जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥
joga jagya japa tapa brata kīnhā| prabhu kaham̐ dei bhagati bara līnhā||
ehi bidhi sara raci muni sarabhaṃgā| baiṭhe hṛdayam̐ chāṛi saba saṃgā||
Meaning योग, यज्ञ, जप, तप जो कुछ व्रत आदि भी मुनिने किया था, सब प्रभुको समर्पण करके बदलेमें भक्तिका वरदान ले लिया। इस प्रकार [दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर] चिता रचकर मुनि शरभंगजी हृदयसे सब आसक्ति छोड़कर उसपर जा बैठे॥ ४॥
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम॥ ८॥
sītā anuja sameta prabhu nīla jalada tanu syāma|
mama hiyam̐ basahu niraṃtara sagunarupa śrīrāma|| 8||
Meaning हे नीले मेघके समान श्याम शरीरवाले सगुणरूप श्रीरामजी! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभु (आप) निरन्तर मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ ८॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥
asa kahi joga agini tanu jārā| rāma kṛpām̐ baikuṃṭha sidhārā||
tāte muni hari līna na bhayaū| prathamahiṃ bheda bhagati bara layaū||
Meaning ऐसा कहकर शरभंगजीने योगाग्िसे अपने शरीरको जला डाला और श्रीरामजीकी कृपासे वे वैकुण्ठको चले गये। मुनि भगवानमें लीन इसलिये नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्तिका वर ले लिया था॥ १॥
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी॥
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा॥
riṣi nikāya munibara gati dekhi| sukhī bhae nija hṛdayam̐ biseṣī||
astuti karahiṃ sakala muni bṛṃdā| jayati pranata hita karunā kaṃdā||
Meaning ऋषिसमूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजीकी यह [दुर्लभ] गति देखकर अपने हृदयमें विशेषरूपसे सुखी हुए। समस्त मुनिवृन्द श्रीरामजीकी स्तुति कर रहे हैं [और कह रहे हैं] शरणागतहितकारी करुणाकन्द (करुणाके मूल) प्रभुकी जय हो!॥ २॥
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे॥
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥
puni raghunātha cale bana āge| munibara bṛṃda bipula sam̐ga lāge||
asthi samūha dekhi raghurāyā| pūchī muninha lāgi ati dāyā||
Meaning फिर श्रीरघुनाथजी आगे वनमें चले। श्रेष्ठ मुनियोंके बहुत-से समूह उनके साथ हो लिये। हड्डियोंका ढेर देखकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी दया आयी, उन्होंने मुनियोंसे पूछा॥ ३॥
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥
jānatahum̐ pūchia kasa svāmī| sabadarasī tumha aṃtarajāmī||
nisicara nikara sakala muni khāe| suni raghubīra nayana jala chāe||
Meaning [ मुनियोंने कहा--] हे स्वामी! आप सर्वदर्शी (सर्वज्ञ) और अन्तयमी (सबके हदयकी जाननेवाले) हैं। जानते हुए भी [अनजानकी तरह] हमसे कैसे पूछ रहे हैं ? राक्षसोंके दलोंने सब मुनियोंको खा डाला है [ये सब उन्हींकी हड्डियोंके ढेर हैं]। यह सुनते ही श्रीरघुबीरके नेत्रोंगें जल छा गया (उनकी आँखोंमें करुणाके आँसू भर आये)॥ ४॥
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥ ९१
nisicara hīna karaum̐ mahi bhuja uṭhāi pana kīnha|
sakala muninha ke āśramanhi jāi jāi sukha dīnha|| 91
Meaning श्रीरामजीने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर दूँगा। फिर समस्त मुनियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उनको [दर्शन एवं सम्भाषणका] सुख दिया॥ ९॥
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥
muni agasti kara siṣya sujānā| nāma sutīchana rati bhagavānā||
mana krama bacana rāma pada sevaka| sapanehum̐ āna bharosa na devaka||
Meaning मुनि अगस्त्यजीके एक सुतीक्ण नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनकी भगवानमें प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंके सेवक थे। उन्हें स्वप्रमें भी किसी दूसरे देवताका भरोसा नहीं था॥ १॥
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥
prabhu āgavanu śravana suni pāvā| karata manoratha ātura dhāvā||
he bidhi dīnabaṃdhu raghurāyā| mo se saṭha para karihahiṃ dāyā||
Meaning उन्होंने ज्यों ही प्रभुका आगमन कानोंसे सुन पाया, त्यों ही अनेक प्रकारके मनोरथ करते हुए वे आतुरता (शीघ्रता) से दौड़ चले। हे विधाता! क्या दीनबन्धु श्रीरघुनाथजी मुझ-जैसे दुष्टपर भी दया करेंगे ?॥ २॥
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई॥
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥
sahita anuja mohi rāma gosāī| milihahiṃ nija sevaka kī nāī||
more jiyam̐ bharosa dṛṛha nāhīṃ| bhagati birati na gyāna mana māhīṃ||
Meaning क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मुझसे अपने सेवककी तरह मिलेंगे ? मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास नहीं होता; क्योंकि मेरे मनमें भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है॥ ३॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
nahiṃ satasaṃga joga japa jāgā| nahiṃ dṛṛha carana kamala anurāgā||
eka bāni karunānidhāna kī| so priya jākeṃ gati na āna kī||
Meaning मैंने न तो सत्सद्भ, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभुके चरणकमलोंमें मेरा दृढ़ अनुराग ही है। हाँ, दयाके भण्डार प्रभुकी एक बान है कि जिसे किसी दूसरेका सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है॥ ४॥
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥
hoihaiṃ suphala āju mama locana| dekhi badana paṃkaja bhava mocana||
nirbhara prema magana muni gyānī| kahi na jāi so dasā bhavānī||
Meaning [ भगवान्की इस बानका स्मरण आते ही मुनि आनन्दमग्र होकर मन-ही-मन कहने लगे--] अहा! भवबन्धनसे छुड़ानेवाले प्रभुके मुखारविन्दको देखकर आज मेरे नेत्र सफल होंगे। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! ज्ञानी मुनि प्रेममें पूर्णरूपसे निमगय्र हैं। उनकी वह दशा कही नहीं जाती॥ ५॥
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥
disi aru bidisi paṃtha nahiṃ sūjhā| ko maiṃ caleum̐ kahām̐ nahiṃ būjhā||
kabahum̐ka phiri pācheṃ puni jāī| kabahum̐ka nṛtya karai guna gāī||
Meaning उन्हें दिशा-विदिशा (दिशाएँ और उनके कोण आदि) और रास्ता, कुछ भी नहीं सूझ रहा है। मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ, यह भी नहीं जानते (इसका भी ज्ञान नहीं है)। वे कभी पीछे घूमकर फिर आगे चलने लगते हैं और कभी [प्रभुके] गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं॥ ६॥
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥
abirala prema bhagati muni pāī| prabhu dekhaiṃ taru oṭa lukāī||
atisaya prīti dekhi raghubīrā| pragaṭe hṛdayam̐ harana bhava bhīrā||
Meaning मुनिने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति प्रात कर ली। प्रभु श्रीरामजी वृक्षकी आड़में छिपकर [ भक्तकी प्रेमोन्मत्त दशा] देख रहे हैं। मुनिका अत्यन्त प्रेम देखकर भवभय (आवागमनके भय) को हरनेवाले श्रीरघुनाथजी मुनिके हृदयमें प्रकट हो गये॥७॥
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥
muni maga mājha acala hoi baisā| pulaka sarīra panasa phala jaisā||
taba raghunātha nikaṭa cali āe| dekhi dasā nija jana mana bhāe||
Meaning [ हृदयमें प्रभुके दर्शन पाकर] मुनि बीच रास्तेमें अचल (स्थिर) होकर बैठ गये। उनका शरीर रोमाज्जसे कटहलके फलके समान [कण्टकित] हो गया। तब श्रीरघुनाथजी उनके पास चले आये और अपने भक्तकी प्रेमदशा देखकर मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥ ८॥
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा॥
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥
munihi rāma bahu bhām̐ti jagāvā| jāga na dhyānajanita sukha pāvā||
bhūpa rūpa taba rāma durāvā| hṛdayam̐ caturbhuja rūpa dekhāvā||
Meaning श्रीरामजीने मुनिको बहुत प्रकारसे जगाया, पर मुनि नहीं जागे; क्योंकि उन्हें प्रभुके ध्यानका सुख प्राप्त हो रहा था। तब श्रीरामजीने अपने राजरूपको छिपा लिया और उनके हृदयमें अपना चतुर्भुजरूप प्रकट किया॥ ९॥
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें॥
आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥
muni akulāi uṭhā taba kaiseṃ| bikala hīna mani phani bara jaiseṃ||
āgeṃ dekhi rāma tana syāmā| sītā anuja sahita sukha dhāmā||
Meaning तब (अपने इष्ट-स्वरूपके अन्तर्धान होते ही) मुनि कैसे व्याकुल होकर उठे, जैसे श्रेष्ठ (मणिधर) सर्प मणिके बिना व्याकुल हो जाता है। मुनिने अपने सामने सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्यामसुन्दर-विग्रह सुखधाम श्रीरामजीको देखा॥ १०॥
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥
pareu lakuṭa iva carananhi lāgī| prema magana munibara baṛabhāgī||
bhuja bisāla gahi lie uṭhāī| parama prīti rākhe ura lāī||
Meaning प्रेममें मग्र हुए वे बड़भागी श्रेष्ठ मुनि लाठीकी तरह गिरकर श्रीरामजीके चरणोंमें लग गये। श्रीरामजीने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेमसे हृदयसे लगा रखा॥ ११॥
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥
munihi milata asa soha kṛpālā| kanaka taruhi janu bheṃṭa tamālā||
rāma badanu biloka muni ṭhāṛhā| mānahum̐ citra mājha likhi kāṛhā||
Meaning कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुनिसे मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोनेके वृक्षसे तमालका वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। मुनि। निस्तब्ध] खड़े हुए [टकटकी लगाकर] श्रीरामजीका मुख देख रहे हैं, मानो चित्रमें लिखकर बनाये गये हों॥ १२॥
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥ १०॥
taba muni hṛdayam̐ dhīra dhīra gahi pada bārahiṃ bāra|
nija āśrama prabhu āni kari pūjā bibidha prakāra|| 10||
Meaning तब मुनिने हृदयमें धीरज धरकर बार-बार चरणोंको स्पर्श किया। फिर प्रभुको अपने आश्रममें लाकर अनेक प्रकारसे उनकी पूजा की॥ १०॥
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी॥
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी॥
kaha muni prabhu sunu binatī morī| astuti karauṃ kavana bidhi torī||
mahimā amita mori mati thorī| rabi sanmukha khadyota am̐jorī||
Meaning मुनि कहने लगे--हे प्रभो ! मेरी विनती सुनिये। मैं किस प्रकारसे आपकी स्तुति करूँ ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि अल्प है। जैसे सूर्यके सामने जुगनूका उजाला!॥ १॥
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥
पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥
śyāma tāmarasa dāma śarīraṃ| jaṭā mukuṭa paridhana municīraṃ||
pāṇi cāpa śara kaṭi tūṇīraṃ| naumi niraṃtara śrīraghuvīraṃ||
Meaning हे नीलकमलकी मालाके समान श्याम शरीरवाले! हे जटाओंका मुकुट और मुनियोंके (वल्कल) वस्त्र पहने हुए, हाथोंमें धनुष-बाण लिये तथा कमरमें तरकस कसे हुए श्रीरामजी ! मैं आपको निरन्तर नमस्कार करता हूँ॥ २॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥
निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥
moha vipina ghana dahana kṛśānuḥ| saṃta saroruha kānana bhānuḥ||
niśicara kari varūtha mṛgarājaḥ| trātu sadā no bhava khaga bājaḥ||
Meaning जो मोहरूपी घने वनको जलानेके लिये अग्नि हैं, संतरूपी कमलोंके वनके प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य हैं, राक्षसरूपी हाथियोंके समूहके पछाड़नेके लिये सिंह हैं और भव (आवागमन) रूपी पक्षीके मारनेके लिये बाजरूप हैं, वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें॥ ३॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं॥
हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं॥
aruṇa nayana rājīva suveśaṃ| sītā nayana cakora niśeśaṃ||
hara hradi mānasa bāla marālaṃ| naumi rāma ura bāhu viśālaṃ||
Meaning हे लाल कमलके समान नेत्र और सुन्दर वेषवाले! सीताजीके नेत्ररूपी चकोरके चन्द्रमा, शिवजीके हृदयरूपी मानसरोवरके बालहंस, विशाल हृदय और भुजावाले श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥
saṃśaya sarpa grasana uragādaḥ| śamana sukarkaśa tarka viṣādaḥ||
bhava bhaṃjana raṃjana sura yūthaḥ| trātu sadā no kṛpā varūthaḥ||
Meaning जो संशयरूपी सर्पको ग्रसनेके लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्कसे उत्पन्न होनेवाले विषादका नाश करनेवाले हैं, आवागमनको मिटानेवाले और देवताओंके समूहको आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपाके समूह श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें॥५॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥
अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं॥
nirguṇa saguṇa viṣama sama rūpaṃ| jñāna girā gotītamanūpaṃ||
amalamakhilamanavadyamapāraṃ| naumi rāma bhaṃjana mahi bhāraṃ||
Meaning हे निर्गुण, सगुण, विषम और समरूप ! हे ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे अतीत! हे अनुपम,निर्मल, सम्पूर्ण दोषरहित, अनन्त एवं पृथ्वीका भार उतारनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ६॥
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥
अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥
bhakta kalpapādapa ārāmaḥ| tarjana krodha lobha mada kāmaḥ||
ati nāgara bhava sāgara setuḥ| trātu sadā dinakara kula ketuḥ||
Meaning जो भक्तोंके लिये कल्पवृक्षके बगीचे हैं, क्रोध, लोभ, मद और कामको डरानेवाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसाररूपी समुद्रसे तरनेके लिये सेतुरूप हैं, वे सूर्यकुलकी ध्वजा श्रीरामजी सदा मेरी रक्षा करें॥७॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥
atulita bhuja pratāpa bala dhāmaḥ| kali mala vipula vibhaṃjana nāmaḥ||
dharma varma narmada guṇa grāmaḥ| saṃtata śaṃ tanotu mama rāmaḥ||
Meaning जिनकी भुजाओंका प्रताप अतुलनीय है, जो बलके धाम हैं, जिनका नाम कलियुगके बड़े भारी पापोंका नाश करनेवाला है, जो धर्मके कवच (रक्षक) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरन्तर मेरे कल्याणका विस्तार करें॥ ८॥
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥
jadapi biraja byāpaka abināsī| saba ke hṛdayam̐ niraṃtara bāsī||
tadapi anuja śrī sahita kharārī| basatu manasi mama kānanacārī||
Meaning यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सबके हृदयमें निरन्तर निवास करनेवाले हैं; तथापि हे खरारि श्रीरामजी ! लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनमें विचरनेवाले आप इसी रूपमें मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ ९॥
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥
जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥
je jānahiṃ te jānahum̐ svāmī| saguna aguna ura aṃtarajāmī||
jo kosala pati rājiva nayanā| karau so rāma hṛdaya mama ayanā||
Meaning हे स्वामी ! आपको जो सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हों, वे जाना करें, मेरे हदयको तो कोसलपति कमलनयन श्रीरामजी ही अपना घर बनावें॥ १०॥
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए॥
asa abhimāna jāi jani bhore| maiṃ sevaka raghupati pati more||
suni muni bacana rāma mana bhāe| bahuri haraṣi munibara ura lāe||
Meaning ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूँ और श्रीरघुनाथजी मेरे स्वामी हैं। मुनिके वचन सुनकर श्रीरामजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। तब उन्होंने हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनिको हृदयसे लगा लिया॥ ११॥
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही॥
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥
parama prasanna jānu muni mohī| jo bara māgahu deu so tohī||
muni kaha mai bara kabahum̐ na jācā| samujhi na parai jhūṭha kā sācā||
Meaning [और कहा-] हे मुनि! मुझे परम प्रसन्न जानो। जो वर माँगो, वही मैं तुम्हें दूँ! मुनि सुतीक्षणजीने कहा--मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है, (क्या माँगूँ, कया नहीं)॥ १२॥
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई॥
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥
tumhahi nīka lāgai raghurāī| so mohi dehu dāsa sukhadāī||
abirala bhagati birati bigyānā| hohu sakala guna gyāna nidhānā||
Meaning [ अत: ] हे रघुनाथजी ! हे दासोंको सुख देनेवाले ! आपको जो अच्छा लगे, मुझे वही दीजिये। [ श्रीरामचन्द्रजीने कहा--हे मुने !] तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान और समस्त गुणों तथा ज्ञानके निधान हो जाओ॥ १३॥
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा।
अब सो देहु मोहि जो भावा॥
prabhu jo dīnha so baru maiṃ pāvā| aba so dehu mohi jo bhāvā||
Meaning [ तब मुनि बोले--] प्रभुने जो वरदान दिया वह तो मैंने पा लिया। अब मुझे जो अच्छा लगता है वह दीजिये--॥ १४॥
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥ १४॥
anuja jānakī sahita prabhu cāpa bāna dhara rāma|
mama hiya gagana iṃdu iva basahu sadā nihakāma|| 14||
Meaning हे प्रभो ! हे श्रीरामजी ! छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित धनुष-बाणधारी आप निष्काम (स्थिर) होकर मेरे हदयरूपी आकाशमें चन्द्रमाकी भाँति सदा निवास कीजिये॥ ११॥
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा॥
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥
evamastu kari ramānivāsā| haraṣi cale kubhaṃja riṣi pāsā||
bahuta divasa gura darasana pāem̐| bhae mohi ehiṃ āśrama āem̐||
Meaning “एवमस्तु' (ऐसा ही हो) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मीनिवास श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषिके पास चले। [तब सुतीक्षणजी बोले--] गुरु अगस्त्यजीका दर्शन पाये और इस आश्रममें आये मुझे बहुत दिन हो गये॥ १॥
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई॥
aba prabhu saṃga jāum̐ gura pāhīṃ| tumha kaham̐ nātha nihorā nāhīṃ||
dekhi kṛpānidhi muni caturāī| lie saṃga bihasai dvau bhāī||
Meaning अब मैं भी प्रभु (आप) के साथ गुरुजीके पास चलता हूँ। इसमें हे नाथ! आपपर मेरा कोई एहसान नहीं है। मुनिकी चतुरता देखकर कृपाके भण्डार श्रीरामजीने उनको साथ ले लिया और दोनों भाई हँसने लगे॥ २॥
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥
paṃtha kahata nija bhagati anūpā| muni āśrama pahum̐ce surabhūpā||
turata sutīchana gura pahiṃ gayaū| kari daṃḍavata kahata asa bhayaū||
Meaning रास्तेमें अपनी अनुपम भक्तिका वर्णन करते हुए देवताओंके राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनिके आश्रमपर पहुँचे। सुततीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्यजीके पास गये और दण्डवत् करके ऐसा कहने लगे--॥ ३॥
नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा॥
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥
nātha kausalādhīsa kumārā| āe milana jagata ādhārā||
rāma anuja sameta baidehī| nisi dinu deva japata hahu jehī||
Meaning हे नाथ! अयोध्याके राजा दशरथजीके कुमार जगदाधार श्रीरामचन्द्रजी छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित आपसे मिलने आये हैं, जिनका हे देव! आप रात-दिन जप करते रहते हैं॥ ४॥
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥
sunata agasti turata uṭhi dhāe| hari biloki locana jala chāe||
muni pada kamala pare dvau bhāī| riṣi ati prīti lie ura lāī||
Meaning यह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत ही उठ दौड़े। भगवान्को देखते ही उनके नेत्रोंगें [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भर आया। दोनों भाई मुनिके चरणकमलॉोंपर गिर पड़े। ऋषिने [उठाकर] बड़े प्रेमसे उन्हें हृदयसे लगा लिया॥ ५॥
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी॥
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा॥
sādara kusala pūchi muni gyānī| āsana bara baiṭhāre ānī||
puni kari bahu prakāra prabhu pūjā| mohi sama bhāgyavaṃta nahiṃ dūjā||
Meaning ज्ञानी मुनिने आदरपूर्वक कुशल पूछकर उनको लाकर श्रेष्ठ आसनपर बैठाया। फिर बहुत प्रकारसे प्रभुकी पूजा करके कहा-मेरे समान भाग्यवान् आज दूसरा कोई नहीं है॥ ६॥
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा।
हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥
jaham̐ lagi rahe apara muni bṛṃdā| haraṣe saba biloki sukhakaṃdā||
Meaning वहाँ जहाँतक (जितने भी) अन्य मुनिगण थे, सभी आनन्दकन्द श्रीरामजीके दर्शन करके हर्षित हो गये॥ ७॥
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर॥ १२॥
muni samūha maham̐ baiṭhe sanmukha saba kī ora|
sarada iṃdu tana citavata mānahum̐ nikara cakora|| 12||
Meaning मुनियोंके समूहमें श्रीरामचन्द्रजी सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं (अर्थात् प्रत्येक मुनिको श्रीरामजी अपने ही सामने मुख करके बेठे दिखायी देते हैं और सब मुनि टकटकी लगाये उनके मुखको देख रहे हैं)। ऐसा जान पड़ता है मानो चकोरोंका समुदाय शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी ओर देख रहा हो॥ १२॥
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही॥
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥
taba raghubīra kahā muni pāhīṃ| tumha sana prabhu durāva kachu nāhī||
tumha jānahu jehi kārana āyaum̐| tāte tāta na kahi samujhāyaum̐||
Meaning तब श्रीरामजीने मुनिसे कहा--हे प्रभो ! आपसे तो कुछ छिपाव है नहीं। मैं जिस कारणसे आया हूँ वह आप जानते ही हैं। इसीसे हे तात! मैंने आपसे समझाकर कुछ नहीं कहा॥ १॥
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥
aba so maṃtra dehu prabhu mohī| jehi prakāra mārauṃ munidrohī||
muni musakāne suni prabhu bānī| pūchehu nātha mohi kā jānī||
Meaning हे प्रभो ! अब आप मुझे वही मन्त्र (सलाह) दीजिये, जिस प्रकार मैं मुनियोंके द्रोही राक्षसोंको मारूँ। प्रभुकी वाणी सुनकर मुनि मुस्कराये और बोले-अहे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया है?॥ २॥
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥
ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥
tumhareim̐ bhajana prabhāva aghārī| jānaum̐ mahimā kachuka tumhārī||
ūmari taru bisāla tava māyā| phala brahmāṃḍa aneka nikāyā||
Meaning हे पापोंका नाश करनेवाले ! मैं तो आपहीके भजनके प्रभावसे आपकी कुछ थोड़ी -सी महिमा जानता हूँ। आपकी माया गूलरके विशाल वृक्षके समान है, अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह ही जिसके फल हैं॥ ३॥
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना॥
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥
jīva carācara jaṃtu samānā| bhītara basahi na jānahiṃ ānā||
te phala bhacchaka kaṭhina karālā| tava bhayam̐ ḍarata sadā sou kālā||
Meaning चर और अचर जीव [गूलरके फलके भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे] जन्तुओंके समान उन [ ब्रह्माण्डरूपी फलों ] के भीतर बसते हैं और वे [अपने उस छोटे-से जगत्के सिवा] दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलोंका भक्षण करनेवाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है॥ ४॥
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥
te tumha sakala lokapati sāīṃ| pūm̐chehu mohi manuja kī nāīṃ||
yaha bara māgaum̐ kṛpāniketā| basahu hṛdayam̐ śrī anuja sametā||
Meaning उन्हीं आपने समस्त लोकपालोंके स्वामी होकर भी मुझसे मनुष्यकी तरह प्रश्न किया। हे कृपाके धाम! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हृदयमें [सदा] निवास कीजिये॥ ५॥
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा॥
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता॥
abirala bhagati birati satasaṃgā| carana saroruha prīti abhaṃgā||
jadyapi brahma akhaṃḍa anaṃtā| anubhava gamya bhajahiṃ jehi saṃtā||
Meaning मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम प्राप्त हो। यद्यपि आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, जो अनुभवसे ही जाननेमें आते हैं और जिनका संतजन भजन करते हैं;॥ ६॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥
asa tava rūpa bakhānaum̐ jānaum̐| phiri phiri saguna brahma rati mānaum̐||
saṃtata dāsanha dehu baṛāī| tāteṃ mohi pūm̐chehu raghurāī||
Meaning यद्यपि मैं आपके ऐसे रूपको जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्ममें (आपके इस सुन्दर स्वरूपमें) ही प्रेम मानता हूँ। आप सेवकोंको सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसीसे हे रघुनाथजी ! आपने मुझसे पूछा है॥७॥
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥
hai prabhu parama manohara ṭhāūm̐| pāvana paṃcabaṭī tehi nāūm̐||
daṃḍaka bana punīta prabhu karahū| ugra sāpa munibara kara harahū||
Meaning हे प्रभो ! एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है; उसका नाम पश्चवटी है। हे प्रभो ! आप दण्डकवनको [ जहाँ पश्चवटी है ] पवित्र कीजिये और श्रेष्ठ मुनि गौतमजीके कठोर शापको हर लीजिये॥ ८॥
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥
bāsa karahu taham̐ raghukula rāyā| kīje sakala muninha para dāyā||
cale rāma muni āyasu pāī| turatahiṃ paṃcabaṭī niarāī||
Meaning हे रघुकुलके स्वामी! आप सब मुनियोंपर दया करके वहीं निवास कीजिये। मुनिकी आज्ञा पाकर श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये और शीघ्र ही पश्टचटीके निकट पहुँच गये॥ ९॥
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥ १३॥
gīdharāja saiṃ bhaiṃṭa bhai bahu bidhi prīti baṛhāi|
godāvarī nikaṭa prabhu rahe parana gṛha chāi|| 13||
Meaning वहाँ गृध्रराज जटायुसे भेंट हुई। उसके साथ बहुत प्रकारसे प्रेम बढ़ाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गोदावरीजीके समीप पर्णकुटी छाकर रहने लगे॥ १३॥
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए॥
jaba te rāma kīnha taham̐ bāsā| sukhī bhae muni bītī trāsā||
giri bana nadīṃ tāla chabi chāe| dina dina prati ati hauhiṃ suhāe||
Meaning जबसे श्रीरामजीने वहाँ निवास किया तबसे मुनि सुखी हो गये, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभासे छा गये। वे दिनोंदिन अधिक सुहावने (मालूम) होने लगे॥ १॥
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं।
मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं॥
khaga mṛga bṛṃda anaṃdita rahahīṃ| madhupa madhura gaṃjata chabi lahahīṃ||
सो बन बरनि न सक अहिराजा।
जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥
so bana barani na saka ahirājā| jahām̐ pragaṭa raghubīra birājā||
Meaning पक्षी और पशुओंके समूह आनन्दित रहते हैं और भौरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहाँ प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वनका वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते॥ २॥
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई॥
eka bāra prabhu sukha āsīnā| lachimana bacana kahe chalahīnā||
sura nara muni sacarācara sāīṃ| maiṃ pūchaum̐ nija prabhu kī nāī||
Meaning एक बार प्रभु श्रीरामजी सुखसे बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजीने उनसे छलरहित (सरल) वचन कहे--हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचरके स्वामी ! मैं अपने प्रभुकी तरह (अपना स्वामी समझकर) आपसे पूछता हूँ॥ ३॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥
mohi samujhāi kahahu soi devā| saba taji karauṃ carana raja sevā||
kahahu gyāna birāga aru māyā| kahahu so bhagati karahu jehiṃ dāyā||
Meaning हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरजकी ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और मायाका वर्णन कीजिये; और उस भक्तिको कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं॥ ४॥
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥ १४॥
īsvara jīva bheda prabhu sakala kahau samujhāi|
jāteṃ hoi carana rati soka moha bhrama jāi|| 14||
Meaning हे प्रभो ! ईश्वर और जीवका भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणोंमें मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा श्रम नष्ट हो जायेँ॥ १४॥
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
thorehi maham̐ saba kahaum̐ bujhāī| sunahu tāta mati mana cita lāī||
maiṃ aru mora tora taiṃ māyā| jehiṃ basa kīnhe jīva nikāyā||
Meaning ( श्रीरामजीने कहा--) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा--यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है॥ १॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥
go gocara jaham̐ lagi mana jāī| so saba māyā jānehu bhāī||
tehi kara bheda sunahu tumha soū| bidyā apara abidyā doū||
Meaning इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना। उसके भी-एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो--॥ २॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥
eka duṣṭa atisaya dukharūpā| jā basa jīva parā bhavakūpā||
eka racai jaga guna basa jākeṃ| prabhu prerita nahiṃ nija bala tākeṃ||
Meaning एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है। और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है॥ ३॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही॥
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥
gyāna māna jaham̐ ekau nāhīṃ| dekha brahma samāna saba māhī||
kahia tāta so parama birāgī| tṛna sama siddhi tīni guna tyāgī||
Meaning ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है। हे तात ! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो॥ ४॥ [जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवाका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मनका निगृहीत न होना, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा- व्याधिमय जगतमें सुखबुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदिमें आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्टकी प्रासिमें हर्ष-शोक, भक्तिका अभाव, एकान्तमें मन न लगना, विषयी मनुष्योंके संगमें प्रेम--ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके अर्थ (तत्त्वज्ञानके द्वारा जाननेयोग्य ) परमात्माका नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिये गीता अध्याय १३। ७ से ११]
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥ १५॥
māyā īsa na āpu kahum̐ jāna kahia so jīva|
baṃdha moccha prada sarbapara māyā preraka sīva|| 15||
Meaning जो मायाको, ईधरको और अपने स्वरूपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। जो [ कर्मानुसार] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह ईशर है॥ १५॥
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥
dharma teṃ birati joga teṃ gyānā| gyāna mocchaprada beda bakhānā||
jāteṃ begi dravaum̐ maiṃ bhāī| so mama bhagati bhagata sukhadāī||
Meaning धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है--ऐसा वेदोंने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है॥ १॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलड़ जो संत होड़ें अनुकूला॥
so sutaṃtra avalaṃba na ānā| tehi ādhīna gyāna bigyānā||
bhagati tāta anupama sukhamūlā| milaṛa jo saṃta hoṛeṃ anukūlā||
Meaning वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधनका सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं॥ २॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥
bhagati ki sādhana kahaum̐ bakhānī| sugama paṃtha mohi pāvahiṃ prānī||
prathamahiṃ bipra carana ati prītī| nija nija karma nirata śruti rītī||
Meaning अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे कहता हूँ-यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणोंके चरणोंमें अत्यन्त प्रीति हो और वेदकी रीतिके अनुसार अपने- अपने [वर्णाश्रमके] कर्मोमें लगा रहे॥ ३॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥
ehi kara phala puni biṣaya birāgā| taba mama dharma upaja anurāgā||
śravanādika nava bhakti dṛṛhāhīṃ| mama līlā rati ati mana māhīṃ||
Meaning इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होनेपर) मेरे धर्म ( भागवतधर्म ) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा॥ ४॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा॥
saṃta carana paṃkaja ati premā| mana krama bacana bhajana dṛṛha nemā||
guru pitu mātu baṃdhu pati devā| saba mohi kaham̐ jāne dṛṛha sevā||
Meaning जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो;॥ ५॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥
mama guna gāvata pulaka sarīrā| gadagada girā nayana baha nīrā||
kāma ādi mada daṃbha na jākeṃ| tāta niraṃtara basa maiṃ tākeṃ||
Meaning मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गदूगद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ॥ ६॥
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥ १६॥
bacana karma mana mori gati bhajanu karahiṃ niḥkāma|
tinha ke hṛdaya kamala mahum̐ karaum̐ sadā biśrāma|| 16||
Meaning जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥ १६॥
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥
bhagati joga suni ati sukha pāvā| lachimana prabhu carananhi siru nāvā||
ehi bidhi gae kachuka dina bītī| kahata birāga gyāna guna nītī||
Meaning इस भक्तियोगको सुनकर लक्ष्मणजीने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंमें सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये॥ १॥
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥
sūpanakhā rāvana kai bahinī| duṣṭa hṛdaya dāruna jasa ahinī||
paṃcabaṭī so gai eka bārā| dekhi bikala bhai jugala kumārā||
Meaning शूर्पणखा नामक रावणकी एक बहिन थी, जो नागिनके समान भयानक और दुष्ट हदयकी थी। वह एक बार पश्चवटीमें गयी और दोनों राजकुमारोंको देखकर विकल (कामसे पीड़ित) हो गयी॥ २॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥
bhrātā pitā putra uragārī| puruṣa manohara nirakhata nārī||
hoi bikala saka manahi na rokī| jimi rabimani drava rabihi bilokī||
Meaning ( काकभुशुण्डिजी कहते हैं--) हे गरुड़जी! (शुर्पणखा-जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध) स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मनको नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यको देखकर द्रवित हो जाती है (ज्वालासे पिघल जाती है)॥ ३॥
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥
rucira rupa dhari prabhu pahiṃ jāī| bolī bacana bahuta musukāī||
tumha sama puruṣa na mo sama nārī| yaha sam̐joga bidhi racā bicārī||
Meaning वह सुन्दर रूप धरकर प्रभुके पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली--न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री ! विधाताने यह संयोग ( जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है॥ ४॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥
mama anurūpa puruṣa jaga māhīṃ| dekheum̐ khoji loka tihu nāhīṃ||
tāte aba lagi rahium̐ kumārī| manu mānā kachu tumhahi nihārī||
Meaning मेरे योग्य पुरुष (वर) जगतूभरमें नहीं है, मैंने तीनों लोकोंको खोज देखा। इसीसे मैं अबतक कुमारी (अविवाहित) रही। अब तुमको देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है॥५॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥
sītahi citai kahī prabhu bātā| ahai kuāra mora laghu bhrātā||
gai lachimana ripu bhaginī jānī| prabhu biloki bole mṛdu bānī||
Meaning सीताजीकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजीके पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रुकी बहिन समझकर और प्रभुकी ओर देखकर कोमल वाणीसे बोले--॥ ६॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥
suṃdari sunu maiṃ unha kara dāsā| parādhīna nahiṃ tora supāsā||
prabhu samartha kosalapura rājā| jo kachu karahiṃ unahi saba chājā||
Meaning हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं पराधीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुरके राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है॥७॥
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥
sevaka sukha caha māna bhikhārī| byasanī dhana subha gati bibhicārī||
lobhī jasu caha cāra gumānī| nabha duhi dūdha cahata e prānī||
Meaning सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल--अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं )॥ ८॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥
puni phiri rāma nikaṭa so āī| prabhu lachimana pahiṃ bahuri paṭhāī||
lachimana kahā tohi so baraī| jo tṛna tori lāja pariharaī||
Meaning वह लौटकर फिर श्रीरामजीके पास आयी। प्रभुने फिर उसे लक्ष्मणजीके पास भेज दिया। लक्ष्मणजीने कहा--तुम्हें वही बरेगा जो लज्जाको तृण तोड़कर (अर्थात् प्रतिज्ञा करके) त्याग देगा (अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा)॥ ९॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥
taba khisiāni rāma pahiṃ gaī| rūpa bhayaṃkara pragaṭata bhaī||
sītahi sabhaya dekhi raghurāī| kahā anuja sana sayana bujhāī||
Meaning तब वह खिसियायी हुई (क्रद्ध होकर) श्रीरामजीके पास गयी और उसने अपना भयड्र रूप प्रकट किया। सीताजीको भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीको इशारा देकर कहा॥ १०॥
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥ १७॥
lachimana ati lāghavam̐ so nāka kāna binu kīnhi|
tāke kara rāvana kaham̐ manau cunautī dīnhi|| 17||
Meaning लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे उसको बिना नाक-कानकी कर दिया। मानो उसके हाथ रावणको चुनौती दी हो!॥ १७॥
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥
nāka kāna binu bhai bikarārā| janu strava saila gairu kai dhārā||
khara dūṣana pahiṃ gai bilapātā| dhiga dhiga tava pauruṣa bala bhrātā||
Meaning बिना नाक-कानके वह विकराल हो गयी। [ उसके शरीरसे रक्त इस प्रकार बहने लगा] मानो [ काले] पर्वतसे गेरूकी धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषणके पास गयी। [ और बोली--] हे भाई! तुम्हार पौरुष (वीरता) को धिककार है, तुम्हारे बलको धिक्कार है॥ १॥
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥
धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥
tehi pūchā saba kahesi bujhāī| jātudhāna suni sena banāī||
dhāe nisicara nikara barūthā| janu sapaccha kajjala giri jūthā||
Meaning उन्होंने पूछा, तब शुर्पणखाने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसोंने सेना तैयार की। राक्षससमूह झुंड-के-झुंड दौड़े। मानो पंखधारी काजलके पर्वतोंका झुंड हो॥ २॥
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥
सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥
nānā bāhana nānākārā| nānāyudha dhara ghora apārā||
supanakhā āgeṃ kari līnī| asubha rūpa śruti nāsā hīnī||
Meaning वे अनेकों प्रकारकी सवारियोंपर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार (सूरतों) के हैं। वे अपार हैं और अनेकों प्रकारके असंख्य भयानक हथियार धारण किये हुए हैं। उन्होंने नाक-कान कटी हुई अमज़लरूपिणी शुूर्पणखाको आगे कर लिया॥ ३॥
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥
asaguna amita hohiṃ bhayakārī| ganahiṃ na mṛtyu bibasa saba jhārī||
garjahi tarjahiṃ gagana uṛāhīṃ| dekhi kaṭaku bhaṭa ati haraṣāhīṃ||
Meaning अनगिनत भयड्भर अशकुन हो रहे हैं। परन्तु मृत्युके वश होनेके कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाशमें उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धालोग बहुत ही हर्षित होते हैं॥ ४॥
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥
धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥
kou kaha jiata dharahu dvau bhāī| dhari mārahu tiya lehu chaṛāī||
dhūri pūri nabha maṃḍala rahā| rāma bolāi anuja sana kahā||
Meaning कोई कहता है दोनों भाइयोंको जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्रीको छीन लो। आकाशमण्डल धूलसे भर गया। तब श्रीरामजीने लक्ष्मणजीको बुलाकर उनसे कहा--॥ ५॥
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥
lai jānakihi jāhu giri kaṃdara| āvā nisicara kaṭaku bhayaṃkara||
rahehu sajaga suni prabhu kai bānī| cale sahita śrī sara dhanu pānī||
Meaning राक्षसोंकी भयानक सेना आ गयी है। जानकीजीको लेकर तुम पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। सावधान रहना॥ प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीसीताजीसहित चले॥ ६॥
देखि राम रिपुदल चलि आवा।
बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥
dekhi rāma ripudala cali āvā| bihasi kaṭhina kodaṃḍa caṛhāvā||
Meaning शत्रुओंकी सेना [समीप] चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजीने हँसकर कठिन धनुषको चढ़ाया॥ ७॥
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥
कटि कसि निष॑ंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।
चितवत मनहूँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
kodaṃḍa kaṭhina caṛhāi sira jaṭa jūṭa bām̐dhata soha kyoṃ|
marakata sayala para larata dāmini koṭi soṃ juga bhujaga jyoṃ||
kaṭi kasi niṣaṃga bisāla bhuja gahi cāpa bisikha sudhāri kai|
citavata manahūm̐ mṛgarāja prabhu gajarāja ghaṭā nihāri kai||
Meaning कठिन धनुष चढ़ाकर सिरपर जटाका जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि (पन्ने) के पर्वतपर करोड़ों बिजलियोंसे दो साँप लड़ रहे हों। कमरमें तरकस कसकर, विशाल भुजाओंमें धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंकी ओर देख रहे हैं। मानो मतवाले हाथियोंके समूहको [आता] देखकर सिंह [उनकी ओर] ताक रहा हो।
आइ गए बगमेल धरहू धरहु धावत सुभट।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥ १८॥
āi gae bagamela dharahū dharahu dhāvata subhaṭa|
jathā biloki akela bāla rabihi gherata danuja|| 18||
Meaning “पकड़ो-पकड़ो' पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर (बड़ी तेजीसे) दौड़े हुए आये [ और उन्होंने श्रीरामजीको चारों ओरसे घेर लिया], जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं॥ १८॥
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥
prabhu biloki sara sakahiṃ na ḍārī| thakita bhaī rajanīcara dhārī||
saciva boli bole khara dūṣana| yaha kou nṛpabālaka nara bhūṣana||
Meaning [ सौन्दर्य-माधुर्यनिधि ] प्रभु श्रीरामजीको देखकर राक्षसोंकी सेना थकित रह गयी। वे उनपर बाण नहीं छोड़ सके। मन्त्रीको बुलाकर खर-दूषणने कहा--यह राजकुमार कोई मनुष्योंका भूषण है॥ १॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥
nāga asura sura nara muni jete| dekhe jite hate hama kete||
hama bhari janma sunahu saba bhāī| dekhī nahiṃ asi suṃdaratāī||
Meaning जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमेंसे हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयो ! सुनो, हमने जन्मभरमें ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी॥ २॥
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥
jadyapi bhaginī kīnha kurūpā| badha lāyaka nahiṃ puruṣa anūpā||
dehu turata nija nāri durāī| jīata bhavana jāhu dvau bhāī||
Meaning यद्यपि इन्होंने हमारी बहिनको कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। 'छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ॥ ३॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई॥
mora kahā tumha tāhi sunāvahu| tāsu bacana suni ātura āvahu||
dūtanha kahā rāma sana jāī| sunata rāma bole musakāī||
Meaning मेरा यह कथन तुमलोग उसे सुनाओ और उसका वचन (उत्तर) सुनकर शीघ्र आओ। दूतोंने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजीसे कहा। उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुसकराकर बोले--॥ ४॥
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥
hama chatrī mṛgayā bana karahīṃ| tumha se khala mṛga khaujata phirahīṃ||
ripu balavaṃta dekhi nahiṃ ḍarahīṃ| eka bāra kālahu sana larahīṃ||
Meaning हम क्षत्रिय हैं, वनमें शिकार करते हैं और तुम्हारे-सरीखे दुष्ट पशुओंको तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान् शत्रुको देखकर नहीं डरते। [ लड़नेको आवे तो] एक बार तो हम कालसे भी लड़ सकते हैं॥ ५॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥
jadyapi manuja danuja kula ghālaka| muni pālaka khala sālaka bālaka||
jauṃ na hoi bala ghara phiri jāhū| samara bimukha maiṃ hataum̐ na kāhū||
Meaning यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुलका नाश करनेवाले और मुनियोंकी रक्षा करनेवाले हैं, हम बालक हैं, परन्तु हैं दुष्ठोंको दण्ड देनेवाले। यदि बल न हो तो घर लौट जाओ। संग्राममें पीठ दिखानेवाले किसीको मैं नहीं मारता॥ ६॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥
rana caṛhi karia kapaṭa caturāī| ripu para kṛpā parama kadarāī||
dūtanha jāi turata saba kaheū| suni khara dūṣana ura ati daheū||
Meaning रणमें चढ़ आकर कपट-चतुराई करना और शत्रुपर कृपा करना (दया दिखाना) तो बड़ी भारी कायरता है। दूतोंने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर-दूषणका हृदय अत्यन्त जल उठा॥ ७॥
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।
सर चाप तोमर सक्ति सूल पान कृ परिघ परसु धरा॥
प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥
ura daheu kaheu ki dharahu dhāe bikaṭa bhaṭa rajanīcarā|
sara cāpa tomara sakti sūla pāna kṛ parigha parasu dharā||
prabhu kīnhi dhanuṣa ṭakora prathama kaṭhora ghora bhayāvahā|
bhae badhira byākula jātudhāna na gyāna tehi avasara rahā||
Meaning [खर-दूषणका] हृदय जल उठा। तब उन्होंने कहा--पकड़ लो (कैद कर लो)। [यह सुनकर] भयानक राक्षस योद्धा बाण, धनुष, तोमर, शक्ति (साँग), शूल (बरछी ), कृपाण (कटार), परिघ और फरसा धारण किये हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्रीरामजीने पहले धनुषका बड़ा कठोर, घोर और भयानक ट्ट्टार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गये। उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा।
सावधान होड़ धाए जानि सबल आराति।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति॥ १९ (क )॥
sāvadhāna hoṛa dhāe jāni sabala ārāti|
lāge baraṣana rāma para astra sastra bahubhām̐ti|| 19 (ka )||
Meaning फिर वे शत्रुको बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर बहुत प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे॥ १९ (क)॥
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।
तानिसरासन श्रवन लगि पुनि छॉड़े निज तीर॥ १९ ( ख )॥
tinha ke āyudha tila sama kari kāṭe raghubīra|
tānisarāsana śravana lagi puni chôṛe nija tīra|| 19 ( kha )||
Meaning श्रीरघुवीरजीने उनके हथियारोंको तिलके समान (टुकड़े-टुकड़े) करके काट डाला। फिर धनुषको कानतक तानकर अपने तीर छोड़े॥ १९ (ख)॥
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥
taba cale jāna babāna karāla| phuṃkarata janu bahu byāla||
kopeu samara śrīrāma| cale bisikha nisita nikāma||
Meaning तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत-से सर्प जा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी संग्राममें क्रद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले॥ १॥
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥
avaloki kharatara tīra| muri cale nisicara bīra||
bhae kruddha tīniu bhāi| jo bhāgi rana te jāi||
Meaning अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंको देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले। तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रद्ध होकर बोले--जो रणसे भागकर जायगा,॥ २॥
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥
tehi badhaba hama nija pāni| phire marana mana mahum̐ ṭhāni||
āyudha aneka prakāra| sanamukha te karahiṃ prahāra||
Meaning उसका हम अपने हाथों वध करेंगे। तब मनमें मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेकों प्रकारके हथियारोंसे श्रीरामजीपर प्रहार करने लगे॥ ३॥
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥
छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥
ripu parama kope jāni| prabhu dhanuṣa sara saṃdhāni||
chām̐ṛe bipula nārāca| lage kaṭana bikaṭa pisāca||
Meaning शत्रुको अत्यन्त कुपित जानकर प्रभुने धनुषपर बाण चढ़ाकर बहुत-से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे॥ ४॥
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥
चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥
ura sīsa bhuja kara carana| jaham̐ taham̐ lage mahi parana||
cikkarata lāgata bāna| dhara parata kudhara samāna||
Meaning उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथीकी तरह चिग्घाड़ते हैं। उनके पहाड़के समान धड़ कट-कटकर गिर रहे हैं॥५॥