सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥
sārada śruti seṣā riṣaya aseṣā jā kahum̐ kou nahi jānā|
jehi dīna piāre beda pukāre dravau so śrībhagavānā||
bhava bāridhi maṃdara saba bidhi suṃdara gunamaṃdira sukhapuṃjā|
muni siddha sakala sura parama bhayātura namata nātha pada kaṃjā||
Meaning सरस्वती, वेद, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान्ू हमपर दया करें। हे संसाररूपी समुद्रके [ मथनेके ] लिये मन्दराचलरूप, सब प्रकारसे सुन्दर, गुणोंके धाम और सुखोंकी राशि नाथ! आपके चरणकमलोंमें मुनि, सिद्ध और सारे देवता भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं॥ ४॥
जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भड़ हरनि सोक संदेह॥ १८६॥
jāni sabhaya sura bhūmi suni bacana sameta saneha|
gaganagirā gaṃbhīra bhaṛa harani soka saṃdeha|| 186||
Meaning देवता और पृथ्वीको भयभीत जानकर और उनके स्नेहयुक्त वचन सुनकर शोक और सन्देहको हरनेवाली गम्भीर आकाशवाणी हुई--॥ १८६॥
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥
jani ḍarapahu muni siddha suresā| tumhahi lāgi dharihaum̐ nara besā||
aṃsanha sahita manuja avatārā| lehaum̐ dinakara baṃsa udārā||
Meaning हे मुनि, सिद्ध और देवताओंके स्वामियो! डरो मत। तुम्हारे लिये मैं मनुष्यका रूप धारण करूँगा और उदार (पवित्र) सूर्यवंशमें अंशोंसहित मनुष्यका अवतार लूँगा॥ १॥
कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा॥
kasyapa aditi mahātapa kīnhā| tinha kahum̐ maiṃ pūraba bara dīnhā||
te dasaratha kausalyā rūpā| kosalapurīṃ pragaṭa narabhūpā||
Meaning कश्यप और अदितिने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ। वे ही दशरथ और कौसल्याके रूपमें मनुष्योंके राजा होकर श्रीअयोध्यापुरीमें प्रकट हुए हैं॥ २॥
तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥
tinha ke gṛha avatarihaum̐ jāī| raghukula tilaka so cāriu bhāī||
nārada bacana satya saba karihaum̐| parama sakti sameta avatarihaum̐||
Meaning उन्हींके घर जाकर मैं रघुकुलमें श्रेष्ठ चार भाइयोंके रूपमें अवतार लूँगा। नारदके सब वचन मैं सत्य करूँगा और अपनी पराशक्तिके सहित अवतार लूँगा॥ ३॥
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥
गगन ब्रह्मबानी सुनी काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना॥
harihaum̐ sakala bhūmi garuāī| nirbhaya hohu deva samudāī||
gagana brahmabānī sunī kānā| turata phire sura hṛdaya juṛānā||
Meaning मैं पृथ्वीका सब भार हर लूँगा। हे देववृन्द ! तुम निर्भय हो जाओ। आकाशगें ब्रह्म ( भगवान्) की वाणीको कानसे सुनकर देवता तुरंत लौट गये। उनका हृदय शीतल हो गया॥ ४॥
तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा।
अभय भई भरोस जियँ आवा॥
taba brahmā dharanihi samujhāvā| abhaya bhaī bharosa jiyam̐ āvā||
Meaning तब ब्रह्माजीने पृथ्वीको समझाया। वह भी निर्भय हुई और उसके जीमें भरोसा (ढाढ्स) आ गया॥ ५॥
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥ १८७॥
nija lokahi biraṃci ge devanha ihai sikhāi|
bānara tanu dhari dhari mahi hari pada sevahu jāi|| 187||
Meaning देवताओंको यही सिखाकर कि वानरोंका शरीर धर-धरकर तुमलोग पृथ्वीपर जाकर भगवान्के चरणोंकी सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये॥ १८७॥
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥
gae deva saba nija nija dhāmā| bhūmi sahita mana kahum̐ biśrāmā||
jo kachu āyasu brahmām̐ dīnhā| haraṣe deva bilaṃba na kīnhā||
Meaning सब देवता अपने-अपने लोकको गये। पृथ्वीसहित सबके मनको शान्ति मिली। ब्रह्माजीने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने [वैसा करनेमें] देर नहीं की॥ १॥
बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं॥
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥
banacara deha dhari chiti māhīṃ| atulita bala pratāpa tinha pāhīṃ||
giri taru nakha āyudha saba bīrā| hari māraga citavahiṃ matidhīrā||
Meaning पृथ्वीपर उन्होंने वानरदेह धारण की। उनमें अपार बल और प्रताप था। सभी शूरवीर थे; पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके शस्त्र थे। वे धीर बुद्धिवाले [ वानररूप देवता] भगवान्के आनेकी राह देखने लगे॥ २॥
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥
giri kānana jaham̐ taham̐ bhari pūrī| rahe nija nija anīka raci rūrī||
yaha saba rucira carita maiṃ bhāṣā| aba so sunahu jo bīcahiṃ rākhā||
Meaning वे [वानर] पर्वतों और जंगलोंमें जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुन्दर सेना बनाकर भरपूर छा गये। यह सब सुन्दर चरित्र मैंने कहा। अब वह चरित्र सुनो जिसे बीचहीमें छोड़ दिया था॥ ३॥
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥
avadhapurīṃ raghukulamani rāū| beda bidita tehi dasaratha nāūm̐||
dharama dhuraṃdhara gunanidhi gyānī| hṛdayam̐ bhagati mati sāram̐gapānī||
Meaning अवधपुरीमें रघुकुलशिरोमणि दशरथ नामके राजा हुए, जिनका नाम वेदोंमें विख्यात है। वे धर्म- धुरन्धर, गुणोंके भण्डार और ज्ञानी थे। उनके हृदयमें शा धनुष धारण करनेवाले भगवान्की भक्ति थी, और उनकी बुद्धि भी उन्हींमें लगी रहती थी॥ ४॥
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥ १८८॥
kausalyādi nāri priya saba ācarana punīta|
pati anukūla prema dṛṛha hari pada kamala binīta|| 188||
Meaning उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरणवाली थीं। वे [बड़ी] विनीत और पतिके अनुकूल [चलनेवाली] थीं और श्रीहरिकि चरणकमलोंमें उनका दृढ़ प्रेम था॥ १८८॥
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥
eka bāra bhūpati mana māhīṃ| bhai galāni moreṃ suta nāhīṃ||
gura gṛha gayau turata mahipālā| carana lāgi kari binaya bisālā||
Meaning एक बार राजाके मनमें बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरुके घर गये और चरणोंमें प्रणाम कर बहुत विनय की॥ १॥
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥
nija dukha sukha saba gurahi sunāyau| kahi basiṣṭha bahubidhi samujhāyau||
dharahu dhīra hoihahiṃ suta cārī| tribhuvana bidita bhagata bhaya hārī||
Meaning राजाने अपना सारा दुःख-सुख गुरुको सुनाया। गुरु वसिष्टजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया [और कहा-] धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध और भक्तोंके भयको हरनेवाले होंगे॥ २॥
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥
sṛṃgī riṣahi basiṣṭha bolāvā| putrakāma subha jagya karāvā||
bhagati sahita muni āhuti dīnheṃ| pragaṭe agini carū kara līnheṃ||
Meaning वसिष्टजीने श्रूज़्ी ऋषिको बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। मुनिके भक्तिसहित आहुतियाँ देनेपर अग्निदेव हाथमें चरु (हविष्यान्न खीर) लिये प्रकट हुए॥ ३॥
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥
jo basiṣṭha kachu hṛdayam̐ bicārā| sakala kāju bhā siddha tumhārā||
yaha habi bām̐ṭi dehu nṛpa jāī| jathā joga jehi bhāga banāī||
Meaning [ और दशरथसे बोले-] वसिष्टने हृदयमें जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया। हे राजन्! [अब] तुम जाकर इस हविष्यान्न (पायस) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो॥ ४॥
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥ १८९॥
taba adṛsya bhae pāvaka sakala sabhahi samujhāi|
paramānaṃda magana nṛpa haraṣa na hṛdayam̐ samāi|| 189||
Meaning तदनन्तर अग्निदेव सारी सभाको समझाकर अन्तर्धान हो गये। राजा परमानन्दमें मग्न हो गये, उनके हृदयमें हर्ष समाता न था॥ १८९॥
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई॥
अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥
tabahiṃ rāyam̐ priya nāri bolāīṃ| kausalyādi tahām̐ cali āī||
ardha bhāga kausalyāhi dīnhā| ubhaya bhāga ādhe kara kīnhā||
Meaning उसी समय राजाने अपनी प्यारी पत्नियोंको बुलाया। कौसल्या आदि सब [रानियाँ] वहाँ चली आयीं। राजाने [ पायसका] आधा भाग कौसल्याको दिया, [और शेष] आधेके दो भाग किये॥ १॥
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥
kaikeī kaham̐ nṛpa so dayaū| rahyo so ubhaya bhāga puni bhayaū||
kausalyā kaikeī hātha dhari| dīnha sumitrahi mana prasanna kari||
Meaning वह (उनमेंसे एक भाग) राजाने कैकेयीको दिया। शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और राजाने उनको कौसल्या और कैकेयीके हाथपर रखकर ( अर्थात् उनकी अनुमति लेकर) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्राको दिया॥ २॥
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥
ehi bidhi garbhasahita saba nārī| bhaīṃ hṛdayam̐ haraṣita sukha bhārī||
jā dina teṃ hari garbhahiṃ āe| sakala loka sukha saṃpati chāe||
Meaning इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं। वे हृदयमें बहुत हर्षित हुईं। उन्हें बड़ा सुख मिला। जिस दिनसे श्रीहरि [लीलासे ही] गर्भमें आये, सब लोकोंमें सुख और सम्पत्ति छा गयी॥ ३॥
मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं॥
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥
maṃdira maham̐ saba rājahiṃ rānī| sobhā sīla teja kī khānīṃ||
sukha juta kachuka kāla cali gayaū| jehiṃ prabhu pragaṭa so avasara bhayaū||
Meaning शोभा, शील और तेजकी खान [बनी हुई] सब रानियाँ महलमें सुशोभित हुईं। इस प्रकार कुछ समय सुखपूर्वक बीता और वह अवसर आ गया जिसमें प्रभुको प्रकट होना था॥ ४॥
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥ १९०॥
joga lagana graha bāra tithi sakala bhae anukūla|
cara aru acara harṣajuta rāma janama sukhamūla|| 190||
Meaning योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गये। जड और चेतन सब हर्षसे भर गये। [क्योंकि] श्रीरामका जन्म सुखका मूल है॥ १९०॥
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
naumī tithi madhu māsa punītā| sukala paccha abhijita hariprītā||
madhyadivasa ati sīta na ghāmā| pāvana kāla loka biśrāmā||
Meaning पवित्र चैत्रका महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवान्का प्रिय अभिजित् मुर्ूर्त था। दोपहरका समय था। न बहुत सरदी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकोंको शान्ति देनेवाला था॥ १॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥
sītala maṃda surabhi baha bāū| haraṣita sura saṃtana mana cāū||
bana kusumita girigana maniārā| stravahiṃ sakala saritā'mṛtadhārā||
Meaning शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतोंके मनमें [बड़ा] चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतोंके समूह मणियोंसे जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृतकी धारा बहा रही थीं॥ २॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल सकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥
so avasara biraṃci jaba jānā| cale sakala sura sāji bimānā||
gagana bimala sakula sura jūthā| gāvahiṃ guna gaṃdharba barūthā||
Meaning जब ब्रह्माजीने वह ( भगवान्के प्रकट होनेका) अवसर जाना तब [उनके समेत] सारे देवता विमान सजा-सजाकर चले। निर्मल आकाश देवताओंके समूहोंसे भर गया। गन्धवोँके दल गुणोंका गान करने लगे॥ ३॥
बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥
baraṣahiṃ sumana suaṃjali sājī| gahagahi gagana duṃdubhī bājī||
astuti karahiṃ nāga muni devā| bahubidhi lāvahiṃ nija nija sevā||
Meaning और सुन्दर अज्जलियोंमें सजा-सजाकर पुष्प बरसाने लगे। आकाशमें घमाघम नगाड़े बजने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकारसे अपनी-अपनी सेवा (उपहार) भेंट करने लगे॥ ४॥
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥ १९१॥
sura samūha binatī kari pahum̐ce nija nija dhāma|
jaganivāsa prabhu pragaṭe akhila loka biśrāma|| 191||
Meaning देवताओंके समूह विनती करके अपने-अपने लोकमें जा पहुँचे। समस्त लोकोंको शान्ति देनेवाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए॥ १९१॥
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
bhae pragaṭa kṛpālā dīnadayālā kausalyā hitakārī|
haraṣita mahatārī muni mana hārī adbhuta rūpa bicārī||
locana abhirāmā tanu ghanasyāmā nija āyudha bhuja cārī|
bhūṣana banamālā nayana bisālā sobhāsiṃdhu kharārī||
Meaning दीनोंपर दया करनेवाले, कौसल्याजीके हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियोंके मनको हरनेवाले उनके अद्भुत रूपका विचार करके माता हर्षसे भर गयी। नेत्रोंको आनन्द देनेवाला मेघके समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओंमें अपने (खास) आयुध [ धारण किये हुए] थे; [दिव्य] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभाके समुद्र तथा खर राक्षसको मारनेवाले भगवान् प्रकट हुए॥ १॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
kaha dui kara jorī astuti torī kehi bidhi karauṃ anaṃtā|
māyā guna gyānātīta amānā beda purāna bhanaṃtā||
karunā sukha sāgara saba guna āgara jehi gāvahiṃ śruti saṃtā|
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥
so mama hita lāgī jana anurāgī bhayau pragaṭa śrīkaṃtā||
Meaning दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी--हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञानसे परे और परिमाणरहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुखका समुद्र, सब गुणोंका धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तोंपर प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् मेरे कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं॥ २॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
brahmāṃḍa nikāyā nirmita māyā roma roma prati beda kahai|
mama ura so bāsī yaha upahāsī sunata dhīra pati thira na rahai||
upajā jaba gyānā prabhu musakānā carita bahuta bidhi kīnha cahai|
kahi kathā suhāī mātu bujhāī jehi prakāra suta prema lahai||
Meaning वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोममें मायाके रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह [ भरे] हैं। वे तुम मेरे गर्भमें रहे-इस हँसीकी बातके सुननेपर धीर (विवेकी) पुरुषोंकी बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)। जब माताको ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराये। वे बहुत प्रकारके चरित्र करना चाहते हैं। अत: उन्होंने [ पूर्वजन्मकी] सुन्दर कथा कहकर माताको समझाया, जिससे उन्हें पुत्रका (वात्सल्य) प्रेम प्राप्त हो ( भगवान्के प्रति पुत्रभाव हो जाय)॥ ३॥
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥
mātā puni bolī so mati ḍaulī tajahu tāta yaha rūpā|
kījai sisulīlā ati priyasīlā yaha sukha parama anūpā||
suni bacana sujānā rodana ṭhānā hoi bālaka surabhūpā|
yaha carita je gāvahiṃ haripada pāvahiṃ te na parahiṃ bhavakūpā||
Meaning माताकी वह बुद्धि बदल गयी, तब वह फिर बोली--हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, [मेरे लिये] यह सुख परम अनुपम होगा। [ माताका] यह वचन सुनकर देवताओंके स्वामी सुजान भगवान्ने बालक [रूप] होकर रोना शुरू कर दिया। [तुलसीदासजी कहते हैं--] जो इस चरित्रका गान करते हैं, वे श्रीहरिका पद पाते हैं और [फिर] संसाररूपी कूपमें नहीं गिरते॥ ४॥
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ १९२॥
bipra dhenu sura saṃta hita līnha manuja avatāra|
nija icchā nirmita tanu māyā guna go pāra|| 192||
Meaning ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्ने मनुष्यका अवतार लिया। वे [अज्ञानमयी, मलिना] माया और उसके गुण (सत्, रज, तम) और [बाहरी तथा भीतरी] इन्द्रियोंसे परे हैं। उनका [दिव्य] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोके द्वारा नहीं ]॥ १९२॥
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥
suni sisu rudana parama priya bānī| saṃbhrama cali āī saba rānī||
haraṣita jaham̐ taham̐ dhāīṃ dāsī| ānam̐da magana sakala purabāsī||
Meaning बच्चेके रोनेकी बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनन्दमें मग्र हो गये॥ १॥
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥
परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा॥
dasaratha putrajanma suni kānā| mānahum̐ brahmānaṃda samānā||
parama prema mana pulaka sarīrā| cāhata uṭhata karata mati dhīrā||
Meaning राजा दशरथजी पुत्रका जन्म कानोंसे सुनकर मानो ब्रह्मानन्दमें समा गये। मनमें अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया। [ आनन्दमें अधीर हुई] बुद्धिको धीरज देकर [ और प्रेममें शिथिल हुए शरीरको सँभालकर] वे उठना चाहते हैं॥ २॥
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥
jākara nāma sunata subha hoī| moreṃ gṛha āvā prabhu soī||
paramānaṃda pūri mana rājā| kahā bolāi bajāvahu bājā||
Meaning जिनका नाम सुननेसे ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। [यह सोचकर] राजाका मन परम आनन्दसे पूर्ण हो गया। उन्होंने बाजेवालोंको बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ॥ ३॥
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥
gura basiṣṭha kaham̐ gayau ham̐kārā| āe dvijana sahita nṛpadvārā||
anupama bālaka dekhenhi jāī| rūpa rāsi guna kahi na sirāī||
Meaning गुरु वसिष्टठजीके पास बुलावा गया। वे ब्राह्मणोंको साथ लिये राजद्वारपर आये। उन्होंने जाकर अनुपम बालकको देखा, जो रूपकी राशि है और जिसके गुण कहनेसे समाप्त नहीं होते॥ ४॥
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥ १९३॥
naṃdīmukha sarādha kari jātakarama saba kīnha|
hāṭaka dhenu basana mani nṛpa bipranha kaham̐ dīnha|| 193||
Meaning फिर राजाने नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म-संस्कार आदि किये और ब्राह्मणोंको सोना, गौ, वस्त्र और मणियोंका दान दिया॥ १९३॥
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥
dhvaja patāka torana pura chāvā| kahi na jāi jehi bhām̐ti banāvā||
sumanabṛṣṭi akāsa teṃ hoī| brahmānaṃda magana saba loī||
Meaning ध्वजा, पताका और तोरणोंसे नगर छा गया। जिस प्रकारसे वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानन्दमें मगर हैं॥ १॥
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई॥
कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥
bṛṃda bṛṃda mili calīṃ logāī| sahaja saṃgāra kiem̐ uṭhi dhāī||
kanaka kalasa maṃgala dhari thārā| gāvata paiṭhahiṃ bhūpa duārā||
Meaning स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं। स्वाभाविक श्रंगार किये ही वे उठ दौड़ीं। सोनेका कलश लेकर और थालोंमें मज़ल द्रव्य भरकर गाती हुई राजद्वारमें प्रवेश करती हैं॥ २॥
करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥
मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥
kari ārati nevachāvari karahīṃ| bāra bāra sisu carananhi parahīṃ||
māgadha sūta baṃdigana gāyaka| pāvana guna gāvahiṃ raghunāyaka||
Meaning वन्दीजन और गवैये रघुकुलके स्वामीके पवित्र गुणोंका गान करते हैं॥३॥
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥
sarbasa dāna dīnha saba kāhū| jehiṃ pāvā rākhā nahiṃ tāhū||
mṛgamada caṃdana kuṃkuma kīcā| macī sakala bīthinha bica bīcā||
Meaning राजाने सब किसीको भरपूर दान दिया। जिसने पाया उसने भी नहीं रखा (लुटा दिया)। [नगरकी] सभी गलियोंके बीच-बीचमें कस्तूरी, चन्दन और केसरकी कीच मच गयी॥ ४॥
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥ १९४॥
gṛha gṛha bāja badhāva subha pragaṭe suṣamā kaṃda|
haraṣavaṃta saba jaham̐ taham̐ nagara nāri nara bṛṃda|| 194||
Meaning घर-घर मज़लमय बधावा बजने लगा, क्योंकि शोभाके मूल भगवान् प्रकट हुए हैं। नगरके स्त्री-पुरुषोंके झुंड-के-झुंड जहाँ-तहाँ आनन्दमग्न हो रहे हैं॥ १९४॥
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥
kaikayasutā sumitrā doū| suṃdara suta janamata bhaiṃ oū||
vaha sukha saṃpati samaya samājā| kahi na sakai sārada ahirājā||
Meaning कैकेयी और सुमित्रा--इन दोनोंने भी सुन्दर पुत्रोंको जन्म दिया। उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाजका वर्णन सरस्वती और सर्पोके राजा शेषजी भी नहीं कर सकते॥ १॥
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥
avadhapurī sohai ehi bhām̐tī| prabhuhi milana āī janu rātī||
dekhi bhānū janu mana sakucānī| tadapi banī saṃdhyā anumānī||
Meaning अवधपुरी इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो रात्रि प्रभुसे मिलने आयी हो और सूर्यको देखकर मानो मनमें सकुचा गयी हो, परन्तु फिर भी मनमें विचारकर वह मानो सन्ध्या बन [ कर रह] गयी हो॥ २॥
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी॥
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥
agara dhūpa bahu janu am̐dhiārī| uṛai abhīra manahum̐ arunārī||
maṃdira mani samūha janu tārā| nṛpa gṛha kalasa so iṃdu udārā||
Meaning अगरकी धूपका बहुत-सा धुआँ मानो [सन्ध्याका] अन्धकार है और जो अबीर उड़ रहा है, वह उसकी ललाई है। महलोंमें जो मणियोंके समूह हैं, वे मानो तारागण हैं। राजमहलका जो कलश है, वही मानो श्रेष्ठ चन्द्रमा है॥ ३॥
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर समयँ जनु सानी॥
कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥
bhavana bedadhuni ati mṛdu bānī| janu khaga mūkhara samayam̐ janu sānī||
kautuka dekhi pataṃga bhulānā| eka māsa teim̐ jāta na jānā||
Meaning राजभवनमें जो अति कोमल वाणीसे वेदध्वनि हो रही है, वही मानो समयसे(समयानुकूल ) सनी हुई पक्षियोंकी चहचहाहट है। यह कौतुक देखकर सूर्य भी [अपनी चाल] भूल गये। एक महीना उन्होंने जाता हुआ न जाना (अर्थात् उन्हें एक महीना वहीं बीत गया)॥ ४॥
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥ १९५॥
māsa divasa kara divasa bhā marama na jānai koi|
ratha sameta rabi thākeu nisā kavana bidhi hoi|| 195||
Meaning महीनेभरका दिन हो गया। इस रहस्यको कोई नहीं जानता। सूर्य अपने रथसहित वहीं रुक गये, फिर रात किस तरह होती॥ १९५॥
यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥
yaha rahasya kāhū nahiṃ jānā| dina mani cale karata gunagānā||
dekhi mahotsava sura muni nāgā| cale bhavana baranata nija bhāgā||
Meaning यह रहस्य किसीने नहीं जाना। सूर्यदेव [ भगवान् श्रीरामजीका] गुणगान करते हुए चले। यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्यकी सराहना करते हुए अपने-अपने घर चले॥ १॥
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥
काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥
aurau eka kahaum̐ nija corī| sunu girijā ati dṛṛha mati torī||
kāka bhusuṃḍi saṃga hama doū| manujarūpa jānai nahiṃ koū||
Meaning हे पार्वती! तुम्हारी बुद्धि [श्रीरामजीके चरणोंमें ] बहुत दूढ़ है, इसलिये मैं और भी अपनी एक चोरी (छिपाव) की बात कहता हूँ, सुनो। काकभुशुण्डि और मैं दोनों वहाँ साथ-साथ थे, परन्तु मनुष्यरूपमें होनेके कारण हमें कोई जान न सका॥ २॥
परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई॥
paramānaṃda premasukha phūle| bīthinha phirahiṃ magana mana bhūle||
yaha subha carita jāna pai soī| kṛpā rāma kai jāpara hoī||
Meaning परम आनन्द और प्रेमके सुखमें फूले हुए हम दोनों मगन मनसे (मस्त हुए) गलियोंमें [तन-मनकी सुधि] भूले हुए फिरते थे। परन्तु यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो॥ ३॥
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥
tehi avasara jo jehi bidhi āvā| dīnha bhūpa jo jehi mana bhāvā||
gaja ratha turaga hema go hīrā| dīnhe nṛpa nānābidhi cīrā||
Meaning उस अवसरपर जो जिस प्रकार आया और जिसके मनको जो अच्छा लगा, राजाने उसे वही दिया। हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और भाँति-भाँतिके वस्त्र राजाने दिये॥ ४॥
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥ १९६॥
mana saṃtoṣe sabanhi ke jaham̐ taham̐ dehi asīsa|
sakala tanaya cira jīvahum̐ tulasidāsa ke īsa|| 196||
Meaning राजाने सबके मनको सन्तुष्ट किया। [इसीसे] सब लोग जहाँ-तहाँ आशीर्वाद दे रहे थे कि तुलसीदासके स्वामी सब पुत्र (चारों राजकुमार) चिरजीवी (दीर्घायु) हों॥ १९६॥
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥
kachuka divasa bīte ehi bhām̐tī| jāta na jānia dina aru rātī||
nāmakarana kara avasaru jānī| bhūpa boli paṭhae muni gyānī||
Meaning इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण- संस्कारका समय जानकर राजाने ज्ञानी मुनि श्रीवसिष्ठजीको बुला भेजा॥ १॥
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥
kari pūjā bhūpati asa bhāṣā| dharia nāma jo muni guni rākhā||
inha ke nāma aneka anūpā| maiṃ nṛpa kahaba svamati anurūpā||
Meaning मुनिकी पूजा करके राजाने कहा--हे मुनि! आपने मनमें जो विचार रखे हों, वे नाम रखिये। [ मुनिने कहा--] हे राजन् ! इनके अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कहूँगा॥ २॥
जो आनंद सिंधु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
jo ānaṃda siṃdhu sukharāsī| sīkara teṃ trailoka supāsī||
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक बिश्रामा॥
so sukha dhāma rāma asa nāmā| akhila loka dāyaka biśrāmā||
Meaning ये जो आनन्दके समुद्र और सुखकी राशि हैं, जिस (आनन्दसिन्धु) के एक कणसे तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम 'राम' है, जो सुखका भवन और सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति देनेवाला है॥ ३॥
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥
bisva bharana poṣana kara joī| tākara nāma bharata asa hoī||
jāke sumirana teṃ ripu nāsā| nāma satruhana beda prakāsā||
Meaning जो संसारका भरण-पोषण करते हैं, उन (आपके दूसरे ' पुत्र) का नाम ' भरत' होगा। जिनके स्मरणमात्रसे शत्रुका नाश होता है, उनका वेदोंमें प्रसिद्ध शत्रुघ्न' नाम है॥ ४॥
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥ १९७॥
lacchana dhāma rāma priya sakala jagata ādhāra|
guru basiṣṭa tehi rākhā lachimana nāma udāra|| 197||
Meaning जो शुभ लक्षणोंके धाम, श्रीरामजीके प्यारे और सारे जगत्के आधार हैं, गुरु वसिष्ठजीने उनका 'लक्ष्मण' ऐसा श्रेष्ठ नाम रखा॥ १९७॥
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि तेहिं सुख माना॥
dhare nāma gura hṛdayam̐ bicārī| beda tatva nṛpa tava suta cārī||
muni dhana jana sarabasa siva prānā| bāla keli tehiṃ sukha mānā||
Meaning गुरुजीने हृदयमें विचारकर ये नाम रखे [ और कहा--] हे राजन् ! तुम्हारे चारों पुत्र वेदके तत्त्व ( साक्षात् परात्पर भगवान्) हैं। जो मुनियोंके धन, भक्तोंके सर्वस्व और शिवजीके प्राण हैं, उन्होंने [इस समय तुम लोगोंके प्रेमबश] बाललीलाके रसमें सुख माना है॥ १॥
बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥
भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥
bārehi te nija hita pati jānī| lachimana rāma carana rati mānī||
bharata satruhana dūnau bhāī| prabhu sevaka jasi prīti baṛāī||
Meaning बचपनसे ही श्रीरामचन्द्रजीको अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजीने उनके चरणों।ें प्रीति जोड़ ली। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंमें स्वामी और सेवककी जिस प्रीतिकी प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी॥ २॥
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥
चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥
syāma gaura suṃdara dou jorī| nirakhahiṃ chabi jananīṃ tṛna torī||
cāriu sīla rūpa guna dhāmā| tadapi adhika sukhasāgara rāmā||
Meaning श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियोंकी शोभाको देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं [जिसमें दीठ न लग जाय]। यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुणके धाम हैं, तो भी सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं॥ ३॥
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥
hṛdayam̐ anugraha iṃdu prakāsā| sūcata kirana manohara hāsā||
kabahum̐ uchaṃga kabahum̐ bara palanā| mātu dulārai kahi priya lalanā||
Meaning उनके हृदयमें कृपारूपी चन्द्रमा प्रकाशित है। उनकी मनको हरनेवाली हँसी उस (कृपारूपी चन्द्रमा) की किरणोंको सूचित करती है। कभी गोदमें [लेकर] और कभी उत्तम पालनेमें [लिटाकर] माता “प्यारे ललना!' कहकर दुलार करती है॥ ४॥
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
byāpaka brahma niraṃjana nirguna bigata binoda|
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद॥ १९८॥
so aja prema bhagati basa kausalyā ke goda|| 198||
Meaning जो सर्वव्यापक, निरज्जन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्तिके वश कौसल्याजीकी गोदमें [खेल रहे] हैं॥ १९८॥
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥
अरुन चरन पकंज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥
kāma koṭi chabi syāma sarīrā| nīla kaṃja bārida gaṃbhīrā||
aruna carana pakaṃja nakha jotī| kamala dalanhi baiṭhe janu motī||
Meaning उनके नील कमल और गम्भीर (जलसे भरे हुए) मेघके समान श्याम शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी शोभा है। लाल-लाल चरणकमलोंके नखोंकी [शुभ्र] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमलके पत्तोंपर मोती स्थिर हो गये हों॥ १॥
रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा॥
rekha kulisa dhavaja aṃkura sohe| nūpura dhuni suni muni mana mohe||
kaṭi kiṃkinī udara traya rekhā| nābhi gabhīra jāna jehi dekhā||
Meaning [ चरणतलोंमें। वत्र, ध्वजा और अड्र्शके चिह्न शोभित और हैं। नूपुर (पैंजनी ) की ध्वनि सुनकर मुनियोंका भी मन मोहित हो जाता है। कमरमें करधनी पेटपर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभिकी गम्भीरताको तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है॥ २॥
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥
उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥
bhuja bisāla bhūṣana juta bhūrī| hiyam̐ hari nakha ati sobhā rūrī||
ura manihāra padika kī sobhā| bipra carana dekhata mana lobhā||
Meaning बहुत-से आभूषणोंसे सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हदयपर बाघके नखकी बहुत ही निराली छटा है। छातीपर रत्नोंसे युक्त मणियोंके हारकी शोभा और ब्राह्मण ( भृूगु) के चरणचिक्नको देखते ही मन लुभा जाता है॥ ३॥
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥
kaṃbu kaṃṭha ati cibuka suhāī| ānana amita madana chabi chāī||
dui dui dasana adhara arunāre| nāsā tilaka ko baranai pāre||
Meaning कण्ठ शक्गके समान (उतार-चढ़ाववाला, तीन रेखाओंसे सुशोभित) है और ठोड़ी बहुत ही सुन्दर है। मुखपर असंख्य कामदेवोंकी छटा छा रही है। दो-दो सुन्दर दूँतुलियाँ हैं, लाल-लाल ओठ हैं। नासिका और तिलक [के सौन्दर्य] का तो वर्णन ही कौन कर सकता है॥ ४॥
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥
suṃdara śravana sucāru kapolā| ati priya madhura totare bolā||
cikkana kaca kuṃcita gabhuāre| bahu prakāra raci mātu sam̐vāre||
Meaning सुन्दर कान और बहुत ही सुन्दर गाल हैं, मधुर तोतले शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं। जन्मके समयसे रखे हुए चिकने और घुँघराले बाल हैं, जिनको माताने बहुत प्रकारसे बनाकर सँवार दिया है॥ ५॥
पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा॥
pīta jhaguliā tanu pahirāī| jānu pāni bicarani mohi bhāī||
rūpa sakahiṃ nahiṃ kahi śruti seṣā| so jānai sapanehum̐ jehi dekhā||
Meaning शरीरपर पीली झँगुली पहनायी हुई है। उनका घुटनों और हाथोंके बल चलना मुझे बहुत ही प्यारा लगता है। उनके रूपका वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते। उसे वही जानता है जिसने कभी स्वप्रमें भी देखा हो॥ ६॥
सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत।
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥ १९९॥
sukha saṃdoha mohapara gyāna girā gotīta|
daṃpati parama prema basa kara sisucarita punīta|| 199||
Meaning जो सुखके पुझ, मोहसे परे तथा ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, वे भगवान् दशरथ- कौसल्याके अत्यन्त प्रेमके वश होकर पवित्र बाललीला करते हैं॥ १९९॥