। ध्यानम् ।
ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम् ।
रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
अर्थ ध्यान-श्लोक — इसमें देवी कामेश्वरी का ध्यान है। जो तपाये हुए स्वर्ण के समान कान्तिमती हैं, जिनके तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि हैं, जो अपने सुन्दर भुजाओं में धनुष, बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण करती हैं, जो शिव-शक्ति-स्वरूपा हैं तथा मस्तक पर चन्द्रकला धारण किए हुए हैं — ऐसी देवी कामेश्वरी का मैं हृदय में भजन करता हूँ।
ॐ ऋषिरुवाच ॥ १०.१॥
अर्थ ऋषि (मार्कण्डेय) बोले —
निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम् ।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ १०.२॥
अर्थ अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मारा गया और सेना को भी नष्ट होते देखकर शुम्भ क्रोध में भरकर यह वचन बोला —
बलावलेपदुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह ।
अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे चातिमानिनी ॥ १०.३॥
अर्थ अरे बल के घमंड से दुष्ट बनी हुई दुर्गे! तू अभिमान मत कर। अत्यन्त अभिमानिनी होकर भी तू तो दूसरी (शक्तियों) के बल का सहारा लेकर लड़ रही है।
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥ १०.५॥
अर्थ इस जगत् में मैं ही अकेली हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है? रे दुष्ट! देख, ये सब तो मेरी ही विभूतियाँ हैं, जो मुझमें ही समा रही हैं।
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् ।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥ १०.६॥
अर्थ तब ब्रह्माणी आदि वे समस्त देवियाँ (मातृगण) उस देवी के शरीर में लीन हो गईं; उस समय केवल एक अम्बिका ही शेष रह गईं।
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता ।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ १०.८॥
अर्थ मैं अपनी विभूति से यहाँ जो अनेक रूपों में स्थित थी, उन्हें मैंने अपने में समेट लिया है; अब मैं अकेली ही खड़ी हूँ। तू युद्ध में डटकर स्थिर रह।
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ १०.१०॥
अर्थ इसके बाद समस्त देवताओं और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ — इन दोनों में घोर युद्ध छिड़ गया।
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः ।
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ १०.११॥
अर्थ तीखे बाणों की वर्षा, पैने शस्त्रों तथा अत्यन्त भयंकर अस्त्रों से उन दोनों का, समस्त लोकों को भयभीत करने वाला युद्ध पुनः होने लगा।
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ १०.१२॥
अर्थ अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज (शुम्भ) ने उनका निवारण करने वाले प्रति-अस्त्रों से तोड़ डाला।
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ १०.१३॥
अर्थ और उसके द्वारा छोड़े गए दिव्य अस्त्रों को परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार आदि के उच्चारण मात्र से खेल-खेल में ही तोड़ डाला।
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः ।
सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ १०.१४॥
अर्थ तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढँक दिया; इस पर कुपित हुई देवी ने भी अपने बाणों से उसका धनुष काट डाला।
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ १०.१५॥
अर्थ धनुष कट जाने पर दैत्यराज ने शक्ति (नामक अस्त्र) उठाई; देवी ने चक्र से उसे भी, जब वह उसके हाथ में ही थी, काट डाला।
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।
अभ्यधा वत तां देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १०.१६॥
अर्थ तब दैत्यों का अधीश्वर सौ चन्द्रों से युक्त चमकती हुई ढाल और तलवार लेकर उस देवी की ओर झपटा।
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ।
अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह ॥ १०.१७॥
अर्थ झपटते हुए उसकी तलवार को चण्डिका ने तुरन्त काट डाला और धनुष से छोड़े गए तीखे बाणों से सूर्य-किरणों के समान निर्मल उसकी ढाल को भी काट दिया; तथा सारथि सहित रथ और घोड़ों को भी गिरा दिया।
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ १०.१८॥
अर्थ तब घोड़ों के मारे जाने, धनुष कट जाने और सारथि के न रहने पर वह दैत्य अम्बिका को मार डालने के लिए उद्यत होकर एक भयंकर मुद्गर (गदा) उठा लिया।
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ १०.१९॥
अर्थ झपटते हुए उसके उस मुद्गर को देवी ने तीखे बाणों से काट डाला; फिर भी वह वेगपूर्वक मुट्ठी तानकर उन पर दौड़ पड़ा।
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ १०.२०॥
अर्थ उस दैत्यश्रेष्ठ ने अपनी मुट्ठी देवी की छाती पर मारी; तब देवी ने भी उसकी छाती पर हथेली से प्रहार किया।
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ १०.२१॥
अर्थ हथेली के उस प्रहार से आहत होकर वह दैत्यराज पृथ्वी पर गिर पड़ा; किन्तु सहसा ही वह फिर उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ।
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ १०.२२॥
अर्थ ऊपर उछलकर और देवी को पकड़कर वह आकाश में जा पहुँचा; वहाँ भी बिना किसी आधार के चण्डिका उसके साथ युद्ध करती रहीं।
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ १०.२३॥
अर्थ तब दैत्य और चण्डिका ने आकाश में परस्पर वह मल्ल-युद्ध (नियुद्ध) किया, जो पहले कभी न हुआ था और सिद्धों तथा मुनियों को भी विस्मित कर देने वाला था।
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।
उत्पाट्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ १०.२४॥
अर्थ इस प्रकार उसके साथ बहुत देर तक मल्ल-युद्ध करके अम्बिका ने उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया।
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ १०.२५॥
अर्थ इस प्रकार फेंका जाकर वह दुष्टात्मा पृथ्वी पर पहुँचते ही मुट्ठी तानकर चण्डिका को मार डालने की इच्छा से वेगपूर्वक (उन पर) दौड़ पड़ा।
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ १०.२६॥
अर्थ तब समस्त दैत्यजनों के उस स्वामी को अपनी ओर आते देख देवी ने शूल से उसकी छाती को बींधकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।
स गतासुः पपातोर्व्यां देवी शूलाग्रविक्षतः ।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ १०.२७॥
अर्थ देवी के शूल की नोक से बिंधा हुआ वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी को कँपा गया।
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ १०.२८॥
अर्थ उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हो उठा; संसार ने परम स्वस्थता (शान्ति) प्राप्त की और आकाश निर्मल हो गया।
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ १०.२९॥
अर्थ पहले जो उल्कापात के साथ उत्पात-सूचक मेघ छाए थे, वे सब शान्त हो गए; और उसके गिराए जाने पर नदियाँ (फिर से) अपने ठीक मार्ग से बहने लगीं।
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ १०.३०॥
अर्थ उसके मारे जाने पर सभी देवगण हर्ष से परिपूर्ण हृदय वाले हो गए; और गन्धर्व मधुर गान करने लगे।
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥ १०.३१॥
अर्थ दूसरे (गन्धर्व) बाजे बजाने लगे और अप्सराओं के समूह नाचने लगे; पवित्र वायु बहने लगी और सूर्य अत्यन्त कान्तिमान् हो उठा।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ १०.३२॥
अर्थ (पहले उपद्रव के कारण) शान्त हो गए अग्नि अब शान्त भाव से स्थिर होकर प्रज्वलित होने लगे और दिशाओं में उठे हुए (अशुभ) शब्द भी शान्त हो गए।