। ध्यानम् ।
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥
| dhyānam |
oṃ kālābhrābhāṃ kaṭākṣairarikulabhayadāṃ maulibaddhendurekhāṃ
śaṅkhaṃ cakraṃ kṛpāṇaṃ triśikhamapi karairudvahantīṃ trinetrām |
siṃhaskandhādhirūḍhāṃ tribhuvanamakhilaṃ tejasā pūrayantīṃ
dhyāyeddurgāṃ jayākhyāṃ tridaśaparivṛtāṃ sevitāṃ siddhikāmaiḥ ||
अर्थ ध्यान — काले मेघों के समान कान्ति वाली, जिनके कटाक्ष शत्रुसमूह को भय पहुँचाते हैं, जिनके मुकुट में चन्द्रमा की रेखा बँधी है, अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण और त्रिशूल धारण किए हुए, तीन नेत्रों वाली, सिंह के कंधे पर विराजमान तथा अपने तेज से समस्त त्रिभुवन को परिपूर्ण करने वाली — सिद्धि की कामना करने वालों से सेवित और देवताओं से घिरी हुई 'जया' नामक दुर्गा का ध्यान करना चाहिए।
ॐ ऋषिरुवाच ॥ ४.१॥
oṃ ṛṣiruvāca || 4.1||
अर्थ ॐ। ऋषि (मार्कण्डेय) बोले —
शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या ।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥ ४.२॥
śakrādayaḥ suragaṇā nihate'tivīrye
tasmindurātmani surāribale ca devyā |
tāṃ tuṣṭuvuḥ praṇatinamraśirodharāṃsā
vāgbhiḥ praharṣapulakodgamacārudehāḥ || 4.2||
अर्थ जब देवी के द्वारा वह अत्यन्त पराक्रमी, दुष्टात्मा (महिषासुर) तथा देवताओं के शत्रुओं की सेना मार दी गई, तब इन्द्र आदि देवगण — प्रणाम से झुके हुए मस्तक और कंधों वाले, और अत्यधिक हर्ष से रोमांचित होकर सुन्दर देह वाले — वाणी से उनकी स्तुति करने लगे।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निःशेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या ।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ ४.३॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā
niḥśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā |
tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ
bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ || 4.3||
अर्थ जिस देवी ने अपनी शक्ति से इस समस्त जगत् को व्याप्त कर रखा है, और जो सम्पूर्ण देवगणों की शक्तियों के समूह का साक्षात् स्वरूप हैं, उन समस्त देवताओं और महर्षियों से पूजित अम्बिका को हम भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं। वे हमारा कल्याण करें।
यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च ।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥ ४.४॥
yasyāḥ prabhāvamatulaṃ bhagavānananto
brahmā haraśca na hi vaktumalaṃ balaṃ ca |
sā caṇḍikākhilajagatparipālanāya
nāśāya cāśubhabhayasya matiṃ karotu || 4.4||
अर्थ जिनके अतुलनीय प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् अनन्त (विष्णु), ब्रह्मा और शिव भी समर्थ नहीं हैं, वे चण्डिका सम्पूर्ण जगत् के पालन तथा अशुभ के भय के नाश की ओर अपना मन लगाएँ (संकल्प करें)।
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥ ४.५॥
yā śrīḥ svayaṃ sukṛtināṃ bhavaneṣvalakṣmīḥ
pāpātmanāṃ kṛtadhiyāṃ hṛdayeṣu buddhiḥ |
śraddhā satāṃ kulajanaprabhavasya lajjā
tāṃ tvāṃ natāḥ sma paripālaya devi viśvam || 4.5||
अर्थ जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं लक्ष्मी (श्री) हैं और पापियों के घरों में अलक्ष्मी (दरिद्रता) हैं, जो शुद्ध बुद्धि वालों के हृदय में बुद्धि हैं, सज्जनों में श्रद्धा हैं और कुलीन पुरुष में लज्जा हैं — उन आप को हम प्रणाम करते हैं। हे देवि! विश्व की रक्षा कीजिए।
किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
किञ्चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि ।
किं चाहवेषु चरितानि तवाति यानि
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ४.६॥
kiṃ varṇayāma tava rūpamacintyametat
kiñcātivīryamasurakṣayakāri bhūri |
kiṃ cāhaveṣu caritāni tavāti yāni
sarveṣu devyasuradevagaṇādikeṣu || 4.6||
अर्थ हे देवि! हम आपके इस अचिन्त्य रूप का वर्णन कैसे करें? आपके उस विपुल एवं असुरनाशक अत्यन्त पराक्रम का, अथवा समस्त असुर-देवगण आदि के बीच युद्धों में आपके किए हुए उन अद्भुत चरित्रों का — किसका वर्णन करें?
हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै-
र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा ।
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ ४.७॥
hetuḥ samastajagatāṃ triguṇāpi doṣai-
rna jñāyase hariharādibhirapyapārā |
sarvāśrayākhilamidaṃ jagadaṃśabhūta-
mavyākṛtā hi paramā prakṛtistvamādyā || 4.7||
अर्थ आप समस्त लोकों की कारण हैं; तीनों गुणों से युक्त होकर भी उनके दोषों से आप युक्त नहीं जानी जातीं; विष्णु, शिव आदि के लिए भी आप अपार (दुर्ज्ञेय) हैं। आप ही सबका आश्रय हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही अंशमात्र है; क्योंकि आप ही अव्यक्त, परम एवं आद्या मूल प्रकृति हैं।
यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि ।
स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ ४.८॥
yasyāḥ samastasuratā samudīraṇena
tṛptiṃ prayāti sakaleṣu makheṣu devi |
svāhāsi vai pitṛgaṇasya ca tṛptihetu-
ruccāryase tvamata eva janaiḥ svadhā ca || 4.8||
अर्थ हे देवि! समस्त यज्ञों में जिनके उच्चारण मात्र से सभी देवता तृप्ति को प्राप्त होते हैं, आप वही स्वाहा हैं; तथा पितरों की तृप्ति की कारण होने से लोग आपको स्वधा कहकर भी पुकारते हैं।
या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं
अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः ।
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥ ४.९॥
yā muktiheturavicintyamahāvratā tvaṃ
abhyasyase suniyatendriyatattvasāraiḥ |
mokṣārthibhirmunibhirastasamastadoṣai-
rvidyāsi sā bhagavatī paramā hi devi || 4.9||
अर्थ हे देवि! जो मुक्ति की कारण और अचिन्त्य महान् व्रत रूपा हैं, जिनका अभ्यास (उपासना) संयमित इन्द्रियों वाले, तत्त्व के सार को ग्रहण करने वाले तथा समस्त दोषों से रहित मोक्षार्थी मुनिजन करते हैं — वही परम भगवती विद्या आप ही हैं।
शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान-
मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् ।
देवि त्रयी भगवती भवभावनाय
वार्तासि सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥ ४.१०॥
śabdātmikā suvimalargyajuṣāṃ nidhāna-
mudgītharamyapadapāṭhavatāṃ ca sāmnām |
devi trayī bhagavatī bhavabhāvanāya
vārtāsi sarvajagatāṃ paramārtihantrī || 4.10||
अर्थ आप शब्दस्वरूपा हैं, अत्यन्त विशुद्ध ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की मन्त्रराशि और उद्गीथ के रमणीय पदों के पाठ वाले सामवेद की निधान (आश्रय) हैं। हे देवि! आप ही तीनों वेद रूप त्रयी भगवती हैं; संसार के पालन-पोषण के लिए आप ही वार्ता (जीविका-रूप वृत्ति) हैं और समस्त जगत् की महान् पीड़ा को हरने वाली हैं।
मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा ।
श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥ ४.११॥
medhāsi devi viditākhilaśāstrasārā
durgāsi durgabhavasāgaranaurasaṅgā |
śrīḥ kaiṭabhārihṛdayaikakṛtādhivāsā
gaurī tvameva śaśimaulikṛtapratiṣṭhā || 4.11||
अर्थ हे देवि! आप ही मेधा (बुद्धि) हैं, जिनसे समस्त शास्त्रों का सार जाना जाता है; आप ही दुर्गा हैं, जो दुस्तर भवसागर से पार उतारने वाली अनासक्त नौका के समान हैं; आप ही श्री हैं, जिन्होंने कैटभ के शत्रु (विष्णु) के हृदय में अपना एकमात्र निवास बना रखा है; और आप ही गौरी हैं, जिन्होंने चन्द्रशेखर शिव में अपनी प्रतिष्ठा (स्थान) बनाई है।
ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र-
बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् ।
अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि
वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥ ४.१२॥
īṣatsahāsamamalaṃ paripūrṇacandra-
bimbānukāri kanakottamakāntikāntam |
atyadbhutaṃ prahṛtamāttaruṣā tathāpi
vaktraṃ vilokya sahasā mahiṣāsureṇa || 4.12||
अर्थ हल्की मुस्कान से युक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमण्डल के बिम्ब का अनुकरण करने वाला, उत्तम स्वर्ण की-सी कान्ति से मनोहर तथा अत्यन्त अद्भुत आपके मुख को देखकर भी, महिषासुर ने क्रोध में भरकर सहसा उस पर प्रहार किया — (यह आगे के श्लोक से जुड़ा है)।
दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-
मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः ।
प्राणान् मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं
कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ ४.१३॥
dṛṣṭvā tu devi kupitaṃ bhrukuṭīkarāla-
mudyacchaśāṅkasadṛśacchavi yanna sadyaḥ |
prāṇān mumoca mahiṣastadatīva citraṃ
kairjīvyate hi kupitāntakadarśanena || 4.13||
अर्थ किन्तु हे देवि! क्रोध से भरे, भ्रकुटी के कारण भयंकर, फिर भी उदित होते चन्द्रमा के समान कान्ति वाले उस मुख को देखकर भी महिष ने तत्काल प्राण नहीं त्यागे — यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है; क्योंकि कुपित यमराज (अन्तक) को देखकर भी भला कौन जीवित रह सकता है?
देवि प्रसीद परमा भवती भवाय
सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि ।
विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत-
न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ ४.१४॥
devi prasīda paramā bhavatī bhavāya
sadyo vināśayasi kopavatī kulāni |
vijñātametadadhunaiva yadastameta-
nnītaṃ balaṃ suvipulaṃ mahiṣāsurasya || 4.14||
अर्थ हे देवि! प्रसन्न होइए। आप परा (सर्वोपरि) हैं और जगत् के कल्याण के लिए हैं; क्रुद्ध होने पर आप शत्रुओं के कुलों को तत्काल नष्ट कर देती हैं। यह बात अभी-अभी इसी से जान ली गई कि महिषासुर की अत्यन्त विशाल सेना नाश को प्राप्त करा दी गई।
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति बन्धुवर्गः ।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ ४.१५॥
te sammatā janapadeṣu dhanāni teṣāṃ
teṣāṃ yaśāṃsi na ca sīdati bandhuvargaḥ |
dhanyāsta eva nibhṛtātmajabhṛtyadārā
yeṣāṃ sadābhyudayadā bhavatī prasannā || 4.15||
अर्थ हे देवि! जिन पर सदा अभ्युदय देने वाली आप प्रसन्न रहती हैं, वे ही मनुष्य देशों में सम्मानित होते हैं, उन्हीं के पास धन होता है, उन्हीं का यश फैलता है और उनका बन्धुवर्ग कभी क्षीण नहीं होता; सुरक्षित पुत्र, सेवक और स्त्री वाले वे ही धन्य हैं।
धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा-
ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति ।
स्वर्गं प्रयाति च ततो भवती प्रसादा-
ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ ४.१६॥
dharmyāṇi devi sakalāni sadaiva karmā-
ṇyatyādṛtaḥ pratidinaṃ sukṛtī karoti |
svargaṃ prayāti ca tato bhavatī prasādā-
llokatraye'pi phaladā nanu devi tena || 4.16||
अर्थ हे देवि! आपके प्रसाद से ही पुण्यात्मा पुरुष अत्यन्त आदरपूर्वक प्रतिदिन समस्त धर्ममय कर्मों को करता है और उसके फलस्वरूप स्वर्ग को प्राप्त होता है। इस प्रकार, हे देवि, आप निश्चय ही तीनों लोकों में फल देने वाली हैं।
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ ४.१७॥
durge smṛtā harasi bhītimaśeṣajantoḥ
svasthaiḥ smṛtā matimatīva śubhāṃ dadāsi |
dāridryaduḥkhabhayahāriṇi kā tvadanyā
sarvopakārakaraṇāya sadārdracittā || 4.17||
अर्थ हे दुर्गे! स्मरण किए जाने पर आप समस्त प्राणियों के भय को हर लेती हैं; स्वस्थ (सुखी) पुरुषों द्वारा स्मरण किए जाने पर उन्हें अत्यन्त कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करती हैं। हे दारिद्र्य, दुःख और भय को हरने वाली! सबका उपकार करने में सदा आर्द्रचित्त (करुणापूर्ण हृदय वाली) आपके अतिरिक्त और कौन है?
एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते
कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् ।
सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
मत्वेति नूनमहितान्विनिहंसि देवि ॥ ४.१८॥
ebhirhatairjagadupaiti sukhaṃ tathaite
kurvantu nāma narakāya cirāya pāpam |
saṅgrāmamṛtyumadhigamya divaṃ prayāntu
matveti nūnamahitānvinihaṃsi devi || 4.18||
अर्थ 'इनके मारे जाने से जगत् सुख को प्राप्त होगा; और यद्यपि इन्होंने चिरकाल तक नरक में ले जाने वाला पाप किया है, तो भी संग्राम में मृत्यु पाकर ये स्वर्ग को चले जाएँ' — ऐसा विचारकर, हे देवि, आप निश्चय ही शत्रुओं का संहार करती हैं।
दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म
सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् ।
लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता
इत्थं मतिर्भवति तेष्वहितेषुसाध्वी ॥ ४.१९॥
dṛṣṭvaiva kiṃ na bhavatī prakaroti bhasma
sarvāsurānariṣu yatprahiṇoṣi śastram |
lokānprayāntu ripavo'pi hi śastrapūtā
itthaṃ matirbhavati teṣvahiteṣusādhvī || 4.19||
अर्थ क्या आप इन समस्त असुरों को केवल देख लेने मात्र से ही भस्म नहीं कर सकतीं? फिर भी आप शत्रुओं पर शस्त्र चलाती हैं — 'शत्रु भी शस्त्र से पवित्र होकर उत्तम लोकों को प्राप्त हों' — उन शत्रुओं के प्रति भी आपकी ऐसी साध्वी (कल्याणमयी) बुद्धि है।
खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः
शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् ।
यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ ४.२०॥
khaḍgaprabhānikaravisphuraṇaistathograiḥ
śūlāgrakāntinivahena dṛśo'surāṇām |
yannāgatā vilayamaṃśumadindukhaṇḍa-
yogyānanaṃ tava vilokayatāṃ tadetat || 4.20||
अर्थ आपकी तलवार की कान्ति-राशि की उग्र चमक से और आपके त्रिशूल के अग्रभाग की प्रकाश-राशि से भी असुरों के नेत्र यदि नष्ट (अन्धे) नहीं हुए, तो इसका कारण यही था कि वे शीतल चन्द्रखण्ड के समान कान्ति वाले आपके मुख को देख रहे थे।
दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं
रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः ।
वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां
वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥ ४.२१॥
durvṛttavṛttaśamanaṃ tava devi śīlaṃ
rūpaṃ tathaitadavicintyamatulyamanyaiḥ |
vīryaṃ ca hantṛ hṛtadevaparākramāṇāṃ
vairiṣvapi prakaṭitaiva dayā tvayettham || 4.21||
अर्थ हे देवि! आपका शील दुष्टों के आचरण का शमन करने वाला है; आपका यह रूप अचिन्त्य है और दूसरों की उपमा से रहित (अतुल्य) है; आपका पराक्रम देवताओं के बल को हर लेने वालों का संहारक है; और इस प्रकार शत्रुओं पर भी आपकी दया प्रकट ही होती है।
केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य
रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र ।
चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ ४.२२॥
kenopamā bhavatu te'sya parākramasya
rūpaṃ ca śatrubhayakāryatihāri kutra |
citte kṛpā samaraniṣṭhuratā ca dṛṣṭā
tvayyeva devi varade bhuvanatraye'pi || 4.22||
अर्थ आपके इस पराक्रम की किससे उपमा दी जाए? और शत्रुओं को भय देने वाला तथा साथ ही अत्यन्त मनोहर आपका रूप और कहाँ है? हे वरदायिनी देवि! हृदय में करुणा और युद्ध में निष्ठुरता — ये दोनों तीनों लोकों में भी केवल आप में ही देखी जाती हैं।
त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन
त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा ।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तम्
अस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ ४.२३॥
trailokyametadakhilaṃ ripunāśanena
trātaṃ tvayā samaramūrdhani te'pi hatvā |
nītā divaṃ ripugaṇā bhayamapyapāstam
asmākamunmadasurāribhavaṃ namaste || 4.23||
अर्थ शत्रुओं का नाश करके आपने इस सम्पूर्ण त्रैलोक्य की रक्षा की है; और उन्हें भी युद्ध के अग्रभाग में मारकर आपने शत्रुगणों को स्वर्ग पहुँचा दिया है; तथा उन्मत्त असुर-शत्रुओं से उत्पन्न हमारा भय भी दूर कर दिया है। आपको नमस्कार है!
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ ४.२४॥
śūlena pāhi no devi pāhi khaḍgena cāmbike |
ghaṇṭāsvanena naḥ pāhi cāpajyāniḥsvanena ca || 4.24||
अर्थ हे देवि! अपने त्रिशूल से हमारी रक्षा कीजिए; हे अम्बिके! अपने खड्ग से हमारी रक्षा कीजिए; अपनी घण्टा के स्वर से और अपने धनुष की प्रत्यंचा के टंकार से भी हमारी रक्षा कीजिए।
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे ।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ ४.२५॥
prācyāṃ rakṣa pratīcyāṃ ca caṇḍike rakṣa dakṣiṇe |
bhrāmaṇenātmaśūlasya uttarasyāṃ tatheśvari || 4.25||
अर्थ हे चण्डिके! पूर्व दिशा में रक्षा कीजिए और पश्चिम में भी; दक्षिण में रक्षा कीजिए; और हे ईश्वरि! अपने त्रिशूल को घुमाकर उत्तर दिशा में भी हमारी रक्षा कीजिए।
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते ।
यानि चात्यन्तघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ ४.२६॥
saumyāni yāni rūpāṇi trailokye vicaranti te |
yāni cātyantaghorāṇi tai rakṣāsmāṃstathā bhuvam || 4.26||
अर्थ आपके जो सौम्य रूप तीनों लोकों में विचरण करते हैं, और जो अत्यन्त घोर रूप हैं — उन सबसे हमारी तथा इस पृथ्वी की रक्षा कीजिए।
खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्रानि तेऽम्बिके ।
करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान्रक्ष सर्वतः ॥ ४.२७॥
khaḍgaśūlagadādīni yāni cāstrāni te'mbike |
karapallavasaṅgīni tairasmānrakṣa sarvataḥ || 4.27||
अर्थ हे अम्बिके! आपके करकमलों (कोमल पल्लव-सदृश हाथों) में सुशोभित खड्ग, शूल, गदा आदि जो अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे सब ओर से हमारी रक्षा कीजिए।
ऋषिरुवाच ॥ ४.२८॥
ṛṣiruvāca || 4.28||
अर्थ ऋषि (मार्कण्डेय) बोले —
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः ।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ ४.२९॥
evaṃ stutā surairdivyaiḥ kusumairnandanodbhavaiḥ |
arcitā jagatāṃ dhātrī tathā gandhānulepanaiḥ || 4.29||
अर्थ इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति की गई जगत् की धात्री (धारण-पालन करने वाली देवी) की नन्दन-वन में उत्पन्न दिव्य पुष्पों तथा सुगन्धित अनुलेपनों (चन्दन आदि) से पूजा की गई।
भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैः सुधूपिता ।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ ४.३०॥
bhaktyā samastaistridaśairdivyairdhūpaiḥ sudhūpitā |
prāha prasādasumukhī samastān praṇatān surān || 4.30||
अर्थ समस्त देवताओं द्वारा भक्तिपूर्वक दिव्य धूपों से भली-भाँति धूपित की गई वह देवी, प्रसन्नमुखी होकर, प्रणाम करते हुए समस्त देवताओं से बोलीं।
देव्युवाच ॥ ४.३१॥
devyuvāca || 4.31||
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ॥ ४.३२॥
vriyatāṃ tridaśāḥ sarve yadasmatto'bhivāñchitam || 4.32||
अर्थ हे समस्त देवगण! हमसे जो कुछ अभीष्ट (मनोवांछित) हो, वह सब माँग लो। (यह अर्धश्लोक है।)
देवा ऊचुः ॥ ४.३३॥
devā ūcuḥ || 4.33||
भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते ॥ ४.३४॥
bhagavatyā kṛtaṃ sarvaṃ na kiñcidavaśiṣyate || 4.34||
अर्थ भगवती ने सब कुछ कर दिया है, अब कुछ भी शेष नहीं रहा। (यह अर्धश्लोक है।)
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ।
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ॥ ४.३५॥
yadayaṃ nihataḥ śatrurasmākaṃ mahiṣāsuraḥ |
yadi cāpi varo deyastvayāsmākaṃ maheśvari || 4.35||
अर्थ हमारा यह शत्रु महिषासुर मारा जा चुका है; फिर भी, हे महेश्वरि, यदि आप हमें कोई वर देना ही चाहती हैं, तो — (यह आगे के श्लोकों से जुड़ा है)।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ।
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥ ४.३६॥
saṃsmṛtā saṃsmṛtā tvaṃ no hiṃsethāḥ paramāpadaḥ |
yaśca martyaḥ stavairebhistvāṃ stoṣyatyamalānane || 4.36||
अर्थ हे निर्मल मुख वाली देवि! बारंबार स्मरण किए जाने पर आप हमारी बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों का नाश करती रहें; और जो मनुष्य इन स्तोत्रों से आपकी स्तुति करेगा — (यह आगे के श्लोक से जुड़ा है)।
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् ।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ ४.३७॥
tasya vittarddhivibhavairdhanadārādisampadām |
vṛddhaye'smatprasannā tvaṃ bhavethāḥ sarvadāmbike || 4.37||
अर्थ हे अम्बिके! उस मनुष्य पर आप सदा प्रसन्न होकर उसके धन-सम्पत्ति, वैभव तथा धन, स्त्री आदि सम्पदाओं की वृद्धि करने वाली होइए।
ऋषिरुवाच ॥ ४.३८॥
ṛṣiruvāca || 4.38||
अर्थ ऋषि (मार्कण्डेय) बोले —
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथात्मनः ।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ४.३९॥
iti prasāditā devairjagato'rthe tathātmanaḥ |
tathetyuktvā bhadrakālī babhūvāntarhitā nṛpa || 4.39||
अर्थ हे राजन्! इस प्रकार जगत् के तथा अपने प्रयोजन के लिए देवताओं द्वारा प्रसन्न की गई भद्रकाली 'ऐसा ही हो' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गईं।
इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा ।
देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४.४०॥
ityetatkathitaṃ bhūpa sambhūtā sā yathā purā |
devī devaśarīrebhyo jagattrayahitaiṣiṇī || 4.40||
अर्थ हे राजन्! इस प्रकार यह बताया गया कि तीनों लोकों का हित चाहने वाली वह देवी पूर्वकाल में देवताओं के शरीरों से किस प्रकार प्रकट हुई थीं।
पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् ।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४.४१॥
punaśca gaurīdehātsā samudbhūtā yathābhavat |
vadhāya duṣṭadaityānāṃ tathā śumbhaniśumbhayoḥ || 4.41||
अर्थ और फिर वे किस प्रकार गौरी के शरीर से प्रकट हुईं — दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ और निशुम्भ के वध के लिए — (यह आगे के श्लोक से जुड़ा है)।
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी ।
तच्छृणुष्व मयाख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ४.४२॥
rakṣaṇāya ca lokānāṃ devānāmupakāriṇī |
tacchṛṇuṣva mayākhyātaṃ yathāvatkathayāmi te || 4.42||
अर्थ तथा लोकों की रक्षा के लिए एवं देवताओं का उपकार करने के लिए (वे प्रकट हुईं) — मेरे द्वारा कहा गया वह वृत्तान्त सुनो; मैं तुम्हें ठीक-ठीक (यथावत्) कह सुनाता हूँ।
। ह्रीं ॐ ।
उवाच ५, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३५, एवमादितः ॥ २५९॥
| hrīṃ oṃ |
uvāca 5, ardhaślokau 2, ślokāḥ 35, evamāditaḥ || 259||
अर्थ (अध्याय-समाप्ति सूचक श्लोक-गणना) 'ह्रीं ॐ'। इसमें उवाच (वचन-सूचक पंक्तियाँ) 5, अर्धश्लोक 2 और पूर्ण श्लोक 35 हैं; इस प्रकार आरम्भ से कुल श्लोक-संख्या 259 हुई। (यह देवी माहात्म्य की श्लोक-गणना का पुष्पिका-सूचक अंश है, स्तुति का पद नहीं।)