विनियोगः
अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य । ब्रह्मा ऋषिः ।
महाकाली देवता । गायत्री छन्दः । नन्दा शक्तिः ।
रक्तदन्तिका बीजम् । अग्निस्तत्त्वम् ।
ऋग्वेदः स्वरूपम् । श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे
प्रथमचरित्रजपे विनियोगः ।
अर्थ विनियोग — इस श्रीप्रथमचरित्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, देवता महाकाली हैं, छन्द गायत्री है, शक्ति नन्दा है, बीज रक्तदन्तिका है, तत्त्व अग्नि है और स्वरूप ऋग्वेद है। श्रीमहाकाली की प्रसन्नता के लिए प्रथमचरित्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है।
। ध्यानम् ।
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
| dhyānam |
oṃ khaḍgaṃ cakragadeṣucāpaparighāñchūlaṃ bhuśuṇḍīṃ śiraḥ
śaṅkhaṃ sandadhatīṃ karaistrinayanāṃ sarvāṅgabhūṣāvṛtām |
nīlāśmadyutimāsyapādadaśakāṃ seve mahākālikāṃ
yāmastautsvapite harau kamalajo hantuṃ madhuṃ kaiṭabham ||
अर्थ ध्यान — मैं उन महाकाली की उपासना करता हूँ, जो अपने हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, (कटा हुआ) मस्तक और शंख धारण किए हुए हैं; जो तीन नेत्रों वाली तथा समस्त अंगों में आभूषणों से विभूषित हैं; जिनकी कान्ति नीलमणि के समान है और जिनके दस मुख तथा दस चरण हैं; और जिनकी स्तुति कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने, विष्णु के सो जाने पर, मधु और कैटभ का वध कराने के लिए की थी।
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
oṃ namaścaṇḍikāyai ||
अर्थ ॐ, चण्डिका देवी को नमस्कार है।
ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच ॥ १.१॥
oṃ aiṃ mārkaṇḍeya uvāca || 1.1||
अर्थ ॐ ऐं। मार्कण्डेय जी बोले —
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद्गदतो मम ॥ १.२॥
sāvarṇiḥ sūryatanayo yo manuḥ kathyate'ṣṭamaḥ |
niśāmaya tadutpattiṃ vistarādgadato mama || 1.2||
अर्थ सूर्य के पुत्र सावर्णि, जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति (मनु-पद की प्राप्ति) का वृत्तान्त मुझसे विस्तारपूर्वक कहे जाते हुए सुनो।
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ १.३॥
mahāmāyānubhāvena yathā manvantarādhipaḥ |
sa babhūva mahābhāgaḥ sāvarṇistanayo raveḥ || 1.3||
अर्थ महामाया के प्रभाव से किस प्रकार सूर्य के वे महाभाग पुत्र सावर्णि मन्वन्तर के अधिपति (मनु) हुए — यह सुनो।
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ १.४॥
svārociṣe'ntare pūrvaṃ caitravaṃśasamudbhavaḥ |
suratho nāma rājābhūtsamaste kṣitimaṇḍale || 1.4||
अर्थ पूर्वकाल में, स्वारोचिष मन्वन्तर में, चैत्र वंश में उत्पन्न सुरथ नामक एक राजा समस्त पृथ्वीमण्डल पर (राज्य करता) था।
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ १.५॥
tasya pālayataḥ samyak prajāḥ putrānivaurasān |
babhūvuḥ śatravo bhūpāḥ kolāvidhvaṃsinastadā || 1.5||
अर्थ जब वह अपनी प्रजा की, अपने औरस पुत्रों के समान, भलीभाँति रक्षा कर रहा था, उस समय कोलाविध्वंसी नामक शत्रु राजा (उसके विरुद्ध) उठ खड़े हुए।
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ १.६॥
tasya tairabhavad yuddhamatiprabaladaṇḍinaḥ |
nyūnairapi sa tairyuddhe kolāvidhvaṃsibhirjitaḥ || 1.6||
अर्थ अत्यन्त बलशाली दण्ड (सेना) वाले उस राजा का उनके साथ युद्ध हुआ; और यद्यपि वे संख्या में कम थे, फिर भी उन कोलाविध्वंसियों ने युद्ध में उसे परास्त कर दिया।
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ १.७॥
tataḥ svapuramāyāto nijadeśādhipo'bhavat |
ākrāntaḥ sa mahābhāgastaistadā prabalāribhiḥ || 1.7||
अर्थ तब वह अपने नगर को लौट आया और केवल अपने ही देश का अधिपति रह गया। वे महाभाग राजा उस समय उन बलवान् शत्रुओं से आक्रान्त (पीड़ित) थे।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥ १.८॥
amātyairbalibhirduṣṭairdurbalasya durātmabhiḥ |
kośo balaṃ cāpahṛtaṃ tatrāpi svapure tataḥ || 1.8||
अर्थ फिर उस दुर्बल हो चुके राजा के, बलवान्, दुष्ट एवं दुरात्मा मन्त्रियों ने, उसके अपने ही नगर में उसका कोश और सेना भी छीन ली।
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ १.९॥
tato mṛgayāvyājena hṛtasvāmyaḥ sa bhūpatiḥ |
ekākī hayamāruhya jagāma gahanaṃ vanam || 1.9||
अर्थ तब जिसका राज्याधिकार छिन चुका था, वह राजा शिकार के बहाने अकेला ही घोड़े पर सवार होकर घने वन में चला गया।
स तत्राश्रममद्राक्षीद्द्विजवर्यस्य मेधसः ।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १.१०॥
sa tatrāśramamadrākṣīddvijavaryasya medhasaḥ |
praśāntaśvāpadākīrṇaṃ muniśiṣyopaśobhitam || 1.10||
अर्थ वहाँ उसने श्रेष्ठ ब्राह्मण मेधा का आश्रम देखा, जो शान्त हो चुके हिंसक पशुओं से भरा हुआ और मुनि के शिष्यों से सुशोभित था।
तस्थौ कञ्चित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥ १.११॥
tasthau kañcitsa kālaṃ ca muninā tena satkṛtaḥ |
itaścetaśca vicaraṃstasmin munivarāśrame || 1.11||
अर्थ वह कुछ काल तक वहाँ रहा और उस मुनि से सत्कार पाकर उस श्रेष्ठ मुनि के आश्रम में इधर-उधर विचरता रहा।
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टमानसः ।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥ १.१२॥
so'cintayattadā tatra mamatvākṛṣṭamānasaḥ |
matpūrvaiḥ pālitaṃ pūrvaṃ mayā hīnaṃ puraṃ hi tat || 1.12||
अर्थ तब ममता से खिंचे हुए मन वाला वह राजा वहाँ सोचने लगा — 'वह नगर, जिसे पहले मेरे पूर्वजों ने पाला था और जो अब मुझसे रहित हो गया है,
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ।
न जाने स प्रधानो मे शूरो हस्ती सदामदः ॥ १.१३॥
madbhṛtyaistairasadvṛttairdharmataḥ pālyate na vā |
na jāne sa pradhāno me śūro hastī sadāmadaḥ || 1.13||
अर्थ मेरे उन दुराचारी सेवकों के द्वारा धर्मपूर्वक पालित हो रहा है या नहीं? मैं नहीं जानता कि मेरा वह प्रधान, शूरवीर, सदा मदमत्त हाथी (किस दशा में है)।
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १.१४॥
mama vairivaśaṃ yātaḥ kān bhogānupalapsyate |
ye mamānugatā nityaṃ prasādadhanabhojanaiḥ || 1.14||
अर्थ जो मेरे शत्रुओं के वश में चला गया है — वह अब कौन-से भोग (सुख) पाएगा? और जो लोग सदा मेरी कृपा, धन और भोजन से मेरे अनुगत रहते थे,
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ।
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥ १.१५॥
anuvṛttiṃ dhruvaṃ te'dya kurvantyanyamahībhṛtām |
asamyagvyayaśīlaistaiḥ kurvadbhiḥ satataṃ vyayam || 1.15||
अर्थ वे निश्चय ही आज दूसरे राजाओं की सेवा (अनुवृत्ति) कर रहे होंगे। और अनुचित रीति से व्यय करने वाले उन (मन्त्रियों) के द्वारा निरन्तर व्यय किए जाते रहने से,
सञ्चितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १.१६॥
sañcitaḥ so'tiduḥkhena kṣayaṃ kośo gamiṣyati |
etaccānyacca satataṃ cintayāmāsa pārthivaḥ || 1.16||
अर्थ बड़े कष्ट से संचित किया हुआ वह कोश क्षीण हो जाएगा।' — यह और ऐसा ही अन्य बहुत कुछ राजा निरन्तर सोचता रहा।
तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः ।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १.१७॥
tatra viprāśramābhyāśe vaiśyamekaṃ dadarśa saḥ |
sa pṛṣṭastena kastvaṃ bho hetuścāgamane'tra kaḥ || 1.17||
अर्थ वहाँ ब्राह्मण के आश्रम के समीप उसने एक वैश्य को देखा। राजा ने उससे पूछा — 'आप कौन हैं? और यहाँ आपके आने का क्या कारण है?
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥ १.१८॥
saśoka iva kasmāttvaṃ durmanā iva lakṣyase |
ityākarṇya vacastasya bhūpateḥ praṇayoditam || 1.18||
अर्थ आप शोकग्रस्त-से और उदास मन वाले-से क्यों दिखाई देते हैं?' — राजा के इन प्रेमपूर्वक कहे हुए वचनों को सुनकर,
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥ १.१९॥
pratyuvāca sa taṃ vaiśyaḥ praśrayāvanato nṛpam || 1.19||
अर्थ उस वैश्य ने विनयपूर्वक झुककर राजा को उत्तर दिया।
वैश्य उवाच ॥ १.२०॥
vaiśya uvāca || 1.20||
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ १.२१॥
samādhirnāma vaiśyo'hamutpanno dhanināṃ kule || 1.21||
अर्थ 'मैं समाधि नामक वैश्य हूँ, धनियों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ।
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥ १.२२॥
putradārairnirastaśca dhanalobhādasādhubhiḥ |
vihīnaśca dhanairdāraiḥ putrairādāya me dhanam || 1.22||
अर्थ धन के लोभ से दुष्ट हुए अपने पुत्रों और पत्नी के द्वारा मैं निकाल दिया गया हूँ; मेरा धन छीनकर पुत्रों ने मुझे धन और पत्नी से रहित कर दिया।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥ १.२३॥
vanamabhyāgato duḥkhī nirastaścāptabandhubhiḥ |
so'haṃ na vedmi putrāṇāṃ kuśalākuśalātmikām || 1.23||
अर्थ दुःखी होकर मैं वन में चला आया हूँ, अपने विश्वासपात्र बन्धुओं के द्वारा भी निकाला जाकर। इस प्रकार आया हुआ मैं अपने पुत्रों के कुशल-अकुशल का समाचार नहीं जानता।
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ १.२४॥
pravṛttiṃ svajanānāṃ ca dārāṇāṃ cātra saṃsthitaḥ |
kiṃ nu teṣāṃ gṛhe kṣemamakṣemaṃ kiṃ nu sāmpratam || 1.24||
अर्थ यहाँ रहते हुए मैं अपने स्वजनों और पत्नी का भी हाल नहीं जानता। इस समय उनके घर में कुशल है या अकुशल?
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ १.२५॥
kathaṃ te kiṃ nu sadvṛttā durvṛttāḥ kiṃ nu me sutāḥ || 1.25||
अर्थ वे कैसे हैं? मेरे पुत्र सदाचारी हैं या दुराचारी?'
राजोवाच ॥ १.२६॥
rājovāca || 1.26||
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ १.२७॥
yairnirasto bhavām̐llubdhaiḥ putradārādibhirdhanaiḥ || 1.27||
अर्थ 'जिन धन-लोभी पुत्रों, पत्नी आदि ने आपको धन के लिए निकाल दिया,
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ १.२८॥
teṣu kiṃ bhavataḥ snehamanubadhnāti mānasam || 1.28||
अर्थ उन पर आपका मन अब भी स्नेह से क्यों बँधा हुआ है?'
वैश्य उवाच ॥ १.२९॥
vaiśya uvāca || 1.29||
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥ १.३०॥
evametadyathā prāha bhavānasmadgataṃ vacaḥ || 1.30||
अर्थ 'आपने मेरे विषय में जो कहा, वह ठीक वैसा ही है (जैसा है)।
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ १.३१॥
kiṃ karomi na badhnāti mama niṣṭhuratāṃ manaḥ |
yaiḥ santyajya pitṛsnehaṃ dhanalubdhairnirākṛtaḥ || 1.31||
अर्थ पर मैं क्या करूँ? मेरा मन कठोरता को नहीं अपनाता। जिन धन-लोभियों ने पिता के स्नेह को छोड़कर मुझे निकाल दिया,
पतिस्वजनहार्दं च हार्दितेष्वेव मे मनः ।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ १.३२॥
patisvajanahārdaṃ ca hārditeṣveva me manaḥ |
kimetannābhijānāmi jānannapi mahāmate || 1.32||
अर्थ उन (पत्नी और स्वजनों) के प्रति पति और स्वजन के नाते मेरा हृदय-स्नेह उन्हीं में लगा रहता है; मेरा मन उन्हीं की ओर आकृष्ट है। हे महाबुद्धिमान्! यह क्या है — यह मैं जानते हुए भी नहीं समझ पाता।
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ १.३३॥
yatpremapravaṇaṃ cittaṃ viguṇeṣvapi bandhuṣu |
teṣāṃ kṛte me niḥśvāso daurmanasyaṃ ca jāyate || 1.33||
अर्थ इन गुणहीन बन्धुओं में भी जिनके प्रति मेरा चित्त प्रेम में झुका रहता है, उन्हीं के लिए मुझे लम्बी साँसें और मन की उदासी (दौर्मनस्य) होती है।
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ १.३४॥
karomi kiṃ yanna manasteṣvaprītiṣu niṣṭhuram || 1.34||
अर्थ मैं क्या करूँ, जब मेरा मन उन प्रेमरहित (मेरे प्रति अप्रीति रखने वाले) लोगों के प्रति भी कठोर नहीं होता?'
मार्कण्डेय उवाच ॥ १.३५॥
mārkaṇḍeya uvāca || 1.35||
अर्थ मार्कण्डेय जी बोले —
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥ १.३६॥
tatastau sahitau vipra taṃ muniṃ samupasthitau || 1.36||
अर्थ हे विप्र! तब वे दोनों एक साथ उस मुनि के पास उपस्थित हुए।
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥ १.३७॥
samādhirnāma vaiśyo'sau sa ca pārthivasattamaḥ |
kṛtvā tu tau yathānyāyaṃ yathārhaṃ tena saṃvidam || 1.37||
अर्थ वह समाधि नामक वैश्य और वह श्रेष्ठ राजा — दोनों ने उन मुनि के साथ यथोचित एवं योग्यतानुसार अभिवादन-वार्ता करके,
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ १.३८॥
upaviṣṭau kathāḥ kāściccakraturvaiśyapārthivau || 1.38||
अर्थ बैठकर, वैश्य और राजा दोनों ने कुछ बातें कीं।
राजोवाच ॥ १.३९॥
rājovāca || 1.39||
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥ १.४०॥
bhagavaṃstvāmahaṃ praṣṭumicchāmyekaṃ vadasva tat || 1.40||
अर्थ 'हे भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, कृपया वह बताइए।
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥ १.४१॥
duḥkhāya yanme manasaḥ svacittāyattatāṃ vinā |
mamatvaṃ gatarājyasya rājyāṅgeṣvakhileṣvapi || 1.41||
अर्थ जो मेरे मन को दुःख देता है — मेरे अपने चित्त के वश में न रहकर (जो उत्पन्न होता है) — राज्य के चले जाने पर भी राज्य के समस्त अंगों में मेरी जो ममता बनी हुई है,
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ १.४२॥
jānato'pi yathājñasya kimetanmunisattama |
ayaṃ ca nikṛtaḥ putrairdārairbhṛtyaistathojjhitaḥ || 1.42||
अर्थ हे मुनिश्रेष्ठ! जानते हुए भी अज्ञानी के समान (यह ममता मुझमें क्यों है) — यह क्या है? और ये (वैश्य) भी, जो अपने पुत्रों से ठगे गए तथा पत्नी और सेवकों द्वारा त्यागे गए,
स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥ १.४३॥
svajanena ca santyaktasteṣu hārdī tathāpyati |
evameṣa tathāhaṃ ca dvāvapyatyantaduḥkhitau || 1.43||
अर्थ और अपने स्वजनों द्वारा भी छोड़े गए — फिर भी उन्हीं के प्रति अत्यन्त स्नेहयुक्त हैं। इस प्रकार ये और मैं — हम दोनों ही अत्यन्त दुःखी हैं;
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ १.४४॥
dṛṣṭadoṣe'pi viṣaye mamatvākṛṣṭamānasau |
tatkimetanmahābhāga yanmoho jñāninorapi || 1.44||
अर्थ विषय में दोष देख लेने पर भी हमारे मन ममता से खिंचे हुए हैं। हे महाभाग! यह क्या है कि हम ज्ञानी (विवेकी) होते हुए भी मोह में पड़े हैं?
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ १.४५॥
mamāsya ca bhavatyeṣā vivekāndhasya mūḍhatā || 1.45||
अर्थ विवेक से अन्धे हुए मुझे और इसे — हम दोनों को यह मूढ़ता (क्यों) घेरे हुए है?'
ऋषिरुवाच ॥ १.४६॥
ṛṣiruvāca || 1.46||
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥ १.४७॥
jñānamasti samastasya jantorviṣayagocare || 1.47||
अर्थ 'प्रत्येक प्राणी को विषयों के क्षेत्र में (अपने-अपने) विषय का ज्ञान रहता है।
विषयाश्च महाभाग यान्ति चैवं पृथक्पृथक् ।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥ १.४८॥
viṣayāśca mahābhāga yānti caivaṃ pṛthakpṛthak |
divāndhāḥ prāṇinaḥ kecidrātrāvandhāstathāpare || 1.48||
अर्थ हे महाभाग! और वे विषय इसी प्रकार भिन्न-भिन्न रूप में (प्राणियों को प्राप्त होते) हैं। कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं और कुछ अन्य रात में अन्धे;
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ १.४९॥
keciddivā tathā rātrau prāṇinastulyadṛṣṭayaḥ |
jñānino manujāḥ satyaṃ kiṃ tu te na hi kevalam || 1.49||
अर्थ कुछ प्राणी दिन और रात दोनों में समान दृष्टि वाले होते हैं। मनुष्य ज्ञानवान् हैं — यह सत्य है; किन्तु केवल वे ही (ज्ञानी) नहीं हैं,
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥ १.५०॥
yato hi jñāninaḥ sarve paśupakṣimṛgādayaḥ |
jñānaṃ ca tanmanuṣyāṇāṃ yatteṣāṃ mṛgapakṣiṇām || 1.50||
अर्थ क्योंकि पशु, पक्षी, मृग आदि सभी (अपने विषय के) ज्ञानी हैं। और जो ज्ञान मनुष्यों को (आहार आदि का) है, वही उन पशु-पक्षियों को भी है।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥ १.५१॥
manuṣyāṇāṃ ca yatteṣāṃ tulyamanyattathobhayoḥ |
jñāne'pi sati paśyaitān pataṅgāñchāvacañcuṣu || 1.51||
अर्थ मनुष्यों को जो (ज्ञान) है और उन्हें जो है, वह तथा अन्य बातें भी दोनों में समान हैं। ज्ञान होते हुए भी इन पक्षियों को देखो, जो अपने बच्चों की चोंच में
कणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥ १.५२॥
kaṇamokṣādṛtān mohātpīḍyamānānapi kṣudhā |
mānuṣā manujavyāghra sābhilāṣāḥ sutān prati || 1.52||
अर्थ (दाना डालने में तत्पर हैं;) मोहवश, स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी वे दाना चुगाने में लगे रहते हैं। हे नरश्रेष्ठ! मनुष्य भी अपने पुत्रों के प्रति अभिलाषा (आशा) रखते हुए,
लोभात् प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥ १.५३॥
lobhāt pratyupakārāya nanvetān kiṃ na paśyasi |
tathāpi mamatāvartte mohagarte nipātitāḥ || 1.53||
अर्थ लोभ के कारण, प्रत्युपकार (बदले में लाभ) की आशा से (उनका पालन करते हैं) — क्या तुम इन्हें नहीं देखते? फिर भी ये सब ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिराए गए हैं —
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ १.५४॥
mahāmāyāprabhāveṇa saṃsārasthitikāriṇā |
tannātra vismayaḥ kāryo yoganidrā jagatpateḥ || 1.54||
अर्थ संसार की स्थिति करने वाली महामाया के प्रभाव से। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वह (महामाया) जगत्पति (विष्णु) की योगनिद्रा है।
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥ १.५५॥
mahāmāyā hareścaiṣā tayā sammohyate jagat |
jñānināmapi cetāṃsi devī bhagavatī hi sā || 1.55||
अर्थ यह हरि (विष्णु) की महामाया है; इसी के द्वारा यह जगत् मोहित किया जाता है। वह भगवती देवी ही ज्ञानियों के भी चित्त को
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ १.५६॥
balādākṛṣya mohāya mahāmāyā prayacchati |
tayā visṛjyate viśvaṃ jagadetaccarācaram || 1.56||
अर्थ बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है। उसी के द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् रचा (प्रकट किया) जाता है।
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥ १.५७॥
saiṣā prasannā varadā nṛṇāṃ bhavati muktaye |
sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī || 1.57||
अर्थ वही देवी प्रसन्न होने पर मनुष्यों की मुक्ति के लिए वरदायिनी होती है। वही मुक्ति की कारणभूत सनातन परा विद्या है,
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ १.५८॥
saṃsārabandhahetuśca saiva sarveśvareśvarī || 1.58||
अर्थ और वही संसार-बन्धन का कारण भी है; वही समस्त ईश्वरों की भी ईश्वरी (परमेश्वरी) है।'
राजोवाच ॥ १.५९॥
rājovāca || 1.59||
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥ १.६०॥
bhagavan kā hi sā devī mahāmāyeti yāṃ bhavān || 1.60||
अर्थ 'हे भगवन्! जिसे आप महामाया कहते हैं, वह देवी वास्तव में कौन है?
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ १.६१॥
bravīti kathamutpannā sā karmāsyāśca kiṃ dvija |
yatprabhāvā ca sā devī yatsvarūpā yadudbhavā || 1.61||
अर्थ हे द्विज! वह किस प्रकार उत्पन्न हुई और उसका कार्य क्या है? उस देवी का प्रभाव कैसा है, उसका स्वरूप कैसा है, और वह किससे प्रकट हुई?
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ १.६२॥
tatsarvaṃ śrotumicchāmi tvatto brahmavidāṃ vara || 1.62||
अर्थ हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! वह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।'
ऋषिरुवाच ॥ १.६३॥
ṛṣiruvāca || 1.63||
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ १.६४॥
nityaiva sā jaganmūrtistayā sarvamidaṃ tatam || 1.64||
अर्थ 'वह देवी तो नित्या ही है, जगत् उसी का स्वरूप है; उसी के द्वारा यह सब (विश्व) व्याप्त है।
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ १.६५॥
tathāpi tatsamutpattirbahudhā śrūyatāṃ mama |
devānāṃ kāryasiddhyarthamāvirbhavati sā yadā || 1.65||
अर्थ फिर भी उसकी उत्पत्ति (प्रकट होने) के अनेक प्रकार मुझसे सुनो। देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए जब वह प्रकट होती है,
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ १.६६॥
utpanneti tadā loke sā nityāpyabhidhīyate |
yoganidrāṃ yadā viṣṇurjagatyekārṇavīkṛte || 1.66||
अर्थ तब यद्यपि वह नित्या है, फिर भी लोक में 'उत्पन्न हुई' — ऐसा कहा जाता है। जब सारा जगत् एकार्णव (एक ही समुद्र) रूप हो गया, तब विष्णु ने योगनिद्रा (धारण की) —
आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ १.६७॥
āstīrya śeṣamabhajat kalpānte bhagavān prabhuḥ |
tadā dvāvasurau ghorau vikhyātau madhukaiṭabhau || 1.67||
अर्थ कल्प के अन्त में भगवान् प्रभु (विष्णु) शेषनाग को बिछाकर (उस पर शयन करते हुए) योगनिद्रा में लीन हुए। उसी समय मधु और कैटभ नामक दो घोर एवं विख्यात असुर,
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ १.६८॥
viṣṇukarṇamalodbhūtau hantuṃ brahmāṇamudyatau |
sa nābhikamale viṣṇoḥ sthito brahmā prajāpatiḥ || 1.68||
अर्थ जो विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न हुए थे, ब्रह्मा को मारने के लिए उद्यत हुए। विष्णु के नाभि-कमल पर स्थित प्रजापति ब्रह्मा,
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयः स्थितः ॥ १.६९॥
dṛṣṭvā tāvasurau cograu prasuptaṃ ca janārdanam |
tuṣṭāva yoganidrāṃ tāmekāgrahṛdayaḥ sthitaḥ || 1.69||
अर्थ उन दोनों उग्र असुरों को तथा सोए हुए जनार्दन (विष्णु) को देखकर, एकाग्र हृदय से स्थित होकर, उस योगनिद्रा की स्तुति करने लगे —
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ १.७०॥
vibodhanārthāya harerharinetrakṛtālayām |
viśveśvarīṃ jagaddhātrīṃ sthitisaṃhārakāriṇīm || 1.70||
अर्थ हरि (विष्णु) को जगाने के लिए (उस देवी की स्तुति की), जिसने हरि के नेत्रों में अपना निवास बनाया है, जो विश्वेश्वरी, जगद्धात्री तथा (जगत् की) स्थिति और संहार करने वाली हैं;
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ १.७१॥
nidrāṃ bhagavatīṃ viṣṇoratulāṃ tejasaḥ prabhuḥ || 1.71||
अर्थ वे प्रभु (ब्रह्मा) विष्णु की उस अतुलनीय तेजस्विनी भगवती निद्रा की (स्तुति करने लगे)।
ब्रह्मोवाच ॥ १.७२॥
brahmovāca || 1.72||
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥ १.७३॥
tvaṃ svāhā tvaṃ svadhā tvaṃ hi vaṣaṭkāraḥ svarātmikā || 1.73||
अर्थ 'तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार हो, और स्वर (के उच्चारण) रूप तुम्हीं हो।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ।
अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः ॥ १.७४॥
sudhā tvamakṣare nitye tridhā mātrātmikā sthitā |
ardhamātrā sthitā nityā yānuccāryāviśeṣataḥ || 1.74||
अर्थ हे नित्य अक्षर (प्रणव)! तुम सुधा हो; तीन मात्राओं वाले रूप में त्रिधा स्थित हो, और नित्य अर्धमात्रा रूप में भी स्थित हो, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् ॥ १.७५॥
tvameva sandhyā sāvitrī tvaṃ devi jananī parā |
tvayaitaddhāryate viśvaṃ tvayaitat sṛjyate jagat || 1.75||
अर्थ तुम्हीं सन्ध्या और सावित्री हो; हे देवी! तुम्हीं परा जननी हो। तुम्हारे द्वारा ही यह विश्व धारण किया जाता है, तुम्हारे द्वारा ही यह जगत् रचा जाता है।
त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥ १.७६॥
tvayaitat pālyate devi tvamatsyante ca sarvadā |
visṛṣṭau sṛṣṭirūpā tvaṃ sthitirūpā ca pālane || 1.76||
अर्थ हे देवी! तुम्हारे द्वारा ही इसका पालन होता है, और तुम ही अन्त में सदा इसका भक्षण कर लेती हो। सृष्टि के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन में स्थितिरूपा हो,
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥ १.७७॥
tathā saṃhṛtirūpānte jagato'sya jaganmaye |
mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhā mahāsmṛtiḥ || 1.77||
अर्थ और उसी प्रकार अन्त में इस जगत् की संहाररूपा हो — हे जगन्मयी! तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति,
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥ १.७८॥
mahāmohā ca bhavatī mahādevī maheśvarī |
prakṛtistvaṃ ca sarvasya guṇatrayavibhāvinī || 1.78||
अर्थ और महामोहा हो; तुम महादेवी, महेश्वरी हो। तुम्हीं सबकी प्रकृति हो, जो तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) को प्रकट करने वाली हो।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥ १.७९॥
kālarātrirmahārātrirmoharātriśca dāruṇā |
tvaṃ śrīstvamīśvarī tvaṃ hrīstvaṃ buddhirbodhalakṣaṇā || 1.79||
अर्थ तुम कालरात्रि, महारात्रि तथा भयंकर मोहरात्रि हो। तुम्हीं श्री हो, तुम्हीं ईश्वरी हो, तुम्हीं ह्री हो, तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥ १.८०॥
lajjā puṣṭistathā tuṣṭistvaṃ śāntiḥ kṣāntireva ca |
khaḍginī śūlinī ghorā gadinī cakriṇī tathā || 1.80||
अर्थ तुम्हीं लज्जा, पुष्टि तथा तुष्टि हो; तुम्हीं शान्ति और क्षमा (क्षान्ति) हो। तुम खड्ग, शूल धारण करने वाली, घोररूपा, गदा तथा चक्र धारण करने वाली हो;
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥ १.८१॥
śaṅkhinī cāpinī bāṇabhuśuṇḍīparighāyudhā |
saumyā saumyatarāśeṣasaumyebhyastvatisundarī || 1.81||
अर्थ तुम शंख, धनुष धारण करने वाली तथा बाण, भुशुण्डी और परिघ को अस्त्र रूप में धारण करने वाली हो। तुम सौम्या हो, सौम्य से भी अधिक सौम्या हो, और समस्त सुन्दर वस्तुओं से भी अधिक सुन्दरी हो।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥ १.८२॥
parāparāṇāṃ paramā tvameva parameśvarī |
yacca kiñcitkvacidvastu sadasadvākhilātmike || 1.82||
अर्थ तुम्हीं पर और अपर सबकी परमा परमेश्वरी हो। हे सर्वात्मिके! जो कुछ भी, कहीं भी सत् अथवा असत् वस्तु है,
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया ।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥ १.८३॥
tasya sarvasya yā śaktiḥ sā tvaṃ kiṃ stūyase mayā |
yayā tvayā jagatsraṣṭā jagatpātyatti yo jagat || 1.83||
अर्थ उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो; फिर मैं तुम्हारी स्तुति कैसे कर सकता हूँ? जब तुम्हारे ही द्वारा जगत् का स्रष्टा, जगत् का पालक और जगत् का संहारक —
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥ १.८४॥
so'pi nidrāvaśaṃ nītaḥ kastvāṃ stotumiheśvaraḥ |
viṣṇuḥ śarīragrahaṇamahamīśāna eva ca || 1.84||
अर्थ वह (विष्णु) भी निद्रा के वश में कर दिया गया — तो फिर यहाँ कौन ईश्वर तुम्हारी स्तुति कर सकता है? विष्णु, मैं (ब्रह्मा) और ईशान (शिव) — (हम सबका) शरीर-धारण
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥ १.८५॥
kāritāste yato'tastvāṃ kaḥ stotuṃ śaktimān bhavet |
sā tvamitthaṃ prabhāvaiḥ svairudārairdevi saṃstutā || 1.85||
अर्थ तुम्हारे ही द्वारा कराया गया है; अतः तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है? हे देवी! इस प्रकार अपने उदार प्रभावों (महिमाओं) से स्तुत की गई तुम,
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥ १.८६॥
mohayaitau durādharṣāvasurau madhukaiṭabhau |
prabodhaṃ ca jagatsvāmī nīyatāmacyuto laghu || 1.86||
अर्थ इन दुर्जय असुरों — मधु और कैटभ — को मोहित कर दो, और जगत्स्वामी अच्युत (विष्णु) को शीघ्र जाग्रत् कर दो;
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ १.८७॥
bodhaśca kriyatāmasya hantumetau mahāsurau || 1.87||
अर्थ और इन्हें (विष्णु को) जगा दो, जिससे वे इन दोनों महान् असुरों का वध कर सकें।'
ऋषिरुवाच ॥ १.८८॥
ṛṣiruvāca || 1.88||
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥ १.८९॥
evaṃ stutā tadā devī tāmasī tatra vedhasā || 1.89||
अर्थ इस प्रकार जब ब्रह्मा (वेधा) ने वहाँ उस तामसी देवी (योगनिद्रा) की स्तुति की,
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ १.९०॥
viṣṇoḥ prabodhanārthāya nihantuṃ madhukaiṭabhau |
netrāsyanāsikābāhuhṛdayebhyastathorasaḥ || 1.90||
अर्थ तब विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ का वध कराने के लिए, वह देवी विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, भुजा, हृदय और वक्षःस्थल से
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ॥ १.९१॥
nirgamya darśane tasthau brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ |
uttasthau ca jagannāthastayā mukto janārdanaḥ || 1.91||
अर्थ निकलकर अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के सामने खड़ी हो गई। तब उससे मुक्त हुए जगन्नाथ जनार्दन (विष्णु) उठ खड़े हुए,
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ।
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ १.९२॥
ekārṇave'hiśayanāttataḥ sa dadṛśe ca tau |
madhukaiṭabhau durātmānāvativīryaparākramau || 1.92||
अर्थ एकार्णव में शेषनाग की शय्या से (जाग उठे)। तब उन्होंने अत्यन्त पराक्रमी और बलशाली, दुरात्मा उन मधु-कैटभ को देखा,
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥ १.९३॥
krodharaktekṣaṇāvattuṃ brahmāṇaṃ janitodyamau |
samutthāya tatastābhyāṃ yuyudhe bhagavān hariḥ || 1.93||
अर्थ जिनके नेत्र क्रोध से लाल थे और जो ब्रह्मा को खा जाने का उद्यम कर रहे थे। तब भगवान् हरि (विष्णु) उठकर उन दोनों के साथ युद्ध करने लगे।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥ १.९४॥
pañcavarṣasahasrāṇi bāhupraharaṇo vibhuḥ |
tāvapyatibalonmattau mahāmāyāvimohitau || 1.94||
अर्थ वे विभु (विष्णु) पाँच हजार वर्षों तक अपनी भुजाओं से ही युद्ध करते रहे। अत्यन्त बल के मद में उन्मत्त तथा महामाया से मोहित वे दोनों (असुर) भी
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥ १.९५॥
uktavantau varo'smatto vriyatāmiti keśavam || 1.95||
अर्थ केशव (विष्णु) से बोले — 'हमसे वर माँगो।'
श्रीभगवानुवाच ॥ १.९६॥
śrībhagavānuvāca || 1.96||
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥ १.९७॥
bhavetāmadya me tuṣṭau mama vadhyāvubhāvapi || 1.97||
अर्थ 'यदि तुम दोनों आज मुझ पर प्रसन्न हो, तो तुम दोनों ही मेरे हाथों वध्य हो जाओ (मेरे द्वारा मारे जाओ)।
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मया ॥ १.९८॥
kimanyena vareṇātra etāvaddhi vṛtaṃ mayā || 1.98||
अर्थ यहाँ किसी दूसरे वर से क्या (प्रयोजन)? मैंने बस इतना ही माँगा है।'
ऋषिरुवाच ॥ १.९९॥
ṛṣiruvāca || 1.99||
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १.१००॥
vañcitābhyāmiti tadā sarvamāpomayaṃ jagat || 1.100||
अर्थ इस प्रकार ठगे जाने पर, तब उन दोनों ने सारे जगत् को जलमय देखकर,
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥ १.१०१॥
vilokya tābhyāṃ gadito bhagavān kamalekṣaṇaḥ |
āvāṃ jahi na yatrorvī salilena pariplutā || 1.101||
अर्थ भगवान् कमलनयन (विष्णु) से कहा — 'जहाँ पृथ्वी जल से आप्लावित (डूबी हुई) न हो, वहाँ हम दोनों का वध करो।'
ऋषिरुवाच ॥ १.१०२॥
ṛṣiruvāca || 1.102||
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।
कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १.१०३॥
tathetyuktvā bhagavatā śaṅkhacakragadābhṛtā |
kṛtvā cakreṇa vai chinne jaghane śirasī tayoḥ || 1.103||
अर्थ 'ऐसा ही हो' — यह कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों को अपनी जाँघ (जघन) पर रखकर, चक्र से उन दोनों के मस्तक काट डाले।
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् ।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ १.१०४॥
evameṣā samutpannā brahmaṇā saṃstutā svayam |
prabhāvamasyā devyāstu bhūyaḥ śaृṇu vadāmi te || 1.104||
अर्थ इस प्रकार यह देवी प्रकट हुई, जिसकी स्वयं ब्रह्मा ने स्तुति की। अब मैं इस देवी की महिमा (प्रभाव) पुनः (आगे) कहता हूँ, उसे सुनो।
। ऐं ॐ ।
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवमादितः ॥ १०४॥
| aiṃ oṃ |
uvāca 14, ardhaślokāḥ 24, ślokāḥ 66, evamāditaḥ || 104||
अर्थ (यह अध्याय-गणना है —) ऐं ॐ। इस (प्रथम अध्याय) में 'उवाच' (वक्ता-सूचक पंक्तियाँ) चौदह, अर्धश्लोक चौबीस और श्लोक छियासठ हैं; इस प्रकार आदि से (कुल) एक सौ चार हुए।