सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे॥
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥
suni pana sakala bhūpa abhilāṣe| bhaṭamānī atisaya mana mākhe||
parikara bām̐dhi uṭhe akulāī| cale iṣṭadevanha sira nāī||
Meaning प्रण सुनकर सब राजा ललचा उठे। जो वीरताके अभिमानी थे, वे मनमें बहुत ही तमतमाये। कमर कसकर अकुलाकर उठे और अपने इष्टदेवोंको सिर नवाकर चले॥ ३॥
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥
tamaki tāki taki sivadhanu dharahīṃ| uṭhai na koṭi bhām̐ti balu karahīṃ||
jinha ke kachu bicāru mana māhīṃ| cāpa samīpa mahīpa na jāhīṃ||
Meaning वे तमककर (बड़े तावसे) शिवजीके धनुषकी ओर देखते हैं और फिर निगाह जमाकर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों भाँतिसे जोर लगाते हैं, पर वह उठता ही नहीं। जिन राजाओंके मनमें कुछ विवेक है, वे धनुषके पास ही नहीं जाते॥ ४॥
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥ २५०॥
tamaki dharahiṃ dhanu mūṛha nṛpa uṭhai na calahiṃ lajāi|
manahum̐ pāi bhaṭa bāhubalu adhiku adhiku garuāi|| 250||
Meaning वे मूर्ख राजा तमककर (किटकिटाकर ) धनुषको पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तो लजाकर चले जाते हैं, मानो वीरोंकी भुजाओंका बल पाकर वह धनुष अधिक-अधिक भारी होता जाता है॥ २५०॥
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥
डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥
bhūpa sahasa dasa ekahi bārā| lage uṭhāvana ṭarai na ṭārā||
ḍagai na saṃbhu sarāsana kaiseṃ| kāmī bacana satī manu jaiseṃ||
Meaning तब दस हजार राजा एक ही बार धनुषको उठाने लगे, तो भी वह उनके टाले नहीं टलता। शिवजीका वह धनुष कैसे नहीं डिगता था, जैसे कामी पुरुषके वचनोंसे सतीका मन (कभी) चलायमान नहीं होता॥ १॥
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥
कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥
saba nṛpa bhae jogu upahāsī| jaiseṃ binu birāga saṃnyāsī||
kīrati bijaya bīratā bhārī| cale cāpa kara barabasa hārī||
Meaning सब राजा उपहासके योग्य हो गये। जैसे वैराग्यके बिना संन्यासी उपहासके योग्य हो जाता है। कीर्ति, विजय, बड़ी वीरता--इन सबको वे धनुषके हाथों बरबस हारकर चले गये॥ २॥
श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥
śrīhata bhae hāri hiyam̐ rājā| baiṭhe nija nija jāi samājā||
nṛpanha biloki janaku akulāne| bole bacana roṣa janu sāne||
Meaning राजालोग हृदयसे. हारकर श्रीहीन (हतप्रभ) हो गये और अपने-अपने समाजमें जा बेठे। राजाओंको (असफल) देखकर जनक अकुला उठे और ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोधमें सने हुए थे॥ ३॥
दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना॥
देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा॥
dīpa dīpa ke bhūpati nānā| āe suni hama jo panu ṭhānā||
deva danuja dhari manuja sarīrā| bipula bīra āe ranadhīrā||
Meaning मैंने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीपके अनेकों राजा आये। देवता और दैत्य भी मनुष्यका शरीर धारण करके आये तथा और भी बहुत-से रणधीर वीर आये॥ ४॥
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय॥ २५१॥
kuam̐ri manohara bijaya baṛi kīrati ati kamanīya|
pāvanihāra biraṃci janu raceu na dhanu damanīya|| 251||
Meaning परन्तु धनुषको तोड़कर मनोहर कन्या, बड़ी विजय और अत्यन्त सुन्दर कीर्तिको पानेवाला मानो ब्रह्माने किसीको रचा ही नहीं॥ २५१॥
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥
kahahu kāhi yahu lābhu na bhāvā| kāhum̐ na saṃkara cāpa caṛhāvā||
rahau caṛhāuba toraba bhāī| tilu bhari bhūmi na sake chaṛāī||
Meaning कहिये, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता। परन्तु किसीने भी शड्रजीका धनुष नहीं चढ़ाया। अरे भाई! चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा, कोई तिलभर भूमि भी छुड़ा न सका॥ १॥
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥
aba jani kou mākhai bhaṭa mānī| bīra bihīna mahī maiṃ jānī||
tajahu āsa nija nija gṛha jāhū| likhā na bidhi baidehi bibāhū||
Meaning अब कोई वीरताका अभिमानी नाराज न हो। मैंने जान लिया, पृथ्वी वीरोंसे खाली हो गयी। अब आशा छोड़कर अपने-अपने घर जाओ; ब्रह्माने सीताका विवाह लिखा ही नहीं॥ २॥
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥
sukṛta jāi jauṃ panu pariharaūm̐| kuam̐ri kuāri rahau kā karaūm̐||
jo janateum̐ binu bhaṭa bhubi bhāī| tau panu kari hoteum̐ na ham̐sāī||
Meaning यदि प्रण छोड़ता हूँ तो पुण्य जाता है; इसलिये क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरोंसे शून्य है, तो प्रण करके उपहासका पात्र न बनता॥ ३॥
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥
janaka bacana suni saba nara nārī| dekhi jānakihi bhae dukhārī||
mākhe lakhanu kuṭila bhaim̐ bhauṃheṃ| radapaṭa pharakata nayana risauṃheṃ||
Meaning जनकके वचन सुनकर सभी स्त्री-पुरुष जानकीजीकी ओर देखकर दु:खी हुए, परन्तु लक्ष्मणजी तमतमा उठे, उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, ओठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोधसे लाल हो गये॥ ४॥
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ २५२॥
kahi na sakata raghubīra ḍara lage bacana janu bāna|
nāi rāma pada kamala siru bole girā pramāna|| 252||
Meaning श्रीरघुवीरजीके डरसे कुछ कह तो सकते नहीं, पर जनकके वचन उन्हें बाण-से लगे। [जब न रह सके तब] श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वे यथार्थ वचन बोले--॥ २५२॥
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी॥
raghubaṃsinha mahum̐ jaham̐ kou hoī| tehiṃ samāja asa kahai na koī||
kahī janaka jasi anucita bānī| bidyamāna raghukula mani jānī||
Meaning रघुवंशियोंमें कोई भी जहाँ होता है, उस समाजमें ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीको उपस्थित जानते हुए भी जनकजीने कहे हैं॥ १॥
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥
sunahu bhānukula paṃkaja bhānū| kahaum̐ subhāu na kachu abhimānū||
jau tumhāri anusāsana pāvauṃ| kaṃduka iva brahmāṃḍa uṭhāvauṃ||
Meaning हे सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य! सुनिये, मैं स्वभावहीसे कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं, यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्डको गेंदकी तरह उठा लूँ॥ २॥
काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥
kāce ghaṭa jimi ḍārauṃ phorī| sakaum̐ meru mūlaka jimi torī||
tava pratāpa mahimā bhagavānā| ko bāpuro pināka purānā||
Meaning और उसे कच्चे घड़ेकी तरह फोड़ डालूँ। मैं सुमेरु पर्वतको मूलीकी तरह तोड़ सकता हूँ, हे भगवन् ! आपके प्रतापकी महिमासे यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है॥ ३॥
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं॥
nātha jāni asa āyasu hoū| kautuku karauṃ bilokia soū||
kamala nāla jimi cāpha caṛhāvauṃ| jojana sata pramāna lai dhāvauṃ||
Meaning ऐसा जानकर हे नाथ! आज्ञा हो तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिये। धनुषको कमलकी डंडीकी तरह चढ़ाकर उसे सौ योजनतक दौड़ा लिये चला जाऊँ॥ ४॥
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ॥ २५३॥
torauṃ chatraka daṃḍa jimi tava pratāpa bala nātha|
jauṃ na karauṃ prabhu pada sapatha kara na dharauṃ dhanu bhātha|| 253||
Meaning हे नाथ! आपके प्रतापके बलसे धनुषको कुकुरमुत्ते ( बरसाती छत्ते) की तरह तोड़ दूँ। यदि ऐसा न करूँ तो प्रभुके चरणोंकी शपथ है, फिर मैं धनुष और तरकसको कभी हाथमें भी न लूँगा॥ २५३॥
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥
सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥
lakhana sakopa bacana je bole| ḍagamagāni mahi diggaja ḍole||
sakala loka saba bhūpa ḍerāne| siya hiyam̐ haraṣu janaku sakucāne||
Meaning ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोधभरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओंके हाथी काँप गये। सभी लोग और सब राजा डर गये। सीताजीके हदयमें हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गये॥ १॥
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥
gura raghupati saba muni mana māhīṃ| mudita bhae puni puni pulakāhīṃ||
sayanahiṃ raghupati lakhanu nevāre| prema sameta nikaṭa baiṭhāre||
Meaning गुरु विश्वामित्रजी, श्रीरघुनाथजी और सब मुनि मनमें प्रसन्न हुए और बार-बार पुलकित होने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने इशारेसे लक्ष्मणको मना किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया॥ २॥
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥
bisvāmitra samaya subha jānī| bole ati sanehamaya bānī||
uṭhahu rāma bhaṃjahu bhavacāpā| meṭahu tāta janaka paritāpā||
Meaning विश्वामित्रजी शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले--हे राम! उठो, शिवजीका धनुष तोड़ो और हे तात! जनकका सन्ताप मिटाओ॥ ३॥
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥
suni guru bacana carana siru nāvā| haraṣu biṣādu na kachu ura āvā||
ṭhāṛhe bhae uṭhi sahaja subhāem̐| ṭhavani jubā mṛgarāju lajāem̐||
Meaning गुरुके वचन सुनकर श्रीरामजीने चरणोंमें सिर नवाया। उनके मनमें न हर्ष हुआ, न विषाद; और वे अपनी ऐंड (खड़े होनेकी शान) से जवान सिंहको भी लजाते हुए सहज स्वभावसे ही उठ खडे हुए॥ ४॥
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥ २५४॥
udita udayagiri maṃca para raghubara bālapataṃga|
bikase saṃta saroja saba haraṣe locana bhṛṃga|| 254||
Meaning मज्जरूपी उदयाचलपर रघुनाथजीरूपी बालसूर्यके उदय होते ही सब संतरूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भौरे हर्षित हो गये॥ २५४॥
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥
nṛpanha keri āsā nisi nāsī| bacana nakhata avalī na prakāsī||
mānī mahipa kumuda sakucāne| kapaṭī bhūpa ulūka lukāne||
Meaning राजाओंकी आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। उनके वचनरूपी तारोंके समूहका चमकना बंद हो गया (वे मौन हो गये)। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये॥ १॥
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥
bhae bisoka koka muni devā| barisahiṃ sumana janāvahiṃ sevā||
gura pada baṃdi sahita anurāgā| rāma muninha sana āyasu māgā||
Meaning मुनि और देवतारूपी चकवे शोकरहित हो गये। वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं। प्रेमसहित गुरुके चरणोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे आज्ञा माँगी॥ २॥
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥
sahajahiṃ cale sakala jaga svāmī| matta maṃju bara kuṃjara gāmī||
calata rāma saba pura nara nārī| pulaka pūri tana bhae sukhārī||
Meaning समस्त जगत्के स्वामी श्रीरामजी सुन्दर मतवाले श्रेष्ठ हाथीकी-सी चालसे स्वाभाविक ही चले। श्रीरामचन्द्रजीके चलते ही नगरभरके सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गये और उनके शरीर रोमाझ्से भर गये॥ ३॥
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं॥
baṃdi pitara sura sukṛta sam̐bhāre| jauṃ kachu punya prabhāu hamāre||
tau sivadhanu mṛnāla kī nāīṃ| torahum̐ rāma ganesa gosāīṃ||
Meaning उन्होंने पितर और देवताओंकी वन्दना करके अपने पुण्योंका स्मरण किया। यदि हमारे पुण्योंका कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको कमलकी डंडीकी भाँति तोड़ डालें॥ ४॥
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ॥ २५५॥
rāmahi prema sameta lakhi sakhinha samīpa bolāi|
sītā mātu saneha basa bacana kahai bilakhāi|| 255||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीको [ वात्सल्य] प्रेमके साथ देखकर और सखियोंको समीप बुलाकर सीताजीकी माता स्नेहवश विलखकर (विलाप करती हुई-सी) ये वचन बोलीं--॥ २५५॥
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे॥
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥
sakhi saba kautuka dekhanihāre| jeṭha kahāvata hitū hamāre||
kou na bujhāi kahai gura pāhīṃ| e bālaka asi haṭha bhali nāhīṃ||
Meaning हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं। कोई भी [इनके] गुरु विश्वामित्रजीको समझाकर नहीं कहता कि ये (रामजी) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरोंके हिलाये न हिल सका, उसे तोड़नेके लिये मुनि विश्वामित्रजीका रामजीको आज्ञा देना और रामजीका उसे तोड़नेके लिये चल देना रानीको हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विशधवामित्रजीको कोई समझाता भी नहीं।]॥ १॥
रावन बान छुआ नहिं चापा।
हारे सकल भूप करि दापा॥
rāvana bāna chuā nahiṃ cāpā| hāre sakala bhūpa kari dāpā||
सो धनु राजकुअँर कर देहीं।
बाल मराल कि मंदर लेहीं॥
so dhanu rājakuam̐ra kara dehīṃ| bāla marāla ki maṃdara lehīṃ||
Meaning रावण और बाणासुरने जिस धनुषको छुआतक नहीं और सब राजा घमंड करके हार गये, वही धनुष इस सुकुमार राजकुमारके हाथमें दे रहे हैं। हंसके बच्चे भी कहीं मन्दराचल पहाड़ उठा सकते हैं ?॥ २॥
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥
bhūpa sayānapa sakala sirānī| sakhi bidhi gati kachu jāti na jānī||
bolī catura sakhī mṛdu bānī| tejavaṃta laghu gania na rānī||
Meaning [ और तो कोई समझाकर कहे या नहीं, राजा तो बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरुको समझानेकी चेष्टा करनी चाहिये थी, परन्तु मालूम होता है] राजाका भी सारा सयानापन समास हो गया। हे सखी! विधाताकी गति कुछ जाननेमें नहीं आती [यों कहकर रानी चुप हो रहीं॥ तब एक चतुर (रामजीके महत्त्वको जाननेवाली ) सखी कोमल वाणीसे बोली--हे रानी! तेजवान्को [ देखनेमें छोटा होनेपर भी] छोटा नहीं गिनना चाहिये॥ ३॥
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥
kaham̐ kuṃbhaja kaham̐ siṃdhu apārā| soṣeu sujasu sakala saṃsārā||
rabi maṃḍala dekhata laghu lāgā| udayam̐ tāsu tibhuvana tama bhāgā||
Meaning कहाँ घड़ेसे उत्पन्न होनेवाले [छोटे-से] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र ? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसारमें छाया हुआ है। सूर्यमण्डल देखनेमें छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकोंका अन्धकार भाग जाता है॥ ४॥
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥ २५६॥
maṃtra parama laghu jāsu basa bidhi hari hara sura sarba|
mahāmatta gajarāja kahum̐ basa kara aṃkusa kharba|| 256||
Meaning जिसके वशभमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है। महान् मतवाले गजराजको छोटा-सा अंकुश वशमें कर लेता है॥ २५६॥
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥
देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी॥
kāma kusuma dhanu sāyaka līnhe| sakala bhuvana apane basa kīnhe||
debi tajia saṃsau asa jānī| bhaṃjaba dhanuṣa rāmu sunu rānī||
Meaning कामदेवने फूलोंका ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकोंको अपने वशमें कर रखा है। हे देवी ! ऐसा जानकर सन्देह त्याग दीजिये। हे रानी! सुनिये, रामचन्द्रजी धनुषको अवश्य ही तोड़ेंगे॥ १॥
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥
sakhī bacana suni bhai paratītī| miṭā biṣādu baṛhī ati prītī||
taba rāmahi biloki baidehī| sabhaya hṛdayam̐ binavati jehi tehī||
Meaning सखीके वचन सुनकर रानीको [ श्रीरामजीके सामर्थ्यके सम्बन्धमें। विश्वास हो गया। उनकी उदासी मिट गयी और श्रीरामजीके प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उस समय श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सीताजी भयभीत हृदयसे जिस-तिस [देवता] से विनती कर रही हैं॥ २॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥
manahīṃ mana manāva akulānī| hohu prasanna mahesa bhavānī||
karahu saphala āpani sevakāī| kari hitu harahu cāpa garuāī||
Meaning वे व्याकुल होकर मन-ही-मन मना रही हैं--हे महेश-भवानी! मुझपर प्रसन्न होइये, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिये और मुझपर स्नेह करके धनुषके भारीपनको हर लीजिये॥ ३॥
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥
gananāyaka baradāyaka devā| āju lageṃ kīnhium̐ tua sevā||
bāra bāra binatī suni morī| karahu cāpa gurutā ati thorī||
Meaning हे गणोंके नायक, वर देनेवाले देवता गणेशजी! मैंने आजहीके लिये तुम्हारी सेवा की थी। बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुषका भारीपन बहुत ही कम कर दीजिये॥ ४॥
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥ २५७॥
dekhi dekhi raghubīra tana sura manāva dhari dhīra|
bhare bilocana prema jala pulakāvalī sarīra|| 257||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी ओर देख-देखकर सीताजी धीरज धरकर देवताओंको मना रही हैं। उनके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भरे हैं और शरीरमें रोमाज्च हो रहा है॥ २५७॥
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥
nīkeṃ nirakhi nayana bhari sobhā| pitu panu sumiri bahuri manu chobhā||
ahaha tāta dāruni haṭha ṭhānī| samujhata nahiṃ kachu lābhu na hānī||
Meaning अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजीकी शोभा देखकर, फिर पिताके प्रणका स्मरण करके सीताजीका मन क्षुब्ध हो उठा। [वे मन-ही-मन कहने लगीं--] अहो! पिताजीने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं॥ १॥
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥
saciva sabhaya sikha dei na koī| budha samāja baṛa anucita hoī||
kaham̐ dhanu kulisahu cāhi kaṭhorā| kaham̐ syāmala mṛdugāta kisorā||
Meaning मन्त्री डर रहे हैं; इसलिये कोई उन्हें सीख भी नहीं देता, पण्डितोंकी सभामें यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ तो वज्रसे भी बढ़कर कठोर धनुष और कहाँ ये कोमलशरीर किशोर श्यामसुन्दर !॥ २॥
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥
bidhi kehi bhām̐ti dharauṃ ura dhīrā| sirasa sumana kana bedhia hīrā||
sakala sabhā kai mati bhai bhorī| aba mohi saṃbhucāpa gati torī||
Meaning हे विधाता! मैं हृदयमें किस तरह धीरज धरूँ, सिरसके फूलके कणसे कहीं हीरा छेदा जाता है। सारी सभाकी बुद्धि भोली (बावली) हो गयी है, अत: हे शिवजीके धनुष! अब तो मुझे तुम्हारा ही आसरा है॥ ३॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥
अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं॥
nija jaṛatā loganha para ḍārī| hohi harua raghupatihi nihārī||
ati paritāpa sīya mana māhī| lava nimeṣa juga saba saya jāhīṃ||
Meaning तुम अपनी जड़ता लोगोंपर डालकर, श्रीरघुनाथजी [ के सुकुमार शरीर] को देखकर [उतने ही] हलके हो जाओ। इस प्रकार सीताजीके मनमें बड़ा ही सन्ताप हो रहा है। निमेषका एक लव (अंश) भी सौ युगोंके समान बीत रहा है॥ ४॥
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल॥ २५८॥
prabhuhi citai puni citava mahi rājata locana lola|
khelata manasija mīna juga janu bidhu maṃḍala ḍola|| 258||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखकर फिर पृथ्वीकी ओर देखती हुई सीताजीके चद्नल नेत्र इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो चन्द्रमण्डलरूपी डोलमें कामदेवकी दो मछलियाँ खेल रही हों॥ २५८॥
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना॥
girā alini mukha paṃkaja rokī| pragaṭa na lāja nisā avalokī||
locana jalu raha locana konā| jaise parama kṛpana kara sonā||
Meaning सीताजीकी वाणीरूपी श्रमरीको उनके मुखरूपी कमलने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रिको देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रोंका जल नेत्रोंके कोने (कोये) में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूसका सोना कोनेमें ही गड़ा रह जाता है॥ १॥
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥
sakucī byākulatā baṛi jānī| dhari dhīraju pratīti ura ānī||
tana mana bacana mora panu sācā| raghupati pada saroja citu rācā||
Meaning अपनी बढ़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदयमें विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचनसे मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंगें मेरा चित्त वास्तवमें अनुरक्त है,॥ २॥
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै दासी॥
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू॥
tau bhagavānu sakala ura bāsī| karihiṃ mohi raghubara kai dāsī||
jehi keṃ jehi para satya sanehū| so tehi milai na kachu saṃhehū||
Meaning तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे। जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥ ३॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे॥
prabhu tana citai prema tana ṭhānā| kṛpānidhāna rāma sabu jānā||
siyahi biloki takeu dhanu kaise| citava garuru laghu byālahi jaise||
Meaning प्रभुकी ओर देखकर सीताजीने शरीरके द्वारा प्रेम ठान लिया (अर्थात् यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हींका होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं )। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजीको देखकर धनुषकी ओर कैसे ताका, जैसे गरुड़जी छोटे-से साँपकी ओर देखते हैं॥ ४॥
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।
पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥
lakhana lakheu raghubaṃsamani tākeu hara kodaṃḍu|
pulaki gāta bole bacana carana cāpi brahmāṃḍu||
Meaning इधर जब लक्ष्मणजीने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीके धनुषकी ओर ताका है, तो वे शरीरसे पुलकित हो ब्रह्माप्डको चरणोंसे दबाकर निम्नलिखित वचन बोले--॥ २५९॥
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥
रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥
disakuṃjarahu kamaṭha ahi kolā| dharahu dharani dhari dhīra na ḍolā||
rāmu cahahiṃ saṃkara dhanu torā| hohu sajaga suni āyasu morā||
Meaning हे दिग्गजो ! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह ! धीरज धरकर पृथ्वीको थामे रहो, जिसमें यह हिलने न पावे। श्रीरामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ॥ १॥
चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥
cāpa sapīpa rāmu jaba āe| nara nārinha sura sukṛta manāe||
saba kara saṃsau aru agyānū| maṃda mahīpanha kara abhimānū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी जब धनुषके समीप आये, तब सब स्त्री-पुरुषोंने देवताओं और पुण्योंको मनाया। सबका सन्देह और अज्ञान, नीच राजाओंका अभिमान,॥ २॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥
bhṛgupati keri garaba garuāī| sura munibaranha keri kadarāī||
siya kara socu janaka pachitāvā| rāninha kara dāruna dukha dāvā||
Meaning परशुरामजीके गर्वकी गुरुता, देवता और श्रेष्ठ मुनियोंकी कातरता (भय), सीताजीका सोच, जनकका पश्चात्ताप और रानियोंके दारुण दुःखका दावानल,॥ ३॥
संभुचाप बड बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ कड़हारू॥
saṃbhucāpa baḍa bohitu pāī| caḍhe jāi saba saṃgu banāī||
rāma bāhubala siṃdhu apārū| cahata pāru nahi kou kaṛahārū||
Meaning ये सब शिवजीके धनुषरूपी बड़े जहाजको पाकर, समाज बनाकर उसपर जा चढ़े। ये श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलरूपी अपार समुद्रके पार जाना चाहते हैं; परन्तु कोई केवट नहीं है॥ ४॥
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥ २६०॥
rāma biloke loga saba citra likhe se dekhi|
citaī sīya kṛpāyatana jānī bikala biseṣi|| 260||
Meaning श्रीरामजीने सब लोगोंकी ओर देखा और उन्हें चित्रमें लिखे हुए-से देखकर फिर कृपाधाम श्रीरामजीने सीताजीकी ओर देखा और उन्हें विशेष व्याकुल जाना॥ २६०॥
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥
dekhī bipula bikala baidehī| nimiṣa bihāta kalapa sama tehī||
tṛṣita bāri binu jo tanu tyāgā| muem̐ karai kā sudhā taṛāgā||
Meaning उन्होंने जानकीजीको बहुत ही विकल देखा। उनका एक-एक क्षण कल्पके समान बीत रहा था। यदि प्यासा आदमी पानीके बिना शरीर छोड़ दे, तो उसके मर जानेपर अमृतका तालाब भी क्या करेगा ?॥ १॥
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥
अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥
kā baraṣā saba kṛṣī sukhāneṃ| samaya cukeṃ puni kā pachitāneṃ||
asa jiyam̐ jāni jānakī dekhī| prabhu pulake lakhi prīti biseṣī||
Meaning सारी खेतीके सूख जानेपर वर्षा किस कामकी ? समय बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या लाभ ? जीमें ऐसा समझकर श्रीरामजीने जानकीजीकी ओर देखा और उनका विशेष प्रेम लखकर वे पुलकित हो गये॥ २॥
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥
gurahi pranāmu manahi mana kīnhā| ati lāghavam̐ uṭhāi dhanu līnhā||
damakeu dāmini jimi jaba layaū| puni nabha dhanu maṃḍala sama bhayaū||
Meaning मन-ही-मन उन्होंने गुरुको प्रणाम किया और बड़ी फुर्तीसे धनुषको उठा लिया। जब उसे [ हाथमें ] लिया, तब वह धनुष बिजलीकी तरह चमका और फिर आकाशमें मण्डल-जैसा (मण्डलाकार) हो गया॥ ३॥
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥
leta caṛhāvata khaiṃcata gāṛheṃ| kāhum̐ na lakhā dekha sabu ṭhāṛheṃ||
tehi chana rāma madhya dhanu torā| bhare bhuvana dhuni ghora kaṭhorā||
Meaning लेते, चढ़ाते और जोरसे खींचते हुए किसीने नहीं लखा (अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्तीसे हुए कि धनुषको कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसीको पता नहीं लगा); सबने श्रीरामजीको [ धनुष खींचे] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजीने धनुषको बीचसे तोड़ डाला। भयड्र कठोर ध्वनिसे [सब] लोक भर गये॥ ४॥
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेड राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥
bhare bhuvana ghora kaṭhora rava rabi bāji taji māragu cale|
cikkarahiṃ diggaja ḍola mahi ahi kola kūruma kalamale||
sura asura muni kara kāna dīnheṃ sakala bikala bicārahīṃ|
kodaṃḍa khaṃḍeḍa rāma tulasī jayati bacana ucārahīṃ||
Meaning घोर, कठोर शब्दसे [सब] लोक भर गये, सूर्यके घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिग्गज चिग्घाड़ने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, राक्षस और मुनि कानोंपर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, जब [सबको निश्चय हो गया कि] श्रीरामजीने धनुषको तोड़ डाला, तब सब ' श्रीरामचन्द्रजीकी जय' बोलने लगे।
संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।
बरूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥ २६१॥
saṃkara cāpu jahāju sāgaru raghubara bāhubalu|
barūṛa so sakala samāju caṛhā jo prathamahiṃ moha basa|| 261||
Meaning शिवजीका धनुष जहाज है और श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंका बल समुद्र है। [ धनुष टूटनेसे ] वह सारा समाज डूब गया, जो मोहवश पहले इस जहाजपर चढ़ा था [जिसका वर्णन ऊपर आया है]॥ २६१॥
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥
कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥
prabhu dou cāpakhaṃḍa mahi ḍāre| dekhi loga saba bhae sukhāre||
kosikarupa payonidhi pāvana| prema bāri avagāhu suhāvana||
Meaning प्रभुने धनुषके दोनों टुकड़े पृथ्वीपर डाल दिये। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्ररूपी पवित्र समुद्रमें, जिसमें प्रेमरूपी सुन्दर अथाह जल भरा है,॥ १॥
रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी॥
बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना॥
rāmarūpa rākesu nihārī| baṛhata bīci pulakāvali bhārī||
bāje nabha gahagahe nisānā| devabadhū nācahiṃ kari gānā||
Meaning रामरूपी पूर्णचन्द्रको देखकर पुलकावलीरूपी भारी लहरें बढ़ने लगीं। आकाशमें बड़े जोरसे नगाड़े बजने लगे और देवाज़नाएँ गान करके नाचने लगीं॥ २॥
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा॥
बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला॥
brahmādika sura siddha munīsā| prabhuhi prasaṃsahi dehiṃ asīsā||
barisahiṃ sumana raṃga bahu mālā| gāvahiṃ kiṃnara gīta rasālā||
Meaning ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वरलोग प्रभुकी प्रशंसा कर रहे हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं। वे रंग-बिरंगे फूल और मालाएँ बरसा रहे हैं। किन्ननलोग रसीले गीत गा रहे हैं॥ ३॥
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥
rahī bhuvana bhari jaya jaya bānī| dhanuṣabhaṃga dhuni jāta na jānī||
mudita kahahiṃ jaham̐ taham̐ nara nārī| bhaṃjeu rāma saṃbhudhanu bhārī||
Meaning सारे ब्रह्माण्डमें जय-जयकारकी ध्वनि छा गयी, जिसमें धनुष टूटनेकी ध्वनि जान ही नहीं पड़ती। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीके भारी धनुषको तोड़ डाला॥ ४॥
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर॥ २६२॥
baṃdī māgadha sūtagana biruda badahiṃ matidhīra|
karahiṃ nichāvari loga saba haya gaya dhana mani cīra|| 262||
Meaning धीर बुद्धिवाले, भाट, मागध और सूतलोग विरुदावली (कीर्ति) का बखान कर रहे हैं। सब लोग घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र निछावर कर रहे हैं॥ २६२॥
झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥
बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥
jhām̐jhi mṛdaṃga saṃkha sahanāī| bheri ḍhola duṃdubhī suhāī||
bājahiṃ bahu bājane suhāe| jaham̐ taham̐ jubatinha maṃgala gāe||
Meaning झाँझ, मृदंग, श्ध, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने नगाड़े आदि बहुत प्रकारके सुन्दर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मज़लगीत गा रही हैं॥ १॥
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई॥
sakhinha sahita haraṣī ati rānī| sūkhata dhāna parā janu pānī||
janaka laheu sukhu socu bihāī| pairata thakeṃ thāha janu pāī||
Meaning सखियोंसहित रानी अत्यन्त हर्षित हुई। मानो सूखते हुए धानपर पानी पड़ गया हो। जनकजीने सोच त्यागकर सुख प्राप्त किया। मानो तैरते-तैरते थके हुए पुरुषने थाह पा ली हो॥ २॥
श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥
सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥
śrīhata bhae bhūpa dhanu ṭūṭe| jaiseṃ divasa dīpa chabi chūṭe||
sīya sukhahi barania kehi bhām̐tī| janu cātakī pāi jalu svātī||
Meaning धनुष टूट जानेपर राजालोग ऐसे श्रीहीन (निस्तेज) हो गये, जैसे दिनमें दीपककी शोभा जाती रहती है। सीताजीका सुख किस प्रकार वर्णन किया जाय; जैसे चातकी स्वातीका जल पा गयी हो॥ ३॥
रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें॥
सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥
rāmahi lakhanu bilokata kaiseṃ| sasihi cakora kisoraku jaiseṃ||
satānaṃda taba āyasu dīnhā| sītām̐ gamanu rāma pahiṃ kīnhā||
Meaning श्रीरामजीको लक्ष्मणजी किस प्रकार देख रहे हैं, जैसे चन्द्रमाको चकोरका बच्चा देख रहा हो। तब शतानन्दजीने आज्ञा दी और सीताजीने श्रीरामजीके पास गमन किया॥ ४॥
संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार॥ २६ ३
saṃga sakhīṃ sudaṃra catura gāvahiṃ maṃgalacāra|
gavanī bāla marāla gati suṣamā aṃga apāra|| 26 3
Meaning साथपमें सुन्दर चतुर सखियाँ मज़लाचारके गीत गा रही हैं; सीताजी बालहंसिनीकी चालसे चलीं। उनके अड्डोंगें अपार शोभा है॥ २६३॥
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥
कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥
sakhinha madhya siya sohati kaise| chabigana madhya mahāchabi jaiseṃ||
kara saroja jayamāla suhāī| bisva bijaya sobhā jehiṃ chāī||
Meaning सखियोंके बीचमें सीताजी कैसी शोभित हो रही हैं; जैसे बहुत-सी छबियोंके बीचमें महाछबि हो। करकमलमें सुन्दर जयमाला है, जिसमें विश्वविजयकी शोभा छायी हुई है॥ १॥
तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी॥
tana sakocu mana parama uchāhū| gūṛha premu lakhi parai na kāhū||
jāi samīpa rāma chabi dekhī| rahi janu kum̐ari citra avarekhī||
Meaning सीताजीके शरीरमें संकोच है, पर मनमें परम उत्साह है। उनका यह गुप्त प्रेम किसीको जान नहीं पड़ रहा है। समीप जाकर, श्रीरामजीकी शोभा देखकर राजकुमारी सीताजी चित्रमें लिखी- सी रह गयीं॥ २॥
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥
सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥
catura sakhīṃ lakhi kahā bujhāī| pahirāvahu jayamāla suhāī||
sunata jugala kara māla uṭhāī| prema bibasa pahirāi na jāī||
Meaning चतुर सखीने यह दशा देखकर समझाकर कहा--सुहावनी जयमाला पहनाओ। यह सुनकर सीताजीने दोनों हाथोंसे माला उठायी, पर प्रेमके विवश होनेसे पहनायी नहीं जाती॥ ३॥
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥
sohata janu juga jalaja sanālā| sasihi sabhīta deta jayamālā||
gāvahiṃ chabi avaloki sahelī| siyam̐ jayamāla rāma ura melī||
Meaning [उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं] मानो डंडियोंसहित दो कमल चन्द्रमाको डरते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छबिको देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजीने श्रीरामजीके गलेमें जयमाला पहना दी॥ ४॥
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥ २६४॥
raghubara ura jayamāla dekhi deva barisahiṃ sumana|
sakuce sakala bhuāla janu biloki rabi kumudagana|| 264||
Meaning श्रीरघुनाथजीके हृदयपर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। समस्त राजागण इस प्रकार सकुचा गये मानो सूर्यको देखकर कुमुदोंका समूह सिकुड़ गया हो॥ २६४॥
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे॥
सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥
pura aru byoma bājane bāje| khala bhae malina sādhu saba rāje||
sura kiṃnara nara nāga munīsā| jaya jaya jaya kahi dehiṃ asīsā||
Meaning नगर और आकाशपें बाजे बजने लगे। दुष्टलोग उदास हो गये और सज्जनलोग सब प्रसन्न हो गये। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीधर जय-जयकार करके आशीर्वाद दे रहे हैं॥ १॥
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं॥
जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं॥
nācahiṃ gāvahiṃ bibudha badhūṭīṃ| bāra bāra kusumāṃjali chūṭīṃ||
jaham̐ taham̐ bipra bedadhuni karahīṃ| baṃdī biradāvali uccarahīṃ||
Meaning देवताओंकी स्त्रियाँ नाचती-गाती हैं। बार-बार हाथोंसे पुष्पोंकी अज्जलियाँ छूट रही हैं। जहाँ- तहाँ ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं और भाटलोग विरुदावली (कुलकीर्ति) बखान रहे हैं॥ २॥
महि पाताल नाक जसु ब्यापा।
राम बरी सिय भंजेउ चापा॥
mahi pātāla nāka jasu byāpā| rāma barī siya bhaṃjeu cāpā||
Meaning पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकोंगें यश फैल गया कि श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ दिया को भुलाकर (सामर्थ्यसे बहुत अधिक) निछावर कर रहे हैं॥३॥
सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥
सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥
sohati sīya rāma kai jaurī| chabi siṃgāru manahum̐ eka ṭhorī||
sakhīṃ kahahiṃ prabhupada gahu sītā| karati na carana parasa ati bhītā||
Meaning श्रीसीता-रामजीकी जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुन्दरता और श्रृंगाररस एकत्र हो गये हों। सखियाँ कह रही हैं--सीते ! स्वामीके चरण छुओ; किन्तु सीताजी अत्यन्त भयभीत हुई उनके चरण नहीं छूतीं॥ ४॥
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥ २६५॥
gautama tiya gati surati kari nahiṃ parasati paga pāni|
mana bihase raghubaṃsamani prīti alaukika jāni|| 265||
Meaning गौतमजीकी स्त्री अहल्याकी गतिका स्मरण करके सीताजी श्रीरामजीके चरणोंको हाथोंसे स्पर्श नहीं कर रही हैं। सीताजीकी अलौकिक प्रीति जानकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मनमें हँसे॥ २६५॥
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥
taba siya dekhi bhūpa abhilāṣe| kūra kapūta mūṛha mana mākhe||
uṭhi uṭhi pahiri sanāha abhāge| jaham̐ taham̐ gāla bajāvana lāge||
Meaning उस समय सीताजीको देखकर कुछ राजा लोग ललचा उठे। वे दुष्ट, कुपूत और मूढ़ राजा मनमें बहुत तमतमाये। वे अभागे उठ-उठकर, कवच पहनकर, जहाँ-तहाँ गाल बजाने लगे॥ १॥
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥
lehu chaṛāi sīya kaha koū| dhari bām̐dhahu nṛpa bālaka doū||
toreṃ dhanuṣu cāṛa nahiṃ saraī| jīvata hamahi kuam̐ri ko baraī||
Meaning कोई कहते हैं, सीताको छीन लो और दोनों राजकुमारोंको पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़नेसे ही चाह नहीं सरेगी (पूरी होगी)। हमारे जीते-जी राजकुमारीको कौन ब्याह सकता है ?॥ २॥
जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥
साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥
jauṃ bidehu kachu karai sahāī| jītahu samara sahita dou bhāī||
sādhu bhūpa bole suni bānī| rājasamājahi lāja lajānī||
Meaning यदि जनक कुछ सहायता करे, तो युद्धमें दोनों भाइयोंसहित उसे भी जीत लो। ये वचन सुनकर साधु राजा बोले-'इस [निर्लज्ज] राजसमाजको देखकर तो लाज भी लजा गयी॥ ३॥
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई।
नाक पिनाकहि संग सिधाई॥
balu pratāpu bīratā baṛāī| nāka pinākahi saṃga sidhāī||
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई।
असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥
soi sūratā ki aba kahum̐ pāī| asi budhi tau bidhi muham̐ masi lāī||
Meaning अरे ! तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुषके साथ ही चली गयी। वही वीरता थी कि अब कहींसे मिली है? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाताने तुम्हारे मुखोंपर कालिख लगा दी॥ ४॥