। ध्यानम् ।
ॐ विद्युद्धामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवाळखेटविलसधस्ताभिरासेविताम् ।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥
| dhyānam |
oṃ vidyuddhāmasamaprabhāṃ mṛgapatiskandhasthitāṃ bhīṣaṇāṃ
kanyābhiḥ karavāḷakheṭavilasadhastābhirāsevitām |
hastaiścakragadāsikheṭaviśikhāṃścāpaṃ guṇaṃ tarjanīṃ
bibhrāṇāmanalātmikāṃ śaśidharāṃ durgāṃ trinetrāṃ bhaje ||
अर्थ ध्यान श्लोक — देवी दुर्गा का ध्यान: जो बिजली की चमक के समान तेजोमयी, सिंह (मृगराज) के कंधे पर विराजमान, भीषण रूपिणी तथा तलवार और ढाल से सुशोभित हाथोंवाली कन्याओं से सेवित हैं; जो अपने हाथों में चक्र, गदा, खड्ग, ढाल, बाण, धनुष, प्रत्यंचा (पाश) और तर्जनी-मुद्रा धारण किए हुए हैं; जो अग्निस्वरूपा, मस्तक पर चन्द्र धारण करनेवाली और त्रिनेत्रा हैं — उन दुर्गा देवी का मैं भजन करता हूँ।
ॐ देव्युवाच ॥ १२.१॥
oṃ devyuvāca || 12.1||
एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्याहं सकलां बाधां शमयिष्याम्यसंशयम् ॥ १२.२॥
ebhiḥ stavaiśca māṃ nityaṃ stoṣyate yaḥ samāhitaḥ |
tasyāhaṃ sakalāṃ bādhāṃ śamayiṣyāmyasaṃśayam || 12.2||
अर्थ जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इन स्तोत्रों से नित्य मेरी स्तुति करेगा, उसकी समस्त बाधाओं को मैं निःसंदेह शान्त कर दूँगी।
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् ।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद्वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ १२.३॥
madhukaiṭabhanāśaṃ ca mahiṣāsuraghātanam |
kīrtayiṣyanti ye tadvadvadhaṃ śumbhaniśumbhayoḥ || 12.3||
अर्थ जो लोग मधु-कैटभ के नाश, महिषासुर के वध तथा उसी प्रकार शुम्भ-निशुम्भ के वध का कीर्तन करेंगे,
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः ।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥ १२.४॥
aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ navamyāṃ caikacetasaḥ |
śroṣyanti caiva ye bhaktyā mama māhātmyamuttamam || 12.4||
अर्थ तथा जो एकाग्रचित्त होकर अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी तिथियों को भक्तिपूर्वक मेरे इस उत्तम माहात्म्य को सुनेंगे,
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद्दुष्कृतोत्था न चापदः ।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥ १२.५॥
na teṣāṃ duṣkṛtaṃ kiñcidduṣkṛtotthā na cāpadaḥ |
bhaviṣyati na dāridryaṃ na caiveṣṭaviyojanam || 12.5||
अर्थ उन्हें कोई पाप-दुष्कर्म नहीं छू सकता, न दुष्कर्म से उत्पन्न विपत्तियाँ आती हैं, न दरिद्रता रहती है और न ही प्रियजनों से वियोग होता है।
शत्रुभ्यो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः ।
न शस्त्रानलतोयौघात् कदाचित् सम्भविष्यति ॥ १२.६॥
śatrubhyo na bhayaṃ tasya dasyuto vā na rājataḥ |
na śastrānalatoyaughāt kadācit sambhaviṣyati || 12.6||
अर्थ उसे शत्रुओं से भय नहीं होता, न डाकुओं से और न राजा से; तथा शस्त्र, अग्नि और जल-प्रवाह से भी उसे कभी कोई भय नहीं होता।
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः ।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं महत् ॥ १२.७॥
tasmānmamaitanmāhātmyaṃ paṭhitavyaṃ samāhitaiḥ |
śrotavyaṃ ca sadā bhaktyā paraṃ svastyayanaṃ mahat || 12.7||
अर्थ इसलिए एकाग्रचित्त पुरुषों को मेरे इस माहात्म्य का पाठ करना चाहिए और सदा भक्तिपूर्वक इसे सुनना चाहिए; यह परम कल्याणकारी और महान् मंगलदायक है।
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् ।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥ १२.८॥
upasargānaśeṣāṃstu mahāmārīsamudbhavān |
tathā trividhamutpātaṃ māhātmyaṃ śamayenmama || 12.8||
अर्थ मेरा यह माहात्म्य महामारी से उत्पन्न होनेवाले समस्त उपसर्गों (उपद्रवों) को तथा तीनों प्रकार के उत्पातों को शान्त कर देता है।
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम ।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥ १२.९॥
yatraitatpaṭhyate samyaṅnityamāyatane mama |
sadā na tadvimokṣyāmi sānnidhyaṃ tatra me sthitam || 12.9||
अर्थ जहाँ मेरे मन्दिर में नित्य विधिपूर्वक इसका पाठ होता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ूँगी; वहाँ मेरी सन्निधि (उपस्थिति) सदा स्थित रहती है।
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे ।
सर्वं ममैतन्माहात्म्यम् उच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥ १२.१०॥
balipradāne pūjāyāmagnikārye mahotsave |
sarvaṃ mamaitanmāhātmyam uccāryaṃ śrāvyameva ca || 12.10||
अर्थ बलि अर्पण के समय, पूजा में, अग्निकार्य (होम) में और महोत्सव में — मेरा यह सम्पूर्ण माहात्म्य उच्चारित (पढ़ा) और श्रवण किया जाना चाहिए।
जानताजानता वापि बलिपूजां यथा कृताम् ।
प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम् ॥ १२.११॥
jānatājānatā vāpi balipūjāṃ yathā kṛtām |
pratīkṣiṣyāmyahaṃ prītyā vahnihomaṃ tathākṛtam || 12.11||
अर्थ जानकर अथवा बिना जाने भी जिस प्रकार से बलि और पूजा की गई हो, तथा जो अग्नि में हवन किया गया हो, उसे मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी (उसकी प्रतीक्षा करती हूँ)।
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी ।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ॥ १२.१२॥
śaratkāle mahāpūjā kriyate yā ca vārṣikī |
tasyāṃ mamaitanmāhātmyaṃ śrutvā bhaktisamanvitaḥ || 12.12||
अर्थ शरद् ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उसमें जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर मेरे इस माहात्म्य को सुनता है,
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ १२.१३॥
sarvābādhāvinirmukto dhanadhānyasamanvitaḥ |
manuṣyo matprasādena bhaviṣyati na saṃśayaḥ || 12.13||
अर्थ वह मेरी कृपा से समस्त बाधाओं से मुक्त तथा धन-धान्य से सम्पन्न हो जाता है — इसमें कोई संदेह नहीं।
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः ।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ॥ १२.१४॥
śrutvā mamaitanmāhātmyaṃ tathā cotpattayaḥ śubhāḥ |
parākramaṃ ca yuddheṣu jāyate nirbhayaḥ pumān || 12.14||
अर्थ मेरे इस माहात्म्य को, तथा मेरे शुभ अवतारों (प्राकट्यों) की कथाओं को, और युद्धों में मेरे पराक्रम को सुनकर मनुष्य निर्भय हो जाता है।
रिपवः सङ्क्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते ।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम् ॥ १२.१५॥
ripavaḥ saṅkṣayaṃ yānti kalyāṇaṃ copapadyate |
nandate ca kulaṃ puṃsāṃ māhātmyaṃ mama śaृṇvatām || 12.15||
अर्थ मेरा माहात्म्य सुननेवाले पुरुषों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं, कल्याण की प्राप्ति होती है और उनका कुल आनन्दित रहता है।
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने ।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥ १२.१६॥
śāntikarmaṇi sarvatra tathā duḥsvapnadarśane |
grahapīḍāsu cogrāsu māhātmyaṃ śaृṇuyānmama || 12.16||
अर्थ सर्वत्र शान्तिकर्म में, बुरे स्वप्न दिखाई देने पर, तथा उग्र ग्रहपीड़ाओं के समय मनुष्य को मेरे माहात्म्य का श्रवण करना चाहिए।
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः ।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥ १२.१७॥
upasargāḥ śamaṃ yānti grahapīḍāśca dāruṇāḥ |
duḥsvapnaṃ ca nṛbhirdṛṣṭaṃ susvapnamupajāyate || 12.17||
अर्थ इससे उपद्रव शान्त हो जाते हैं, भयंकर ग्रहपीड़ाएँ भी शान्त हो जाती हैं, और मनुष्यों द्वारा देखा गया बुरा स्वप्न शुभ स्वप्न में बदल जाता है।
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् ।
सङ्घातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥ १२.१८॥
bālagrahābhibhūtānāṃ bālānāṃ śāntikārakam |
saṅghātabhede ca nṛṇāṃ maitrīkaraṇamuttamam || 12.18||
अर्थ यह बालग्रहों से पीड़ित बालकों के लिए शान्तिकारक है, और मनुष्यों में फूट (मतभेद) पड़ने पर उनमें मैत्री स्थापित करने का उत्तम साधन है।
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् ।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥ १२.१९॥
durvṛttānāmaśeṣāṇāṃ balahānikaraṃ param |
rakṣobhūtapiśācānāṃ paṭhanādeva nāśanam || 12.19||
अर्थ यह समस्त दुराचारियों के बल को अत्यन्त क्षीण कर देता है, और इसके पाठमात्र से राक्षसों, भूतों और पिशाचों का नाश हो जाता है।
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम् ।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ॥ १२.२०॥
sarvaṃ mamaitanmāhātmyaṃ mama sannidhikārakam |
paśupuṣpārghyadhūpaiśca gandhadīpaistathottamaiḥ || 12.20||
अर्थ मेरा यह सम्पूर्ण माहात्म्य मेरी सन्निधि (उपस्थिति) को उत्पन्न करनेवाला है। पशु (बलि), पुष्प, अर्घ्य, धूप तथा उत्तम गन्ध और दीपों से,
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम् ।
अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ॥ १२.२१॥
viprāṇāṃ bhojanairhomaiḥ prokṣaṇīyairaharniśam |
anyaiśca vividhairbhogaiḥ pradānairvatsareṇa yā || 12.21||
अर्थ ब्राह्मणों के भोजन, होम तथा प्रोक्षण-जल से — दिन-रात, और अन्य नाना प्रकार के भोगों तथा उपहारों से पूरे एक वर्ष तक आराधना करने पर जो (प्रसन्नता मुझे प्राप्त होती है),
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृदुच्चरिते श्रुते ।
श्रुतं हरति पापानि तथारोग्यं प्रयच्छति ॥ १२.२२॥
prītirme kriyate sāsmin sakṛduccarite śrute |
śrutaṃ harati pāpāni tathārogyaṃ prayacchati || 12.22||
अर्थ मेरी वही प्रसन्नता इस माहात्म्य को एक बार भी पढ़ने या सुनने से हो जाती है। इसका श्रवण पापों को हर लेता है और आरोग्य प्रदान करता है।
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम ।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥ १२.२३॥
rakṣāṃ karoti bhūtebhyo janmanāṃ kīrtanaṃ mama |
yuddheṣu caritaṃ yanme duṣṭadaityanibarhaṇam || 12.23||
अर्थ मेरे अवतारों (प्राकट्यों) का कीर्तन भूत-प्रेतादि से रक्षा करता है; और युद्धों में मेरा जो चरित्र है — दुष्ट दैत्यों का संहार —
तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते ।
युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः ॥ १२.२४॥
tasmiñchrute vairikṛtaṃ bhayaṃ puṃsāṃ na jāyate |
yuṣmābhiḥ stutayo yāśca yāśca brahmarṣibhiḥ kṛtāḥ || 12.24||
अर्थ उसके श्रवण से मनुष्यों को शत्रुकृत भय नहीं होता। जो स्तुतियाँ तुम (देवताओं) द्वारा और जो ब्रह्मर्षियों द्वारा की गई हैं,
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्तु शुभां मतिम् ।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ॥ १२.२५॥
brahmaṇā ca kṛtāstāstu prayacchantu śubhāṃ matim |
araṇye prāntare vāpi dāvāgniparivāritaḥ || 12.25||
अर्थ तथा जो ब्रह्मा द्वारा रची गई हैं — वे सब शुभ बुद्धि प्रदान करें। जो मनुष्य जंगल में, निर्जन प्रान्त में, अथवा दावानल (वन की आग) से घिरा हो,
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः ।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥ १२.२६॥
dasyubhirvā vṛtaḥ śūnye gṛhīto vāpi śatrubhiḥ |
siṃhavyāghrānuyāto vā vane vā vanahastibhiḥ || 12.26||
अर्थ अथवा सुनसान स्थान में डाकुओं से घिरा हो, या शत्रुओं द्वारा पकड़ा गया हो, या वन में सिंह-व्याघ्र अथवा जंगली हाथियों द्वारा पीछा किया जा रहा हो,
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा ।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ॥ १२.२७॥
rājñā kruddhena cājñapto vadhyo bandhagato'pi vā |
āghūrṇito vā vātena sthitaḥ pote mahārṇave || 12.27||
अर्थ या कुपित राजा द्वारा वध की आज्ञा पा चुका हो अथवा बन्धन (कैद) में पड़ा हो, या महासागर में नौका पर बैठा हुआ आँधी के झकोरों में हो,
पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे ।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा ॥ १२.२८॥
patatsu cāpi śastreṣu saṅgrāme bhṛśadāruṇe |
sarvābādhāsu ghorāsu vedanābhyardito'pi vā || 12.28||
अर्थ अथवा अत्यन्त भयंकर संग्राम में शस्त्रों की वर्षा के बीच हो, या समस्त घोर बाधाओं में फँसा हो, या पीड़ा से अत्यन्त व्यथित हो —
स्मरन् ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् ।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ॥ १२.२९॥
smaran mamaitaccaritaṃ naro mucyeta saṅkaṭāt |
mama prabhāvātsiṃhādyā dasyavo vairiṇastathā || 12.29||
अर्थ ऐसा मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करते हुए संकट से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि हिंसक जीव, डाकू और शत्रु —
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥ १२.३०॥
dūrādeva palāyante smarataścaritaṃ mama || 12.30||
अर्थ मेरे चरित्र का स्मरण करनेवाले से दूर से ही भाग जाते हैं।
ऋषिरुवाच ॥ १२.३१॥
ṛṣiruvāca || 12.31||
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥ १२.३२॥
ityuktvā sā bhagavatī caṇḍikā caṇḍavikramā || 12.32||
अर्थ ऐसा कहकर वे प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका,
पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत ।
तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान्यथा पुरा ॥ १२.३३॥
paśyatāṃ sarvadevānāṃ tatraivāntaradhīyata |
te'pi devā nirātaṅkāḥ svādhikārānyathā purā || 12.33||
अर्थ समस्त देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गईं। वे देवता भी निर्भय होकर, पहले की भाँति अपने-अपने अधिकारों (कार्यों) को —
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः ।
दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥ १२.३४॥
yajñabhāgabhujaḥ sarve cakrurvinihatārayaḥ |
daityāśca devyā nihate śumbhe devaripau yudhi || 12.34||
अर्थ यज्ञभाग के भोक्ता बनकर, अपने शत्रुओं का नाश हो जाने पर, सब निर्वहन करने लगे। और देवशत्रु शुम्भ के युद्ध में देवी द्वारा मारे जाने पर,
जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे ।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥ १२.३५॥
jagadvidhvaṃsake tasmin mahogre'tulavikrame |
niśumbhe ca mahāvīrye śeṣāḥ pātālamāyayuḥ || 12.35||
अर्थ तथा जगत् का विध्वंस करनेवाले, महाभयंकर, अतुलनीय पराक्रमी एवं महापराक्रमी निशुम्भ के भी मारे जाने पर, शेष बचे दैत्य पाताल को चले गए।
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः ।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥ १२.३६॥
evaṃ bhagavatī devī sā nityāpi punaḥ punaḥ |
sambhūya kurute bhūpa jagataḥ paripālanam || 12.36||
अर्थ इस प्रकार, हे राजन्! वे भगवती देवी नित्या (सनातन) होते हुए भी बार-बार प्रकट होकर जगत् का पालन करती हैं।
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते ।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥ १२.३७॥
tayaitanmohyate viśvaṃ saiva viśvaṃ prasūyate |
sā yācitā ca vijñānaṃ tuṣṭā ṛddhiṃ prayacchati || 12.37||
अर्थ उन्हीं के द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व मोहित किया जाता है, वे ही विश्व को उत्पन्न करती हैं; प्रार्थना किए जाने पर वे ज्ञान (विज्ञान) प्रदान करती हैं और प्रसन्न होने पर ऋद्धि (समृद्धि) देती हैं।
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर ।
महादेव्या महाकाली महामारीस्वरूपया ॥ १२.३८॥
vyāptaṃ tayaitatsakalaṃ brahmāṇḍaṃ manujeśvara |
mahādevyā mahākālī mahāmārīsvarūpayā || 12.38||
अर्थ हे मनुजेश्वर! महामारीस्वरूपा महाकाली रूपिणी उन महादेवी के द्वारा यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है।
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा ।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥ १२.३९॥
saiva kāle mahāmārī saiva sṛṣṭirbhavatyajā |
sthitiṃ karoti bhūtānāṃ saiva kāle sanātanī || 12.39||
अर्थ वे ही समय आने पर महामारी (संहार) रूप हैं, वे ही अजन्मा होकर सृष्टि रूप बनती हैं; और वे ही सनातनी समय पर प्राणियों की स्थिति (पालन) करती हैं।
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे ।
सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥ १२.४०॥
bhavakāle nṛṇāṃ saiva lakṣmīrvṛddhipradā gṛhe |
saivābhāve tathālakṣmīrvināśāyopajāyate || 12.40||
अर्थ उत्कर्ष (समृद्धि) के समय वे ही मनुष्यों के घर में वृद्धि देनेवाली लक्ष्मी हैं, और अवसान (दुर्भाग्य) के समय वे ही अलक्ष्मी बनकर विनाश के लिए प्रकट होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्गन्धधूपादिभिस्तथा ।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ १२.४१॥
stutā sampūjitā puṣpairgandhadhūpādibhistathā |
dadāti vittaṃ putrāṃśca matiṃ dharme gatiṃ śubhām || 12.41||
अर्थ पुष्प, गन्ध, धूप आदि से स्तुति और भलीभाँति पूजा किए जाने पर वे धन और पुत्र प्रदान करती हैं, तथा धर्म में बुद्धि और शुभ गति (सद्गति) देती हैं।
भगवती वाक्यं द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
bhagavatī vākyaṃ dvādaśo'dhyāyaḥ || 12||
अर्थ इस प्रकार श्रीदुर्गासप्तशती (देवीमाहात्म्य) का 'भगवती-वाक्य' नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
उवाच २, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३७, एवमादितः ॥ ६७१॥
uvāca 2, ardhaślokau 2, ślokāḥ 37, evamāditaḥ || 671||
अर्थ श्लोक-गणना सूचक पंक्ति — इस अध्याय में दो 'उवाच' (देव्युवाच तथा ऋषिरुवाच), दो अर्धश्लोक और सैंतीस पूर्ण श्लोक हैं; इस प्रकार आरम्भ से (कुल संचित संख्या) छह सौ इकहत्तर होती है।