धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥
dhari dhīraju eka āli sayānī| sītā sana bolī gahi pānī||
bahuri gauri kara dhyāna karehū| bhūpakisora dekhi kina lehū||
Meaning एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजीसे बोली--गिरिजाजीका ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमारको क्यों नहीं देख लेतीं॥ १॥
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥
sakuci sīyam̐ taba nayana ughāre| sanamukha dou raghusiṃgha nihāre||
nakha sikha dekhi rāma kai sobhā| sumiri pitā panu manu ati chobhā||
Meaning तब सीताजीने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुलके दोनों सिंहोंको अपने सामने [खड़े] देखा। नखसे शिखातक श्रीरामजीकी शोभा देखकर और फिर पिताका प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया॥ २॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहि सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥
parabasa sakhinha lakhī jaba sītā| bhayau gaharu saba kahahi sabhītā||
puni āuba ehi beriām̐ kālī| asa kahi mana bihasī eka ālī||
Meaning जब सखियोंने सीताजीको परवश (प्रेमके वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं--बड़ी देर हो गयी [अब चलना चाहिये]। कल इसी समय फिर आयेंगी, ऐसा कहकर एक सखी मनमें हँसी॥ ३॥
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने॥
gūṛha girā suni siya sakucānī| bhayau bilaṃbu mātu bhaya mānī||
dhari baṛi dhīra rāmu ura āne| phiri apanapau pitubasa jāne||
Meaning सखीकी यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं। देर हो गयी जान उन्हें माताका भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें ले आयीं, और [उनका ध्यान करती हुई] अपनेको पिताके अधीन जानकर लौट चलीं॥ ४॥
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥ २३४॥
dekhana misa mṛga bihaga taru phirai bahori bahori|
nirakhi nirakhi raghubīra chabi bāṛhai prīti na thori|| 234||
Meaning मृग, पक्षी और वृक्षोंको देखनेके बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्रीरामजीकी छवि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है (अर्थात् बहुत ही बढ़ता जाता है)॥ २३४॥
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥
jāni kaṭhina sivacāpa bisūrati| calī rākhi ura syāmala mūrati||
prabhu jaba jāta jānakī jānī| sukha saneha sobhā guna khānī||
Meaning शिवजीके धनुषको कठोर जानकर वे विसूरती (मनमें विलाप करती) हुई हृदयमें श्रीरामजीकी साँवली मूर्तिको रखकर चलीं। (शिवजीके धनुषकी कठोरताका स्मरण आनेसे उन्हें चिन्ता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथजी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिताके प्रणकी स्मृतिसे उनके हृदयमें क्षोभ था ही, इसलिये मनमें विलाप करने लगीं। प्रेमवश ऐश्वर्यकी विस्मृति हो जानेसे ही ऐसा हुआ; फिर भगवान्के बलका स्मरण आते ही वे हर्षित हो गयीं और साँवली छबिको हृदयमें धारण करके चलीं।) प्रभु श्रीरामजीने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुणोंकी खान श्रीजानकीजीको जाती हुई जाना,॥ १॥
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही॥
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥
parama premamaya mṛdu masi kīnhī| cāru cita bhītīṃ likha līnhī||
gaī bhavānī bhavana bahorī| baṃdi carana bolī kara jorī||
Meaning तब परमप्रेमकी कोमल स्याही बनाकर उनके स्वरूपको अपने सुन्दर चित्तरूपी भित्तिपर चित्रित कर लिया। सीताजी पुन: भवानीजीके मन्दिरमें गयीं और उनके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोलीं--॥ २॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
jaya jaya giribararāja kisorī| jaya mahesa mukha caṃda cakorī||
jaya gaja badana ṣaṛānana mātā| jagata janani dāmini duti gātā||
Meaning हे श्रेष्ठ पर्वतोंके राजा हिमाचलकी पुत्री पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो; हे महादेवजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी [ओर टकटकी लगाकर देखनेवाली] चकोरी! आपकी जय हो; हे हाथीके मुखवाले गणेशजी और छः: मुखवाले स्वामिकार्तिकजीकी माता! हे जगज्जननी ! हे बिजलीकी-सी कान्तियुक्त शरीरवाली ! आपकी जय हो!॥ ३॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
nahiṃ tava ādi madhya avasānā| amita prabhāu bedu nahiṃ jānā||
bhava bhava bibhava parābhava kārini| bisva bimohani svabasa bihārini||
Meaning आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है। आपके असीम प्रभावको वेद भी नहीं जानते। आप संसारको उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली हैं। विश्वको मोहित करनेवाली और स्वतन्त्ररूपसे विहार करनेवाली हैं॥ ४॥
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥ २३५॥
patidevatā sutīya mahum̐ mātu prathama tava rekha|
mahimā amita na sakahiṃ kahi sahasa sāradā seṣa|| 235||
Meaning पतिको इष्टदेव माननेवाली श्रेष्ठ नारियोंमें हे माता ! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमाको हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते॥ २३५॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
sevata tohi sulabha phala cārī| baradāyanī purāri piārī||
debi pūji pada kamala tumhāre| sura nara muni saba hohiṃ sukhāre||
Meaning हे [ भक्तोंको मुँहमाँगा] वर देनेवाली! हे त्रिपुरके शत्रु शिवजीकी प्रिय पत्नी ! आपकी सेवा करनेसे चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि! आपके चरणकमलोंकी पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं॥ १॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
mora manorathu jānahu nīkeṃ| basahu sadā ura pura sabahī keṃ||
kīnheum̐ pragaṭa na kārana tehīṃ| asa kahi carana gahe baidehīṃ||
Meaning मेरे मनोरथको आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजीने उनके चरण पकड़ लिये॥ २॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥
binaya prema basa bhaī bhavānī| khasī māla mūrati musukānī||
sādara siyam̐ prasādu sira dhareū| bolī gauri haraṣu hiyam̐ bhareū||
Meaning गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं। उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी। सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिरपर धारण किया। गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं--॥ ३॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
sunu siya satya asīsa hamārī| pūjihi mana kāmanā tumhārī||
nārada bacana sadā suci sācā| so baru milihi jāhiṃ manu rācā||
Meaning हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मन:कामना पूरी होगी। नारदजीका वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित) और सत्य है। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा॥ ४॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियें हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
manu jāhiṃ rāceu milihi so baru sahaja suṃdara sām̐varo|
karunā nidhāna sujāna sīlu sanehu jānata rāvaro||
ehi bhām̐ti gauri asīsa suni siya sahita hiyeṃ haraṣīṃ alī|
tulasī bhavānihi pūji puni puni mudita mana maṃdira calī||
Meaning जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभावसे ही सुन्दर साँवला वर ( श्रीरामचन्द्रजी ) तुमको मिलेगा। वह दयाका खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेहको जानता है। इस प्रकार श्रीगौरीजीका आशीर्वाद सुनकर जानकीजीसमेत सब सखियाँ हदयमें हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं--भवानीजीको बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मनसे राजमहलको लौट चलीं।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥ २३६॥
jāni gauri anukūla siya hiya haraṣu na jāi kahi|
maṃjula maṃgala mūla bāma aṃga pharakana lage|| 236||
Meaning गौरीजीको अनुकूल जानकर सीताजीके हृदयको जो हर्ष हुआ वह कहा नहीं जा सकता। सुन्दर मड़लोंके मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे॥ २३६॥
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥
राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥
hṛdayam̐ sarāhata sīya lonāī| gura samīpa gavane dou bhāī||
rāma kahā sabu kausika pāhīṃ| sarala subhāu chuata chala nāhīṃ||
Meaning हृदयमें सीताजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए दोनों भाई गुरुजीके पास गये। श्रीरामचन्द्रजी ने विधामित्रजीसे सब कुछ कह दिया। क्योंकि उनका सरल स्वभाव है, छल तो उसे छूता भी नहीं है॥ १॥
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे॥
sumana pāi muni pūjā kīnhī| puni asīsa duhu bhāinha dīnhī||
suphala manoratha hohum̐ tumhāre| rāmu lakhanu suni bhae sukhāre||
Meaning फूल पाकर मुनिने पूजा की। फिर दोनों भाइयोंको आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्रीराम-लक्ष्मण सुखी हुए॥ २॥
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥
kari bhojanu munibara bigyānī| lage kahana kachu kathā purānī||
bigata divasu guru āyasu pāī| saṃdhyā karana cale dou bhāī||
Meaning श्रेष्ठ विज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी भोजन करके कुछ प्राचीन कथाएँ कहने लगे। [ इतनेमें ] दिन बीत गया और गुरुकी आज्ञा पाकर दोनों भाई सन्ध्या करने चले॥ ३॥
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
prācī disi sasi uyau suhāvā| siya mukha sarisa dekhi sukhu pāvā||
bahuri bicāru kīnha mana māhīṃ| sīya badana sama himakara nāhīṃ||
Meaning [उधर] पूर्व दिशामें सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ। श्रीरामचन्द्रजीने उसे सीताके मुखके समान देखकर सुख पाया। फिर मनमें विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजीके मुखके समान नहीं है॥ ४॥
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥ २३७॥
janamu siṃdhu puni baṃdhu biṣu dina malīna sakalaṃka|
siya mukha samatā pāva kimi caṃdu bāpuro raṃka|| 237||
Meaning खारे समुद्रमें तो इसका जन्म, फिर [उसी समुद्रसे उत्पन्न होनेके कारण] विष इसका भाई; दिनमें यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलड्ली (काले दागसे युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजीके मुखकी बराबरी कैसे पा सकता है ?॥ २३७॥
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥
ghaṭai baṛhai birahani dukhadāī| grasai rāhu nija saṃdhihiṃ pāī||
koka sikaprada paṃkaja drohī| avaguna bahuta caṃdramā tohī||
Meaning फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियोंको दुःख देनेवाला है; राहु अपनी सन्धिमें पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवेको [ चकवीके वियोगका] शोक देनेवाला और कमलका वैरी (उसे मुरझा देनेवाला) है। हे चन्द्रमा ! तुझमें बहुत-से अवगुण हैं [जो सीताजीमें नहीं हैं]॥ १॥
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे॥
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी॥
baidehī mukha paṭatara dīnhe| hoi doṣa baṛa anucita kīnhe||
siya mukha chabi bidhu byāja bakhānī| guru pahiṃ cale nisā baṛi jānī||
Meaning अत: जानकीजीके मुखकी तुझे उपमा देनेमें बड़ा अनुचित कर्म करनेका दोष लगेगा। इस प्रकार चन्द्रमाके बहाने सीताजीके मुखकी छबिका वर्णन करके, बड़ी रात हो गयी जान, वे गुरुजीके पास चले॥ २॥
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥
बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥
kari muni carana saroja pranāmā| āyasu pāi kīnha biśrāmā||
bigata nisā raghunāyaka jāge| baṃdhu biloki kahana asa lāge||
Meaning मुनिके चरणकमलोंमें प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया; रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजी जागे और भाईको देखकर ऐसा कहने लगे--॥ ३॥
उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥
बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥
udau aruna avalokahu tātā| paṃkaja koka loka sukhadātā||
bole lakhanu jori juga pānī| prabhu prabhāu sūcaka mṛdu bānī||
Meaning हे तात! देखो, कमल, चक्रवाक और समस्त संसारको सुख देनेवाला अरुणोदय हुआ है। लक्ष्मणजी दोनों हाथ जोड़कर प्रभुके प्रभावको सूचित करनेवाली कोमल वाणी बोले--॥ ४॥
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥ २३८॥
arunodayam̐ sakuce kumuda uḍagana joti malīna|
jimi tumhāra āgamana suni bhae nṛpati balahīna|| 238||
Meaning अरुणोदय होनेसे कुमुदिनी सकुचा गयी और तारागणोंका प्रकाश फीका पड़ गया, जिस प्रकार आपका आना सुनकर सब राजा बलहीन हो गये हैं॥ २३८॥
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥
कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥
nṛpa saba nakhata karahiṃ ujiārī| ṭāri na sakahiṃ cāpa tama bhārī||
kamala koka madhukara khaga nānā| haraṣe sakala nisā avasānā||
Meaning सब राजारूपी तारे उजाला (मन्द प्रकाश) करते हैं, पर वे धनुषरूपी महान् अन्धकारको हटा नहीं सकते। रात्रिका अन्त होनेसे जैसे कमल, चकवे, भौरे और नाना प्रकारके पक्षी हर्षित हो रहे हैं॥ १॥
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥
aisehiṃ prabhu saba bhagata tumhāre| hoihahiṃ ṭūṭeṃ dhanuṣa sukhāre||
uyau bhānu binu śrama tama nāsā| dure nakhata jaga teju prakāsā||
Meaning वैसे ही हे प्रभो ! आपके सब भक्त धनुष टूटनेपर सुखी होंगे। सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया। तारे छिप गये, संसारमें तेजका प्रकाश हो गया॥ २॥
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥
तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥
rabi nija udaya byāja raghurāyā| prabhu pratāpu saba nṛpanha dikhāyā||
tava bhuja bala mahimā udaghāṭī| pragaṭī dhanu bighaṭana paripāṭī||
Meaning हे रघुनाथजी ! सूर्यने अपने उदयके बहाने सब राजाओंको प्रभु (आप) का प्रताप दिखलाया है। आपकी भुजाओंके बलकी महिमाको उद्घाटित करने (खोलकर दिखाने) के लिये ही धनुष तोड़नेकी यह पद्धति प्रकट हुई है॥ ३॥
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥
baṃdhu bacana suni prabhu musukāne| hoi suci sahaja punīta nahāne||
nityakriyā kari guru pahiṃ āe| carana saroja subhaga sira nāe||
Meaning भाईके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर स्वभावसे ही पवित्र श्रीरामजीने शौचसे निवृत्त होकर स्नान किया और नित्यकर्म करके वे गुरुजीके पास आये। आकर उन्होंने गुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें सिर नवाया॥ ४॥
सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥
satānaṃdu taba janaka bolāe| kausika muni pahiṃ turata paṭhāe||
janaka binaya tinha āi sunāī| haraṣe boli lie dou bhāī||
Meaning तब जनकजीने शतानन्दजीको बुलाया और उन्हें तुरंत ही विश्वामित्र मुनिके पास भेजा। उन्होंने आकर जनकजीकी विनती सुनायी। विश्वामित्रजीने हर्षित होकर दोनों भाइयोंको बुलाया॥ ५॥
सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥ २३९॥
satānaṃdapada baṃdi prabhu baiṭhe gura pahiṃ jāi|
calahu tāta muni kaheu taba paṭhavā janaka bolāi|| 239||
Meaning शतानन्दजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गुरुजीके पास जा बैठे। तब मुनिने कहा--हे तात! चलो, जनकजीने बुला भेजा है॥ २३९॥
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥
sīya svayaṃbaru dekhia jāī| īsu kāhi dhauṃ dei baṛāī||
lakhana kahā jasa bhājanu soī| nātha kṛpā tava jāpara hoī||
Meaning चलकर सीताजीके स्वयंवरको देखना चाहिये। देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजीने कहा--हे नाथ! जिसपर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाईका पात्र होगा ( धनुष तोड़नेका श्रेय उसीको प्राप्त होगा)॥ श॥
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥
haraṣe muni saba suni bara bānī| dīnhi asīsa sabahiṃ sukhu mānī||
puni munibṛṃda sameta kṛpālā| dekhana cale dhanuṣamakha sālā||
Meaning इस श्रेष्ठ वाणीको सुनकर सब मुनि प्रसन्न हुए। सभीने सुख मानकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनियोंके समूहसहित कृपालु श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञशाला देखने चले॥ २॥
रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥
raṃgabhūmi āe dou bhāī| asi sudhi saba purabāsinha pāī||
cale sakala gṛha kāja bisārī| bāla jubāna jaraṭha nara nārī||
Meaning दोनों भाई रंगभूमिमें आये हैं, ऐसी खबर जब सब नगरनिवासियोंने पायी, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और काम-काजको भुलाकर चल दिये॥ ३॥
देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू॥
dekhī janaka bhīra bhai bhārī| suci sevaka saba lie ham̐kārī||
turata sakala loganha pahiṃ jāhū| āsana ucita dehū saba kāhū||
Meaning जब जनकजीने देखा कि बड़ी भीड़ हो गयी है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकोंको बुलवा लिया और कहा--तुमलोग तुरंत सब लोगोंके पास जाओ और सब किसीको यथायोग्य आसन दो॥ ४॥
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥ २४०॥
kahi mṛdu bacana binīta tinha baiṭhāre nara nāri|
uttama madhyama nīca laghu nija nija thala anuhāri|| 240||
Meaning उन सेवकोंने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु (सभी श्रेणीके ) स्त्री-पुरुषोंको अपने-अपने योग्य स्थानपर बैठाया॥ २४०॥
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥
गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥
rājakuam̐ra tehi avasara āe| manahum̐ manoharatā tana chāe||
guna sāgara nāgara bara bīrā| suṃdara syāmala gaura sarīrā||
Meaning उसी समय राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आये। [वे ऐसे सुन्दर हैं] मानो साक्षात् मनोहरता ही उनके शरीरोंपर छा रही हो। सुन्दर साँवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणोंके समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं॥ १॥
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
rāja samāja birājata rūre| uḍagana mahum̐ janu juga bidhu pūre||
jinha keṃ rahī bhāvanā jaisī| prabhu mūrati tinha dekhī taisī||
Meaning वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥ २॥
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥
dekhahiṃ rūpa mahā ranadhīrā| manahum̐ bīra rasu dhareṃ sarīrā||
ḍare kuṭila nṛpa prabhuhi nihārī| manahum̐ bhayānaka mūrati bhārī||
Meaning महान् रणधीर (राजालोग) श्रीरामचन्द्रजीके रूपको ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर-रस शरीर धारण किये हुए हो। कुटिल राजा प्रभुको देखकर डर गये, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो॥ ३॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा॥
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥
rahe asura chala chonipa beṣā| tinha prabhu pragaṭa kālasama dekhā||
purabāsinha dekhe dou bhāī| narabhūṣana locana sukhadāī||
Meaning छलसे जो राक्षस वहाँ राजाओंके वेषमें [ बैठे] थे, उन्होंने प्रभुको प्रत्यक्ष कालके समान देखा। नगरनिवासियोंने दोनों भाइयोंको मनुष्योंके भूषणरूप और नेत्रोंको सुख देनेवाला देखा॥ ४॥
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥ २४१॥
nāri bilokahiṃ haraṣi hiyam̐ nija nija ruci anurūpa|
janu sohata siṃgāra dhari mūrati parama anūpa|| 241||
Meaning स्त्रियाँ हदयमें हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो श्रृंगार- रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किये सुशोभित हो रहा हो॥ २४१॥
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥
biduṣanha prabhu birāṭamaya dīsā| bahu mukha kara paga locana sīsā||
janaka jāti avalokahiṃ kaisaiṃ| sajana sage priya lāgahiṃ jaiseṃ||
Meaning विद्वानोंको प्रभु विराट्रूपमें दिखायी दिये, जिसके बहुत-से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजीके सजातीय (कुट्म्बी) प्रभुको किस तरह (कैसे प्रिय रूपमें) देख रहे हैं, जैसे सगे सजन (सम्बन्धी ) प्रिय लगते हैं॥ १॥
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥
sahita bideha bilokahiṃ rānī| sisu sama prīti na jāti bakhānī||
joginha parama tatvamaya bhāsā| sāṃta suddha sama sahaja prakāsā||
Meaning जनकसमेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चेके समान देख रही हैं, उनकी प्रीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियोंको वे शान्त, शुद्ध, सम और स्वतःप्रकाश परम तत्त्वके रूपमें दीखे॥ २॥
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥
haribhagatanha dekhe dou bhrātā| iṣṭadeva iva saba sukha dātā||
rāmahi citava bhāyam̐ jehi sīyā| so sanehu sukhu nahiṃ kathanīyā||
Meaning हरिभक्तोंने दोनों भाइयोंको सब सुखोंके देनेवाले इष्टदेवके समान देखा। सीताजी जिस भावसे श्रीरामचन्द्रजीको देख रही हैं, वह स्नेह और सुख तो कहनेमें ही नहीं आता॥ ३॥
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥
ura anubhavati na kahi saka soū| kavana prakāra kahai kabi koū||
ehi bidhi rahā jāhi jasa bhāū| tehiṃ tasa dekheu kosalarāū||
Meaning उस (स्नेह और सुख) का वे हृदयमें अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीको वैसा ही देखा॥ ४॥
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥ २४२॥
rājata rāja samāja mahum̐ kosalarāja kisora|
suṃdara syāmala gaura tana bisva bilocana cora|| 242||
Meaning सुन्दर साँवले और गोरे शरीरवाले तथा विश्वभरके नेत्रोंको चुरानेवाले कोसलाधीशके कुमार राजसमाजमें [इस प्रकार] सुशोभित हो रहे हैं॥ २४२॥
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥
सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥
sahaja manohara mūrati doū| koṭi kāma upamā laghu soū||
sarada caṃda niṃdaka mukha nīke| nīraja nayana bhāvate jī ke||
Meaning दोनों मूर्तियाँ स्वभावसे ही (बिना किसी बनाव-श्रंगारके ) मनको हरनेवाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिये तुच्छ है। उनके सुन्दर मुख शरद् [ पूर्णिमा] के चन्द्रमाकी भी निन््दा करनेवाले (उसे नीचा दिखानेवाले) हैं और कमलके समान नेत्र मनको बहुत ही भाते हैं॥ १॥
चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥
citavata cāru māra manu haranī| bhāvati hṛdaya jāti nahīṃ baranī||
kala kapola śruti kuṃḍala lolā| cibuka adhara suṃdara mṛdu bolā||
Meaning सुन्दर चितवन [सारे संसारके मनको हरनेवाले] कामदेवके भी मनको हरनेवाली है। वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चल्नल (झूमते हुए) कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है॥ २॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥
kumudabaṃdhu kara niṃdaka hām̐sā| bhṛkuṭī bikaṭa manohara nāsā||
bhāla bisāla tilaka jhalakāhīṃ| kaca biloki ali avali lajāhīṃ||
Meaning हँसी चन्द्रमाकी किरणों का तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं (दीसिमान् हो रहे हैं)। [ काले घुँघराले] बालोंको देखकर भौंरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं॥ ३॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥
pīta cautanīṃ siranhi suhāī| kusuma kalīṃ bica bīca banāīṃ||
rekheṃ rucira kaṃbu kala gīvām̐| janu tribhuvana suṣamā kī sīvām̐||
Meaning पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी (काढ़ी) हुई हैं। शड्ढके समान सुन्दर (गोल) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [को बता रही] हैं॥ ४॥
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥ २४३॥
kuṃjara mani kaṃṭhā kalita uranhi tulasikā māla|
bṛṣabha kaṃdha kehari ṭhavani bala nidhi bāhu bisāla|| 243||
Meaning हदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कण्ठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ऊँचे तथा पुष्ट ] हैं, ऐंड (खड़े होनेकी शान) सिंहकी-सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं॥ २४३॥
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे॥
पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥
kaṭi tūnīra pīta paṭa bām̐dhe| kara sara dhanuṣa bāma bara kām̐dhe||
pīta jagya upabīta suhāe| nakha sikha maṃju mahāchabi chāe||
Meaning कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [ दाहिने] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपबीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान् शोभा छायी हुई है॥ १॥
देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥
हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥
dekhi loga saba bhae sukhāre| ekaṭaka locana calata na tāre||
haraṣe janaku dekhi dou bhāī| muni pada kamala gahe taba jāī||
Meaning उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए। नेत्र एकटक (निमेषशून्य) हैं और तारे (पुतलियाँ) भी नहीं चलते। जनकजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए। तब उन्होंने जाकर मुनिके चरणकमल पकड़ लिये॥ २॥
करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥
kari binatī nija kathā sunāī| raṃga avani saba munihi dekhāī||
jaham̐ jaham̐ jāhi kuam̐ra bara doū| taham̐ taham̐ cakita citava sabu koū||
Meaning विनती करके अपनी कथा सुनायी और मुनिको सारी रंगभूमि (यज्ञशाला) दिखलायी। [मुनिके साथ] दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं॥ ३॥
निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥
nija nija rukha rāmahi sabu dekhā| kou na jāna kachu maramu biseṣā||
bhali racanā muni nṛpa sana kaheū| rājām̐ mudita mahāsukha laheū||
Meaning सबने रामजीको अपनी-अपनी ओर ही मुख किये हुए देखा; परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। मुनिने राजासे कहा-रंगभूमिकी रचना बड़ी सुन्दर है। [ विश्वामित्र-जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनिसे रचनाकी प्रशंसा सुनकर] राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला॥ ४॥
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥ २४४॥
saba maṃcanha te maṃcu eka suṃdara bisada bisāla|
muni sameta dou baṃdhu taham̐ baiṭhāre mahipāla|| 244||
Meaning सब मज्ञोंसे एक मज्ज अधिक सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल था। [स्वयं] राजाने मुनिसहित दोनों भाइयोंको उसपर बैठाया॥ २४४॥
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥
prabhuhi dekhi saba nṛpa hiṃyam̐ hāre| janu rākesa udaya bhaem̐ tāre||
asi pratīti saba ke mana māhīṃ| rāma cāpa toraba saka nāhīṃ||
Meaning प्रभुको देखकर सब राजा हृदयमें ऐसे हार गये (निराश एवं उत्साहहीन हो गये) जैसे पूर्ण चन्द्रमाके उदय होनेपर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। [उनके तेजको देखकर] सबके मनमें ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुषको तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं॥ १॥
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥
binu bhaṃjehum̐ bhava dhanuṣu bisālā| melihi sīya rāma ura mālā||
asa bicāri gavanahu ghara bhāī| jasu pratāpu balu teju gavām̐ī||
Meaning [इधर उनके रूपको देखकर सबके मनमें यह निश्चय हो गया कि] शिवजीके विशाल धनुषको [जो सम्भव है न टूट सके] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके ही गलेमें जयमाल डालेंगी ( अर्थात् दोनों तरहसे ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजीके हाथ रहेगी)। [यों सोचकर वे कहने लगे-] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने- अपने घर चलो॥ २॥
बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥
bihase apara bhūpa suni bānī| je abibeka aṃdha abhimānī||
torehum̐ dhanuṣu byāhu avagāhā| binu toreṃ ko kuam̐ri biāhā||
Meaning दूसरे राजा, जो अविवेकसे अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे। [ उन्होंने कहा--] धनुष तोड़नेपर भी विवाह होना कठिन है (अर्थात् सहजहीमें हम जानकीको हाथसे जाने नहीं देंगे), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारीको ब्याह ही कौन सकता है॥ ३॥
एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥
eka bāra kālau kina hoū| siya hita samara jitaba hama soū||
yaha suni avara mahipa musakāne| dharamasīla haribhagata sayāne||
Meaning काल ही क्यों न हो, एक बार तो सीताके लिये उसे भी हम युद्धमें जीत लेंगे। यह घमण्डकी बात सुनकर दूसरे राजा, जो धर्मात्मा, हरिभक्त और सयाने थे, मुसकराये॥ ४॥
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥ २४५॥
sīya biāhabi rāma garaba dūri kari nṛpanha ke|
jīti ko saka saṃgrāma dasaratha ke rana bām̐kure|| 245||
Meaning [ उन्होंने कहा-- ] राजाओंके गर्व दूर करके (जो धनुष किसीसे नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर) श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको ब्याहेंगे। [रही युद्धकी बात, सो ] महाराज दशरथके रणमें बाँके पुत्रोंको युद्धमें तो जीत ही कौन सकता है॥ २४५॥
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥
byartha marahu jani gāla bajāī| mana modakanhi ki bhūkha butāī||
sikha hamāri suni parama punītā| jagadaṃbā jānahu jiyam̐ sītā||
Meaning गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो। मनके लड्डुओंसे भी कहीं भूख बुझती है ? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीखको सुनकर सीताजीको अपने जीमें साक्षात् जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नीरूपमें पानेकी आशा एवं लालसा छोड़ दो),॥ १॥
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥
jagata pitā raghupatihi bicārī| bhari locana chabi lehu nihārī||
suṃdara sukhada sakala guna rāsī| e dou baṃdhu saṃbhu ura bāsī||
Meaning और श्रीरघुनाथजीको जगत्का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा]। सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणोंकी राशि ये दोनों भाई शिवजीके हृदयमें बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदयमें छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रोंके सामने आ गये हैं)॥ २॥
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥
sudhā samudra samīpa bihāī| mṛgajalu nirakhi marahu kata dhāī||
karahu jāi jā kahum̐ joī bhāvā| hama tau āju janama phalu pāvā||
Meaning समीप आये हुए ( भगवददर्शनरूप) अमृतके समुद्रको छोड़कर तुम [जगज्जननी जानकीको पत्नीरूपमें पानेकी दुराशारूप मिथ्या] मृगजलको देखकर दौड़कर क्यों मरते हो ? फिर [ भाई! ] जिसको जो अच्छा लगे वही जाकर करो। हमने तो [ श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन करके ] आज जन्म लेनेका फल पा लिया (जीवन और जन्मको सफल कर लिया)॥ ३॥
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥
asa kahi bhale bhūpa anurāge| rūpa anūpa bilokana lāge||
dekhahiṃ sura nabha caṛhe bimānā| baraṣahiṃ sumana karahiṃ kala gānā||
Meaning ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेममग्र होकर श्रीरामजीका अनुपम रूप देखने लगे। [मनुष्योंकी तो बात ही क्या] देवता लोग भी आकाशसे विमानोंपर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुन्दर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं॥ ४॥
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं॥ २४६॥
jāni suavasaru sīya taba paṭhaī janaka bolāī|
catura sakhīṃ suṃdara sakala sādara calīṃ lavāīṃ|| 246||
Meaning तब सुअवसर जानकर जनकजीने सीताजीको बुला भेजा। सब चतुर और सुन्दर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें लिवा चलीं॥ २४६॥
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥
उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥
siya sobhā nahiṃ jāi bakhānī| jagadaṃbikā rūpa guna khānī||
upamā sakala mohi laghu lāgīṃ| prākṛta nāri aṃga anurāgīṃ||
Meaning रूप और गुणोंकी खान जगज्जननी जानकीजीकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिये मुझे [काव्यकी] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियोंके अंगोंसे अनुराग रखनेवाली हैं ( अर्थात् वे जगत्की स्त्रियोंके अंगोंको दी जाती हैं )। [ काव्यकी उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजीके अप्राकृत, चिन्मय अंगोंके लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपनेको उपहासास्पद बनाना है]॥ १॥
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई॥
जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया॥
siya barania tei upamā deī| kukabi kahāi ajasu ko leī||
jau paṭataria tīya sama sīyā| jaga asi jubati kahām̐ kamanīyā||
Meaning सीताजीके वर्णनमें उन्हीं उपमाओंको देकर कौन कुकवि कहलाये और अपयशका भागी बने ( अर्थात् सीताजीके लिये उन उपमाओंका प्रयोग करना सुकविके पदसे च्युत होना और अपकाीर्ति मोल लेना है, कोई भी सुकवि ऐसी नादानी एवं अनुचित कार्य नहीं करेगा।) यदि किसी स्त्रीके साथ सीताजीकी तुलना की जाय तो जगतमें ऐसी सुन्दर युवती है ही कहाँ [जिसकी उपमा उन्हें दी जाय]॥ २॥
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥
girā mukhara tana aradha bhavānī| rati ati dukhita atanu pati jānī||
biṣa bārunī baṃdhu priya jehī| kahia ramāsama kimi baidehī||
Meaning [ पृथ्वीकी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या, देवताओंकी स्त्रियोंको भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें ] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अद्धांगिनी हैं ( अर्थात् अर्द्ध-नारीनटेश्वरके रूपमें उनका आधा ही अंग स्त्रीका है, शेष आधा अंग पुरुष--शिवजीका है), कामदेवकी स्त्री रति पतिको बिना शरीरका (अनंग) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और मद्य-जैसे [ समुद्रसे उत्पन्न होनेके नाते] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मीके समान तो जानकीजीको कहा ही कैसे जाय॥ ३॥
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई।
परम रूपमय कच्छप सोई॥
jau chabi sudhā payonidhi hoī| parama rūpamaya kacchapa soī||
सोभा रजु मंदरु सिंगारू।
मथै पानि पंकज निज मारू॥
sobhā raju maṃdaru siṃgārū| mathai pāni paṃkaja nija mārū||
Meaning [जिन लक्ष्मीजीकी बात ऊपर कही गयी है वे निकली थीं खारे समुद्रसे, जिसको मथनेके लिये भगवानू्ने अति कर्कश पीठवाले कच्छपका रूप धारण किया, रस्सी बनायी गयी महान् विषधर वासुकि नागकी, मथानीका कार्य किया अतिशय कठोर मन्दराचल पर्वतने और उसे मथा सारे देवताओं और दैत्योंने मिलकर। जिन लक्ष्मीको अतिशय शोभाकी खान और अनुपम सुन्दरी कहते हैं, उनको प्रकट करनेमें हेतु बने ये सब असुन्दर एवं स्वाभाविक ही कठोर उपकरण। ऐसे उपकरणोंसे प्रकट हुई लक्ष्मी श्रीजनकीजीकी समताको कैसे पा सकती हैं। हाँ, इसके विपरीत] यदि छबिरूपी अमृतका समुद्र हो, परम रूपमय कच्छप हो, शोभारूप रस्सी हो, श्रंगार [रस] पर्वत हो और [उस छबिके समुद्रको] स्वयं कामदेव अपने ही करकमलसे मथे,॥ ४॥
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल॥ २४७॥
ehi bidhi upajai lacchi jaba suṃdaratā sukha mūla|
tadapi sakoca sameta kabi kahahiṃ sīya samatūla|| 247||
Meaning इस प्रकार (का संयोग होनेसे) जब सुन्दरता और सुखकी मूल लक्ष्मी उत्पन्न हो, तो भी कवि लोग उसे (बहुत) संकोचके साथ सीताजीके समान कहेंगे॥ २४७॥ [जिस सुन्दरताके समुद्रको कामदेव मथेगा वह सुन्दरता भी प्राकृत, लौकिक सुन्दरता ही होगी; क्योंकि कामदेव स्वयं भी त्रिगुणमयी प्रकृतिका ही विकार है। अत: उस सुन्दरताको मथकर प्रकट की हुई लक्ष्मी भी उपर्युक्त लक्ष्मीकी अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर और दिव्य होनेपर भी होगी प्राकृत ही, अत: उसके साथ भी जानकीजीकी तुलना करना कविके लिये बड़े संकोचकी बात होगी। जिस सुन्दरतासे जानकीजीका दिव्यातिदिव्य परम दिव्य विग्रह बना है वह सुन्दरता उपर्युक्त सुन्दरतासे भिन्न अप्राकृत है--वस्तुत: लक्ष्मीजीका आप्राकृत रूप भी यही है। वह कामदेवके मथनेमें नहीं आ सकती और वह जानकीजीका स्वरूप ही है, अत: उनसे भिन्न नहीं, और उपमा दी जाती है भिन्न वस्तुके साथ। इसके अतिरिक्त जानकीजी प्रकट हुई हैं स्वयं अपनी महिमासे, उन्हें प्रकट करनेके लिये किसी भिन्न उपकरणकी अपेक्षा नहीं है। अर्थात् शक्ति शक्तिमानसे अभिन्न, अट्वैत-तत््व है, अतएव अनुपमेय है, यही गूढ़ दार्शनिक तत्त्व भक्तशिरोमणि कविने इस अभूतोपमालड्ारके द्वारा बड़ी सुन्दरतासे व्यक्त किया है।]
चलिं संग लै सखीं सयानी।
गावत गीत मनोहर बानी॥
caliṃ saṃga lai sakhīṃ sayānī| gāvata gīta manohara bānī||
सोह नवल तनु सुंदर सारी।
जगत जननि अतुलित छबि भारी॥
soha navala tanu suṃdara sārī| jagata janani atulita chabi bhārī||
Meaning सयानी सखियाँ सीताजीको साथ लेकर मनोहर वाणीसे गीत गाती हुई चलीं। सीताजीके नवल शरीरपर सुन्दर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननीकी महान् छवि अतुलनीय है॥ १॥
भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥
रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥
bhūṣana sakala sudesa suhāe| aṃga aṃga raci sakhinha banāe||
raṃgabhūmi jaba siya pagu dhārī| dekhi rūpa mohe nara nārī||
Meaning सब आभूषण अपनी-अपनी जगहपर शोभित हैं, जिन्हें सखियोंने अंग-अंगमें भलीभाँति सजाकर पहनाया है। जब सीताजीने रंगभूमिमें पैर रखा, तब उनका [दिव्य] रूप देखकर स्त्री- पुरुष--सभी मोहित हो गये॥ २॥
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई॥
पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥
haraṣi suranha duṃdubhīṃ bajāī| baraṣi prasūna apacharā gāī||
pāni saroja soha jayamālā| avacaṭa citae sakala bhuālā||
Meaning देवताओंने हर्षित होकर नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं। सीताजीके करकमलोंमें जयमाला सुशोभित है। सब राजा चकित होकर अचानक उनकी ओर देखने लगे॥ ३॥
सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥
मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥
sīya cakita cita rāmahi cāhā| bhae mohabasa saba naranāhā||
muni samīpa dekhe dou bhāī| lage lalaki locana nidhi pāī||
Meaning सीताजी चकित चित्तसे श्रीरामजीको देखने लगीं, तब सब राजालोग मोहके वश हो गये। सीताजीने मुनिके पास [बैठे हुए] दोनों भाइयोंको देखा तो उनके नेत्र अपना खजाना पाकर ललचाकर वहीं ( श्रीरामजीमें) जा लगे (स्थिर हो गये)॥ ४॥
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥ २४८॥
gurajana lāja samāju baṛa dekhi sīya sakucāni|
lāgi bilokana sakhinha tana raghubīrahi ura āni|| 248||
Meaning परन्तु गुरुजनोंकी लाजसे तथा बहुत बड़े समाजको देखकर सीताजी सकुचा गयीं। वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें लाकर सखियोंकी ओर देखने लगीं॥ २४८॥
राम रूपु अरु सिय छबि देखें।
नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥
rāma rūpu aru siya chabi dekheṃ| nara nārinha pariharīṃ nimeṣeṃ||
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं।
बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥
socahiṃ sakala kahata sakucāhīṃ| bidhi sana binaya karahiṃ mana māhīṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका रूप और सीताजीकी छवि देखकर स्त्री-पुरुषोंने पलक मारना छोड़ दिया (सब एकटक उन्हींको देखने लगे)। सभी अपने मनमें सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं। मन- ही-मन वे विधातासे विनय करते हैं--॥ १॥
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू॥
haru bidhi begi janaka jaṛatāī| mati hamāri asi dehi suhāī||
binu bicāra panu taji naranāhu| sīya rāma kara karai bibāhū||
Meaning हे विधाता! जनककी मूढ़ताको शीघ्र हर लीजिये और हमारी ही ऐसी सुन्दर बुद्धि उन्हें दीजिये कि जिससे बिना ही विचार किये राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजीका विवाह रामजीसे कर दें॥ २॥
जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू॥
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू॥
jaga bhala kahahi bhāva saba kāhū| haṭha kīnhe aṃtahum̐ ura dāhū||
ehiṃ lālasām̐ magana saba logū| baru sām̐varo jānakī jogū||
Meaning संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसीको अच्छी लगती है। हठ करनेसे अन्तमें भी हृदय जलेगा। सब लोग इसी लालसामें मग्न हो रहे हैं कि जानकीजीके योग्य वर तो यह साँवला ही है॥ ३॥
तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥
taba baṃdījana janaka baulāe| biridāvalī kahata cali āe||
kaha nṛpa jāi kahahu pana morā| cale bhāṭa hiyam̐ haraṣu na thorā||
Meaning तब राजा जनकने बंदीजनों ( भाटों ) को बुलाया। वे विरुदावली (वंशकी कीर्ति) गाते हुए चले आये। राजाने कहा--जाकर मेरा प्रण सबसे कहो। भाट चले, उनके हृदयमें कम आनन्द न था॥ ४॥
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल॥ २४९॥
bole baṃdī bacana bara sunahu sakala mahipāla|
pana bideha kara kahahiṃ hama bhujā uṭhāi bisāla|| 249||
Meaning भाटोंने श्रेष्ठ वचन कहा-- हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले सब राजागण! सुनिये। हम अपनी भुजा उठाकर जनकजीका विशाल प्रण कहते हैं॥ २४९॥
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥
nṛpa bhujabala bidhu sivadhanu rāhū| garua kaṭhora bidita saba kāhū||
rāvanu bānu mahābhaṭa bhāre| dekhi sarāsana gavam̐hiṃ sidhāre||
Meaning राजाओंकी भुजाओंका बल चन्द्रमा है, शिवजीका धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुषको देखकर गाँसे (चुपके- से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूनेतककी हिम्मत न हुई)॥ १॥
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा॥
त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही॥
soi purāri kodaṃḍu kaṭhorā| rāja samāja āju joi torā||
tribhuvana jaya sameta baidehī| binahiṃ bicāra barai haṭhi tehī||
Meaning उसी शिवजीके कठोर धनुषको आज इस राजसमाजमें जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकोंकी विजयके साथ ही उसको जानकीजी बिना किसी विचारके हठपूर्वक वरण करेंगी॥ २॥