एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥
ehi bidhi rāma jagata pitu mātā| kosalapura bāsinha sukhadātā||
jinha raghunātha carana rati mānī| tinha kī yaha gati pragaṭa bhavānī||
Meaning इस प्रकार [सम्पूर्ण] जगत्के माता-पिता श्रीरामजी अवधपुरके निवासियोंको सुख देते हैं। जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति जोड़ी है, हे भवानी! उनकी यह प्रत्यक्ष गति है [कि भगवान् उनके प्रेमवश बाललीला करके उन्हें आनन्द दे रहे हैं]॥ १॥
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥
raghupati bimukha jatana kara korī| kavana sakai bhava baṃdhana chorī||
jīva carācara basa kai rākhe| so māyā prabhu soṃ bhaya bhākhe||
Meaning श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसारबन्धन कौन छुड़ा सकता है। जिसने सब चराचर जीवोंको अपने वशमें कर रखा है, वह माया भी प्रभुसे भय खाती है॥ २॥
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥
bhṛkuṭi bilāsa nacāvai tāhī| asa prabhu chāṛi bhajia kahu kāhī||
mana krama bacana chāṛi caturāī| bhajata kṛpā karihahiṃ raghurāī||
Meaning भगवान् उस मायाको भौंहके इशारेपर नचाते हैं। ऐसे प्रभुको छोड़कर कहो, [और] किसका भजन किया जाय। मन, वचन और कर्मसे चतुराई छोड़कर भजते ही श्रीरघुनाथजी कृपा करेंगे॥ ३॥
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥
लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै॥
ehi bidhi sisubinoda prabhu kīnhā| sakala nagarabāsinha sukha dīnhā||
lai uchaṃga kabahum̐ka halarāvai| kabahum̐ pālaneṃ ghāli jhulāvai||
Meaning इस प्रकारसे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बालक्रीड़ा की और समस्त नगरनिवासियोंको सुख दिया। कौसल्याजी कभी उन्हें गोदमें लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालनेमें लिटाकर झुलाती थीं॥ ४॥
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥ २००॥
prema magana kausalyā nisi dina jāta na jāna|
suta saneha basa mātā bālacarita kara gāna|| 200||
Meaning प्रेममें मग्न कौसल्याजी रात और दिनका बीतना नहीं जानती थीं। पुत्रके स्नेहवश माता उनके बालचरित्रोंका गान किया करतीं॥ २००॥
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥
eka bāra jananīṃ anhavāe| kari siṃgāra palanām̐ pauṛhāe||
nija kula iṣṭadeva bhagavānā| pūjā hetu kīnha asnānā||
Meaning एक बार माताने श्रीरामचन्द्रजीको स्नान कराया और श्रंगार करके पालनेपर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुलके इष्टदेव भगवान्की पूजाके लिये स्नान किया॥ १॥
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥
kari pūjā naibedya caṛhāvā| āpu gaī jaham̐ pāka banāvā||
bahuri mātu tahavām̐ cali āī| bhojana karata dekha suta jāī||
Meaning पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गयी, जहाँ रसोई बनायी गयी थी। फिर माता वहीं (पूजाके स्थानमें) लौट आयी, और वहाँ आनेपर पुत्रको [इष्टदेव भगवान्के लिये चढ़ाये हुए नैवेद्यका] भोजन करते देखा॥ २॥
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥
gai jananī sisu pahiṃ bhayabhītā| dekhā bāla tahām̐ puni sūtā||
bahuri āi dekhā suta soī| hṛdayam̐ kaṃpa mana dhīra na hoī||
Meaning माता भयभीत होकर (पालनेमें सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बातसे डरकर) पुत्रके पास गयी, तो वहाँ बालकको सोया हुआ देखा। फिर [पूजास्थानमें लौटकर] देखा कि वही पुत्र वहाँ [ भोजन कर रहा] है। उनके हृदयमें कम्प होने लगा और मनको धीरज नहीं होता॥ ३॥
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥
ihām̐ uhām̐ dui bālaka dekhā| matibhrama mora ki āna biseṣā||
dekhi rāma jananī akulānī| prabhu ham̐si dīnha madhura musukānī||
Meaning [वह सोचने लगी कि] यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धिका भ्रम है या और कोई विशेष कारण है ? प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने माताको घबड़ायी हुई देखकर मधुर मुसकानसे हँस दिया॥ ४॥
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥ २०१॥
dekharāvā mātahi nija adabhuta rupa akhaṃḍa|
roma roma prati lāge koṭi koṭi brahmaṃḍa|| 201||
Meaning फिर उन्होंने माताको अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं॥ २०१॥
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥
aganita rabi sasi siva caturānana| bahu giri sarita siṃdhu mahi kānana||
kāla karma guna gyāna subhāū| sou dekhā jo sunā na kāū||
Meaning अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे। और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे॥ १॥
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥
dekhī māyā saba bidhi gāṛhī| ati sabhīta joreṃ kara ṭhāṛhī||
dekhā jīva nacāvai jāhī| dekhī bhagati jo chorai tāhī||
Meaning सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [ भगवान्के सामने] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [फिर] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [ मायासे] छुड़ा देती है॥ २॥
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥
tana pulakita mukha bacana na āvā| nayana mūdi caranani siru nāvā||
bisamayavaṃta dekhi mahatārī| bhae bahuri sisurūpa kharārī||
Meaning [ माताका] शरीर पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। माताको आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये॥ ३॥
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥
हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥
astuti kari na jāi bhaya mānā| jagata pitā maiṃ suta kari jānā||
hari janani bahubidhi samujhāī| yaha jani katahum̐ kahasi sunu māī||
Meaning [ मातासे] स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गयी कि मैंने जगत्पिता परमात्माको पुत्र करके जाना। श्रीहरिने माताको बहुत प्रकारसे समझाया [ और कहा--] हे माता! सुनो, यह बात कहीं पर कहना नहीं॥ ४॥
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥ २०२॥
bāra bāra kausalyā binaya karai kara jori|
aba jani kabahūm̐ byāpai prabhu mohi māyā tori|| 202||
Meaning कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि हे प्रभो! मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे॥ २०२॥
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥
कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥
bālacarita hari bahubidhi kīnhā| ati anaṃda dāsanha kaham̐ dīnhā||
kachuka kāla bīteṃ saba bhāī| baṛe bhae parijana sukhadāī||
Meaning भगवान्ने बहुत प्रकारसे बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकोंको अत्यन्त आनन्द दिया। कुछ समय बीतनेपर चारों भाई बड़े होकर कुटुम्बियोंको सुख देनेवाले हुए॥ १॥
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥
cūṛākarana kīnha guru jāī| bipranha puni dachinā bahu pāī||
parama manohara carita apārā| karata phirata cāriu sukumārā||
Meaning तब गुरुजीने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया। ब्राह्मणोंने फिर बहुत-सी दक्षिणा पायी। चारों सुन्दर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं॥ २॥
मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥
भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥
mana krama bacana agocara joī| dasaratha ajira bicara prabhu soī||
bhojana karata bola jaba rājā| nahiṃ āvata taji bāla samājā||
Meaning जो मन, वचन और कर्मसे अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजीके आँगनमें विचर रहे हैं। भोजन करनेके समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बालसखाओंके समाजको छोड़कर नहीं आते॥ ३॥
कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई॥
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥
kausalyā jaba bolana jāī| ṭhumaku ṭhumaku prabhu calahiṃ parāī||
nigama neti siva aṃta na pāvā| tāhi dharai jananī haṭhi dhāvā||
Meaning कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं। जिनका वेद 'नेति' (इतना ही नहीं) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजीने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़नेके लिये दौड़ती हैं॥ ४॥
धूरस धूरि भरें तनु आए।
भूपति बिहसि गोद बैठाए॥
dhūrasa dhūri bhareṃ tanu āe| bhūpati bihasi goda baiṭhāe||
Meaning वे शरीरमें धूल लपेटे हुए आये और राजाने हँसकर उन्हें गोदमें बैठा लिया॥ ५॥
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥ २०३॥
bhojana karata capala cita ita uta avasaru pāi|
bhāji cale kilakata mukha dadhi odana lapaṭāi|| 203||
Meaning भोजन करते हैं पर चित्त चट्लल है। अवसर पाकर मुँहमें दही -भात लपटाये किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले॥ २०३॥
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥
जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥
bālacarita ati sarala suhāe| sārada seṣa saṃbhu śruti gāe||
jina kara mana inha sana nahiṃ rātā| te jana baṃcita kie bidhātā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी बहुत ही सरल ( भोली) और सुन्दर (मनभावनी) बाललीलाओंका सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदोंने गान किया है। जिनका मन इन लीलाओंमें अनुरक्त नहीं हुआ, विधाताने उन मनुष्योंको वद्धित कर दिया (नितान्त भाग्यहीन बनाया)॥ १॥
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥
bhae kumāra jabahiṃ saba bhrātā| dīnha janeū guru pitu mātā||
guragṛham̐ gae paṛhana raghurāī| alapa kāla bidyā saba āī||
Meaning ज्यों ही सब भाई कुमारावस्थाके हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माताने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्रीरघुनाथजी [ भाइयोंसहित] गुरुके घरमें विद्या पढ़ने गये और थोड़े ही समयमें उनको सब विद्याएँ आ गयीं॥ २॥
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला॥
jākī sahaja svāsa śruti cārī| so hari paṛha yaha kautuka bhārī||
bidyā binaya nipuna guna sīlā| khelahiṃ khela sakala nṛpalīlā||
Meaning चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान् पढ़ें, यह बड़ा कौतुक (अचरज) है। चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शीलमें [ बड़े] निपुण हैं और सब राजाओंकी लीलाओंके ही खेल खेलते हैं॥ ३॥
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥
karatala bāna dhanuṣa ati sohā| dekhata rūpa carācara mohā||
jinha bīthinha biharahiṃ saba bhāī| thakita hohiṃ saba loga lugāī||
Meaning हाथोंमें बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर (जड-चेतन) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियोंमें खेलते [ हुए निकलते] हैं, उन गलियोंके सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेहसे शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं॥ ४॥
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥ २०४॥
kosalapura bāsī nara nāri bṛddha aru bāla|
prānahu te priya lāgata saba kahum̐ rāma kṛpāla|| 204||
Meaning कोसलपुरके रहनेवाले स्त्री, पुरुष, बूढ़े और बालक सभीको कृपालु श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय लगते हैं॥ २०४॥
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥
पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥
baṃdhu sakhā saṃga lehiṃ bolāī| bana mṛgayā nita khelahiṃ jāī||
pāvana mṛga mārahiṃ jiyam̐ jānī| dina prati nṛpahi dekhāvahiṃ ānī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट-मित्रोंको बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वनमें जाकर शिकार खेलते हैं। मनमें पवित्र समझकर मृगोंको मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा (दशरथजी ) को दिखलाते हैं॥ १॥
जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥
je mṛga rāma bāna ke māre| te tanu taji suraloka sidhāre||
anuja sakhā sam̐ga bhojana karahīṃ| mātu pitā agyā anusarahīṃ||
Meaning जो मृग श्रीरामजीके बाणसे मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोकको चले जाते थे। श्रीरामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओंके साथ भोजन करते हैं और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करते हैं॥ २॥
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥
बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥
jehi bidhi sukhī hohiṃ pura logā| karahiṃ kṛpānidhi soi saṃjogā||
beda purāna sunahiṃ mana lāī| āpu kahahiṃ anujanha samujhāī||
Meaning जिस प्रकार नगरके लोग सुखी हों, कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी वही संयोग (लीला) करते हैं। वे मन लगाकर वेद-पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयोंको समझाकर कहते हैं॥ ३॥
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥
prātakāla uṭhi kai raghunāthā| mātu pitā guru nāvahiṃ māthā||
āyasu māgi karahiṃ pura kājā| dekhi carita haraṣai mana rājā||
Meaning श्रीरघुनाथजी प्रात:काल उठकर माता-पिता और गुरुको मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगरका काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मनमें बड़े हर्षित होते हैं॥ ४॥
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥ २०५॥
byāpaka akala anīha aja nirguna nāma na rūpa|
bhagata hetu nānā bidhi karata caritra anūpa|| 205||
Meaning जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजनमा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं॥ २०५॥
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ आश्रम जानी॥
yaha saba carita kahā maiṃ gāī| āgili kathā sunahu mana lāī||
bisvāmitra mahāmuni gyānī| basahi bipina subha āśrama jānī||
Meaning यह सब चरित्र मैंने गाकर (बखानकर) कहा। अब आगेकी कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वनमें शुभ आश्रम (पवित्र स्थान) जानकर बसते थे,॥ १॥
जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥
देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥
jaham̐ japa jagya muni karahī| ati mārīca subāhuhi ḍarahīṃ||
dekhata jagya nisācara dhāvahi| karahi upadrava muni dukha pāvahiṃ||
Meaning जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, परन्तु मारीच और सुबाहुसे बहुत डरते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि [बहुत] दुःख पाते थे॥ २॥
गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी॥
तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥
gādhitanaya mana ciṃtā byāpī| hari binu marahi na nisicara pāpī||
taba munivara mana kīnha bicārā| prabhu avatareu harana mahi bhārā||
Meaning गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीके मनमें चिन्ता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान्के [ मारे] बिना न मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनिने मनमें विचार किया कि प्रभुने पृथ्वीका भार हरनेके लिये अवतार लिया है॥ ३॥
एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई॥
ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना॥
ehum̐ misa dekhauṃ pada jāī| kari binatī ānau dou bhāī||
gyāna birāga sakala guna ayanā| so prabhu mai dekhaba bhari nayanā||
Meaning इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणोंका दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयोंको ले आऊँ। [ अहा!] जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणोंके धाम हैं, उन प्रभुको मैं नेत्र भरकर देखूँगा॥ ४॥
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥ २०६॥
bahubidhi karata manoratha jāta lāgi nahiṃ bāra|
kari majjana saraū jala gae bhūpa darabāra|| 206||
Meaning बहुत प्रकारसे मनोरथ करते हुए जानेमें देर नहीं लगी। सरयूजीके जलमें स्नान करके वे राजाके दरवाजेपर पहुँचे॥ २०६॥
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा॥
करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥
muni āgamana sunā jaba rājā| milana gayaū lai bipra samājā||
kari daṃḍavata munihi sanamānī| nija āsana baiṭhārenhi ānī||
Meaning राजाने जब मुनिका आना सुना, तब वे ब्राह्मणोंके समाजको साथ लेकर मिलने गये और दण्डवत् करके मुनिका सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसनपर बैठाया॥ १॥
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥
बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा॥
carana pakhāri kīnhi ati pūjā| mo sama āju dhanya nahiṃ dūjā||
bibidha bhām̐ti bhojana karavāvā| munivara hṛdayam̐ haraṣa ati pāvā||
Meaning चरणोंको धोकर बहुत पूजा की और कहा-गेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है। फिर अनेक प्रकारके भोजन करवाये, जिससे श्रेष्ठ मुनिने अपने हृदयमें बहुत ही हर्ष प्राप्त किया॥ २॥
पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥
भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥
puni caranani mele suta cārī| rāma dekhi muni deha bisārī||
bhae magana dekhata mukha sobhā| janu cakora pūrana sasi lobhā||
Meaning फिर राजाने चारों पुत्रोंको मुनिके चरणोंपर डाल दिया (उनसे प्रणाम कराया)। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर मुनि अपनी देहकी सुधि भूल गये। वे श्रीरामजीके मुखकी शोभा देखते ही ऐसे मग्र हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमाको देखकर लुभा गया हो॥ ३॥
तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥
taba mana haraṣi bacana kaha rāū| muni asa kṛpā na kīnhihu kāū||
kehi kārana āgamana tumhārā| kahahu so karata na lāvaum̐ bārā||
Meaning तब राजाने मनमें हर्षित होकर ये वचन कहे-हे मुनि ! इस प्रकार कृपा तो आपने कभी नहीं की। आज किस कारणसे आपका शुभागमन हुआ ? कहिये, मैं उसे पूरा करनेमें देर नहीं लगाऊँगा॥ ४॥
असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥
asura samūha satāvahiṃ mohī| mai jācana āyaum̐ nṛpa tohī||
anuja sameta dehu raghunāthā| nisicara badha maiṃ hoba sanāthā||
Meaning [ मुनिने कहा--] हे राजन् ! राक्षसोंके समूह मुझे बहुत सताते हैं। इसीलिये मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ। छोटे भाईसहित श्रीरघुनाथजीको मुझे दो। राक्षसोंके मारे जानेपर मैं सनाथ (सुरक्षित) हो जाऊँगा॥ ५॥
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥ २०७॥
dehu bhūpa mana haraṣita tajahu moha agyāna|
dharma sujasa prabhu tumha kauṃ inha kaham̐ ati kalyāna|| 207||
Meaning हे राजन् ! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो। हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा॥ २०७॥
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥
चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥
suni rājā ati apriya bānī| hṛdaya kaṃpa mukha duti kumulānī||
cautheṃpana pāyaum̐ suta cārī| bipra bacana nahiṃ kahehu bicārī||
Meaning इस अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। [उन्होंने कहा--] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही॥ १॥
मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥
देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही॥
māgahu bhūmi dhenu dhana kosā| sarbasa deum̐ āju saharosā||
deha prāna teṃ priya kachu nāhī| sou muni deum̐ nimiṣa eka māhī||
Meaning हे मुनि! आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना माँग लीजिये, मैं आज बड़े हर्षके साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राणसे अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पलमें दे दूँगा॥ २॥
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥
saba suta priya mohi prāna ki nāīṃ| rāma deta nahiṃ banai gosāī||
kaham̐ nisicara ati ghora kaṭhorā| kaham̐ suṃdara suta parama kisorā||
Meaning सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो [किसी प्रकार भी] देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके (बिलकुल सुकुमार) मेरे सुन्दर पुत्र!॥ ३॥
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥
तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥
suni nṛpa girā prema rasa sānī| hṛdayam̐ haraṣa mānā muni gyānī||
taba basiṣṭa bahu nidhi samujhāvā| nṛpa saṃdeha nāsa kaham̐ pāvā||
Meaning प्रेम-रसमें सनी हुई राजाकी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजीने हृदयमें बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्टजीने राजाको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे राजाका सन्देह नाशको प्रात हुआ॥ ४॥
अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥
ati ādara dou tanaya bolāe| hṛdayam̐ lāi bahu bhām̐ti sikhāe||
mere prāna nātha suta doū| tumha muni pitā āna nahiṃ koū||
Meaning राजाने बड़े ही आदरसे दोनों पुत्रोंको बुलाया और हृदयसे लगाकर बहुत प्रकारसे उन्हें शिक्षा दी। [फिर कहा--] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! [अब] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं॥ ५॥
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस।
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस॥ २०८ ( क )॥
sauṃpe bhūpa riṣihi suta bahu bidhi dei asīsa|
jananī bhavana gae prabhu cale nāi pada sīsa|| 208 ( ka )||
Meaning राजाने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद देकर पुत्रोंको ऋषिके हवाले कर दिया। फिर प्रभु माताके महलमें गये और उनके चरणोंमें सिर नवाकर चले॥ २०८ (क)॥
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥ २०८ ( ख )॥
puruṣasiṃha dou bīra haraṣi cale muni bhaya harana|
kṛpāsiṃdhu matidhīra akhila bisva kārana karana|| 208 ( kha )||
Meaning पुरुषोंमें सिंहरूप दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) मुनिका भय हरनेके लिये प्रसन्न होकर चले। वे कृपाके समुद्र, धीरबुद्धि और सम्पूर्ण विश्रके कारणके भी कारण हैं॥ २०८ (ख)॥
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥
कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥
aruna nayana ura bāhu bisālā| nīla jalaja tanu syāma tamālā||
kaṭi paṭa pīta kaseṃ bara bhāthā| rucira cāpa sāyaka duhum̐ hāthā||
Meaning भगवान्के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमालके वृक्षकी तरह श्याम शरीर है, कमरमें पीताम्बर [पहने] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथोंमें [ क्रमश: ] सुन्दर धनुष और बाण हैं॥ १॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई॥
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना॥
syāma gaura suṃdara dou bhāī| bisbāmitra mahānidhi pāī||
prabhu brahmanyadeva mai jānā| mohi niti pitā tajehu bhagavānā||
Meaning श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजीको महान् निधि प्राप्त हो गयी। [वे सोचने लगे--] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणोंके भक्त) हैं। मेरे लिये भगवानने अपने पिताको भी छोड़ दिया॥ २॥
चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥
cale jāta muni dīnhi dikhāī| suni tāṛakā krodha kari dhāī||
ekahiṃ bāna prāna hari līnhā| dīna jāni tehi nija pada dīnhā||
Meaning मार्गमें चले जाते हुए मुनिने ताड़काको दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजीने एक ही बाणसे उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया॥ ३॥
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥
जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥
taba riṣi nija nāthahi jiyam̐ cīnhī| bidyānidhi kahum̐ bidyā dīnhī||
jāte lāga na chudhā pipāsā| atulita bala tanu teja prakāsā||
Meaning तब ऋषि विश्वामित्रने प्रभुको मनमें विद्याका भण्डार समझते हुए भी [लीलाको पूर्ण करनेके लिये] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीरमें अतुलित बल और तेजका प्रकाश हो॥ ४॥
आयुष सब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥ २०९॥
āyuṣa saba samarpi kai prabhu nija āśrama āni|
kaṃda mūla phala bhojana dīnha bhagati hita jāni|| 209||
Meaning सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्रीरीमजीको अपने आश्रममें ले आये; और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फलका भोजन कराया॥ २०९॥
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥
prāta kahā muni sana raghurāī| nirbhaya jagya karahu tumha jāī||
homa karana lāge muni jhārī| āpu rahe makha kīṃ rakhavārī||
Meaning सबेरे श्रीरघुनाथजीने मुनिसे कहा--आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्रीरामजी) यज्ञकी रखवालीपर रहे॥ १॥
सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥
suni mārīca nisācara krohī| lai sahāya dhāvā munidrohī||
binu phara bāna rāma tehi mārā| sata jojana gā sāgara pārā||
Meaning यह समाचार सुनकर मुनियोंका शत्रु क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकोंको लेकर दौड़ा। श्रीरामजीने बिना फलवाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजनके विस्तारवाले समुद्रके पार जा गिरा॥ २॥
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥
मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥
pāvaka sara subāhu puni mārā| anuja nisācara kaṭaku sam̐ghārā||
māri asura dvija nirmayakārī| astuti karahiṃ deva muni jhārī||
Meaning फिर सुबाहुको अग्निबाण मारा। इधर छोटे भाई लक्ष्मणजीने राक्षसोंकी सेनाका संहार कर डाला। इस प्रकार श्रीरामजीने राक्षसोंको मारकर ब्राह्मणोंको निर्भय कर दिया। तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे॥ ३॥
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥
भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥
taham̐ puni kachuka divasa raghurāyā| rahe kīnhi bipranha para dāyā||
bhagati hetu bahu kathā purānā| kahe bipra jadyapi prabhu jānā||
Meaning श्रीरघुनाथजीने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणोंपर दया की। भक्तिके कारण ब्राह्मणोंने उन्हें पुराणोंकी बहुत-सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे॥ ४॥
तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥
धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥
taba muni sādara kahā bujhāī| carita eka prabhu dekhia jāī||
dhanuṣajagya muni raghukula nāthā| haraṣi cale munibara ke sāthā||
Meaning तदनन्तर मुनिने आदरपूर्वक समझाकर कहा--हे प्रभो ! चलकर एक चरित्र देखिये। रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञ [ की बात] सुनकर मुनिश्रेष्ठ विधामित्रजीके साथ प्रसन्न होकर चले॥ ५॥
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥
āśrama eka dīkha maga māhīṃ| khaga mṛga jīva jaṃtu taham̐ nāhīṃ||
pūchā munihi silā prabhu dekhī| sakala kathā muni kahā biseṣī||
Meaning मार्गमें एक आश्रम दिखायी पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थरकी एक शिलाको देखकर प्रभुने पूछा, तब मुनिने विस्तारपूर्वक सब कथा कही॥ ६॥
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥ २१०॥
gautama nāri śrāpa basa upala deha dhari dhīra|
carana kamala raja cāhati kṛpā karahu raghubīra|| 210||
Meaning गौतम मुनिकी स्त्री अहल्या शापवश पत्थरकी देह धारण किये बड़े धीरजसे आपके चरणकमलोंकी धूलि चाहती है। हे रघुवीर! इसपर कृपा कीजिये॥ २१०॥
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥
parasata pada pāvana soka nasāvana pragaṭa bhaī tapapuṃja sahī|
dekhata raghunāyaka jana sukha dāyaka sanamukha hoi kara jori rahī||
ati prema adhīrā pulaka sarīrā mukha nahiṃ āvai bacana kahī|
atisaya baṛabhāgī carananhi lāgī jugala nayana jaladhāra bahī||
Meaning श्रीरामजीके पवित्र और शोकको नाश करनेवाले चरणोंका स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोभमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी। भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीको देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी। अत्यन्त प्रेमके कारण वह अधीर हो गयी। उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुखसे वचन कहनेमें नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभुके चरणोंसे लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रोंसे जल (प्रेम और आनन्दके आँसुओं) की धारा बहने लगी॥ १॥
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥
dhīraju mana kīnhā prabhu kahum̐ cīnhā raghupati kṛpām̐ bhagati pāī|
ati nirmala bānīṃ astuti ṭhānī gyānagamya jaya raghurāī||
mai nāri apāvana prabhu jaga pāvana rāvana ripu jana sukhadāī|
rājīva bilocana bhava bhaya mocana pāhi pāhi saranahiṃ āī||
Meaning फिर उसने मनमें धीरज धरकर प्रभुको पहचाना और श्रीरघुनाथजीकी कृपासे भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणीसे उसने [इस प्रकार] स्तुति प्रारम्भ की--हे ज्ञानसे जानने योग्य श्रीरघुनाथजी ! आपकी जय हो! मैं [सहज ही] अपवित्र स्त्री हूं; और हे प्रभो ! आप जगतूको पवित्र करनेवाले, भक्तोंको सुख देनेवाले और रावणके शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भयसे छुड़ानेवाले ! मैं आपकी शरण आयी हूँ, [मेरी] रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥ २॥
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।
muni śrāpa jo dīnhā ati bhala kīnhā parama anugraha maiṃ mānā|
dekheum̐ bhari locana hari bhavamocana ihai lābha saṃkara jānā||
binatī prabhu morī maiṃ mati bhorī nātha na māgaum̐ bara ānā|
pada kamala parāgā rasa anurāgā mama mana madhupa karai pānā|
Meaning मुनिने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसारसे छुड़ानेवाले श्रीहरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सब्से बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धिकी बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरणकमलकी रजके प्रेमरूपी रसका सदा पान करता रहे॥ ३॥
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
jehiṃ pada surasaritā parama punītā pragaṭa bhaī siva sīsa dharī|
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी॥
soi pada paṃkaja jehi pūjata aja mama sira dhareu kṛpāla harī||
ehi bhām̐ti sidhārī gautama nārī bāra bāra hari carana parī|
jo ati mana bhāvā so baru pāvā gai patiloka anaṃda bharī||
Meaning जिन चरणोंसे परमपवित्र देवनदी गड़ाजी प्रकट हुई, जिन्हें शिवजीने सिरपर धारण किया और जिन चरणकमलोंको ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हींको मेरे सिरपर रखा। इस प्रकार [स्तुति करती हुई] बार-बार भगवान्के चरणोंमें गिरकर, जो मनको बहुत ही अच्छा लगा, उस वरको पाकर गौतमकी स्त्री अहल्या आनन्दमें भरी हुई पतिलोकको चली गयी॥ ४॥
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ २४११॥
asa prabhu dīnabaṃdhu hari kārana rahita dayāla|
tulasidāsa saṭha tehi bhaju chāṛi kapaṭa jaṃjāla|| 2411||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [मन]! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर॥ २११॥
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥
गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥
cale rāma lachimana muni saṃgā| gae jahām̐ jaga pāvani gaṃgā||
gādhisūnu saba kathā sunāī| jehi prakāra surasari mahi āī||
Meaning श्रीरीमजी और लक्ष्मणजी मुनिके साथ चले। वे वहाँ गये, जहाँ जगत्को पवित्र करनेवाली गड़्ाजी थीं। महाराज गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीने वह सब कथा कह सुनायी जिस प्रकार देवनदी गड़ाजी पृथ्वीपर आयी थीं॥ १॥
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥
taba prabhu riṣinha sameta nahāe| bibidha dāna mahidevanhi pāe||
haraṣi cale muni bṛṃda sahāyā| begi bideha nagara niarāyā||
Meaning तब प्रभुने ऋषियोंसहित [गज़ाजीमें] स्नान किया। ब्राह्मणोंने भाँति-भाँतिके दान पाये। फिर मुनिवृन्दके साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुरके निकट पहुँच गये॥ २॥
पुर रम्यता राम जब देखी।
हरषे अनुज समेत बिसेषी॥
pura ramyatā rāma jaba dekhī| haraṣe anuja sameta biseṣī||
Meaning श्रीरामजीने जब जनकपुरकी शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृतके समान जल है और मणियोंकी सीढ़ियाँ [बनी हुई] हैं॥ ३॥
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥
बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥
guṃjata maṃju matta rasa bhṛṃgā| kūjata kala bahubarana bihaṃgā||
barana barana bikase bana jātā| tribidha samīra sadā sukhadātā||
Meaning मकरन्द-रससे मतवाले होकर भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [ बहुत-से] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंगके कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओंें ) सुख देनेवाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है॥ ४॥
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥ २१२॥
sumana bāṭikā bāga bana bipula bihaṃga nivāsa|
phūlata phalata supallavata sohata pura cahum̐ pāsa|| 212||
Meaning पुष्पवाटिका (फुलवारी ), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियोंका निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तोंसे लदे हुए नगरके चारों ओर सुशोभित हैं॥ २१२॥
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥
चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥
banai na baranata nagara nikāī| jahām̐ jāi mana taham̐im̐ lobhāī||
cāru bajāru bicitra am̐bārī| manimaya bidhi janu svakara sam̐vārī||
Meaning नगरकी सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है; वहीं लुभा जाता (रम जाता) है। सुन्दर बाजार है, मणियोंसे बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्माने उन्हें अपने हाथोंसे बनाया है॥ १॥
धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना॥
चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥
dhanika banika bara dhanada samānā| baiṭha sakala bastu lai nānā||
cauhaṭa suṃdara galīṃ suhāī| saṃtata rahahiṃ sugaṃdha siṃcāī||
Meaning कुबेरके समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकारकी अनेक वस्तुएँ लेकर [ दूकानोंमें। बैठे हैं। सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धसे सिंची रहती हैं॥ २॥
मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें॥
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥
maṃgalamaya maṃdira saba kereṃ| citrita janu ratinātha citereṃ||
pura nara nāri subhaga suci saṃtā| dharamasīla gyānī gunavaṃtā||
Meaning सबके घर मज़्लमय हैं और उनपर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकारने अंकित किया है। नगरके [सभी] स्त्री-पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु-स्वभाववाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं॥ ३॥
अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥
ati anūpa jaham̐ janaka nivāsū| bithakahiṃ bibudha biloki bilāsū||
hota cakita cita koṭa bilokī| sakala bhuvana sobhā janu rokī||
Meaning जहाँ जनकजीका अत्यन्त अनुपम (सुन्दर) निवासस्थान (महल) है, वहाँके विलास (ऐश्वर्य)को देखकर देवता भी थकित (स्तम्भित) हो जाते हैं [मनुष्योंकी तो बात ही क्या !]। कोट (राजमहलके परकोटे) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, [ऐसा मालूम होता है] मानो उसने समस्त लोकोंकी शोभाको रोक (घेर) रखा है॥ ४॥
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥ २१३॥
dhavala dhāma mani puraṭa paṭa sughaṭita nānā bhām̐ti|
siya nivāsa suṃdara sadana sobhā kimi kahi jāti|| 213||
Meaning उज्ज्वल महलोंमें अनेक प्रकारके सुन्दर रीतिसे बने हुए मणिजटित सोनेकी जरीके परदे लगे हैं। सीताजीके रहनेके सुन्दर महलकी शोभाका वर्णन किया ही कैसे जा सकता है॥ २१३॥
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥
बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥
subhaga dvāra saba kulisa kapāṭā| bhūpa bhīra naṭa māgadha bhāṭā||
banī bisāla bāji gaja sālā| haya gaya ratha saṃkula saba kālā||
Meaning राजमहलके सब दरवाजे (फाटक) सुन्दर हैं, जिनमें वज्रके (मजबूत अथवा हीरोंके चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं। वहाँ [मातहत] राजाओं, नटों, मागधों और भाटोंकी भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियोंके लिये बहुत बड़ी-बड़ी घुड़शालें और गजशालाएँ (फीलखाने ) बनी हुई हैं; जो सब समय घोड़े, हाथी और रथोंसे भरी रहती हैं॥ १॥
सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥
पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥
sūra saciva senapa bahutere| nṛpagṛha sarisa sadana saba kere||
pura bāhera sara sārita samīpā| utare jaham̐ taham̐ bipula mahīpā||
Meaning बहुत-से शूरवीर, मन्त्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल-सरीखे ही हैं। नगरके बाहर तालाब और नदीके निकट जहाँ-तहाँ बहुत-से राजालोग उतरे हुए (डेरा डाले हुए) हैं॥ २॥
देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई॥
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥
dekhi anūpa eka am̐varāī| saba supāsa saba bhām̐ti suhāī||
kausika kaheu mora manu mānā| ihām̐ rahia raghubīra sujānā||
Meaning [वहीं ] आमोंका एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकारके सुभीते थे और जो सब तरहसे सुहावना था, विश्वामित्रजीने कहा--हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाय॥ ३॥
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता॥
बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥
bhalehiṃ nātha kahi kṛpāniketā| utare taham̐ munibṛṃda sametā||
bisvāmitra mahāmuni āe| samācāra mithilāpati pāe||
Meaning कृपाके धाम श्रीरामचन्द्रजी * बहुत अच्छा स्वामिन् !' कहकर वहीं मुनियोंके समूहके साथ ठहर गये। मिथिलापति जनकजीने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं,॥ ४॥
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।
चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति॥ २१४॥
saṃga saciva suci bhūri bhaṭa bhūsura bara gura gyāti|
cale milana munināyakahi mudita rāu ehi bhām̐ti|| 214||
Meaning तब उन्होंने पवित्र हदयके (ईमानदार, स्वामिभक्त) मन्त्री, बहुत-से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु ( शतानन्दजी ) और अपनी जातिके श्रेष्ठ लोगोंको साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नताके साथ राजा मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीसे मिलने चले॥ २१४॥
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥
बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥
kīnha pranāmu carana dhari māthā| dīnhi asīsa mudita munināthā||
biprabṛṃda saba sādara baṃde| jāni bhāgya baṛa rāu anaṃde||
Meaning राजाने मुनिके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमण्डलीको आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनन्दित हुए॥ १॥
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥
तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥
kusala prasna kahi bārahiṃ bārā| bisvāmitra nṛpahi baiṭhārā||
tehi avasara āe dou bhāī| gae rahe dekhana phulavāī||
Meaning बार-बार कुशलप्रश्न करके विश्वामित्रजीने राजाको बैठाया। उसी समय दोनों भाई आ पहुँचे, जो फुलवाड़ी देखने गये थे॥ २॥
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥
उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥
syāma gaura mṛdu bayasa kisorā| locana sukhada bisva cita corā||
uṭhe sakala jaba raghupati āe| bisvāmitra nikaṭa baiṭhāe||
Meaning सुकुमार किशोर अवस्थावाले, श्याम और गौर वर्णके दोनों कुमार नेत्रोंको सुख देनेवाले और सारे विश्वके चित्तको चुरानेवाले हैं। जब रघुनाथजी आये तब सभी [उनके रूप एवं तेजसे प्रभावित होकर] उठकर खड़े हो गये। विश्वामित्रजीने उनको अपने पास बैठा लिया॥ ३॥
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥
bhae saba sukhī dekhi dou bhrātā| bāri bilocana pulakita gātā||
mūrati madhura manohara dekhī| bhayau bidehu bidehu biseṣī||
Meaning दोनों भाइयोंको देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रोंगें जल भर आया (आनन्द और प्रेमके आँसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमाद्ित हो उठे। रामजीकी मधुर मनोहर मूर्तिको देखकर विदेह (जनक) विशेषरूपसे विदेह (देहकी सुध-बुधसे रहित) हो गये॥ ४॥
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥ २१५॥
prema magana manu jāni nṛpu kari bibeku dhari dhīra|
boleu muni pada nāi siru gadagada girā gabhīra|| 215||
Meaning मनको प्रेममें मग्न जान राजा जनकने विवेकका आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर गदूद (प्रेमभरी ) गम्भीर वाणीसे कहा--॥ २१५॥
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥
kahahu nātha suṃdara dou bālaka| munikula tilaka ki nṛpakula pālaka||
brahma jo nigama neti kahi gāvā| ubhaya beṣa dhari kī soi āvā||
Meaning हे नाथ! कहिये, ये दोनों ' सुन्दर बालक मुनिकुलके आभूषण हैं या किसी राजवंशके पालक ? अथवा जिसका वेदोंने नेति' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है ?॥ १॥
सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥
sahaja birāgarupa manu morā| thakita hota jimi caṃda cakorā||
tāte prabhu pūchaum̐ satibhāū| kahahu nātha jani karahu durāū||
Meaning मेरा मन जो स्वभावसे ही वैराग्यरूप [बना हुआ] है, [इन्हें देखकर] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर। हे प्रभो ! इसलिये मैं आपसे सत्य (निश्छल) भावसे पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये॥ २॥
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥
inhahi bilokata ati anurāgā| barabasa brahmasukhahi mana tyāgā||
kaha muni bihasi kahehu nṛpa nīkā| bacana tumhāra na hoi alīkā||
Meaning इनको देखते ही अत्यन्त प्रेमके वश होकर मेरे मनने जबर्दस्ती ब्रहासुखको त्याग दिया है। मुनिने हँसकर कहा->हे राजन् ! आपने ठीक (यथार्थ ही) कहा। आपका वचन मिशथ्या नहीं हो सकता॥ ३॥
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥
रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥
e priya sabahi jahām̐ lagi prānī| mana musukāhiṃ rāmu suni bānī||
raghukula mani dasaratha ke jāe| mama hita lāgi naresa paṭhāe||
Meaning जगतमें जहाँतक (जितने भी) प्राणी हैं, ये सभीको प्रिय हैं। मुनिकी [ रहस्यभरी] वाणी सुनकर श्रीराीमजी मन-ही-मन मुसकराते हैं ( हँसकर मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिये नहीं )। [ तब मुनिने कहा-] ये रघुकुलमणि महाराज दशरथके पुत्र हैं। मेरे हितके लिये राजाने इन्हें मेरे साथ भेजा है॥ ४॥
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम॥ २१६॥
rāmu lakhanu dou baṃdhubara rūpa sīla bala dhāma|
makha rākheu sabu sākhi jagu jite asura saṃgrāma|| 216||
Meaning ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बलके धाम हैं। सारा जगत् [इस बातका;] साक्षी है कि इन्होंने युद्धमें असुरोंको जीतकर मेरे यज्ञकी रक्षा की है॥ २१६॥