तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥
tāpasa nṛpa nija sakhahi nihārī| haraṣi mileu uṭhi bhayau sukhārī||
mitrahi kahi saba kathā sunāī| jātudhāna bolā sukha pāī||
Meaning तपस्वी राजा अपने मित्रको देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्रको सब कथा कह सुनायी, तब राक्षस आनन्दित होकर बोला॥ १॥
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥
aba sādheum̐ ripu sunahu naresā| jauṃ tumha kīnha mora upadesā||
parihari soca rahahu tumha soī| binu auṣadha biādhi bidhi khoī||
Meaning हे राजन् ! सुनो, जब तुमने मेरे कहनेके अनुसार [इतना] काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रुको काबूमें कर ही लिया [समझो]। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाताने बिना ही दवाके रोग दूर कर दिया॥ २॥
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥
kula sameta ripu mūla bahāī| cauthe divasa milaba maiṃ āī||
tāpasa nṛpahi bahuta paritoṣī| calā mahākapaṭī atiroṣī||
Meaning कुलसहित शत्रुको जड़-मूलसे उखाड़-बहाकर, [ आजसे] चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। [इस प्रकार] तपस्वी राजाको खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला॥३॥
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥
bhānupratāpahi bāji sametā| pahum̐cāesi chana mājha niketā||
nṛpahi nāri pahiṃ sayana karāī| hayagṛham̐ bām̐dhesi bāji banāī||
Meaning उसने प्रतापभानु राजाको घोड़ेसहित क्षणभरमें घर पहुँचा दिया। राजाको रानीके पास सुलाकर घोड़ेको अच्छी तरहसे घुड़सालमें बाँध दिया॥ ४॥
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥ १७१॥
rājā ke uparohitahi hari lai gayau bahori|
lai rākhesi giri khoha mahum̐ māyām̐ kari mati bhori|| 171||
Meaning फिर वह राजाके पुरोहितको उठा ले गया और मायासे उसकी बुद्धिको शभ्रममें डालकर उसे उसने पहाड़की खोहमें ला रखा॥ १७१॥
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥
āpu biraci uparohita rūpā| pareu jāi tehi seja anūpā||
jāgeu nṛpa anabhaem̐ bihānā| dekhi bhavana ati acaraju mānā||
Meaning वह आप पुरोहितका रूप बनाकर उसकी सुन्दर सेजपर जा लेटा। राजा सबेरा होनेसे पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना॥ १॥
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥
muni mahimā mana mahum̐ anumānī| uṭheu gavam̐hi jehi jāna na rānī||
kānana gayau bāji caṛhi tehīṃ| pura nara nāri na jāneu kehīṃ||
Meaning मनमें मुनिकी महिमाका अनुमान करके वह धीरेसे उठा, जिसमें रानी न जान पावे। फिर उसी घोड़ेपर चढ़कर वनको चला गया। नगरके किसी भी स्त्री-पुरुषने नहीं जाना॥ २॥
गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा॥
gaem̐ jāma juga bhūpati āvā| ghara ghara utsava bāja badhāvā||
uparohitahi dekha jaba rājā| cakita biloki sumiri soi kājā||
Meaning दो पहर बीत जानेपर राजा आया। घर-घर उत्सव होने लगे और बधावा बजने लगा। जब राजाने पुरोहितको देखा, तब वह [ अपने] उसी कार्यका स्मरणकर उसे आश्चर्यसे देखने लगा॥ ३॥
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥
समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥
juga sama nṛpahi gae dina tīnī| kapaṭī muni pada raha mati līnī||
samaya jāni uparohita āvā| nṛpahi mate saba kahi samujhāvā||
Meaning राजाको तीन दिन युगके समान बीते। उसकी बुद्धि कपटी मुनिके चरणोंमें लगी रही। निश्चित समय जानकर पुरोहित [बना हुआ राक्षस] आया और राजाके साथ की हुई गुप्त सलाहके अनुसार [उसने अपने] सब विचार उसे समझाकर कह दिये॥ ४॥
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥ १७२॥
nṛpa haraṣeu pahicāni guru bhrama basa rahā na ceta|
bare turata sata sahasa bara bipra kuṭuṃba sameta|| 172||
Meaning [संकेतके अनुसार] गुरुको [उस रूपमें। पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ। श्रमवश उसे चेत न रहा [कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस]। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणोंको कुठ्म्बसहित निमन्त्रण दे दिया॥ १७२॥
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥
uparohita jevanāra banāī| charasa cāri bidhi jasi śruti gāī||
māyāmaya tehiṃ kīnha rasoī| biṃjana bahu gani sakai na koī||
Meaning पुरोहितने छः: रस और चार प्रकारके भोजन, जैसा कि वेदोंमें वर्णन है, बनाये। उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यज्ञन बनाये जिन्हें कोई गिन नहीं सकता॥ १॥
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥
bibidha mṛganha kara āmiṣa rām̐dhā| tehi mahum̐ bipra mām̐su khala sām̐dhā||
bhojana kahum̐ saba bipra bolāe| pada pakhāri sādara baiṭhāe||
Meaning अनेक प्रकारके पशुओंका मांस पकाया और उसमें उस दुष्टने ब्राह्मणोंका मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणोंको भोजनके लिये बुलाया और चरण धोकर आदरसहित बैठाया॥ २॥
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥
parusana jabahiṃ lāga mahipālā| bhai akāsabānī tehi kālā||
biprabṛṃda uṭhi uṭhi gṛha jāhū| hai baṛi hāni anna jani khāhū||
Meaning ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल [ कालकेतुकृत] आकाशवाणी हुई--हे ब्राह्मणो ! उठ- उठकर अपने घर जाओ; यह अन्न मत खाओ। इस [के खाने] में बड़ी हानि है॥ ३॥
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस आव मुख बानी॥
bhayau rasoīṃ bhūsura mām̐sū| saba dvija uṭhe māni bisvāsū||
bhūpa bikala mati moham̐ bhulānī| bhāvī basa āva mukha bānī||
Meaning रसोईमें ब्राह्मणोंका मांस बना है। [आकाशवाणीका] विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खडे हुए। राजा व्याकुल हो गया। [परन्तु] उसकी बुद्धि मोहमें भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँहसे [एक] बात [भी] न निकली॥ ४॥
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥ १७३॥
bole bipra sakopa taba nahiṃ kachu kīnha bicāra|
jāi nisācara hohu nṛpa mūṛha sahita parivāra|| 173||
Meaning तब ब्राह्मण क्रोधसहित बोल उठे--उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया--अआरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवारसहित राक्षस हो॥ १७३॥
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥
ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥
chatrabaṃdhu taiṃ bipra bolāī| ghālai lie sahita samudāī||
īsvara rākhā dharama hamārā| jaihasi taiṃ sameta parivārā||
Meaning रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवारसहित ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वरने हमारे धर्मकी रक्षा की। अब तू परिवारसहित नष्ट होगा॥ १॥
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥
saṃbata madhya nāsa tava hoū| jaladātā na rahihi kula koū||
nṛpa suni śrāpa bikala ati trāsā| bhai bahori bara girā akāsā||
Meaning एक वर्षके भीतर तेरा नाश हो जाय, तेरे कुलमें कोई पानी देनेवालातक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भयके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुन्दर आकाशवाणी हुई--॥ २॥
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥
biprahu śrāpa bicāri na dīnhā| nahiṃ aparādha bhūpa kachu kīnhā||
cakita bipra saba suni nabhabānī| bhūpa gayau jaham̐ bhojana khānī||
Meaning हे ब्राह्मणो! तुमने विचारकर शाप नहीं दिया। राजाने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गये। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था॥ ३॥
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥
taham̐ na asana nahiṃ bipra suārā| phireu rāu mana soca apārā||
saba prasaṃga mahisuranha sunāī| trasita pareu avanīṃ akulāī||
Meaning [देखा तो] वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मनमें अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणोंको सब वृत्तान्त सुनाया और [बड़ा ही] भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४॥
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥ १७४॥
bhūpati bhāvī miṭai nahiṃ jadapi na dūṣana tora|
kiem̐ anyathā hoi nahiṃ bipraśrāpa ati ghora|| 174||
Meaning हे राजन्! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणोंका शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता॥ १७४॥
अस कहि सब महिदेव सिधाए।
समाचार पुरलोगन्ह पाए॥
asa kahi saba mahideva sidhāe| samācāra puraloganha pāe||
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं।
बिचरत हंस काग किय जेहीं॥
socahiṃ dūṣana daivahi dehīṃ| bicarata haṃsa kāga kiya jehīṃ||
Meaning ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गये। नगरवासियोंने [जब] यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाताको दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते-बनाते कौआ कर दिया (ऐसे पुण्यात्मा राजाको देवता बनाना चाहिये था, सो राक्षस बना दिया)॥ १॥
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥
uparohitahi bhavana pahum̐cāī| asura tāpasahi khabari janāī||
tehiṃ khala jaham̐ taham̐ patra paṭhāe| saji saji sena bhūpa saba dhāe||
Meaning पुरोहितको उसके घर पहुँचाकर असुर (कालकेतु) ने [कपटी] तपस्वीको खबर दी। उस दुष्टने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब [वैरी] राजा सेना सजा-सजाकर [चढ़] दौड़े॥ २॥
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होई लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥
gherenhi nagara nisāna bajāī| bibidha bhām̐ti nita hoī larāī||
jūjhe sakala subhaṭa kari karanī| baṃdhu sameta pareu nṛpa dharanī||
Meaning और उन्होंने डंका बजाकर नगरको घेर लिया। नित्यप्रति अनेक प्रकारसे लड़ाई होने लगी। [ प्रतापभानुके] सब योद्धा [ शूरवीरोंको ] करनी करके रणमें जूझ मरे। राजा भी भाईसहित खेत रहा॥ ३॥
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥
satyaketu kula kou nahiṃ bām̐cā| bipraśrāpa kimi hoi asām̐cā||
ripu jiti saba nṛpa nagara basāī| nija pura gavane jaya jasu pāī||
Meaning सत्यकेतुके कुलमें कोई नहीं बचा। ब्राह्मणोंका शाप झूठा कैसे हो सकता था। शत्रुको जीतकर, नगरको [फिरसे] बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने-अपने नगरको चले गये॥ ४॥
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥ १७५॥
bharadvāja sunu jāhi jaba hoi bidhātā bāma|
dhūri merusama janaka jama tāhi byālasama dāma|| 175||
Meaning [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] हे भरद्वाज ! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरुपर्वतके समान ( भारी और कुचल डालनेवाली), पिता यमके समान (कालरूप) और रस्सी साँपके समान (काट खानेवाली) हो जाती है॥ १७५॥
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥
kāla pāi muni sunu soi rājā| bhayau nisācara sahita samājā||
dasa sira tāhi bīsa bhujadaṃḍā| rāvana nāma bīra baribaṃḍā||
Meaning हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवारसहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था॥ १॥
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥
bhūpa anuja arimardana nāmā| bhayau so kuṃbhakarana baladhāmā||
saciva jo rahā dharamaruci jāsū| bhayau bimātra baṃdhu laghu tāsū||
Meaning अरिमर्दन नामक जो राजाका छोटा भाई था, वह बलका धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मन्त्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावणका सौतेला छोटा भाई हुआ॥ २॥
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥
nāma bibhīṣana jehi jaga jānā| biṣnubhagata bigyāna nidhānā||
rahe je suta sevaka nṛpa kere| bhae nisācara ghora ghanere||
Meaning उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत् जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञानका भण्डार था और जो राजाके पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए॥ ३॥
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥
kāmarūpa khala jinasa anekā| kuṭila bhayaṃkara bigata bibekā||
kṛpā rahita hiṃsaka saba pāpī| barani na jāhiṃ bisva paritāpī||
Meaning वे सब अनेकों जातिके, मनमाना रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसारभरको दु:ख देनेवाले हुए; उनका वर्णन नहीं हो सकता॥ ४॥
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥ १७६॥
upaje jadapi pulastyakula pāvana amala anūpa|
tadapi mahīsura śrāpa basa bhae sakala agharūpa|| 176||
Meaning यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषिके पवित्र, निर्मल और अनुपम कुलमें उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणोंके शापके कारण वे सब पापरूप हुए॥ १७६॥
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥
kīnha bibidha tapa tīnihum̐ bhāī| parama ugra nahiṃ barani so jāī||
gayau nikaṭa tapa dekhi bidhātā| māgahu bara prasanna maiṃ tātā||
Meaning तीनों भाइयोंने अनेकों प्रकारकी बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। [उनका उग्र] तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले--हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो॥ १॥
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥
kari binatī pada gahi dasasīsā| boleu bacana sunahu jagadīsā||
hama kāhū ke marahiṃ na māreṃ| bānara manuja jāti dui bāreṃ||
Meaning रावणने विनय करके और चरण पकड़कर कहा--हे जगदीश्वर! सुनिये, वानर और मनुष्य-- इन दो जातियोंको छोड़कर हम और किसीके मारे न मरें [यह वर दीजिये]॥ २॥
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥
evamastu tumha baṛa tapa kīnhā| maiṃ brahmām̐ mili tehi bara dīnhā||
puni prabhu kuṃbhakarana pahiṃ gayaū| tehi biloki mana bisamaya bhayaū||
Meaning [शिवजी कहते हैं कि--] मैंने और ब्रह्माने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्णके पास गये। उसे देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ३॥
जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥
jauṃ ehiṃ khala nita karaba ahārū| hoihi saba ujāri saṃsārū||
sārada preri tāsu mati pherī| māgesi nīda māsa ṣaṭa kerī||
Meaning जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जायगा। [ऐसा विचारकर] ब्रह्माजीने सरस्वतीको प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। [जिससे] उसने छः महीनेकी नींद माँगी॥ ४॥
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥ १७७॥
gae bibhīṣana pāsa puni kaheu putra bara māgu|
tehiṃ māgeu bhagavaṃta pada kamala amala anurāgu|| 177||
Meaning फिर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और बोले-टे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवानके चरणकमलोंमें निर्मल (निष्काम और अनन्य) प्रेम माँगा॥ १७७॥
तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥
tinhi dei bara brahma sidhāe| haraṣita te apane gṛha āe||
maya tanujā maṃdodari nāmā| parama suṃdarī nāri lalāmā||
Meaning उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गये और वे (तीनों भाई) हर्षित होकर अपने घर लौट आये। मय दानवकी मन्दोदरी नामकी कन्या परम सुन्दरी और स्त्रियोंगें शिरोमणि थी॥ १॥
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥
soi mayam̐ dīnhi rāvanahi ānī| hoihi jātudhānapati jānī||
haraṣita bhayau nāri bhali pāī| puni dou baṃdhu biāhesi jāī||
Meaning मयने उसे लाकर रावणको दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसोंका राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयोंका विवाह कर दिया॥ २॥
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी।
बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥
giri trikūṭa eka siṃdhu majhārī| bidhi nirmita durgama ati bhārī||
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा।
कनक रचित मनिभवन अपारा॥
soi maya dānavam̐ bahuri sam̐vārā| kanaka racita manibhavana apārā||
Meaning समुद्रके बीचमें त्रकूट नामक पर्वतपर ब्रह्माका बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। [महान् मायावी और निपुण कारीगर] मय दानवने उसको फिरसे सजा दिया। उसमें मणियोंसे जड़े हुए सोनेके अनगिनत महल थे॥ ३॥
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥
bhogāvati jasi ahikula bāsā| amarāvati jasi sakranivāsā||
tinha teṃ adhika ramya ati baṃkā| jaga bikhyāta nāma tehi laṃkā||
Meaning जैसी नागकुलके रहनेकी [ पाताललोकमें ] भोगावती पुरी है और इन्द्रके रहनेकी [स्वर्गलोकमें। अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुन्दर और बाँका वह दुर्ग था। जगत्में उसका नाम लड़ा प्रसिद्ध हुआ। ४॥
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥ १७८ ( क )॥
khāīṃ siṃdhu gabhīra ati cārihum̐ disi phiri āva|
kanaka koṭa mani khacita dṛṛha barani na jāi banāva|| 178 ( ka )||
Meaning उसे चारों ओरसे समुद्रकी अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस [दुर्ग] के मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरीका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १७८ (क)॥
हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥ १७८ (ख )॥
hariprerita jehiṃ kalapa joi jātudhānapati hoi|
sūra pratāpī atulabala dala sameta basa soi|| 178 (kha )||
Meaning भगवान्की प्रेरणासे जिस कल्पमें जो राक्षसोंका राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान् अपनी सेनासहित उस पुरीमें बसता है॥ १७८ (ख)॥
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥
rahe tahām̐ nisicara bhaṭa bhāre| te saba suranha samara saṃghāre||
aba taham̐ rahahiṃ sakra ke prere| racchaka koṭi jacchapati kere||
Meaning [ पहले] वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओंने उन सबको युद्धमें मार डाला। अब इन्द्रकी प्रेरणासे वहाँ कुबेरके एक करोड़ रक्षक (यक्ष लोग) रहते हैं--॥ १॥
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥
dasamukha katahum̐ khabari asi pāī| sena sāji gaṛha gheresi jāī||
dekhi bikaṭa bhaṭa baṛi kaṭakāī| jaccha jīva lai gae parāī||
Meaning रावणको कहीं ऐसी खबर मिली तब उसने सेना सजाकर किलेको जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेनाको देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गये॥ २॥
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥
phiri saba nagara dasānana dekhā| gayau soca sukha bhayau biseṣā||
suṃdara sahaja agama anumānī| kīnhi tahām̐ rāvana rajadhānī||
Meaning तब रावणने घूम-फिरकर सारा नगर देखा, उसकी [ स्थानसम्बन्धी ] चिन्ता मिट गयी और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरीको स्वाभाविक ही सुन्दर और [बाहरवालोंके लिये] दुर्गम अनुमान करके रावणने वहाँ अपनी राजधानी कायम की॥ ३॥
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे॥
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥
jehi jasa joga bām̐ṭi gṛha dīnhe| sukhī sakala rajanīcara kīnhe||
eka bāra kubera para dhāvā| puṣpaka jāna jīti lai āvā||
Meaning योग्यताके अनुसार घरोंको बाँटकर रावणने सब राक्षसोंको सुखी किया। एक बार वह कुबेरपर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पकविमानको जीतकर ले आया॥ ४॥
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥ १७९॥
kautukahīṃ kailāsa puni līnhesi jāi uṭhāi|
manahum̐ tauli nija bāhubala calā bahuta sukha pāi|| 179||
Meaning फिर उसने जाकर [एक बार] खिलवाड़हीमें कैलास पर्वतको उठा लिया और मानो अपनी भुजाओंका बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँसे चला आया॥ १७९॥
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥
sukha saṃpati suta sena sahāī| jaya pratāpa bala buddhi baṛāī||
nita nūtana saba bāṛhata jāī| jimi pratilābha lobha adhikāī||
Meaning सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई--ये सब उसके नित्य नये [वैसे ही] बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है॥ १॥
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा॥
atibala kuṃbhakarana asa bhrātā| jehi kahum̐ nahiṃ pratibhaṭa jaga jātā||
karai pāna sovai ṣaṭa māsā| jāgata hoi tihum̐ pura trāsā||
Meaning अत्यन्त बलवान् कुम्भकर्ण-सा उसका भाई था, जिसके जोड़का योद्धा जगत्में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छः महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकोंमें तहलका मच जाता था॥ २॥
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥
jauṃ dina prati ahāra kara soī| bisva begi saba caupaṭa hoī||
samara dhīra nahiṃ jāi bakhānā| tehi sama amita bīra balavānā||
Meaning यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट (खाली) हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [ लड़ामें] उसके ऐसे असंख्य बलवान् वीर थे॥ ३॥
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥
bāridanāda jeṭha suta tāsū| bhaṭa mahum̐ prathama līka jaga jāsū||
jehi na hoi rana sanamukha koī| surapura nitahiṃ parāvana hoī||
Meaning मेघनाद रावणका बड़ा लड़का था, जिसका जगत्के योद्धाओंमें पहला नंबर था। रणमें कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्गमें तो [उसके भयसे ] नित्य भगदड़ मची रहती थी॥ ४॥
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥ १८०॥
kumukha akaṃpana kulisarada dhūmaketu atikāya|
eka eka jaga jīti saka aise subhaṭa nikāya|| 180||
Meaning [ इनके अतिरिक्त] दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत्को जीत सकते थे॥ १८०॥
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥
kāmarūpa jānahiṃ saba māyā| sapanehum̐ jinha keṃ dharama na dāyā||
dasamukha baiṭha sabhām̐ eka bārā| dekhi amita āpana parivārā||
Meaning सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और [ आसुरी] माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्रमें भी नहीं था। एक बार सभामें बेठे हुए रावणने अपने अगणित परिवारको देखा--॥ श१॥
सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥
suta samūha jana parijana nātī| ge ko pāra nisācara jātī||
sena biloki sahaja abhimānī| bolā bacana krodha mada sānī||
Meaning पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। [सारी] राक्षसोंकी जातियोंको तो गिन ही कौन सकता था ? अपनी सेनाको देखकर स्वभावसे ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्वमें सनी हुई वाणी बोला--॥ २॥
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥
ते सनमुख नहिं करही लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥
sunahu sakala rajanīcara jūthā| hamare bairī bibudha barūthā||
te sanamukha nahiṃ karahī larāī| dekhi sabala ripu jāhiṃ parāī||
Meaning हे समस्त राक्षसोंके दलो! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान् शत्रुको देखकर भाग जाते हैं॥ ३॥
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥
द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥
tenha kara marana eka bidhi hoī| kahaum̐ bujhāi sunahu aba soī||
dvijabhojana makha homa sarādhā| saba kai jāi karahu tumha bādhā||
Meaning उनका मरण एक ही उपायसे हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। [उनके बलको बढ़ानेवाले] ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध--इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो॥ ४॥
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥ १८१॥
chudhā chīna balahīna sura sahajehiṃ milihahiṃ āi|
taba mārihaum̐ ki chāṛihaum̐ bhalī bhām̐ti apanāi|| 181||
Meaning भूखसे दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहजहीमें आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके [सर्वथा पराधीन करके] छोड़ दूँगा॥ १८१॥
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा॥
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥
meghanāda kahum̐ puni ham̐karāvā| dīnhī sikha balu bayaru baṛhāvā||
je sura samara dhīra balavānā| jinha keṃ laribe kara abhimānā||
Meaning फिर उसने मेघनादको बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और [देवताओंके प्रति ] वैरभावको उत्तेजना दी। [फिर कहा--] हे पुत्र! जो देवता रणमें धीर और बलवान् हैं और जिन्हें लड़नेका अभिमान है॥ १॥
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥
tinhahi jīti rana ānesu bām̐dhī| uṭhi suta pitu anusāsana kām̐dhī||
ehi bidhi sabahī agyā dīnhī| āpunu caleu gadā kara līnhī||
Meaning उन्हें युद्धमें जीतकर बाँध लाना। बेटेने उठकर पिताकी आज्ञाको शिरोधार्य किया। इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथमें गदा लेकर चल दिया॥ २॥
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥
calata dasānana ḍolati avanī| garjata garbha stravahiṃ sura ravanī||
rāvana āvata suneu sakohā| devanha take meru giri khohā||
Meaning रावणके चलनेसे पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जनासे देवरमणियोंके गर्भ गिरने लगे। रावणको क्रोधसहित आते हुए सुनकर देवताओंने सुमेरु पर्वतकी गुफाएँ तकीं ( भागकर सुमेरुकी गुफाओंका आश्रय लिया)॥ ३॥
दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥
digapālanha ke loka suhāe| sūne sakala dasānana pāe||
puni puni siṃghanāda kari bhārī| dei devatanha gāri pacārī||
Meaning दिक्पालोंके सारे सुन्दर लोकोंको रावणने सूना पाया। वह बार-बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओंको ललकार-ललकारकर गालियाँ देता था॥ ४॥
रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥
rana mada matta phirai jaga dhāvā| pratibhaṭa khaujata katahum̐ na pāvā||
rabi sasi pavana baruna dhanadhārī| agini kāla jama saba adhikārī||
Meaning रणके मदमें मतवाला होकर वह अपनी जोड़ीका योद्धा खोजता हुआ जगत्भरमें दौड़ता फिरा, परन्तु उसे ऐसा योद्धा कहीं नहीं मिला। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्रि, काल और यम आदि सब अधिकारी,॥ ५॥
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥
kiṃnara siddha manuja sura nāgā| haṭhi sabahī ke paṃthahiṃ lāgā||
brahmasṛṣṭi jaham̐ lagi tanudhārī| dasamukha basabartī nara nārī||
Meaning किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग--सभीके पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसीको भी उसने शान्तिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजीकी सृष्टिमें जहाँतक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावणके अधीन हो गये॥ ६॥
आयसु करहिं सकल भयभीता।
नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥
āyasu karahiṃ sakala bhayabhītā| navahiṃ āi nita carana binītā||
Meaning डरके मारे सभी उसकी आज्ञाका पालन करते थे और नित्य आकर नम्रतापूर्वक उसके चरणोंमें सिर नवाते थे॥ ७॥
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥
bhujabala bisva basya kari rākhesi kou na sutaṃtra|
maṃḍalīka mani rāvana rāja karai nija maṃtra||
Meaning उसने भुजाओंके बलसे सारे विश्वको वशमें कर लिया, किसीको स्वतन्त्र नहीं रहने दिया। [ इस प्रकार ] मण्डलीक राजाओंका शिरोमणि (सार्वभौम सम्राट) रावण अपने इच्छानुसार राज्य करने लगा॥ १८२ (क)॥
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि।
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि॥ १८२ (ख )॥
deva jaccha gaṃdharva nara kiṃnara nāga kumāri|
jīti barīṃ nija bāhubala bahu suṃdara bara nāri|| 182 (kha )||
Meaning देवता, यक्ष, गन्धर्व, मनुष्य, किन्नर और नागोंकी कन्याओं तथा बहुत-सी अन्य सुन्दरी और उत्तम स्त्रियोंको उसने अपनी भुजाओंके बलसे जीतकर ब्याह लिया॥ १८२ (ख)॥
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥
iṃdrajīta sana jo kachu kaheū| so saba janu pahilehiṃ kari raheū||
prathamahiṃ jinha kahum̐ āyasu dīnhā| tinha kara carita sunahu jo kīnhā||
Meaning मेघनादसे उसने जो कुछ कहा, उसे उसने ( मेघनादने ) मानो पहलेसे ही कर रखा था (अर्थात् रावणके कहनेभरकी देर थी, उसने आज्ञापालनमें तनिक भी देर नहीं की)। जिनको [ रावणने मेघनादसे] पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें की उन्हें सुनो--॥ १॥
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥
करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥
dekhata bhīmarūpa saba pāpī| nisicara nikara deva paritāpī||
karahi upadrava asura nikāyā| nānā rūpa dharahiṃ kari māyā||
Meaning सब राक्षसोंके समूह देखनेमें बड़े भयानक, पापी और देवताओंको दुःख देनेवाले थे। वे असुरोंके समूह उपद्रव करते थे और मायासे अनेकों प्रकारके रूप धरते थे॥ २॥
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥
jehi bidhi hoi dharma nirmūlā| so saba karahiṃ beda pratikūlā||
jehiṃ jehiṃ desa dhenu dvija pāvahiṃ| nagara gāum̐ pura āgi lagāvahiṃ||
Meaning जिस प्रकार धर्मकी जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे। जिस-जिस स्थानमें वे गौ और ब्राह्मणोंको पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुरवेमें आग लगा देते थे॥ ३॥
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥
subha ācarana katahum̐ nahiṃ hoī| deva bipra gurū māna na koī||
nahiṃ haribhagati jagya tapa gyānā| sapanehum̐ sunia na beda purānā||
Meaning [ उनके डरसे] कहीं भी शुभ आचरण (ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि) नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरुको कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो स्वप्रमें भी सुननेको नहीं मिलते थे॥ ४॥
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनड़ दससीसा।
आपुनु उठि धावड़ रहे न पावड़ धरि सब घालड़ खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासड़ देस निकासड़ जो कह बेद पुराना॥
japa joga birāgā tapa makha bhāgā śravana sunaṛa dasasīsā|
āpunu uṭhi dhāvaṛa rahe na pāvaṛa dhari saba ghālaṛa khīsā||
asa bhraṣṭa acārā bhā saṃsārā dharma sunia nahiṃ kānā|
tehi bahubidhi trāsaṛa desa nikāsaṛa jo kaha beda purānā||
Meaning जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञमें [देवताओंके] भाग पानेकी बात रावण कहीं कानोंसे सुन पाता, तो [उसी समय। स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसारमें ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानोंमें भी सुननेमें नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरहसे त्रास देता और देशसे निकाल देता था।
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ १८३॥
barani na jāi anīti ghora nisācara jo karahiṃ|
hiṃsā para ati prīti tinha ke pāpahi kavani miti|| 183||
Meaning राक्षसलोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिंसापर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापोंका क्या ठिकाना!॥ १८३॥
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥
bāṛhe khala bahu cora juārā| je laṃpaṭa paradhana paradārā||
mānahiṃ mātu pitā nahiṃ devā| sādhunha sana karavāvahiṃ sevā||
Meaning पराये धन और परायी स्त्रीपर मन चलानेवाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये। लोग माता-पिता और देवताओंको नहीं मानते थे और साधुओं [की सेवा करना तो दूर रहा, उलटे उन] से सेवा करवाते थे॥ १॥
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥
jinha ke yaha ācarana bhavānī| te jānehu nisicara saba prānī||
atisaya dekhi dharma kai glānī| parama sabhīta dharā akulānī||
Meaning [ श्रीशिवजी कहते हैं कि--] हे भवानी ! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियोंको राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्मके प्रति [ लोगोंकी। अतिशय ग्लानि (अरुचि, अनास्था) देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गयी॥ २॥
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥
giri sari siṃdhu bhāra nahiṃ mohī| jasa mohi garua eka paradrohī||
sakala dharma dekhai biparītā| kahi na sakai rāvana bhaya bhītā||
Meaning [वह सोचने लगी कि] पर्वतों, नदियों और समुद्रोंका बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही (दूसरोंका अनिष्ट करनेवाला) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मोंको विपरीत देख रही है, पर रावणसे भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती॥ ३॥
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥
निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥
dhenu rūpa dhari hṛdayam̐ bicārī| gaī tahām̐ jaham̐ sura muni jhārī||
nija saṃtāpa sunāesi roī| kāhū teṃ kachu kāja na hoī||
Meaning [ अन्तमें] हृदयमें सोच-विचारकर, गौका रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि [छिपे] थे। पृथ्वीने रोकर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसीसे कुछ काम न बना॥ ४॥
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥
ब्रहमाँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥
sura muni gaṃdharbā mili kari sarbā ge biraṃci ke lokā|
sam̐ga gotanudhārī bhūmi bicārī parama bikala bhaya sokā||
brahamām̐ saba jānā mana anumānā mora kachū na basāī|
jā kari taiṃ dāsī so abināsī hamareu tora sahāī||
Meaning तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजीके लोक (सत्यलोक) को गये। भय और शोकसे अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौका शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गये। उन्होंने मनमें अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलनेका। [तब उन्होंने पृथ्वीसे कहा कि--] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनोंका सहायक है।
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु।
जानत जन को पीर प्रभु भंजिहि दारून बिपति॥ १८४॥
dharani dharahi mana dhīra kaha biraṃci hari pada sumiru|
jānata jana ko pīra prabhu bhaṃjihi dārūna bipati|| 184||
Meaning ब्रह्माजीने कहा--हे धरती! मनमें धीरज धारण करके श्रीहरिके चरणोंका स्मरण करो। प्रभु अपने दासोंकी पीड़ाको जानते हैं, ये तुम्हारी कठिन विपत्तिका नाश करेंगे॥ १८४॥
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥
baiṭhe sura saba karahiṃ bicārā| kaham̐ pāia prabhu karia pukārā||
pura baikuṃṭha jāna kaha koī| kou kaha payanidhi basa prabhu soī||
Meaning सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभुको कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार (फर्याद) करें। कोई वैकुण्ठपुरी जानेको कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्रमें निवास करते हैं॥ १॥
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ॥
jāke hṛdayam̐ bhagati jasi prīti| prabhu taham̐ pragaṭa sadā tehiṃ rītī||
tehi samāja girijā maiṃ raheūm̐| avasara pāi bacana eka kaheūm̐||
Meaning जिसके हदयमें जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिये) सदा उसी रीतिसे प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाजमें मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही--॥ २॥
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
hari byāpaka sarbatra samānā| prema teṃ pragaṭa hohiṃ maiṃ jānā||
desa kāla disi bidisihu māhīṃ| kahahu so kahām̐ jahām̐ prabhu nāhīṃ||
Meaning मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं। देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों॥३॥
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥
मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥
aga jagamaya saba rahita birāgī| prema teṃ prabhu pragaṭai jimi āgī||
mora bacana saba ke mana mānā| sādhu sādhu kari brahma bakhānā||
Meaning वे चराचरमय (चराचरमें व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्ि। (अग्ि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेमसे प्रकट होते हैं।) मेरी बात सबको प्रिय लगी। ब्रह्माजीने ' साधु, साधु' कहकर बड़ाई की॥ ४॥
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥ १८५॥
suni biraṃci mana haraṣa tana pulaki nayana baha nīra|
astuti karata jori kara sāvadhāna matidhīra|| 185||
Meaning मेरी बात सुनकर ब्रह्माजीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ; उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [ प्रेमके] आँसू बहने लगे। तब वे धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे--॥ १८५॥
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥
jaya jaya suranāyaka jana sukhadāyaka pranatapāla bhagavaṃtā|
go dvija hitakārī jaya asurārī sidhuṃsutā priya kaṃtā||
pālana sura dharanī adbhuta karanī marama na jānai koī|
jo sahaja kṛpālā dīnadayālā karau anugraha soī||
Meaning हे देवताओंके स्वामी, सेवकोंको सुख देनेवाले, शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान् ! आपकी जय हो! जय हो! ! हे गो-ब्राह्मणोंका हित करनेवाले, असुरोंका विनाश करनेवाले, समुद्रकी कन्या ( श्रीलक्ष्मीजी )के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो। हे देवता और पृथ्वीका पालन करनेवाले ! आपकी लीला अद्भुत है,उसका भेद कोई नहीं जानता। ऐसे जो स्वभावसे ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें॥ १॥
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥
jaya jaya abināsī saba ghaṭa bāsī byāpaka paramānaṃdā|
abigata gotītaṃ carita punītaṃ māyārahita mukuṃdā||
jehi lāgi birāgī ati anurāgī bigatamoha munibṛṃdā|
nisi bāsara dhyāvahiṃ guna gana gāvahiṃ jayati saccidānaṃdā||
Meaning हे अविनाशी, सबके हृदयमें निवास करनेवाले ( अन्तर्यामी ), सर्वव्यापक परम आनन्दस्वरूप, अज्ञेय, इन्द्रियोंसे परे, पवित्रचरित्र, मायासे रहित मुकुन्द (मोक्षदाता) ! आपकी जय हो! जय हो!! [इस लोक और परलोकके. सब भोगोंसे] विरक्त तथा. मोहसे. सर्वथा छूटे हुए (ज्ञानी) मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी (प्रेमी) बनकर जिनका रात-दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणोंके समूहका गान करते हैं, उन सच्चिदानन्दकी जय हो॥ २॥
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
jehiṃ sṛṣṭi upāī tribidha banāī saṃga sahāya na dūjā|
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा॥
so karau aghārī ciṃta hamārī jānia bhagati na pūjā||
jo bhava bhaya bhaṃjana muni mana raṃjana gaṃjana bipati barūthā|
mana baca krama bānī chāṛi sayānī sarana sakala sura jūthā||
Meaning जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायकके अकेले ही [या स्वयं अपनेको त्रिगुणरूप-- ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप--बनाकर अथवा बिना किसी उपादान-कारणके अर्थात् स्वयं ही सृष्टिका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनकर तीन प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की, वे पापोंका नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा। जो संसारके (जन्म-मृत्युके) भयका नाश करनेवाले, मुनियोंके मनको आनन्द देनेवाले और विपत्तियोंके समूहको नष्ट करनेवाले हैं। हम सब देवताओंके समूह मन, वचन और कर्मसे चतुराई करनेकी बान छोड़कर उन (भगवान्) की शरण [आये] हैं॥ ३॥