विनियोगः
अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुरृषिः ।
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता ।
उष्णिक् छन्दः । शाकम्भरी शक्तिः । दुर्गा बीजम् ।
वायुस्तत्त्वम् ।
यजुर्वेदः स्वरूपम् । श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे
मध्यमचरित्रजपे विनियोगः ।
अर्थ विनियोग — इस श्रीमध्यमचरित्र (दुर्गासप्तशती के मध्यम चरित्र) के ऋषि विष्णु हैं, देवता श्रीमहालक्ष्मी हैं, छन्द उष्णिक् है, शक्ति शाकम्भरी है, बीज दुर्गा है, तत्त्व वायु है और स्वरूप यजुर्वेद है। श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए मध्यमचरित्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है।
। ध्यानम् ।
ॐ अक्षस्रक्परशू गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रवालप्रभां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥
| dhyānam |
oṃ akṣasrakparaśū gadeṣukuliśaṃ padmaṃ dhanuḥ kuṇḍikāṃ
daṇḍaṃ śaktimasiṃ ca carma jalajaṃ ghaṇṭāṃ surābhājanam |
śūlaṃ pāśasudarśane ca dadhatīṃ hastaiḥ pravālaprabhāṃ
seve sairibhamardinīmiha mahālakṣmīṃ sarojasthitām ||
अर्थ ध्यान — जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, तलवार, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, त्रिशूल, पाश और सुदर्शन-चक्र धारण करती हैं, जिनकी कान्ति मूँगे के समान अरुण है, कमल पर विराजमान उन महिषासुरमर्दिनी श्रीमहालक्ष्मी का मैं यहाँ ध्यान-उपासना करता हूँ।
ॐ ह्रीं ऋषिरुवाच ॥ २.१॥
oṃ hrīṃ ṛṣiruvāca || 2.1||
अर्थ ऋषि (मेधा मुनि) ने कहा — (ॐ ह्रीं इस बीजमन्त्र के साथ) —
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा ।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥ २.२॥
devāsuramabhūdyuddhaṃ pūrṇamabdaśataṃ purā |
mahiṣe'surāṇāmadhipe devānāṃ ca purandare || 2.2||
अर्थ प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच पूरे सौ वर्षों तक युद्ध हुआ, जब असुरों का अधिपति महिष था और देवताओं का स्वामी इन्द्र (पुरन्दर) था।
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् ।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥ २.३॥
tatrāsurairmahāvīryairdevasainyaṃ parājitam |
jitvā ca sakalān devānindro'bhūnmahiṣāsuraḥ || 2.3||
अर्थ उस युद्ध में महापराक्रमी असुरों ने देवताओं की सेना को पराजित कर दिया, और समस्त देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इन्द्र (देवराज) बन बैठा।
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् ।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥ २.४॥
tataḥ parājitā devāḥ padmayoniṃ prajāpatim |
puraskṛtya gatāstatra yatreśagaruḍadhvajau || 2.4||
अर्थ तब पराजित देवता कमल से उत्पन्न प्रजापति ब्रह्मा को आगे करके वहाँ गए, जहाँ भगवान शिव और गरुड़ध्वज विष्णु विराजमान थे।
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ २.५॥
yathāvṛttaṃ tayostadvanmahiṣāsuraceṣṭitam |
tridaśāḥ kathayāmāsurdevābhibhavavistaram || 2.5||
अर्थ देवताओं ने उन दोनों (शिव और विष्णु) से महिषासुर के सब कृत्य और अपने पराभव (हार) का सारा विस्तार, जैसा घटित हुआ था, वैसा ही कह सुनाया।
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च ।
अन्येषां चाधिकारान्स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥ २.६॥
sūryendrāgnyanilendūnāṃ yamasya varuṇasya ca |
anyeṣāṃ cādhikārānsa svayamevādhitiṣṭhati || 2.6||
अर्थ (उन्होंने कहा —) 'वह महिष सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के अधिकारों को स्वयं ही हड़पकर उन पर अधिष्ठित हो गया है।'
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥ २.७॥
svargānnirākṛtāḥ sarve tena devagaṇā bhuvi |
vicaranti yathā martyā mahiṣeṇa durātmanā || 2.7||
अर्थ 'उस दुरात्मा महिष के द्वारा स्वर्ग से निकाले गए सब देवगण मर्त्यों (मनुष्यों) की भाँति पृथ्वी पर विचरते फिरते हैं।'
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ २.८॥
etadvaḥ kathitaṃ sarvamamarāriviceṣṭitam |
śaraṇaṃ vaḥ prapannāḥ smo vadhastasya vicintyatām || 2.8||
अर्थ 'देवशत्रु (महिष) का यह सब कृत्य हमने आप दोनों से कह दिया है; हम आपकी शरण में आए हैं — अब उसके वध का उपाय सोचा जाए।'
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः ।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥ २.९॥
itthaṃ niśamya devānāṃ vacāṃsi madhusūdanaḥ |
cakāra kopaṃ śambhuśca bhrukuṭīkuṭilānanau || 2.9||
अर्थ देवताओं के ये वचन सुनकर मधुसूदन (विष्णु) और शम्भु (शिव) क्रोध से भर उठे, और उनके मुख भौंहों की टेढ़ी रेखाओं से कुटिल हो गए।
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥ २.१०॥
tato'tikopapūrṇasya cakriṇo vadanāttataḥ |
niścakrāma mahattejo brahmaṇaḥ śaṅkarasya ca || 2.10||
अर्थ तब अत्यन्त क्रोध से भरे चक्रधारी विष्णु के मुख से, तथा ब्रह्मा और शंकर के मुख से भी, महान तेज प्रकट हुआ।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः ।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ २.११॥
anyeṣāṃ caiva devānāṃ śakrādīnāṃ śarīrataḥ |
nirgataṃ sumahattejastaccaikyaṃ samagacchata || 2.11||
अर्थ इन्द्र आदि अन्य देवताओं के शरीरों से भी अत्यन्त महान तेज निकला, और वह सारा तेज एकत्र होकर एक हो गया।
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ २.१२॥
atīva tejasaḥ kūṭaṃ jvalantamiva parvatam |
dadṛśuste surāstatra jvālāvyāptadigantaram || 2.12||
अर्थ देवताओं ने वहाँ अत्यन्त प्रचण्ड तेज का एक पुंज देखा, जो जलते हुए पर्वत के समान था और जिसकी ज्वालाओं ने समस्त दिशाओं को व्याप्त कर रखा था।
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ २.१३॥
atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam |
ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā || 2.13||
अर्थ समस्त देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अनुपम तेज एक स्थान पर संघटित होकर एक नारी के रूप में प्रकट हुआ, जिसने अपनी दीप्ति से तीनों लोकों को व्याप्त कर लिया।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् ।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ २.१४॥
yadabhūcchāmbhavaṃ tejastenājāyata tanmukham |
yāmyena cābhavan keśā bāhavo viṣṇutejasā || 2.14||
अर्थ जो शिव (शाम्भव) का तेज था उससे उस देवी का मुख बना; यम के तेज से उनके केश और विष्णु के तेज से उनकी भुजाएँ बनीं।
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ २.१५॥
saumyena stanayoryugmaṃ madhyaṃ caindreṇa cābhavat |
vāruṇena ca jaṅghorū nitambastejasā bhuvaḥ || 2.15||
अर्थ चन्द्रमा (सौम्य) के तेज से दोनों स्तन, इन्द्र के तेज से कमर (मध्यभाग), वरुण के तेज से जंघाएँ और पिंडलियाँ, तथा पृथ्वी के तेज से नितम्ब बने।
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा ।
वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ २.१६॥
brahmaṇastejasā pādau tadaṅgulyo'rkatejasā |
vasūnāṃ ca karāṅgulyaḥ kaubereṇa ca nāsikā || 2.16||
अर्थ ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण, सूर्य के तेज से पाँवों की उँगलियाँ, वसुओं के तेज से हाथों की उँगलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका बनी।
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा ।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ २.१७॥
tasyāstu dantāḥ sambhūtāḥ prājāpatyena tejasā |
nayanatritayaṃ jajñe tathā pāvakatejasā || 2.17||
अर्थ प्रजापति के तेज से उसके दाँत प्रकट हुए, और अग्नि (पावक) के तेज से उसके तीनों नेत्र उत्पन्न हुए।
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ २.१८॥
bhruvau ca sandhyayostejaḥ śravaṇāvanilasya ca |
anyeṣāṃ caiva devānāṃ sambhavastejasāṃ śivā || 2.18||
अर्थ दोनों सन्ध्याओं (प्रातः-सायं) के तेज से उसकी भौंहें और वायु के तेज से उसके कान बने; इस प्रकार वह कल्याणमयी देवी अन्य देवताओं के तेज से भी प्रकट हुई।
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् ।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ।
ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि च ॥ २.१९॥
tataḥ samastadevānāṃ tejorāśisamudbhavām |
tāṃ vilokya mudaṃ prāpuramarā mahiṣārditāḥ |
tato devā dadustasyai svāni svānyāyudhāni ca || 2.19||
अर्थ तब समस्त देवताओं के तेज-पुंज से उत्पन्न उस देवी को देखकर महिष से पीड़ित देवगण आनन्दित हुए। फिर देवताओं ने अपने-अपने आयुध उन्हें प्रदान किए।
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाट्य स्वचक्रतः ॥ २.२०॥
śūlaṃ śūlādviniṣkṛṣya dadau tasyai pinākadhṛk |
cakraṃ ca dattavān kṛṣṇaḥ samutpāṭya svacakrataḥ || 2.20||
अर्थ पिनाकधारी शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर उन्हें दिया, और श्रीकृष्ण (विष्णु) ने अपने चक्र से एक चक्र निकालकर प्रदान किया।
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।
मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ २.२१॥
śaṅkhaṃ ca varuṇaḥ śaktiṃ dadau tasyai hutāśanaḥ |
māruto dattavāṃścāpaṃ bāṇapūrṇe tatheṣudhī || 2.21||
अर्थ वरुण ने शंख दिया, अग्नि (हुताशन) ने शक्ति दी, और वायु (मरुत्) ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश प्रदान किए।
वज्रमिन्द्रः समुत्पाट्य कुलिशादमराधिपः ।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद्गजात् ॥ २.२२॥
vajramindraḥ samutpāṭya kuliśādamarādhipaḥ |
dadau tasyai sahasrākṣo ghaṇṭāmairāvatādgajāt || 2.22||
अर्थ सहस्राक्ष देवराज इन्द्र ने अपने वज्र (कुलिश) से एक वज्र निकालकर उन्हें दिया, और अपने ऐरावत हाथी से एक घण्टा उतारकर दिया।
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।
प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २.२३॥
kāladaṇḍādyamo daṇḍaṃ pāśaṃ cāmbupatirdadau |
prajāpatiścākṣamālāṃ dadau brahmā kamaṇḍalum || 2.23||
अर्थ यम ने अपने कालदण्ड से एक दण्ड दिया, जल के स्वामी वरुण ने पाश दिया; प्रजापति ने अक्षमाला और ब्रह्मा ने कमण्डलु प्रदान किया।
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।
कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्यै चर्म च निर्मलम् ॥ २.२४॥
samastaromakūpeṣu nijaraśmīn divākaraḥ |
kālaśca dattavān khaḍgaṃ tasyai carma ca nirmalam || 2.24||
अर्थ सूर्य ने उनके समस्त रोमकूपों में अपनी किरणें स्थापित कीं, और काल (यम) ने उन्हें तलवार तथा निर्मल ढाल प्रदान की।
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ २.२५॥
kṣīrodaścāmalaṃ hāramajare ca tathāmbare |
cūḍāmaṇiṃ tathā divyaṃ kuṇḍale kaṭakāni ca || 2.25||
अर्थ क्षीरसागर ने निर्मल हार, कभी जीर्ण न होने वाले दो वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, कुण्डलों की जोड़ी और कड़े प्रदान किए।
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥ २.२६॥
ardhacandraṃ tathā śubhraṃ keyūrān sarvabāhuṣu |
nūpurau vimalau tadvad graiveyakamanuttamam || 2.26||
अर्थ तथा उज्ज्वल अर्धचन्द्र (आभूषण), सब भुजाओं के लिए बाजूबन्द (केयूर), निर्मल नूपुरों की जोड़ी और एक अनुपम कण्ठहार (ग्रैवेयक) भी दिए।
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च ।
विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥ २.२७॥
aṅgulīyakaratnāni samastāsvaṅgulīṣu ca |
viśvakarmā dadau tasyai paraśuṃ cātinirmalam || 2.27||
अर्थ तथा सब उँगलियों के लिए रत्नजड़ित अँगूठियाँ दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा प्रदान किया।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् ।
अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥ २.२८॥
astrāṇyanekarūpāṇi tathābhedyaṃ ca daṃśanam |
amlānapaṅkajāṃ mālāṃ śirasyurasi cāparām || 2.28||
अर्थ अनेक प्रकार के अस्त्र तथा अभेद्य कवच भी दिए; और सिर के लिए तथा वक्षःस्थल के लिए कभी न मुरझाने वाले कमलों की एक-एक माला दी।
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।
हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥ २.२९॥
adadajjaladhistasyai paṅkajaṃ cātiśobhanam |
himavān vāhanaṃ siṃhaṃ ratnāni vividhāni ca || 2.29||
अर्थ समुद्र ने उन्हें अत्यन्त सुशोभित कमल दिया; हिमवान् ने वाहन के रूप में सिंह और नाना प्रकार के रत्न प्रदान किए।
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ।
शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥ २.३०॥
dadāvaśūnyaṃ surayā pānapātraṃ dhanādhipaḥ |
śeṣaśca sarvanāgeśo mahāmaṇivibhūṣitam || 2.30||
अर्थ धनपति कुबेर ने सुरा (मदिरा) से सदा भरा रहने वाला पानपात्र दिया; और समस्त नागों के स्वामी शेषनाग ने —
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् ।
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥ २.३१॥
nāgahāraṃ dadau tasyai dhatte yaḥ pṛthivīmimām |
anyairapi surairdevī bhūṣaṇairāyudhaistathā || 2.31||
अर्थ — जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्होंने महामणियों से विभूषित नागहार उन्हें प्रदान किया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी देवी को आभूषणों और आयुधों से सम्मानित किया।
सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥ २.३२॥
sammānitā nanādoccaiḥ sāṭṭahāsaṃ muhurmuhuḥ |
tasyā nādena ghoreṇa kṛtsnamāpūritaṃ nabhaḥ || 2.32||
अर्थ इस प्रकार सम्मानित होकर देवी बार-बार अट्टहासपूर्वक ऊँचे स्वर से गरज उठीं। उनके उस घोर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा।
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥ २.३३॥
amāyatātimahatā pratiśabdo mahānabhūt |
cukṣubhuḥ sakalā lokāḥ samudrāśca cakampire || 2.33||
अर्थ उस अत्यन्त विस्तृत एवं महान नाद से बड़ी भारी प्रतिध्वनि उठी; समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे और समुद्र काँप उठे।
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।
जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥ २.३४॥
cacāla vasudhā celuḥ sakalāśca mahīdharāḥ |
jayeti devāśca mudā tāmūcuḥ siṃhavāhinīm || 2.34||
अर्थ पृथ्वी डोल उठी और सारे पर्वत हिल गए। तब देवताओं ने हर्षित होकर उस सिंहवाहिनी देवी से 'जय हो' कहा।
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ।
दृष्ट्वा समस्तं सङ्क्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ॥ २.३५॥
tuṣṭuvurmunayaścaināṃ bhaktinamrātmamūrtayaḥ |
dṛṣṭvā samastaṃ saṅkṣubdhaṃ trailokyamamarārayaḥ || 2.35||
अर्थ भक्ति से नम्र शरीर वाले मुनियों ने उनकी स्तुति की। समस्त त्रिलोक को इस प्रकार क्षुब्ध देखकर देवशत्रु (असुर) —
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ।
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥ २.३६॥
sannaddhākhilasainyāste samuttasthurudāyudhāḥ |
āḥ kimetaditi krodhādābhāṣya mahiṣāsuraḥ || 2.36||
अर्थ — अपनी समस्त सेनाओं सहित सन्नद्ध होकर शस्त्र उठाए खड़े हो गए। 'अरे! यह क्या है?' — ऐसा कहकर महिषासुर क्रोध से —
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥ २.३७॥
abhyadhāvata taṃ śabdamaśeṣairasurairvṛtaḥ |
sa dadarśa tato devīṃ vyāptalokatrayāṃ tviṣā || 2.37||
अर्थ — समस्त असुरों से घिरा हुआ उस नाद की ओर दौड़ पड़ा। तब उसने उस देवी को देखा, जो अपनी दीप्ति से तीनों लोकों में व्याप्त थीं,
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥ २.३८॥
pādākrāntyā natabhuvaṃ kirīṭollikhitāmbarām |
kṣobhitāśeṣapātālāṃ dhanurjyāniḥsvanena tām || 2.38||
अर्थ जिनके चरणों के भार से पृथ्वी झुक गई थी, जिनके मुकुट से आकाश छू रहा था, और जिन्होंने अपने धनुष की टंकार से समस्त पातालों को क्षुब्ध कर दिया था;
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद्व्याप्य संस्थिताम् ।
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥ २.३९॥
diśo bhujasahasreṇa samantādvyāpya saṃsthitām |
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tayā devyā suradviṣām || 2.39||
अर्थ जो अपनी सहस्र भुजाओं से चारों ओर सब दिशाओं को व्याप्त करके खड़ी थीं। तब उस देवी और देवद्वेषी असुरों के बीच युद्ध आरम्भ हुआ।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ।
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥ २.४०॥
śastrāstrairbahudhā muktairādīpitadigantaram |
mahiṣāsurasenānīścikṣurākhyo mahāsuraḥ || 2.40||
अर्थ चारों ओर छोड़े गए अनेक शस्त्रों और अस्त्रों से दिशाएँ जगमगा उठीं। महिषासुर की सेना का सेनापति चिक्षुर नामक महान असुर —
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥ २.४१॥
yuyudhe cāmaraścānyaiścaturaṅgabalānvitaḥ |
rathānāmayutaiḥ ṣaḍbhirudagrākhyo mahāsuraḥ || 2.41||
अर्थ — चतुरंगिणी सेना से युक्त होकर, तथा चामर आदि अन्य असुरों के साथ युद्ध करने लगा। उदग्र नामक महान असुर साठ हजार (छह अयुत) रथों के साथ,
अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः ।
पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः ॥ २.४२॥
ayudhyatāyutānāṃ ca sahasreṇa mahāhanuḥ |
pañcāśadbhiśca niyutairasilomā mahāsuraḥ || 2.42||
अर्थ और महाहनु नामक असुर एक करोड़ (एक हजार अयुत) सेना के साथ युद्ध करने लगा; असिलोमा नामक महान असुर पचास नियुत (पाँच करोड़) के साथ,
अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे ।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः ॥ २.४३॥
ayutānāṃ śataiḥ ṣaḍbhirbāṣkalo yuyudhe raṇe |
gajavājisahasraughairanekaiḥ parivāritaḥ || 2.43||
अर्थ बाष्कल नामक असुर छह सौ अयुत (साठ लाख) के साथ रण में लड़ने लगा, और वह अनेक सहस्र हाथी-घोड़ों के समूहों से घिरा हुआ था।
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥ २.४४॥
vṛto rathānāṃ koṭyā ca yuddhe tasminnayudhyata |
biḍālākhyo'yutānāṃ ca pañcāśadbhirathāyutaiḥ || 2.44||
अर्थ एक करोड़ रथों से घिरकर वह उस युद्ध में लड़ा। और बिडाल नामक असुर पचास अयुत गुणित अयुत (पाँच सौ करोड़) रथों —
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥ २.४५॥
yuyudhe saṃyuge tatra rathānāṃ parivāritaḥ |
anye ca tatrāyutaśo rathanāgahayairvṛtāḥ || 2.45||
अर्थ — से घिरकर उस संग्राम में लड़ा। इनके अतिरिक्त और भी अनेक असुर, जो अयुतों की संख्या में रथ, हाथी और घोड़ों से घिरे थे,
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ।
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥ २.४६॥
yuyudhuḥ saṃyuge devyā saha tatra mahāsurāḥ |
koṭikoṭisahasraistu rathānāṃ dantināṃ tathā || 2.46||
अर्थ वे महान असुर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे। करोड़ों-करोड़ों सहस्र रथों, हाथियों —
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ।
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ २.४७॥
hayānāṃ ca vṛto yuddhe tatrābhūnmahiṣāsuraḥ |
tomarairbhindipālaiśca śaktibhirmusalaistathā || 2.47||
अर्थ — और घोड़ों से घिरा हुआ महिषासुर भी उस युद्ध में उपस्थित था। तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति और मूसल आदि आयुधों से,
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः ।
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित् पाशांस्तथापरे ॥ २.४८॥
yuyudhuḥ saṃyuge devyā khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ |
kecicca cikṣipuḥ śaktīḥ kecit pāśāṃstathāpare || 2.48||
अर्थ तथा तलवार, फरसा और पट्टिश (धारदार भाले) से वे असुर देवी के साथ युद्ध करने लगे। कोई शक्ति (बरछी) फेंकते, तो कोई पाश,
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः ।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥ २.४९॥
devīṃ khaḍgaprahāraistu te tāṃ hantuṃ pracakramuḥ |
sāpi devī tatastāni śastrāṇyastrāṇi caṇḍikā || 2.49||
अर्थ और उन्होंने तलवार के प्रहारों से देवी को मारने का प्रयत्न आरम्भ किया। किन्तु उन देवी चण्डिका ने उनके उन शस्त्रों और अस्त्रों को —
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥ २.५०॥
līlayaiva praciccheda nijaśastrāstravarṣiṇī |
anāyastānanā devī stūyamānā surarṣibhiḥ || 2.50||
अर्थ — अपने शस्त्र-अस्त्रों की वर्षा करती हुई लीला-मात्र से ही काट डाला। देवी का मुख तनिक भी थका हुआ नहीं था, और देवगण तथा ऋषि उनकी स्तुति कर रहे थे।
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी ।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥ २.५१॥
mumocāsuradeheṣu śastrāṇyastrāṇi ceśvarī |
so'pi kruddho dhutasaṭo devyā vāhanakesarī || 2.51||
अर्थ देवी (ईश्वरी) असुरों के शरीरों में शस्त्र-अस्त्र छोड़ती रहीं। उधर देवी का वाहन सिंह भी क्रोध से अपनी अयाल हिलाता हुआ —
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः ।
निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥ २.५२॥
cacārāsurasainyeṣu vaneṣviva hutāśanaḥ |
niḥśvāsān mumuce yāṃśca yudhyamānā raṇe'mbikā || 2.52||
अर्थ — असुरों की सेनाओं में इस प्रकार विचरने लगा जैसे वनों में अग्नि। युद्ध करती हुई अम्बिका ने जो निःश्वास छोड़े,
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः ।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥ २.५३॥
ta eva sadyaḥ sambhūtā gaṇāḥ śatasahasraśaḥ |
yuyudhuste paraśubhirbhindipālāsipaṭṭiśaiḥ || 2.53||
अर्थ वे ही निःश्वास तत्काल सैकड़ों-हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गए। वे गण फरसों, भिन्दिपालों, तलवारों और पट्टिशों से —
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः ।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥ २.५४॥
nāśayanto'suragaṇān devīśaktyupabṛṃhitāḥ |
avādayanta paṭahān gaṇāḥ śaṅkhāṃstathāpare || 2.54||
अर्थ — असुर-सेनाओं का नाश करते हुए युद्ध करने लगे; वे देवी की शक्ति से बलवान् बने हुए थे। कुछ गण ढोल (पटह) बजाने लगे, तो कुछ शंख,
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः ॥ २.५५॥
mṛdaṅgāṃśca tathaivānye tasmin yuddhamahotsave |
tato devī triśūlena gadayā śaktivṛṣṭibhiḥ || 2.55||
अर्थ और कुछ अन्य उस युद्धरूपी महोत्सव में मृदंग बजाने लगे। तब देवी ने त्रिशूल, गदा तथा शक्तियों की वर्षा से,
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् ।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥ २.५६॥
khaḍgādibhiśca śataśo nijaghāna mahāsurān |
pātayāmāsa caivānyān ghaṇṭāsvanavimohitān || 2.56||
अर्थ और तलवार आदि शस्त्रों से सैकड़ों महान असुरों का संहार किया; तथा घण्टे के स्वर से मोहित हुए अन्य असुरों को भी मार गिराया।
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् ।
केचिद् द्विधाकृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥ २.५७॥
asurān bhuvi pāśena baddhvā cānyānakarṣayat |
kecid dvidhākṛtāstīkṣṇaiḥ khaḍgapātaistathāpare || 2.57||
अर्थ कुछ असुरों को पाश से पृथ्वी पर बाँधकर उसने घसीटा, तथा कुछ अन्य को अपने तीखे खड्ग के प्रहारों से दो टुकड़े कर डाला।
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ।
वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥ २.५८॥
vipothitā nipātena gadayā bhuvi śerate |
vemuśca kecidrudhiraṃ musalena bhṛśaṃ hatāḥ || 2.58||
अर्थ कुछ असुर गदा के प्रहार से चूर-चूर होकर धरती पर पड़े रहे, और कुछ मूसल से बुरी तरह आहत होकर रक्त वमन करने लगे।
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि ।
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥ २.५९॥
kecinnipatitā bhūmau bhinnāḥ śūlena vakṣasi |
nirantarāḥ śaraugheṇa kṛtāḥ kecidraṇājire || 2.59||
अर्थ कुछ असुर शूल से छाती में बिंधकर भूमि पर गिर पड़े, और कुछ रणभूमि में बाणों की झड़ी से छलनी कर दिए गए।
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः ।
केषाञ्चिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥ २.६०॥
śyenānukāriṇaḥ prāṇān mumucustridaśārdanāḥ |
keṣāñcid bāhavaśchinnāśchinnagrīvāstathāpare || 2.60||
अर्थ देवताओं को सताने वाले वे असुर बाज पक्षियों की भाँति (शीघ्रता से) अपने प्राण छोड़ने लगे। किन्हीं की भुजाएँ कट गईं, तो किन्हीं की गरदनें कट गईं,
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः ।
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥ २.६१॥
śirāṃsi peturanyeṣāmanye madhye vidāritāḥ |
vicchinnajaṅghāstvapare petururvyāṃ mahāsurāḥ || 2.61||
अर्थ कितनों के सिर कट गिरे, कितने बीच से चीर डाले गए, और कितने महान असुर टाँगें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े।
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधाकृताः ।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ २.६२॥
ekabāhvakṣicaraṇāḥ keciddevyā dvidhākṛtāḥ |
chinne'pi cānye śirasi patitāḥ punarutthitāḥ || 2.62||
अर्थ कुछ असुर देवी के द्वारा बीच से दो टुकड़े कर दिए जाने पर एक ही भुजा, एक ही आँख और एक ही पाँव वाले रह गए; और कुछ अन्य सिर कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ खड़े हुए।
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ।
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥ २.६३॥
kabandhā yuyudhurdevyā gṛhītaparamāyudhāḥ |
nanṛtuścāpare tatra yuddhe tūryalayāśritāḥ || 2.63||
अर्थ श्रेष्ठ आयुध धारण किए हुए धड़ (कबन्ध) ही देवी से युद्ध करने लगे; और कुछ अन्य वहाँ युद्ध में बाजों की लय-ताल पर नाचने लगे।
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः ।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥ २.६४॥
kabandhāśchinnaśirasaḥ khaḍgaśaktyṛṣṭipāṇayaḥ |
tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣanto devīmanye mahāsurāḥ || 2.64||
अर्थ कटे हुए सिर वाले वे कबन्ध हाथों में तलवार, शक्ति और ऋष्टि (धारदार भाले) लिए हुए, 'ठहर, ठहर' कहते हुए देवी की ओर बढ़े — ऐसे और भी अनेक महान असुर थे।
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा ।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत् स महारणः ॥ २.६५॥
pātitai rathanāgāśvairasuraiśca vasundharā |
agamyā sābhavattatra yatrābhūt sa mahāraṇaḥ || 2.65||
अर्थ गिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों से वह भूमि, जहाँ वह महासंग्राम हुआ, चलने-फिरने योग्य नहीं रह गई (अगम्य हो गई)।
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ २.६६॥
śoṇitaughā mahānadyaḥ sadyastatra prasusruvuḥ |
madhye cāsurasainyasya vāraṇāsuravājinām || 2.66||
अर्थ असुर-सेना के बीच, हाथियों, असुरों और घोड़ों के रक्त से महानदियों के समान रक्त की धाराएँ वहाँ तत्काल बह निकलीं।
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका ।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ २.६७॥
kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā |
ninye kṣayaṃ yathā vahnistṛṇadārumahācayam || 2.67||
अर्थ जैसे अग्नि तिनकों और लकड़ियों के महान ढेर को क्षणभर में भस्म कर देती है, वैसे ही अम्बिका ने असुरों की उस विशाल सेना को क्षणमात्र में नष्ट कर दिया।
स च सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः ।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ २.६८॥
sa ca siṃho mahānādamutsṛjan dhutakesaraḥ |
śarīrebhyo'marārīṇāmasūniva vicinvati || 2.68||
अर्थ और वह सिंह अपनी अयाल हिलाता हुआ महान गर्जना करता रहा, मानो देवशत्रु असुरों के शरीरों से उनके प्राण खोज-खोजकर निकाल रहा हो।
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः ।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ २.६९॥
devyā gaṇaiśca taistatra kṛtaṃ yuddhaṃ tathāsuraiḥ |
yathaiṣāṃ tutuṣurdevāḥ puṣpavṛṣṭimuco divi || 2.69||
अर्थ वहाँ देवी और उनके गणों ने असुरों के साथ ऐसा युद्ध किया कि उससे प्रसन्न होकर देवता आकाश से पुष्पों की वर्षा करने लगे।
उवाच १, अर्धश्लोकाः ६८, श्लोकाः ६९, एवमादितः ॥ १७३॥
uvāca 1, ardhaślokāḥ 68, ślokāḥ 69, evamāditaḥ || 173||
अर्थ (यह अध्याय के अन्त की श्लोक-गणना है —) उवाच (वक्ता-सूचक पंक्ति) — १, अर्धश्लोक — ६८, पूर्ण श्लोक — ६९; इस प्रकार आरम्भ से अब तक कुल संख्या — १७३। यह पाठ की गणना दर्शाने वाली सम्पादकीय पंक्ति है, कथा का अंग नहीं।