सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत् तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्॥
अर्थ सिन्दूर के समान अरुण (लाल) विग्रह वाली, तीन नेत्रों वाली, माणिक्य मुकुट पर चन्द्रमा को धारण करने वाली, मुस्कान से युक्त मुखवाली, पूर्ण उन्नत वक्षस्थल वाली, हाथों में मधु से भरा रत्न पात्र और लाल कमल धारण करने वाली, सौम्य (शान्त), रत्न जड़ित पादुकाओं पर रक्त वर्ण चरणों वाली — ऐसी परम अम्बिका (माँ) का ध्यान करना चाहिए।
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम्॥
अर्थ अरुण (लाल) वर्ण वाली, करुणा से तरंगित नेत्रों वाली, पाश, अंकुश, पुष्प बाण और धनुष धारण करने वाली, अणिमा आदि (अष्ट) सिद्धियों से घिरी हुई, प्रकाश किरणों से युक्त — ऐसी भवानी का मैं 'अहम्' (मैं ही वह हूँ) इस भाव से ध्यान करता हूँ।
ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम्।
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम्॥
अर्थ पद्मासन पर विराजमान, प्रफुल्लित मुख वाली, कमल-पत्र के समान विशाल नेत्रों वाली, स्वर्ण के समान कान्तिमयी, पीत वस्त्र धारण किए, हाथ में सुशोभित स्वर्ण-कमल लिए, सुन्दर अंगों वाली, समस्त अलंकारों से युक्त, सदा अभयदान देने वाली, भक्तों पर प्रसन्न रहने वाली भवानी — जो श्रीविद्या-स्वरूपा, शान्तमूर्ति, समस्त देवताओं द्वारा वन्दित एवं सर्व सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं — उनका ध्यान करें।
सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम्।
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम्॥
अर्थ जिनके ललाट पर कुंकुम का लेप एवं कस्तूरी का तिलक है, जिनके नेत्र मन्द मुस्कान से युक्त हैं, जो बाण, धनुष, पाश एवं अंकुश धारण करती हैं, समस्त जनों को मोहित करने वाली, अरुण (लाल) माला, आभूषण एवं वस्त्रों से सुशोभित, जपा-पुष्प के समान देदीप्यमान अम्बिका का — जप के समय — मैं स्मरण करता हूँ।
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी।
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता॥१॥
अर्थ ॐ — श्रीमाता — श्री (लक्ष्मी/सम्पदा) की माता, श्रीमहाराज्ञी — श्रीमती महान राज्ञी (महारानी), श्रीमत्सिंहासनेश्वरी — श्रीमान् सिंहासन की ईश्वरी (अधिष्ठात्री), चिदग्निकुण्डसम्भूता — चित् (चेतना) की अग्नि के कुण्ड से उत्पन्न, देवकार्यसमुद्यता — देवताओं के कार्य (भण्डासुर वध) के लिए उद्यत।
उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता।
रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
अर्थ उद्यद्भानुसहस्राभा — उदय होते हज़ार सूर्यों के समान कान्तिवाली, चतुर्बाहुसमन्विता — चार भुजाओं से युक्त, रागस्वरूपपाशाढ्या — राग (अनुराग/प्रेम) स्वरूप पाश से सम्पन्न, क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला — क्रोध के आकार वाले अंकुश से उज्ज्वल।
मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका।
निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला॥३॥
अर्थ मनोरूपेक्षुकोदण्डा — मन के रूप वाला इक्षु (गन्ना) का धनुष धारण करने वाली, पञ्चतन्मात्रसायका — पाँच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के रूप वाले पाँच बाणों वाली, निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला — अपनी अरुण (लाल) प्रभा की बाढ़ में जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मण्डल को डुबो दिया है।
चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा।
कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता॥४॥
अर्थ चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा — चम्पक, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक पुष्पों से सुशोभित केशराशि वाली, कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता — कुरुविन्द मणियों की श्रेणी से चमकते मुकुट से अलंकृत।
अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता।
मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका॥५॥
अर्थ अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता — अष्टमी के चन्द्रमा के समान चमकते ललाट (भाल) से शोभायमान, मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका — मुख रूपी चन्द्रमा पर कलंक के समान शोभित कस्तूरी (मृगनाभि) के तिलक वाली।
वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना॥६॥
अर्थ वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका — जिनकी भौंहें मुख रूपी कामदेव के मंगल-गृह के तोरण (द्वार-मेहराब) के समान हैं, वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना — जिनके नेत्र मुख की शोभा रूपी प्रवाह में तैरती हुई मछलियों के समान हैं
नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता।
ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा॥७॥
अर्थ नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता — नवीन चम्पा के फूल के समान कान्ति वाली नासिका-दण्ड से सुशोभित, ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा — तारों की कान्ति को भी तिरस्कृत करने वाले नासिका-आभूषण से देदीप्यमान
कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरा।
ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला॥८॥
अर्थ कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरा — कदम्ब की मञ्जरी से बने कर्णफूल (कर्णपूर) से मनोहर, ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला — जिनके दोनों कर्ण-आभूषण (ताटङ्क) सूर्य और चन्द्रमा के मण्डल हैं
पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः।
नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा॥९॥
अर्थ पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः — जिनके कपोल-प्रदेश पद्मराग-मणि के दर्पण को भी परास्त करते हैं, नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा — जिनके अधर नवीन मूँगे और बिम्बफल की शोभा को भी तिरस्कृत करते हैं
शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला।
कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा॥१०॥
अर्थ शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला — जिनकी दोनों दन्त-पंक्तियाँ शुद्धविद्या के अंकुरों के समान उज्ज्वल हैं, कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा — जिनके कर्पूरयुक्त ताम्बूल की सुगन्ध समस्त दिशाओं को आकर्षित करती है
निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी।
मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा॥११॥
अर्थ निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी — जिनके वार्तालाप की मधुरता सरस्वती की कच्छपी वीणा को भी तिरस्कृत कर देती है, मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा — जिनकी मन्द मुस्कान की प्रभा के प्रवाह में कामेश्वर का मन निमग्न रहता है
अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता।
कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा॥१२॥
अर्थ अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता — जिनकी ठोड़ी (चिबुक) की शोभा अनुपम (जिसकी कोई उपमा नहीं) है, कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा — जिनका कण्ठ कामेश्वर द्वारा बाँधे गए मंगलसूत्र से सुशोभित है
कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता।
रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता॥१३॥
अर्थ कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता — स्वर्ण के अंगद और केयूर (बाजूबन्द) से सुशोभित मनोहर भुजाओं वाली, रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता — रत्नजड़ित कण्ठहार में लटकते पदक (चिन्ताक) और हिलते मोती से युक्त
कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी।
नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी॥१४॥
अर्थ कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी — जिनके स्तन कामेश्वर के प्रेम-रूपी रत्न के बदले दिए गए मूल्य के समान हैं, नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी — जिनके दोनों स्तन नाभि रूपी क्यारी से उठी रोमावली-लता के फल हैं
लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा।
स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया॥१५॥
अर्थ लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा — जिनकी सूक्ष्म कमर केवल दृश्य रोमावली-लता के आधार रूप में ही अनुमेय है, स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया — स्तनों के भार से टूटती कमर को पट्ट-बन्ध के समान थामे तीन वलियों (त्रिवली) वाली
अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी।
रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता॥१६॥
अर्थ अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी — कुसुम्भ से रँगे अत्यन्त लाल वस्त्र से देदीप्यमान कटि-प्रदेश वाली, रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता — रत्नजड़ित घुँघरुओं से रमणीय करधनी (रशना) से विभूषित
कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता।
माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता॥१७॥
अर्थ कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता — जिनकी जाँघों का सौभाग्य और कोमलता केवल कामेश्वर को ही ज्ञात है, माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता — माणिक्य के मुकुट के आकार वाले दोनों घुटनों से सुशोभित
इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता॥१८॥
अर्थ इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका — जिनकी पिंडलियाँ इन्द्रगोप (बीरबहूटी) जड़े कामदेव के तूणीर के समान शोभित हैं, गूढगुल्फा — जिनके टखने (गुल्फ) मांसल होने से गूढ़ (अप्रकट) हैं, कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता — जिनके पगों के ऊपरी भाग (प्रपद) कछुए की पीठ को भी जीतने वाले (उससे अधिक चिकने-उन्नत) हैं
नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणा।
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा॥१९॥
अर्थ नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणा — जिनके नखों की कान्ति प्रणाम करने वालों के तमोगुण को ढँक (दूर कर) देती है, पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा — जिनके दोनों चरणों की प्रभा-जाल कमल को भी परास्त कर देती है
सिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा।
मरालीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः॥२०॥
अर्थ सिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा — जिनके श्री-चरण-कमल झनकार करते रत्नजड़ित नूपुरों (मञ्जीर) से मण्डित हैं, मरालीमन्दगमना — हंसिनी के समान मन्द-मन्थर गति वाली, महालावण्यशेवधिः — महान् लावण्य (सौन्दर्य) की निधि (कोष)
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा॥२१॥
अर्थ सर्वारुणा — पूर्णतः अरुण (रक्तवर्ण) वाली, अनवद्याङ्गी — निर्दोष एवं सुन्दर अंगों वाली, सर्वाभरणभूषिता — समस्त आभूषणों से विभूषित, शिवकामेश्वराङ्कस्था — शिव-कामेश्वर की गोद में विराजमान, शिवा — मंगलमयी, शिव की शक्ति, स्वाधीनवल्लभा — जिसका प्रियतम (पति) उसके अधीन है
सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका।
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता॥२२॥
अर्थ सुमेरुमध्यशृङ्गस्था — सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर स्थित, श्रीमन्नगरनायिका — श्री नगर (श्रीचक्र-नगरी) की स्वामिनी, चिन्तामणिगृहान्तस्था — चिन्तामणि-गृह के भीतर विराजमान, पञ्चब्रह्मासनस्थिता — पञ्च-ब्रह्म रूपी आसन पर विराजमान
महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी॥२३॥
अर्थ महापद्माटवीसंस्था — महापद्म-वन में निवास करने वाली, कदम्बवनवासिनी — कदम्ब वन में निवास करने वाली, सुधासागरमध्यस्था — अमृत के सागर के मध्य स्थित, कामाक्षी — मनोहर (कामनापूर्ण) नेत्रों वाली, कामदायिनी — समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली
देवर्षिगणसंघातस्तूयमानात्मवैभवा।
भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता॥२४॥
अर्थ देवर्षिगणसंघातस्तूयमानात्मवैभवा — देवताओं और ऋषियों के समूह द्वारा जिसकी महिमा स्तुत होती है, भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता — भण्डासुर का वध करने को उद्यत शक्ति-सेना से युक्त
सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता॥२५॥
अर्थ सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता — सम्पत्करी द्वारा अधिष्ठित गजसमूह से सेवित, अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता — अश्वारूढा द्वारा अधिष्ठित करोड़ों अश्वों से घिरी हुई
चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता।
गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता॥२६॥
अर्थ चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता — चक्रराज रथ पर आरूढ़, समस्त आयुधों से सुसज्जित, गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता — गेयचक्र रथ पर आरूढ़ मन्त्रिणी (श्यामला) द्वारा सेवित
किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा॥२७॥
अर्थ किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता — किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा (वाराही) से अग्रगण्य रूप में सेवित, ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा — ज्वालामालिनी द्वारा रचित अग्नि-प्राकार के मध्य विराजमान
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता।
नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका॥२८॥
अर्थ भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता — भण्ड की सेना का वध करने में उद्यत शक्तियों के पराक्रम से हर्षित, नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका — नित्या देवियों के प्रचण्ड पराक्रम को देखने के लिए उत्सुक
भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता।
मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता॥२९॥
अर्थ भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता — भण्ड के पुत्रों के वध में उद्यत बाला के पराक्रम से आनन्दित, मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता — मन्त्रिणी अम्बा द्वारा किए गए विषङ्ग-वध से संतुष्ट
विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता।
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा॥३०॥
अर्थ विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता — विशुक्र के प्राण हरने वाली वाराही के पराक्रम से आनन्दित, कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा — कामेश्वर के मुख के अवलोकन मात्र से श्रीगणेश की रचना करने वाली
महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता।
भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी॥३१॥
अर्थ महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता — महागणेश द्वारा विघ्न-यन्त्रों के विध्वंस से अत्यंत हर्षित, भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी — भण्डासुर द्वारा छोड़े गए शस्त्रों के प्रति प्रत्यस्त्रों की वर्षा करने वाली
कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः।
महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका॥३२॥
अर्थ कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः — जिसके हाथ की अंगुलियों के नखों से नारायण के दश अवतार प्रकट हुए, महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका — महापाशुपतास्त्र की अग्नि से असुर-सेना को भस्म करने वाली
कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका।
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा॥३३॥
अर्थ कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका — कामेश्वरास्त्र से भण्डासुर सहित शून्यक नगरी को भस्म करने वाली, ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा — ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवों द्वारा जिसका वैभव स्तुत है
हरनेत्राग्निसंदग्धकामसञ्जीवनौषधिः।
श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा॥३४॥
अर्थ हरनेत्राग्निसंदग्धकामसञ्जीवनौषधिः — शिव के नेत्राग्नि से भस्म हुए कामदेव के लिए संजीवनी औषधि रूप, श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा — जिसका मुख-कमल श्रीविद्या के वाग्भव-कूट का स्वरूप है
कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी।
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी॥३५॥
अर्थ कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी — कण्ठ के नीचे से कटि पर्यन्त भाग जिसका मध्य-कूट (कामराज-कूट) स्वरूप है, शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी — शक्ति-कूट के साथ एकत्व को प्राप्त कटि के नीचे के भाग को धारण करने वाली
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा।
कुलामृतैकरसिका कुलसंकेतपालिनी॥३६॥
अर्थ मूलमन्त्रात्मिका — मूलमन्त्र (पञ्चदशी) स्वरूपा, मूलकूटत्रयकलेवरा — मूलमन्त्र के तीन कूटों को शरीर रूप में धारण करने वाली, कुलामृतैकरसिका — कुल के अमृत में एकमात्र रस लेने वाली, कुलसंकेतपालिनी — कुल के गुप्त संकेतों की रक्षा करने वाली
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी।
अकुला समयान्तस्था समयाचारतत्परा॥३७॥
अर्थ कुलाङ्गना — कुलीन नारी, कुल की देवी, कुलान्तस्था — कुल के भीतर स्थित, कौलिनी — कौल मार्ग की देवी, कुलयोगिनी — कुल की योगिनी, अकुला — कुल से परे, अकुल स्वरूपा, समयान्तस्था — समय (आन्तरिक उपासना) में स्थित, समयाचारतत्परा — समयाचार में निरत रहने वाली
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी॥३८॥
अर्थ मूलाधारैकनिलया — मूलाधार चक्र को मुख्य निवास बनाने वाली, ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी — ब्रह्मग्रन्थि का भेदन करने वाली, मणिपूरान्तरुदिता — मणिपूर चक्र में उदित होने वाली, विष्णुग्रन्थिविभेदिनी — विष्णुग्रन्थि का भेदन करने वाली
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी॥३९॥
अर्थ आज्ञाचक्रान्तरालस्था — आज्ञा चक्र के मध्य में स्थित, रुद्रग्रन्थिविभेदिनी — रुद्रग्रन्थि का भेदन करने वाली, सहस्राराम्बुजारूढा — सहस्रार कमल पर आरूढ़, सुधासाराभिवर्षिणी — अमृत की धारा बरसाने वाली
तडिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी॥४०॥
अर्थ तडिल्लतासमरुचिः — बिजली की लता के समान कान्ति वाली, षट्चक्रोपरिसंस्थिता — षट्चक्रों के ऊपर स्थित, महाशक्तिः — महाशक्ति स्वरूपा (कुण्डलिनी), कुण्डलिनी — कुण्डलिनी शक्ति स्वरूपा, बिसतन्तुतनीयसी — कमलनाल के तन्तु से भी सूक्ष्मतर
भवानी भावनागम्या भवारण्यकुठारिका।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्तसौभाग्यदायिनी॥४१॥
अर्थ भवानी — भव (शिव) की पत्नी, भवानी, भावनागम्या — भावना (ध्यान) द्वारा प्राप्य, भवारण्यकुठारिका — संसार रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी, भद्रप्रिया — मंगल (भद्र) से प्रेम करने वाली, भद्रमूर्तिः — मंगलमयी मूर्ति वाली, भक्तसौभाग्यदायिनी — भक्तों को सौभाग्य देने वाली
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी॥४२॥
अर्थ भक्तिप्रिया — भक्ति से प्रेम करने वाली, भक्तिगम्या — भक्ति द्वारा प्राप्य, भक्तिवश्या — भक्ति के वश में होने वाली, भयापहा — भय को दूर करने वाली, शाम्भवी — शम्भु (शिव) की शक्ति, शाम्भवी, शारदाराध्या — शारदा (सरस्वती) द्वारा पूजित, शर्वाणी — शर्व (शिव) की पत्नी, शर्वाणी, शर्मदायिनी — सुख (शर्म) प्रदान करने वाली
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्रनिभानना।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना॥४३॥
अर्थ शाङ्करी — शंकर की शक्ति, शांकरी, श्रीकरी — श्री (सम्पत्ति) प्रदान करने वाली, साध्वी — पतिव्रता, साध्वी, शरच्चन्द्रनिभानना — शरद ऋतु के चन्द्रमा-सा मुख वाली, शातोदरी — कृश (पतले) उदर वाली, शान्तिमती — शान्ति से युक्त, निराधारा — आधार-रहित, स्वयं-आश्रित, निरञ्जना — निर्मल, अञ्जन (लेप) रहित
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा॥४४॥
अर्थ निर्लेपा — किसी लेप (कर्मलेप) से रहित, निर्मला — मलरहित, परम शुद्ध, नित्या — नित्य, शाश्वत, निराकारा — आकार-रहित, निराकार, निराकुला — व्याकुलता-रहित, स्थिर, निर्गुणा — गुणों से परे, निर्गुण, निष्कला — कला (अंश) रहित, अखण्ड, शान्ता — शान्त स्वरूपा, निष्कामा — कामना-रहित, निरुपप्लवा — उपप्लव (विनाश/उपद्रव) रहित
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा॥४५॥
अर्थ नित्यमुक्ता — नित्य मुक्त स्वरूपा, निर्विकारा — विकार-रहित, अपरिवर्तनीय, निष्प्रपञ्चा — प्रपञ्च (जगत्-विस्तार) से परे, निराश्रया — किसी आश्रय की अपेक्षा न रखने वाली, नित्यशुद्धा — सदा शुद्ध, नित्यबुद्धा — नित्य बुद्ध (सदा जागृत ज्ञानमयी), निरवद्या — दोष-रहित, निर्दोष, निरन्तरा — अन्तर (भेद/अवकाश) रहित, अखण्ड
निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा।
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी॥४६॥
अर्थ निष्कारणा — कारण-रहित, स्वयंभू, निष्कलङ्का — कलंक (दोष) रहित, निरुपाधिः — उपाधि-रहित, निरीश्वरा — जिसके ऊपर कोई ईश्वर नहीं, नीरागा — राग (आसक्ति) रहित, रागमथनी — राग (आसक्ति) का नाश करने वाली, निर्मदा — मद (अहंकार) रहित, मदनाशिनी — मद (अहंकार) का नाश करने वाली
निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी॥४७॥
अर्थ निश्चिन्ता — चिन्ता-रहित, निरहंकारा — अहंकार-रहित, निर्मोहा — मोह-रहित, मोहनाशिनी — मोह का नाश करने वाली, निर्ममा — ममता (मेरेपन) रहित, ममताहन्त्री — ममता का नाश करने वाली, निष्पापा — पाप-रहित, पापनाशिनी — पाप का नाश करने वाली
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी॥४८॥
अर्थ निष्क्रोधा — क्रोध-रहित, क्रोधशमनी — क्रोध को शान्त करने वाली, निर्लोभा — लोभ-रहित, लोभनाशिनी — लोभ का नाश करने वाली, निःसंशया — संशय-रहित, संशयघ्नी — संशय का नाश करने वाली, निर्भवा — भव (जन्म-मरण) रहित, भवनाशिनी — भव (संसार) का नाश करने वाली
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा॥४९॥
अर्थ निर्विकल्पा — विकल्प (भेद-कल्पना) रहित, निराबाधा — बाधा (पीड़ा) रहित, निर्भेदा — भेद-रहित, अभेद स्वरूपा, भेदनाशिनी — भेद (द्वैत) का नाश करने वाली, निर्नाशा — नाश-रहित, अविनाशी, मृत्युमथनी — मृत्यु का मथन (नाश) करने वाली, निष्क्रिया — क्रिया-रहित, निष्क्रिय स्वरूपा, निष्परिग्रहा — परिग्रह (संग्रह) रहित
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा॥५०॥
अर्थ निस्तुला — अतुलनीय, जिसकी कोई तुलना नहीं, नीलचिकुरा — नीले (काले) केश वाली, निरपाया — अपाय (विनाश) रहित, निरत्यया — अत्यय (उल्लंघन/नाश) रहित, दुर्लभा — दुर्लभ, कठिनता से प्राप्य, दुर्गमा — दुर्गम, कठिनता से पहुँच योग्य, दुर्गा — दुर्गति नाशिनी दुर्गा, दुःखहन्त्री — दुःख का नाश करने वाली, सुखप्रदा — सुख प्रदान करने वाली
दुष्टदूरा दुराचारशमनी दोषवर्जिता।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिकवर्जिता॥५१॥
अर्थ दुष्टदूरा — दुष्टों से दूर रहने वाली, जिससे दुर्जन दूर रहते हैं, दुराचारशमनी — दुराचार का शमन करने वाली, दोषवर्जिता — समस्त दोषों से रहित, सर्वज्ञा — सब कुछ जानने वाली, सर्वज्ञ, सान्द्रकरुणा — गहन करुणा से परिपूर्ण, समानाधिकवर्जिता — जिसके समान या अधिक कोई नहीं
सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रदा।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी॥५२॥
अर्थ सर्वशक्तिमयी — समस्त शक्तियों से युक्त, सर्वमङ्गला — समस्त मंगलों की अधिष्ठात्री, सद्गतिप्रदा — शुभ गति एवं मोक्ष प्रदान करने वाली, सर्वेश्वरी — सबकी परम अधीश्वरी, सर्वमयी — सर्वस्वरूपा, सर्वव्यापिनी, सर्वमन्त्रस्वरूपिणी — समस्त मन्त्रों की स्वरूपा
सर्वयन्त्रात्मिका सर्वतन्त्ररूपा मनोन्मनी।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया॥५३॥
अर्थ सर्वयन्त्रात्मिका — समस्त यन्त्रों की आत्मा, सर्वतन्त्ररूपा — समस्त तन्त्रों की स्वरूपा, मनोन्मनी — मन से परे उन्मनी अवस्था-स्वरूपा, माहेश्वरी — महेश्वर की शक्ति, महेश्वरी, महादेवी — महान् देवी, महालक्ष्मीः — महालक्ष्मी-स्वरूपा, मृडप्रिया — मृड (शिव) की प्रिया
महारूपा महापूज्या महापातकनाशिनी।
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः॥५४॥
अर्थ महारूपा — महान् रूप वाली, महापूज्या — परम पूजनीया, महापातकनाशिनी — महान् पातकों का नाश करने वाली, महामाया — महान् माया-स्वरूपा, जगत् की मूल शक्ति, महासत्त्वा — महान् सत्त्व-गुण एवं बल से युक्त, महाशक्तिः — महान् शक्ति-स्वरूपा, महारतिः — महान् आनन्द एवं प्रीति-स्वरूपा
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला।
महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी॥५५॥
अर्थ महाभोगा — महान् भोग एवं ऐश्वर्य-स्वरूपा, महैश्वर्या — महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न, महावीर्या — महान् वीर्य एवं पराक्रम वाली, महाबला — महान् बल-सम्पन्ना, महाबुद्धिः — महान् बुद्धि-स्वरूपा, महासिद्धिः — महान् सिद्धि-स्वरूपा, महायोगेश्वरेश्वरी — महान् योगेश्वरों की भी ईश्वरी
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना।
महायागक्रमाराध्या महाभैरवपूजिता॥५६॥
अर्थ महातन्त्रा — महान् तन्त्र-स्वरूपा, महामन्त्रा — महान् मन्त्र-स्वरूपा, महायन्त्रा — महान् यन्त्र (श्रीचक्र) स्वरूपा, महासना — महान् आसन पर विराजमान, महायागक्रमाराध्या — महायाग की विधि-क्रम से आराधित, महाभैरवपूजिता — महाभैरव (शिव) द्वारा पूजित
महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणी।
महाकामेशमहिषी महात्रिपुरसुन्दरी॥५७॥
अर्थ महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणी — महाप्रलय में महेश्वर के महाताण्डव की साक्षी, महाकामेशमहिषी — महाकामेश्वर की महारानी, महात्रिपुरसुन्दरी — महान् त्रिपुरसुन्दरी
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी।
महाचतुःषष्टिकोटियोगिनीगणसेविता॥५८॥
अर्थ चतुःषष्ट्युपचाराढ्या — चौंसठ उपचारों से पूजित, चतुःषष्टिकलामयी — चौंसठ कलाओं से युक्त, महाचतुःषष्टिकोटियोगिनीगणसेविता — चौंसठ करोड़ योगिनी-गणों से सेवित
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डलमध्यगा।
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्रकलाधरा॥५९॥
अर्थ मनुविद्या — मनु-विद्या मन्त्र-स्वरूपा, चन्द्रविद्या — चन्द्र-विद्या मन्त्र-स्वरूपा, चन्द्रमण्डलमध्यगा — चन्द्रमण्डल के मध्य में स्थित, चारुरूपा — मनोहर रूप वाली, चारुहासा — मनोहर मुस्कान वाली, चारुचन्द्रकलाधरा — मनोहर चन्द्रकला को धारण करने वाली
चराचरजगन्नाथा चक्रराजनिकेतना।
पार्वती पद्मनयना पद्मरागसमप्रभा॥६०॥
अर्थ चराचरजगन्नाथा — चर-अचर समस्त जगत् की स्वामिनी, चक्रराजनिकेतना — श्रीचक्र (चक्रराज) में निवास करने वाली, पार्वती — पर्वतराज की पुत्री, पार्वती, पद्मनयना — कमल के समान नेत्रों वाली, पद्मरागसमप्रभा — पद्मराग मणि के समान कान्ति वाली
पञ्चप्रेतासनासीना पञ्चब्रह्मस्वरूपिणी।
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञानघनरूपिणी॥६१॥
अर्थ पञ्चप्रेतासनासीना — पंच-प्रेत (ब्रह्मादि) के आसन पर विराजमान, पञ्चब्रह्मस्वरूपिणी — पंच-ब्रह्म की स्वरूपा, चिन्मयी — शुद्ध चैतन्य-स्वरूपा, परमानन्दा — परम आनन्द-स्वरूपा, विज्ञानघनरूपिणी — घनीभूत विज्ञान (चैतन्य) स्वरूपा
ध्यानध्यातृध्येयरूपा धर्माधर्मविवर्जिता।
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका॥६२॥
अर्थ ध्यानध्यातृध्येयरूपा — ध्यान, ध्याता और ध्येय — तीनों की स्वरूपा, धर्माधर्मविवर्जिता — धर्म और अधर्म दोनों से परे, विश्वरूपा — विश्व-स्वरूपा, जाग्रत् अवस्था की अधिष्ठात्री, जागरिणी — जाग्रत् अवस्था-स्वरूपा, स्वपन्ती — स्वप्न अवस्था-स्वरूपा, तैजसात्मिका — स्वप्नाभिमानी तैजस की आत्मा
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्थाविवर्जिता।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी॥६३॥
अर्थ सुप्ता — सुषुप्ति (गाढ़ निद्रा) अवस्था-स्वरूपा, प्राज्ञात्मिका — सुषुप्त्यभिमानी प्राज्ञ की आत्मा, तुर्या — तुरीय (चतुर्थ) अवस्था-स्वरूपा, सर्वावस्थाविवर्जिता — समस्त अवस्थाओं से परे, सृष्टिकर्त्री — सृष्टि की रचयित्री, ब्रह्मरूपा — सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की स्वरूपा, गोप्त्री — जगत् की पालनकर्त्री, रक्षिका, गोविन्दरूपिणी — पालक गोविन्द (विष्णु) की स्वरूपा
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधानकरीश्वरी।
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्यपरायणा॥६४॥
अर्थ संहारिणी — जगत् का संहार करने वाली, रुद्ररूपा — संहारकर्ता रुद्र की स्वरूपा, तिरोधानकरी — जगत् के तिरोधान (विलय) को करने वाली, ईश्वरी — तिरोधान करने वाली ईश्वर-शक्ति, सदाशिवा — अनुग्रहकर्ता सदाशिव की स्वरूपा, अनुग्रहदा — अनुग्रह (कृपा) प्रदान करने वाली, पञ्चकृत्यपरायणा — सृष्टि-स्थिति-संहार-तिरोधान-अनुग्रह — पंच कृत्यों में तत्पर
भानुमण्डलमध्यस्था भैरवी भगमालिनी।
पद्मासना भगवती पद्मनाभसहोदरी॥६५॥
अर्थ भानुमण्डलमध्यस्था — सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित, भैरवी — भैरवी-स्वरूपा, भैरव की शक्ति, भगमालिनी — भग (ऐश्वर्य के छह गुण) की माला धारण करने वाली, पद्मासना — कमल के आसन पर विराजमान, भगवती — षड्-ऐश्वर्य-सम्पन्ना भगवती, पद्मनाभसहोदरी — पद्मनाभ (विष्णु) की सहोदरा (बहन)
उन्मेषनिमिषोत्पन्नविपन्नभुवनावली।
सहस्रशीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात्॥६६॥
अर्थ उन्मेषनिमिषोत्पन्नविपन्नभुवनावली — जिसके नेत्र खोलने से भुवनों की पंक्ति उत्पन्न और बंद करने से विलीन हो जाती है, सहस्रशीर्षवदना — सहस्र (हज़ारों) शीर्ष और मुख वाली, सहस्राक्षी — सहस्र नेत्रों वाली, सहस्रपात् — सहस्र चरणों वाली
आब्रह्मकीटजननी वर्णाश्रमविधायिनी।
निजाज्ञारूपनिगमा पुण्यापुण्यफलप्रदा॥६७॥
अर्थ आब्रह्मकीटजननी — ब्रह्मा से लेकर कीट तक समस्त प्राणियों की जननी, वर्णाश्रमविधायिनी — वर्ण और आश्रम व्यवस्था की विधायिका, निजाज्ञारूपनिगमा — जिसकी अपनी आज्ञा ही वेदों (निगम) के रूप में है, पुण्यापुण्यफलप्रदा — पुण्य और पाप के फल प्रदान करने वाली
श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाब्जधूलिका।
सकलागमसन्दोहशुक्तिसम्पुटमौक्तिका॥६८॥
अर्थ श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाब्जधूलिका — जिसके चरण-कमलों की धूलि वेदरूपी नारियों की माँग का सिन्दूर बन जाती है, सकलागमसन्दोहशुक्तिसम्पुटमौक्तिका — समस्त आगमों के समूहरूपी सीप-सम्पुट में स्थित मोती
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी।
अम्बिकाऽनादिनिधना हरिब्रह्मेन्द्रसेविता॥६९॥
अर्थ पुरुषार्थप्रदा — चारों पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) को प्रदान करने वाली, पूर्णा — सर्वथा परिपूर्ण, भोगिनी — समस्त भोगों की स्वामिनी एवं भोक्त्री, भुवनेश्वरी — समस्त भुवनों (लोकों) की ईश्वरी, अम्बिका — जगन्माता, अनादिनिधना — जिसका न आदि है न अन्त, हरिब्रह्मेन्द्रसेविता — विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र द्वारा सेवित
नारायणी नादरूपा नामरूपविवर्जिता।
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेयवर्जिता॥७०॥
अर्थ नारायणी — भगवान् नारायण की शक्ति-स्वरूपा, नादरूपा — आदि नाद (ध्वनि) के रूप वाली, नामरूपविवर्जिता — नाम और रूप से रहित, ह्रींकारी — ह्रीं बीजमन्त्र के स्वरूप वाली, ह्रीमती — लज्जा (ह्री) से युक्त, हृद्या — हृदय में निवास करने वाली एवं मनोहारिणी, हेयोपादेयवर्जिता — त्याज्य और ग्राह्य के भेद से रहित
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणिमेखला॥७१॥
अर्थ राजराजार्चिता — राजाओं के राजा (कुबेर) द्वारा अर्चित, राज्ञी — साम्राज्ञी, रम्या — परम रमणीय एवं मनोहर, राजीवलोचना — कमल के समान नेत्रों वाली, रञ्जनी — सबको आनन्दित एवं अनुरक्त करने वाली, रमणी — रमण कराने वाली सुन्दरी, रस्या — रस से पूर्ण, आस्वाद्य, रणत्किङ्किणिमेखला — रुनझुन करती घण्टियों वाली करधनी धारण करने वाली
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा॥७२॥
अर्थ रमा — लक्ष्मीस्वरूपा, शोभायमाना, राकेन्दुवदना — पूर्णिमा के चन्द्र समान मुख वाली, रतिरूपा — रति (प्रेम) के रूप वाली, रतिप्रिया — रति को प्रिय एवं प्रेम से युक्त, रक्षाकरी — रक्षा करने वाली, राक्षसघ्नी — राक्षसों का संहार करने वाली, रामा — रमणीय सुन्दरी, सबको आह्लादित करने वाली, रमणलम्पटा — अपने प्रियतम (शिव) में अनुरक्त
काम्या कामकलारूपा कदम्बकुसुमप्रिया।
कल्याणी जगतीकन्दा करुणारससागरा॥७३॥
अर्थ काम्या — सबके द्वारा वांछनीय, कामकलारूपा — कामकला के स्वरूप वाली, कदम्बकुसुमप्रिया — कदम्ब के पुष्पों को प्रिय मानने वाली, कल्याणी — मंगलमयी, कल्याण करने वाली, जगतीकन्दा — जगत् का मूल कारण, करुणारससागरा — करुणा-रस का सागर
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया।
वरदा वामनयना वारुणीमदविह्वला॥७४॥
अर्थ कलावती — समस्त कलाओं से युक्त, कलालापा — मधुर एवं कलात्मक वाणी वाली, कान्ता — अत्यन्त रमणीय एवं मनोहारिणी, कादम्बरीप्रिया — कादम्बरी (मधु) को प्रिय मानने वाली, वरदा — वरदान देने वाली, वामनयना — सुन्दर नेत्रों वाली, वारुणीमदविह्वला — वारुणी (आनन्द-रस) के मद से विह्वल
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचलनिवासिनी।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी॥७५॥
अर्थ विश्वाधिका — समस्त विश्व से परे एवं श्रेष्ठ, वेदवेद्या — वेदों द्वारा ज्ञेय, विन्ध्याचलनिवासिनी — विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करने वाली, विधात्री — सृष्टि की विधात्री (रचयित्री), वेदजननी — वेदों की जननी, विष्णुमाया — विष्णु की माया-स्वरूपा, विलासिनी — लीला-विलास करने वाली
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनी।
क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता क्षेत्रपालसमर्चिता॥७६॥
अर्थ क्षेत्रस्वरूपा — क्षेत्र (देह/प्रकृति) के स्वरूप वाली, क्षेत्रेशी — क्षेत्र की स्वामिनी, क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनी — क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) दोनों का पालन करने वाली, क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता — ह्रास और वृद्धि से सर्वथा रहित, क्षेत्रपालसमर्चिता — क्षेत्रपालों द्वारा सम्यक् पूजित
विजया विमला वन्द्या वन्दारुजनवत्सला।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डलवासिनी॥७७॥
अर्थ विजया — सर्वत्र विजय पाने वाली, विमला — निर्मल, दोषरहित, वन्द्या — सबके द्वारा वन्दनीय, वन्दारुजनवत्सला — वन्दना करने वाले भक्तजनों पर वात्सल्य रखने वाली, वाग्वादिनी — वाणी की अधिष्ठात्री, बुलवाने वाली, वामकेशी — सुन्दर केशों वाली, वह्निमण्डलवासिनी — अग्नि-मण्डल में निवास करने वाली
भक्तिमत्कल्पलतिका पशुपाशविमोचिनी।
संहृताशेषपाषण्डा सदाचारप्रवर्तिका॥७८॥
अर्थ भक्तिमत्कल्पलतिका — भक्तिमानों के लिए कल्पलता के समान, पशुपाशविमोचिनी — जीव (पशु) को बन्धन (पाश) से मुक्त करने वाली, संहृताशेषपाषण्डा — समस्त पाखण्डों (नास्तिक मतों) का संहार करने वाली, सदाचारप्रवर्तिका — सदाचार का प्रवर्तन करने वाली
तापत्रयाग्निसन्तप्तसमाह्लादनचन्द्रिका।
तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा॥७९॥
अर्थ तापत्रयाग्निसन्तप्तसमाह्लादनचन्द्रिका — त्रिविध तापों की अग्नि से संतप्त जनों को आह्लादित करने वाली चाँदनी, तरुणी — नित्य युवावस्था वाली, तापसाराध्या — तपस्वियों द्वारा आराधित, तनुमध्या — कृश (पतली) कटि वाली, तमोऽपहा — अन्धकार एवं अज्ञान को दूर करने वाली
चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी।
स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः॥८०॥
अर्थ चितिः — शुद्ध चैतन्य-स्वरूपा, तत्पदलक्ष्यार्था — 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ (परम तत्त्व), चिदेकरसरूपिणी — चैतन्य के एकरस स्वरूप वाली, स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः — जिसके आत्मानन्द के एक लव-मात्र में ब्रह्मा आदि का समस्त आनन्द समाहित है
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्तमानसहंसिका॥८१॥
अर्थ परा — सर्वोच्च परावाक्-स्वरूपा (वाणी की परा अवस्था), प्रत्यक्चितीरूपा — अन्तर्मुखी चैतन्य-स्वरूपा, पश्यन्ती — पश्यन्ती वाक्-रूपा (वाणी की दूसरी अवस्था), परदेवता — परम देवता, मध्यमा — मध्यमा वाक्-रूपा (वाणी की मध्य अवस्था), वैखरीरूपा — वैखरी वाक्-स्वरूपा (उच्चरित वाणी), भक्तमानसहंसिका — भक्तों के मानस-रूपी सरोवर में विहार करने वाली हंसी
कामेश्वरप्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता।
शृङ्गाररससम्पूर्णा जया जालन्धरस्थिता॥८२॥
अर्थ कामेश्वरप्राणनाडी — कामेश्वर (शिव) की प्राण-नाडी, कृतज्ञा — सब कर्मों की ज्ञाता, कृतज्ञ, कामपूजिता — कामदेव द्वारा पूजित, शृङ्गाररससम्पूर्णा — शृङ्गार-रस से परिपूर्ण, जया — विजयस्वरूपा, जयशीला, जालन्धरस्थिता — जालन्धर पीठ में स्थित
ओड्याणपीठनिलया बिन्दुमण्डलवासिनी।
रहोयागक्रमाराध्या रहस्तर्पणतर्पिता॥८३॥
अर्थ ओड्याणपीठनिलया — ओड्याण पीठ में निवास करने वाली, बिन्दुमण्डलवासिनी — श्रीचक्र के बिन्दु-मण्डल में निवास करने वाली, रहोयागक्रमाराध्या — गुप्त याग-क्रम से आराध्या, रहस्तर्पणतर्पिता — गुप्त तर्पण से तृप्त होने वाली
सद्यःप्रसादिनी विश्वसाक्षिणी साक्षिवर्जिता।
षडङ्गदेवतायुक्ता षाड्गुण्यपरिपूरिता॥८४॥
अर्थ सद्यःप्रसादिनी — तत्काल प्रसन्न होकर कृपा करने वाली, विश्वसाक्षिणी — समस्त विश्व की साक्षी, साक्षिवर्जिता — जिसका कोई साक्षी नहीं, साक्षी-रहित, षडङ्गदेवतायुक्ता — षडङ्ग देवताओं से युक्ता, षाड्गुण्यपरिपूरिता — षड्गुण-ऐश्वर्य से परिपूर्ण
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाणसुखदायिनी।
नित्याषोडशिकारूपा श्रीकण्ठार्धशरीरिणी॥८५॥
अर्थ नित्यक्लिन्ना — नित्य करुणा-आर्द्र, नित्यक्लिन्ना (नित्या-देवी), निरुपमा — जिसकी कोई उपमा नहीं, अनुपम, निर्वाणसुखदायिनी — निर्वाण-सुख प्रदान करने वाली, नित्याषोडशिकारूपा — सोलह नित्या-देवियों की स्वरूपा, श्रीकण्ठार्धशरीरिणी — श्रीकण्ठ (शिव) के अर्ध-शरीर वाली
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी॥८६॥
अर्थ प्रभावती — प्रभा (तेज) से युक्ता, दीप्तिमती, प्रभारूपा — प्रभा-स्वरूपा, तेजोमयी, प्रसिद्धा — सर्वत्र प्रसिद्ध, विख्याता, परमेश्वरी — परम ईश्वरी, सर्वोच्च देवी, मूलप्रकृतिः — मूल प्रकृति, सृष्टि का मूल कारण, अव्यक्ता — अव्यक्त, अप्रकट, व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी — व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों वाली
व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्यास्वरूपिणी।
महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी॥८७॥
अर्थ व्यापिनी — सर्वव्यापिनी, विविधाकारा — अनेक (विविध) रूपों वाली, विद्याविद्यास्वरूपिणी — विद्या और अविद्या दोनों-स्वरूपा, महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी — महाकामेश (शिव) के नेत्र-कुमुद को आह्लादित करने वाली चाँदनी
भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः।
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी॥८८॥
अर्थ भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः — भक्तों के हृदय-अन्धकार को भेदने वाली सूर्य-किरणों की पंक्ति, शिवदूती — शिव को दूत बनाने वाली शिवदूती, शिवाराध्या — शिव द्वारा आराध्या, शिवमूर्तिः — शिव-स्वरूपा, मंगलमयी मूर्ति, शिवङ्करी — मंगल (शिव-कल्याण) करने वाली
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा॥८९॥
अर्थ शिवप्रिया — शिव की प्रिया, शिवपरा — शिव में परायण, शिव-निष्ठा वाली, शिष्टेष्टा — शिष्ट (सज्जन) पुरुषों की इष्ट, शिष्टपूजिता — शिष्टजनों द्वारा पूजित, अप्रमेया — अप्रमेय, प्रमाणों से अगम्य, स्वप्रकाशा — स्वयं-प्रकाशमान, स्वप्रकाशा, मनोवाचामगोचरा — मन और वाणी के अगोचर
चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका।
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्दनिषेविता॥९०॥
अर्थ चिच्छक्तिः — चित्-शक्ति, चैतन्य की शक्ति, चेतनारूपा — चेतना-स्वरूपा, जडशक्तिः — जड (अचेतन) के आधारभूत शक्ति, जडात्मिका — जड-रूपा, अचेतन का आत्मस्वरूप, गायत्री — गायत्री-स्वरूपा, वेदमाता, व्याहृतिः — व्याहृति-स्वरूपा (भूः भुवः स्वः), सन्ध्या — सन्ध्या-वन्दन स्वरूपा, द्विजवृन्दनिषेविता — द्विज (ब्राह्मण)-समूह द्वारा सेवित
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्चकोशान्तरस्थिता।
निःसीममहिमा नित्ययौवना मदशालिनी॥९१॥
अर्थ तत्त्वासना — तत्त्वों को आसन बनाने वाली, तत्त्वमयी — समस्त तत्त्वमयी, पञ्चकोशान्तरस्थिता — पञ्च कोशों के भीतर स्थित, निःसीममहिमा — असीम महिमा वाली, नित्ययौवना — नित्य युवा, सदा यौवनवती, मदशालिनी — मद (आनन्द-उन्माद) से सुशोभित
मदघूर्णितरक्ताक्षी मदपाटलगण्डभूः।
चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी चाम्पेयकुसुमप्रिया॥९२॥
अर्थ मदघूर्णितरक्ताक्षी — मद से घूर्णित लाल नेत्रों वाली, मदपाटलगण्डभूः — मद से पाटल (गुलाबी) कपोलों वाली, चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी — चन्दन-द्रव से लिपे अंगों वाली, चाम्पेयकुसुमप्रिया — चम्पा-पुष्प की प्रिया
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी।
कुलकुण्डालया कौलमार्गतत्परसेविता॥९३॥
अर्थ कुशला — कुशल, दक्ष एवं कल्याणमयी, कोमलाकारा — कोमल आकृति वाली, कुरुकुल्ला — कुरुकुल्ला-देवी स्वरूपा, कुलेश्वरी — कुल (कौल परम्परा) की ईश्वरी, कुलकुण्डालया — कुलकुण्ड (मूलाधार, कुण्डलिनी-स्थान) में निवास करने वाली, कौलमार्गतत्परसेविता — कौल-मार्ग में तत्पर साधकों द्वारा सेवित
कुमारगणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः।
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी॥९४॥
अर्थ कुमारगणनाथाम्बा — कुमार (स्कन्द) और गणनाथ (गणेश) की माता, तुष्टिः — तुष्टि (सन्तोष)-स्वरूपा, पुष्टिः — पुष्टि (पोषण)-स्वरूपा, मतिः — मति (बुद्धि)-स्वरूपा, धृतिः — धृति (धैर्य)-स्वरूपा, शान्तिः — शान्ति-स्वरूपा, स्वस्तिमती — स्वस्ति (कल्याण) से युक्ता, मंगलमयी, कान्तिः — कान्ति (शोभा)-स्वरूपा, नन्दिनी — आनन्द देने वाली, नन्दिनी, विघ्ननाशिनी — विघ्नों का नाश करने वाली
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षीकामरूपिणी।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचलवासिनी॥९५॥
अर्थ तेजोवती — तेज से युक्ता, तेजस्विनी, त्रिनयना — तीन नेत्रों वाली, लोलाक्षीकामरूपिणी — कामरूप-पीठ में चंचल-नेत्रा रूप में विराजमान, मालिनी — मालिनी (माला-धारिणी / मालिनी-वर्णमाला रूपा), हंसिनी — हंस-स्वरूपा, हंसिनी, माता — सबकी माता, मलयाचलवासिनी — मलयाचल पर्वत पर निवास करने वाली
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका।
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी॥९६॥
अर्थ सुमुखी — सुन्दर एवं प्रसन्न मुखवाली, नलिनी — कमल के समान कोमल, सुभ्रूः — सुन्दर भौंहों वाली, शोभना — परम शोभायुक्त, कान्तिमयी, सुरनायिका — देवताओं की नायिका, कालकण्ठी — नीलकण्ठ (शिव) की पत्नी, कान्तिमती — अपार कान्ति वाली, क्षोभिणी — सृष्टि में क्षोभ (स्पन्दन) उत्पन्न करने वाली, सूक्ष्मरूपिणी — सूक्ष्म रूप वाली
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्थाविवर्जिता।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी॥९७॥
अर्थ वज्रेश्वरी — वज्रेश्वरी देवी, वज्र की अधीश्वरी, वामदेवी — वामदेव (शिव) की शक्ति, वयोऽवस्थाविवर्जिता — आयु की अवस्थाओं (परिवर्तनों) से रहित, सिद्धेश्वरी — सिद्धों की ईश्वरी, सिद्धविद्या — सिद्ध (श्रीविद्या) मन्त्रस्वरूपा, सिद्धमाता — सिद्धों की माता, यशस्विनी — यश एवं कीर्ति से युक्त
विशुद्धिचक्रनिलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना।
खट्वाङ्गादिप्रहरणा वदनैकसमन्विता॥९८॥
अर्थ विशुद्धिचक्रनिलया — विशुद्धि-चक्र में निवास करने वाली, आरक्तवर्णा — किंचित् रक्त (लालिमायुक्त) वर्ण वाली, त्रिलोचना — तीन नेत्रों वाली, खट्वाङ्गादिप्रहरणा — खट्वाङ्ग आदि आयुध धारण करने वाली, वदनैकसमन्विता — एक मुख से युक्त
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोकभयङ्करी।
अमृतादिमहाशक्तिसंवृता डाकिनीश्वरी॥९९॥
अर्थ पायसान्नप्रिया — पायस (खीर) अन्न प्रिय, त्वक्स्था — त्वचा-धातु में स्थित, पशुलोकभयङ्करी — पशु-लोक (बद्ध जीवों) को भयङ्करी, अमृतादिमहाशक्तिसंवृता — अमृता आदि महाशक्तियों से घिरी हुई, डाकिनीश्वरी — विशुद्धि-चक्र की अधिष्ठात्री डाकिनी शक्ति
अनाहताब्जनिलया श्यामाभा वदनद्वया।
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्षमालादिधरा रुधिरसंस्थिता॥१००॥
अर्थ अनाहताब्जनिलया — अनाहत-चक्र के कमल में निवास करने वाली, श्यामाभा — श्याम (नील) कान्ति वाली, वदनद्वया — दो मुख वाली, दंष्ट्रोज्ज्वला — दंष्ट्राओं (दाढ़ों) से उज्ज्वल, अक्षमालादिधरा — अक्षमाला आदि धारण करने वाली, रुधिरसंस्थिता — रुधिर (रक्त) धातु में स्थित
कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता स्निग्धौदनप्रिया।
महावीरेन्द्रवरदा राकिण्यम्बास्वरूपिणी॥१०१॥
अर्थ कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता — कालरात्रि आदि शक्ति-समूह से घिरी हुई, स्निग्धौदनप्रिया — स्निग्ध (घृतयुक्त) अन्न प्रिय, महावीरेन्द्रवरदा — महान् वीरों को वर देने वाली, राकिण्यम्बास्वरूपिणी — अनाहत-चक्र की अधिष्ठात्री राकिणी अम्बा के रूप वाली
मणिपूराब्जनिलया वदनत्रयसंयुता।
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता॥१०२॥
अर्थ मणिपूराब्जनिलया — मणिपूर-चक्र के कमल में निवास करने वाली, वदनत्रयसंयुता — तीन मुखों से युक्त, वज्रादिकायुधोपेता — वज्र आदि आयुधों से युक्त, डामर्यादिभिरावृता — डामरी आदि शक्तियों से घिरी हुई
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्नप्रीतमानसा।
समस्तभक्तसुखदा लाकिन्यम्बास्वरूपिणी॥१०३॥
अर्थ रक्तवर्णा — रक्त (लाल) वर्ण वाली, मांसनिष्ठा — मांस-धातु में स्थित, गुडान्नप्रीतमानसा — गुड़-मिश्रित अन्न से प्रसन्न मन वाली, समस्तभक्तसुखदा — समस्त भक्तों को सुख देने वाली, लाकिन्यम्बास्वरूपिणी — मणिपूर-चक्र की अधिष्ठात्री लाकिनी अम्बा के रूप वाली
स्वाधिष्ठानाम्बुजगता चतुर्वक्त्रमनोहरा।
शूलाद्यायुधसम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता॥१०४॥
अर्थ स्वाधिष्ठानाम्बुजगता — स्वाधिष्ठान-चक्र के कमल में स्थित, चतुर्वक्त्रमनोहरा — चार मुखों से मनोहर, शूलाद्यायुधसम्पन्ना — शूल आदि आयुधों से सम्पन्न, पीतवर्णा — पीत (पीले) वर्ण वाली, अतिगर्विता — अत्यन्त गर्वयुक्त (गरिमामयी)
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादिसमन्विता।
दध्यन्नासक्तहृदया काकिनीरूपधारिणी॥१०५॥
अर्थ मेदोनिष्ठा — मेद-धातु में स्थित, मधुप्रीता — मधु से प्रीति रखने वाली, बन्धिन्यादिसमन्विता — बन्धिनी आदि शक्तियों से युक्त, दध्यन्नासक्तहृदया — दधि-अन्न (दही-भात) में आसक्त हृदय वाली, काकिनीरूपधारिणी — स्वाधिष्ठान-चक्र की अधिष्ठात्री काकिनी के रूप को धारण करने वाली
मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्चवक्त्राऽस्थिसंस्थिता।
अङ्कुशादिप्रहरणा वरदादिनिषेविता॥१०६॥
अर्थ मूलाधाराम्बुजारूढा — मूलाधार-चक्र के कमल पर आरूढ़, पञ्चवक्त्रा — पाँच मुख वाली, अस्थिसंस्थिता — अस्थि-धातु में स्थित, अङ्कुशादिप्रहरणा — अङ्कुश आदि आयुध धारण करने वाली, वरदादिनिषेविता — वरदा आदि शक्तियों से सेवित
मुद्गौदनासक्तचित्ता साकिन्यम्बास्वरूपिणी।
आज्ञाचक्राब्जनिलया शुक्लवर्णा षडानना॥१०७॥
अर्थ मुद्गौदनासक्तचित्ता — मुद्ग (मूँग) अन्न में आसक्त चित्त वाली, साकिन्यम्बास्वरूपिणी — मूलाधार-चक्र की अधिष्ठात्री साकिनी अम्बा के रूप वाली, आज्ञाचक्राब्जनिलया — आज्ञा-चक्र के कमल में निवास करने वाली, शुक्लवर्णा — श्वेत (शुक्ल) वर्ण वाली, षडानना — छह मुख वाली
मज्जासंस्था हंसवतीमुख्यशक्तिसमन्विता।
हरिद्रान्नैकरसिका हाकिनीरूपधारिणी॥१०८॥
अर्थ मज्जासंस्था — मज्जा-धातु में स्थित, हंसवतीमुख्यशक्तिसमन्विता — हंसवती आदि मुख्य शक्तियों से युक्त, हरिद्रान्नैकरसिका — हरिद्रा (हल्दी-युक्त) अन्न में ही रुचि रखने वाली, हाकिनीरूपधारिणी — आज्ञा-चक्र की अधिष्ठात्री हाकिनी के रूप को धारण करने वाली
सहस्रदलपद्मस्था सर्ववर्णोपशोभिता।
सर्वायुधधरा शुक्लसंस्थिता सर्वतोमुखी॥१०९॥
अर्थ सहस्रदलपद्मस्था — सहस्रदल कमल (सहस्रार) में स्थित, सर्ववर्णोपशोभिता — समस्त वर्णों (अक्षरों) से सुशोभित, सर्वायुधधरा — समस्त आयुध धारण करने वाली, शुक्लसंस्थिता — शुक्र (शुक्ल) धातु में स्थित, सर्वतोमुखी — सब ओर मुख वाली
सर्वौदनप्रीतचित्ता याकिन्यम्बास्वरूपिणी।
स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा॥११०॥
अर्थ सर्वौदनप्रीतचित्ता — सभी प्रकार के अन्न से प्रसन्न चित्त वाली, याकिन्यम्बास्वरूपिणी — सहस्रार की अधिष्ठात्री याकिनी अम्बा के रूप वाली, स्वाहा — देव-यज्ञ की आहुति-मन्त्र स्वाहा स्वरूपा, स्वधा — पितृ-यज्ञ की आहुति-मन्त्र स्वधा स्वरूपा, अमतिः — बुद्धि से परे (अमति) अवस्था स्वरूपा, मेधा — धारणा-शक्ति (मेधा) स्वरूपा, श्रुतिः — श्रुति (वेद) स्वरूपा, स्मृतिः — स्मृति (शास्त्र) स्वरूपा, अनुत्तमा — जिससे श्रेष्ठ कोई नहीं, परम अनुत्तमा
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवणकीर्तना।
पुलोमजार्चिता बन्धमोचनी बन्धुरालका॥१११॥
अर्थ पुण्यकीर्तिः — जिनकी कीर्ति परम पवित्र है, पुण्यलभ्या — पुण्य के द्वारा ही प्राप्त होने वाली, पुण्यश्रवणकीर्तना — जिनका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायक है, पुलोमजार्चिता — पुलोमजा (शची, इन्द्राणी) द्वारा पूजित, बन्धमोचनी — संसार के बन्धनों से मुक्त करने वाली, बन्धुरालका — सुन्दर घुँघराले केशों वाली
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादिजगत्प्रसूः।
सर्वव्याधिप्रशमनी सर्वमृत्युनिवारिणी॥११२॥
अर्थ विमर्शरूपिणी — विमर्श (आत्म-चेतना) स्वरूपा, विद्या — परा विद्या-स्वरूपा, वियदादिजगत्प्रसूः — आकाश आदि पंचभूतों सहित जगत् की जननी, सर्वव्याधिप्रशमनी — समस्त रोगों को शान्त करने वाली, सर्वमृत्युनिवारिणी — समस्त मृत्यु का निवारण करने वाली
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मषनाशिनी।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्षनिषेविता॥११३॥
अर्थ अग्रगण्या — सबमें अग्रगण्य, सर्वप्रथम गणनीय, अचिन्त्यरूपा — जिनका स्वरूप चिन्तन से परे है, कलिकल्मषनाशिनी — कलियुग के पापों का नाश करने वाली, कात्यायनी — कात्यायन ऋषि के यहाँ प्रकट देवी दुर्गा-स्वरूपा, कालहन्त्री — काल (मृत्यु, यम) का संहार करने वाली, कमलाक्षनिषेविता — कमलाक्ष (विष्णु) द्वारा सेवित
ताम्बूलपूरितमुखी दाडिमीकुसुमप्रभा।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी॥११४॥
अर्थ ताम्बूलपूरितमुखी — जिनका मुख ताम्बूल (पान) से पूरित है, दाडिमीकुसुमप्रभा — अनार के फूल-सी कान्ति वाली, मृगाक्षी — मृग-सी सुन्दर आँखों वाली, मोहिनी — समस्त जगत् को मोहित करने वाली, मुख्या — सबमें मुख्य, प्रधान, मृडानी — मृड (शिव) की पत्नी, मित्ररूपिणी — सबकी सखा (मित्र)-स्वरूपा
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी।
मैत्र्यादिवासनालभ्या महाप्रलयसाक्षिणी॥११५॥
अर्थ नित्यतृप्ता — सदा तृप्त, नित्य पूर्णकाम, भक्तनिधिः — भक्तों की निधि (कोष), नियन्त्री — सबका नियमन और नियन्त्रण करने वाली, निखिलेश्वरी — समस्त की ईश्वरी, मैत्र्यादिवासनालभ्या — मैत्री आदि भावनाओं के अभ्यास से प्राप्य, महाप्रलयसाक्षिणी — महाप्रलय की साक्षी
परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघनरूपिणी।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृकावर्णरूपिणी॥११६॥
अर्थ पराशक्तिः — परम (सर्वोच्च) शक्ति-स्वरूपा, परानिष्ठा — परम निष्ठा (चरम आधार व लक्ष्य) स्वरूपा, प्रज्ञानघनरूपिणी — घनीभूत शुद्ध प्रज्ञान (चैतन्य) स्वरूपा, माध्वीपानालसा — मधुर मद्य (माध्वी) के पान से अलसाई हुई, मत्ता — आनन्द में मत्त, उन्मत्त, मातृकावर्णरूपिणी — मातृका-वर्णों (अक्षरमाला) स्वरूपा
महाकैलासनिलया मृणालमृदुदोर्लता।
महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्यशालिनी॥११७॥
अर्थ महाकैलासनिलया — महाकैलास में निवास करने वाली, मृणालमृदुदोर्लता — कमलनाल-सी कोमल भुजलताओं वाली, महनीया — परम पूज्य, आदरणीय, दयामूर्तिः — करुणा की साक्षात् मूर्ति, महासाम्राज्यशालिनी — महान् साम्राज्य से सुशोभित
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता।
श्रीषोडशाक्षरीविद्या त्रिकूटा कामकोटिका॥११८॥
अर्थ आत्मविद्या — आत्मज्ञान-स्वरूपा, महाविद्या — महान् विद्या-स्वरूपा, श्रीविद्या — श्रीविद्या-स्वरूपा, कामसेविता — कामदेव द्वारा सेवित व उपासित, श्रीषोडशाक्षरीविद्या — श्री षोडशाक्षरी विद्या (मन्त्र) स्वरूपा, त्रिकूटा — तीन कूटों (मन्त्र-खण्डों) वाली, कामकोटिका — कामकोटि (जहाँ समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं) स्वरूपा
कटाक्षकिङ्करीभूतकमलाकोटिसेविता।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्रधनुःप्रभा॥११९॥
अर्थ कटाक्षकिङ्करीभूतकमलाकोटिसेविता — जिनके कटाक्ष से किंकरी बनी करोड़ों लक्ष्मियों द्वारा सेवित, शिरःस्थिता — मस्तक (सहस्रार) में स्थित, चन्द्रनिभा — चन्द्रमा के समान कान्ति वाली, भालस्थेन्द्रधनुःप्रभा — ललाट पर इन्द्रधनुष-सी प्रभा वाली
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तरदीपिका।
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञविनाशिनी॥१२०॥
अर्थ हृदयस्था — हृदय (अनाहत) में स्थित, रविप्रख्या — सूर्य के समान तेजस्वी, त्रिकोणान्तरदीपिका — त्रिकोण के भीतर दीपक-सी प्रकाशमान, दाक्षायणी — दक्ष की पुत्री (सती), दैत्यहन्त्री — दैत्यों का संहार करने वाली, दक्षयज्ञविनाशिनी — दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाली
दरान्दोलितदीर्घाक्षी दरहासोज्ज्वलन्मुखी।
गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः॥१२१॥
अर्थ दरान्दोलितदीर्घाक्षी — किंचित् चंचल लम्बे नेत्रों वाली, दरहासोज्ज्वलन्मुखी — मन्द मुस्कान से उज्ज्वल मुख वाली, गुरुमूर्तिः — गुरु-स्वरूपा, गुणनिधिः — समस्त शुभ गुणों की निधि, गोमाता — गौओं की और वाणी की माता, गुहजन्मभूः — गुह (कार्तिकेय) की जन्मभूमि व जननी
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाशरूपिणी।
प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिता॥१२२॥
अर्थ देवेशी — देवताओं की ईश्वरी, दण्डनीतिस्था — दण्डनीति (न्यायशासन) में स्थित, दहराकाशरूपिणी — हृदय के दहराकाश (सूक्ष्म आकाश) स्वरूपा, प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिता — प्रतिपदा से पूर्णिमा (राका) पर्यन्त तिथि-मण्डल (नित्या देवियों) द्वारा पूजित
कलात्मिका कलानाथा काव्यालापविनोदिनी।
सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता॥१२३॥
अर्थ कलात्मिका — समस्त कलाओं की आत्मा-स्वरूपा, कलानाथा — कलाओं की स्वामिनी, काव्यालापविनोदिनी — काव्य-आलाप में आनन्द लेने वाली, सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता — चँवर लिए रमा (लक्ष्मी) व वाणी (सरस्वती) द्वारा बाएँ-दाएँ सेवित
आदिशक्तिरमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः।
अनेककोटिब्रह्माण्डजननी दिव्यविग्रहा॥१२४॥
अर्थ आदिशक्तिः — आदि (मूल) शक्ति-स्वरूपा, अमेयात्मा — अप्रमेय (अमाप) आत्मा वाली, परमा — परम (सर्वोच्च) तत्त्व-स्वरूपा, पावनाकृतिः — पवित्र करने वाली आकृति (स्वरूप) वाली, अनेककोटिब्रह्माण्डजननी — अनेक करोड़ ब्रह्माण्डों की जननी, दिव्यविग्रहा — दिव्य विग्रह (शरीर) वाली
क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्यपददायिनी।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी॥१२५॥
अर्थ क्लींकारी — क्लीं-बीज (कामबीज) स्वरूपा, केवला — केवल (शुद्ध, असंग) तत्त्व-स्वरूपा, गुह्या — गुह्य (गोपनीय, रहस्यमयी), कैवल्यपददायिनी — कैवल्य (मोक्ष) पद प्रदान करने वाली, त्रिपुरा — त्रिपुरा (तीन पुरों व अवस्थाओं की अधीश्वरी), त्रिजगद्वन्द्या — तीनों लोकों द्वारा वन्दनीय, त्रिमूर्तिः — त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) स्वरूपा, त्रिदशेश्वरी — त्रिदश (देवताओं) की ईश्वरी
त्र्यक्षरी दिव्यगन्धाढ्या सिन्दूरतिलकाञ्चिता।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्वसेविता॥१२६॥
अर्थ त्र्यक्षरी — तीन बीजाक्षरों (ऐं ह्रीं श्रीं) स्वरूपा, दिव्यगन्धाढ्या — दिव्य सुगन्ध से युक्त, सिन्दूरतिलकाञ्चिता — सिन्दूर के तिलक से सुशोभित, उमा — देवी उमा, शैलेन्द्रतनया — पर्वतराज हिमवान् की पुत्री, गौरी — गौर वर्ण वाली, शिव-पत्नी पार्वती, गन्धर्वसेविता — गन्धर्वों द्वारा सेवित
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी।
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा॥१२७॥
अर्थ विश्वगर्भा — जिसके गर्भ में समस्त विश्व स्थित है, स्वर्णगर्भा — हिरण्यगर्भ (सुवर्णमय ब्रह्माण्ड) की जननी, अवरदा — श्रेष्ठ वरदान देने वाली, वागधीश्वरी — वाणी की अधीश्वरी, ध्यानगम्या — केवल ध्यान से प्राप्य, अपरिच्छेद्या — जो देश-काल आदि से विभाजित/परिमित नहीं की जा सकती, ज्ञानदा — ज्ञान प्रदान करने वाली, ज्ञानविग्रहा — ज्ञान की मूर्तिमती स्वरूपा
सर्ववेदान्तसंवेद्या सत्यानन्दस्वरूपिणी।
लोपामुद्रार्चिता लीलाकॢप्तब्रह्माण्डमण्डला॥१२८॥
अर्थ सर्ववेदान्तसंवेद्या — समस्त वेदान्त द्वारा ज्ञेय, सत्यानन्दस्वरूपिणी — सत्य एवं आनन्द स्वरूपा, लोपामुद्रार्चिता — ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा द्वारा पूजित, लीलाकॢप्तब्रह्माण्डमण्डला — लीलामात्र से ब्रह्माण्ड-समूह की रचना करने वाली
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा॥१२९॥
अर्थ अदृश्या — इन्द्रियों से अगोचर, न देखी जाने वाली, दृश्यरहिता — जिसके लिए कोई दृश्य विषय शेष नहीं, विज्ञात्री — सबकी ज्ञाता (सर्वसाक्षी), वेद्यवर्जिता — जिससे भिन्न कोई ज्ञेय शेष नहीं, योगिनी — योगयुक्ता, योगेश्वरी, योगदा — योग (परमात्म-मिलन) प्रदान करने वाली, योग्या — योग द्वारा प्राप्त होने के योग्य, योगानन्दा — योग से उत्पन्न आनन्द स्वरूपा, युगन्धरा — युगों (कालचक्र) को धारण करने वाली
इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूपधारिणी॥१३०॥
अर्थ इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी — इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया — तीनों शक्तियों स्वरूपा, सर्वाधारा — समस्त सृष्टि की आधारभूता, सुप्रतिष्ठा — सुदृढ़ प्रतिष्ठित, सर्वश्रेष्ठ अधिष्ठान, सदसद्रूपधारिणी — सत् (कारण) एवं असत् (कार्य) दोनों रूप धारण करने वाली
अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्राविधायिनी।
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता॥१३१॥
अर्थ अष्टमूर्तिः — आठ मूर्तियों (पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्र, यजमान) रूपा, अजाजैत्री — अजा (माया/अविद्या) को जीतने वाली, लोकयात्राविधायिनी — संसार-यात्रा (लोक-व्यवहार) का संचालन करने वाली, एकाकिनी — अद्वितीय, एकमात्र स्वरूपा, भूमरूपा — भूमा (अनन्त पूर्णता) स्वरूपा, निर्द्वैता — द्वैत-रहित, अद्वैत स्वरूपा, द्वैतवर्जिता — द्वैत-भाव से सर्वथा रहित
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया॥१३२॥
अर्थ अन्नदा — अन्न प्रदान करने वाली, वसुदा — धन-सम्पत्ति प्रदान करने वाली, वृद्धा — सर्वप्राचीना, अनादि, ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी — ब्रह्म एवं जीवात्मा की एकता स्वरूपा, बृहती — महती, विशाल (बृहती छन्द रूपा), ब्राह्मणी — ब्रह्म से सम्बन्धित शक्ति, ब्रह्मा-पत्नी, ब्राह्मी — ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मी, ब्रह्मानन्दा — ब्रह्म-आनन्द स्वरूपा, बलिप्रिया — बलि (उपहार-अर्पण) से प्रसन्न होने वाली
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभावविवर्जिता।
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः॥१३३॥
अर्थ भाषारूपा — समस्त भाषा/वाणी स्वरूपा, बृहत्सेना — विशाल सेना वाली, भावाभावविवर्जिता — भाव (सत्ता) एवं अभाव दोनों से रहित, सुखाराध्या — सुगमता से आराधन योग्य, शुभकरी — कल्याण/मंगल करने वाली, शोभना — परम शोभायुक्त, सुन्दरी, सुलभागतिः — जो सहज ही प्राप्य आश्रय/गति है
राजराजेश्वरी राज्यदायिनी राज्यवल्लभा।
राजत्कृपा राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता॥१३४॥
अर्थ राजराजेश्वरी — राजाधिराजों की भी अधीश्वरी, राज्यदायिनी — राज्य (साम्राज्य) प्रदान करने वाली, राज्यवल्लभा — राज्य की रक्षिका एवं प्रिया, राजत्कृपा — जिसकी कृपा सदा देदीप्यमान रहती है, राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता — अपने आश्रितों को राजसिंहासन पर स्थापित करने वाली
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्गबलेश्वरी।
साम्राज्यदायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला॥१३५॥
अर्थ राज्यलक्ष्मीः — राज्य की समृद्धि-रूपा लक्ष्मी, कोशनाथा — राजकोष (भण्डार) की स्वामिनी, चतुरङ्गबलेश्वरी — चतुरंगिणी सेना की अधीश्वरी, साम्राज्यदायिनी — साम्राज्य (सार्वभौम सत्ता) प्रदान करने वाली, सत्यसन्धा — सत्य-प्रतिज्ञा वाली, वचन की पक्की, सागरमेखला — समुद्र जिसकी करधनी है (पृथ्वी-रूपा)
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोकवशङ्करी।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्दरूपिणी॥१३६॥
अर्थ दीक्षिता — दीक्षा प्राप्त/संस्कारयुक्त, दैत्यशमनी — दैत्यों का शमन (नाश) करने वाली, सर्वलोकवशङ्करी — समस्त लोकों को वश में करने वाली, सर्वार्थदात्री — समस्त अभीष्ट अर्थ (प्रयोजन) प्रदान करने वाली, सावित्री — सूर्य-शक्ति/वेदमाता सावित्री, सच्चिदानन्दरूपिणी — सत्-चित्-आनन्द स्वरूपा
देशकालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी॥१३७॥
अर्थ देशकालापरिच्छिन्ना — देश एवं काल से अपरिच्छिन्न (असीम), सर्वगा — सर्वत्र व्याप्त, सर्वमोहिनी — समस्त जगत् को मोहित करने वाली, सरस्वती — वाणी एवं विद्या की देवी सरस्वती, शास्त्रमयी — समस्त शास्त्र-स्वरूपा, गुहाम्बा — गुह (कार्तिकेय) की माता, गुह्यरूपिणी — गुह्य (गूढ़/रहस्यमय) स्वरूपा
सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता सदाशिवपतिव्रता।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डलरूपिणी॥१३८॥
अर्थ सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता — समस्त उपाधियों से सर्वथा मुक्त, सदाशिवपतिव्रता — सदाशिव को पति रूप में वरण करने वाली पतिव्रता, सम्प्रदायेश्वरी — गुरु-परम्परा (सम्प्रदाय) की अधीश्वरी, साध्वी — साध्वी, परम पतिव्रता, गुरुमण्डलरूपिणी — गुरु-मण्डल (गुरु-परम्परा समूह) स्वरूपा
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया॥१३९॥
अर्थ कुलोत्तीर्णा — कुल (कौल-मार्ग/परम्परा) से परे स्थित, भगाराध्या — भग (ऐश्वर्यादि षड्गुण) रूप में आराधित, माया — जगत्-रचयित्री माया-शक्ति, मधुमती — मधुर स्वरूपा (योग की मधुमती भूमि), मही — पृथ्वी-रूपा, महती, गणाम्बा — शिव-गणों की माता, गुह्यकाराध्या — गुह्यकों (देवयोनि) द्वारा आराधित, कोमलाङ्गी — कोमल अंगों वाली, गुरुप्रिया — गुरु (शिव) की प्रिया
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्तिरूपिणी।
सनकादिसमाराध्या शिवज्ञानप्रदायिनी॥१४०॥
अर्थ स्वतन्त्रा — पूर्ण स्वाधीन, किसी पर आश्रित नहीं, सर्वतन्त्रेशी — समस्त तन्त्रों की अधीश्वरी, दक्षिणामूर्तिरूपिणी — गुरुदेव दक्षिणामूर्ति स्वरूपा, सनकादिसमाराध्या — सनक आदि ऋषियों द्वारा समाराधित, शिवज्ञानप्रदायिनी — शिव-ज्ञान (आत्मज्ञान) प्रदान करने वाली
चित्कलाऽऽनन्दकलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी।
नामपारायणप्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी॥१४१॥
अर्थ चित्कला — चैतन्य की कला-स्वरूपा, आनन्दकलिका — आनन्द की खिलती हुई कलिका-स्वरूपा, प्रेमरूपा — शुद्ध प्रेम स्वरूपा, प्रियङ्करी — भक्तों का प्रिय (कल्याण) करने वाली, नामपारायणप्रीता — नाम-पारायण (सहस्रनाम पाठ) से प्रसन्न होने वाली, नन्दिविद्या — नन्दिविद्या (मन्त्र के एक रूप) स्वरूपा, नटेश्वरी — नटेश्वर (नर्तक शिव) की अधीश्वरी
मिथ्याजगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता॥१४२॥
अर्थ मिथ्याजगदधिष्ठाना — मिथ्या (आभासी) जगत् की अधिष्ठान-भूता, मुक्तिदा — मुक्ति प्रदान करने वाली, मुक्तिरूपिणी — मुक्ति (मोक्ष) स्वरूपा, लास्यप्रिया — लास्य-नृत्य में प्रीति रखने वाली, लयकरी — प्रलय (संहार) करने वाली, लज्जा — लज्जा (ह्रीँ) तत्त्व स्वरूपा, रम्भादिवन्दिता — रम्भा आदि अप्सराओं से वन्दित
भवदावसुधावृष्टिः पापारण्यदवानला।
दौर्भाग्यतूलवातूला जराध्वान्तरविप्रभा॥१४३॥
अर्थ भवदावसुधावृष्टिः — संसाररूपी दावाग्नि पर अमृत की वर्षा करने वाली, पापारण्यदवानला — पापरूपी वन को भस्म करने वाली दावाग्नि, दौर्भाग्यतूलवातूला — दुर्भाग्यरूपी रुई को उड़ा देने वाली प्रचण्ड वायु, जराध्वान्तरविप्रभा — जरारूपी अन्धकार को दूर करने वाली सूर्य-प्रभा
भाग्याब्धिचन्द्रिका भक्तचित्तकेकिघनाघना।
रोगपर्वतदम्भोलिर्मृत्युदारुकुठारिका॥१४४॥
अर्थ भाग्याब्धिचन्द्रिका — भाग्यरूपी समुद्र को उल्लसित करने वाली चन्द्रिका, भक्तचित्तकेकिघनाघना — भक्त-चित्तरूपी मयूर को हर्षित करने वाला घनघोर मेघ, रोगपर्वतदम्भोलिः — रोगरूपी पर्वत को चूर करने वाला वज्र, मृत्युदारुकुठारिका — मृत्युरूपी वृक्ष को काटने वाली कुठारी
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी॥१४५॥
अर्थ महेश्वरी — महेश्वर (शिव) की शक्ति, परमेश्वरी, महाकाली — प्रलयकालिक महाकाली-स्वरूपा, महाग्रासा — प्रलय में समस्त का महाग्रास करने वाली, महाशना — सर्वभक्षिणी, महान् भोजन करने वाली, अपर्णा — पत्ते तक न खाकर तप करने वाली पार्वती, चण्डिका — उग्र चण्डिका-स्वरूपा, चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी — चण्ड और मुण्ड नामक असुरों का संहार करने वाली
क्षराक्षरात्मिका सर्वलोकेशी विश्वधारिणी।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका॥१४६॥
अर्थ क्षराक्षरात्मिका — क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) दोनों स्वरूपा, सर्वलोकेशी — समस्त लोकों की अधीश्वरी, विश्वधारिणी — समस्त विश्व को धारण करने वाली, त्रिवर्गदात्री — धर्म-अर्थ-काम (त्रिवर्ग) प्रदान करने वाली, सुभगा — परम सौभाग्यशालिनी, त्र्यम्बका — तीन नेत्रों वाली, त्रिगुणात्मिका — सत्त्व-रज-तम त्रिगुण स्वरूपा
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्पनिभाकृतिः।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता॥१४७॥
अर्थ स्वर्गापवर्गदा — स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाली, शुद्धा — नित्य शुद्ध, निर्मल स्वरूपा, जपापुष्पनिभाकृतिः — जपा (गुड़हल) पुष्प के समान अरुण कान्ति वाली, ओजोवती — ओज (तेज व बल) से सम्पन्न, द्युतिधरा — दिव्य कान्ति धारण करने वाली, यज्ञरूपा — यज्ञ-स्वरूपा, प्रियव्रता — व्रत-नियम जिसे प्रिय हैं
दुराराध्या दुराधर्षा पाटलीकुसुमप्रिया।
महती मेरुनिलया मन्दारकुसुमप्रिया॥१४८॥
अर्थ दुराराध्या — जिसकी आराधना कठिन है, दुराधर्षा — जिसका सामना व तिरस्कार असम्भव है, पाटलीकुसुमप्रिया — पाटली-पुष्प जिसे प्रिय है, महती — परम महान् स्वरूपा, मेरुनिलया — सुमेरु पर्वत निवासिनी, मन्दारकुसुमप्रिया — मन्दार-पुष्प जिसे प्रिय है
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी।
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी॥१४९॥
अर्थ वीराराध्या — वीराचार साधकों द्वारा आराध्य, विराड्रूपा — विराट् (विश्वरूप) स्वरूपा, विरजा — रज व मल से रहित निर्मला, विश्वतोमुखी — सर्वत्र मुख वाली, सर्वदर्शिनी, प्रत्यग्रूपा — अन्तरात्मा (प्रत्यक् चैतन्य) स्वरूपा, पराकाशा — परम आकाश (चिदाकाश) स्वरूपा, प्राणदा — प्राण (जीवन) प्रदान करने वाली, प्राणरूपिणी — प्राण-स्वरूपा
मार्ताण्डभैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः।
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा॥१५०॥
अर्थ मार्ताण्डभैरवाराध्या — मार्ताण्ड-भैरव (सूर्यरूप भैरव) द्वारा आराध्य, मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः — मन्त्रिणी (श्यामला) को राज्य का भार सौंपने वाली, त्रिपुरेशी — त्रिपुर की अधीश्वरी, जयत्सेना — विजयी सेना वाली, निस्त्रैगुण्या — त्रिगुणों से अतीत, निर्गुणा, परापरा — पर और अपर (उभय) स्वरूपा
सत्यज्ञानानन्दरूपा सामरस्यपरायणा।
कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी॥१५१॥
अर्थ सत्यज्ञानानन्दरूपा — सत्-चित्-आनन्द स्वरूपा, सामरस्यपरायणा — शिव-शक्ति के सामरस्य (एकत्व) में निरत, कपर्दिनी — कपर्द (जटाजूट) धारी शिव की शक्ति, कलामाला — समस्त कलाओं की माला स्वरूपा, कामधुक् — कामधेनु सदृश समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाली, कामरूपिणी — इच्छानुसार रूप धारण करने वाली
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा॥१५२॥
अर्थ कलानिधिः — समस्त कलाओं की निधि, काव्यकला — काव्य-कला स्वरूपा, रसज्ञा — समस्त रसों की ज्ञाता, रसास्वादिनी, रसशेवधिः — रस (आनन्द) की निधि, पुष्टा — परिपूर्ण व पुष्ट स्वरूपा, पुरातना — अनादि, पुरातन, सनातनी, पूज्या — सर्वपूज्या, सबकी आराध्या, पुष्करा — समस्त का पोषण करने वाली, पुष्करेक्षणा — कमल के समान नेत्रों वाली
परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा।
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्रविभेदिनी॥१५३॥
अर्थ परंज्योतिः — परम ज्योति (प्रकाश) स्वरूपा, परंधाम — परम धाम (आश्रय) स्वरूपा, परमाणुः — सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमाणु स्वरूपा, परात्परा — पर से भी परे, सर्वोत्कृष्टा, पाशहस्ता — हाथ में पाश धारण करने वाली, पाशहन्त्री — जीव के पाश-बन्धन का नाश करने वाली, परमन्त्रविभेदिनी — शत्रु-प्रयुक्त मन्त्रों को भेदने व निष्फल करने वाली
मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानसहंसिका।
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती॥१५४॥
अर्थ मूर्ता — साकार (मूर्त) रूप वाली, अमूर्ता — निराकार (अमूर्त) स्वरूपा, नित्यतृप्ता — नित्य तृप्त, सदा परितुष्ट, मुनिमानसहंसिका — मुनियों के मानस-सरोवर में विहार करने वाली हंसी, सत्यव्रता — सत्य का व्रत धारण करने वाली, सत्यरूपा — सत्य-स्वरूपा, सर्वान्तर्यामिनी — समस्त प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से स्थित, सती — सत्-स्वरूपा, पतिव्रता सती
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः॥१५५॥
अर्थ ब्रह्माणी — ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी, ब्रह्मजननी — ब्रह्मा व समस्त सृष्टि की जननी, बहुरूपा — अनेक रूप धारण करने वाली, बुधार्चिता — ज्ञानी व विद्वानों द्वारा अर्चित, प्रसवित्री — समस्त सृष्टि को प्रसव करने वाली जननी, प्रचण्डा — अत्यन्त उग्र, प्रचण्ड स्वरूपा, आज्ञा — जिसकी आज्ञा अखण्ड व अप्रतिहत है, प्रतिष्ठा — समस्त की प्रतिष्ठा व आधार स्वरूपा, प्रकटाकृतिः — प्रकट (स्पष्ट) आकृति वाली
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठरूपिणी।
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः॥१५६॥
अर्थ प्राणेश्वरी — समस्त प्राणों की स्वामिनी, प्राणदात्री — समस्त प्राणियों को प्राण देने वाली, पञ्चाशत्पीठरूपिणी — पचास पीठों (पचास वर्णों) के रूप वाली, विशृङ्खला — बन्धन-रहित (श्रृंखलामुक्त), विविक्तस्था — एकान्त (विविक्त) स्थान में स्थित रहने वाली, वीरमाता — वीरों (शूरों) की माता, वियत्प्रसूः — आकाश (वियत्) की जननी
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रहरूपिणी।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्रप्रवर्तिनी॥१५७॥
अर्थ मुकुन्दा — मुक्ति प्रदान करने वाली (मुकुन्द-स्वरूपा), मुक्तिनिलया — मुक्ति का निवास-स्थान, मूलविग्रहरूपिणी — मूल (आदि) विग्रह-स्वरूपा (मूलप्रकृति-रूपा), भावज्ञा — सबके अन्तर्भावों को जानने वाली, भवरोगघ्नी — संसार-रूपी रोग का नाश करने वाली, भवचक्रप्रवर्तिनी — संसार-चक्र को प्रवर्तित करने वाली
छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी।
उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी॥१५८॥
अर्थ छन्दःसारा — वेदों (छन्दों) का सार-स्वरूपा, शास्त्रसारा — समस्त शास्त्रों का सार, मन्त्रसारा — समस्त मन्त्रों का सार, तलोदरी — कृश (पतले) उदर वाली, उदारकीर्तिः — उदार (महान्) कीर्ति वाली, उद्दामवैभवा — असीम (अनियन्त्रित) वैभव वाली, वर्णरूपिणी — अक्षरों (वर्णों) के रूप वाली
जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनी।
सर्वोपनिषदुद्घुष्टा शान्त्यतीतकलात्मिका॥१५९॥
अर्थ जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनी — जन्म, मृत्यु व जरा से संतप्त जनों को विश्रान्ति देने वाली, सर्वोपनिषदुद्घुष्टा — समस्त उपनिषदों द्वारा घोषित (प्रकाशित), शान्त्यतीतकलात्मिका — शान्ति से परे 'शान्त्यतीता' कला-स्वरूपा
गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा।
कल्पनारहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्धविग्रहा॥१६०॥
अर्थ गम्भीरा — अगाध (गम्भीर) स्वरूपा, गगनान्तस्था — आकाश (गगन) के मध्य में स्थित, गर्विता — अपने ऐश्वर्य पर गर्वयुक्ता, गानलोलुपा — संगीत (गान) की प्रेमी, कल्पनारहिता — कल्पना (विकल्प) से रहित, काष्ठा — सर्वोच्च सीमा (परम काष्ठा) रूपा, अकान्ता — अकार-रूप शिव की प्रिया (कान्ता), कान्तार्धविग्रहा — अपने कान्त (शिव) के आधे शरीर वाली (अर्धनारीश्वरी)
कार्यकारणनिर्मुक्ता कामकेलितरङ्गिता।
कनत्कनकताटङ्का लीलाविग्रहधारिणी॥१६१॥
अर्थ कार्यकारणनिर्मुक्ता — कार्य और कारण से मुक्त, कामकेलितरङ्गिता — प्रेम-क्रीड़ा से तरंगायित (आनन्दमग्ना), कनत्कनकताटङ्का — चमकते हुए स्वर्ण-कर्णभूषण (ताटंक) धारण करने वाली, लीलाविग्रहधारिणी — लीला के लिए विग्रह (शरीर) धारण करने वाली
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्रप्रसादिनी।
अन्तर्मुखसमाराध्या बहिर्मुखसुदुर्लभा॥१६२॥
अर्थ अजा — जन्म-रहित (अजन्मा), क्षयविनिर्मुक्ता — क्षय (नाश) से पूर्णतः मुक्त, मुग्धा — मनोहर सौन्दर्य वाली (सरल-सुन्दरी), क्षिप्रप्रसादिनी — शीघ्र प्रसन्न होकर कृपा करने वाली, अन्तर्मुखसमाराध्या — अन्तर्मुख (आत्मनिष्ठ) जनों द्वारा भली-भाँति आराध्य, बहिर्मुखसुदुर्लभा — बहिर्मुख (विषयासक्त) जनों के लिए अति दुर्लभ
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः॥१६३॥
अर्थ त्रयी — तीनों वेद-स्वरूपा, त्रिवर्गनिलया — धर्म, अर्थ, काम — त्रिवर्ग का आश्रय, त्रिस्था — तीनों (अवस्थाओं/शक्तियों) में स्थित, त्रिपुरमालिनी — त्रिपुरमालिनी (त्रिपुरा की माला-रूप देवी), निरामया — रोग-रहित (निर्दोष), निरालम्बा — किसी आधार से रहित (स्वयं-आश्रिता), स्वात्मारामा — अपने ही आत्मा में रमण करने वाली, सुधासृतिः — अमृत की धारा-स्वरूपा
संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डिता।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमानस्वरूपिणी॥१६४॥
अर्थ संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डिता — संसार-रूपी पंक में डूबे जनों के उद्धार में कुशल, यज्ञप्रिया — यज्ञ से प्रेम करने वाली, यज्ञकर्त्री — यज्ञ का सम्पादन करने वाली, यजमानस्वरूपिणी — यजमान के स्वरूप वाली
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्यविवर्धिनी।
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमणकारिणी॥१६५॥
अर्थ धर्माधारा — धर्म की आधार-स्वरूपा, धनाध्यक्षा — धन की अध्यक्षा (अधिष्ठात्री), धनधान्यविवर्धिनी — धन-धान्य की वृद्धि करने वाली, विप्रप्रिया — ब्राह्मणों (विप्रों) की प्रिय, विप्ररूपा — ब्राह्मणों के रूप वाली, विश्वभ्रमणकारिणी — विश्व को भ्रमण कराने वाली (जगत्-चक्र चलाने वाली)
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी।
अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी॥१६६॥
अर्थ विश्वग्रासा — प्रलय में विश्व को ग्रस लेने वाली, विद्रुमाभा — मूँगे (विद्रुम) के समान आभा वाली, वैष्णवी — विष्णु की शक्ति-स्वरूपा, विष्णुरूपिणी — विष्णु के रूप वाली, अयोनिः — जिसका कोई उद्गम (योनि) नहीं (अजन्मा), योनिनिलया — सबके मूल कारण (योनि) में निवास करने वाली, कूटस्था — अविकारी रूप से अटल स्थित रहने वाली, कुलरूपिणी — कुल (कौल परम्परा/शिव-शक्ति समूह) के रूप वाली
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना॥१६७॥
अर्थ वीरगोष्ठीप्रिया — वीरों की गोष्ठी (सभा) से प्रेम करने वाली, वीरा — शौर्यमयी (वीर-स्वरूपा), नैष्कर्म्या — निष्कर्मता (कर्म-रहितता) में स्थित, नादरूपिणी — नाद (आदि ध्वनि) के रूप वाली, विज्ञानकलना — विशिष्ट ज्ञान की प्रेरयित्री (उद्भाविका), कल्या — सदा मंगलमयी (सुदृढ़), विदग्धा — निपुण एवं चतुर (रसज्ञा), बैन्दवासना — बिन्दु (श्रीचक्र के केन्द्रबिन्दु) पर आसीन
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थस्वरूपिणी।
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिवकुटुम्बिनी॥१६८॥
अर्थ तत्त्वाधिका — समस्त तत्त्वों से परे (अधिक), तत्त्वमयी — समस्त तत्त्वों से युक्त (तत्त्व-स्वरूपा), तत्त्वमर्थस्वरूपिणी — 'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थ-स्वरूपा, सामगानप्रिया — सामवेद के गान से प्रेम करने वाली, सौम्या — सौम्य एवं शान्त (चन्द्रवत् मनोहर), सदाशिवकुटुम्बिनी — सदाशिव की गृहिणी (पत्नी)
सव्यापसव्यमार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता॥१६९॥
अर्थ सव्यापसव्यमार्गस्था — दक्षिण (सव्य) और वाम (अपसव्य) दोनों मार्गों में स्थित, सर्वापद्विनिवारिणी — समस्त आपत्तियों का निवारण करने वाली, स्वस्था — अपने स्वरूप (आत्मा) में स्थित, स्वभावमधुरा — स्वभाव से ही मधुर, धीरा — धैर्यवती एवं विवेकशीला, धीरसमर्चिता — धीर (विवेकी) जनों द्वारा भली-भाँति पूजित
चैतन्यार्घ्यसमाराध्या चैतन्यकुसुमप्रिया।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्यपाटला॥१७०॥
अर्थ चैतन्यार्घ्यसमाराध्या — चैतन्य-रूपी अर्घ्य से आराध्य, चैतन्यकुसुमप्रिया — चैतन्य-रूपी पुष्प से प्रसन्न होने वाली, सदोदिता — सदा उदित (नित्य प्रकाशमान), सदातुष्टा — सदा सन्तुष्ट रहने वाली, तरुणादित्यपाटला — उदीयमान (तरुण) सूर्य के समान अरुण-आभा वाली
दक्षिणादक्षिणाराध्या दरस्मेरमुखाम्बुजा।
कौलिनीकेवलाऽनर्घ्यकैवल्यपददायिनी॥१७१॥
अर्थ दक्षिणा — यज्ञ की दक्षिणास्वरूपा एवं परम उदार (दक्ष), दक्षिणाराध्या — दक्षिणामूर्ति (शिवगुरु) द्वारा आराधित, दरस्मेरमुखाम्बुजा — जिनका मुखकमल मन्द मुस्कान से युक्त है, कौलिनी — कौल-मार्ग (कुल-सम्प्रदाय) की अधिष्ठात्री देवी, केवला — केवल (अद्वितीय, निरपेक्ष) स्वरूपा, अनर्घ्यकैवल्यपददायिनी — अमूल्य कैवल्य-पद (मोक्ष) प्रदान करने वाली
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुतिसंस्तुतवैभवा।
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः॥१७२॥
अर्थ स्तोत्रप्रिया — स्तोत्रों (स्तुति) से प्रसन्न होने वाली, स्तुतिमती — स्तुति-स्वरूपा, स्तुति के योग्य, श्रुतिसंस्तुतवैभवा — जिनकी महिमा वेदों (श्रुति) द्वारा गाई गई है, मनस्विनी — उत्तम मन वाली, बुद्धिमती, मानवती — मान (गौरव) से युक्त, महेशी — महेश्वरी — महेश (शिव) की शक्ति, मङ्गलाकृतिः — मंगलमयी (शुभ) आकृति वाली
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी॥१७३॥
अर्थ विश्वमाता — समस्त विश्व की माता, जगद्धात्री — जगत् को धारण एवं पोषण करने वाली, विशालाक्षी — विशाल (बड़े) नेत्रों वाली, विरागिणी — राग-रहित (वैराग्ययुक्त), प्रगल्भा — प्रगल्भ (निर्भीक एवं दक्ष), परमोदारा — परम उदार (महान् दानशील), परामोदा — परम आनन्दमयी, मनोमयी — मनोमय (मन-स्वरूपा)
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी।
पञ्चयज्ञप्रिया पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनी॥१७४॥
अर्थ व्योमकेशी — आकाशरूपी केशों वाली (व्योमकेश शिव की शक्ति), विमानस्था — विमान (दिव्य रथ) में स्थित, वज्रिणी — वज्रधारिणी (वज्रसदृश दृढ़), वामकेश्वरी — वामकेश्वर-तन्त्र की अधीश्वरी, पञ्चयज्ञप्रिया — पञ्च-यज्ञों से प्रसन्न होने वाली, पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनी — पञ्च-प्रेतों (ब्रह्मा आदि पाँच) से बने मञ्च पर शयन करने वाली
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्चसंख्योपचारिणी।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी॥१७५॥
अर्थ पञ्चमी — पञ्चमी — पाँच (ब्रह्मादि) के ऊपर स्थित पाँचवीं शक्ति, पञ्चभूतेशी — पञ्च महाभूतों की अधीश्वरी, पञ्चसंख्योपचारिणी — पाँच उपचारों (पञ्चोपचार) से पूजित, शाश्वती — शाश्वत (नित्य) स्वरूपा, शाश्वतैश्वर्या — जिनका ऐश्वर्य नित्य (अविनाशी) है, शर्मदा — सुख (शर्म) प्रदान करने वाली, शम्भुमोहिनी — शम्भु (शिव) को मोहित करने वाली
धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका॥१७६॥
अर्थ धराधरसुता — पर्वतराज (हिमवान्) की पुत्री, धन्या — धन्य (कृतार्थ, सौभाग्यशालिनी), धर्मिणी — धर्म-परायणा (धर्मयुक्ता), धर्मवर्धिनी — धर्म की वृद्धि करने वाली, लोकातीता — समस्त लोकों से परे, गुणातीता — त्रिगुणों से अतीत, सर्वातीता — सबसे परे (सर्वातीत), शमात्मिका — शान्ति (शम) स्वरूपा
बन्धूककुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी।
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी॥१७७॥
अर्थ बन्धूककुसुमप्रख्या — बन्धूक (लाल) पुष्प के समान कान्तिमयी, बाला — बाला (सदा नवयौवना; बाला-देवी), लीलाविनोदिनी — लीला (सृष्टि-क्रीड़ा) में आनन्द लेने वाली, सुमङ्गली — सौभाग्यवती, परम मंगलमयी, सुखकरी — सुख प्रदान करने वाली, सुवेषाढ्या — सुन्दर वेष (सजावट) से सम्पन्न, सुवासिनी — सुवासिनी (सौभाग्यवती स्त्री-स्वरूपा)
सुवासिन्यर्चनप्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा।
बिन्दुतर्पणसन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका॥१७८॥
अर्थ सुवासिन्यर्चनप्रीता — सुवासिनियों की पूजा से प्रसन्न होने वाली, आशोभना — सर्वथा सुशोभित (परम सुन्दरी), शुद्धमानसा — शुद्ध (निर्मल) मन वाली, बिन्दुतर्पणसन्तुष्टा — बिन्दु (श्रीचक्र-केन्द्र) में किए तर्पण से सन्तुष्ट, पूर्वजा — सबसे पूर्व उत्पन्न (आदि) स्वरूपा, त्रिपुराम्बिका — त्रिपुरा-अम्बिका (त्रिपुरा की माता-स्वरूपा)
दशमुद्रासमाराध्या त्रिपुराश्रीवशङ्करी।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणी॥१७९॥
अर्थ दशमुद्रासमाराध्या — दस मुद्राओं द्वारा भली-भाँति आराधित, त्रिपुराश्रीवशङ्करी — त्रिपुरा की श्री (ऐश्वर्य) को वश में कराने वाली, वशीकरण-प्रदा, ज्ञानमुद्रा — ज्ञानमुद्रा-स्वरूपा, ज्ञानगम्या — ज्ञान द्वारा प्राप्य (जानने योग्य), ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणी — ज्ञान एवं ज्ञेय दोनों स्वरूपा
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा।
अनघाऽद्भुतचारित्रा वाञ्छितार्थप्रदायिनी॥१८०॥
अर्थ योनिमुद्रा — योनिमुद्रा-स्वरूपा, त्रिखण्डेशी — त्रिखण्डा मुद्रा की अधीश्वरी, त्रिगुणाम्बा — तीनों गुणों की जननी (माता), त्रिकोणगा — त्रिकोण (श्रीचक्र के मध्य त्रिकोण) में स्थित, अनघा — निष्पाप (निर्दोष) स्वरूपा, अद्भुतचारित्रा — अद्भुत चरित्र (लीलाओं) वाली, वाञ्छितार्थप्रदायिनी — इच्छित (वाञ्छित) पदार्थों को प्रदान करने वाली
अभ्यासातिशयज्ञाता षडध्वातीतरूपिणी।
अव्याजकरुणामूर्तिरज्ञानध्वान्तदीपिका॥१८१॥
अर्थ अभ्यासातिशयज्ञाता — अत्यधिक अभ्यास (साधना) से ज्ञात होने वाली, षडध्वातीतरूपिणी — षट् अध्वाओं (छह मार्गों) से अतीत स्वरूपा, अव्याजकरुणामूर्तिः — निष्कपट (हेतुरहित) करुणा की मूर्ति, अज्ञानध्वान्तदीपिका — अज्ञान-रूपी अन्धकार को दूर करने वाली दीपिका
आबालगोपविदिता सर्वानुल्लङ्घ्यशासना।
श्रीचक्रराजनिलया श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी॥१८२॥
अर्थ आबालगोपविदिता — बालकों और गोपों (ग्वालों) तक — सबको ज्ञात, सर्वानुल्लङ्घ्यशासना — जिनका शासन (आज्ञा) कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता, श्रीचक्रराजनिलया — श्रीचक्रराज (श्रीयन्त्र) में निवास करने वाली, श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी — श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी — तीनों लोकों की परम सुन्दरी
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका।
एवं श्रीललिता देव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः॥
अर्थ श्रीशिवा — कल्याणस्वरूपा, शिव की शाश्वत मंगलमयी शक्ति, शिवशक्त्यैक्यरूपिणी — शिव एवं शक्ति की अद्वैत एकता की मूर्तिस्वरूपा, ललिताम्बिका — ललिता अम्बिका — परम जगदम्बा, जिनके ये सहस्र नाम गाये गये। इस प्रकार देवगणों ने श्रीललिता देवी के सहस्र (एक हज़ार) नामों का गान किया।
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवागस्त्यसंवादे श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रकथनं सम्पूर्णम् ॥
अर्थ इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड में श्रीहयग्रीव एवं अगस्त्य के संवाद में कहा गया श्रीललितासहस्रनाम स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।