भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥
नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥
bhaṭa kaṭata tana sata khaṃḍa| puni uṭhata kari pāṣaṃḍa||
nabha uṛata bahu bhuja muṃḍa| binu mauli dhāvata ruṃḍa||
Meaning योद्धाओंके शरीर कटकर सैकड़ों ट्कड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। आकाशमें बहुत-सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिरके धड़ दौड़ रहे हैं॥६१॥
खग कंक काक सृगाल।
कटकटहिं कठिन कराल॥
khaga kaṃka kāka sṛgāla| kaṭakaṭahiṃ kaṭhina karāla||
Meaning चील [या क्रौंच], कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयड्टर कट-कट शब्द कर रहे हैं॥ ७॥
कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥
kaṭakaṭahiṃ zaṃbuka bhūta preta pisāca kharpara saṃcahīṃ|
betāla bīra kapāla tāla bajāi jogini naṃcahīṃ||
raghubīra bāna pracaṃḍa khaṃḍahiṃ bhaṭanha ke ura bhuja sirā|
jaham̐ taham̐ parahiṃ uṭhi larahiṃ dhara dharu dharu karahiṃ bhayakara girā||
Meaning सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं [ अथवा खप्पर भर रहे हैं ]। वीर-वैताल खोपड़ियोंपर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाण योद्धाओंके वक्ष:स्थल, भुजा और सिरोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। उनके धड़ जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं। फिर उठते और लड़ते हैं और *पकड़ो-पकड़ो' का भयड्भर शब्द करते हैं॥ १॥
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥ २॥
aṃtāvarīṃ gahi uṛata gīdha pisāca kara gahi dhāvahīṃ|
saṃgrāma pura bāsī manahum̐ bahu bāla guṛī uṛāvahīṃ||
māre pachāre ura bidāre bipula bhaṭa kaham̐rata pare|
avaloki nija dala bikala bhaṭa tisirādi khara dūṣana phire|| 2||
Meaning अँतड़ियोंके एक छोरको पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हींका दूसरा छोर हाथसे पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगरके निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये। बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेनाको व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजीकी ओर मुड़े॥ २॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥ ३॥
sara sakti tomara parasu sūla kṛpāna ekahi bārahīṃ|
kari kopa śrīraghubīra para aganita nisācara ḍārahīṃ||
prabhu nimiṣa mahum̐ ripu sara nivāri pacāri ḍāre sāyakā|
dasa dasa bisikha ura mājha māre sakala nisicara nāyakā|| 3||
Meaning अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बारमें श्रीरघुवीरपर छोड़ने लगे। प्रभुने पलभरमें शत्रुओंके बाणोंको काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े। सब राक्षस-सेनापतियोंके हृदयमें दस-दस बाण मारे॥ ३॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो॥ ४॥
mahi parata uṭhi bhaṭa bhirata marata na karata māyā ati ghanī|
sura ḍarata caudaha sahasa preta biloki eka avadha dhanī||
sura muni sabhaya prabhu dekhi māyānātha ati kautuka kar yo|
dekhahi parasapara rāma kari saṃgrāma ripudala lari mar yo|| 4||
Meaning योद्धा पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकारकी अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [राक्षस] चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियोंको भयभीत देखकर मायाके स्वामी प्रभुने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओंकी सेना एक-दूसरेको रामरूप देखने लगी और आपसमें ही युद्ध करके लड़ मरी॥ ४॥
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।
करि उपाय रिपु मारे छन महूँ कृपानिधान॥ २० (क )॥
rāma rāma kahi tanu tajahiṃ pāvahiṃ pada nirbāna|
kari upāya ripu māre chana mahūm̐ kṛpānidhāna|| 20 (ka )||
Meaning सब [' यही राम है, इसे मारो' इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्रीरामजीने यह उपाय करके क्षणभरमें शत्रुओंको मार डाला॥ २० (कक)॥
हरघित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।
अस्तुतिकरि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥ २० ( ख )॥
haraghita baraṣahiṃ sumana sura bājahiṃ gagana nisāna|
astutikari kari saba cale sobhita bibidha bimāna|| 20 ( kha )||
Meaning देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। फिर वे सब स्तुति कर- करके अनेकों विमानोंपर सुशोभित हुए चले गये॥ २० (ख)॥
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥
jaba raghunātha samara ripu jīte| sura nara muni saba ke bhaya bīte||
taba lachimana sītahi lai āe| prabhu pada parata haraṣi ura lāe||
Meaning जब श्रीरघुनाथजीने युद्धमें शत्रु ओंको जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सबके भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मणजी सीताजीको ले आये। चरणोंमें पड़ते हुए उनको प्रभुने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदयसे लगा लिया॥ १॥
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥
sītā citava syāma mṛdu gātā| parama prema locana na aghātā||
paṃcavaṭīṃ basi śrīraghunāyaka| karata carita sura muni sukhadāyaka||
Meaning सीताजी श्रीरामजीके श्याम और कोमल शरीरको परम प्रेमके साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पश्चवटीमें बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियोंको सुख देनेवाले चरित्र करने लगे॥ २॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥
बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥
dhuām̐ dekhi kharadūṣana kerā| jāi supanakhām̐ rāvana prerā||
boli bacana krodha kari bhārī| desa kosa kai surati bisārī||
Meaning खर-दूषणका विध्वंस देखकर शुर्पणखाने जाकर रावणको भड़काया। वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली--तूने देश और खजानेकी सुधि ही भुला दी॥ ३॥
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ॥
संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥
karasi pāna sovasi dinu rātī| sudhi nahiṃ tava sira para ārātī||
rāja nīti binu dhana binu dharmā| harihi samarpe binu satakarmā||
bidyā binu bibeka upajāem̐| śrama phala paṛhe kiem̐ aru pāem̐||
saṃga te jatī kumaṃtra te rājā| māna te gyāna pāna teṃ lājā||
Meaning शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है ? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है। विषयोंके सड़्से संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा,॥ ४-५॥
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी।
नासहि बेगि नीति अस सुनी॥
prīti pranaya binu mada te gunī| nāsahi begi nīti asa sunī||
Meaning नम्रताके बिना (नम्रता न होनेसे ) प्रीति और मद (अहड्ार) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है॥ ६॥
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥ २१ ( क )॥
ripu ruja pāvaka pāpa prabhu ahi gania na choṭa kari|
asa kahi bibidha bilāpa kari lāgī rodana karana|| 21 ( ka )||
Meaning शत्रु रोग, अग्रि, पाप, स्वामी और सर्पको छोटा करके नहीं समझना चाहिये। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकारसे विलाप करके रोने लगी॥ २१ (क)॥
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥ २१ (ख )॥
sabhā mājha pari byākula bahu prakāra kaha roi|
tohi jiata dasakaṃdhara mori ki asi gati hoi|| 21 (kha )||
Meaning [ रावणकी ] सभाके बीच वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकारसे रो-रोकर कह रही है कि अरे दशग्रीव! तेरे जीते-जी मेरी क्या ऐसी दशा होनी चाहिये ?॥ २५ (ख)॥
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई॥
कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता॥
sunata sabhāsada uṭhe akulāī| samujhāī gahi bāham̐ uṭhāī||
kaha laṃkesa kahasi nija bātā| keṃim̐ tava nāsā kāna nipātā||
Meaning शूर्पणखाके वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। उन्होंने शूर्पणखाकी बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया। लड्रापति रावणने कहा--अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिये ?॥ १॥
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥
avadha nṛpati dasaratha ke jāe| puruṣa siṃgha bana khelana āe||
samujhi parī mohi unha kai karanī| rahita nisācara karihahiṃ dharanī||
Meaning [वह बोली--] अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र, जो पुरुषोंमें सिंहके समान हैं, वनमें शिकार खेलने आये हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर देंगे॥ २॥
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥
jinha kara bhujabala pāi dasānana| abhaya bhae bicarata muni kānana||
dekhata bālaka kāla samānā| parama dhīra dhanvī guna nānā||
Meaning जिनकी भुजाओंका बल पाकर हे दशमुख! मुनिलोग वनमें निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखनेमें तो बालक हैं, पर हैं कालके समान। वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणोंसे युक्त हैं॥३॥
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता।
खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥
atulita bala pratāpa dvau bhrātā| khala badha rata sura muni sukhadātā||
सोभाधाम राम अस नामा।
तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥
sobhādhāma rāma asa nāmā| tinha ke saṃga nāri eka syāmā||
Meaning दोनों भाइयोंका बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टोंके वध करनेमें लगे हैं और देवता तथा मुनियोंको सुख देनेवाले हैं। वे शोभाके धाम हैं, ' राम' ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है॥ ४॥
रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥
rupa rāsi bidhi nāri sam̐vārī| rati sata koṭi tāsu balihārī||
tāsu anuja kāṭe śruti nāsā| suni tava bhagini karahiṃ parihāsā||
Meaning विधाताने उस स्त्रीको ऐसी रूपकी राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेवकी स्त्री ) उसपर निछावर हैं। उन्हींके छोटे भाईने मेरे नाक-कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे॥ ५॥
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥
khara dūṣana suni lage pukārā| chana mahum̐ sakala kaṭaka unha mārā||
khara dūṣana tisirā kara ghātā| suni dasasīsa jare saba gātā||
Meaning मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभरमें सारी सेनाको मार डाला। खर-दूषण और त्रिशिराका वध सुनकर रावणके सारे अज् जल उठे॥ ६॥
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥ २२॥
supanakhahi samujhāi kari bala bolesi bahu bhām̐ti|
gayau bhavana ati socabasa nīda parai nahiṃ rāti|| 22||
Meaning उसने शुर्पणखाको समझाकर बहुत प्रकारसे अपने बलका बखान किया, किन्तु [मनमें] वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने महलमें गया, उसे रातभर नींद नहीं पड़ी॥ २२॥
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥
sura nara asura nāga khaga māhīṃ| more anucara kaham̐ kou nāhīṃ||
khara dūṣana mohi sama balavaṃtā| tinhahi ko mārai binu bhagavaṃtā||
Meaning [वह मन-ही-मन विचार करने लगा--] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियोंमें कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवकको भी पा सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान् थे। उन्हें भगवान्के सिवा और कौन मार सकता है?॥ १॥
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥
sura raṃjana bhaṃjana mahi bhārā| jauṃ bhagavaṃta līnha avatārā||
tau mai jāi bairu haṭhi karaūm̐| prabhu sara prāna tajeṃ bhava taraūm̐||
Meaning देवताओंको आनन्द देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभुके बाण [के आघात] से प्राण छोड़कर भवसागरसे तर जाऊँगा॥ २॥
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥
जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥
hoihi bhajanu na tāmasa dehā| mana krama bacana maṃtra dṛṛha ehā||
jauṃ nararupa bhūpasuta koū| harihaum̐ nāri jīti rana doū||
Meaning इस तामस शरीरसे भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्मसे यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनोंको रणमें जीतकर उनकी स्त्रीको हर लूँगा॥ ३॥
चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ॥
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई॥
calā akela jāna caḍhi tahavām̐| basa mārīca siṃdhu taṭa jahavām̐||
ihām̐ rāma jasi juguti banāī| sunahu umā so kathā suhāī||
Meaning [यों विचारकर] रावण रथपर चढ़कर अकेला ही वहाँ चला, जहाँ समुद्रके तटपर मारीच रहता था। [शिवजी कहते हैं कि--] हे पार्वती ! यहाँ श्रीरामचन्द्रजीने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो॥ ४॥
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥ २३॥
lachimana gae banahiṃ jaba lena mūla phala kaṃda|
janakasutā sana bole bihasi kṛpā sukha bṛṃda|| 23||
Meaning लक्ष्मणजी जब कन्द-मूल-फल लेनेके लिये वनमें गये, तब [ अकेलेमें] कृपा और सुखके समूह श्रीरामचन्द्रजी हँसकर जानकीजीसे बोले--॥ २३॥
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥
sunahu priyā brata rucira susīlā| maiṃ kachu karabi lalita naralīlā||
tumha pāvaka mahum̐ karahu nivāsā| jau lagi karauṃ nisācara nāsā||
Meaning हे प्रिये! हे सुन्दर पातिव्रत-धर्मका पालन करनेवाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसोंका नाश करूँ, तबतक तुम अग्रिमें निवास करो॥ १॥
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता॥
jabahiṃ rāma saba kahā bakhānī| prabhu pada dhari hiyam̐ anala samānī||
nija pratibiṃba rākhi taham̐ sītā| taisai sīla rupa subinītā||
Meaning श्रीरामजीने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभुके चरणोंको हृदयमें धरकर आग्निमें समा गयीं। सीताजीने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी॥ २॥
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥
lachimanahūm̐ yaha maramu na jānā| jo kachu carita racā bhagavānā||
dasamukha gayau jahām̐ mārīcā| nāi mātha svāratha rata nīcā||
Meaning भगवान्ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्यको लक्ष्मणजीने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया॥ ३॥
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥
navani nīca kai ati dukhadāī| jimi aṃkusa dhanu uraga bilāī||
bhayadāyaka khala kai priya bānī| jimi akāla ke kusuma bhavānī||
Meaning नीचका झुकना (नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अड्श, धनुष, साँप और बिल््लीका झुकना। हे भवानी! दुष््की मीठी वाणी भी [उसी प्रकार] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल!॥ ४॥
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥ २४॥
kari pūjā mārīca taba sādara pūchī bāta|
kavana hetu mana byagra ati akasara āyahu tāta|| 24||
Meaning तब मारीचने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी-हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं ?॥ २४॥
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी॥
dasamukha sakala kathā tehi āgeṃ| kahī sahita abhimāna abhāgeṃ||
hohu kapaṭa mṛga tumha chalakārī| jehi bidhi hari ānau nṛpanārī||
Meaning भाग्यहीन रावणने सारी कथा अभिमानसहित उसके सामने कही [ और फिर कहा--] तुम छल करनेवाले कपट-मृग बनो, जिस उपायसे मैं उस राजवधूको हर लाऊँ॥ १॥
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा॥
तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥
tehiṃ puni kahā sunahu dasasīsā| te nararupa carācara īsā||
tāsoṃ tāta bayaru nahiṃ kīje| māreṃ maria jiāem̐ jījai||
Meaning तब उसने ( मारीचने ) कहा--हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूपमें चराचरके ईश्वर हैं। हे तात! उनसे वैर न कीजिये। उन्हींके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना होता है (सबका जीवन- मरण उन्हींके अधीन है)॥ २॥
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं॥
muni makha rākhana gayau kumārā| binu phara sara raghupati mohi mārā||
sata jojana āyaum̐ chana māhīṃ| tinha sana bayaru kiem̐ bhala nāhīṃ||
Meaning यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजीने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभरमें सौ योजनपर आ गिरा। उनसे वैर करनेमें भलाई नहीं है॥ ३॥
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥
bhai mama kīṭa bhṛṃga kī nāī| jaham̐ taham̐ maiṃ dekhaum̐ dou bhāī||
jauṃ nara tāta tadapi ati sūrā| tinhahi birodhi na āihi pūrā||
Meaning मेरी दशा तो भृड्नीके कीड़ेकी-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको ही देखता हूँ। और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करनेमें पूरा न पड़ेगा (सफलता नहीं मिलेगी)॥ ४॥
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥ २५॥
jehiṃ tāṛakā subāhu hati khaṃḍeu hara kodaṃḍa|
khara dūṣana tisirā badheu manuja ki asa baribaṃḍa|| 25||
Meaning जिसने ताड़का और सुबाहुको मारकर शिवजीका धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिराका वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है ?॥ २५॥
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा॥
jāhu bhavana kula kusala bicārī| sunata jarā dīnhisi bahu gārī||
guru jimi mūṛha karasi mama bodhā| kahu jaga mohi samāna ko jodhā||
Meaning अतः: अपने कुलकी कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं (दुर्वचन कहे)। [कहा--] अरे मूर्ख! तू गुरुकी तरह मुझे ज्ञान सिखाता है ? बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा कौन है 2॥ १॥
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥
taba mārīca hṛdayam̐ anumānā| navahi birodheṃ nahiṃ kalyānā||
sastrī marmī prabhu saṭha dhanī| baida baṃdi kabi bhānasa gunī||
Meaning तब मारीचने हृदयमें अनुमान किया कि शस्त्री (शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जाननेवाला ), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवानु, वैद्य, भाय कवि और रसोइया--इन नौ व्यक्तियोंसे विरोध (वैर) करनेमें कल्याण (कुशल) नहीं होता॥ २॥
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥
ubhaya bhām̐ti dekhā nija maranā| taba tākisi raghunāyaka saranā||
utaru deta mohi badhaba abhāgeṃ| kasa na marauṃ raghupati sara lāgeṃ||
Meaning जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा)। [ सोचा कि] उत्तर देते ही (नाहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ?॥ ३॥
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥
asa jiyam̐ jāni dasānana saṃgā| calā rāma pada prema abhaṃgā||
mana ati haraṣa janāva na tehī| āju dekhihaum̐ parama sanehī||
Meaning हृदयमें ऐसा समझकर वह रावणके साथ चला। श्रीरामजीके चरणोंमें उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मनमें इस बातका अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्रेही श्रीरामजीको देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावणको नहीं जनाया॥ ४॥
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥
निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥
nija parama prītama dekhi locana suphala kari sukha pāihauṃ|
śrī sahita anuja sameta kṛpāniketa pada mana lāihauṃ||
nirbāna dāyaka krodha jā kara bhagati abasahi basakarī|
nija pāni sara saṃdhāni so mohi badhihi sukhasāgara harī||
Meaning [वह मन-ही-मन सोचने लगा] अपने परम प्रियतमको देखकर नेत्रोंको सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजीसहित और छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत कृपानिधान श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसीके वशमें न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्) को भी वशमें करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्दके समुद्र श्रीहरि अपने हाथोंसे बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!
मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥ २६॥
mama pācheṃ dhara dhāvata dhareṃ sarāsana bāna|
phiri phiri prabhuhi bilokihaum̐ dhanya na mo sama āna|| 26||
Meaning धनुष-बाण धारण किये मेरे पीछे-पीछे पृथ्वीपर ( पकड़नेके लिये) दौड़ते हुए प्रभुको मैं फिर- फिरकर देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है॥ २६॥
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥
tehi bana nikaṭa dasānana gayaū| taba mārīca kapaṭamṛga bhayaū||
ati bicitra kachu barani na jāī| kanaka deha mani racita banāī||
Meaning जब रावण उस वनके (जिस वनमें श्रीरघुनाथजी रहते थे) निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता। सोनेका शरीर मणियोंसे जड़कर बनाया था॥ १॥
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥
sītā parama rucira mṛga dekhā| aṃga aṃga sumanohara beṣā||
sunahu deva raghubīra kṛpālā| ehi mṛga kara ati suṃdara chālā||
Meaning सीताजीने उस परम सुन्दर हिरनको देखा, जिसके अड्-अज्की छटा अत्यन्त मनोहर थी। [वे कहने लगीं-] हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये। इस मृगकी छाल बहुत ही सुन्दर है॥ २॥
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥
satyasaṃdha prabhu badhi kari ehī| ānahu carma kahati baidehī||
taba raghupati jānata saba kārana| uṭhe haraṣi sura kāju sam̐vārana||
Meaning जानकीजीने कहा--हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो ! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी [ मारीचके कपटमृग बननेका] सब कारण जानते हुए भी, देवताओंका कार्य बनानेके लिये हर्षित होकर उठे॥ ३॥
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥
mṛga biloki kaṭi parikara bām̐dhā| karatala cāpa rucira sara sām̐dhā||
prabhu lachimanihi kahā samujhāī| phirata bipina nisicara bahu bhāī||
Meaning हिरनको देखकर श्रीरामजीने कमरमें फेंटा बाँधा और हाथमें धनुष लेकर उसपर सुन्दर (दिव्य ) बाण चढ़ाया। फिर प्रभुने लक्ष्मणजीको समझाकर कहा--हे भाई! वनमें बहुत-से राक्षस फिरते हैं॥ ४॥
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी॥
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी॥
sītā keri karehu rakhavārī| budhi bibeka bala samaya bicārī||
prabhuhi biloki calā mṛga bhājī| dhāe rāmu sarāsana sājī||
Meaning तुम बुद्धि और विवेकके द्वारा बल और समयका विचार करके सीताकी रखवाली करना। प्रभुको देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े॥ ५॥
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥
nigama neti siva dhyāna na pāvā| māyāmṛga pācheṃ so dhāvā||
kabahum̐ nikaṭa puni dūri parāī| kabahum̐ka pragaṭai kabahum̐ chapāī||
Meaning वेद जिनके विषयमें ' नेति-नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है॥ ६॥
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥
pragaṭata durata karata chala bhūrī| ehi bidhi prabhuhi gayau lai dūrī||
taba taki rāma kaṭhina sara mārā| dharani pareu kari ghora pukārā||
Meaning इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभुको दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने तककर (निशाना साधकर) कठोर बाण मारा, [जिसके लगते ही] वह घोर शब्द करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ७॥
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥
lachimana kara prathamahiṃ lai nāmā| pācheṃ sumiresi mana mahum̐ rāmā||
prāna tajata pragaṭesi nija dehā| sumiresi rāmu sameta sanehā||
Meaning पहले लक्ष्मणजीका नाम लेकर उसने पीछे मनमें श्रीरामजीका स्मरण किया। प्राण त्याग करते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजीका स्मरण किया॥ ८॥
अंतर प्रेम तासु पहिचाना।
मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥ ९॥
aṃtara prema tāsu pahicānā| muni durlabha gati dīnhi sujānā|| 9||
Meaning सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामजीने उसके हृदयके प्रेमको पहचानकर उसे वह गति (अपना परमपद) दी जो मुनियोंको भी दुर्लभ है॥ ९॥
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥ २७॥
bipula sumana sura baraṣahiṃ gāvahiṃ prabhu guna gātha|
nija pada dīnha asura kahum̐ dīnabaṃdhu raghunātha|| 27||
Meaning देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभुके गुणोंकी गाथाएँ (स्तुतियाँ) गा रहे हैं [कि] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुरको भी अपना परम पद दे दिया॥ २७॥
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥
आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥
khala badhi turata phire raghubīrā| soha cāpa kara kaṭi tūnīrā||
ārata girā sunī jaba sītā| kaha lachimana sana parama sabhītā||
Meaning दुष्ट मारीचको मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथमें धनुष और कमरमें तरकस शोभा दे रहा है। इधर जब सीताजीने दुःखभरी वाणी (मरते समय मारीचकी 'हा लक्ष्मण' की आवाज) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक््मणजीसे कहने लगीं--॥ १॥
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥
jāhu begi saṃkaṭa ati bhrātā| lachimana bihasi kahā sunu mātā||
bhṛkuṭi bilāsa sṛṣṭi laya hoī| sapanehum̐ saṃkaṭa parai ki soī||
Meaning तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकटमें हैं। लक्ष्मणजीने हँसकर कहा--हे माता! सुनो, जिनके भ्रुकुटिविलास ( भौंके इशारे) मात्रसे सारी सृष्टिका लय (प्रलय) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्रमें भी संकटमें पड़ सकते हैं 2॥ २॥
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥
marama bacana jaba sītā bolā| hari prerita lachimana mana ḍolā||
bana disi deva sauṃpi saba kāhū| cale jahām̐ rāvana sasi rāhū||
Meaning इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन ( हृदयमें चुभनेवाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान्की प्रेरणासे लक्ष्मणजीका मन भी चज्नल हो उठा। वे श्रीसीताजीको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमाके लिये राहुरूप श्रीरामजी थे॥ ३॥
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥
sūna bīca dasakaṃdhara dekhā| āvā nikaṭa jatī keṃ beṣā||
jākeṃ ḍara sura asura ḍerāhīṃ| nisi na nīda dina anna na khāhīṃ||
Meaning रावण सूना मौका देखकर यति (संन्यासी) के वेषभमें श्रीसीताजीके समीप आया। जिसके डरसे देवता और दैत्यतक इतना डरते हैं कि रातको नींद नहीं आती और दिनमें [ भरपेट] अन्न नहीं खाते--॥ ४॥
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा॥
so dasasīsa svāna kī nāī| ita uta citai calā bhaṛihāī||
imi kupaṃtha paga deta khagesā| raha na teja budhi bala lesā||
Meaning वही दस सिरवाला रावण कुत्तेकी तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई* (चोरी) के लिये चला। [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी! इस प्रकार कुमार्गपर पैर रखते ही शरीरमें तेज तथा बुद्धि एवं बलका लेश भी नहीं रह जाता॥ ५॥ * सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाड़ोंमें मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है उसे, ' भड़िहाई' कहते हैं।
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई॥
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं॥
nānā bidhi kari kathā suhāī| rājanīti bhaya prīti dekhāī||
kaha sītā sunu jatī gosāīṃ| bolehu bacana duṣṭa kī nāīṃ||
Meaning रावणने अनेकों प्रकारकी सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजीको राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजीने कहा--हे यति गोसाई! सुनो, तुमने तो दुष्टकी तरह वचन कहे॥ ६॥
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा॥
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा॥
taba rāvana nija rūpa dekhāvā| bhaī sabhaya jaba nāma sunāvā||
kaha sītā dhari dhīraju gāṛhā| āi gayau prabhu rahu khala ṭhāṛhā||
Meaning तब रावणने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा-* अरे दुष्ट! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये'॥ ७॥
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा॥
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना॥
jimi haribadhuhi chudra sasa cāhā| bhaesi kālabasa nisicara nāhā||
sunata bacana dasasīsa risānā| mana mahum̐ carana baṃdi sukha mānā||
Meaning जैसे सिंहकी स्त्रीको तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज! तू [ मेरी चाह करके] कालके वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावणको क्रोध आ गया, परन्तु मनमें उसने सीताजीके चरणोंकी वन्दना करके सुख माना॥ ८॥
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥ २८॥
krodhavaṃta taba rāvana līnhisi ratha baiṭhāi|
calā gaganapatha ātura bhayam̐ ratha hām̐ki na jāi|| 28||
Meaning फिर क्रोधमें भरकर रावणने सीताजीको रथपर बैठा लिया और वह बड़ी उतावलीके साथ आकाशमार्गसे चला; किन्तु डरके मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था॥ २८॥
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया॥
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक॥
hā jaga eka bīra raghurāyā| kehiṃ aparādha bisārehu dāyā||
ārati harana sarana sukhadāyaka| hā raghukula saroja dinanāyaka||
Meaning [ सीताजी विलाप कर रही थीं--] हा जगत्के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी ! आपने किस अपराधसे मुझपर दया भुला दी। हे दु:खोंके हरनेवाले, हे शरणागतको सुख देनेवाले, हा रघुकुलरूपी कमलके सूर्य!॥ १॥
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥
hā lachimana tumhāra nahiṃ dosā| so phalu pāyaum̐ kīnheum̐ rosā||
bibidha bilāpa karati baidehī| bhūri kṛpā prabhu dūri sanehī||
Meaning हा लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजनकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं--[हाय!] प्रभुकी कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्त्रेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं॥ २॥
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥
bipati mori ko prabhuhi sunāvā| puroḍāsa caha rāsabha khāvā||
sītā kai bilāpa suni bhārī| bhae carācara jīva dukhārī||
Meaning प्रभुको मेरी यह विपत्ति कौन सुनावे ? यज्ञके अन्नको गदहा खाना चाहता है। सीताजीका भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सभी जीव दुखी हो गये॥ ३॥
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥
अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥
gīdharāja suni ārata bānī| raghukulatilaka nāri pahicānī||
adhama nisācara līnhe jāī| jimi malecha basa kapilā gāī||
Meaning गृध्नराज जटायुने सीताजीकी दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी हैं। [उसने देखा कि] नीच राक्षस इनको [बुरी तरह] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छके पाले पड़ गयी हो॥ ४॥
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे॥
sīte putri karasi jani trāsā| karihaum̐ jātudhāna kara nāsā||
dhāvā krodhavaṃta khaga kaiseṃ| chūṭai pabi parabata kahum̐ jaise||
Meaning [वह बोला--] हे सीते पुत्री! भय मत कर। मैं इस राक्षसका नाश करूँगा। [यह कहकर] वह पक्षी क्रोधमें भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वतकी ओर वत्र छूटता हो॥५॥
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही॥
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना॥
re re duṣṭa ṭhāṛha kina hohī| nirbhaya calesi na jānehi mohī||
āvata dekhi kṛtāṃta samānā| phiri dasakaṃdhara kara anumānā||
Meaning [उसने ललकारकर कहा-- रे रे दुष्ट! खड़ा क्यों नहीं होता ? निडर होकर चल दिया! मुझे तूने नहीं जाना ? उसको यमराजके समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मनमें अनुमान करने लगा--॥६॥
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई॥
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा॥
kī maināka ki khagapati hoī| mama bala jāna sahita pati soī||
jānā jaraṭha jaṭāyū ehā| mama kara tīratha chām̐ṛihi dehā||
Meaning यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियोंका स्वामी गरुड़। पर वह (गरुड़) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बलको जानता है! [ कुछ पास आनेपर] रावणने उसे पहचान लिया [और बोला--] यह तो बूढ़ा जटायु है! यह मेरे हाथरूपी तीर्थमें शरीर छोड़ेगा॥ ७॥
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा॥
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥
sunata gīdha krodhātura dhāvā| kaha sunu rāvana mora sikhāvā||
taji jānakihi kusala gṛha jāhū| nāhiṃ ta asa hoihi bahubāhū||
Meaning यह सुनते ही गीध क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला--रावण! मेरी सिखावन सुन। जानकीजीको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले ! ऐसा होगा कि-॥८॥
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा॥
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा॥
rāma roṣa pāvaka ati ghorā| hoihi sakala salabha kula torā||
utaru na deta dasānana jodhā| tabahiṃ gīdha dhāvā kari krodhā||
Meaning श्रीरामजीके क्रोधरूपी अत्यन्त भयानक अग़्िमें तेरा सारा वंश पतिंगा [होकर भस्म] हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा॥ ९॥
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥
dhari kaca biratha kīnha mahi girā| sītahi rākhi gīdha puni phirā||
caucanha māri bidāresi dehī| daṃḍa eka bhai muruchā tehī||
Meaning उसने [रावणके] बाल पकड़कर उसे रथके नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वीपर गिर पड़ा। गीध सीताजीको एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचोंसे मार-मारकर रावणके शरीरको विदीर्ण कर डाला। इससे उसे एक घड़ीके लिये मूर्च्छां हो गयी॥ १०॥
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना॥
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी॥
taba sakrodha nisicara khisiānā| kāṛhesi parama karāla kṛpānā||
kāṭesi paṃkha parā khaga dharanī| sumiri rāma kari adabhuta karanī||
Meaning तब खिसियाये हुए रावणने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायुके पंख काट डाले। पक्षी (जटायु) श्रीरामजीकी अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ११॥
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी॥
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता॥
sītahi jāni caṛhāi bahorī| calā utāila trāsa na thorī||
karati bilāpa jāti nabha sītā| byādha bibasa janu mṛgī sabhītā||
Meaning सीताजीको फिर रथपर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावलीके साथ चला, उसे भय कम न था। सीताजी आकाशमें विलाप करती हुई जा रही हैं। मानो व्याधके वशमें पड़ी हुई (जालमें फँसी हुई) कोई भयभीत हिरनी हो!॥ १२॥
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी॥
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ॥
giri para baiṭhe kapinha nihārī| kahi hari nāma dīnha paṭa ḍārī||
ehi bidhi sītahi so lai gayaū| bana asoka maham̐ rākhata bhayaū||
Meaning पर्वतपर बैठे हुए बंदरोंको देखकर सीताजीने हरिनाम लेकर वस्त्र डाल दिया। इस प्रकार वह सीताजीको ले गया और उन्हें अशोकवनमें जा रखा॥ १३॥
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ॥ २९ (क )॥
hāri parā khala bahu bidhi bhaya aru prīti dekhāi|
taba asoka pādapa tara rākhisi jatana karāi|| 29 (ka )||
Meaning सीताजीको बहुत प्रकारसे भय और प्रीति दिखिलाकर जब वह दुष्ट हार गया, तब उन्हें यत्र कराके (सब व्यवस्था ठीक कराके) अशोक-वृक्षके नीचे रख दिया॥ २९ (क)॥
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।
jehi bidhi kapaṭa kuraṃga sam̐ga dhāi cale śrīrāma|
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥ २९ ( ख )॥
so chabi sītā rākhi ura raṭati rahati harināma|| 29 ( kha )||
Meaning जिस प्रकार कपटमृगके साथ श्रीरामजी दौड़ चले थे, उसी छविको हृदयमें रखकर वे हरिनाम (रामनाम) रटती रहती हैं॥ २९ (ख)॥
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥
raghupati anujahi āvata dekhī| bāhija ciṃtā kīnhi biseṣī||
janakasutā pariharihu akelī| āyahu tāta bacana mama pelī||
Meaning [इधर] श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको आते देखकर बाह्रूपमें बहुत चिन्ता की [और कहा-] हे भाई! तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञाका उल्लड्भन कर यहाँ चले आये!॥ १॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥
nisicara nikara phirahiṃ bana māhīṃ| mama mana sītā āśrama nāhīṃ||
gahi pada kamala anuja kara jorī| kaheu nātha kachu mohi na khorī||
Meaning राक्षसोंके झुंड वनमें फिरते रहते हैं। मेरे मनमें ऐसा आता है कि सीता आश्रममें नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजीने श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़कर हाथ जोड़कर कहा--हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥ २॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥
anuja sameta gae prabhu tahavām̐| godāvari taṭa āśrama jahavām̐||
āśrama dekhi jānakī hīnā| bhae bikala jasa prākṛta dīnā||
Meaning लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था। आश्रमको जानकीजीसे रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यकी भाँति व्याकुल और दीन (दुखी ) हो गये॥ ३॥
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती॥
hā guna khāni jānakī sītā| rūpa sīla brata nema punītā||
lachimana samujhāe bahu bhām̐tī| pūchata cale latā taru pām̐tī||
Meaning [ वे विलाप करने लगे--] हा गुणोंकी खान जानकी ! हा रूप, शील, व्रत और नियमोंमें पवित्र सीते ! लक्ष्मणजीने बहुत प्रकारसे समझाया। तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षोंकी पंक्तियोंसे पूछते हुए चले॥ ४॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥
he khaga mṛga he madhukara śrenī| tumha dekhī sītā mṛganainī||
khaṃjana suka kapota mṛga mīnā| madhupa nikara kokilā prabīnā||
Meaning हे पक्षियो ! हे पशुओ! हे भौंरोंकी पंक्तियो ! तुमने कहीं मृगनयनी सीताको देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरोंका समूह, प्रवीण कोयल,॥ ५॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥
kuṃda kalī dāṛima dāminī| kamala sarada sasi ahibhāminī||
baruna pāsa manoja dhanu haṃsā| gaja kehari nija sunata prasaṃsā||
Meaning कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद्का चन्द्रमा और नागिनी, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, गज और सिंह--ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं॥ ६॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥
śrīphala kanaka kadali haraṣāhīṃ| neku na saṃka sakuca mana māhīṃ||
sunu jānakī tohi binu ājū| haraṣe sakala pāi janu rājū||
Meaning बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मनमें जरा भी शड्गा और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्होरे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों। (अर्थात् तुम्हारे अंगोंकि सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्नित थे। आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभाके अभिमानमें फूल रहे हैं )॥७॥
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी॥
kimi sahi jāta anakha tohi pāhīṃ| priyā begi pragaṭasi kasa nāhīṃ||
ehi bidhi khaujata bilapata svāmī| manahum̐ mahā birahī ati kāmī||
Meaning तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है ? हे प्रिये ! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती ? इस प्रकार [ अनन्त ब्रह्माण्डोंके अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीके ] स्वामी श्रीरामजी सीताजीको खोजते हुए [इस प्रकार] विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो॥ ८॥
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी॥
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥
pūranakāma rāma sukha rāsī| manuja carita kara aja abināsī||
āge parā gīdhapati dekhā| sumirata rāma carana jinha rekhā||
Meaning पूर्णकाम, आनन्दकी राशि, अजनमा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्योंके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे [जानेपर] उन्होंने गृध्रपति जटायुको पड़ा देखा। वह श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण कर रहा था, जिनमें [ ध्वजा-कुलिश आदिकी] रेखाएँ (चिह्न) हैं॥ ९॥
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥ ३०॥
kara saroja sira paraseu kṛpāsiṃdhu radhubīra|
nirakhi rāma chabi dhāma mukha bigata bhaī saba pīra|| 30||
Meaning कृपासागर श्रीरघुवीरने अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया (उसके सिरपर कर-कमल फेर दिया)। शोभाधाम श्रीरामजीका [ परम सुन्दर] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही॥ ३०॥