। ध्यानम् ।
ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ।
ॐ ऋषिरुवाच ॥ ३.१॥
| dhyānam |
oṃ udyadbhānusahasrakāntimaruṇakṣaumāṃ śiromālikāṃ
raktāliptapayodharāṃ japavaṭīṃ vidyāmabhītiṃ varam |
hastābjairdadhatīṃ trinetravilasadvaktrāravindaśriyaṃ
devīṃ baddhahimāṃśuratnamukuṭāṃ vande'ravindasthitām |
oṃ ṛṣiruvāca || 3.1||
अर्थ ध्यान श्लोक — देवी का ध्यान: जो उदय होते हुए सहस्र सूर्यों के समान कान्तिमयी हैं, अरुण (लाल) रेशमी वस्त्र धारण किए हैं, मुण्डमाला पहने हैं, जिनके स्तन (रक्तचन्दन से) लाल रंग में लिप्त हैं, जो अपने कमल-सदृश हाथों में जपमाला, विद्या (पुस्तक), अभयमुद्रा और वरमुद्रा धारण करती हैं, त्रिनेत्रयुक्त जिनका मुखकमल सुशोभित है, तथा जो मस्तक पर चन्द्ररूपी रत्न का मुकुट बाँधे कमल पर विराजमान हैं — उन देवी को मैं प्रणाम करता हूँ। (ॐ। ऋषि ने कहा —)
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः ।
सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥ ३.२॥
nihanyamānaṃ tatsainyamavalokya mahāsuraḥ |
senānīścikṣuraḥ kopādyayau yoddhumathāmbikām || 3.2||
अर्थ उस सेना को नष्ट होते देखकर महान् असुर सेनापति चिक्षुर क्रोध में भरकर अम्बिका से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा।
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः ।
यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥ ३.३॥
sa devīṃ śaravarṣeṇa vavarṣa samare'suraḥ |
yathā merugireḥ śaृṅgaṃ toyavarṣeṇa toyadaḥ || 3.3||
अर्थ उस असुर ने समराङ्गण में देवी पर बाणों की वैसी ही वर्षा की, जैसे मेघ मेरु पर्वत के शिखर पर जल की वर्षा करता है।
तस्य छित्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् ।
जघान तुरगान्बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥ ३.४॥
tasya chitvā tato devī līlayaiva śarotkarān |
jaghāna turagānbāṇairyantāraṃ caiva vājinām || 3.4||
अर्थ तब देवी ने खेल-खेल में ही उसके बाण-समूहों को काटकर, अपने बाणों से उसके घोड़ों को तथा घोड़ों के सारथि को भी मार डाला।
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छृतम् ।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥ ३.५॥
ciccheda ca dhanuḥ sadyo dhvajaṃ cātisamucchṛtam |
vivyādha caiva gātreṣu chinnadhanvānamāśugaiḥ || 3.5||
अर्थ उसने तुरन्त ही उसका धनुष और अत्यन्त ऊँची ध्वजा काट डाली, और जिसका धनुष कट चुका था उस असुर के अंगों को भी तीव्र बाणों से बींध दिया।
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ।
अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥ ३.६॥
sacchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ |
abhyadhāvata tāṃ devīṃ khaḍgacarmadharo'suraḥ || 3.6||
अर्थ धनुष कट जाने, रथहीन हो जाने तथा घोड़े और सारथि के मारे जाने पर वह असुर ढाल-तलवार लेकर देवी की ओर दौड़ा।
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि ।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥ ३.७॥
siṃhamāhatya khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa mūrdhani |
ājaghāna bhuje savye devīmapyativegavān || 3.7||
अर्थ उसने अत्यन्त वेग से तीक्ष्ण धार वाली तलवार से सिंह के सिर पर प्रहार किया और देवी की बाईं भुजा पर भी वार किया।
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन ।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥ ३.८॥
tasyāḥ khaḍgo bhujaṃ prāpya paphāla nṛpanandana |
tato jagrāha śūlaṃ sa kopādaruṇalocanaḥ || 3.8||
अर्थ हे राजकुमार! देवी की भुजा से टकराते ही उसकी तलवार टूट गई। तब क्रोध से आँखें लाल किए हुए उसने शूल उठा लिया।
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः ।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥ ३.९॥
cikṣepa ca tatastattu bhadrakālyāṃ mahāsuraḥ |
jājvalyamānaṃ tejobhī ravibimbamivāmbarāt || 3.9||
अर्थ तत्पश्चात् उस महान् असुर ने तेज से प्रज्वलित उस शूल को भद्रकाली पर वैसे ही फेंका, जैसे आकाश से सूर्य का मण्डल (गिरता हो)।
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत ।
तेन तच्छतधा नीतं शूलं स च महासुरः ॥ ३.१०॥
dṛṣṭvā tadāpatacchūlaṃ devī śūlamamuñcata |
tena tacchatadhā nītaṃ śūlaṃ sa ca mahāsuraḥ || 3.10||
अर्थ उस गिरते हुए शूल को देखकर देवी ने अपना शूल छोड़ा, जिससे वह (असुर का) शूल और वह महान् असुर — दोनों सौ टुकड़ों में हो गए।
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥ ३.११॥
hate tasminmahāvīrye mahiṣasya camūpatau |
ājagāma gajārūḍhaścāmarastridaśārdanaḥ || 3.11||
अर्थ उस महापराक्रमी महिष-सेनापति (चिक्षुर) के मारे जाने पर देवताओं को सताने वाला चामर हाथी पर सवार होकर आया।
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् ।
हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥ ३.१२॥
so'pi śaktiṃ mumocātha devyāstāmambikā drutam |
huṅkārābhihatāṃ bhūmau pātayāmāsa niṣprabhām || 3.12||
अर्थ उसने भी देवी पर शक्ति (नामक अस्त्र) चलाई, किन्तु अम्बिका ने हुँकार मात्र से उसे मारकर, कान्तिहीन करके भूमि पर गिरा दिया।
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः ।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥ ३.१३॥
bhagnāṃ śaktiṃ nipatitāṃ dṛṣṭvā krodhasamanvitaḥ |
cikṣepa cāmaraḥ śūlaṃ bāṇaistadapi sācchinat || 3.13||
अर्थ अपनी शक्ति को टूटकर गिरा देखकर क्रोध से भरे चामर ने शूल फेंका, किन्तु देवी ने उसे भी बाणों से काट दिया।
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः ।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥ ३.१४॥
tataḥ siṃhaḥ samutpatya gajakumbhāntare sthitaḥ |
bāhuyuddhena yuyudhe tenoccaistridaśāriṇā || 3.14||
अर्थ तब सिंह ने उछलकर हाथी के गण्डस्थल (कुम्भ) पर स्थित होकर उस उन्नत देव-शत्रु (चामर) के साथ बाहुयुद्ध किया।
युध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥ ३.१५॥
yudhyamānau tatastau tu tasmānnāgānmahīṃ gatau |
yuyudhāte'tisaṃrabdhau prahārairatidāruṇaiḥ || 3.15||
अर्थ युद्ध करते हुए वे दोनों उस हाथी से पृथ्वी पर आ गए, और अत्यन्त क्रुद्ध होकर बड़े भयंकर प्रहारों से लड़ने लगे।
ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा ।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक् कृतम् ॥ ३.१६॥
tato vegāt khamutpatya nipatya ca mṛgāriṇā |
karaprahāreṇa śiraścāmarasya pṛthak kṛtam || 3.16||
अर्थ तब सिंह ने वेग से आकाश में उछलकर और नीचे झपटकर, अपने पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः ।
दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥ ३.१७॥
udagraśca raṇe devyā śilāvṛkṣādibhirhataḥ |
dantamuṣṭitalaiścaiva karālaśca nipātitaḥ || 3.17||
अर्थ उदग्र भी रण में देवी के द्वारा शिला, वृक्ष आदि से मारा गया, और कराल दाँतों, मुक्कों तथा थप्पड़ों से गिरा दिया गया।
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् ।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥ ३.१८॥
devī kruddhā gadāpātaiścūrṇayāmāsa coddhatam |
bāṣkalaṃ bhindipālena bāṇaistāmraṃ tathāndhakam || 3.18||
अर्थ क्रुद्ध देवी ने गदा के प्रहारों से उद्धत को चूर-चूर कर दिया, भिन्दिपाल से बाष्कल को, तथा बाणों से ताम्र और अन्धक को (मार डाला)।
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम् ।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥ ३.१९॥
ugrāsyamugravīryaṃ ca tathaiva ca mahāhanum |
trinetrā ca triśūlena jaghāna parameśvarī || 3.19||
अर्थ त्रिनेत्रधारिणी परमेश्वरी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु को त्रिशूल से मार डाला।
बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः ।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ ३.२०॥
biḍālasyāsinā kāyāt pātayāmāsa vai śiraḥ |
durdharaṃ durmukhaṃ cobhau śarairninye yamakṣayam || 3.20||
अर्थ उन्होंने तलवार से बिडाल का सिर धड़ से गिरा दिया, और दुर्धर तथा दुर्मुख — दोनों को बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।
एवं सङ्क्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः ।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥ ३.२१॥
evaṃ saṅkṣīyamāṇe tu svasainye mahiṣāsuraḥ |
māhiṣeṇa svarūpeṇa trāsayāmāsa tān gaṇān || 3.21||
अर्थ इस प्रकार अपनी सेना का संहार होते देख महिषासुर ने भैंसे के अपने (असली) रूप से देवी के गणों को त्रस्त कर दिया।
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् ।
लाङ्गूलताडितांश्चान्यान् शृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥ ३.२२॥
kāṃścittuṇḍaprahāreṇa khurakṣepaistathāparān |
lāṅgūlatāḍitāṃścānyān śaृṅgābhyāṃ ca vidāritān || 3.22||
अर्थ किसी को थूथन के प्रहार से, किसी को खुरों की मार से, किसी को पूँछ के आघात से, तो किसी को अपने दोनों सींगों से चीरकर उसने घायल किया।
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च ।
निःश्वासपवनेनान्यान्पातयामास भूतले ॥ ३.२३॥
vegena kāṃścidaparānnādena bhramaṇena ca |
niḥśvāsapavanenānyānpātayāmāsa bhūtale || 3.23||
अर्थ किसी को वेग से, किसी को गर्जना और घुमाव से, तथा अन्य को अपने श्वास की वायु से उसने पृथ्वी पर गिरा दिया।
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः ।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥ ३.२४॥
nipātya pramathānīkamabhyadhāvata so'suraḥ |
siṃhaṃ hantuṃ mahādevyāḥ kopaṃ cakre tato'mbikā || 3.24||
अर्थ प्रमथ-गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने के लिए दौड़ा; तब अम्बिका ने क्रोध किया।
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः ।
शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥ ३.२५॥
so'pi kopānmahāvīryaḥ khurakṣuṇṇamahītalaḥ |
śaृṅgābhyāṃ parvatānuccāṃścikṣepa ca nanāda ca || 3.25||
अर्थ वह महापराक्रमी भी क्रोध से खुरों द्वारा पृथ्वी को खोदता हुआ, अपने सींगों से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को फेंकने और गरजने लगा।
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत ।
लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥ ३.२६॥
vegabhramaṇavikṣuṇṇā mahī tasya vyaśīryata |
lāṅgūlenāhataścābdhiḥ plāvayāmāsa sarvataḥ || 3.26||
अर्थ उसके वेगपूर्ण घुमाव से कुचली हुई पृथ्वी फटने लगी, और उसकी पूँछ के आघात से समुद्र सब ओर उमड़ पड़ा।
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः ।
श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥ ३.२७॥
dhutaśaृṅgavibhinnāśca khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ yayurghanāḥ |
śvāsānilāstāḥ śataśo nipeturnabhaso'calāḥ || 3.27||
अर्थ उसके हिलते हुए सींगों से टकराकर बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए, और उसके श्वास की वायु से आहत होकर पर्वत सैकड़ों की संख्या में आकाश से गिरने लगे।
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् ।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥ ३.२८॥
iti krodhasamādhmātamāpatantaṃ mahāsuram |
dṛṣṭvā sā caṇḍikā kopaṃ tadvadhāya tadākarot || 3.28||
अर्थ इस प्रकार क्रोध से फूले हुए तथा टूट पड़ते हुए उस महान् असुर को देखकर चण्डिका ने उसके वध के लिए क्रोध किया।
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् ।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥ ३.२९॥
sā kṣiptvā tasya vai pāśaṃ taṃ babandha mahāsuram |
tatyāja māhiṣaṃ rūpaṃ so'pi baddho mahāmṛdhe || 3.29||
अर्थ उसने अपना पाश फेंककर उस महान् असुर को बाँध लिया; उस महासंग्राम में बँध जाने पर उसने अपना भैंसे का रूप त्याग दिया।
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः ।
छिनत्ति तावत् पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥ ३.३०॥
tataḥ siṃho'bhavatsadyo yāvattasyāmbikā śiraḥ |
chinatti tāvat puruṣaḥ khaḍgapāṇiradṛśyata || 3.30||
अर्थ तब वह तत्काल सिंह बन गया; ज्यों ही अम्बिका उसका (सिंह का) सिर काटने लगीं, त्यों ही वह हाथ में तलवार लिए पुरुष के रूप में दिखाई दिया।
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः ।
तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥ ३.३१॥
tata evāśu puruṣaṃ devī ciccheda sāyakaiḥ |
taṃ khaḍgacarmaṇā sārdhaṃ tataḥ so'bhūnmahāgajaḥ || 3.31||
अर्थ तुरन्त ही देवी ने ढाल-तलवार सहित उस पुरुष को बाणों से काट डाला; तब वह विशाल हाथी बन गया।
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च ।
कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥ ३.३२॥
kareṇa ca mahāsiṃhaṃ taṃ cakarṣa jagarja ca |
karṣatastu karaṃ devī khaḍgena nirakṛntata || 3.32||
अर्थ उसने अपनी सूँड से उस महान् सिंह को खींचा और गरजा; किन्तु खींचते हुए उसकी सूँड को देवी ने तलवार से काट डाला।
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः ।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३.३३॥
tato mahāsuro bhūyo māhiṣaṃ vapurāsthitaḥ |
tathaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṃ sacarācaram || 3.33||
अर्थ तब वह महान् असुर पुनः भैंसे का शरीर धारण करके, पहले की भाँति ही चराचर सहित तीनों लोकों को क्षुब्ध करने लगा।
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् ।
पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥ ३.३४॥
tataḥ kruddhā jaganmātā caṇḍikā pānamuttamam |
papau punaḥ punaścaiva jahāsāruṇalocanā || 3.34||
अर्थ तब क्रुद्ध जगन्माता चण्डिका ने बार-बार उत्तम पेय (मधु) का पान किया और लाल आँखें किए हुए अट्टहास किया।
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः ।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥ ३.३५॥
nanarda cāsuraḥ so'pi balavīryamadoddhataḥ |
viṣāṇābhyāṃ ca cikṣepa caṇḍikāṃ prati bhūdharān || 3.35||
अर्थ बल और पराक्रम के मद से उन्मत्त वह असुर भी गरजा, और अपने दोनों सींगों से चण्डिका की ओर पर्वत फेंकने लगा।
सा च तान्प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः ।
उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥ ३.३६॥
sā ca tānprahitāṃstena cūrṇayantī śarotkaraiḥ |
uvāca taṃ madoddhūtamukharāgākulākṣaram || 3.36||
अर्थ उसके फेंके हुए उन पर्वतों को बाण-समूहों से चूर्ण करती हुई देवी ने मद से आरक्त मुख के कारण लड़खड़ाते हुए शब्दों में उससे कहा —
देव्युवाच ॥ ३.३७॥
devyuvāca || 3.37||
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ३.३८॥
garja garja kṣaṇaṃ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham |
mayā tvayi hate'traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ || 3.38||
अर्थ अरे मूढ़! जब तक मैं यह मधु पीती हूँ, तब तक क्षण भर गरज ले। तुझे मेरे द्वारा यहीं मार दिए जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे (जय-जयकार करेंगे)।
ऋषिरुवाच ॥ ३.३९॥
ṛṣiruvāca || 3.39||
एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् ।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥ ३.४०॥
evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṃ mahāsuram |
pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat || 3.40||
अर्थ ऐसा कहकर देवी उछलकर उस महान् असुर पर चढ़ गईं और पैर से उसके गले को दबाकर शूल से उस पर प्रहार किया।
ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्तदा ।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः ॥ ३.४१॥
tataḥ so'pi padākrāntastayā nijamukhāttadā |
ardhaniṣkrānta evāsīddevyā vīryeṇa saṃvṛtaḥ || 3.41||
अर्थ तब पैर से दबाए जाने पर वह भी अपने (भैंसे के) मुख से आधा ही बाहर निकल पाया था कि देवी के पराक्रम से घिर गया।
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः ।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥ ३.४२॥
ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ |
tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ || 3.42||
अर्थ आधा ही बाहर निकला हुआ, युद्ध करता हुआ वह महान् असुर देवी द्वारा महाखड्ग से सिर काटकर गिरा दिया गया।
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् ।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥ ३.४३॥
tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ daityasainyaṃ nanāśa tat |
praharṣaṃ ca paraṃ jagmuḥ sakalā devatāgaṇāḥ || 3.43||
अर्थ तब हाहाकार करती हुई वह समस्त दैत्य-सेना नष्ट हो गई, और सम्पूर्ण देवगण परम हर्ष को प्राप्त हुए।
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सहदिव्यैर्महर्षिभिः ।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ३.४४॥
tuṣṭuvustāṃ surā devīṃ sahadivyairmaharṣibhiḥ |
jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ || 3.44||
अर्थ दिव्य महर्षियों सहित देवताओं ने उन देवी की स्तुति की; गन्धर्वराज गान करने लगे और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।
उवाच ३, अर्धश्लोकाः ४१, श्लोकाः ४४, एवमादितः ॥ २१७॥
uvāca 3, ardhaślokāḥ 41, ślokāḥ 44, evamāditaḥ || 217||
अर्थ यह अध्याय के अन्त की गणना-पंक्ति (पुष्पिका) है — इसमें वक्ता-सूचक ('उवाच') पंक्तियाँ ३, अर्धश्लोक ४१ तथा पूर्ण श्लोक ४४ गिनाए गए हैं; आरम्भ से क्रमशः कुल संख्या २१७ बताई गई है।