मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥ १॥
mūlaṃ dharmatarorvivekajaladheḥ pūrṇendumānandadaṃ vairāgyāmbujabhāskaraṃ hyaghaghanadhvāntāpahaṃ tāpaham|
mohāmbhodharapūgapāṭanavidhau svaḥsambhavaṃ śaṅkaraṃ vande brahmakulaṃ kalaṅkaśamanaṃ śrīrāmabhūpapriyam|| 1||
Meaning धर्मरूपी वृक्षके मूल, विवेकरूपी समुद्रको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमलके [विकसित करनेवाले] सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकारको निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापोंको हरनेवाले, मोहरूपी बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न करनेकी विधि (क्रिया)-में आकाशसे उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्माजीके वंशज (आत्मज) तथा कलड्झनाशक महाराज श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय श्रीशड्टरजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्।
राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥ २॥
sāndrānandapayodasaubhagatanuṃ pītāmbaraṃ sundaraṃ pāṇau bāṇaśarāsanaṃ kaṭilasattūṇīrabhāraṃ varam|
rājīvāyatalocanaṃ dhṛtajaṭājūṭena saṃśobhitaṃ sītālakṣmaṇasaṃyutaṃ pathigataṃ rāmābhirāmaṃ bhaje|| 2||
Meaning जिनका शरीर जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर (श्यामवर्ण) एवं आनन्दघन है, जो सुन्दर [वल्कलका पीतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकसके भारसे सुशोभित है, कमलके समान विशाल नेत्र हैं और मस्तकपर जटाजूट धारण किये हैं, उन अत्यन्त शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित मार्गमें चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ॥ २॥
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥
umā rāma guna gūṛha paṃḍita muni pāvahiṃ birati|
pāvahiṃ moha bimūṛha je hari bimukha na dharma rati||
Meaning हे पार्वती ! श्रीरामजीके गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो भगवान्से विमुख हैं और जिनका धर्ममें प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ [उन्हें सुनकर] मोहको प्राप्त होते हैं।
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥
pura nara bharata prīti maiṃ gāī| mati anurūpa anūpa suhāī||
aba prabhu carita sunahu ati pāvana| karata je bana sura nara muni bhāvana||
Meaning पुरवासियोंके और भरतजीके अनुपम और सुन्दर प्रेमका मैंने अपनी बुद्धिकि अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य और मुनियोंके मनको भानेवाले प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वे अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वनमें कर रहे हैं॥ १॥
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥
eka bāra cuni kusuma suhāe| nija kara bhūṣana rāma banāe||
sītahi pahirāe prabhu sādara| baiṭhe phaṭika silā para suṃdara||
Meaning एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजीने अपने हाथोंसे भाँति-भाँतिके गहने बनाये और सुन्दर स्फटिकशिलापर बेठे हुए प्रभुने आदरके साथ वे गहने श्रीसीताजीको पहनाये॥ २॥
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥
surapati suta dhari bāyasa beṣā| saṭha cāhata raghupati bala dekhā||
jimi pipīlikā sāgara thāhā| mahā maṃdamati pāvana cāhā||
Meaning देवराज इन्द्रका मूर्ख पुत्र जयन्त कौएका रूप धरकर श्रीरघुनाथजीका बल देखना चाहता है। जैसे महान् मन्दबुद्धि चींटी समुद्रका थाह पाना चाहती हो॥ ३॥
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥
sītā carana cauṃca hati bhāgā| mūṛha maṃdamati kārana kāgā||
calā rudhira raghunāyaka jānā| sīṃka dhanuṣa sāyaka saṃdhānā||
Meaning वह मूढ़, मन्दबुद्धि कारणसे ( भगवानूके बलकी परीक्षा करनेके लिये) बना हुआ कौओआ सीताजीके चरणोंमें चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजीने जाना और धनुषपर सींक (सरकंडे)का बाण सन्धान किया॥ ४॥
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥ १॥
ati kṛpāla raghunāyaka sadā dīna para neha|
tā sana āi kīnha chalu mūrakha avaguna geha|| 1||
Meaning श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनोंपर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणोंके घर मूर्ख जयन्तने आकर छल किया॥ १॥
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥
prerita maṃtra brahmasara dhāvā| calā bhāji bāyasa bhaya pāvā||
dhari nija rupa gayau pitu pāhīṃ| rāma bimukha rākhā tehi nāhīṃ||
Meaning मन्त्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्रके पास गया, पर श्रीरामजीका विरोधी जानकर इन्द्रने उसको नहीं रखा॥ १॥
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥
bhā nirāsa upajī mana trāsā| jathā cakra bhaya riṣi durbāsā||
brahmadhāma sivapura saba lokā| phirā śramita byākula bhaya sokā||
Meaning तब वह निराश हो गया, उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्वासा ऋषिको चक्रसे भय हुआ था। वह ब्रहालोक, शिवलोक आदि समस्त लोकोंमें थका हुआ और भय-शोकसे व्याकुल होकर भागता फिरा॥ २॥
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥
kāhūm̐ baiṭhana kahā na ohī| rākhi ko sakai rāma kara drohī||
mātu mṛtyu pitu samana samānā| sudhā hoi biṣa sunu harijānā||
Meaning [पर रखना तो दूर रहा] किसीने उसे बैठनेतकके लिये नहीं कहा। श्रीरामजीके द्रोहीको कौन रख सकता है ? [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत विषके समान हो जाता है॥ ३॥
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥
mitra karai sata ripu kai karanī| tā kaham̐ bibudhanadī baitaranī||
saba jagu tāhi analahu te tātā| jo raghubīra bimukha sunu bhrātā||
Meaning मित्र सैकड़ों शत्रुओंकी-सी करनी करने लगता है। देवनदी गड़ाजी उसके लिये वैतरणी (यमपुरीकी नदी) हो जाती है। हे भाई ! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजीके विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्रिसे भी अधिक गरम (जलानेवाला) हो जाता है॥ ४॥
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥
nārada dekhā bikala jayaṃtā| lāgi dayā komala cita saṃtā||
paṭhavā turata rāma pahiṃ tāhī| kahesi pukāri pranata hita pāhī||
Meaning नारदजीने जयन्तको व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतोंका चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे [समझाकर] तुरंत श्रीरामजीके पास भेज दिया। उसने [जाकर] पुकारकर कहा- हे शरणागतके हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये॥ ५॥
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई॥
ātura sabhaya gahesi pada jāī| trāhi trāhi dayāla raghurāī||
atulita bala atulita prabhutāī| maiṃ matimaṃda jāni nahiṃ pāī||
Meaning आतुर और भयभीत जयन्तने जाकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये [और कहा--] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य)-को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था॥ ६॥
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥
nija kṛta karma janita phala pāyaum̐| aba prabhu pāhi sarana taki āyaum̐||
suni kṛpāla ati ārata bānī| ekanayana kari tajā bhavānī||
Meaning अपने किये हुए कर्मसे उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूँ। [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजीने उसकी अत्यन्त आर्त्त [दुःखभरी] वाणी सुनकर उसे एक आँखका काना करके छोड़ दिया॥ ७॥
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥ २॥
kīnha moha basa droha jadyapi tehi kara badha ucita|
prabhu chāṛeu kari choha ko kṛpāla raghubīra sama|| 2||
Meaning उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभुने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजीके समान कृपालु और कौन होगा?॥ २॥
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥
raghupati citrakūṭa basi nānā| carita kie śruti sudhā samānā||
bahuri rāma asa mana anumānā| hoihi bhīra sabahiṃ mohi jānā||
Meaning चित्रकूटमें बसकर श्रीरघुनाथजीने बहुत-से चरित्र किये, जो कानोंको अमृतके समान [प्रिय ] हैं। फिर (कुछ समय पश्चात्) श्रीरामजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे [यहाँ] बड़ी भीड़ हो जायगी॥ १॥
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥
sakala muninha sana bidā karāī| sītā sahita cale dvau bhāī||
atri ke āśrama jaba prabhu gayaū| sunata mahāmuni haraṣita bhayaū||
Meaning [इसलिये] सब मुनियोंसे विदा लेकर सीताजीसहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजीके आश्रममें गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये॥ २॥
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥
pulakita gāta atri uṭhi dhāe| dekhi rāmu ātura cali āe||
karata daṃḍavata muni ura lāe| prema bāri dvau jana anhavāe||
Meaning शरीर पुलकित हो. गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रतासे चले आये। दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजीको [उठाकर] मुनिने हृदयसे लगा लिया और प्रेमाश्रुओंके जलसे दोनों जनोंको (दोनों भाइयोंको) नहला दिया॥ ३॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने॥
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥
dekhi rāma chabi nayana juṛāne| sādara nija āśrama taba āne||
kari pūjā kahi bacana suhāe| die mūla phala prabhu mana bhāe||
Meaning श्रीरामजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रममें ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनिने मूल और फल दिये, जो प्रभुके मनको बहुत रुचे॥ ४॥
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥ ३॥
prabhu āsana āsīna bhari locana sobhā nirakhi|
munibara parama prabīna jori pāni astuti karata|| 3||
Meaning प्रभु आसनपर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे--॥ ३॥
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥ १॥
namāmi bhakta vatsalaṃ| kṛpālu śīla komalaṃ|
bhajāmi te padāṃbujaṃ| akāmināṃ svadhāmadaṃ|| 1||
Meaning हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषोंको अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ॥ १॥
निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥ २॥
nikāma śyāma suṃdaraṃ| bhavāmbunātha maṃdaraṃ|
praphulla kaṃja locanaṃ| madādi doṣa mocanaṃ|| 2||
Meaning आप नितान्त सुन्दर श्याम, संसार [आवागमन] रूपी समुद्रको मथनेके लिये मन्दराचलरूप, फूले हुए कमलके समान नेत्रोंबाले और मद आदि दोषोंसे छुड़ानेवाले हैं॥ २॥
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥ ३॥
pralaṃba bāhu vikramaṃ| prabho'prameya vaibhavaṃ|
niṣaṃga cāpa sāyakaṃ| dharaṃ triloka nāyakaṃ|| 3||
Meaning हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओंका पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय (बुद्धिकि परे अथवा असीम) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करनेवाले तीनों लोकोंके स्वामी,॥ ३॥
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥ ४॥
dineśa vaṃśa maṃḍanaṃ| maheśa cāpa khaṃḍanaṃ|
munīṃdra saṃta raṃjanaṃ| surāri vṛṃda bhaṃjanaṃ|| 4||
Meaning सूर्यवंशके भूषण, महादेवजीके धनुषको तोड़नेवाले, मुनिराजों और संतोंको आनन्द देनेवाले तथा देवताओंके शत्रु असुरोंके समूहका नाश करनेवाले हैं॥ ४॥
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥ ५॥
manoja vairi vaṃditaṃ| ajādi deva sevitaṃ|
viśuddha bodha vigrahaṃ| samasta dūṣaṇāpahaṃ|| 5||
Meaning आप कामदेवके शत्रु महादेवजीके द्वारा वन्दित, ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह और समस्त दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं॥ ५॥
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।
भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं॥ ६॥
namāmi iṃdirā patiṃ| sukhākaraṃ satāṃ gatiṃ|
bhaje saśakti sānujaṃ| śacī patiṃ priyānujaṃ|| 6||
Meaning हे लक्ष्मीपते! हे सुखोंकी खान और सत्पुरुषोंकी एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे शचीपति (इन्द्र) के प्रिय छोटे भाई (वामनजी ) ! स्वरूपा-शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित आपको मैं भजता हूँ॥ ६॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ ७॥
tvadaṃghri mūla ye narāḥ| bhajaṃti hīna matsarā|
pataṃti no bhavārṇave| vitarka vīci saṃkule|| 7||
Meaning जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकारके सन्देह) रूपी तरड्रोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते (आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते)॥ ७॥
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ ८॥
vivikta vāsinaḥ sadā| bhajaṃti muktaye mudā|
nirasya iṃdriyādikaṃ| prayāṃti te gatiṃ svakaṃ|| 8||
Meaning जो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इन्द्रियादिका निग्रह करके (उन्हें विषयोंसे हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको (अपने स्वरूपको) प्राप्त होते हैं॥ ८॥
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।
जगदूरूं च शाश्चतं। तुरीयमेव केवलं॥ ९॥
tamekamabhdutaṃ prabhuṃ| nirīhamīśvaraṃ vibhuṃ|
jagadūrūṃ ca śāścataṃ| turīyameva kevalaṃ|| 9||
Meaning उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत्से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी ), व्यापक, जगदूगुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणोंसे सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूपमें स्थित) हैं॥ ९॥
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।
स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥ १०॥
bhajāmi bhāva vallabhaṃ| kuyogināṃ sudurlabhaṃ|
svabhakta kalpa pādapaṃ| samaṃ susevyamanvahaṃ|| 10||
Meaning [तथा] जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों )के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष (अर्थात् उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ॥ १०॥
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।
प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ ११॥
anūpa rūpa bhūpatiṃ| nato'hamurvijā patiṃ|
prasīda me namāmi te| padābja bhakti dehi me|| 11||
Meaning हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरणकमलोंकी भक्ति दीजिये॥ ११॥
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।
व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता॥ १२॥
paṭhaṃti ye stavaṃ idaṃ| narādareṇa te padaṃ|
vrajaṃti nātra saṃśayaṃ| tvadīya bhakti saṃyutā|| 12||
Meaning जो मनुष्य इस स्तुतिको आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर आपके परमपदको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं॥ १२॥
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबदहुूँ तजै मति मोरि॥ ४॥
binatī kari muni nāi siru kaha kara jori bahori|
carana saroruha nātha jani kabadahuूm̐ tajai mati mori|| 4||
Meaning मुनिने [इस प्रकार] विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा--हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े॥ ४॥
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥
anusuiyā ke pada gahi sītā| milī bahori susīla binītā||
riṣipatinī mana sukha adhikāī| āsiṣa dei nikaṭa baiṭhāī||
Meaning फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [ अत्रिजीकी पत्नी ] अनसूयाजीके चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्ीके मनमें बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीताजीको पास बैठा लिया॥ १॥
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥
dibya basana bhūṣana pahirāe| je nita nūtana amala suhāe||
kaha riṣibadhū sarasa mṛdu bānī| nāridharma kachu byāja bakhānī||
Meaning और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य-नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणीसे स्त्रियोंके कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं॥ २॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥
mātu pitā bhrātā hitakārī| mitaprada saba sunu rājakumārī||
amita dāni bhartā bayadehī| adhama so nāri jo seva na tehī||
Meaning हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमातक ही [सुख] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [मोक्षरूप] असीम [सुख] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती॥ ३॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना॥
dhīraja dharma mitra aru nārī| āpada kāla parikhiahiṃ cārī||
bṛddha rogabasa jaṛa dhanahīnā| adhaṃ badhira krodhī ati dīnā||
Meaning धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री-इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन--॥ ४॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥
aisehu pati kara kiem̐ apamānā| nāri pāva jamapura dukha nānā||
ekai dharma eka brata nemā| kāyam̐ bacana mana pati pada premā||
Meaning ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है। शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥५॥
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं॥
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥
jaga pati bratā cāri bidhi ahahiṃ| beda purāna saṃta saba kahahiṃ||
uttama ke asa basa mana māhīṃ| sapanehum̐ āna puruṣa jaga nāhīṃ||
Meaning जगतमें चार प्रकारकी पतिब्रताएँ हैं वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणीकी पतिब्रताके मनमें ऐसा भाव बसा रहता है कि जगतमें [ मेरे पतिको छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्रमें भी नहीं है॥६॥
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें॥
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥
madhyama parapati dekhai kaiseṃ| bhrātā pitā putra nija jaiṃseṃ||
dharma bicāri samujhi kula rahaī| so nikiṣṭa triya śruti asa kahaī||
Meaning मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है।) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्रश्रेणीकी ) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥ ७॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥
binu avasara bhaya teṃ raha joī| jānehu adhama nāri jaga soī||
pati baṃcaka parapati rati karaī| raurava naraka kalpa sata paraī||
Meaning और जो स्त्री मौका न मिलनेसे या भयवश पतित्रता बनी रहती है, जगत्में उसे अधम स्त्री जानना। पतिको धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पतिसे रति करती है, वह तो सौ कल्पतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है॥ ८॥
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
chana sukha lāgi janama sata koṭi| dukha na samujha tehi sama ko khoṭī||
binu śrama nāri parama gati lahaī| patibrata dharma chāṛi chala gahaī||
Meaning क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मोंके दुःखको नहीं समझती, उसके समान दुष्ा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है॥ ९॥
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई।
बिधवा होई पाई तरुनाई॥
pati pratikula janama jaham̐ jāī| bidhavā hoī pāī tarunāī||
Meaning किन्तु जो पतिके प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर ( भरी जवानीमें) विधवा हो जाती है॥ १०॥
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय॥ ५ ( क )॥
sahaja apāvani nāri pati sevata subha gati lahai|
jasu gāvata śruti cāri ajahu tulasikā harihi priya|| 5 ( ka )||
Meaning स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किन्तु पतिकी ' सेवा करके ' वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [ पातिवब्रतधर्मके कारण ही ] आज भी तुलसीजी भगवान्को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥ ५ (क)॥
सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥ ५ ( ख )॥
sunu sītā tava nāma sumira nāri patibrata karahi|
tohi prānapriya rāma kahium̐ kathā saṃsāra hita|| 5 ( kha )||
Meaning हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मका पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीरामजी प्राणोंके समान प्रिय हैं, यह (पातिव्रतधर्मकी ) कथा तो मैंने संसारके हितके लिये कही है॥ ५ (ख)॥
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥
suni jānakīṃ parama sukhu pāvā| sādara tāsu carana siru nāvā||
taba muni sana kaha kṛpānidhānā| āyasu hoi jāum̐ bana ānā||
Meaning जानकीजीने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणोंमें सिर नवाया। तब कृपाकी खान श्रीरामजीने मुनिसे कहा--आज्ञा हो तो अब दूसरे वनमें जाऊँ॥ १॥
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू॥
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी॥
saṃtata mo para kṛpā karehū| sevaka jāni tajehu jani nehū||
dharma dhuraṃdhara prabhu kai bānī| suni saprema bole muni gyānī||
Meaning मुझपर निरन्तर कृपा करते रहियेगा और अपना सेवक जानकर स्त्रेह न छोड़ियेगा। धर्मधुरन्धर प्रभु श्रीरामजीके वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले--॥ २॥
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥
jāsu kṛpā aja siva sanakādī| cahata sakala paramāratha bādī||
te tumha rāma akāma piāre| dīna baṃdhu mṛdu bacana ucāre||
Meaning ब्रह्मा, शिव और सनकादि सभी परमार्थवादी (तत्त्ववेत्ता) जिनकी कृपा चाहते हैं, हे रामजी ! आप वही निष्काम पुरुषोंके भी प्रिय और दीनोंके बन्धु भगवान् हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोल रहे हैं॥ ३॥
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई॥
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई॥
aba jānī maiṃ śrī caturāī| bhajī tumhahi saba deva bihāī||
jehi samāna atisaya nahiṃ koī| tā kara sīla kasa na asa hoī||
Meaning अब मैंने लक्ष्मीजीकी चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओंको छोड़कर आपहीको भजा। जिसके समान [सब बातोंमें] अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों न होगा 2॥ ४॥
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥
kehi bidhi kahauṃ jāhu aba svāmī| kahahu nātha tumha aṃtarajāmī||
asa kahi prabhu biloki muni dhīrā| locana jala baha pulaka sarīrā||
Meaning मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी ! आप अब जाइये? हे नाथ! आप अन्तर्यमी हैं, आप ही कहिये। ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभुको देखने लगे। मुनिके नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका] जल बह रहा है और शरीर पुलकित है॥ ५॥
तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।
रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥
tana pulaka nirbhara prema purana nayana mukha paṃkaja die|
mana gyāna guna gotīta prabhu maiṃ dīkha japa tapa kā kie||
japa joga dharma samūha teṃ nara bhagati anupama pāvaī|
radhubīra carita punīta nisi dina dāsa tulasī gāvaī||
Meaning मुनि अत्यन्त प्रेमसे पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोिंको श्रीरामजीके मुखकमलमें लगाये हुए हैं। [ मनमें विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियोंसे परे प्रभुके दर्शन पाये। जप, योग और धर्म-समूहसे मनुष्य अनुपम भक्तिको पाता है। श्रीरघुवीरके पवित्र चरित्रको तुलसीदास रात-दिन गाता है।
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल॥ ६ ( क )॥
kalimala samana damana mana rāma sujasa sukhamūla|
sādara sunahi je tinha para rāma rahahiṃ anukūla|| 6 ( ka )||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश कलियुगके पापोंका नाश करनेवाला, मनको दमन करनेवाला और सुखका मूल है। जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उनपर श्रीरामजी प्रसन्न रहते हैं॥६ (क)॥
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥ ६ ( ख )॥
kaṭhina kāla mala kosa dharma na gyāna na joga japa|
parihari sakala bharosa rāmahi bhajahiṃ te catura nara|| 6 ( kha )||
Meaning यह कठिन कलिकाल पापोंका खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है। इसमें तो जो लोग सब भरोसोंको छोड़कर श्रीरामजीको ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं॥ ६ (ख)॥
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥
आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥
muni pada kamala nāi kari sīsā| cale banahi sura nara muni īsā||
āge rāma anuja puni pācheṃ| muni bara beṣa bane ati kācheṃ||
Meaning मुनिके चरणकमलोंमें सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियोंके स्वामी श्रीरामजी वनको चले। आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं। दोनों ही मुनियोंका सुन्दर वेष बनाये अत्यन्त सुशोभित हैं॥ १॥
उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥
सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा॥
umaya bīca śrī sohai kaisī| brahma jīva bica māyā jaisī||
saritā bana giri avaghaṭa ghāṭā| pati pahicānī dehiṃ bara bāṭā||
Meaning दोनोंके बीचमें श्रीजनकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्मा और जीवके बीच माया हो। नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, सभी अपने स्वामीको पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं॥ २॥
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया॥
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता॥
jaham̐ jaham̐ jāhi deva raghurāyā| karahiṃ medha taham̐ taham̐ nabha chāyā||
milā asura birādha maga jātā| āvatahīṃ raghuvīra nipātā||
Meaning जहाँ-जहाँ देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाशमें छाया करते जाते हैं। रास्तेमें जाते हुए विराध राक्षस मिला। सामने आते ही श्रीरघुनाथजीने उसे मार डाला॥ ३॥
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा॥
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥
turatahiṃ rucira rūpa tehiṃ pāvā| dekhi dukhī nija dhāma paṭhāvā||
puni āe jaham̐ muni sarabhaṃgā| suṃdara anuja jānakī saṃgā||
Meaning [ श्रीरामजीके हाथसे मरते ही] उसने तुरंत सुन्दर (दिव्य) रूप प्राप्त कर लिया। दुखी देखकर प्रभुने उसे अपने परम धामको भेज दिया। फिर वे सुन्दर छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीके साथ वहाँ आये जहाँ मुनि शरभंगजी थे॥ ४॥
देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥ ७॥
dekhī rāma mukha paṃkaja munibara locana bhṛṃga|
sādara pāna karata ati dhanya janma sarabhaṃga|| 7||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका मुखकमल देखकर मुनिश्रेष्ठके नेत्ररूपी भौरे अत्यन्त आदरपूर्वक उसका [ मकरन्दरस। पान कर रहे हैं। शरभंगजीका जन्म धन्य है॥ 9॥
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥
kaha muni sunu raghubīra kṛpālā| saṃkara mānasa rājamarālā||
jāta raheum̐ biraṃci ke dhāmā| suneum̐ śravana bana aihahiṃ rāmā||
Meaning मुनिने कहा--हे कृपालु रघुवीर! हे शंकरजीके मनरूपी मानसरोवरके राजहंस! सुनिये, मैं ब्रह्मलोकको जा रहा था। [इतनेमें] कानोंसे सुना कि श्रीरामजी वनमें आवेंगे॥ १॥
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती॥
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥
citavata paṃtha raheum̐ dina rātī| aba prabhu dekhi juṛānī chātī||
nātha sakala sādhana maiṃ hīnā| kīnhī kṛpā jāni jana dīnā||
Meaning तबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूँ। अब (आज) प्रभुको देखकर मेरी छाती शीतल हो गयी। हे नाथ! मैं सब साधनोंसे हीन हूँ। आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की है॥२॥
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥
so kachu deva na mohi nihorā| nija pana rākheu jana mana corā||
taba lagi rahahu dīna hita lāgī| jaba lagi milauṃ tumhahi tanu tyāgī||
Meaning हे देव ! यह कुछ मुझपर आपका एहसान नहीं है। हे भक्त-मनचोर ! ऐसा करके आपने अपने प्रणकी ही रक्षा की है। अब इस दीनके कल्याणके लिये तबतक यहाँ ठहरिये, जबतक मैं शरीर छोड़कर आपसे [आपके धाममें न] मिलूँ॥ ३॥