विनियोगः
अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः ।
श्रीमहासरस्वती देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः । भीमा शक्तिः । भ्रामरी बीजम् ।
सूर्यस्तत्त्वम् ।
सामवेदः स्वरूपम् । श्रीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे
उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः ।
अर्थ विनियोग — इस श्री उत्तरचरित्र के पाठ का विनियोग बताया गया है। इसके ऋषि रुद्र हैं, देवता श्रीमहासरस्वती हैं, छन्द अनुष्टुप् है, शक्ति भीमा है, बीज भ्रामरी है, तत्त्व सूर्य है और स्वरूप सामवेद है। श्रीमहासरस्वती की प्रसन्नता के लिए उत्तरचरित्र के पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।
। ध्यानम् ।
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ॥
| dhyānam |
ghaṇṭāśūlahalāni śaṅkhamusale cakraṃ dhanuḥ sāyakaṃ
hastābjairdadhatīṃ ghanāntavilasacchītāṃśutulyaprabhām |
gaurīdehasamudbhavāṃ trijagatāmādhārabhūtāṃ mahā-
pūrvāmatra sarasvatīmanubhaje śumbhādidaityārdinīm ||
अर्थ ध्यान — जो अपने कमल जैसे हाथों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, जिनकी कान्ति मेघों के अन्त में चमकते हुए शीतल चन्द्रमा के समान है, जो गौरी के शरीर से प्रकट हुई हैं, जो तीनों लोकों की आधारभूता हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं — उन महासरस्वती का मैं यहाँ भजन-ध्यान करता हूँ।
ॐ क्लीं ऋषिरुवाच ॥ ५.१॥
oṃ klīṃ ṛṣiruvāca || 5.1||
अर्थ ॐ क्लीं — इस बीजमन्त्र के साथ ऋषि (मार्कण्डेय) ने कहा —
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः ।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ॥ ५.२॥
purā śumbhaniśumbhābhyāmasurābhyāṃ śacīpateḥ |
trailokyaṃ yajñabhāgāśca hṛtā madabalāśrayāt || 5.2||
अर्थ प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो असुरों ने अपने मद और बल के भरोसे इन्द्र (शचीपति) से तीनों लोकों का राज्य तथा यज्ञ के भाग छीन लिए।
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम् ।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च ॥ ५.३॥
tāveva sūryatāṃ tadvadadhikāraṃ tathaindavam |
kauberamatha yāmyaṃ ca cakrāte varuṇasya ca || 5.3||
अर्थ उन दोनों ने ही सूर्य का अधिकार, वैसे ही चन्द्रमा का, कुबेर का, यम का और वरुण का अधिकार भी अपने हाथ में ले लिया।
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च ।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ॥ ५.४॥
tāveva pavanarddhiṃ ca cakraturvahnikarma ca |
tato devā vinirdhūtā bhraṣṭarājyāḥ parājitāḥ || 5.4||
अर्थ उन्हीं दोनों ने वायु की सम्पत्ति (शक्ति) और अग्नि का कार्य भी अपने अधीन कर लिया। इससे देवता अपने राज्य से भ्रष्ट, पराजित और बहिष्कृत हो गए।
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः ।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम् ॥ ५.५॥
hṛtādhikārāstridaśāstābhyāṃ sarve nirākṛtāḥ |
mahāsurābhyāṃ tāṃ devīṃ saṃsmarantyaparājitām || 5.5||
अर्थ अपने अधिकार से वंचित और उन दोनों महान् असुरों द्वारा सर्वथा तिरस्कृत किए गए देवता उस अपराजिता देवी का भली-भाँति स्मरण करने लगे।
तयास्माकं वरो दत्तो यथापत्सु स्मृताखिलाः ।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ॥ ५.६॥
tayāsmākaṃ varo datto yathāpatsu smṛtākhilāḥ |
bhavatāṃ nāśayiṣyāmi tatkṣaṇātparamāpadaḥ || 5.6||
अर्थ (उन्हें स्मरण हुआ कि) देवी ने हमें यह वरदान दिया था — जब भी तुम लोग विपत्ति में मेरा स्मरण करोगे, उसी क्षण मैं तुम्हारी घोर विपत्तियों का नाश कर दूँगी।
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम् ।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ॥ ५.७॥
iti kṛtvā matiṃ devā himavantaṃ nageśvaram |
jagmustatra tato devīṃ viṣṇumāyāṃ pratuṣṭuvuḥ || 5.7||
अर्थ ऐसा निश्चय करके देवता पर्वतराज हिमालय पर गए और वहाँ जाकर उन्होंने विष्णुमाया-स्वरूपा देवी की भली-भाँति स्तुति की।
देवा ऊचुः ॥ ५.८॥
devā ūcuḥ || 5.8||
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ ५.९॥
namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ |
namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām || 5.9||
अर्थ देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है, शिवा (कल्याणस्वरूपा) को सदा नमस्कार है। प्रकृति और भद्रा (कल्याणी) को नमस्कार है; हम संयमपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हैं।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ ५.१०॥
raudrāyai namo nityāyai gauryai dhātryai namo namaḥ |
jyotsnāyai cendurūpiṇyai sukhāyai satataṃ namaḥ || 5.10||
अर्थ रौद्रा और नित्या को नमस्कार, गौरी और धात्री (धारण करने वाली) को बार-बार नमस्कार। ज्योत्स्ना (चन्द्रिका) रूपिणी, चन्द्ररूपिणी तथा सुखस्वरूपा देवी को सदा नमस्कार है।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ।
नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ५.११॥
kalyāṇyai praṇatāṃ vṛddhyai siddhyai kurmo namo namaḥ |
nairṛtyai bhūbhṛtāṃ lakṣmyai śarvāṇyai te namo namaḥ || 5.11||
अर्थ कल्याणी को, प्रणत जनों की वृद्धिस्वरूपा और सिद्धिस्वरूपा देवी को हम बार-बार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋति को, राजाओं (पृथ्वीधरों) की लक्ष्मीस्वरूपा को और शर्वाणी (शिवपत्नी) को — हे देवी, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ ५.१२॥
durgāyai durgapārāyai sārāyai sarvakāriṇyai |
khyātyai tathaiva kṛṣṇāyai dhūmrāyai satataṃ namaḥ || 5.12||
अर्थ दुर्गा को, दुर्गम विपत्ति से पार उतारने वाली (दुर्गपारा) को, सारभूता को और सब कुछ करने वाली (सर्वकारिणी) को; ख्याति को, वैसे ही कृष्णा को और धूम्रा को सदा नमस्कार है।
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ ५.१३॥
atisaumyātiraudrāyai natāstasyai namo namaḥ |
namo jagatpratiṣṭhāyai devyai kṛtyai namo namaḥ || 5.13||
अर्थ जो अत्यन्त सौम्य और अत्यन्त रौद्र (दोनों) रूप वाली हैं, उन्हें नमस्कार करते हुए बार-बार नमस्कार है। जगत् की आधारभूता (प्रतिष्ठा) देवी को नमस्कार, और क्रिया (कर्म) रूपा देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.१४-१६॥
yā devī sarvabhūteṣu viṣṇumāyeti śabditā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.14-16||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से जानी जाती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.१७-१९॥
yā devī sarvabhūteṣu cetanetyabhidhīyate |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.17-19||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में चेतना (चैतन्य) कहलाती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.२०-२२॥
yā devī sarvabhūteṣu buddhirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.20-22||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में बुद्धि रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.२३-२५॥
yā devī sarvabhūteṣu nidrārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.23-25||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में निद्रा रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.२६-२८॥
yā devī sarvabhūteṣu kṣudhārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.26-28||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में क्षुधा (भूख) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.२९-३१॥
yā devī sarvabhūteṣu chāyārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.29-31||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में छाया रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.३२-३४॥
yā devī sarvabhūteṣu śaktirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.32-34||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.३५-३७॥
yā devī sarvabhūteṣu tṛṣṇārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.35-37||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में तृष्णा (तृष्णा-लालसा) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.३८-४०॥
yā devī sarvabhūteṣu kṣāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.38-40||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में क्षान्ति (क्षमा) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.४१-४३॥
yā devī sarvabhūteṣu jātirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.41-43||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में जाति (जन्म-वर्ग) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.४४-४६॥
yā devī sarvabhūteṣu lajjārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.44-46||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में लज्जा रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.४७-४९॥
yā devī sarvabhūteṣu śāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.47-49||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में शान्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.५०-५२॥
yā devī sarvabhūteṣu śraddhārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.50-52||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में श्रद्धा रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.५३-५५॥
yā devī sarvabhūteṣu kāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.53-55||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में कान्ति (शोभा-सौन्दर्य) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.५६-५८॥
yā devī sarvabhūteṣu lakṣmīrūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.56-58||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में लक्ष्मी (श्री-सम्पत्ति) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.५९-६१॥
yā devī sarvabhūteṣu vṛttirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.59-61||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में वृत्ति (प्रवृत्ति-कर्म) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.६२-६४॥
yā devī sarvabhūteṣu smṛtirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.62-64||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में स्मृति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.६५-६७॥
yā devī sarvabhūteṣu dayārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.65-67||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में दया रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.६८-७०॥
yā devī sarvabhūteṣu tuṣṭirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.68-70||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में तुष्टि (सन्तोष) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.७१-७३॥
yā devī sarvabhūteṣu mātṛrūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.71-73||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में मातृ (माता) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.७४-७६॥
yā devī sarvabhūteṣu bhrāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.74-76||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों में भ्रान्ति (भ्रम-मोह) रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः ॥ ५.७७॥
indriyāṇāmadhiṣṭhātrī bhūtānāṃ cākhileṣu yā |
bhūteṣu satataṃ tasyai vyāptyai devyai namo namaḥ || 5.77||
अर्थ जो देवी समस्त प्राणियों की इन्द्रियों की अधिष्ठात्री हैं और जो सम्पूर्ण भूतों में सर्वत्र व्याप्त होकर सदा स्थित रहती हैं — उस व्याप्तिस्वरूपा देवी को बार-बार नमस्कार है।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५.७८-८०॥
citirūpeṇa yā kṛtsnametad vyāpya sthitā jagat |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 5.78-80||
अर्थ जो देवी चिति (चैतन्य) रूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है।
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-
त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ ५.८१॥
stutā suraiḥ pūrvamabhīṣṭasaṃśrayā-
ttathā surendreṇa dineṣu sevitā |
karotu sā naḥ śubhaheturīśvarī
śubhāni bhadrāṇyabhihantu cāpadaḥ || 5.81||
अर्थ जो पहले देवताओं द्वारा अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए स्तुति की गई थीं और जिनकी देवराज इन्द्र प्रतिदिन सेवा करते हैं — वे कल्याणकारिणी ईश्वरी हमारा मंगल करें, हमें शुभ एवं भद्र (कल्याण) प्रदान करें और हमारी विपत्तियों का नाश करें।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-
रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः
सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥ ५.८२॥
yā sāmprataṃ coddhatadaityatāpitai-
rasmābhirīśā ca surairnamasyate |
yā ca smṛtā tatkṣaṇameva hanti naḥ
sarvāpado bhaktivinamramūrtibhiḥ || 5.82||
अर्थ इस समय उद्धत दैत्यों से पीड़ित हम देवताओं द्वारा जो ईश्वरी नमस्कृत हो रही हैं, और जो भक्तिपूर्वक विनम्र मूर्ति वाले हम लोगों द्वारा स्मरण किए जाने पर उसी क्षण हमारी समस्त विपत्तियों का नाश कर देती हैं — (वे हमारा कल्याण करें)।
ऋषिरुवाच ॥ ५.८३॥
ṛṣiruvāca || 5.83||
एवं स्तवाभियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती ।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ॥ ५.८४॥
evaṃ stavābhiyuktānāṃ devānāṃ tatra pārvatī |
snātumabhyāyayau toye jāhnavyā nṛpanandana || 5.84||
अर्थ हे राजकुमार! जब देवता इस प्रकार स्तुति में लगे हुए थे, उसी समय पार्वती वहाँ गंगा (जाह्नवी) के जल में स्नान करने के लिए आईं।
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का ।
शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा ॥ ५.८५॥
sābravīttān surān subhrūrbhavadbhiḥ stūyate'tra kā |
śarīrakośataścāsyāḥ samudbhūtābravīcchivā || 5.85||
अर्थ उन सुन्दर भौंहों वाली पार्वती ने उन देवताओं से पूछा — यहाँ आप लोग किसकी स्तुति कर रहे हैं? तब उन्हीं (पार्वती) के शरीर-कोश से प्रकट हुई शिवा (अम्बिका) ने उत्तर दिया —
स्तोत्रं ममैतत्क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः ।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥ ५.८६॥
stotraṃ mamaitatkriyate śumbhadaityanirākṛtaiḥ |
devaiḥ sametaiḥ samare niśumbhena parājitaiḥ || 5.86||
अर्थ (अम्बिका ने कहा —) यह स्तोत्र शुम्भ दैत्य द्वारा बहिष्कृत तथा युद्ध में निशुम्भ द्वारा पराजित एकत्रित देवताओं के द्वारा मेरी ही स्तुति के रूप में किया जा रहा है।
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका ।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥ ५.८७॥
śarīrakośādyattasyāḥ pārvatyā niḥsṛtāmbikā |
kauśikīti samasteṣu tato lokeṣu gīyate || 5.87||
अर्थ चूँकि अम्बिका उन पार्वती के शरीर-कोश से निकलीं, इसलिए वे समस्त लोकों में 'कौशिकी' नाम से गाई-पुकारी जाती हैं।
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती ।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥ ५.८८॥
tasyāṃ vinirgatāyāṃ tu kṛṣṇābhūtsāpi pārvatī |
kāliketi samākhyātā himācalakṛtāśrayā || 5.88||
अर्थ उनके (कौशिकी के) निकल जाने पर वे पार्वती भी कृष्ण (श्याम) वर्ण की हो गईं और हिमालय पर आश्रय लेकर 'कालिका' नाम से विख्यात हुईं।
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम् ।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ५.८९॥
tato'mbikāṃ paraṃ rūpaṃ bibhrāṇāṃ sumanoharam |
dadarśa caṇḍo muṇḍaśca bhṛtyau śumbhaniśumbhayoḥ || 5.89||
अर्थ इसके बाद शुम्भ और निशुम्भ के दो सेवक चण्ड और मुण्ड ने परम मनोहर श्रेष्ठ रूप धारण किए हुए उस अम्बिका को देखा।
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता सातीव सुमनोहरा ।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥ ५.९०॥
tābhyāṃ śumbhāya cākhyātā sātīva sumanoharā |
kāpyāste strī mahārāja bhāsayantī himācalam || 5.90||
अर्थ उन दोनों ने शुम्भ से कहा — हे महाराज! अत्यन्त मनोहर रूप वाली कोई स्त्री हिमालय को अपनी कान्ति से प्रकाशित करती हुई वहाँ स्थित है।
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम् ।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥ ५.९१॥
naiva tādṛk kvacidrūpaṃ dṛṣṭaṃ kenaciduttamam |
jñāyatāṃ kāpyasau devī gṛhyatāṃ cāsureśvara || 5.91||
अर्थ ऐसा उत्तम (सुन्दर) रूप कभी किसी के द्वारा कहीं नहीं देखा गया। हे असुरेश्वर! पता लगाइए कि यह कौन देवी है, और उसे ग्रहण कीजिए।
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा ।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥ ५.९२॥
strīratnamaticārvaṅgī dyotayantī diśastviṣā |
sā tu tiṣṭhati daityendra tāṃ bhavān draṣṭumarhati || 5.92||
अर्थ हे दैत्येन्द्र! अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, अति सुन्दर अंगों वाली वह स्त्री-रत्न वहाँ विद्यमान है; आप उसे देखने योग्य हैं (अवश्य देखें)।
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो ।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥ ५.९३॥
yāni ratnāni maṇayo gajāśvādīni vai prabho |
trailokye tu samastāni sāmprataṃ bhānti te gṛhe || 5.93||
अर्थ हे प्रभो! तीनों लोकों में जितने भी रत्न, मणियाँ, हाथी-घोड़े आदि हैं, वे सब इस समय आपके ही घर में सुशोभित हो रहे हैं।
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात् ।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥ ५.९४॥
airāvataḥ samānīto gajaratnaṃ purandarāt |
pārijātataruścāyaṃ tathaivoccaiḥśravā hayaḥ || 5.94||
अर्थ हाथियों में रत्नस्वरूप ऐरावत इन्द्र (पुरन्दर) से लाया गया है, यह पारिजात वृक्ष भी, और उसी प्रकार उच्चैःश्रवा नामक अश्व भी (आपके पास है)।
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे ।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम् ॥ ५.९५॥
vimānaṃ haṃsasaṃyuktametattiṣṭhati te'ṅgaṇe |
ratnabhūtamihānītaṃ yadāsīdvedhaso'dbhutam || 5.95||
अर्थ हंसों से युक्त यह अद्भुत विमान, जो रत्नस्वरूप था और पहले ब्रह्मा (वेधा) का था, यहाँ लाया जाकर आपके आँगन में खड़ा है।
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात् ।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम् ॥ ५.९६॥
nidhireṣa mahāpadmaḥ samānīto dhaneśvarāt |
kiñjalkinīṃ dadau cābdhirmālāmamlānapaṅkajām || 5.96||
अर्थ यह महापद्म नामक निधि कुबेर (धनेश्वर) से लाई गई है; और समुद्र ने केसरों से युक्त, कभी न मुरझाने वाले कमलों की माला (आपको) दी है।
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति ।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुरासीत्प्रजापतेः ॥ ५.९७॥
chatraṃ te vāruṇaṃ gehe kāñcanasrāvi tiṣṭhati |
tathāyaṃ syandanavaro yaḥ purāsītprajāpateḥ || 5.97||
अर्थ आपके घर में वरुण का सोना बरसाने वाला छत्र स्थित है; तथा यह श्रेष्ठ रथ भी, जो पहले प्रजापति (ब्रह्मा) का था, (आपके पास है)।
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता ।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे ॥ ५.९८॥
mṛtyorutkrāntidā nāma śaktirīśa tvayā hṛtā |
pāśaḥ salilarājasya bhrātustava parigrahe || 5.98||
अर्थ हे स्वामी! मृत्यु (यम) की उत्क्रान्तिदा नामक शक्ति (अस्त्र) आपके द्वारा हर ली गई है; और जलराज वरुण का पाश आपके भाई (निशुम्भ) के अधिकार में है।
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः ।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥ ५.९९॥
niśumbhasyābdhijātāśca samastā ratnajātayaḥ |
vahnirapi dadau tubhyamagniśauce ca vāsasī || 5.99||
अर्थ समुद्र से उत्पन्न समस्त रत्नों की जातियाँ निशुम्भ के पास हैं; और अग्नि ने भी आपको आग से शुद्ध (अग्नि में भी न जलने वाले) दो वस्त्र दिए हैं।
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते ।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ॥ ५.१००॥
evaṃ daityendra ratnāni samastānyāhṛtāni te |
strīratnameṣā kalyāṇī tvayā kasmānna gṛhyate || 5.100||
अर्थ इस प्रकार, हे दैत्येन्द्र! समस्त रत्न आपके पास लाए जा चुके हैं। फिर यह कल्याणी स्त्री-रत्न आपके द्वारा क्यों नहीं ग्रहण किया जाता?
ऋषिरुवाच ॥ ५.१०१॥
ṛṣiruvāca || 5.101||
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः ।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम् ॥ ५.१०२॥
niśamyeti vacaḥ śumbhaḥ sa tadā caṇḍamuṇḍayoḥ |
preṣayāmāsa sugrīvaṃ dūtaṃ devyā mahāsuram || 5.102||
अर्थ चण्ड और मुण्ड के इस वचन को सुनकर शुम्भ ने उस समय सुग्रीव नामक महान् असुर को देवी के पास दूत बनाकर भेजा।
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम ।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु ॥ ५.१०३॥
iti ceti ca vaktavyā sā gatvā vacanānmama |
yathā cābhyeti samprītyā tathā kāryaṃ tvayā laghu || 5.103||
अर्थ (शुम्भ ने कहा —) तुम जाकर मेरे कहे अनुसार उससे यह और यह (सारी बात) कहना; और ऐसा उपाय शीघ्र करना कि वह प्रसन्नतापूर्वक (मेरे पास) चली आए।
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने ।
तां च देवीं ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ ५.१०४॥
sa tatra gatvā yatrāste śailoddeśe'tiśobhane |
tāṃ ca devīṃ tataḥ prāha ślakṣṇaṃ madhurayā girā || 5.104||
अर्थ वह (दूत) वहाँ पर्वत के उस अत्यन्त सुन्दर स्थान पर, जहाँ देवी विराजमान थीं, जाकर उन देवी से मृदु और मधुर वाणी में बोला —
दूत उवाच ॥ ५.१०५॥
dūta uvāca || 5.105||
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः ।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥ ५.१०६॥
devi daityeśvaraḥ śumbhastrailokye parameśvaraḥ |
dūto'haṃ preṣitastena tvatsakāśamihāgataḥ || 5.106||
अर्थ हे देवी! दैत्यों के स्वामी शुम्भ तीनों लोकों के परमेश्वर हैं। मैं उनका भेजा हुआ दूत हूँ और उन्हीं के द्वारा भेजा जाकर यहाँ आपके पास आया हूँ।
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु ।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥ ५.१०७॥
avyāhatājñaḥ sarvāsu yaḥ sadā devayoniṣu |
nirjitākhiladaityāriḥ sa yadāha śaृṇuṣva tat || 5.107||
अर्थ समस्त देवयोनियों में जिनकी आज्ञा सदा अबाधित रहती है, जिन्होंने दैत्यों के सारे शत्रुओं (देवताओं) को जीत लिया है — वे जो कहते हैं, उसे सुनिए।
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः ।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥ ५.१०८॥
mama trailokyamakhilaṃ mama devā vaśānugāḥ |
yajñabhāgānahaṃ sarvānupāśnāmi pṛthak pṛthak || 5.108||
अर्थ (शुम्भ का संदेश —) सम्पूर्ण तीनों लोक मेरे हैं, देवता मेरे वश में हैं। मैं ही सारे यज्ञभागों को अलग-अलग भोगता हूँ।
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः ।
तथैव गजरत्नं च हृतं देवेन्द्रवाहनम् ॥ ५.१०९॥
trailokye vararatnāni mama vaśyānyaśeṣataḥ |
tathaiva gajaratnaṃ ca hṛtaṃ devendravāhanam || 5.109||
अर्थ तीनों लोकों के श्रेष्ठ रत्न पूर्णरूप से मेरे अधीन हैं; इसी प्रकार इन्द्र का वाहन हाथियों का रत्न (ऐरावत) भी (मेरे द्वारा) हर लिया गया है।
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः ।
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥ ५.११०॥
kṣīrodamathanodbhūtamaśvaratnaṃ mamāmaraiḥ |
uccaiḥśravasasaṃjñaṃ tatpraṇipatya samarpitam || 5.110||
अर्थ क्षीरसागर के मन्थन से उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न देवताओं ने प्रणाम करके मुझे अर्पित कर दिया है।
यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च ।
रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ ५.१११॥
yāni cānyāni deveṣu gandharveṣūrageṣu ca |
ratnabhūtāni bhūtāni tāni mayyeva śobhane || 5.111||
अर्थ हे सुन्दरी! देवताओं, गन्धर्वों और नागों में जो अन्य रत्नस्वरूप प्राणी (वस्तुएँ) हैं, वे सब भी मेरे ही पास हैं।
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् ।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥ ५.११२॥
strīratnabhūtāṃ tvāṃ devi loke manyāmahe vayam |
sā tvamasmānupāgaccha yato ratnabhujo vayam || 5.112||
अर्थ हे देवी! हम आपको संसार में स्त्रियों का रत्न मानते हैं। इसलिए वैसी आप हमारे पास आ जाइए, क्योंकि हम रत्नों के भोक्ता हैं।
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् ।
भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ ५.११३॥
māṃ vā mamānujaṃ vāpi niśumbhamuruvikramam |
bhaja tvaṃ cañcalāpāṅgi ratnabhūtāsi vai yataḥ || 5.113||
अर्थ हे चंचल कटाक्ष वाली! तुम मुझे अथवा मेरे महापराक्रमी छोटे भाई निशुम्भ को वरण करो, क्योंकि तुम निश्चय ही (सर्वश्रेष्ठ) रत्न हो।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् ।
एतद्बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ ५.११४॥
paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyase matparigrahāt |
etadbuddhyā samālocya matparigrahatāṃ vraja || 5.114||
अर्थ मुझे पति रूप में स्वीकार करने से तुम्हें अतुलनीय परम ऐश्वर्य प्राप्त होगा। इस बात को बुद्धि से भली-भाँति विचार कर मेरी पत्नी बन जाओ।
ऋषिरुवाच ॥ ५.११५॥
ṛṣiruvāca || 5.115||
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ ।
दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५.११६॥
ityuktā sā tadā devī gambhīrāntaḥsmitā jagau |
durgā bhagavatī bhadrā yayedaṃ dhāryate jagat || 5.116||
अर्थ इस प्रकार कहे जाने पर वह देवी — दुर्गा, भगवती, भद्रा, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है — मन ही मन गम्भीर मुस्कान लिए हुए बोलीं —
देव्युवाच ॥ ५.११७॥
devyuvāca || 5.117||
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम् ।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ॥ ५.११८॥
satyamuktaṃ tvayā nātra mithyā kiñcittvayoditam |
trailokyādhipatiḥ śumbho niśumbhaścāpi tādṛśaḥ || 5.118||
अर्थ तुमने सत्य कहा है, इसमें तुम्हारे द्वारा कही गई कोई भी बात मिथ्या नहीं है। शुम्भ तीनों लोकों के अधिपति हैं और निशुम्भ भी वैसे ही (पराक्रमी) हैं।
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम् ।
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा ॥ ५.११९॥
kiṃ tvatra yatpratijñātaṃ mithyā tatkriyate katham |
śrūyatāmalpabuddhitvātpratijñā yā kṛtā purā || 5.119||
अर्थ किन्तु इस विषय में जो प्रतिज्ञा की जा चुकी है, उसे मिथ्या कैसे किया जाए? पहले अल्पबुद्धिवश मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सुनो —
यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति ।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥ ५.१२०॥
yo māṃ jayati saṅgrāme yo me darpaṃ vyapohati |
yo me pratibalo loke sa me bhartā bhaviṣyati || 5.120||
अर्थ जो मुझे युद्ध में जीत ले, जो मेरे दर्प (अभिमान) को दूर कर दे, जो इस संसार में मेरे बल के समान (सामर्थ्यशाली) हो — वही मेरा पति होगा।
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महाबलः ।
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु ॥ ५.१२१॥
tadāgacchatu śumbho'tra niśumbho vā mahābalaḥ |
māṃ jitvā kiṃ cireṇātra pāṇiṃ gṛhṇātu me laghu || 5.121||
अर्थ इसलिए शुम्भ यहाँ आ जाएँ, अथवा महाबली निशुम्भ आ जाएँ; मुझे जीतकर देर क्यों करें — शीघ्र ही मेरा पाणिग्रहण कर लें।
दूत उवाच ॥ ५.१२२॥
dūta uvāca || 5.122||
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः ।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ५.१२३॥
avaliptāsi maivaṃ tvaṃ devi brūhi mamāgrataḥ |
trailokye kaḥ pumāṃstiṣṭhedagre śumbhaniśumbhayoḥ || 5.123||
अर्थ हे देवी! तुम घमण्ड में भरी हो; मेरे सामने ऐसा मत कहो। तीनों लोकों में ऐसा कौन पुरुष है जो शुम्भ और निशुम्भ के सामने खड़ा हो सके?
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि ।
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥ ५.१२४॥
anyeṣāmapi daityānāṃ sarve devā na vai yudhi |
tiṣṭhanti sammukhe devi kiṃ punaḥ strī tvamekikā || 5.124||
अर्थ हे देवी! अन्य दैत्यों के सामने भी समस्त देवता युद्ध में नहीं टिक पाते; फिर तुम अकेली स्त्री (उनके सामने) कैसे ठहरोगी?
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे ।
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम् ॥ ५.१२५॥
indrādyāḥ sakalā devāstasthuryeṣāṃ na saṃyuge |
śumbhādīnāṃ kathaṃ teṣāṃ strī prayāsyasi sammukham || 5.125||
अर्थ इन्द्र आदि समस्त देवता जिन शुम्भ आदि के सामने युद्ध में नहीं ठहर सके, उनके सम्मुख तुम एक स्त्री कैसे जाओगी?
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ।
केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ॥ ५.१२६॥
sā tvaṃ gaccha mayaivoktā pārśvaṃ śumbhaniśumbhayoḥ |
keśākarṣaṇanirdhūtagauravā mā gamiṣyasi || 5.126||
अर्थ इसलिए मेरे कहने से तुम स्वयं शुम्भ और निशुम्भ के पास चली जाओ। ऐसा न हो कि तुम्हें केश पकड़कर घसीटा जाए और तुम्हारा गौरव नष्ट हो जाए — इस दशा में जाना उचित नहीं।
देव्युवाच ॥ ५.१२७॥
devyuvāca || 5.127||
एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चापितादृशः ।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ॥ ५.१२८॥
evametad balī śumbho niśumbhaścāpitādṛśaḥ |
kiṃ karomi pratijñā me yadanālocitā purā || 5.128||
अर्थ बात ऐसी ही है — शुम्भ बलवान् हैं और निशुम्भ भी वैसे ही (महाबली) हैं। किन्तु मैं क्या करूँ? पहले बिना विचारे मेरे द्वारा जो प्रतिज्ञा कर ली गई है (उसे कैसे तोड़ूँ)?
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः ।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु यत् ॥ ५.१२९॥
sa tvaṃ gaccha mayoktaṃ te yadetatsarvamādṛtaḥ |
tadācakṣvāsurendrāya sa ca yuktaṃ karotu yat || 5.129||
अर्थ इसलिए तुम जाओ; मैंने जो कुछ तुमसे कहा है, वह सब आदरपूर्वक असुरराज को बता देना, और वह जो उचित समझे, वही करे।
उवाच ९, त्रिपान्मन्त्राः ६६, श्लोकाः ५४, एवमादितः ॥ ३८८॥
uvāca 9, tripānmantrāḥ 66, ślokāḥ 54, evamāditaḥ || 388||
अर्थ (पाठ-गणना सूचक पुष्पिका) — इस अध्याय में 'उवाच' (वक्ता-सूचक पंक्तियाँ) ९, त्रिपाद-मन्त्र (या देवी... वाले) ६६, तथा श्लोक ५४ हैं; इस प्रकार आदि से (कुल संचित संख्या) ३८८ होती है।