā||
Meaning हे पक्षिराज ! इसी प्रकार श्रीहरिकि भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। श्रीहरिकि सेवकको अविद्या नहीं व्यापती। प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है॥ १॥
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर॥
भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥
tāte nāsa na hoi dāsa kara| bheda bhagati bhāṛhai bihaṃgabara||
bhrama te cakita rāma mohi dekhā| biham̐se so sunu carita biseṣā||
Meaning हे पक्षिश्रेष्ठ! इसीसे दासका नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। श्रीरामजीने मुझे जब भ्रमसे चकित देखा, तब वे हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये॥ २॥
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥
जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥
tehi kautuka kara maramu na kāhūm̐| jānā anuja na mātu pitāhūm̐||
jānu pāni dhāe mohi dharanā| syāmala gāta aruna kara caranā||
Meaning उस खेलका मर्म किसीने नहीं जाना, न छोटे भाइयोंने और न माता-पिताने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतलवाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथोंके बल मुझे पकड़नेको दौड़े॥ ३॥
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥
taba maiṃ bhāgi caleum̐ uragāmī| rāma gahana kaham̐ bhujā pasārī||
jimi jimi dūri uṛāum̐ akāsā| taham̐ bhuja hari dekhaum̐ nija pāsā||
Meaning हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! तब मैं भाग चला। श्रीरामजीने मुझे पकड़नेके लिये भुजा फैलायी। मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरिकी भुजाको अपने पास देखता था॥ ४॥
ब्रहालोक लगि गये मैं चितयउँ पाछ उड़ात।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात॥ ७९ ( क )॥
brahāloka lagi gaye maiṃ citayaum̐ pācha uṛāta|
juga aṃgula kara bīca saba rāma bhujahi mohi tāta|| 79 ( ka )||
Meaning मैं ब्रह्मलोकतक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछेकी ओर देखा, तो हे तात! श्रीरामजीकी भुजामें और मुझमें केवल दो ही अंगुलका बीच था॥ ७९ (क)॥
सप्ताबरन भेद करि जहां लगें गति मोरि।
गयडें तहां प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भय बहोरि॥ ७९ ( ख )॥
saptābarana bheda kari jahāṃ lageṃ gati mori|
gayaḍeṃ tahāṃ prabhu bhuja nirakhi byākula bhaya bahori|| 79 ( kha )||
Meaning सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको [ अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया॥ ७९ (ख)॥
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥
mūdeum̐ nayana trasita jaba bhayaum̐| puni citavata kosalapura gayaūm̐||
mohi biloki rāma musukāhīṃ| biham̐sata turata gayaum̐ mukha māhīṃ||
Meaning जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरीमें पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुखमें चला गया॥ १॥
उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥
udara mājha sunu aṃḍaja rāyā| dekheum̐ bahu brahmāṃḍa nikāyā||
ati bicitra taham̐ loka anekā| racanā adhika eka te ekā||
Meaning हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेटमें बहुत-से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डोंमें ) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एककी बढ़कर थी॥ २॥
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥
अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥
koṭinha caturānana gaurīsā| aganita uḍagana rabi rajanīsā||
aganita lokapāla jama kālā| aganita bhūdhara bhūmi bisālā||
Meaning करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,॥ ३॥
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥
sāgara sari sara bipina apārā| nānā bhām̐ti sṛṣṭi bistārā||
sura muni siddha nāga nara kiṃnara| cāri prakāra jīva sacarācara||
Meaning असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकारके जड़ और चेतन जीव देखे॥ ४॥
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूं न समाइ।
jo nahiṃ dekhā nahiṃ sunā jo manahūṃ na samāi|
सब अद्भुत देखेउं बरनि कवनि बिधि जाइ॥ ८० (क )॥
saba adbhuta dekheuṃ barani kavani bidhi jāi|| 80 (ka )||
Meaning जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मनमें भी नहीं समा सकता था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय!॥ ८० (क)॥
एक एक ब्रह्मांड महूं रहउं बरष सत एक।
एहि बिधि देखत फिरें में अंड कटाह अनेक॥ ८० (ख )॥
eka eka brahmāṃḍa mahūṃ rahauṃ baraṣa sata eka|
ehi bidhi dekhata phireṃ meṃ aṃḍa kaṭāha aneka|| 80 (kha )||
Meaning मैं एक-एक ब्रह्माण्डमें एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा॥ ८० (ख)॥
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥
नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥
loka loka prati bhinna bidhātā| bhinna biṣnu siva manu disitrātā||
nara gaṃdharba bhūta betālā| kiṃnara nisicara pasu khaga byālā||
Meaning प्रत्येक लोकमें भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प,॥ १॥
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती॥
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥
deva danuja gana nānā jātī| sakala jīva taham̐ ānahi bhām̐tī||
mahi sari sāgara sara giri nānā| saba prapaṃca taham̐ ānai ānā||
Meaning तथा नाना जातिके देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकारके थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकारकी थी॥ २॥
अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥
aṃḍakosa prati prati nija rupā| dekheum̐ jinasa aneka anūpā||
avadhapurī prati bhuvana ninārī| sarajū bhinna bhinna nara nārī||
Meaning प्रत्येक ब्रह्माण्डमें मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवनमें न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकारके ही नर-नारी थे॥ ३॥
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥
dasaratha kausalyā sunu tātā| bibidha rūpa bharatādika bhrātā||
prati brahmāṃḍa rāma avatārā| dekhaum̐ bālabinoda apārā||
Meaning हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता॥ ४॥
भिन्न भिन्न में दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।
अगनित भुवन फिरेउं प्रभु राम न देखेउं आन॥ ८१ (क )॥
bhinna bhinna meṃ dīkha sabu ati bicitra harijāna|
aganita bhuvana phireuṃ prabhu rāma na dekheuṃ āna|| 81 (ka )||
Meaning हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने दूसरी तरहका नहीं देखा॥ ८१ (क)॥
इ सिसुपन सोड़ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।
भुवन भुवन देखत फिरें प्रेरित मोह समीर॥ ८१ ( ख )॥
i sisupana soṛa sobhā soi kṛpāla raghubīra|
bhuvana bhuvana dekhata phireṃ prerita moha samīra|| 81 ( kha )||
Meaning सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर ! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था॥ ८१ (ख)॥
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहें पुनि रहि कछ काल ग्वाँयडें॥
bhramata mohi brahmāṃḍa anekā| bīte manahum̐ kalpa sata ekā||
phirata phirata nija āśrama āyaum̐| taheṃ puni rahi kacha kāla gvām̐yaḍeṃ||
Meaning अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया॥ १॥
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥
देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥
nija prabhu janma avadha suni pāyaum̐| nirbhara prema haraṣi uṭhi dhāyaum̐||
dekhaum̐ janma mahotsava jāī| jehi bidhi prathama kahā maiṃ gāī||
Meaning फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ॥ २॥
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥
rāma udara dekheum̐ jaga nānā| dekhata banai na jāi bakhānā||
taham̐ puni dekheum̐ rāma sujānā| māyā pati kṛpāla bhagavānā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके पेठमें मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामको देखा॥ ३॥
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥
karaum̐ bicāra bahori bahorī| moha kalila byāpita mati morī||
ubhaya gharī maham̐ maiṃ saba dekhā| bhayaum̐ bhramita mana moha biseṣā||
Meaning मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया॥ ४॥
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आय सुनु मतिधीर॥ ८२ (क )॥
dekhi kṛpāla bikala mohi biham̐se taba raghubīra|
biham̐satahīṃ mukha bāhera āya sunu matidhīra|| 82 (ka )||
Meaning मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया॥ ८२ (क)॥
इ़ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहड़ बिश्राम॥ ८२ (ख )॥
i larikāī mo sana karana lage puni rāma|
koṭi bhām̐ti samujhāvaum̐ manu na lahaṛa biśrāma|| 82 (kha )||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों ( असंख्य) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था॥ ८२ (ख)॥
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥
dekhi carita yaha so prabhutāī| samujhata deha dasā bisarāī||
dharani pareum̐ mukha āva na bātā| trāhi trāhi ārata jana trātā||
Meaning यह [बाल] चरित्र देखकर और [ पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और 'हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुखसे बात नहीं निकलती थी!॥ १॥
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥
premākula prabhu mohi bilokī| nija māyā prabhutā taba rokī||
kara saroja prabhu mama sira dhareū| dīnadayāla sakala dukha hareū||
Meaning तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्लल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव ) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा। दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया॥ २॥
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥
kīnha rāma mohi bigata bimohā| sevaka sukhada kṛpā saṃdohā||
prabhutā prathama bicāri bicārī| mana maham̐ hoi haraṣa ati bhārī||
Meaning सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह ( कृपामय ) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार-विचारकर (याद कर-करके ) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ॥ ३॥
भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥
सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥
bhagata bachalatā prabhu kai dekhī| upajī mama ura prīti biseṣī||
sajala nayana pulakita kara jorī| kīnhium̐ bahu bidhi binaya bahorī||
Meaning प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे ] नेत्रोंगें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की॥ ४॥
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास॥ ८३ ( क )॥
suni saprema mama bānī dekhi dīna nija dāsa|
bacana sukhada gaṃbhīra mṛdu bole ramānivāsa|| 83 ( ka )||
Meaning मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले--॥ ८३ (क)॥
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधिमोच्छ सकल सुख खानि॥ ८ ३ ( ख )॥
kākabhasuṃḍi māgu bara ati prasanna mohi jāni|
animādika sidhi apara ridhimoccha sakala sukha khāni|| 8 3 ( kha )||
Meaning हे काकभुशुण्डि ! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि आअष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष,॥८३ (ख)॥
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥
gyāna bibeka birati bigyānā| muni durlabha guna je jaga nānā||
āju deum̐ saba saṃsaya nāhīṃ| māgu jo tohi bhāva mana māhīṃ||
Meaning ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगतमें मुनियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले॥ १॥
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ॥
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥
suni prabhu bacana adhika anurāgeum̐| mana anumāna karana taba lāgeūm̐||
prabhu kaha dena sakala sukha sahī| bhagati āpanī dena na kahī||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मनमें अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखोंके देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देनेकी बात नहीं कही॥ २॥
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥
bhagati hīna guna saba sukha aise| lavana binā bahu biṃjana jaise||
bhajana hīna sukha kavane kājā| asa bicāri boleum̐ khagarājā||
Meaning भक्तिसे रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ। भजनसे रहित सुख किस कामके ? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला--॥ ३॥
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥
jauṃ prabhu hoi prasanna bara dehū| mo para karahu kṛpā aru nehū||
mana bhāvata bara māgaum̐ svāmī| tumha udāra ura aṃtarajāmī||
Meaning हे प्रभो ! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और स्त्रेह करते हैं, तो हे स्वामी ! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं॥ ४॥
अबिरल भगति बिसुद्ध तब श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥ ८४ ( क )॥
abirala bhagati bisuddha taba śruti purāna jo gāva|
jehi khojata jogīsa muni prabhu prasāda kou pāva|| 84 ( ka )||
Meaning आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य, निष्काम) भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभुकी कृपासे कोई विरला ही जिसे पाता है,॥ ८४ (क)॥
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।
bhagata kalpataru pranata hita kṛpā siṃdhu sukha dhāma|
इ़ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥ ८४ (ख )॥
i nija bhagati mohi prabhu dehu dayā kari rāma|| 84 (kha )||
Meaning हे भक्तोंके [ मन-इच्छित फल देनेवाले] कल्पवृक्ष ! हे शरणागतके हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी ! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये॥ ८४ (ख)॥
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥
evamastu kahi raghukulanāyaka| bole bacana parama sukhadāyaka||
sunu bāyasa taiṃ sahaja sayānā| kāhe na māgasi asa baradānā||
Meaning 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंशके स्वामी परम सुख देनेवाले वचन बोले--हे काक! सुन, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान् है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता 2॥ १॥
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥
saba sukha khāni bhagati taiṃ māgī| nahiṃ jaga kou tohi sama baṛabhāgī||
jo muni koṭi jatana nahiṃ lahahīṃ| je japa joga anala tana dahahīṃ||
Meaning तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, जगतमें तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग़्िसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्र करके भी जिसको (जिस भक्तिको नहीं पाते॥ २॥
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥
rījheum̐ dekhi tori caturāī| māgehu bhagati mohi ati bhāī||
sunu bihaṃga prasāda aba moreṃ| saba subha guna basihahiṃ ura toreṃ||
Meaning वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदयमें बसेंगे॥ ३॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥
bhagati gyāna bigyāna birāgā| joga caritra rahasya bibhāgā||
jānaba taiṃ sabahī kara bhedā| mama prasāda nahiṃ sādhana khedā||
Meaning भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग--इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधनका कष्ट नहीं होगा॥ ४॥
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
जानेसु ब्रहा अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ ( क )॥
māyā saṃbhava bhrama saba aba na byāpihahiṃ tohi|
jānesu brahā anādi aja aguna gunākara mohi|| 85 ( ka )||
Meaning मायासे उत्पन्न सब श्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना॥ ८५ (क)॥
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।
का्यें बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥ ८५ (ख ])॥
mohi bhagata priya saṃtata asa bicāri sunu kāga|
kāyeṃ bacana mana mama pada karesu acala anurāga|| 85 (kha ])||
Meaning हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मनसे मेरे चरणोंमें अटल प्रेम करना॥ ८५ (ख)॥
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी॥
निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥
aba sunu parama bimala mama bānī| satya sugama nigamādi bakhānī||
nija siddhāṃta sunāvaum̐ tohī| sunu mana dharu saba taji bhaju mohī||
Meaning अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादिके द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। मैं तुझको यह 'निज सिद्धान्त' सुनाता हूँ। सुनकर मनमें धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर॥ १॥
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥
mama māyā saṃbhava saṃsārā| jīva carācara bibidhi prakārā||
saba mama priya saba mama upajāe| saba te adhika manuja mohi bhāe||
Meaning यह सारा संसार मेरी मायासे उत्पन्न है। [ इसमें ] अनेकों प्रकारके चराचर जीव हैं। वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। [ किन्तु] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छे लगते हैं॥ २॥
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥
tinha maham̐ dvija dvija maham̐ śrutidhārī| tinha mahum̐ nigama dharama anusārī||
tinha maham̐ priya birakta puni gyānī| gyānihu te ati priya bigyānī||
Meaning उन मनुष्योंमें भी द्विज, द्विजोंमें भी वेदोंको [ कण्ठमें] धारण करनेवाले, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, उनमें भी विरक्त (वैराग्यबवान्ू) मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं॥ ३॥
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥
tinha te puni mohi priya nija dāsā| jehi gati mori na dūsari āsā||
puni puni satya kahaum̐ tohi pāhīṃ| mohi sevaka sama priya kou nāhīṃ||
Meaning विज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य (' निज सिद्धान्त') कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है॥ ४॥
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥
bhagati hīna biraṃci kina hoī| saba jīvahu sama priya mohi soī||
bhagativaṃta ati nīcau prānī| mohi prānapriya asi mama bānī||
Meaning भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है। परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है॥ ५॥
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।
श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥ ८६॥
suci susīla sevaka sumati priya kahu kāhi na lāga|
śruti purāna kaha nīti asi sāvadhāna sunu kāga|| 86||
Meaning पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता ? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं। हे काक! सावधान होकर सुन॥ ८६॥
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥
कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥
eka pitā ke bipula kumārā| hohiṃ pṛthaka guna sīla acārā||
kou paṃḍiṃta kou tāpasa gyātā| kou dhanavaṃta sūra kou dātā||
Meaning एक पिताके बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,॥ १॥
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥
kou sarbagya dharmarata koī| saba para pitahi prīti sama hoī||
kou pitu bhagata bacana mana karmā| sapanehum̐ jāna na dūsara dharmā||
Meaning कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है। परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, वचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्रमें भी दूसरा धर्म नहीं जानता,॥ २॥
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥
एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥
so suta priya pitu prāna samānā| jadyapi so saba bhām̐ti ayānā||
ehi bidhi jīva carācara jete| trijaga deva nara asura samete||
Meaning वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकारसे अज्ञान (मूर्ख ) ही हो। इस प्रकार तिर्यकू (पशु-पक्षी ), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड जीव हैं,॥ ३॥
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया॥
akhila bisva yaha mora upāyā| saba para mohi barābari dāyā||
tinha maham̐ jo parihari mada māyā| bhajai mohi mana baca arū kāyā||
Meaning [उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अत: सबपर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीरसे मुझको भजता है,॥ ४॥
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥ ८७ ( क )॥
puruṣa napuṃsaka nāri vā jīva carācara koi|
sarba bhāva bhaja kapaṭa taji mohi parama priya soi|| 87 ( ka )||
Meaning वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है॥ ८७ (क)॥
सत्य कह३ँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।
अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥ ८७ ( ख )॥
satya kaha3m̐ khaga tohi suci sevaka mama prānapriya|
asa bicāri bhaju mohi parihari āsa bharosa saba|| 87 ( kha )||
Meaning हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझीको भज॥ ८७ (ख)॥
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥
kabahūm̐ kāla na byāpihi tohī| sumiresu bhajesu niraṃtara mohī||
prabhu bacanāmṛta suni na aghāūm̐| tanu pulakita mana ati haraṣāūm̐||
Meaning तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभुके वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त ही हर्षित हो रहा था॥ १॥
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥
प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥
so sukha jānai mana aru kānā| nahiṃ rasanā pahiṃ jāi bakhānā||
prabhu sobhā sukha jānahiṃ nayanā| kahi kimi sakahiṃ tinhahi nahiṃ bayanā||
Meaning वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभसे उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभुकी शोभाका वह सुख नेत्र ही जानते हैं। पर वे कह कैसे सकते हैं ? उनके वाणी तो है नहीं॥ २॥