संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥ १०८ (घ )॥
saṃkara dīnadayāla aba ehi para hohu kṛpāla|
sāpa anugraha hoi jehiṃ nātha thorehīṃ kāla|| 108 (gha )||
Meaning हे दीनोंपर दया करनेवाले [ कल्याणकारी ] शड्धर ! अब इसपर कृपालु होइये (कृपा कीजिये ), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समयमें इसपर शापके बाद अनुग्रह ( शापसे मुक्ति) हो जाय॥ १०८ (घ)॥
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥
बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥
ehi kara hoi parama kalyānā| soi karahu aba kṛpānidhānā||
bipragirā suni parahita sānī| evamastu iti bhai nabhabānī||
Meaning हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई--एवमस्तु' (ऐसा ही हो)॥ १॥
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा॥
तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥
jadapi kīnha ehiṃ dāruna pāpā| maiṃ puni dīnha kopa kari sāpā||
tadapi tumhāra sādhutā dekhī| karihaum̐ ehi para kṛpā biseṣī||
Meaning यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा॥ २॥
छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी॥
मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि॥
chamāsīla je para upakārī| te dvija mohi priya jathā kharārī||
mora śrāpa dvija byartha na jāihi| janma sahasa avasya yaha pāihi||
Meaning हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी। हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा। यह हजार जन्म अवश्य पावेगा॥ ३॥
जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥
janamata marata dusaha dukha hoī| ahi svalpau nahiṃ byāpihi soī||
kavaneum̐ janma miṭihi nahiṃ gyānā| sunahi sūdra mama bacana pravānā||
Meaning परन्तु जन्मने और मरनेमें जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र ! मेरा प्रामाणिक (सत्य) वचन सुन॥ ४॥
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ॥
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें॥
raghupati purīṃ janma taba bhayaū| puni taiṃ mama sevām̐ mana dayaū||
purī prabhāva anugraha moreṃ| rāma bhagati upajihi ura toreṃ||
Meaning [प्रथम तो] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी पुरीमें हुआ। फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न होगी॥ ५॥
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई॥
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना॥
sunu mama bacana satya aba bhāī| haritoṣana brata dvija sevakāī||
aba jani karahi bipra apamānā| jānehu saṃta anaṃta samānā||
Meaning हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजोंकी सेवा ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाला ब्रत है। अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना। संतोंको अनन्त श्रीभगवानूहीके समान जानना॥ ६॥
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥
जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई॥
iṃdra kulisa mama sūla bisālā| kāladaṃḍa hari cakra karālā||
jo inha kara mārā nahiṃ maraī| bipradroha pāvaka so jaraī||
Meaning इन्द्रके व्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिकि विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रदोहरूपी अग्िसे भस्म हो जाता है॥ ७॥
अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।
औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी॥
asa bibeka rākhehu mana māhīṃ| tumha kaham̐ jaga durlabha kachu nāhīṃ|
aurau eka āsiṣā morī| apratihata gati hoihi torī||
Meaning ऐसा विवेक मनमें रखना। फिर तुम्हारे लिये जगतमें कुछ भी दुर्लभ न होगा। मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी (अर्थात् तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहीं बिना रोक-टोकके जा सकोगे)॥ ८॥
सुनि सिव बचन हरघि गुर एवमस्तु इति भाषि।
मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ ' १०९ ( क )॥
suni siva bacana haraghi gura evamastu iti bhāṣi|
mohi prabodhi gayau gṛha saṃbhu carana ura rākhi|| ' 109 ( ka )||
Meaning [ आकाशवाणीके द्वारा] शिवजीके वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर ऐसा ही हो' यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजीके चरणोंको हृदयमें रखकर अपने घर गये॥ १०९ (क)॥
प्रेरित काल बिंधि गिरि जाड़ भयरें मैं ब्याल।
पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल॥ १०९ ( ख )॥
prerita kāla biṃdhi giri jāṛa bhayareṃ maiṃ byāla|
puni prayāsa binu so tanu tajeum̐ gaem̐ kachu kāla|| 109 ( kha )||
Meaning कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतनेपर बिना ही परिश्रम (कष्ट) के मैंने वह शरीर त्याग दिया॥ १०९ (ख)॥
जोड़ तनु धर तजड३ें पुनि अनायास हरिजान।
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥ १०९ ( ग )॥
joṛa tanu dhara tajaḍa3ेṃ puni anāyāsa harijāna|
jimi nūtana paṭa pahirai nara pariharai purāna|| 109 ( ga )||
Meaning हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है॥ १०९ (ग)॥
सिर राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस।
एहि बिधि धरेउं बिबिधि तनुग्यान नगयउ खगेस॥ २१०९ ( घ )॥
sira rākhī śruti nīti aru maiṃ nahiṃ pāvā klesa|
ehi bidhi dhareuṃ bibidhi tanugyāna nagayau khagesa|| 2109 ( gha )||
Meaning शिवजीने वेदकी मर्यादाकी रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया॥ १०९ (घ)॥
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥
एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥
trijaga deva nara joi tanu dharaum̐| taham̐ taham̐ rāma bhajana anusaraūm̐||
eka sūla mohi bisara na kāū| gura kara komala sīla subhāū||
Meaning तिर्यक् योनि (पशु-पक्षी ), देवता या मनुष्यका, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस- उस शरीरमें) मैं श्रीरीमजीका भजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजीका कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात् मैंने ऐसे कोमल- स्वभाव दयालु गुरुका अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा)॥ १॥
चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥
carama deha dvija kai maiṃ pāī| sura durlabha purāna śruti gāī||
khelaum̐ tahūm̐ bālakanha mīlā| karaum̐ sakala raghunāyaka līlā||
Meaning मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मणका पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओंको भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरीरमें) भी बालकोंमें मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजीकी ही सब लीलाएँ किया करता॥ २॥
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझें सुन गुनऊ नहिं भावा॥
मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥
prauṛha bhaem̐ mohi pitā paṛhāvā| samajheṃ suna gunaū nahiṃ bhāvā||
mana te sakala bāsanā bhāgī| kevala rāma carana laya lāgī||
Meaning सयाना होनेपर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और विचारता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मनसे सारी वासनाएँ भाग गयीं। केवल श्रीरामजीके चरणोंमें लव लग गयी॥ ३॥
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥
kahu khagesa asa kavana abhāgī| kharī seva suradhenuhi tyāgī||
prema magana mohi kachu na sohāī| hāreu pitā paṛhāi paṛhāī||
Meaning हे गरुड़जी ! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनुको छोड़कर गदहीकी सेवा करेगा ? प्रेममें मग्र रहनेके कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर हार गये॥ ४॥
भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥
bhae kālabasa jaba pitu mātā| maiṃ bana gayaum̐ bhajana janatrātā||
jaham̐ jaham̐ bipina munīsvara pāvaum̐| āśrama jāi jāi siru nāvaum̐||
Meaning जब पिता-माता कालवश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तोंकी रक्षा करनेवाले श्रीरामजीका भजन करनेके लिये वनमें चला गया। वनमें जहाँ-जहाँ मुनीश्वरोंके आश्रम पाता, वहाँ-वहाँ जा- जाकर उन्हें सिर नवाता॥ ५॥
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥
būjhata tinhahi rāma guna gāhā| kahahiṃ sunaum̐ haraṣita khaganāhā||
sunata phiraum̐ hari guna anubādā| abyāhata gati saṃbhu prasādā||
Meaning हे गरुड़जी ! उनसे मैं श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरिके गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजीकी कृपासे मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात् मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था)॥ ६॥
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥
राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥
chūṭī tribidha īṣanā gāṛhī| eka lālasā ura ati bāṛhī||
rāma carana bārija jaba dekhauṃ| taba nija janma saphala kari lekhauṃ||
Meaning मेरी तीनों प्रकारकी (पुत्रकी, धनकी और मानकी) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदयमें एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजीके चरणकमलोंके दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ॥ ७॥
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई॥
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥
jehi pūm̐chaum̐ soi muni asa kahaī| īsvara sarba bhūtamaya ahaī||
nirguna mata nahiṃ mohi sohāī| saguna brahma rati ura adhikāī||
Meaning जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था। हृदयमें सगुण ब्रह्मपर प्रीति बढ़ रही थी॥ ८॥
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।
रघुपति जस गावत फिरउें छन छन नव अनुराग॥ ११० ( क )॥
gura ke bacana surati kari rāma carana manu lāga|
raghupati jasa gāvata phirauेṃ chana chana nava anurāga|| 110 ( ka )||
Meaning गुरुजीके वचनोंका स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजीके चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया- नया प्रेम प्रात करता हुआ श्रीरघुनाथजीका यश गाता फिरता था॥ ११० (क)॥
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।
देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउं अति दीन॥ ११० ( ख )॥
meru sikhara baṭa chāyām̐ muni lomasa āsīna|
dekhi carana siru nāyaum̐ bacana kaheuṃ ati dīna|| 110 ( kha )||
Meaning सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़की छायामें लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने उनके चरणों में सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे॥ ११० (ख)॥
सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज।
मोहि सादर पूछत भए द्विज आयहु केहि काज॥ ११० ( ग)॥
suni mama bacana binīta mṛdu muni kṛpāla khagarāja|
mohi sādara pūchata bhae dvija āyahu kehi kāja|| 110 ( ga)||
Meaning हे पक्षिराज! मेरे अत्यन्त नम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदरके साथ पूछने लगे-हे ब्राह्मण! आप किस कार्यसे यहाँ आये हैं॥ ११० (ग)॥
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।
सगुन ब्रहहा अवराधन मोहि कहट्ठु भगवान॥ ११० (घ )॥
taba maiṃ kahā kṛpānidhi tumha sarbagya sujāna|
saguna brahahā avarādhana mohi kahaṭṭhu bhagavāna|| 110 (gha )||
Meaning तब मैंने कहा-हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं। हे भगवन् ! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधना [की प्रक्रिया] कहिये॥ ११० (घ)॥
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी॥
taba muniṣa raghupati guna gāthā| kahe kachuka sādara khaganāthā||
brahmagyāna rata muni bigyāni| mohi parama adhikārī jānī||
Meaning तब हे पक्षिराज! मुनीश्वरने श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कुछ कथाएँ आदरसहित कहीं। फिर वे ब्रह्मजज्ञानपरायण विज्ञानवान् मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर--॥ १॥
लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा॥
अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥
lāge karana brahma upadesā| aja adveta aguna hṛdayesā||
akala anīha anāma arupā| anubhava gamya akhaṃḍa anūpā||
Meaning ब्रहाका उपदेश करने लगे कि वह अजनमा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदयका स्वामी ( अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धिके द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित अनुभवसे जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है,॥ २॥
मन गोतीत अमल अबिनासी।
निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥
mana gotīta amala abināsī| nirbikāra niravadhi sukha rāsī||
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा।
बारि बीचि इव गावहि बेदा॥
so taiṃ tāhi tohi nahiṃ bhedā| bāri bīci iva gāvahi bedā||
Meaning वह मन और इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमारहित और सुखकी राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत््वमसि), जल और जलकी लहरकी भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है॥३॥
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥
bibidha bhām̐ti mohi muni samujhāvā| nirguna mata mama hṛdayam̐ na āvā||
puni maiṃ kaheum̐ nāi pada sīsā| saguna upāsana kahahu munīsā||
Meaning मुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा। मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा--हे मुनीधर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये॥ ४॥
राम भगति जल मम मन मीना।
किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥
rāma bhagati jala mama mana mīnā| kimi bilagāi munīsa prabīnā||
सोइ उपदेस कहहु करि दाया।
निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥
soi upadesa kahahu kari dāyā| nija nayananhi dekhauṃ raghurāyā||
Meaning मेरा मन रामभक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है (उसीमें रम रहा है)। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशामें वह उससे अलग कैसे हो सकता है ? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ॥ ५॥
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा॥
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥
bhari locana biloki avadhesā| taba sunihaum̐ nirguna upadesā||
muni puni kahi harikathā anūpā| khaṃḍi saguna mata aguna nirūpā||
Meaning [पहले] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथको देखकर, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुणका निरूपण किया॥ ६॥
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥
taba maiṃ nirguna mata kara dūrī| saguna nirūpaum̐ kari haṭha bhūrī||
uttara pratiuttara maiṃ kīnhā| muni tana bhae krodha ke cīnhā||
Meaning तब मैं निर्गुण मतको हटाकर (काटकर) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्त किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोधके चिह्न उत्पन्न हो गये॥ ७॥
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥
अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥
sunu prabhu bahuta avagyā kiem̐| upaja krodha gyāninha ke hiem̐||
ati saṃgharaṣana jauṃ kara koī| anala pragaṭa caṃdana te hoī||
Meaning हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करनेपर ज्ञानीके भी हदयमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दनकी लकड़ीको बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्ि प्रकट हो जायगी॥ ८॥
बारंबार सकोप मुनि करड़ निरूपन ग्यान।
मैं अपने मन बैठ तब करें बिबिधि अनुमान॥ १११ ( क )॥
bāraṃbāra sakopa muni karaṛa nirūpana gyāna|
maiṃ apane mana baiṭha taba kareṃ bibidhi anumāna|| 111 ( ka )||
Meaning मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञानका निरूपण करने लगे। तब मैं बैठा-बैठा अपने मनमें अनेकों प्रकारके अनुमान करने लगा॥ १११ (क)॥
क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि इस समान॥ १११ (ख )॥
krodha ki dvaitabuddhi binu dvaita ki binu agyāna|
māyābasa parichinna jaṛa jīva ki isa samāna|| 111 (kha )||
Meaning बिना ह्वैतबुद्धिकि क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है 2॥ १११ (ख)॥
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥
परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥
kabahum̐ ki dukha saba kara hita tākeṃ| tehi ki daridra parasa mani jākeṃ||
paradrohī kī hohiṃ nisaṃkā| kāmī puni ki rahahiṃ akalaṃkā||
Meaning सबका हित चाहनेसे क्या कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है? दूसरेसे द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं और कामी क्या कलड्ररहित (बेदाग) रह सकते हैं ?॥ १॥
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥
काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥
baṃsa ki raha dvija anahita kīnheṃ| karma ki hohiṃ svarūpahi cīnheṃ||
kāhū sumati ki khala sam̐ga jāmī| subha gati pāva ki paratriya gāmī||
Meaning ब्राह्मणका बुरा करनेसे क्या वंश रह सकता है ? स्वरूपकी पहिचान (आत्मज्ञान) होनेपर क्या [ आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं ? दुष्टोंके सज़से क्या किसीके सुबुद्धि उत्पन्न हुई है ? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है?॥ २॥
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक॥
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥
bhava ki parahiṃ paramātmā biṃdaka| sukhī ki hohiṃ kabahum̐ hariniṃdaka||
rāju ki rahai nīti binu jāneṃ| agha ki rahahiṃ haricarita bakhāneṃ||
Meaning परमात्माको जाननेवाले कहीं जन्म-मरण [के चक्कर] में पड़ सकते हैं ? भगवान्की निन््दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं ? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है ? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं?॥ ३॥
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥
लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥
pāvana jasa ki punya binu hoī| binu agha ajasa ki pāvai koī||
lābhu ki kichu hari bhagati samānā| jehi gāvahiṃ śruti saṃta purānā||
Meaning बिना पुण्यके क्या पवित्र यश [प्रा] हो सकता है ? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है ? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं उस हरि-भक्तिके समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है ?॥ ४॥
हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥
अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥
hāni ki jaga ehi sama kichu bhāī| bhajia na rāmahi nara tanu pāī||
agha ki pisunatā sama kachu ānā| dharma ki dayā sarisa harijānā||
Meaning हे भाई! जगत्में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्यका शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय ? चुगलखोरीके समान क्या कोई दूसरा पाप है ? और हे गरुड़जी ! दयाके समान क्या कोई दूसरा धर्म है ?॥ ५॥
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ॥
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा॥
ehi bidhi amiti juguti mana gunaūm̐| muni upadesa na sādara sunaūm̐||
puni puni saguna paccha maiṃ ropā| taba muni boleu bacana sakopā||
Meaning इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मनमें विचारता था और आदरके साथ मुनिका उपदेश नहीं सुनता था। जब मैंने बार-बार सगुणका पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले--॥ ६॥
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥
सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही॥
mūṛha parama sikha deum̐ na mānasi| uttara pratiuttara bahu ānasi||
satya bacana bisvāsa na karahī| bāyasa iva sabahī te ḍarahī||
Meaning अरे मूढ़! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ, तो भी तू उसे नहीं मानता और बहुत-से उत्तर- प्रत्युत्तर (दलीलें ) लाकर रखता है। मेरे सत्य वचनपर विश्वास नहीं करता! कौएकी भाँति सभीसे डरता है॥ ७॥
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥
saṭha svapaccha taba hṛdayam̐ bisālā| sapadi hohi pacchī caṃḍālā||
līnha śrāpa maiṃ sīsa caṛhāī| nahiṃ kachu bhaya na dīnatā āī||
Meaning आरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने पक्षका बड़ा भारी हठ है, अत: तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनन्दके साथ मुनिके शापको सिरपर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी॥ ८॥
तुरत भयडं मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरघित चलें उड़ाइ॥ ११२ (क )॥
turata bhayaḍaṃ maiṃ kāga taba puni muni pada siru nāi|
sumiri rāma raghubaṃsa mani haraghita caleṃ uṛāi|| 112 (ka )||
Meaning तब मैं तुरंत ही कौआ हो गया। फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीका स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला॥ ११२ (क)॥
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥ ११२ (ख )॥
umā je rāma carana rata bigata kāma mada krodha|
nija prabhumaya dekhahiṃ jagata kehi sana karahiṃ birodha|| 112 (kha )||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें ?॥ ११२ (ख)॥
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी॥
sunu khagesa nahiṃ kachu riṣi dūṣana| ura preraka raghubaṃsa bibhūṣana||
kṛpāsiṃdhu muni mati kari bhorī| līnhi prema paricchā morī||
Meaning [ काकभुशुण्डिजीने कहा-- हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषिका कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंशके विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदयमें प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभुने मुनिकी बुद्धिको भोली करके ( भुलावा देकर) मेरे प्रेमको परीक्षा ली॥ १॥
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना॥
रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी॥
mana baca krama mohi nija jana jānā| muni mati puni pherī bhagavānā||
riṣi mama mahata sīlatā dekhī| rāma carana bisvāsa biseṣī||
Meaning मन, वचन और कर्मसे जब प्रभुने मुझे अपना दास जान लिया, तब भगवान्ने मुनिकी बुद्धि फिर पलट दी। ऋषिने मेरा महान् पुरुषोंका-सा स्वभाव (धैर्य, अक्रोध, विनय आदि) और श्रीरामजीके चरणोंमें विशेष विश्वास देखा,॥ २॥
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥
ati bisamaya puni puni pachitāī| sādara muni mohi līnha bolāī||
mama paritoṣa bibidha bidhi kīnhā| haraṣita rāmamaṃtra taba dīnhā||
Meaning तब मुनिने बहुत दुःखके साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया। उन्होंने अनेकों प्रकारसे मेरा सन्तोष किया और तब हर्षित होकर मुझे राममन्त्र दिया॥ ३॥
बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना॥
सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा॥
bālakarūpa rāma kara dhyānā| kaheu mohi muni kṛpānidhānā||
suṃdara sukhada mihi ati bhāvā| so prathamahiṃ maiṃ tumhahi sunāvā||
Meaning कृपानिधान मुनिने मुझे बालकरूप श्रीरामजीका ध्यान (ध्यानकी विधि) बतलाया। सुन्दर और सुख देनेवाला यह ध्यान मुझे बहुत ही अच्छा लगा। वह ध्यान मैं आपको पहले ही सुना चुका हूँ॥ '४१॥
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। तब भाषा॥
सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥
muni mohi kachuka kāla taham̐ rākhā| taba bhāṣā||
sādara mohi yaha kathā sunāī| puni bole muni girā suhāī||
Meaning मुनिने कुछ समयतक मुझको वहाँ (अपने पास) रखा। तब उन्होंने रामचरितमानस वर्णन किया। आदरपूर्वक मुझे यह कथा सुनाकर फिर मुनि मुझसे सुन्दर वाणी बोले--॥५॥
रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥
तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥
rāmacarita sara gupta suhāvā| saṃbhu prasāda tāta maiṃ pāvā||
tohi nija bhagata rāma kara jānī| tāte maiṃ saba kaheum̐ bakhānī||
Meaning हे तात! यह सुन्दर और गुप्त रामचरितमानस मैंने शिवजीकी कृपासे पाया था। तुम्हें श्रीरामजीका 'निज भक्त' जाना, इसीसे मैंने तुमसे सब चरित्र विस्तारके साथ कहा॥ ६॥
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥
rāma bhagati jinha keṃ ura nāhīṃ| kabahum̐ na tāta kahia tinha pāhīṃ||
muni mohi bibidha bhām̐ti samujhāvā| maiṃ saprema muni pada siru nāvā||
Meaning हे तात! जिनके हृदयमें श्रीरामजीकी भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनिने मुझे बहुत प्रकारसे समझाया। तब मैंने प्रेमके साथ मुनिके चरणोंमें सिर नवाया॥ ७॥
निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥
राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥
nija kara kamala parasi mama sīsā| haraṣita āsiṣa dīnha munīsā||
rāma bhagati abirala ura toreṃ| basihi sadā prasāda aba moreṃ||
Meaning मुनीश्वरने अपने कर-कमलोंसे मेरा सिर स्पर्श करके हर्षित होकर आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदयमें सदा प्रगाढ़ रामभक्ति बसेगी॥ ८॥
सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान।
कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान॥ ११३ (क )॥
sadā rāma priya hohu tumha subha guna bhavana amāna|
kāmarūpa icchāmarana gyāna birāga nidhāna|| 113 (ka )||
Meaning तुम सदा श्रीरामजीको प्रिय होओ और कल्याणरूप गुणोंके धाम, मानरहित इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, इच्छामृत्यु (जिसकी शरीर छोड़नेकी इच्छा करनेपर ही मृत्यु हो, बिना इच्छाके मृत्यु न हो), एवं ज्ञान और वैराग्यके भण्डार होओ॥ ११३ (क)॥
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत।
ब्यापिहि तहेँं न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥ ११३ (ख )॥
jehiṃ āśrama tumha basaba puni sumirata śrībhagavaṃta|
byāpihi tahem̐ṃ na abidyā jojana eka prajaṃta|| 113 (kha )||
Meaning इतना ही नहीं, श्रीभगवान्को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रममें निवास करोगे वहाँ एक योजन (चार कोस) तक अविद्या (माया-मोह) नहीं व्यापेगी॥ ११३ (ख)॥
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥
kāla karma guna doṣa subhāū| kachu dukha tumhahi na byāpihi kāū||
rāma rahasya lalita bidhi nānā| gupta pragaṭa itihāsa purānā||
Meaning काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य (गुप्त मर्मके चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)॥ १॥
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥
binu śrama tumha jānaba saba soū| nita nava neha rāma pada hoū||
jo icchā karihahu mana māhīṃ| hari prasāda kachu durlabha nāhīṃ||
Meaning तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजीके चरणोंमें तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मनमें तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरिकी कृपासे उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी॥ २॥
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रहागिरा भड़ गगन गेंभीरा॥
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥
suni muni āsiṣa sunu matidhīrā| brahāgirā bhaṛa gagana geṃbhīrā||
evamastu tava baca muni gyānī| yaha mama bhagata karma mana bānī||
Meaning हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनिका आशीर्वाद सुनकर आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह कर्म, मन और वचनसे मेरा भक्त है॥ ३॥
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥
करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥
suni nabhagirā haraṣa mohi bhayaū| prema magana saba saṃsaya gayaū||
kari binatī muni āyasu pāī| pada saroja puni puni siru nāī||
Meaning आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेममें मग्र हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। तदनन्तर मुनिकी विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलोंमें बार-बार सिर नवाकर--॥ ४॥
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥
haraṣa sahita ehiṃ āśrama āyaum̐| prabhu prasāda durlabha bara pāyaum̐||
ihām̐ basata mohi sunu khaga īsā| bīte kalapa sāta aru bīsā||
Meaning मैं हर्षसहित इस आश्रममें आया। प्रभु श्रीरामजीकी कृपासे मैंने दुर्लभ वर पा लिया। हे पक्षिराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये॥ ५॥
करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥
karaum̐ sadā raghupati guna gānā| sādara sunahiṃ bihaṃga sujānā||
jaba jaba avadhapurīṃ raghubīrā| dharahiṃ bhagata hita manuja sarīrā||
Meaning मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। अयोध्यापुरीमें जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके [हितके] लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं,॥ ६१॥
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥
taba taba jāi rāma pura rahaūm̐| sisulīlā biloki sukha lahaūm̐||
puni ura rākhi rāma sisurūpā| nija āśrama āvaum̐ khagabhūpā||
Meaning तब-तब मैं जाकर श्रीरामजीकी नगरीमें रहता हूँ और प्रभुकी शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजीके शिशुरूपको हदयमें रखकर मैं अपने आश्रममें आ जाता हूँ॥ ७॥
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई॥
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥
kathā sakala maiṃ tumhahi sunāī| kāga deha jehiṃ kārana pāī||
kahium̐ tāta saba prasna tumhārī| rāma bhagati mahimā ati bhārī||
Meaning जिस कारणसे मैंने कौएकी देह पायी, वह सारी कथा आपको सुना दी। हे तात! मैंने आपके सब प्रश्रोंके उत्तर कहे। अहा! रामभक्तिकी बड़ी भारी महिमा है॥ ८॥
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।
निज प्रभु दरसन पायउँं गए सकल संदेह॥ ११४ (क )॥
tāte yaha tana mohi priya bhayau rāma pada neha|
nija prabhu darasana pāyaum̐ṃ gae sakala saṃdeha|| 114 (ka )||
Meaning मुझे अपना यह काकशरीर इसीलिये प्रिय है कि इसमें मुझे श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम प्राप्त हुआ। इसी शरीरसे मैंने अपने प्रभुके दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे (दूर हुए)॥ ११४ (क)॥
भगति पच्छ हठ करि रहें दीन्हि महारिषि साप।
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखह भजन प्रताप॥ ११४ ( ख )॥
bhagati paccha haṭha kari raheṃ dīnhi mahāriṣi sāpa|
muni durlabha bara pāyaum̐ dekhaha bhajana pratāpa|| 114 ( kha )||
Meaning मैं हठ करके भक्तिपक्षपर अड़ा रहा, जिससे महर्षि लोमशने मुझे शाप दिया; परन्तु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियोंको भी दुर्लभ है, वह वरदान मैंने पाया। भजनका प्रताप तो देखिये!॥ ११४ (ख)॥
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥
je asi bhagati jāni pariharahīṃ| kevala gyāna hetu śrama karahīṃ||
te jaṛa kāmadhenu gṛham̐ tyāgī| khojata āku phirahiṃ paya lāgī||
Meaning जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञानके लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं॥ १॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥
sunu khagesa hari bhagati bihāī| je sukha cāhahiṃ āna upāī||
te saṭha mahāsiṃdhu binu taranī| pairi pāra cāhahiṃ jaṛa karanī||
Meaning हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले ( अभागे) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं॥ २॥
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥
suni bhasuṃḍi ke bacana bhavānī| boleu garuṛa haraṣi mṛdu bānī||
tava prasāda prabhu mama ura māhīṃ| saṃsaya soka moha bhrama nāhīṃ||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! भुशुण्डिकि वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणीसे बोले--हे प्रभो ! आपके प्रसादसे मेरे हदयमें अब सन्देह, शोक, मोह. और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया॥ ३॥
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा॥
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥
suneum̐ punīta rāma guna grāmā| tumharī kṛpām̐ laheum̐ biśrāmā||
eka bāta prabhu pūm̐chaum̐ tohī| kahahu bujhāi kṛpānidhi mohī||
Meaning मैंने आपकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र गुणसमूहोंको सुना और शान्ति प्राप्त की। हे प्रभो ! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ। हे कृपासागर! मुझे समझाकर कहिये॥ ४॥
कहहिं संत मुनि बेद पुराना।
नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना॥
kahahiṃ saṃta muni beda purānā| nahiṃ kachu durlabha gyāna samānā||
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं।
नहिं आदरेहु भगति की नाईं॥
soi muni tumha sana kaheu gosāīṃ| nahiṃ ādarehu bhagati kī nāīṃ||
Meaning संत, मुनि, वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। हे गोसाई ! वही ज्ञान मुनिने आपसे कहा, परन्तु आपने भक्तिके समान उसका आदर नहीं किया॥ ५॥
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥
सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥
gyānahi bhagatihi aṃtara ketā| sakala kahahu prabhu kṛpā niketā||
suni uragāri bacana sukha mānā| sādara boleu kāga sujānā||
Meaning हे कृपाके धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें कितना अन्तर है ? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जीके वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीने सुख माना और आदरके साथ कहा--॥ ६॥
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥
bhagatihi gyānahi nahiṃ kachu bhedā| ubhaya harahiṃ bhava saṃbhava khedā||
nātha munīsa kahahiṃ kachu aṃtara| sāvadhāna sou sunu bihaṃgabara||
Meaning भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं। हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये॥ ७॥
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥
gyāna birāga joga bigyānā| e saba puruṣa sunahu harijānā||
puruṣa pratāpa prabala saba bhām̐tī| abalā abala sahaja jaṛa jātī||
Meaning हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान--ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है। अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है॥ ८॥
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर॥ ११५ ( क )॥
-puruṣa tyāgi saka nārihi jo birakta mati dhīra|
na tu kāmī biṣayābasa bimukha jo pada raghubīra|| 115 ( ka )||
Meaning परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्रीको त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयोंके वशभें हैं (उनके गुलाम हैं ) और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख हैं॥ ११५ (क)॥
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥ ११५ (ख )॥
sou muni gyānanidhāna mṛganayanī bidhu mukha nirakhi|
bibasa hoi harijāna nāri biṣnu māyā pragaṭa|| 115 (kha )||
Meaning वे ज्ञानके भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुखको देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही स्त्रीरूपसे प्रकट है॥ ११५ (ख)॥
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ॥
मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥
ihām̐ na pacchapāta kachu rākhaum̐| beda purāna saṃta mata bhāṣaum̐||
moha na nāri nāri keṃ rūpā| pannagāri yaha rīti anūpā||
Meaning यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतोंका मत (सिद्धान्त) ही कहता हूँ। हे गरुड़जी ! यह अनुपम (विलक्षण) रीति है कि एक स्त्रीके रूपपर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती॥ १॥
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥
māyā bhagati sunahu tumha doū| nāri barga jānai saba koū||
puni raghubīrahi bhagati piārī| māyā khalu nartakī bicārī||
Meaning आप सुनिये, माया और भक्ति--ये दोनों ही स्त्रीवर्गकी हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुवीरको भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचनेवाली (नटिनीमात्र) है॥ २॥
भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥
bhagatihi sānukūla raghurāyā| tāte tehi ḍarapati ati māyā||
rāma bhagati nirupama nirupādhī| basai jāsu ura sadā abādhī||
Meaning श्रीरघुनाथजी भक्तिके विशेष अनुकूल रहते हैं। इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती रहती है। जिसके हृदयमें उपमारहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक- टोक) के बसती है;॥ ३॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी॥
tehi biloki māyā sakucāī| kari na sakai kachu nija prabhutāī||
asa bicāri je muni bigyānī| jācahīṃ bhagati sakala sukha khānī||
Meaning उसे देखकर माया सकुचा जाती है। उसपर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती। ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखोंकी खानि भक्तिकी ही याचना करते हैं॥ ४॥
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ।
जो जानइ रघुपति कृपा सपनेहुं मोह न होइ॥ ११६ ( क )॥
yaha rahasya raghunātha kara begi na jānai koi|
jo jānai raghupati kṛpā sapanehuṃ moha na hoi|| 116 ( ka )||
Meaning श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य (गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्रमें भी मोह नहीं होता॥ ११६ (क)॥
औरड ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन।
जो सुनि होड़ राम पद प्रीति सदा अबिछीन॥ ११६ ( ख )॥
auraḍa gyāna bhagati kara bheda sunahu suprabīna|
jo suni hoṛa rāma pada prīti sadā abichīna|| 116 ( kha )||
Meaning हे सुचतुर गरुड़जी! ज्ञान और भक्तिका और भी भेद सुनिये, जिसके सुननेसे श्रीरामजीके चरणोंमें सदा अविच्छिन्न (एकतार) प्रेम हो जाता है॥ ११६ (ख)॥
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
sunahu tāta yaha akatha kahānī| samujhata banai na jāi bakhānī||
īsvara aṃsa jīva abināsī| cetana amala sahaja sukha rāsī||
Meaning हे तात! यह अकथनीय कहानी (वार्ता) सुनिये। यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती। जीव ईश्वरका अंश है। [ अतएव] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावसे ही सुखकी राशि है॥१॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
so māyābasa bhayau gosāīṃ| bam̐dhyo kīra marakaṭa kī nāī||
jaṛa cetanahi graṃthi pari gaī| jadapi mṛṣā chūṭata kaṭhinaī||
Meaning हे गोसाई! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने-आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतनमें ग्रन्थि (गाँठ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटनेमें कठिनता है॥ २॥
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥
taba te jīva bhayau saṃsārī| chūṭa na graṃthi na hoi sukhārī||
śruti purāna bahu kaheu upāī| chūṭa na adhika adhika arujhāī||
Meaning तभीसे जीव संसारी ( जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणोंने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह (ग्रन्थि) छूटती नहीं वर अधिकाधिक उलझती ही जाती है॥ ३॥
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥
अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥
jīva hṛdayam̐ tama moha biseṣī| graṃthi chūṭa kimi parai na dekhī||
asa saṃjoga īsa jaba karaī| tabahum̐ kadācita so niruaraī||
Meaning जीवके हृदयमें अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूपसे छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे ? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग (जैसा आगे कहा जाता है) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचितू ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है॥ ४॥
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई॥
जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा॥
sāttvika śraddhā dhenu suhāī| jauṃ hari kṛpām̐ hṛdayam̐ basa āī||
japa tapa brata jama niyama apārā| je śruti kaha subha dharma acārā||
Meaning श्रीहरिकी कृपासे यदि सात्तिकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार (आचरण), जो श्रुतियोंने कहे हैं,॥ ५॥
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥
tei tṛna harita carai jaba gāī| bhāva baccha sisu pāi penhāī||
noi nibṛtti pātra bisvāsā| nirmala mana ahīra nija dāsā||
Meaning उन्हीं [ धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़ेको पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति (सांसारिक विषयोंसे और प्रपश्वसे हटना) नोई (गौके दूहते समय पिछले पैर बाँधनेकी रस्सी) है, विश्वास [दूध दूहनेका] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वशमें है), दुहनेवाला अहीर है॥ ६॥
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥
parama dharmamaya paya duhi bhāī| avaṭai anala akāma banāī||
toṣa maruta taba chamām̐ juṛāvai| dhṛti sama jāvanu dei jamāvai||
Meaning हे भाई! इस प्रकार ( धर्माचारमें प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौसे भाव, निवृत्ति और वशभमें किये हुए निर्मल मनकी सहायतासे) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्रिपर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोषरूपी हवासे उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मनका निग्रह )-रूपी जामन देकर उसे जमावे॥ ७॥
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥
muditām̐ mathaiṃ bicāra mathānī| dama adhāra raju satya subānī||
taba mathi kāṛhi lei navanītā| bimala birāga subhaga supunītā||
Meaning तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरीमें तत्त्वविचाररूपी मथानीसे दम (इन्द्रिय-दमन) के आधारपर (दमरूपी खंभे आदिके सहारे) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमेंसे निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले॥ ८॥
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥ ११७ ( क )॥
joga agini kari pragaṭa taba karma subhāsubha lāi|
buddhi sirāvaiṃ gyāna ghṛta mamatā mala jari jāi|| 117 ( ka )||
Meaning तब योगरूपी अग्ि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे (सब कर्मोंको योगरूपी अग्िमें भस्म कर दे)। जब [वैराग्यरूपी मक्खनका] ममतारूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घीको [निश्चयात्मिका] बुद्धिसे ठंढा करे॥ ११७ (क)॥