॥ नारायणीस्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥
अर्थ यह ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसका नाम 'नारायणी-स्तुति' है। (यह अध्याय का शीर्षक-सूचक मंगल-वाक्य है।)
। ध्यानम् ।
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥
अर्थ ध्यान — मैं उन भुवनेश्वरी (त्रिलोकी की स्वामिनी) का ध्यान करता हूँ, जिनकी कान्ति बालसूर्य के समान है, जो मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं, जिनके स्तन उन्नत हैं, जो तीन नेत्रों से युक्त हैं, जिनका मुख मुसकानयुक्त है, तथा जिनके हाथों में वरमुद्रा, अंकुश, पाश और अभयमुद्रा सुशोभित हैं।
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे
सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् ।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्
विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥ ११.२॥
अर्थ जब वहाँ देवी के द्वारा उस महान् असुरराज (शुम्भ) का वध हो गया, तब अभीष्ट की प्राप्ति से इन्द्रसहित तथा अग्नि आदि प्रमुख देवताओं ने कात्यायनी की स्तुति की; उनके प्रफुल्लित मुखकमलों से दिशाएँ भी उल्लसित (प्रकाशित) हो उठीं।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ११.३॥
अर्थ हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए। हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए। हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए; हे देवी! आप ही चराचर जगत् की स्वामिनी हैं।
आधारभूता जगतस्त्वमेका
महीस्वरूपेण यतः स्थितासि ।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत-
दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ ११.४॥
अर्थ आप ही एकमात्र इस जगत् की आधारभूता हैं, क्योंकि पृथ्वी के रूप में आप ही स्थित हैं। हे अलंघ्य पराक्रम वाली देवी! जल के रूप में स्थित आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण जगत् तृप्त एवं पुष्ट होता है।
त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ११.५॥
अर्थ आप अनन्त पराक्रम वाली वैष्णवी शक्ति हैं, आप ही विश्व के बीजस्वरूपा परा माया हैं। हे देवी! आपने ही इस समस्त जगत् को मोहित कर रखा है; और प्रसन्न होने पर आप ही इस पृथ्वी पर मुक्ति की कारण बन जाती हैं।
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्यपरापरोक्तिः ॥ ११.६॥
अर्थ हे देवी! समस्त विद्याएँ आपके ही भेद (रूप) हैं, संसार की सम्पूर्ण स्त्रियाँ भी आपकी ही मूर्तियाँ हैं। हे माता! एकमात्र आपने ही इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है। आपकी स्तुति क्या हो सकती है? आप तो स्तुति करने योग्य परा तथा अपरा वाणी से भी परे हैं।
सर्वभूता यदा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ ११.७॥
अर्थ जब आप समस्त प्राणियों के रूप में स्थित, भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं, तब आपकी स्तुति (हमारे शब्दों से) कैसे हो सकती है? आपकी स्तुति के लिए उत्तम-से-उत्तम वाणी भी क्या पर्याप्त होगी?
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.८॥
अर्थ हे देवी! आप समस्त प्राणियों के हृदय में बुद्धि के रूप में विराजमान हैं। हे स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी! आपको नमस्कार है।
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि ।
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.९॥
अर्थ हे देवी! आप कला, काष्ठा आदि (काल के अंश) रूपों से जगत् में परिवर्तन लाने वाली हैं। हे विश्व के प्रलय (संहार) में समर्थ शक्तिस्वरूपा नारायणी! आपको नमस्कार है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१०॥
अर्थ हे सम्पूर्ण मंगलों की भी मंगलमयी, हे कल्याणस्वरूपा शिवा! हे समस्त पुरुषार्थों (मनोरथों) को सिद्ध करने वाली, हे शरण देने वाली, हे त्रिनयना गौरी! हे नारायणी! आपको नमस्कार है।
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.११॥
अर्थ हे सृष्टि, स्थिति (पालन) और संहार की शक्तिस्वरूपा सनातनी देवी! हे (सत्त्व-रज-तम) गुणों की आश्रयभूता तथा गुणमयी नारायणी! आपको नमस्कार है।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१२॥
अर्थ हे शरण में आए हुए दीन तथा पीड़ित जनों की रक्षा में तत्पर रहने वाली, हे सबकी पीड़ा हरने वाली देवी नारायणी! आपको नमस्कार है।
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि ।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१३॥
अर्थ हे हंसयुक्त विमान पर विराजमान, ब्रह्माणी का रूप धारण करने वाली देवी! हे कुशमिश्रित जल छिड़कने वाली नारायणी! आपको नमस्कार है।
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि ।
माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तुते ॥ ११.१४॥
अर्थ हे त्रिशूल, चन्द्रमा और सर्प धारण करने वाली, महान् वृषभ (बैल) पर सवारी करने वाली देवी! माहेश्वरी रूप से विराजमान नारायणी! आपको नमस्कार है।
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे ।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१५॥
अर्थ हे मयूर और मुर्गे से घिरी हुई, महान् शक्ति (आयुध) धारण करने वाली, निष्पाप (अनघ) देवी! हे कौमारी रूप में स्थित नारायणी! आपको नमस्कार है।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे ।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१६॥
अर्थ हे शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष रूपी उत्तम आयुधों को धारण करने वाली देवी! प्रसन्न होइए। हे वैष्णवी रूप वाली नारायणी! आपको नमस्कार है।
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे ।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१७॥
अर्थ हे भयंकर महान् चक्र धारण करने वाली, अपनी दाढ़ (दंष्ट्रा) पर पृथ्वी को धारण करके ऊपर उठाने वाली, कल्याणमयी वाराहरूपिणी देवी! नारायणी! आपको नमस्कार है।
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे ।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१८॥
अर्थ हे उग्र नृसिंह रूप धारण करके दैत्यों का वध करने के लिए उद्यत हुई देवी! हे त्रिलोकी की रक्षा में तत्पर नारायणी! आपको नमस्कार है।
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले ।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.१९॥
अर्थ हे मुकुट धारण करने वाली, महान् वज्र (आयुध) वाली, सहस्र नेत्रों से देदीप्यमान, वृत्रासुर के प्राण हरने वाली ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) रूप नारायणी! आपको नमस्कार है।
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले ।
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२०॥
अर्थ हे शिवदूती रूप से दैत्यों के महान् बल का नाश करने वाली, भयंकर रूप वाली तथा महान् गर्जना करने वाली देवी नारायणी! आपको नमस्कार है।
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे ।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२१॥
अर्थ हे दाढ़ों (दंष्ट्राओं) के कारण भयंकर मुख वाली, मुण्डों की माला से विभूषित, मुण्ड का मर्दन करने वाली चामुण्डा देवी नारायणी! आपको नमस्कार है।
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे ।
महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२२॥
अर्थ हे लक्ष्मी! हे लज्जा! हे महाविद्या! हे श्रद्धा! हे पुष्टि! हे स्वधा! हे ध्रुवा (अचल)! हे महारात्रि! हे महामाया! हे नारायणी! आपको नमस्कार है।
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि ।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तुते ॥ ११.२३॥
अर्थ हे मेधा! हे सरस्वती! हे श्रेष्ठे (वरा)! हे भूति! हे बाभ्रवी! हे तामसी! हे नियता! हे ईश्वरी! आप प्रसन्न होइए। हे नारायणी! आपको नमस्कार है।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२४॥
अर्थ हे सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, समस्त शक्तियों से सम्पन्न देवी! आप हमें सब भयों से बचाइए। हे देवी दुर्गे! आपको नमस्कार है।
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।
पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२५॥
अर्थ आपका यह सौम्य मुख, जो तीन नेत्रों से सुशोभित है, समस्त प्राणियों (के भय) से हमारी रक्षा करे। हे कात्यायनी! आपको नमस्कार है।
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥ ११.२६॥
अर्थ जो त्रिशूल अपनी ज्वालाओं से विकराल, अत्यन्त उग्र और समस्त असुरों का संहार करने वाला है, वह हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली! आपको नमस्कार है।
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥ ११.२७॥
अर्थ जो घण्टा अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज (बल) का नाश कर देता है, वह घण्टा, हे देवी! जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, वैसे ही हमें पापों से बचाए।
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः ।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥ ११.२८॥
अर्थ हे चण्डिके! असुरों के रक्त और चर्बी के कीचड़ से लिपटा हुआ, आपके हाथ में चमकता हुआ खड्ग हमारे कल्याण के लिए हो। हम आपको नमस्कार करते हैं।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ११.२९॥
अर्थ प्रसन्न होने पर आप समस्त रोगों को नष्ट कर देती हैं और रुष्ट होने पर सभी अभीष्ट (इच्छित) कामनाओं को विफल कर देती हैं। जो लोग आपकी शरण में आ जाते हैं, उन पर कोई विपत्ति नहीं आती; बल्कि आपके शरणागत मनुष्य स्वयं (दूसरों के लिए) आश्रयस्वरूप बन जाते हैं।
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य
धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् ।
रूपैरनेकैर्बहुधात्ममूर्तिं
कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥ ११.३०॥
अर्थ हे देवी! धर्म से द्वेष करने वाले महान् असुरों का जो यह संहार आज आपने किया है, हे अम्बिके! अपने एक ही स्वरूप को अनेक रूपों में बहुत प्रकार से प्रकट करके — ऐसा कार्य आपके सिवा और कौन कर सकता है?
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे-
ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या ।
ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे
विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥ ११.३१॥
अर्थ विद्याओं में, शास्त्रों में, विवेक रूपी दीपकों में तथा आदि (वेद) वाक्यों में आपके अतिरिक्त और कौन है? (सर्वत्र आप ही हैं।) फिर भी आप ही इस समस्त विश्व को ममता के गड्ढे रूपी अत्यन्त गहन अन्धकार में भटकाती रहती हैं।
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥ ११.३२॥
अर्थ जहाँ राक्षस हैं, जहाँ उग्र विष वाले सर्प हैं, जहाँ शत्रु और दस्युओं (लुटेरों) की सेनाएँ हैं, जहाँ दावानल (वन की आग) है, तथा जहाँ समुद्र के बीच (संकट) है — वहाँ भी स्थित होकर आप ही सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करती हैं।
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीह विश्वम् ।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ११.३३॥
अर्थ हे विश्वेश्वरी! आप ही विश्व का पालन करती हैं; विश्वस्वरूपा होकर आप ही यहाँ विश्व को धारण करती हैं। आप विश्व के स्वामी (जगदीश्वर) के द्वारा भी वन्दनीय हैं; और जो भक्तिपूर्वक आपके सामने नत होते हैं, वे स्वयं समस्त विश्व के आश्रयभूत बन जाते हैं।
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥ ११.३४॥
अर्थ हे देवी! प्रसन्न होइए। जैसे अभी इसी क्षण असुरों का वध करके आपने हमारी रक्षा की है, वैसे ही सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाइए। समस्त लोकों के पापों को तथा उत्पातों के परिपाक से उत्पन्न होने वाले महान् उपद्रवों (विपत्तियों) को शीघ्र ही शान्त कर दीजिए।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि ।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ ११.३५॥
अर्थ हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए। हे त्रिलोकवासियों के द्वारा स्तुति के योग्य देवी! समस्त लोकों को वर देने वाली बनिए।
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥ ११.३७॥
अर्थ हे देवगण! मैं वर देने वाली हूँ। तुम मन में जिस वर की इच्छा करते हो, उसे माँग लो; मैं उसे प्रदान करूँगी — जो जगत् का उपकार करने वाला हो।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ११.३९॥
अर्थ हे अखिलेश्वरी! इसी प्रकार आप त्रिलोकी की समस्त बाधाओं का शमन तथा हमारे शत्रुओं का विनाश (सदा) करती रहें — यही (हमारी अभिलाषा) है।
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥ ११.४१॥
अर्थ वैवस्वत मन्वन्तर के प्राप्त होने पर, अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो अन्य महान् असुर उत्पन्न होंगे।
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ११.४२॥
अर्थ तब मैं नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर, विन्ध्याचल पर निवास करती हुई, उन दोनों (असुरों) का नाश करूँगी।
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले ।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांश्च दानवान् ॥ ११.४३॥
अर्थ फिर भी, अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर मैं विप्रचित्ति के वंश में उत्पन्न दानवों (वैप्रचित्तों) का वध करूँगी।
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् महासुरान् ।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥ ११.४४॥
अर्थ उन उग्र वैप्रचित्त महासुरों का भक्षण करते समय मेरे दाँत अनार के फूलों के समान लाल हो जाएँगे।
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः ।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥ ११.४५॥
अर्थ तब स्वर्ग में देवता और मृत्युलोक में मनुष्य निरन्तर स्तुति करते हुए मुझे 'रक्तदन्तिका' कहकर पुकारेंगे।
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि ।
मुनिभिः संस्मृता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा ॥ ११.४६॥
अर्थ फिर, जब सौ वर्षों तक वर्षा न होने के कारण जल रहित अनावृष्टि (अकाल) पड़ेगी, तब मुनियों के द्वारा स्मरण की जाने पर मैं पृथ्वी पर अयोनिजा (बिना गर्भ के) प्रकट होऊँगी।
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्याम्यहं मुनीन् ।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥ ११.४७॥
अर्थ उस समय मैं सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी; इसलिए मनुष्य तब मुझे 'शताक्षी' (सौ नेत्रों वाली) कहकर कीर्तन करेंगे।
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः ।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥ ११.४८॥
अर्थ हे देवगण! तब मैं वर्षा होने तक अपने ही शरीर से उत्पन्न, प्राणों को धारण करने वाले (जीवनदायी) शाकों (साग-सब्जियों) के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का पालन-पोषण करूँगी।
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥ ११.४९॥
अर्थ तब मैं पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी; और वहीं पर दुर्गम नामक महासुर का वध करूँगी।
दुर्गादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।
पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥ ११.५०॥
अर्थ (दुर्गम का वध करने के कारण) मेरा वह नाम 'दुर्गादेवी' के रूप में प्रसिद्ध होगा। और फिर, जब मैं हिमालय पर्वत पर भयंकर रूप धारण करके —
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् ।
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ॥ ११.५१॥
अर्थ — मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का भक्षण करूँगी, तब सम्पूर्ण मुनि नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे।
भीमादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥ ११.५२॥
अर्थ तब मेरा वह नाम 'भीमादेवी' के रूप में प्रसिद्ध होगा। और जब अरुण नामक (असुर) त्रिलोकी में महान् बाधा (उपद्रव) उत्पन्न करेगा —
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासङ्ख्येयषट्पदम् ।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ ११.५३॥
अर्थ — तब मैं असंख्य भ्रमरों (मधुमक्खियों) से युक्त भ्रामरी रूप धारण करके, त्रिलोकी के हित के लिए उस महासुर का वध करूँगी।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः ।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥ ११.५४॥
अर्थ तब सर्वत्र लोग मुझे 'भ्रामरी' कहकर स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब दानवों से उत्पन्न बाधा (संकट) उठ खड़ी होगी —
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसङ्क्षयम् ॥ ११.५५॥
अर्थ — तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूँगी।
नारायणीस्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११॥
अर्थ इस प्रकार 'नारायणी-स्तुति' नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। (यह अध्याय-समाप्ति का पुष्पिका-वाक्य है।)
उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ५०, एवमादितः ॥ ६३०॥
अर्थ (इस अध्याय में) कथन-सूचक 'उवाच' (अर्धश्लोक) चार, अर्धश्लोक एक, तथा पूर्ण श्लोक पचास हैं; इस प्रकार आरम्भ से लेकर (कुल संख्या) छह सौ तीस होती है। (यह श्लोक-गणना का सूचक शास्त्रीय कथन है।)