मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ॥
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥
muni tava carana dekhi kaha rāū| kahi na sakaum̐ nija punya prābhāū||
suṃdara syāma gaura dou bhrātā| ānam̐dahū ke ānam̐da dātā||
Meaning राजाने कहा--हे मुनि! आपके चरणोंके दर्शन कर मैं अपना पुण्य-प्रभाव कह नहीं सकता। ये सुन्दर श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई आनन्दको भी आनन्द देनेवाले हैं॥ १॥
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥
inha kai prīti parasapara pāvani| kahi na jāi mana bhāva suhāvani||
sunahu nātha kaha mudita bidehū| brahma jīva iva sahaja sanehū||
Meaning इनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [वाणीसे] कही नहीं जा सकती। विदेह (जनकजी) आनन्दित होकर कहते हैं--हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है॥ २॥
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥
puni puni prabhuhi citava naranāhū| pulaka gāta ura adhika uchāhū||
mrunihi prasaṃsi nāi pada sīsū| caleu lavāi nagara avanīsū||
Meaning राजा बार-बार प्रभुको देखते हैं (दृष्टि वहाँसे हटना ही नहीं चाहती )। [ प्रेमसे] शरीर पुलकित हो रहा है और हदयमें बड़ा उत्साह है। [फिर] मुनिकी प्रशंसा करके और उनके चरणोंमें सिर नवाकर राजा उन्हें नगरमें लिवा चले॥ ३॥
सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥
करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥
suṃdara sadanu sukhada saba kālā| tahām̐ bāsu lai dīnha bhuālā||
kari pūjā saba bidhi sevakāī| gayau rāu gṛha bidā karāī||
Meaning एक सुन्दर महल जो सब समय (सभी ऋतुओंमें ) सुखदायक था, वहाँ राजाने उन्हें ले जाकर ठहराया। तदनन्तर सब प्रकारसे पूजा और सेवा करके राजा विदा माँगकर अपने घर गये॥ ४॥
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥ २१७॥
riṣaya saṃga raghubaṃsa mani kari bhojanu biśrāmu|
baiṭhe prabhu bhrātā sahita divasu rahā bhari jāmu|| 217||
Meaning रघुकुलके शिरोमणि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंके साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मणसमेत बैठे। उस समय पहरभर दिन रह गया था॥ २१७॥
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥
lakhana hṛdayam̐ lālasā biseṣī| jāi janakapura āia dekhī||
prabhu bhaya bahuri munihi sakucāhīṃ| pragaṭa na kahahiṃ manahiṃ musukāhīṃ||
Meaning लक्ष्मणजीके हृदयमें विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें। परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका डर है और फिर मुनिसे भी सकुचाते हैं। इसलिये प्रकटमें कुछ नहीं कहते; मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ १॥
राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी॥
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई॥
rāma anuja mana kī gati jānī| bhagata bachalatā hiṃyam̐ hulasānī||
parama binīta sakuci musukāī| bole gura anusāsana pāī||
Meaning [ अन्तर्यमी ] श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाईके मनकी दशा जान ली, [तब] उनके हृदयमें भक्तवत्सलता उमड़ आयी। वे गुरुकी आज्ञा पाकर बहुत ही विनयके साथ सकुचाते हुए मुसकराकर बोले--॥ २॥
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥
जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ॥
nātha lakhanu puru dekhana cahahīṃ| prabhu sakoca ḍara pragaṭa na kahahīṃ||
jauṃ rāura āyasu maiṃ pāvauṃ| nagara dekhāi turata lai āvau||
Meaning हे नाथ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, किन्तु प्रभु (आप) के डर और संकोचके कारण स्पष्ट नहीं कहते। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं इनको नगर दिखलाकर तुरंत ही [वापस] ले आरऊँ॥ ३॥
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता॥
suni munīsu kaha bacana saprītī| kasa na rāma tumha rākhahu nītī||
dharama setu pālaka tumha tātā| prema bibasa sevaka sukhadātā||
Meaning यह सुनकर मुनीश्वर विश्वामित्रजीने प्रेमसहित वचन कहे--हे राम! तुम नीतिकी रक्षा कैसे न करोगे; हे तात! तुम धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले और प्रेमके वशीभूत होकर सेवकोंको सुख देनेवाले हो॥ ४॥
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥ २१८॥
jāi dekhī āvahu nagaru sukha nidhāna dou bhāi|
karahu suphala saba ke nayana suṃdara badana dekhāi|| 218||
Meaning सुखके निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आओ। अपने सुन्दर मुख दिखलाकर सब [ नगर- निवासियों] के नेत्रोंको सफल करो॥ २१८॥
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥
बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥
muni pada kamala baṃdi dou bhrātā| cale loka locana sukha dātā||
bālaka bṛṃdi dekhi ati sobhā| lage saṃga locana manu lobhā||
Meaning सब लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाले दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करके चले। बालकोंके झुंड इन [के सौन्दर्य] की अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गये। उनके नेत्र और मन [इनकी माधुरीपर] लुभा गये॥ १॥
पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥
तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥
pīta basana parikara kaṭi bhāthā| cāru cāpa sara sohata hāthā||
tana anuharata sucaṃdana khorī| syāmala gaura manohara jorī||
Meaning [दोनों भाइयोंके] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [ पीले ] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं। हाथोंमें सुन्दर धनुष- बाण सुशोभित हैं। [ श्याम और गौर वर्णके] शरीरोंके अनुकूल ( अर्थात् जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके ) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है। साँवरे और गोरे [ रंग] की मनोहर जोड़ी है॥ २॥
केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥
सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥
kehari kaṃdhara bāhu bisālā| ura ati rucira nāgamani mālā||
subhaga sona sarasīruha locana| badana mayaṃka tāpatraya mocana||
Meaning सिंहके समान (पुष्ट ) गर्दन (गलेका पिछला भाग) है; विशाल भुजाएँ हैं। [ चौड़ी ] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुक्ताकी माला है। सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं। तीनों तापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है॥ ३॥
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी॥
kānanhi kanaka phūla chabi dehīṃ| citavata citahi cori janu lehīṃ||
citavani cāru bhṛkuṭi bara bām̐kī| tilaka rekhā sobhā janu cām̐kī||
Meaning कानोंमें सोनेके कर्णफूल [ अत्यन्त] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [ देखनेवालेके] चित्तको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [माथेपर] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [मूर्तिमती ] शोभापर मुहर लगा दी गयी है॥ ४॥
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥ २१९॥
rucira cautanīṃ subhaga sira mecaka kuṃcita kesa|
nakha sikha suṃdara baṃdhu dou sobhā sakala sudesa|| 219||
Meaning सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [दिये] हैं, काले और पघुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक (एड़ीसे चोटीतक) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है॥ २१९॥
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी॥
dekhana nagaru bhūpasuta āe| samācāra purabāsinha pāe||
dhāe dhāma kāma saba tyāgī| manahu raṃka nidhi lūṭana lāgī||
Meaning जब पुरवासियोंने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखनेके लिये आये हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्री [ धनका] खजाना लूटने दौड़े हों॥१॥
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥
nirakhi sahaja suṃdara dou bhāī| hohiṃ sukhī locana phala pāī||
jubatīṃ bhavana jharokhanhi lāgīṃ| nirakhahiṃ rāma rūpa anurāgīṃ||
Meaning स्वभावहीसे सुन्दर दोनों भाइयोंको देखकर वे लोग नेत्रोंका फल पाकर सुखी हो रहे हैं। युवती स्त्रियाँ घरके झरोखोंसे लगी हुई प्रेमसहित श्रीरामचन्द्रजीके रूपको देख रही हैं॥ २॥
कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥
kahahiṃ parasapara bacana saprītī| sakhi inha koṭi kāma chabi jītī||
sura nara asura nāga muni māhīṃ| sobhā asi kahum̐ suniati nāhīṃ||
Meaning वे आपसमभें बड़े प्रेमसे बातें कर रही हैं--हे सखी ! इन्होंने करोड़ों कामदेवों की छबिको जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियोंमें ऐसी शोभा तो कहीं सुननेमें भी नहीं आती॥ ३॥
बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही॥
biṣnu cāri bhuja bighi mukha cārī| bikaṭa beṣa mukha paṃca purārī||
apara deu asa kou na āhī| yaha chabi sakhi paṭataria jāhī||
Meaning भगवान् विष्णुके चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजीके चार मुख हैं, शिवजीका विकट ( भयानक) वेष है और उनके पाँच मुँह हैं। हे सखी ! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबिकी उपमा दी जाय॥ ४॥
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख घाम।
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥ २२०॥
baya kisora suṣamā sadana syāma gaura sukha ghāma|
aṃga aṃga para vāriahiṃ koṭi koṭi sata kāma|| 220||
Meaning इनकी किशोर अवस्था है, ये सुन्दरताके घर, साँवले और गोरे रंगके तथा सुखके धाम हैं। इनके आअज्ञभ-अज्पर करोड़ों-अरबों कामदेवोंको निछावर कर देना चाहिये॥ २२०॥
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥
kahahu sakhī asa ko tanudhārī| jo na moha yaha rūpa nihārī||
kou saprema bolī mṛdu bānī| jo maiṃ sunā so sunahu sayānī||
Meaning हे सखी! [ भला] कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा जो इस रूपको देखकर मोहित न हो जाय (अर्थात् यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करनेवाला है)। [तब] कोई दूसरी सखी प्रेमसहित कोमल वाणीसे बोली--हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो--॥ १॥
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥
मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥
e doū dasaratha ke ḍhoṭā| bāla marālanhi ke kala joṭā||
muni kausika makha ke rakhavāre| jinha rana ajira nisācara māre||
Meaning ये दोनों [राजकुमार] महाराज दशरथजीके पुत्र हैं। बाल राजहंसोंका-सा. सुन्दर जोड़ा है। ये मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं, इन्होंने युद्धके मैदानमें राक्षसोंको मारा है॥२॥
स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥
कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥
syāma gāta kala kaṃja bilocana| jo mārīca subhuja madu mocana||
kausalyā suta so sukha khānī| nāmu rāmu dhanu sāyaka pānī||
Meaning जिनका श्याम शरीर और सुन्दर कमल-जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहुके मदको चूर करनेवाले और सुखकी खान हैं और जो हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं, वे कौसल्याजीके पुत्र हैं; इनका नाम राम है॥ ३॥
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥
gaura kisora beṣu bara kācheṃ| kara sara cāpa rāma ke pācheṃ||
lachimanu nāmu rāma laghu bhrātā| sunu sakhi tāsu sumitrā mātā||
Meaning जिनका रंग गोरा और किशोर अवस्था है और जो सुन्दर वेष बनाये और हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीरामजीके पीछे-पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं; उनका नाम लक्ष्मण है। हे सखी ! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं॥ ४॥
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥ २२१॥
biprakāju kari baṃdhu dou maga munibadhū udhāri|
āe dekhana cāpamakha suni haraṣīṃ saba nāri|| 221||
Meaning दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्रका काम करके और रास्तेमें मुनि गौतमकी स्त्री अहल्याका उद्धार करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आये हैं। यह सुनकर सब स्त्रयाँ प्रसन्न हुईं॥ २२१॥
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥
जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥
dekhi rāma chabi kou eka kahaī| jogu jānakihi yaha baru ahaī||
jau sakhi inhahi dekha naranāhū| pana parihari haṭhi karai bibāhū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर कोई एक (दूसरी सखी) कहने लगी--यह वर जानकीके योग्य है। हे सखी ! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हींसे विवाह कर देगा॥ १॥
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥
सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥
kou kaha e bhūpati pahicāne| muni sameta sādara sanamāne||
sakhi paraṃtu panu rāu na tajaī| bidhi basa haṭhi abibekahi bhajaī||
Meaning किसीने कहा-राजाने इन्हें पहचान लिया है और मुनिके सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है। परन्तु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता। वह होनहारके वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेकका ही आश्रय लिये हुए है (प्रणपर अड़े रहनेकी मूर्खता नहीं छोड़ता)॥ २॥
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता॥
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥
kou kaha jauṃ bhala ahai bidhātā| saba kaham̐ sunia ucita phaladātā||
tau jānakihi milihi baru ehū| nāhina āli ihām̐ saṃdehū||
Meaning कोई कहती है--यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीजीको यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है॥३॥
जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥
सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥
jau bidhi basa asa banai sam̐jogū| tau kṛtakṛtya hoi saba logū||
sakhi hamareṃ ārati ati tāteṃ| kabahum̐ka e āvahiṃ ehi nāteṃ||
Meaning जो दैवयोगसे ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायँ। हे सखी! मेरे तो इसीसे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आवेंगे॥ ४॥
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥ २२२॥
nāhiṃ ta hama kahum̐ sunahu sakhi inha kara darasanu dūri|
yaha saṃghaṭu taba hoi jaba punya purākṛta bhūri|| 222||
Meaning नहीं तो (विवाह न हुआ तो) हे सखी ! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी हो सकता है जब हमारे पूर्वजन्मोंके बहुत पुण्य हों॥ २२२॥
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का॥
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा॥
bolī apara kahehu sakhi nīkā| ehiṃ biāha ati hita sabahīṃ kā||
kou kaha saṃkara cāpa kaṭhorā| e syāmala mṛdugāta kisorā||
Meaning दूसरीने कहा-हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाहसे सभीका परम हित है। किसीने कहा--शड्जरजीका धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीरके बालक हैं॥ १॥
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥
sabu asamaṃjasa ahai sayānī| yaha suni apara kahai mṛdu bānī||
sakhi inha kaham̐ kou kou asa kahahīṃ| baṛa prabhāu dekhata laghu ahahīṃ||
Meaning हे सयानी! सब असमंजस ही है। यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणीसे कहने लगी-- हे सखी ! इनके सम्बन्धमें कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि ये देखनेमें तो छोटे हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है॥ २॥
परसि जासु पद पंकज धूरी।
तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥
parasi jāsu pada paṃkaja dhūrī| tarī ahalyā kṛta agha bhūrī||
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें।
यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥
so ki rahihi binu sivadhanu toreṃ| yaha pratīti pariharia na bhoreṃ||
Meaning जिनके चरणकमलोंकी धूलिका स्पर्श पाकर अहल्या तर गयी, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, वे क्या शिवजीका धनुष बिना तोड़े रहेंगे। इस विश्वासको भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिये॥ ३॥
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी॥
jehiṃ biraṃci raci sīya sam̐vārī| tehiṃ syāmala baru raceu bicārī||
tāsu bacana suni saba haraṣānīṃ| aisei hou kahahiṃ mudu bānī||
Meaning जिस ब्रह्माने सीताको सँवारकर (बड़ी चतुराईसे) रचा है, उसीने विचारकर साँवला वर भी रच रखा है। उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुई और कोमल वाणीसे कहने लगीं--ऐसा ही हो॥ ४॥
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥ २२३॥
hiyam̐ haraṣahiṃ baraṣahiṃ sumana sumukhi sulocani bṛṃda|
jāhiṃ jahām̐ jaham̐ baṃdhu dou taham̐ taham̐ paramānaṃda|| 223||
Meaning सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह-की-समूह हदयमें हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। जहाँ-जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनन्द छा जाता है॥ २२३॥
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥
pura pūraba disi ge dou bhāī| jaham̐ dhanumakha hita bhūmi banāī||
ati bistāra cāru gaca ḍhārī| bimala bedikā rucira sam̐vārī||
Meaning दोनों भाई नगरके पूरब ओर गये; जहाँ धनुषयज्ञके लिये [रंग] भूमि बनायी गयी थी। बहुत लंबा-चौड़ा सुन्दर ढाला हुआ पक्का आँगन था, जिसपर सुन्दर और निर्मल वेदी सजायी गयी थी॥ १॥
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं महिपाला॥
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥
cahum̐ disi kaṃcana maṃca bisālā| race jahām̐ beṭhahiṃ mahipālā||
tehi pācheṃ samīpa cahum̐ pāsā| apara maṃca maṃḍalī bilāsā||
Meaning चारों ओर सोनेके बड़े-बड़े मंच बने थे, जिनपर राजा लोग बेठेंगे। उनके पीछे समीप ही चारों ओर दूसरे मचानोंका मण्डलाकार घेरा सुशोभित था॥ २॥
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥
kachuka ūm̐ci saba bhām̐ti suhāī| baiṭhahiṃ nagara loga jaham̐ jāī||
tinha ke nikaṭa bisāla suhāe| dhavala dhāma bahubarana banāe||
Meaning वह कुछ ऊँचा था और सब प्रकारसे सुन्दर था, जहाँ जाकर नगरके लोग बैठेंगे। उन्हींके पास विशाल एवं सुन्दर सफेद मकान अनेक रंगोंके बनाये गये हैं,॥ ३॥
जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी॥
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥
jaham̐ baiṃṭhaiṃ dekhahiṃ saba nārī| jathā jogu nija kula anuhārī||
pura bālaka kahi kahi mṛdu bacanā| sādara prabhuhi dekhāvahiṃ racanā||
Meaning जहाँ अपने-अपने कुलके अनुसार सब स्त्रियाँ यथायोग्य (जिसको जहाँ बैठना उचित है) बैठकर देखेंगी। नगरके बालक कोमल वचन कह-कहकर आदरपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको [ यज्ञशालाकी ] रचना दिखला रहे हैं॥ ४॥
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥ २२४॥
saba sisu ehi misa premabasa parasi manohara gāta|
tana pulakahiṃ ati haraṣu hiyam̐ dekhi dekhi dou bhrāta|| 224||
Meaning सब बालक इसी बहाने प्रेमके वश होकर श्रीरामजीके मनोहर अड्लोंको छूकर शरीरसे पुलकित हो रहे हैं और दोनों भाइयोंको देख-देखकर उनके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है॥ २२४॥
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥
निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥
sisu saba rāma premabasa jāne| prīti sameta niketa bakhāne||
nija nija ruci saba leṃhiṃ bolāī| sahita saneha jāhiṃ dou bhāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने सब बालकोंको प्रेमके वश जानकर [ यज्ञभूमिके] स्थानोंकी प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। [इससे बालकोंका उत्साह, आनन्द और प्रेम और भी बढ़ गया, जिससे] वे सब अपनी- अपनी रुचिके अनुसार उन्हें बुला लेते हैं और [प्रत्येकके बुलानेपर] दोनों भाई प्रेमसहित उनके पास चले जाते हैं॥ १॥
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥
लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥
rāma dekhāvahiṃ anujahi racanā| kahi mṛdu madhura manohara bacanā||
lava nimeṣa maham̐ bhuvana nikāyā| racai jāsu anusāsana māyā||
Meaning कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणको [यज्ञभूमिकी ] रचना दिखलाते हैं। जिनकी आज्ञा पाकर माया लव निमेष (पलक गिरनेके चौथाई समय) में ब्रह्माण्डोंके समूह रच डालती है,॥ २॥
भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥
bhagati hetu soi dīnadayālā| citavata cakita dhanuṣa makhasālā||
kautuka dekhi cale guru pāhīṃ| jāni bilaṃbu trāsa mana māhīṃ||
Meaning वही दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरामजी भक्तिके कारण धनुषयज्ञशालाको चकित होकर ( आश्चर्यके साथ) देख रहे हैं। इस प्रकार सब कौतुक (विचित्र रचना) देखकर वे गुरुके पास चले। देर हुई जानकर उनके मनमें डर है॥३॥
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई॥
jāsu trāsa ḍara kahum̐ ḍara hoī| bhajana prabhāu dekhāvata soī||
kahi bāteṃ mṛdu madhura suhāīṃ| kie bidā bālaka bariāī||
Meaning जिनके भयसे डरको भी डर लगता है, वही प्रभु भजनका प्रभाव [जिसके कारण ऐसे महान् प्रभु भी भयका नाट्य करते हैं] दिखला रहे हैं। उन्होंने कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहकर बालकोंको जबर्दस्ती विदा किया॥ ४॥
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥ २२५॥
sabhaya saprema binīta ati sakuca sahita dou bhāi|
gura pada paṃkaja nāi sira baiṭhe āyasu pāi|| 225||
Meaning फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोचके साथ दोनों भाई गुरुके चरणकमलोंमें सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे॥ २२५॥
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥
nisi prabesa muni āyasu dīnhā| sabahīṃ saṃdhyābaṃdanu kīnhā||
kahata kathā itihāsa purānī| rucira rajani juga jāma sirānī||
Meaning रात्रिका प्रवेश होते ही (सन्ध्याके समय) मुनिने आज्ञा दी, तब सबने सन्ध्यावन्दन किया। फिर प्राचीन कथाएँ तथा इतिहास कहते-कहते सुन्दर रात्रि दो पहर बीत गयी॥ १॥
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥
munibara sayana kīnhi taba jāī| lage carana cāpana dou bhāī||
jinha ke carana saroruha lāgī| karata bibidha japa joga birāgī||
Meaning तब श्रेष्ठ मुनिने जाकर शयन किया। दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे जिनके चरणकमलों के [दर्शन एवं स्पर्शके] लिये वैराग्यवान् पुरुष भी भाँति-भाँतिके जप और योग करते हैं,॥ २॥
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥
बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥
tei dou baṃdhu prema janu jīte| gura pada kamala paloṭata prīte||
bārabāra muni agyā dīnhī| raghubara jāi sayana taba kīnhī||
Meaning वे ही दोनों भाई मानो प्रेमसे जीते हुए प्रेमपूर्वक गुरुजीके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। मुनिने बार-बार आज्ञा दी, तब श्रीरघुनाथजीने जाकर शयन किया॥ ३॥
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥
cāpata carana lakhanu ura lāem̐| sabhaya saprema parama sacu pāem̐||
puni puni prabhu kaha sovahu tātā| pauṛhe dhari ura pada jalajātā||
Meaning श्रीरामजीके चरणोंको हृदयसे लगाकर भय और प्रेमसहित परम सुखका अनुभव करते हुए लक्ष्मणजी उनको दबा रहे हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बार-बार कहा--हे तात! [अब] सो जाओ। तब वे उन चरणकमलोंको हृदयमें धरकर लेट रहे॥ ४॥
उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥ २२६॥
uṭhe lakhana nisi bigata suni arunasikhā dhuni kāna|
gura teṃ pahilehiṃ jagatapati jāge rāmu sujāna|| 226||
Meaning रात बीतनेपर, मुर्गेका शब्द कानोंसे सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत्के स्वामी सुजान श्रीरामचन्द्रजी भी गुरुसे पहले ही जाग गये॥ २२६॥
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥
sakala sauca kari jāi nahāe| nitya nibāhi munihi sira nāe||
samaya jāni gura āyasu pāī| lena prasūna cale dou bhāī||
Meaning सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाये। फिर [ सन्ध्या-अग्रिहोत्रादि] नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनिको मस्तक नवाया। [ पूजाका] समय जानकर, गुरुकी आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले॥ १॥
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥
bhūpa bāgu bara dekheu jāī| jaham̐ basaṃta ritu rahī lobhāī||
lāge biṭapa manohara nānā| barana barana bara beli bitānā||
Meaning उन्होंने जाकर राजाका सुन्दर बाग देखा, जहाँ वसन्त-ऋतु लुभाकर रह गयी है। मनको लुभानेवाले अनेक वृक्ष लगे हैं। रंग-बिरंगी उत्तम लताओंके मण्डप छाये हुए हैं॥ २॥
नव पल्लव फल सुमान सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए॥
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥
nava pallava phala sumāna suhāe| nija saṃpati sura rūkha lajāe||
cātaka kokila kīra cakorā| kūjata bihaga naṭata kala morā||
Meaning नये पत्तों, फलों और फूलोंसे युक्त सुन्दर वृक्ष अपनी सम्पत्तिसे कल्पवृक्षको भी लजा रहे हैं। पपीहे, कोयल, तोते, चकोर आदि पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और मोर सुन्दर नृत्य कर रहे हैं॥३॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा।
जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥
bimala salilu sarasija bahuraṃgā| jalakhaga kūjata guṃjata bhṛṃgā||
Meaning बागके बीचोबीच सुहावना सरोवर सुशोभित है, जिसमें मणियोंकी सीढ़ियाँ विचित्र ढंगसे बनी हैं। उसका जल निर्मल है, जिसमें अनेक रंगोंके कमल खिले हुए हैं, जलके पक्षी कलरव कर रहे हैं और श्रमर गुंजार कर रहे हैं॥ ४॥
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥ २१२४॥
bāgu taṛāgu biloki prabhu haraṣe baṃdhu sameta|
parama ramya ārāmu yahu jo rāmahi sukha deta|| 2124||
Meaning बाग और सरोवरको देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मणसहित हर्षित हुए। यह बाग [ वास्तवमें] परम रमणीय है, जो [ जगत्को सुख देनेवाले] श्रीरामचन्द्रजीको सुख दे रहा है॥ २२७॥
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥
cahum̐ disi citai pūm̐chi māligana| lage lena dala phūla mudita mana||
tehi avasara sītā taham̐ āī| girijā pūjana janani paṭhāī||
Meaning चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियोंसे पूछकर वे प्रसन्न मनसे पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आयीं। माताने उन्हें गिरिजा (पार्वती) जीकी पूजा करनेके लिये भेजा था॥ १॥
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥
saṃga sakhīṃ saba subhaga sayānī| gāvahiṃ gīta manohara bānī||
sara samīpa girijā gṛha sohā| barani na jāi dekhi manu mohā||
Meaning साथमें सब सुन्दरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणीसे गीत गा रही हैं। सरोवरके पास गिरिजाजीका मन्दिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; देखकर मन मोहित हो जाता है॥ २॥
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥
majjanu kari sara sakhinha sametā| gaī mudita mana gauri niketā||
pūjā kīnhi adhika anurāgā| nija anurūpa subhaga baru māgā||
Meaning सखियोंसहित सरोवरमें स्नान करके सीताजी प्रसन्न मनसे गिरिजाजीके मन्दिरमें गयीं। उन्होंने बड़े प्रेमसे पूजा की और अपने योग्य सुन्दर वर माँगा॥ ३॥
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥
eka sakhī siya saṃgu bihāī| gaī rahī dekhana phulavāī||
tehi dou baṃdhu biloke jāī| prema bibasa sītā pahiṃ āī||
Meaning एक सखी सीताजीका साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गयी थी। उसने जाकर दोनों भाइयोंको देखा और प्रेममें विह्लल होकर वह सीताजीके पास आयी॥ ४॥
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन॥ २२८॥
tāsu dasā dekhi sakhinha pulaka gāta jalu naina|
kahu kāranu nija haraṣa kara pūchahi saba mṛdu baina|| 228||
Meaning सखियोंने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रोंगें जल भरा है। सब कोमल वाणीसे पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नताका कारण बता॥ २२८॥
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥
dekhana bāgu kuam̐ra dui āe| baya kisora saba bhām̐ti suhāe||
syāma gaura kimi kahauṃ bakhānī| girā anayana nayana binu bānī||
Meaning [उसने कहा--] दो राजकुमार बाग देखने आये हैं। किशोर अवस्थाके हैं और सब प्रकारसे सुन्दर हैं। वे साँवले और गोरे [रंगके. हैं; उनके सौन्दर्यको मैं कैसे बखानकर कहूँ। वाणी बिना नेत्रकी है और नेत्रोंके वाणी नहीं है॥ १॥
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली॥
suni haraṣīṃ saba sakhīṃ sayānī| siya hiyam̐ ati utakaṃṭhā jānī||
eka kahai nṛpasuta tei ālī| sune je muni sam̐ga āe kālī||
Meaning यह सुनकर और सीताजीके हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा जानकर सब सयानी सखियाँ प्रसन्न हुईं। तब एक सखी कहने लगी--हे सखी ! ये वही राजकुमार हैं जो सुना है कि कल विश्वामित्र मुनिके साथ आये हैं॥ २॥
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी॥
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥
jinha nija rūpa mohanī ḍārī| kīnha svabasa nagara nara nārī||
baranata chabi jaham̐ taham̐ saba logū| avasi dekhiahiṃ dekhana jogū||
Meaning और जिन्होंने अपने रूपकी मोहिनी डालकर नगरके स्त्री-पुरुषोंको अपने वशमें कर लिया है। जहाँ-तहाँ सब लोग उन्हींकी छबिका वर्णन कर रहे हैं। अवश्य [चलकर] उन्हें देखना चाहिये, वे देखने ही योग्य हैं॥ ३॥
तासु वचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥
tāsu vacana ati siyahi suhāne| darasa lāgi locana akulāne||
calī agra kari priya sakhi soī| prīti purātana lakhai na koī||
Meaning उसके वचन सीताजीको अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शनके लिये उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखीको आगे करके सीताजी चलीं। पुरानी प्रीतिको कोई लख नहीं पाता॥ ४॥
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥ २२९॥
sumiri sīya nārada bacana upajī prīti punīta|
cakita bilokati sakala disi janu sisu mṛgī sabhīta|| 229||
Meaning नारदजीके वचनोंका स्मरण करके सीताजीके मनमें पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो॥ २२९॥
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥
kaṃkana kiṃkini nūpura dhuni suni| kahata lakhana sana rāmu hṛdayam̐ guni||
mānahum̐ madana duṃdubhī dīnhī| manasā bisva bijaya kaham̐ kīnhī||
Meaning कंकण (हाथोंके कड़े ), करधनी और पायजेबके शब्द सुनकर श्रीरामचन्द्रजी हृदयमें विचारकर लक्ष्मणसे कहते हैं--[ यह ध्वनि ऐसी आ रही है] मानो कामदेवने विश्वको जीतनेका संकल्प करके डंकेपर चोट मारी है॥ १॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥
asa kahi phiri citae tehi orā| siya mukha sasi bhae nayana cakorā||
bhae bilocana cāru acaṃcala| manahum̐ sakuci nimi taje digaṃcala||
Meaning ऐसा कहकर श्रीरामजीने फिरकर उस ओर देखा। श्रीसीताजीके मुखरूपी चन्द्रमा [ को निहारने। के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये। सुन्दर नेत्र स्थिर हो गये (टकटकी लग गयी)। मानो निमि ( जनकजीके पूर्वज) ने [जिनका सबकी पलकोंमें निवास माना गया है, लड़की-दामादके मिलन- प्रसज़को देखना उचित नहीं, इस भावसे] सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, (पलकोंमें रहना छोड़ दिया, जिससे पलकोंका गिरना रुक गया)॥ २॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥
dekhi sīya sobhā sukhu pāvā| hṛdayam̐ sarāhata bacanu na āvā||
janu biraṃci saba nija nipunāī| biraci bisva kaham̐ pragaṭi dekhāī||
Meaning सीताजीकी शोभा देखकर श्रीरामजीने बड़ा सुख पाया। हृदयमें वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुखसे वचन नहीं निकलते। [वह शोभा ऐसी अनुपम है] मानो ब्रह्माने अपनी सारी निपुणताको मूर्तिमान्ू कर संसारको प्रकट करके दिखा दिया हो॥ ३॥
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥
suṃdaratā kahum̐ suṃdara karaī| chabigṛham̐ dīpasikhā janu baraī||
saba upamā kabi rahe juṭhārī| kehiṃ paṭatarauṃ bidehakumārī||
Meaning वह (सीताजीकी शोभा) सुन्दरताको भी सुन्दर करनेवाली है [वह ऐसी मालूम होती है] मानो सुन्दरतारूपी घरमें दीपककी लौ जल रही हो। ( अबतक सुन्दरतारूपी भवनमें अँधेरा था, वह भवन मानो सीताजीकी सुन्दरतारूपी दीपशिखाको पाकर जगमगा उठा है, पहलेसे भी अधिक सुन्दर हो गया है)। सारी उपमाओंको तो कवियोंने जूँठा कर रखा है। मैं जनकनन्दिनी श्रीसीताजीकी किससे उपमा दूँ॥ ४॥
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥ २३०॥
siya sobhā hiyam̐ barani prabhu āpani dasā bicāri|
bole suci mana anuja sana bacana samaya anuhāri|| 230||
Meaning [इस प्रकार] हृदयमें सीताजीकी शोभाका वर्णन करके और अपनी दशाको विचारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पवित्र मनसे अपने छोटे भाई लक्ष्मणसे समयानुकूल वचन बोले--॥ २३०॥
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥
पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई॥
tāta janakatanayā yaha soī| dhanuṣajagya jehi kārana hoī||
pūjana gauri sakhīṃ lai āī| karata prakāsu phirai phulavāī||
Meaning हे तात! यह वही जनकजीकी कन्या है जिसके लिये धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरीपूजनके लिये ले आयी हैं। यह फुलवाड़ीमें प्रकाश करती हुई फिर रही है॥ १॥
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा।
सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
jāsu biloki alokika sobhā| sahaja punīta mora manu chobhā||
सो सबु कारन जान बिधाता।
फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥
so sabu kārana jāna bidhātā| pharakahiṃ subhada aṃga sunu bhrātā||
Meaning जिसकी अलौकिक सुन्दरता देखकर स्वभावसे ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें। किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मज़लदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं॥ २॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥
raghubaṃsinha kara sahaja subhāū| manu kupaṃtha pagu dharai na kāū||
mohi atisaya pratīti mana kerī| jehiṃ sapanehum̐ paranāri na herī||
Meaning रघुवंशियोंका यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [ जाग्रतूकी कौन कहे] स्वपमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है॥ ३॥
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥
jinha kai lahahiṃ na ripu rana pīṭhī| nahiṃ pāvahiṃ paratiya manu ḍīṭhī||
maṃgana lahahi na jinha kai nāhīṃ| te narabara thore jaga māhīṃ||
Meaning रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते ' नहीं ), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे नाहीं' नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं॥ ४॥
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥ २३१॥
karata batakahi anuja sana mana siya rūpa lobhāna|
mukha saroja makaraṃda chabi karai madhupa iva pāna|| 231||
Meaning यों श्रीरामजी छोटे भाईसे बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजीके रूपमें लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमलके छबिरूप मकरन्द-रसको भौरेकी तरह पी रहा है॥ २३१॥
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥
citavahi cakita cahūm̐ disi sītā| kaham̐ gae nṛpakisora manu ciṃtā||
jaham̐ biloka mṛga sāvaka nainī| janu taham̐ barisa kamala sita śrenī||
Meaning सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बातकी चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गये। बालमृग-नयनी (मृगके छौनेकी-सी आँखवाली) सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलोंकी कतार बरस जाती है॥ १॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥
latā oṭa taba sakhinha lakhāe| syāmala gaura kisora suhāe||
dekhi rūpa locana lalacāne| haraṣe janu nija nidhi pahicāne||
Meaning तब सखियोंने लताकी ओगमें सुन्दर श्याम और गौर कुमारोंको दिखलाया। उनके रूपको देखकर नेत्र ललचा उठे; वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया॥ २॥
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥
thake nayana raghupati chabi dekheṃ| palakanhihūm̐ pariharīṃ nimeṣeṃ||
adhika saneham̐ deha bhai bhorī| sarada sasihi janu citava cakorī||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी छवि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गये। पलकोंने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेहके कारण शरीर विह्लल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको चकोरी [ बेसुध हुई] देख रही हो॥ ३॥
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥
locana maga rāmahi ura ānī| dīnhe palaka kapāṭa sayānī||
jaba siya sakhinha premabasa jānī| kahi na sakahiṃ kachu mana sakucānī||
Meaning नेत्रोंके रास्ते श्रीरामजीको हृदयमें लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजीने पलकोंके किवाड़ लगा दिये (अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियोंने सीताजीको प्रेमके वश जाना, तब वे मनमें सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं॥ ४॥
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ॥ २३२॥
latābhavana teṃ pragaṭa bhe tehi avasara dou bhāi|
nikase janu juga bimala bidhu jalada paṭala bilagāi|| 232||
Meaning उसी समय दोनों भाई लतामण्डप (कुझ्ञ) मेंसे प्रकट हुए। मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलोंके पर्देको हटाकर निकले हों॥ २३२॥
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥
sobhā sīvam̐ subhaga dou bīrā| nīla pīta jalajābha sarīrā||
morapaṃkha sira sohata nīke| guccha bīca bica kusuma kalī ke||
Meaning दोनों सुन्दर भाई शोभाकी सीमा हैं। उनके शरीरकी आभा नीले और पीले कमलकी-सी है। सिरपर सुन्दर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियोंके गुच्छे लगे हैं॥ १॥
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥
bhāla tilaka śramabiṃdu suhāe| śravana subhaga bhūṣana chabi chāe||
bikaṭa bhṛkuṭi kaca ghūgharavāre| nava saroja locana ratanāre||
Meaning माथेपर तिलक और पसीनेकी बूँदें शोभायमान हैं। कानोंमें सुन्दर भूषणोंकी छवि छायी है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नये लाल कमलके समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं॥२॥
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥
cāru cibuka nāsikā kapolā| hāsa bilāsa leta manu molā||
mukhachabi kahi na jāi mohi pāhīṃ| jo biloki bahu kāma lajāhīṃ||
Meaning ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं, और हँसीकी शोभा मनको मोल लिये लेती है। मुखकी छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं॥ ३॥
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥
ura mani māla kaṃbu kala gīvā| kāma kalabha kara bhuja balasīṃvā||
sumana sameta bāma kara donā| sāvam̐ra kuam̐ra sakhī suṭhi lonā||
Meaning वक्ष:स्थलपर मणियोंकी माला है। शज्जुके सदृश सुन्दर गला है। कामदेवके हाथीके बच्चेकी सूँडके समान (उतार-चढ़ाववाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बलकी सीमा हैं। जिसके बायें हाथमें फूलोंसहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है॥ ४॥
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥ २३३॥
kehari kaṭi paṭa pīta dhara suṣamā sīla nidhāna|
dekhi bhānukulabhūṣanahi bisarā sakhinha apāna|| 233||
Meaning सिंहकी-सी (पतली, लचीली) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शीलके भण्डार, सूर्यकुलके भूषण श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सखियाँ अपने-आपको भूल गयीं॥ २३३॥