कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥
koṭa kam̐gūranhi sohahiṃ kaise| meru ke sṛṃgani janu ghana baise||
bājahiṃ ḍhola nisāna jujhāū| suni dhuni hoi bhaṭanhi mana cāū||
Meaning वे परकोटेके कँगूरोंपर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरुके शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, [जिनकी] ध्वनि सुनकर योद्धाओंके मनमें [ लड़नेका] चाव होता है॥ १॥
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा॥
bājahiṃ bheri naphīri apārā| suni kādara ura jāhiṃ darārā||
dekhinha jāi kapinha ke ṭhaṭṭā| ati bisāla tanu bhālu subhaṭṭā||
Meaning अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, [जिन्हें] सुनकर कायरोंके हदयमें दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान् योद्धा वानर और भालुओंके ठट्ट (समूह ) देखे॥ २॥
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥
dhāvahiṃ ganahiṃ na avaghaṭa ghāṭā| parbata phori karahiṃ gahi bāṭā||
kaṭakaṭāhiṃ koṭinha bhaṭa garjahiṃ| dasana oṭha kāṭahiṃ ati tarjahiṃ||
Meaning [देखा कि] वे रीछ-वानर दौड़ते हैं; औघट (ऊँची-नीची, विकट) घाटियोंको कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ोंको फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतोंसे ओंठ काटते और खूब डपटते हैं॥ ३॥
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥
uta rāvana ita rāma dohāī| jayati jayati jaya parī larāī||
nisicara sikhara samūha ḍhahāvahiṃ| kūdi dharahiṃ kapi pheri calāvahiṃ||
Meaning उधर रावणकी और इधर श्रीरामजीकी दोहाई बोली जा रही है। 'जय' 'जय' 'जय' की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी। राक्षस पहाड़ोंके ढेर-के-ढेर शिखरोंको फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर चलाते हैं॥ ४॥
धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहं राम जसु गावत भए॥
dhari kudhara khaṃḍa pracaṃḍa markaṭa bhālu gaṛha para ḍārahīṃ|
jhapaṭahiṃ carana gahi paṭaki mahi bhaji calata bahuri pacārahīṃ||
ati tarala taruna pratāpa tarapahiṃ tamaki gaṛha caṛhi caṛhi gae|
kapi bhālu caṛhi maṃdiranha jaham̐ tahaṃ rāma jasu gāvata bhae||
Meaning प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतोंके टुकड़े ले-लेकर किलेपर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसोंके पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चज्नल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्तीसे उछलकर किलेपर चढ़-चढ़कर गये और जहाँ- तहाँ महलोंमें घुसकर श्रीरामजीका यश गाने लगे।
एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।
ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥ ४१॥
eku eku nisicara gahi puni kapi cale parāi|
ūpara āpu heṭha bhaṭa girahiṃ dharani para āi|| 41||
Meaning फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वे वानर भाग चले। ऊपर आप और नीचे [राक्षस] योद्धा--इस प्रकार वे [ किलेपरसे] धरतीपर आ गिरते हैं॥ ४१॥
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥
rāma pratāpa prabala kapijūthā| mardahiṃ nisicara subhaṭa barūthā||
caṛhe durga puni jaham̐ taham̐ bānara| jaya raghubīra pratāpa divākara||
Meaning श्रीरामजीके प्रतापसे प्रबल वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूह-के-समूह योद्धाओंको मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किलेपर चढ़ गये और प्रतापमें सूर्यके समान श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे॥ १॥
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥
हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥
cale nisācara nikara parāī| prabala pavana jimi ghana samudāī||
hāhākāra bhayau pura bhārī| rovahiṃ bālaka ātura nārī||
Meaning राक्षसोंके झुंड वैसे ही भाग चले जैसे जोरकी हवा चलनेपर बादलोंके समूह तितर-बितर हो जाते हैं। लड्ठा नगरीमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया। बालक, स्त्रियाँ और रोगी [ असमर्थताके कारण] रोने लगे॥ २॥
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥
saba mili dehiṃ rāvanahi gārī| rāja karata ehiṃ mṛtyu ham̐kārī||
nija dala bicala sunī tehiṃ kānā| pheri subhaṭa laṃkesa risānā||
Meaning सब मिलकर रावणको गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्युको बुला लिया। रावणने जब अपनी सेनाका विचलित होना कानोंसे सुना, तब [ भागते हुए] योद्धाओंको लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला--॥ ३॥
जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥
सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥
jo rana bimukha sunā maiṃ kānā| so maiṃ hataba karāla kṛpānā||
sarbasu khāi bhoga kari nānā| samara bhūmi bhae ballabha prānā||
Meaning मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक दुधारी तलवारसे मारूँगा। मेरा सब कुछ खाया, भाँति-भाँतिके भोग किये और अब रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये!॥ ४॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥
सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा॥
ugra bacana suni sakala ḍerāne| cale krodha kari subhaṭa lajāne||
sanmukha marana bīra kai sobhā| taba tinha tajā prāna kara lobhā||
Meaning रावणके उग्र (कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्नित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले। रणमें [शत्रुके] सम्मुख (युद्ध करते हुए) मरनेमें ही वीरकी शोभा है। [यह सोचकर] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया॥ ५॥
बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।
ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी॥ ४२॥
bahu āyudha dhara subhaṭa saba bhirahiṃ pacāri pacāri|
byākula kie bhālu kapi parigha trisūlanhi mārī|| 42||
Meaning बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघों और त्रिशूलोंसे मार-मारकर सब रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया॥ ४२॥
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥
bhaya ātura kapi bhāgana lāge| jadyapi umā jītihahiṃ āge||
kou kaha kaham̐ aṃgada hanumaṃtā| kaham̐ nala nīla dubida balavaṃtā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] वानर भयातुर होकर (डरके मारे घबड़ाकर) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [वे ही] जीतेंगे। कोई कहता है--अंगद-हनुमान् कहाँ हैं ? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?॥ १॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥
मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥
nija dala bikala sunā hanumānā| pacchima dvāra rahā balavānā||
meghanāda taham̐ karai larāī| ṭūṭa na dvāra parama kaṭhināī||
Meaning हनुमानूजीने जब अपने दलको विकल ( भयभीत) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वारपर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी॥ २॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥
pavanatanaya mana bhā ati krodhā| garjeu prabala kāla sama jodhā||
kūdi laṃka gaṛha ūpara āvā| gahi giri meghanāda kahum̐ dhāvā||
Meaning तब पवनपुत्र हनुमानूजीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे कालके समान योद्धा बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लड्डाके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी ओर दौड़े॥ ३॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता॥
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥
bhaṃjeu ratha sārathī nipātā| tāhi hṛdaya mahum̐ māresi lātā||
dusareṃ sūta bikala tehi jānā| syaṃdana ghāli turata gṛha ānā||
Meaning रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात मारी। दूसरा सारथि मेघनादको व्याकुल जानकर, उसे रथमें डालकर, तुरंत घर ले आया॥ ४॥
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥ ४३॥
aṃgada sunā pavanasuta gaṛha para gayau akela|
rana bām̐kurā bālisuta taraki caṛheu kapi khela|| 43||
Meaning इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किलेपर अकेले ही गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र वानरके खेलकी तरह उछलकर किलेपर चढ़ गये॥ ४३॥
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई॥
juddha biruddha kruddha dvau baṃdara| rāma pratāpa sumiri ura aṃtara||
rāvana bhavana caṛhe dvau dhāī| karahi kosalādhīsa dohāī||
Meaning युद्धमें शत्रुओंके विरुद्ध दोनों वानर क्रद्ध हो गये। हृदयमें श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके दोनों दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलराज श्रीरामजीकी दुहाई बोलने लगे॥ १॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥
नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती॥
kalasa sahita gahi bhavanu ḍhahāvā| dekhi nisācarapati bhaya pāvā||
nāri bṛṃda kara pīṭahiṃ chātī| aba dui kapi āe utapātī||
Meaning उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया। सब स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं [ और कहने लगीं--] अबकी बार दो उत्पाती वानर [एक साथ] आ गये॥ २॥
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥
पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥
kapilīlā kari tinhahi ḍerāvahiṃ| rāmacaṃdra kara sujasu sunāvahiṃ||
puni kara gahi kaṃcana ke khaṃbhā| kahenhi karia utapāta araṃbhā||
Meaning वानरलीला करके (घुड़की देकर ) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं। फिर सोनेके खंभोंको हाथोंसे पकड़कर उन्होंने [ परस्पर] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय॥ ३॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥
काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥
garji pare ripu kaṭaka majhārī| lāge mardai bhuja bala bhārī||
kāhuhi lāta capeṭanhi kehū| bhajahu na rāmahi so phala lehū||
Meaning वे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसका मर्दन करने लगे। किसीकी लातसे और किसीकी थप्पड़से खबर लेते हैं [और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो॥ ४॥
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥ ४४॥
eka eka soṃ mardahiṃ tori calāvahiṃ muṃḍa|
rāvana āgeṃ parahiṃ te janu phūṭahiṃ dadhi kuṃḍa|| 44||
Meaning एकको दूसरेसे [रगड़कर] मसल डालते हैं और सिरोंको तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावणके सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दहीके कूँड़े फूट रहे हों॥ ४४॥
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥
mahā mahā mukhiā je pāvahiṃ| te pada gahi prabhu pāsa calāvahiṃ||
kahai bibhīṣanu tinha ke nāmā| dehiṃ rāma tinhahū nija dhāmā||
Meaning जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों )-को पकड़ पाते हैं उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं॥ १॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।
उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥
khala manujāda dvijāmiṣa bhogī| pāvahiṃ gati jo jācata jogī|
umā rāma mṛducita karunākara| bayara bhāva sumirata mohi nisicara||
Meaning ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [ परन्तु सहजमें नहीं पाते]। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा ! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहदय और करुणाकी खान हैं। [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं॥ २॥
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥
dehiṃ parama gati so jiyam̐ jānī| asa kṛpāla ko kahahu bhavānī||
asa prabhu suni na bhajahiṃ bhrama tyāgī| nara matimaṃda te parama abhāgī||
Meaning ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी ! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं ? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं॥ ३॥
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥
लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें॥
aṃgada aru hanumaṃta prabesā| kīnha durga asa kaha avadhesā||
laṃkām̐ dvau kapi sohahiṃ kaiseṃ| mathahi siṃdhu dui maṃdara jaiseṃ||
Meaning श्रीरामजीने कहा कि अड्भद और हनुमान् किलेमें घुस गये हैं। दोनों वानर लड्ामें [ विध्वंस करते] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों॥ ४॥
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥ ४५॥
bhuja bala ripu dala dalamali dekhi divasa kara aṃta|
kūde jugala bigata śrama āe jaham̐ bhagavaṃta|| 45||
Meaning भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान् और अज्द दोनों कूद पड़े और श्रम (थकावट) रहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान् श्रीरामजी थे॥ ४५॥
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए॥
राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे॥
prabhu pada kamala sīsa tinha nāe| dekhi subhaṭa raghupati mana bhāe||
rāma kṛpā kari jugala nihāre| bhae bigataśrama parama sukhāre||
Meaning उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाये। उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। श्रीरामजीने कृपा करके दोनोंको देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये॥ १॥
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना॥
जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई॥
gae jāni aṃgada hanumānā| phire bhālu markaṭa bhaṭa nānā||
jātudhāna pradoṣa bala pāī| dhāe kari dasasīsa dohāī||
Meaning अड्द और हनुमान्को गये जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े। राक्षसोंने प्रदोष (सायं) कालका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा किया॥ २॥
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे॥
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी॥
nisicara anī dekhi kapi phire| jaham̐ taham̐ kaṭakaṭāi bhaṭa bhire||
dvau dala prabala pacāri pacārī| larata subhaṭa nahiṃ mānahiṃ hārī||
Meaning राक्षसोंकी सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये। दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं। योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते॥ ३॥
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे॥
सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा॥
mahābīra nisicara saba kāre| nānā barana balīmukha bhāre||
sabala jugala dala samabala jodhā| kautuka karata larata kari krodhā||
Meaning सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगोंके हैं। दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बलवाले योद्धा हैं। वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) हैं॥ ४॥
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे॥
अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया॥
prābiṭa sarada payoda ghanere| larata manahum̐ māruta ke prere||
anipa akaṃpana aru atikāyā| bicalata sena kīnhi inha māyā||
Meaning [राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं] मानो क्रमश: वर्षा और शरद्-ऋतुके बहुत-से बादल पवनसे प्रेरित होकर लड़ रहे हों। अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियोंने अपनी सेनाको विचलित होते देखकर माया की॥५॥
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा।
बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा॥
bhayau nimiṣa maham̐ ati am̐dhiyārā| bṛṣṭi hoi rudhiropala chārā||
Meaning पलभरमें अत्यन्त अन्धकार हो गया। खून, पत्थर और राखकी वर्षा होने लगी॥ ६॥
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥ ४६॥
dekhi nibiṛa tama dasahum̐ disi kapidala bhayau khabhāra|
ekahi eka na dekhaī jaham̐ taham̐ karahiṃ pukāra|| 46||
Meaning दसों दिशाओंमें अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरोंकी सेनामें खलबली पड़ गयी। एकको एक (दूसरा) नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं॥ ४६॥
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥
समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥
sakala maramu raghunāyaka jānā| lie boli aṃgada hanumānā||
samācāra saba kahi samujhāe| sunata kopi kapikuṃjara dhāe||
Meaning श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये। उन्होंने अज्नद और हनुमानको बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया। सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े॥ १॥
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥
puni kṛpāla ham̐si cāpa caṛhāvā| pāvaka sāyaka sapadi calāvā||
bhayau prakāsa katahum̐ tama nāhīṃ| gyāna udayam̐ jimi saṃsaya jāhīṃ||
Meaning फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [सब प्रकारके] सन्देह दूर हो जाते हैं॥ २॥
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥
हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥
bhālu balīmukha pāi prakāsā| dhāe haraṣa bigata śrama trāsā||
hanūmāna aṃgada rana gāje| hām̐ka sunata rajanīcara bhāje||
Meaning भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भयसे रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान् और अड्भद रणमें गरज उठे। उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे॥ ३॥
भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥
गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥
bhāgata paṭa paṭakahiṃ dhari dharanī| karahiṃ bhālu kapi adbhuta karanī||
gahi pada ḍārahiṃ sāgara māhīṃ| makara uraga jhaṣa dhari dhari khāhīṃ||
Meaning भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर और भालू पकड़कर पृथ्वीपर दे मारते हैं। और अद्भुत (आश्चर्यजनक) करनी करते हैं (युद्धकौशल दिखलाते हैं)। पैर पकड़कर उन्हें समुद्रमें डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा डालते हैं॥ ४॥
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।
गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥ '४७॥
kachu māre kachu ghāyala kachu gaṛha caṛhe parāi|
garjahiṃ bhālu balīmukha ripu dala bala bicalāi|| '47||
Meaning कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़पर चढ़ गये। अपने बलसे शत्रुदलको विचलित करके रीछ और वानर [वीर] गरज रहे हैं॥ ४७॥
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥
राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥
nisā jāni kapi cāriu anī| āe jahām̐ kosalā dhanī||
rāma kṛpā kari citavā sabahī| bhae bigataśrama bānara tabahī||
Meaning रात हुई जानकर वानरोंकी चारों सेनाएँ (टुकड़ियाँ) वहाँ आयीं जहाँ कोसलपति श्रीरामजी थे। श्रीरामजीने ज्यों ही सबको कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गये॥ १॥
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥
आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥
uhām̐ dasānana saciva ham̐kāre| saba sana kahesi subhaṭa je māre||
ādhā kaṭaku kapinha saṃghārā| kahahu begi kā karia bicārā||
Meaning वहाँ [लड्ामें] रावणने मन्त्रियोंको बुलाया और जो योद्धा मारे गये थे उन सबको सबसे बताया। [उसने कहा--] वानरोंने आधी सेनाका संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार (उपाय) करना चाहिये ?॥ २॥
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥
बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
mālyavaṃta ati jaraṭha nisācara| rāvana mātu pitā maṃtrī bara||
bolā bacana nīti ati pāvana| sunahu tāta kachu mora sikhāvana||
Meaning माल्यवंत [नामका एक] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावणकी माताका पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला--हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो--॥ ३॥
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥
बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥
jaba te tumha sītā hari ānī| asaguna hohiṃ na jāhiṃ bakhānī||
beda purāna jāsu jasu gāyo| rāma bimukha kāhum̐ na sukha pāyo||
Meaning जब्से तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते। वेद-पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया॥ ४॥
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥ ४८ ( क )॥
hiranyāccha bhrātā sahita madhu kaiṭabha balavāna|
jehi māre soi avatareu kṛpāsiṃdhu bhagavāna|| 48 ( ka )||
Meaning भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको जिन्होंने मारा था, वे ही कृपाके समुद्र भगवान् [रामरूपसे] अवतरित हुए हैं॥ ४८ (क)॥
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥ ४८ (ख )॥
kālarūpa khala bana dahana gunāgāra ghanabodha|
siva biraṃci jehi sevahiṃ tāsoṃ kavana birodha|| 48 (kha )||
Meaning जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके समूहरूपी वनके भस्म करनेवाले [अग्ि] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा ?॥ ४८ (ख)॥
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥
ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे॥
parihari bayaru dehu baidehī| bhajahu kṛpānidhi parama sanehī||
tāke bacana bāna sama lāge| kariā muha kari jāhi abhāge||
Meaning [ अत: ] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्त्रेही श्रीरामजीका भजन करो। रावणको उसके वचन बाणके समान लगे। [वह बोला--] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँसे] निकल जा॥ १॥
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥
तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥
būṛha bhaesi na ta marateum̐ tohī| aba jani nayana dekhāvasi mohī||
tehi apane mana asa anumānā| badhyo cahata ehi kṛpānidhānā||
Meaning तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला। रावणके ये वचन सुनकर उसने ( माल्यवानूने) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीराीमजी अब मारना ही चाहते हैं॥ २॥
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥
so uṭhi gayau kahata durbādā| taba sakopa boleu ghananādā||
kautuka prāta dekhiahu morā| karihaum̐ bahuta kahauṃ kā thorā||
Meaning वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला--सबेरे मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा)॥ ३॥
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥
करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥
suni suta bacana bharosā āvā| prīti sameta aṃka baiṭhāvā||
karata bicāra bhayau bhinusārā| lāge kapi puni cahūm̐ duārā||
Meaning पुत्रके वचन सुनकर रावणको भरोसा आ गया। उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे॥ ४॥
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥
बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥
kopi kapinha durghaṭa gaṛhu gherā| nagara kolāhalu bhayau ghanerā||
bibidhāyudha dhara nisicara dhāe| gaṛha te parbata sikhara ḍhahāe||
Meaning वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया। नगरमें बहुत ही कोलाहल ( शोर) मच गया। राक्षस बहुत तरहके अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ों के शिखर ढहाये॥ ५॥
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहेँ सो तहँ निसिचर हए॥
ḍhāhe mahīdhara sikhara koṭinha bibidha bidhi golā cale|
ghaharāta jimi pabipāta garjata janu pralaya ke bādale||
markaṭa bikaṭa bhaṭa juṭata kaṭata na laṭata tana jarjara bhae|
gahi saila tehi gaṛha para calāvahiṃ jahem̐ so taham̐ nisicara hae||
Meaning उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं ), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ (जो जहाँ होते हैं वहीं) मारे जाते हैं।
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ।
उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥ ४९॥
meghanāda suni śravana asa gaṛha puni cheṃkā āi|
utaryo bīra durga teṃ sanmukha calyo bajāi|| 49||
Meaning मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोंने आकर फिर किलेको घेर लिया है। तब वह वीर किलेसे उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला॥ ४९॥
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥
कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥
kaham̐ kosalādhīsa dvau bhrātā| dhanvī sakala loka bikhyātā||
kaham̐ nala nīla dubida sugrīvā| aṃgada hanūmaṃta bala sīṃvā||
Meaning [ मेघनादने पुकारकर कहा--] समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं ? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अज्द और हनुमान् कहाँ हैं 2॥ १॥
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥
अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥
kahām̐ bibhīṣanu bhrātādrohī| āju sabahi haṭhi māraum̐ ohī||
asa kahi kaṭhina bāna saṃdhāne| atisaya krodha śravana lagi tāne||
Meaning भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है ? आज मैं सबको और उस दुष्टको तो हठपूर्वक (अवश्य ही) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुषपर कठिन बाणोंका सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कानतक खींचा॥ २॥
सर समुह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥
जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥
sara samuha so chāṛai lāgā| janu sapaccha dhāvahiṃ bahu nāgā||
jaham̐ taham̐ parata dekhiahiṃ bānara| sanmukha hoi na sake tehi avasara||
Meaning वह बाणोंके समूह छोड़ने लगा। मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके॥ ३॥
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा।
बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥
jaham̐ taham̐ bhāgi cale kapi rīchā| bisarī sabahi juddha kai īchā||
सो कपि भालु न रन महँ देखा।
कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥
so kapi bhālu na rana maham̐ dekhā| kīnhesi jehi na prāna avaseṣā||
Meaning रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सबको युद्धकी इच्छा भूल गयी। रणभूमिमें ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो)॥ ४॥
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।
सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥ ५०॥
dasa dasa sara saba māresi pare bhūmi kapi bīra|
siṃhanāda kari garjā meghanāda bala dhīra|| 50||
Meaning फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वीपर गिर पड़े। बलवान और धीर मेघनाद सिंहके समान नाद करके गरजने लगा॥ ५०॥
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥
महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥
dekhi pavanasuta kaṭaka bihālā| krodhavaṃta janu dhāyau kālā||
mahāsaila eka turata upārā| ati risa meghanāda para ḍārā||
Meaning सारी सेनाको बेहाल (व्याकुल) देखकर पवनसुत हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोधके साथ उसे मेघनादपर छोड़ा॥ १॥
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥
बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥
āvata dekhi gayau nabha soī| ratha sārathī turaga saba khoī||
bāra bāra pacāra hanumānā| nikaṭa na āva maramu so jānā||
Meaning पहाड़को आते देखकर वह आकाशमें उड़ गया। [उसके] रथ, सारथि और घोड़े सब नष्ट हो गये (चूर-चूर हो गये)। हनुमानजी उसे बार-बार ललकारते हैं। पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बलका मर्म जानता था॥ २॥
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥
अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥
raghupati nikaṭa gayau ghananādā| nānā bhām̐ti karesi durbādā||
astra sastra āyudha saba ḍāre| kautukahīṃ prabhu kāṭi nivāre||
Meaning [ तब] मेघनाद श्रीरघुनाथजीके पास गया और उसने [उनके प्रति] अनेकों प्रकारके दुर्वचनों का प्रयोग किया। [फिर] उसने उनपर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये। प्रभुने खेलमें ही सबको काटकर अलग कर दिया॥ ३॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥
जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥
dekhi pratāpa mūṛha khisiānā| karai lāga māyā bidhi nānā||
jimi kou karai garuṛa saiṃ khelā| ḍarapāvai gahi svalpa sapelā||
Meaning श्रीरामजीका प्रताप (सामर्थ्य) देखकर वह मूर्ख लज्नित हो गया और अनेकों प्रकारकी माया करने लगा। जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँपका बच्चा हाथमें लेकर गरुड़को डरावे और उससे खेल करे॥ ४॥
जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट।
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥ ५१॥
jāsu prabala māyā bala siva biraṃci baṛa choṭa|
tāhi dikhāvai nisicara nija māyā mati khoṭa|| 51||
Meaning शिवजी और ब्रह्माजीतक बड़े-छोटे [सभी] जिनकी अत्यन्त बलवान् मायाके वशभमें हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है॥ ५१॥
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥
नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥
nabha caṛhi baraṣa bipula aṃgārā| mahi te pragaṭa hohiṃ jaladhārā||
nānā bhām̐ti pisāca pisācī| māru kāṭu dhuni bolahiṃ nācī||
Meaning आकाशमें [ऊँचे] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वीसे जलकी धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकारके पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर ' मारो, काटो ' की आवाज करने लगीं॥ १॥
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥
biṣṭā pūya rudhira kaca hāṛā| baraṣai kabahum̐ upala bahu chāṛā||
baraṣi dhūri kīnhesi am̐dhiārā| sūjha na āpana hātha pasārā||
Meaning वह कभी तो विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता था और कभी बहुत-से पत्थर फेंके देता था। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था॥ २॥
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें॥
कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥
kapi akulāne māyā dekheṃ| saba kara marana banā ehi lekheṃ||
kautuka dekhi rāma musukāne| bhae sabhīta sakala kapi jāne||
Meaning माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे (इसी तरह रहा) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं॥ ३॥
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥
eka bāna kāṭī saba māyā| jimi dinakara hara timira nikāyā||
kṛpādṛṣṭi kapi bhālu biloke| bhae prabala rana rahahiṃ na roke||
Meaning तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे॥ ४॥
आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥ ५२॥
āyasu māgi rāma pahiṃ aṃgadādi kapi sātha|
lachimana cale kruddha hoi bāna sarāsana hātha|| 52||
Meaning श्रीरीमजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक््मणजी क्रद्ध होकर चले॥ ५२॥
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥
इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥
chataja nayana ura bāhu bisālā| himagiri nibha tanu kachu eka lālā||
ihām̐ dasānana subhaṭa paṭhāe| nānā astra sastra gahi dhāe||
Meaning उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल ( गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र- शस्त्र लेकर दौड़े॥ १॥
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥
bhūdhara nakha biṭapāyudha dhārī| dhāe kapi jaya rāma pukārī||
bhire sakala jorihi sana jorī| ita uta jaya icchā nahiṃ thorī||
Meaning पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर ' श्रीरामचन्द्रजीकी जय' पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ीसे जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी)॥ २॥
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥
मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥
muṭhikanha lātanha dātanha kāṭahiṃ| kapi jayasīla māri puni ḍāṭahiṃ||
māru māru dharu dharu dharu mārū| sīsa tori gahi bhujā upārū||
Meaning वानर उनको घूँसों ' और लातोंसे मारते हैं, दाँतोंसे काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो॥ ३॥
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥
asi rava pūri rahī nava khaṃḍā| dhāvahiṃ jaham̐ taham̐ ruṃḍa pracaṃḍā||
dekhahiṃ kautuka nabha sura bṛṃdā| kabahum̐ka bisamaya kabahum̐ anaṃdā||
Meaning नवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाशगें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द॥ ४॥
रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।
जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥ ५३॥
rudhira gāṛa bhari bhari jamyo ūpara dhūri uṛāi|
janu am̐gāra rāsinha para mṛtaka dhūma rahyo chāi|| 53||
Meaning खून गड्डोंगें भर-भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है [वह दृश्य ऐसा है] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो॥ ५३॥
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे॥
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥
ghāyala bīra birājahiṃ kaise| kusumita kiṃsuka ke taru jaise||
lachimana meghanāda dvau jodhā| bhirahiṃ parasapara kari ati krodhā||
Meaning घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक-दूसरेसे भिड़ते हैं॥ १॥
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥
क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥
ekahi eka sakai nahiṃ jītī| nisicara chala bala karai anītī||
krodhavaṃta taba bhayau anaṃtā| bhaṃjeu ratha sārathī turaṃtā||
Meaning एक-दूसरेको (कोई किसीको) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल (माया) और अनीति ( अधर्म) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथको तोड़ डाला और सारधिको टुकड़े-टुकड़े कर दिये!॥ २॥
नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥
रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥
nānā bidhi prahāra kara seṣā| rācchasa bhayau prāna avaseṣā||
rāvana suta nija mana anumānā| saṃkaṭha bhayau harihi mama prānā||
Meaning शेषजी (लक्ष्मणजी) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे। राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये। रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अब तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे॥ ३॥
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥
bīraghātinī chāṛisi sām̐gī| teja puṃja lachimana ura lāgī||
muruchā bhaī sakti ke lāgeṃ| taba cali gayau nikaṭa bhaya tyāgeṃ||
Meaning तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी। शक्तिके लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥ ४॥
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥ ५४॥
meghanāda sama koṭi sata jodhā rahe uṭhāi|
jagadādhāra seṣa kimi uṭhai cale khisiāi|| 54||
Meaning मेघनादके समान सौ करोड़ (अगणित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परन्तु जगत्के आधार श्रीशेषजी (लक्ष्मणजी ) उनसे कैसे उठते ? तब वे लजाकर चले गये॥ ५४॥
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥
सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥
sunu girijā krodhānala jāsū| jārai bhuvana cāridasa āsū||
saka saṃgrāma jīti ko tāhī| sevahiṃ sura nara aga jaga jāhī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, [प्रलयकालमें ] जिन (शेषनाग) -के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [जीव] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ?॥ १॥
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥
संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥
yaha kautūhala jānai soī| jā para kṛpā rāma kai hoī||
saṃdhyā bhai phiri dvau bāhanī| lage sam̐bhārana nija nija anī||
Meaning इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे॥ २॥
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥
तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥
byāpaka brahma ajita bhuvanesvara| lachimana kahām̐ būjha karunākara||
taba lagi lai āyau hanumānā| anuja dekhi prabhu ati dukha mānā||
Meaning व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा-- लक्ष्मण कहाँ हैं ? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाईको [इस दशामें।] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना॥ ३॥
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥
jāmavaṃta kaha baida suṣenā| laṃkām̐ rahai ko paṭhaī lenā||
dhari laghu rūpa gayau hanumaṃtā| āneu bhavana sameta turaṃtā||
Meaning जाम्बवानूने कहा--लड्ामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय ? हनुमानूजी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये॥ ४॥
राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥ ५५॥
rāma padārabiṃda sira nāyau āi suṣena|
kahā nāma giri auṣadhī jāhu pavanasuta lena|| 55||
Meaning सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनपुत्र! ओषधि लेने जाओ॥ ५५॥
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी॥
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा॥
rāma carana sarasija ura rākhī| calā prabhaṃjana suta bala bhāṣī||
uhām̐ dūta eka maramu janāvā| rāvana kālanemi gṛha āvā||
Meaning श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमानजी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया॥ १॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥
dasamukha kahā maramu tehiṃ sunā| puni puni kālanemi siru dhunā||
dekhata tumhahi nagaru jehiṃ jārā| tāsu paṃtha ko rokana pārā||
Meaning रावणने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा--] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?॥ २॥
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥
bhaji raghupati karu hita āpanā| chām̐ṛahu nātha mṛṣā jalpanā||
nīla kaṃja tanu suṃdara syāmā| hṛdayam̐ rākhu locanābhirāmā||
Meaning श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो॥ ३॥
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥
maiṃ taiṃ mora mūṛhatā tyāgū| mahā moha nisi sūtata jāgū||
kāla byāla kara bhacchaka joī| sapanehum̐ samara ki jītia soī||
Meaning मैं-तू ( भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह ( अज्ञान)-रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है ?॥ ४॥
सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।
राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥ ५६॥
suni dasakaṃṭha risāna ati tehiṃ mana kīnha bicāra|
rāma dūta kara marauṃ baru yaha khala rata mala bhāra|| 56||
Meaning उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [ इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है॥ ५६॥
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥
asa kahi calā racisi maga māyā| sara maṃdira bara bāga banāyā||
mārutasuta dekhā subha āśrama| munihi būjhi jala piyauṃ jāi śrama||
Meaning वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय॥ १॥
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥
जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥
rācchasa kapaṭa beṣa taham̐ sohā| māyāpati dūtahi caha mohā||
jāi pavanasuta nāyau māthā| lāga so kahai rāma guna gāthā||
Meaning राक्षस वहाँ कपट [से मुनि] का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा॥ २॥
होत महा रन रावन रामहिं। जितहहिं राम न संसय या महिं॥
इहाँ भएँ मैं देखेउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥
hota mahā rana rāvana rāmahiṃ| jitahahiṃ rāma na saṃsaya yā mahiṃ||
ihām̐ bhaem̐ maiṃ dekheum̐ bhāī| gyāna dṛṣṭi bala mohi adhikāī||
Meaning [वह बोला--] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है॥ ३॥
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥
सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥
māgā jala tehiṃ dīnha kamaṃḍala| kaha kapi nahiṃ aghāum̐ thoreṃ jala||
sara majjana kari ātura āvahu| dicchā deum̐ gyāna jehiṃ pāvahu||
Meaning हनुमानूजीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्ूजीने कहा--थोड़े जलसे मैं तृप्त नहीं होनेका। तब वह बोला--तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो॥ ४॥
सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।
मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥ ५७॥
sara paiṭhata kapi pada gahā makarīṃ taba akulāna|
mārī so dhari divya tanu calī gagana caṛhi jāna|| 57||
Meaning तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरीने अकुलाकर उसी समय हनुमानूजीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्जीने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली॥ ५७॥
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥
kapi tava darasa bhaium̐ niṣpāpā| miṭā tāta munibara kara sāpā||
muni na hoi yaha nisicara ghorā| mānahu satya bacana kapi morā||
Meaning [उसने कहा-] हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी। हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो॥ १॥
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू॥
asa kahi gaī apacharā jabahīṃ| nisicara nikaṭa gayau kapi tabahīṃ||
kaha kapi muni guradachinā lehū| pācheṃ hamahi maṃtra tumha dehū||
Meaning ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमानजी निशाचरके पास गये। हनुमान्जीने कहा--हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा॥ २॥
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥
sira laṃgūra lapeṭi pachārā| nija tanu pragaṭesi maratī bārā||
rāma rāma kahi chāṛesi prānā| suni mana haraṣi caleu hanumānā||
Meaning हनुमानूजीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी ) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँहसे राम-नामका उच्चारण) सुनकर हनुमानजी मनमें हर्षित होकर चले॥ ३॥
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी उपर कपि गयऊ॥
dekhā saila na auṣadha cīnhā| sahasā kapi upāri giri līnhā||
gahi giri nisi nabha dhāvata bhayaū| avadhapurī upara kapi gayaū||
Meaning उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमानूजीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये॥ ४॥
देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥ ५८॥
dekhā bharata bisāla ati nisicara mana anumāni|
binu phara sāyaka māreu cāpa śravana lagi tāni|| 58||
Meaning भरतजीने आकाशगमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा॥ ५८॥