सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥
जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥
sunu rāvana parihari caturāī| bhajasi na kṛpāsiṃdhu raghurāī||
jau khala bhaesi rāma kara drohī| brahma rudra saka rākhi na tohī||
Meaning अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता ? अरे दुष्ट ! यदि तू श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे॥ १॥
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥
mūṛha bṛthā jani mārasi gālā| rāma bayara asa hoihi hālā||
tava sira nikara kapinha ke āgeṃ| parihahiṃ dharani rāma sara lāgeṃ||
Meaning हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्रीरामजीसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजीके बाण लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे,॥२॥
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना॥
जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक॥
te tava sira kaṃduka sama nānā| khelahahiṃ bhālu kīsa caugānā||
jabahiṃ samara kopahi raghunāyaka| chuṭihahiṃ ati karāla bahu sāyaka||
Meaning और रीछ-वानर तेरे उन गेंदके समान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे,॥ ३॥
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा॥
सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा॥
taba ki calihi asa gāla tumhārā| asa bicāri bhaju rāma udārā||
sunata bacana rāvana parajarā| jarata mahānala janu ghṛta parā||
Meaning तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा ? ऐसा विचारकर उदार (कृपालु) श्रीरामजीको भज। अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्रिमें घी पड़ गया हो॥ ४॥
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि॥ २७॥
kuṃbhakarana asa baṃdhu mama suta prasiddha sakrāri|
mora parākrama nahiṃ sunehi jiteum̐ carācara jhāri|| 27||
Meaning [वह बोला--अरे मूर्ख !] कुम्भकर्ण-ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड-चेतन जगत्को जीत लिया है !॥ २७॥
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥
नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥
saṭha sākhāmṛga jori sahāī| bām̐dhā siṃdhu ihai prabhutāī||
nāghahiṃ khaga aneka bārīsā| sūra na hohiṃ te sunu saba kīsā||
Meaning रे दुष्ट! वानरोंकी सहायता जोड़कर रामने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्रको तो अनेकों पक्षी भी लॉँघ जाते हैं। पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते। आरे मूर्ख बंदर! सुन--॥ १॥
मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा॥
बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा॥
mama bhuja sāgara bala jala pūrā| jaham̐ būṛe bahu sura nara sūrā||
bīsa payodhi agādha apārā| ko asa bīra jo pāihi pārā||
Meaning मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। [बता,] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रों का पार पा जायगा?॥ २॥
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा॥
जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा॥
digapālanha maiṃ nīra bharāvā| bhūpa sujasa khala mohi sunāvā||
jauṃ pai samara subhaṭa tava nāthā| puni puni kahasi jāsu guna gāthā||
Meaning आरे दुष्ट ! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजाका मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राममें लड़नेवाला योद्धा है--॥ ३॥
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥
tau basīṭha paṭhavata kehi kājā| ripu sana prīti karata nahiṃ lājā||
haragiri mathana nirakhu mama bāhū| puni saṭha kapi nija prabhuhi sarāhū||
Meaning तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है ? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती ? [ पहले] कैलासका मथन करनेवाली मेरी भुजाओंको देख। फिर अरे मूर्ख वानर ! अपने मालिककी सराहना करना॥ ४॥
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस॥ २८॥
sūra kavana rāvana sarisa svakara kāṭi jehiṃ sīsa|
hune anala ati haraṣa bahu bāra sākhi gaurīsa|| 28||
Meaning रावणके समान शूरवीर कौन है ? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्िमें होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बातके साक्षी हैं॥ २८॥
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥
नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥
jarata bilokeum̐ jabahiṃ kapālā| bidhi ke likhe aṃka nija bhālā||
nara keṃ kara āpana badha bām̐cī| haseum̐ jāni bidhi girā asām̐cī||
Meaning मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटोंपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेखको) असत्य जानकर मैं हँसा॥ १॥
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥
आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे॥
sou mana samujhi trāsa nahiṃ moreṃ| likhā biraṃci jaraṭha mati bhoreṃ||
āna bīra bala saṭha mama āgeṃ| puni puni kahasi lāja pati tyāge||
Meaning उस बातको समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [ क्योंकि मैं समझता हूँ कि बूढ़े ब्रह्माने बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है। आरे मूर्ख! तू लजजा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है!॥ २॥
कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥
लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥
kaha aṃgada salajja jaga māhīṃ| rāvana tohi samāna kou nāhīṃ||
lājavaṃta tava sahaja subhāū| nija mukha nija guna kahasi na kāū||
Meaning अंगदने कहा--अरे रावण! तेरे समान लज्जावान्ू जगत्में कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता॥ ३॥
सिर अरु सैल कथा चित रही।
ताते बार बीस तैं कही॥
sira aru saila kathā cita rahī| tāte bāra bīsa taiṃ kahī||
सो भुजबल राखेउ उर घाली।
जीतेहु सहसबाहु बलि बाली॥
so bhujabala rākheu ura ghālī| jītehu sahasabāhu bali bālī||
Meaning सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओंके उस बलको तो तूने हृदयमें ही टाल (छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्त्रबाहु, बलि और बालिको जीता था॥ ४॥
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥
इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥
sunu matimaṃda dehi aba pūrā| kāṭeṃ sīsa ki hoia sūrā||
iṃdrajāli kahu kahia na bīrā| kāṭai nija kara sakala sarīrā||
Meaning अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटनेसे भी कया कोई शूरवीर हो जाता है ? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है !॥ ५॥
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥ २९॥
jarahiṃ pataṃga moha basa bhāra bahahiṃ khara bṛṃda|
te nahiṃ sūra kahāvahiṃ samujhi dekhu matimaṃda|| 29||
Meaning अरे मन्दबुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आगमें जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते॥ २९॥
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥
aba jani batabaṛhāva khala karahī| sunu mama bacana māna pariharahī||
dasamukha maiṃ na basīṭhīṃ āyaum̐| asa bicāri raghubīra paṭhāyaum̐||
Meaning आरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूतकी तरह [सन्धि करने] नहीं आया हूँ। श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है--॥ १॥
बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला॥
मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥
bāra bāra asa kahai kṛpālā| nahiṃ gajāri jasu badheṃ sṛkālā||
mana mahum̐ samujhi bacana prabhu kere| saheum̐ kaṭhora bacana saṭha tere||
Meaning कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख ! प्रभुके [उन] वचनोंको मनमें समझकर (याद करके) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं॥ २॥
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा॥
जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥
nāhiṃ ta kari mukha bhaṃjana torā| lai jāteum̐ sītahi barajorā||
jāneum̐ tava bala adhama surārī| sūneṃ hari ānihi paranārī||
Meaning नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर (चुरा) लाया॥ ३॥
तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥
जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥
taiṃ nisicara pati garba bahūtā| maiṃ raghupati sevaka kara dūtā||
jauṃ na rāma apamānahi ḍaraum̐| tohi dekhata asa kautuka karaūm̐||
Meaning तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवकका भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि--॥ ४॥
तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।
तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥ ३०॥
tohi paṭaki mahi sena hati caupaṭa kari tava gāum̐|
tava jubatinha sameta saṭha janakasutahi lai jāum̐|| 30||
Meaning तुझे जमीनपर पटककर, तेरी सेनाका संहारकर और तेरे गाँवको चौपट [नष्ट-भ्रष्ट] करके, आरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियोंसहित जानकीजीको ले जाऊँ॥ ३०॥
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥
jau asa karauṃ tadapi na baṛāī| muehi badheṃ nahiṃ kachu manusāī||
kaula kāmabasa kṛpina bimūṛhā| ati daridra ajasī ati būṛhā||
Meaning यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है। मरे हुएको मारनेमें कुछ भी पुरुषत्व ( बहादुरी ) नहीं है। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा,॥ १॥
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी॥
sadā rogabasa saṃtata krodhī| biṣnu bimūkha śruti saṃta birodhī||
tanu poṣaka niṃdaka agha khānī| jīvana sava sama caudaha prānī||
Meaning नित्यका रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णुसे विमुख, वेद और संतोंका विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, परायी निन्दा करनेवाला और पापकी खान (महान् पापी)--ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदेके समान हैं॥ २॥
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥
asa bicāri khala badhaum̐ na tohī| aba jani risa upajāvasi mohī||
suni sakopa kaha nisicara nāthā| adhara dasana dasi mījata hāthā||
Meaning अरे दुष्ट! ऐसा विचारकर मैं तुझे नहीं मारता। अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। अज्ञदके वचन सुनकर राक्षसराज रावण दाँतोंसे होठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला--॥ ३॥
रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥
कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥
re kapi adhama marana aba cahasī| choṭe badana bāta baṛi kahasī||
kaṭu jalpasi jaṛa kapi bala jākeṃ| bala pratāpa budhi teja na tākeṃ||
Meaning अरे नीच बंदर ! अब तू मरना ही चाहता है ! इसीसे छोटे मुँह बड़ी बात कहता है। अरे मूर्ख बंदर ! तू जिसके बलपर कड़ए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है॥ ४॥
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।
aguna amāna jāni tehi dīnha pitā banabāsa|
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास॥ ३१ ( क )॥
so dukha aru jubatī biraha puni nisi dina mama trāsa|| 31 ( ka )||
Meaning उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिताने वनवास दे दिया। उसे एक तो वह (उसका) दुःख, उसपर युवती स्त्रीका विरह और फिर रात-दिन मेरा डर बना रहता है॥ ३१ (क)॥
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।
खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक॥ ३१ (ख )॥
jinha ke bala kara garba tohi aise manuja aneka|
khāhīṃ nisācara divasa nisi mūṛha samujhu taji ṭeka|| 31 (kha )||
Meaning जिनके बलका तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्योंको तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं। अरे मूढ़ ! जिद्द छोड़कर समझ (विचार कर)॥ ३१ (ख)॥
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥
jaba tehiṃ kīnha rāma kai niṃdā| krodhavaṃta ati bhayau kapiṃdā||
hari hara niṃdā sunai jo kānā| hoi pāpa goghāta samānā||
Meaning जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [ शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन््दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है॥ १॥
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥
डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥
kaṭakaṭāna kapikuṃjara bhārī| duhu bhujadaṃḍa tamaki mahi mārī||
ḍolata dharani sabhāsada khase| cale bhāji bhaya māruta grase||
Meaning वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोरसे) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [ जिससे बेठे हुए] सभासदू गिर पड़े और भयरूपी पवन (भूत) से ग्रस्त होकर भाग चले॥ २॥
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥
girata sam̐bhāri uṭhā dasakaṃdhara| bhūtala pare mukuṭa ati suṃdara||
kachu tehiṃ lai nija siranhi sam̐vāre| kachu aṃgada prabhu pāsa pabāre||
Meaning रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के पास फेंक दिये॥ ३॥
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥
की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥
āvata mukuṭa dekhi kapi bhāge| dinahīṃ lūka parana bidhi lāge||
kī rāvana kari kopa calāe| kulisa cāri āvata ati dhāe||
Meaning मुकुटोंको आते देखकर वानर भागे। [ सोचने लगे] विधाता! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा (तारे टूटकर गिरने लगे) ? अथवा क्या रावणने क्रोध करके चार व्र चलाये हैं, जो बड़े धायेके साथ (वेगसे) आ रहे हैं ?॥ ४॥
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥
ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥
kaha prabhu ham̐si jani hṛdayam̐ ḍerāhū| lūka na asani ketu nahiṃ rāhū||
e kirīṭa dasakaṃdhara kere| āvata bālitanaya ke prere||
Meaning प्रभुने [उनसे] हँसकर कहा--मनमें डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावणके मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगदके फेंके हुए आ रहे हैं॥ ५॥
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥ ३२ ( क )॥
taraki pavanasuta kara gahe āni dhare prabhu pāsa|
kautuka dekhahiṃ bhālu kapi dinakara sarisa prakāsa|| 32 ( ka )||
Meaning पवनपुत्र श्रीहनुमानूजीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रभुके पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्यके समान था॥ ३२ (क)॥
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ॥ ३२ (ख )॥
uhām̐ sakopi dasānana saba sana kahata risāi|
dharahu kapihi dhari mārahu suni aṃgada musukāi|| 32 (kha )||
Meaning वहाँ (सभामें ) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि--बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे॥ ३२ (ख)॥
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥
मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥
ehi bidhi begi sūbhaṭa saba dhāvahu| khāhu bhālu kapi jaham̐ jaham̐ pāvahu||
markaṭahīna karahu mahi jāī| jiata dharahu tāpasa dvau bhāī||
Meaning [रावण फिर बोला--] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरोंको पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम- लक्ष्मण) को जीते-जी पकड़ लो॥ १॥
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥
मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥
puni sakopa boleu jubarājā| gāla bajāvata tohi na lājā||
maru gara kāṭi nilaja kulaghātī| bala biloki biharati nahiṃ chātī||
Meaning [ रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले--तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज! अरे कुलनाशक ! गला काटकर (आत्महत्या करके) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती!॥ २॥
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥
re triya cora kumāraga gāmī| khala mala rāsi maṃdamati kāmī||
sanyapāta jalpasi durbādā| bhaesi kālabasa khala manujādā||
Meaning आरे स्त्रीके चोर! अरे कुमार्गपर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी ! तू सन्निपातमें कया दुर्वचन बक रहा है? अआरे दुष्ट राक्षस! तू कालके वश हो गया है!॥ ३॥
याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥
yāko phalu pāvahigo āgeṃ| bānara bhālu capeṭanhi lāgeṃ||
rāmu manuja bolata asi bānī| girahiṃ na tava rasanā abhimānī||
Meaning इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़तीं ?॥ ४॥
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं।
सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥
girihahiṃ rasanā saṃsaya nāhīṃ| siranhi sameta samara mahi māhīṃ||
Meaning इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [ अकेले नहीं वर] सिरोंके साथ रणभूमिमें गिरेंगी॥ ५॥
सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।
बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़॥ ३३ (क )॥
so nara kyoṃ dasakaṃdha bāli badhyo jehiṃ eka sara|
bīsahum̐ locana aṃdha dhiga tava janma kujāti jaṛa|| 33 (ka )||
Meaning रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति, अरे जड़! बीस आँखें होनेपर भी तू अन्धा है। तेरे जन्मको धिक्कार है॥ ३३ (क)॥
तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर।
तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥ ३३ (ख )॥
taba sonita kī pyāsa tṛṣita rāma sāyaka nikara|
tajaum̐ tohi tehi trāsa kaṭu jalpaka nisicara adhama|| 33 (kha )||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं। [वे प्यासे ही रह जायूँगे] इस डरसे, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ॥ ३३ (ख)॥
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥
mai tava dasana toribe lāyaka| āyasu mohi na dīnha raghunāyaka||
asi risa hoti dasau mukha torauṃ| laṃkā gahi samudra maham̐ borauṃ||
Meaning मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [तेरी] लड्डाको पकड़कर समुद्रमें डुबा दूँ॥ १॥
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥
मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥
gūlari phala samāna tava laṃkā| basahu madhya tumha jaṃtu asaṃkā||
maiṃ bānara phala khāta na bārā| āyasu dīnha na rāma udārā||
Meaning तेरी लड्ठा गूलरके फलके समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [ अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी ? पर उदार (कृपालु) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आज्ञा नहीं दी॥ २॥
जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥
बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥
jugati sunata rāvana musukāī| mūṛha sikhihi kaham̐ bahuta jhuṭhāī||
bāli na kabahum̐ gāla asa mārā| mili tapasinha taiṃ bhaesi labārā||
Meaning अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला--] औओरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियोंसे मिलकर लबार हो गया है॥ ३॥
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥
sām̐cehum̐ maiṃ labāra bhuja bīhā| jauṃ na upārium̐ tava dasa jīhā||
samujhi rāma pratāpa kapi kopā| sabhā mājha pana kari pada ropā||
Meaning [ अंगदने कहा--] अरे बीस भुजावाले ! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके (दूढ़ताके साथ) पैर रोप दिया॥ ४॥
जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥
सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥
jauṃ mama carana sakasi saṭha ṭārī| phirahiṃ rāmu sītā maiṃ hārī||
sunahu subhaṭa saba kaha dasasīsā| pada gahi dharani pachārahu kīsā||
Meaning [और कहा-] अआरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायँगे, मैं सीताजीको हार गया। रावणने कहा--हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो॥ ५॥
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥
iṃdrajīta ādika balavānā| haraṣi uṭhe jaham̐ taham̐ bhaṭa nānā||
jhapaṭahiṃ kari bala bipula upāī| pada na ṭarai baiṭhahiṃ siru nāī||
Meaning इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँसे हर्षित होकर उठे। वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं॥ ६॥
पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥
puni uṭhi jhapaṭahīṃ sura ārātī| ṭarai na kīsa carana ehi bhām̐tī||
puruṣa kujogī jimi uragārī| moha biṭapa nahiṃ sakahiṃ upārī||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] वे देवताओंके शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पोके शत्रु गरुड़जी! अज्दका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी ) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते॥ ७॥
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।
झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥ ३४ ( क )॥
koṭinha meghanāda sama subhaṭa uṭhe haraṣāi|
jhapaṭahiṃ ṭarai na kapi carana puni baiṭhahiṃ sira nāi|| 34 ( ka )||
Meaning करोड़ों वीर योद्धा जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्षित होकर उठे। वे बार-बार झपटते हैं, पर वानरका चरण नहीं उठता, तब लज्जाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं॥ ३४ (क)॥
भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ ३४ ( ख )॥
bhūmi na chām̐ḍata kapi carana dekhata ripu mada bhāga|
koṭi bighna te saṃta kara mana jimi nīti na tyāga|| 34 ( kha )||
Meaning जैसे करोड़ों विध्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद)-का चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण) -का मद दूर हो गया!॥ ३४ (ख)॥
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥
kapi bala dekhi sakala hiyam̐ hāre| uṭhā āpu kapi keṃ paracāre||
gahata carana kaha bālikumārā| mama pada gaheṃ na tora ubārā||
Meaning अड्भदका बल देखकर सब हदयमें हार गये। तब आअड्भदके ललकारनेपर रावण स्वयं उठा। जब वह अज्दका चरण पकड़ने लगा, तब बालिकुमार अड्भदने कहा-मेरा चरण पकड़नेसे तेरा बचाव नहीं होगा!॥ १॥
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥
gahasi na rāma carana saṭha jāī| sunata phirā mana ati sakucāī||
bhayau tejahata śrī saba gaī| madhya divasa jimi sasi sohaī||
Meaning अरे मूर्ख! तू जाकर श्रीरामजीके चरण क्यों नहीं पकड़ता ? यह सुनकर वह मनमें बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही। वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्याह्ममें चन्द्रमा दिखायी देता है॥ २॥
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥
siṃghāsana baiṭheu sira nāī| mānahum̐ saṃpati sakala gam̐vāī||
jagadātamā prānapati rāmā| tāsu bimukha kimi laha biśrāmā||
Meaning वह सिर नीचा करके सिंहासनपर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। श्रीरामचन्द्रजी जगतूभरके आत्मा और प्राणोंके स्वामी हैं। उनसे विमुख रहनेवाला शान्ति कैसे पा सकता है ?॥ ३॥
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥
umā rāma kī bhṛkuṭi bilāsā| hoi bisva puni pāvai nāsā||
tṛna te kulisa kulisa tṛna karaī| tāsu dūta pana kahu kimi ṭaraī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजीके भ्रूविलास ( भौंहके इशारे)- से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाशको प्राप्त होता है; जो तृणको व्र और व्रको तृण बना देते हैं ( अत्यन्त निर्बलको महान् प्रबल और महान् प्रबलको अत्यन्त निर्बल कर देते हैं ), उनके दूतका प्रण, कहो, कैसे टल सकता है ?॥ ४॥
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥
puni kapi kahī nīti bidhi nānā| māna na tāhi kālu niarānā||
ripu mada mathi prabhu sujasu sunāyo| yaha kahi calyo bāli nṛpa jāyo||
Meaning फिर अंगदने अनेकों प्रकारसे नीति कही। पर रावणने नहीं माना; क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रुके गर्वको चूर करके अंगदने उसको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका सुयश सुनाया और फिर वह राजा बालिका पुत्र यह कहकर चल दिया--॥५॥
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई॥
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥
hatauṃ na kheta khelāi khelāī| tohi abahiṃ kā karauṃ baṛāī||
prathamahiṃ tāsu tanaya kapi mārā| so suni rāvana bhayau dukhārā||
Meaning रणभूमिमें तुझे खेला-खेलाकर न मारूँ तबतक अभी [ पहलेसे। कया बड़ाई करूँ। अंगदने पहले ही (सभामें आनेसे पूर्व ही ) उसके पुत्रको मार डाला था। वह संवाद सुनकर रावण दुखी हो गया॥ ६॥
जातुधान अंगद पन देखी।
भय ब्याकुल सब भए बिसेषी॥
jātudhāna aṃgada pana dekhī| bhaya byākula saba bhae biseṣī||
Meaning अंगदका प्रण [सफल देखकर सब राक्षस भयसे अत्यन्त ही व्याकुल हो गये॥७॥
रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥ ३५ (क )॥
ripu bala dharaṣi haraṣi kapi bālitanaya bala puṃja|
pulaka sarīra nayana jala gahe rāma pada kaṃja|| 35 (ka )||
Meaning शत्रुके बलका मर्दन कर, बलकी राशि बालिपुत्र अंगदजीने हर्षित होकर आकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंमें [ आनन्दाश्रुओंका] जल भरा है॥ ३५ (क)॥
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ॥ ३५ (ख )॥
sām̐jha jāni dasakaṃdhara bhavana gayau bilakhāi|
maṃdodarī rāvanahi bahuri kahā samujhāi|| 35 (kha )||
Meaning सन्ध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महलमें गया। मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा--॥ ३५ (ख)॥
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥
रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥
kaṃta samujhi mana tajahu kumatihī| soha na samara tumhahi raghupatihī||
rāmānuja laghu rekha khacāī| sou nahiṃ nāghehu asi manusāī||
Meaning हे कान्त! मनमें समझकर (विचारकर) कुबुद्धिको छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजीसे युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लॉँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है॥ १॥
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥
कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥
piya tumha tāhi jitaba saṃgrāmā| jāke dūta kera yaha kāmā||
kautuka siṃdhu nāghī tava laṃkā| āyau kapi keharī asaṃkā||
Meaning हे प्रियतम ! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है? खेलसे ही समुद्र लँघकर वह वानरोंमें सिंह (हनुमानू) आपकी लंकामें निर्भय चला आया!॥ २॥
रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥
rakhavāre hati bipina ujārā| dekhata tohi accha tehiṃ mārā||
jāri sakala pura kīnhesi chārā| kahām̐ rahā bala garba tumhārā||
Meaning रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बलका गर्व कहाँ चला गया था 2॥ ३॥
अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु॥
aba pati mṛṣā gāla jani mārahu| mora kahā kachu hṛdayam̐ bicārahu||
pati raghupatihi nṛpati jani mānahu| aga jaga nātha atula bala jānahu||
Meaning अब हे स्वामी ! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिये (डींग न हाँकिये) मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये। हे पति! आप श्रीरघुपतिको [निरा] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ (चराचरके स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिये॥ ४॥
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥
जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला॥
bāna pratāpa jāna mārīcā| tāsu kahā nahiṃ mānehi nīcā||
janaka sabhām̐ aganita bhūpālā| rahe tumhau bala atula bisālā||
Meaning श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था। परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनककी सभामें अगणित राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बलवाले आप भी थे॥५॥
भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही॥
सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥
bhaṃji dhanuṣa jānakī biāhī| taba saṃgrāma jitehu kina tāhī||
surapati suta jānai bala thorā| rākhā jiata ām̐khi gahi phorā||
Meaning वहाँ शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामजीने जानकीको ब्याहा, तब आपने उनको संग्राममें क्यों नहीं जीता ? इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ-कुछ जानता है। श्रीरामजीने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया॥ ६॥
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी।
तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी॥
sūpanakhā kai gati tumha dekhī| tadapi hṛdayam̐ nahiṃ lāja biṣeṣī||
Meaning शूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली। तो भी आपके हृदयमें [ उनसे लड़नेकी बात सोचते] विशेष (कुछ भी) लज्जा नहीं आती!॥ ७॥
बधि बिराध खर दूषनहि लींलाँ हत्यो कबंध।
बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध॥ ३६॥
badhi birādha khara dūṣanahi līṃlām̐ hatyo kabaṃdha|
bāli eka sara mārayo tehi jānahu dasakaṃdha|| 36||
Meaning जिन्होंने विराध और खर-दूषणको मारकर लीलासे ही कबन्धको भी मार डाला; और जिन्होंने बालिको एक ही बाणसे मार दिया, हे दशकन्ध! आप उन्हें (उनके महत्त्वको ) समझिये!॥ ३६॥
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥
कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥
jehiṃ jalanātha bam̐dhāyau helā| utare prabhu dala sahita subelā||
kārunīka dinakara kula ketū| dūta paṭhāyau tava hita hetū||
Meaning जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) करुणामय भगवानूने आपहीके हितके लिये दूत भेजा॥ १॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा॥
अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥
sabhā mājha jehiṃ tava bala mathā| kari barūtha mahum̐ mṛgapati jathā||
aṃgada hanumata anucara jāke| rana bām̐kure bīra ati bām̐ke||
Meaning जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें आकर सिंह [उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है]। रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं,॥ २॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥
अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥
tehi kaham̐ piya puni puni nara kahahū| mudhā māna mamatā mada bahahū||
ahaha kaṃta kṛta rāma birodhā| kāla bibasa mana upaja na bodhā||
Meaning हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं! हा प्रियतम ! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता॥ ३॥
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥
निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥
kāla daṃḍa gahi kāhu na mārā| harai dharma bala buddhi bicārā||
nikaṭa kāla jehi āvata sāīṃ| tehi bhrama hoi tumhārihi nāīṃ||
Meaning काल दण्ड (लाठी) लेकर किसीको नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है। हे स्वामी ! जिसका काल (मरण-समय) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह श्रम हो जाता है॥ ४॥
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥ ३७॥
dui suta mare daheu pura ajahum̐ pūra piya dehu|
kṛpāsiṃdhu raghunātha bhaji nātha bimala jasu lehu|| 37||
Meaning आपके दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया। [जो हुआ सो हुआ] हे प्रियतम ! अब भी [इस भूलकी ] पूर्ति (समासति) कर दीजिये ( श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये), और हे नाथ! कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीको भजकर निर्मल यश लीजिये॥ ३७॥
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥
बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥
nāri bacana suni bisikha samānā| sabhām̐ gayau uṭhi hota bihānā||
baiṭha jāi siṃghāsana phūlī| ati abhimāna trāsa saba bhūlī||
Meaning स्त्रीके बाणके समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभामें चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूलकर सिंहासनपर जा बैठा॥ १॥
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥
अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥
ihām̐ rāma aṃgadahi bolāvā| āi carana paṃkaja siru nāvā||
ati ādara sapīpa baiṭhārī| bole biham̐si kṛpāla kharārī||
Meaning यहाँ (सुबेल पर्वतपर) श्रीरामजीने अंगदको बुलाया। उन्होंने आकर चरण-कमलोंमें सिर नवाया। बड़े आदरसे उन्हें पास बैठाकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजी हँसकर बोले॥ २॥
बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही॥
रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥
bālitanaya kautuka ati mohī| tāta satya kahu pūchaum̐ tohī||
rāvanu jātudhāna kula ṭīkā| bhuja bala atula jāsu jaga līkā||
Meaning हे बालिके पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे तात! इसीसे मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना। जो रावण राक्षसोंके कुलका तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्भरमें धाक है,॥ ३॥
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए॥
सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी॥
tāsu mukuṭa tumha cāri calāe| kahahu tāta kavanī bidhi pāe||
sunu sarbagya pranata sukhakārī| mukuṭa na hohiṃ bhūpa guna cārī||
Meaning उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात ! बताओ, तुमने उनको किस प्रकारसे पाया! [ अंगदने कहा हे सर्वज्ञ! हे शरणागतको सुख देनेवाले! सुनिये। वे मुकुट नहीं हैं। वे तो राजाके चार गुण हैं॥ ४॥
साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥
नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए॥
sāma dāna aru daṃḍa bibhedā| nṛpa ura basahiṃ nātha kaha bedā||
nīti dharma ke carana suhāe| asa jiyam̐ jāni nātha pahiṃ āe||
Meaning हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद--ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं। ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं। [किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं॥ ५॥
धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।
तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस॥ ३८ ( क )॥
dharmahīna prabhu pada bimukha kāla bibasa dasasīsa|
tehi parihari guna āe sunahu kosalādhīsa|| 38 ( ka )||
Meaning दशशीश रावण धर्महीन, प्रभुके पदसे विमुख और कालके वशमें है। इसलिये हे कोसलराज ! सुनिये, वे गुण रावणको छोड़कर आपके पास आ गये हैं॥ ३८ (क)॥
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।
समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥ ३८ ( ख )॥
parama caturatā śravana suni biham̐se rāmu udāra|
samācāra puni saba kahe gaṛha ke bālikumāra|| 38 ( kha )||
Meaning अंगदकी परम चतुरता [पूर्ण उक्ति] कानोंसे सुनकर उदार श्रीरामचन्द्रजी हँसने लगे। फिर बालिपुत्रने किलेके (लड्डाके) सब समाचार कहे॥ ३८ (ख)॥
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥
लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥
ripu ke samācāra jaba pāe| rāma saciva saba nikaṭa bolāe||
laṃkā bām̐ke cāri duārā| kehi bidhi lāgia karahu bicārā||
Meaning जब शत्रुके समाचार प्राप्त हो गये, तब श्रीरामचन्द्रजीने सब मन्त्रियोंको पास बुलाया [और कहा-] लड्डाके चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उनपर किस तरह आक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो॥ १॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन॥
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा॥
taba kapīsa ricchesa bibhīṣana| sumiri hṛdayam̐ dinakara kula bhūṣana||
kari bicāra tinha maṃtra dṛṛhāvā| cāri anī kapi kaṭaku banāvā||
Meaning तब वानरराज सुग्रीव, ऋशक्षपति जाम्बवान् और विभीषणने हृदयमें सूर्यकुलके भूषण श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरोंकी सेनाके चार दल बनाये॥ २॥
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे॥
प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए॥
jathājoga senāpati kīnhe| jūthapa sakala boli taba līnhe||
prabhu pratāpa kahi saba samujhāe| suni kapi siṃghanāda kari dhāe||
Meaning और उनके लिये यथायोग्य (जैसे चाहिये वैसे) सेनापति नियुक्त किये। फिर सब यूथपतियोंको बुला लिया और प्रभुका प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर सिंहके समान गर्जना करके दौड़े॥ ३॥
हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं॥
गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा॥
haraṣita rāma carana sira nāvahiṃ| gahi giri sikhara bīra saba dhāvahiṃ||
garjahiṃ tarjahiṃ bhālu kapīsā| jaya raghubīra kosalādhīsā||
Meaning वे हर्षित होकर श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाते हैं और पर्वतोंके शिखर ले-लेकर सब वीर दौड़ते हैं। ' कोसलराज श्रीरघुवबीरजीकी जय हो' पुकारते हुए भालू और वानर गरजते और ललकारते हैं॥ ४॥
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥
घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी॥
jānata parama durga ati laṃkā| prabhu pratāpa kapi cale asaṃkā||
ghaṭāṭopa kari cahum̐ disi gherī| mukhahiṃ nisāna bajāvahīṃ bherī||
Meaning लड्डाको अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले। चारों ओरसे घिरी हुई बादलोंकी घटाकी तरह लड्राको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे॥ ५॥
जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।
गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव॥ ३९॥
jayati rāma jaya lachimana jaya kapīsa sugrīva|
garjahiṃ siṃghanāda kapi bhālu mahā bala sīṃva|| 39||
Meaning महान बलकी सीमा वे वानर-भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे ' श्रीरीमजीकी जय', 'लक्ष्मणजीकी जय', 'वानरराज सुग्रीवकी जय' ऐसी गर्जना करने लगे॥ ३९॥
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी॥
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई॥
laṃkām̐ bhayau kolāhala bhārī| sunā dasānana ati aham̐kārī||
dekhahu banaranha keri ḍhiṭhāī| biham̐si nisācara sena bolāī||
Meaning लड्ठामें बड़ा भारी कोलाहल (कोहराम) मच गया। अत्यन्त अहड्डारी रावणने उसे सुनकर कहा--वानरोंकी ढिठाई तो देखो ! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलायी॥ १॥
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे॥
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा॥
āe kīsa kāla ke prere| chudhāvaṃta saba nisicara mere||
asa kahi aṭṭahāsa saṭha kīnhā| gṛha baiṭhe ahāra bidhi dīnhā||
Meaning बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विधाताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्खने अट्टहास किया (वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा)॥ २॥
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥
उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥
subhaṭa sakala cārihum̐ disi jāhū| dhari dhari bhālu kīsa saba khāhū||
umā rāvanahi asa abhimānā| jimi ṭiṭṭibha khaga sūta utānā||
Meaning [और बोला--] हे वीरो ! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़- पकड़कर खाओ। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है [मानो आकाशको थाम लेगा]॥ ३॥
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥
तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सुल कृपान परिघ गिरिखंडा॥
cale nisācara āyasu māgī| gahi kara bhiṃḍipāla bara sām̐gī||
tomara mugdara parasu pracaṃḍā| sula kṛpāna parigha girikhaṃḍā||
Meaning आज्ञा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिंदिपाल, साँगी (बरछी ), तोमर, मुद्रर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले॥ ४॥
जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥
jimi arunopala nikara nihārī| dhāvahiṃ saṭha khaga māṃsa ahārī||
coṃca bhaṃga dukha tinhahi na sūjhā| timi dhāe manujāda abūjhā||
Meaning जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंका समूह देखकर उसपर टूट पड़ते हैं, [पत्थरोंपर लगनेसे] चोंच टूटनेका दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े॥ ५॥
नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।
कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥ ४०॥
nānāyudha sara cāpa dhara jātudhāna bala bīra|
koṭa kam̐gūranhi caṛhi gae koṭi koṭi ranadhīra|| 40||
Meaning अनेकों प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किये करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गये॥ ४०॥