मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महूँ निरखि।
चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन॥ ६८ ( ख )॥
mohi bhayau ati moha prabhu baṃdhana rana mahūm̐ nirakhi|
cidānaṃda saṃdoha rāma bikala kārana kavana|| 68 ( kha )||
Meaning युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्द्घन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं॥ ६८ (ख)॥
देखि चरित अति नर अनुसारी।
भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥
dekhi carita ati nara anusārī| bhayau hṛdayam̐ mama saṃsaya bhārī||
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना।
कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥
soi bhrama aba hita kari maiṃ mānā| kīnha anugraha kṛpānidhānā||
Meaning बिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया। मैं अब उस श्रम (सन्देह) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया॥ १॥
जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥
जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥
jo ati ātapa byākula hoī| taru chāyā sukha jānai soī||
jauṃ nahiṃ hota moha ati mohī| milateum̐ tāta kavana bidhi tohī||
Meaning जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है। हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता ?॥ २॥
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥
निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥
sunateum̐ kimi hari kathā suhāī| ati bicitra bahu bidhi tumha gāī||
nigamāgama purāna mata ehā| kahahiṃ siddha muni nahiṃ saṃdehā||
Meaning और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकारसे गायी है ? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि--॥ ३॥
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥
saṃta bisuddha milahiṃ pari tehī| citavahiṃ rāma kṛpā kari jehī||
rāma kṛpām̐ tava darasana bhayaū| tava prasāda saba saṃsaya gayaū||
Meaning शुद्ध (सच्चे) संत उसीको मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया॥ ४॥
सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।
पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग॥ ६९ ( क )॥
suni bihaṃgapati bānī sahita binaya anurāga|
pulaka gāta locana sajala mana haraṣeu ati kāga|| 69 ( ka )||
Meaning पक्षिराज गरुड़जीकी विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंगें जल भर आया और वे मनमें अत्यन्त हर्षित हुए॥ ६९ (क)॥
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास।
पाइ़ उमा अति गोप्यमपि सजन करहिं प्रकास॥ ६९ ( ख )॥
śrotā sumati susīla suci kathā rasika haridāsa|
pāi umā ati gopyamapi sajana karahiṃ prakāsa|| 69 ( kha )||
Meaning हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथाके प्रेमी और हरिके सेवक श्रोताको पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करनेयोग्य) रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं॥ ६९ (ख)॥
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥
boleu kākabhasuṃḍa bahorī| nabhaga nātha para prīti na thorī||
saba bidhi nātha pūjya tumha mere| kṛpāpātra raghunāyaka kere||
Meaning काकभुशुण्डिजीने फिर कहा--पश्षिराजपर उनका प्रेम कम न था (अर्थात् बहुत था)--हे नाथ! आप सब प्रकारसे मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजीके कृपापात्र हैं॥ १॥
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥
tumhahi na saṃsaya moha na māyā| mo para nātha kīnha tumha dāyā||
paṭhai moha misa khagapati tohī| raghupati dīnhi baṛāī mohī||
Meaning आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझपर दया की है। हे पक्षिराज! मोहके बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है॥ २॥
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥
नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥
tumha nija moha kahī khaga sāīṃ| so nahiṃ kachu ācaraja gosāīṃ||
nārada bhava biraṃci sanakādī| je munināyaka ātamabādī||
Meaning हे पक्षियोंके स्वामी ! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाई ! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं॥ ३॥
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥
moha na aṃdha kīnha kehi kehī| ko jaga kāma nacāva na jehī||
tṛsnām̐ kehi na kīnha baurāhā| kehi kara hṛdaya krodha nahiṃ dāhā||
Meaning उनमेंसे भी किस-किसको मोहने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया ? जगत्में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो ? तृष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया ? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया ?॥ ४॥
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।
केहि के लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार॥ ७० (क )॥
gyānī tāpasa sūra kabi kobida guna āgāra|
kehi ke lobha biḍaṃbanā kīnhi na ehiṃ saṃsāra|| 70 (ka )||
Meaning इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणोंका धाम है, जिसकी लोभने विडम्बना (मिट्टी पलीद) न की हो॥ ७० (क)॥
श्रीमद बक़ न कौन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नेन सर को अस लाग न जाहि॥ ७० (ख )॥
śrīmada baqa na kaunha kehi prabhutā badhira na kāhi|
mṛgalocani ke nena sara ko asa lāga na jāhi|| 70 (kha )||
Meaning लक्ष्मीके मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया ? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र-बाण न लगे हों 7॥७० (ख)॥
गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥
guna kṛta sanyapāta nahiṃ kehī| kou na māna mada tajeu nibehī||
jobana jvara kehi nahiṃ balakāvā| mamatā kehi kara jasa na nasāvā||
Meaning [रज, तम आदि] गुणोंका किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मदने अछूता छोड़ा हो। यौवनके ज्वरने किसे आपेसे बाहर नहीं किया ? ममताने किसके यशका नाश नहीं किया ?॥ १॥
मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥
macchara kāhi kalaṃka na lāvā| kāhi na soka samīra ḍolāvā||
ciṃtā sām̐pini ko nahiṃ khāyā| ko jaga jāhi na byāpī māyā||
Meaning मत्सर (डाह) ने किसको कलड्ड नहीं लगाया? शोकरूपी पवनने किसे नहीं हिला दिया? चिन्तारूपी साँपिनने किसे नहीं खा लिया? जगतमें ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो?॥ २॥
कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥
सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी॥
kīṭa manoratha dāru sarīrā| jehi na lāga ghuna ko asa dhīrā||
suta bita loka īṣanā tīnī| kehi ke mati inha kṛta na malīnī||
Meaning मनोर॑थ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है। ऐसा धैर्यवान् कौन है, जिसके शरीरमें यह कीड़ा न लगा हो ? पुत्रकी, धनकी और लोकप्रतिष्ठाकी इन तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं कर दिया (बिगाड़ नहीं दिया) ?॥ ३॥
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा॥
सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥
yaha saba māyā kara parivārā| prabala amiti ko baranai pārā||
siva caturānana jāhi ḍerāhīṃ| apara jīva kehi lekhe māhīṃ||
Meaning यह सब मायाका बड़ा बलवान् परिवार है। यह अपार है, इसका वर्णन कौन कर सकता है ? शिवजी और ब्रह्माजी भी जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव तो किस गिनतीमें हैं ?॥ ४॥
ब्यापि रहेउ संसार महूँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड॥ ७१ (क )॥
byāpi raheu saṃsāra mahūm̐ māyā kaṭaka pracaṃḍa|
senāpati kāmādi bhaṭa daṃbha kapaṭa pāṣaṃḍa|| 71 (ka )||
Meaning मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें छायी हुई है। कामादि (काम, क्रोध और लोभ) उसके सेनापति हैं और दम्भ, कपट और पाखण्ड योद्धा हैं॥ ७१ (क)॥
दासी रघुबीर के समुझें मिथ्या सोपि।
छूट न राम कृपा बिनु नाथ कह पद रोपि॥ ७१ (ख )॥
dāsī raghubīra ke samujheṃ mithyā sopi|
chūṭa na rāma kṛpā binu nātha kaha pada ropi|| 71 (kha )||
Meaning वह माया श्रीरघुवीरकी दासी है। यद्यपि समझ लेनेपर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी कृपाके बिना छूटती नहीं। हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ॥ ७१ (ख)॥
जो माया सब जगहि नचावा।
जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥
jo māyā saba jagahi nacāvā| jāsu carita lakhi kāhum̐ na pāvā||
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा।
नाच नटी इव सहित समाजा॥
soi prabhu bhrū bilāsa khagarājā| nāca naṭī iva sahita samājā||
Meaning जो माया सारे जगत्को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसीने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी शभ्रुकुटीके इशारेपर अपने समाज (परिवार) सहित नटीकी तरह नाचती है॥ १॥
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा॥
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥
soi saccidānaṃda ghana rāmā| aja bigyāna rūpo bala dhāmā||
byāpaka byāpya akhaṃḍa anaṃtā| akhila amoghasakti bhagavaṃtā||
Meaning श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छः: ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं॥ २॥
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥
aguna adabhra girā gotītā| sabadarasī anavadya ajītā||
nirmama nirākāra niramohā| nitya niraṃjana sukha saṃdohā||
Meaning वे निर्गुण (मायाके गुणोंसे रहित), महान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे, सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार (मायिक आकारसे रहित), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुखकी राशि,॥ ३॥
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥
prakṛti pāra prabhu saba ura bāsī| brahma nirīha biraja abināsī||
ihām̐ moha kara kārana nāhīṃ| rabi sanmukha tama kabahum̐ ki jāhīṃ||
Meaning प्रकृतिसे परे, प्रभु (सर्वसमर्थ), सदा सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ ( श्रीराममें) मोहका कारण ही नहीं है। क्या अन्धकारका समूह कभी सूर्यके सामने जा सकता है ?॥ ४॥
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥ ७२ (क )॥
bhagata hetu bhagavāna prabhu rāma dhareu tanu bhūpa|
kie carita pāvana parama prākṛta nara anurūpa|| 72 (ka )||
Meaning भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके- से अनेकों परम पावन चरित्र किये॥ ७२ (क)॥
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ़ नट कोइ।
jathā aneka beṣa dhari nṛtya karai naṭa koi|
इ सोइ भाव देखाबड़ आपुन होड़ न सोइ़॥ ७२ (ख )॥
i soi bhāva dekhābaṛa āpuna hoṛa na soi|| 72 (kha )||
Meaning जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता,॥ ७२ (ख)॥
असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥
जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी॥
asi raghupati līlā uragārī| danuja bimohani jana sukhakārī||
je mati malina biṣayabasa kāmī| prabhu moha dharahiṃ imi svāmī||
Meaning हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है। हे स्वामी ! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं॥ १॥
नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥
nayana doṣa jā kaham̐ jaba hoī| pīta barana sasi kahum̐ kaha soī||
jaba jehi disi bhrama hoi khagesā| so kaha pacchima uyau dinesā||
Meaning जब जिसको [ कर्वबल आदि] नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमाको पीले रंगका कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाश्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिममें उदय हुआ है॥ २॥
नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥
naukārūṛha calata jaga dekhā| acala moha basa āpuhi lekhā||
bālaka bhramahiṃ na bhramahiṃ gṛhādīṃ| kahahiṃ paraspara mithyābādī||
Meaning नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है। बालक घूमते (चक्राकार दौड़ते) हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपसभें एक- दूसेरेको झूठा कहते हैं॥ ३॥
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥
मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥
hari biṣaika asa moha bihaṃgā| sapanehum̐ nahiṃ agyāna prasaṃgā||
māyābasa matimaṃda abhāgī| hṛdayam̐ jamanikā bahubidhi lāgī||
Meaning हे गरुड़जी! श्रीहरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, भगवानमें तो स्वप्रमें भी अज्ञानका प्रसंग (अवसर) नहीं है। किन्तु जो मायाके वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदयपर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं,॥ ४॥
ते सठ हठ बस संसय करहीं।
निज अग्यान राम पर धरहीं॥
te saṭha haṭha basa saṃsaya karahīṃ| nija agyāna rāma para dharahīṃ||
Meaning वे मूर्ख हठके वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजीपर आरोपित करते हैं॥ ५॥
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥ ७३ ( क )॥
kāma krodha mada lobha rata gṛhāsakta dukharūpa|
te kimi jānahiṃ raghupatihi mūṛha pare tama kūpa|| 73 ( ka )||
Meaning जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं॥ ७३ (क)॥
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख )॥
nirguna rūpa sulabha ati saguna jāna nahiṃ koi|
sugama agama nānā carita suni muni mana bhrama hoi|| 73 (kha )||
Meaning निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझमें आ जानेवाला) है, परन्तु [ गुणातीत दिव्य] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान्के अनेक प्रकारके सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियोंके भी मनको श्रम हो जाता है॥ ७३(ख)॥
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई॥
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥
sunu khagesa raghupati prabhutāī| kahaum̐ jathāmati kathā suhāī||
jehi bidhi moha bhayau prabhu mohī| sou saba kathā sunāvaum̐ tohī||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़जी ! श्रीरघुनाथजीकी प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धिकि अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो ! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥ १॥
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥
rāma kṛpā bhājana tumha tātā| hari guna prīti mohi sukhadātā||
tāte nahiṃ kachu tumhahiṃ durāvaum̐| parama rahasya manohara gāvaum̐||
Meaning हे तात! आप श्रीरामजीके कृपापात्र हैं। श्रीहरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसीसे मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्यकी बातें आपको गाकर सुनाता हूँ॥ २॥
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥
sunahu rāma kara sahaja subhāū| jana abhimāna na rākhahiṃ kāū||
saṃsṛta mūla sūlaprada nānā| sakala soka dāyaka abhimānā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये। वे भक्तमें अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंका देनेवाला है॥ ३॥
ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं॥
tāte karahiṃ kṛpānidhi dūrī| sevaka para mamatā ati bhūrī||
jimi sisu tana brana hoi gosāī| mātu cirāva kaṭhina kī nāīṃ||
Meaning इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवकपर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाई! जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हदयकी भाँति चिरा डालती है॥ ४॥
जदपि प्रथम दुख पावड़ रोवड़ बाल अधीर।
ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥ ७४ ( क )॥
jadapi prathama dukha pāvaṛa rovaṛa bāla adhīra|
byādhi nāsa hita jananī ganati na so sisu pīra|| 74 ( ka )||
Meaning यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोगके नाशके लिये माता बच्चेकी उस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़ेको चिरवा ही डालती है)॥ ७४ (क)॥
तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ ७४ (ख )॥
timi raghupati nija dāsa kara harahiṃ māna hita lāgi|
tulasidāsa aise prabhuhi kasa na bhajahu bhrama tyāgi|| 74 (kha )||
Meaning उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दासका अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते॥ ७४ (ख)॥
राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥
जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥
rāma kṛpā āpani jaṛatāī| kahaum̐ khagesa sunahu mana lāī||
jaba jaba rāma manuja tanu dharahīṃ| bhakta hetu līlā bahu karahīṃ||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़जी ! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धारण करते हैं और भक्तोंके लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं॥ १॥
तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥
जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥
taba taba avadhapurī maiṃ zāūm̐| bālacarita biloki haraṣāūm̐||
janma mahotsava dekhaum̐ jāī| baraṣa pām̐ca taham̐ rahaum̐ lobhāī||
Meaning तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [ भगवान्की शिशुलीलामें ] लुभाकर पाँच वर्षतक वहीं रहता हूँ॥ २॥
इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥
निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥
iṣṭadeva mama bālaka rāmā| sobhā bapuṣa koṭi sata kāmā||
nija prabhu badana nihāri nihārī| locana suphala karaum̐ uragārī||
Meaning बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है। हे गरुड़जी ! अपने प्रभुका मुख देख-देखकर मैं नेत्रोंको सफल करता हूँ॥ ३॥
लघु बायस बपु धरि हरि संगा।
देखउँ बालचरित बहुरंगा॥
laghu bāyasa bapu dhari hari saṃgā| dekhaum̐ bālacarita bahuraṃgā||
Meaning छोटे-से कौएका शरीर धरकर और भगवान्के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति-भाँतिके बालचरित्रोंको देखा करता हूँ॥ ४॥
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ॥ ७५ ( क )॥
larikāīṃ jaham̐ jaham̐ phirahiṃ taham̐ taham̐ saṃga uṛāum̐|
jūṭhani parai ajira maham̐ so uṭhāi kari khāum̐|| 75 ( ka )||
Meaning लड़कपनमें वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगनमें उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ॥ ७५ (क)॥
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥ ७५ ( ख )॥
eka bāra atisaya saba carita kie raghubīra|
sumirata prabhu līlā soi pulakita bhayau sarīra|| 75 ( kha )||
Meaning एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये। प्रभुकी उस लीलाका स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजीका शरीर [ प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया॥ ७५ (ख)॥
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक।
राम चरित सेवक सुखदायक नृप मंदिर सुंदर सब भाँती।
खचित कनक मनि नाना जाती॥
kahai bhasuṃḍa sunahu khaganāyaka| rāma carita sevaka sukhadāyaka nṛpa maṃdira suṃdara saba bhām̐tī| khacita kanaka mani nānā jātī||
Meaning भुशुण्डिजी कहने लगे--हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [ अयोध्याका ] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोनेके महलमें नाना प्रकारके रबर जड़े हुए हैं॥ १॥
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥
बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥
barani na jāi rucira am̐ganāī| jaham̐ khelahiṃ nita cāriu bhāī||
bālabinoda karata raghurāī| bicarata ajira janani sukhadāī||
Meaning सुन्दर आँगनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगनमें विचर रहे हैं॥ २॥
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥
नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥
marakata mṛdula kalevara syāmā| aṃga aṃga prati chabi bahu kāmā||
nava rājīva aruna mṛdu caranā| padaja rucira nakha sasi duti haranā||
Meaning मरकत मणिके समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अज्-अज्ञमें बहुत-से कामदेवोंकी शोभा छायी हुई है। नवीन [ लाल] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योतिसे चन्द्रमाकी कान्तिको हरनेवाले हैं॥ ३॥
ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी॥
चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई॥
lalita aṃka kulisādika cārī| nūpura cārū madhura ravakārī||
cāru puraṭa mani racita banāī| kaṭi kiṃkina kala mukhara suhāī||
Meaning [ तलवेमें ] वज्ादि (व्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिढ्ठ हैं, चरणोंमें मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रतनोंसे जड़ी हुई सोनेकी बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है॥ ४॥
रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।
उर आयत शभ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर॥ ७६॥
rekhā traya suṃdara udara nābhī rucira gam̐bhīra|
ura āyata śabhrājata bibidhi bāla bibhūṣana cīra|| 76||
Meaning उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्ष:स्थलपर अनेकों प्रकारके बच्चोंके आभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं॥ ७६॥
अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥
aruna pāni nakha karaja manohara| bāhu bisāla bibhūṣana suṃdara||
kaṃdha bāla kehari dara grīvā| cāru cibuka ānana chabi sīṃvā||
Meaning लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओंपर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह (सिंहके बच्चे) के-से कंधे और शंखके समान (तीन रेखाओंसे युक्त) गला है। सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छबिकी सीमा ही है॥ १॥
कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥
ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥
kalabala bacana adhara arunāre| dui dui dasana bisada bara bāre||
lalita kapola manohara nāsā| sakala sukhada sasi kara sama hāsā||
Meaning कलबल (तोतले) वचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी [ ऊपर और नीचे] दो-दो दँतुलियाँ हैं। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखोंको देनेवाली चन्द्रमाकी [ अथवा सुख देनेवाली समस्त कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाकी ] किरणोंके समान मधुर मुसकान है॥ २॥
नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥
nīla kaṃja locana bhava mocana| bhrājata bhāla tilaka gorocana||
bikaṭa bhṛkuṭi sama śravana suhāe| kuṃcita kaca mecaka chabi chāe||
Meaning नीले कमलके समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है। भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशोंकी छवि छा रही है॥३॥
पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥
रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥
pīta jhīni jhagulī tana sohī| kilakani citavani bhāvati mohī||
rūpa rāsi nṛpa ajira bihārī| nācahiṃ nija pratibiṃba nihārī||
Meaning पीली और महीन झँगुली शरीरपर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजीके आँगनमें विहार करनेवाले रूपकी राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं,॥ ४॥
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥
किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥
mohi sana karahīṃ bibidha bidhi krīṛā| baranata mohi hoti ati brīṛā||
kilakata mohi dharana jaba dhāvahiṃ| calaum̐ bhāgi taba pūpa dekhāvahiṃ||
Meaning और मुझसे बहुत प्रकारके खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जा आती है ! किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे॥ ५॥
आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।
जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितड़ पराहिं॥ ७७ ( क )॥
āvata nikaṭa ham̐sahiṃ prabhu bhājata rudana karāhiṃ|
jāum̐ samīpa gahana pada phiri phiri citaṛa parāhiṃ|| 77 ( ka )||
Meaning मेरे निकट आनेपर प्रभु हँसते हैं और भाग जानेपर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करनेके लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं॥ ७७ (क)॥
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥ ७७ (ख )॥
prākṛta sisu iva līlā dekhi bhayau mohi moha|
kavana caritra karata prabhu cidānaṃda saṃdoha|| 77 (kha )||
Meaning साधारण बच्चों -जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शड्जा) हुआ कि सच्चिदानन्दघन प्रभु यह कौन [ महत्त्वका] चरित्र (लीला) कर रहे हैं॥ ७७ (ख)॥
एतना मन आनत खगराया।
रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥
etanā mana ānata khagarāyā| raghupati prerita byāpī māyā||
सो माया न दुखद मोहि काहीं।
आन जीव इव संसृत नाहीं॥
so māyā na dukhada mohi kāhīṃ| āna jīva iva saṃsṛta nāhīṃ||
Meaning हे पक्षिराज ! मनमें इतनी [ शड्ा। लाते ही श्रीरघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दु:ख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें डालनेवाली हुई॥ १॥