राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ॥
rāma carita je sunata aghāhīṃ| rasa biseṣa jānā tinha nāhīṃ||
jīvanamukta mahāmuni jeū| hari guna sunahīṃ niraṃtara teū||
Meaning श्रीरामजीके चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं ), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं॥ १॥
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥
bhava sāgara caha pāra jo pāvā| rāma kathā tā kaham̐ dṛṛha nāvā||
biṣainha kaham̐ puni hari guna grāmā| śravana sukhada aru mana abhirāmā||
Meaning जो संसाररूपी सागरका पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजीकी कथा दृढ़ नौकाके समान है। श्रीहरिके गुणसमूह तो विषयी लोगोंके लिये भी कानोंको सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं॥ २॥
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥
śravanavaṃta asa ko jaga māhīṃ| jāhi na raghupati carita sohāhīṃ||
te jaṛa jīva nijātmaka ghātī| jinhahi na raghupati kathā sohātī||
Meaning जगतमें कानवाला ऐसा कौन है. जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न. सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं॥ ३॥
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥
haricaritra mānasa tumha gāvā| suni maiṃ nātha amiti sukha pāvā||
tumha jo kahī yaha kathā suhāī| kāgabhasuṃḍi garuṛa prati gāī||
Meaning हे नाथ! आपने श्रीरामचरित्रमानसका गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। आपने जो यह कहा कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीसे कही थी--॥ ४॥
बिरति ग्यान बिग्यान दूढ़ राम चरन अति नेह।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥ ५३॥
birati gyāna bigyāna dūṛha rāma carana ati neha|
bāyasa tana raghupati bhagati mohi parama saṃdeha|| 53||
Meaning सो कौएका शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञानमें दृढ़ हैं, उनका श्रीरामजीके चरणों में अत्यन्त प्रेम है और उन्हें श्रीरघुनाथजीकी भक्ति भी प्राप्त है, इस बातका मुझे परम सन्देह हो रहा है॥५३॥
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥
nara sahastra maham̐ sunahu purārī| kou eka hoi dharma bratadhārī||
dharmasīla koṭika maham̐ koī| biṣaya bimukha birāga rata hoī||
Meaning हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मके व्रतका धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख (विषयोंका त्यागी ) और वैराग्यपरायण होता है॥ १॥
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥
koṭi birakta madhya śruti kahaī| samyaka gyāna sakṛta kou lahaī||
gyānavaṃta koṭika maham̐ koū| jīvanamukta sakṛta jaga soū||
Meaning श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक ही सम्यकू (यथार्थ) ज्ञानको प्राप्त करता है। और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है। जगत्में कोई विरला ही ऐसा ( जीवन्मुक्त ) होगा॥ २॥
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी॥
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥
tinha sahastra mahum̐ saba sukha khānī| durlabha brahmalīna bigyānī||
dharmasīla birakta aru gyānī| jīvanamukta brahmapara prānī||
Meaning हजारों जीवन्मुक्तोंगें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानवान् पुरुष और भी दुर्लभ है। धर्मत्मा, वैराग्यवान्, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रहालीन--॥ ३॥
सब ते सो दुर्लभ सुरराया।
राम भगति रत गत मद माया॥
saba te so durlabha surarāyā| rāma bhagati rata gata mada māyā||
सो हरिभगति काग किमि पाई।
बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥
so haribhagati kāga kimi pāī| bisvanātha mohi kahahu bujhāī||
Meaning इन सबमें भी हे देवाधिदेव महादेवजी ! वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है जो मद और मायासे रहित होकर श्रीरामजीकी भक्तिके परायण हो। हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्तिको कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये॥ ४॥
राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।
नाथ कहट्ठू केहि कारन पायउ काक सरीर॥ ५४॥
rāma parāyana gyāna rata gunāgāra mati dhīra|
nātha kahaṭṭhū kehi kārana pāyau kāka sarīra|| 54||
Meaning हे नाथ! कहिये, [ ऐसे] श्रीरामपरायण, ज्ञाननिरत, गुणधाम और धीरबुद्धि भुशुण्डिजीने कौएका शरीर किस कारण पाया ?॥ पड॥
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥
yaha prabhu carita pavitra suhāvā| kahahu kṛpāla kāga kaham̐ pāvā||
tumha kehi bhām̐ti sunā madanārī| kahahu mohi ati kautuka bhārī||
Meaning हे कृपालु! बताइये, उस कौएने प्रभुका यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया ? और हे कामदेवके शत्रु ! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार सुना ? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है॥ १॥
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥
garuṛa mahāgyānī guna rāsī| hari sevaka ati nikaṭa nivāsī||
tehiṃ kehi hetu kāga sana jāī| sunī kathā muni nikara bihāī||
Meaning गरुड़जी तो महान् ज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, श्रीहरिकि सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले (उनके वाहन ही) हैं। उन्होंने मुनियोंके समूहको छोड़कर, कौएसे जाकर हरिकथा किस कारण सुनी ?॥ २॥
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥
kahahu kavana bidhi bhā saṃbādā| dou haribhagata kāga uragādā||
gauri girā suni sarala suhāī| bole siva sādara sukha pāī||
Meaning कहिये, काकभुशुण्डि और गरुड़ इन दोनों हरिभक्तोंकी बातचीत किस प्रकार हुई ? पार्वतीजीकी सरल, सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी सुख पाकर आदरके साथ बोले--॥ ३॥
धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी॥
सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा॥
dhanya satī pāvana mati torī| raghupati carana prīti nahiṃ thorī||
sunahu parama punīta itihāsā| jo suni sakala loka bhrama nāsā||
Meaning हे सती! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है। श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अत्यधिक प्रेम है)। अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुननेसे सारे लोकके भ्रमका नाश हो जाता है॥ ४॥
उपजइ राम चरन बिस्वासा।
भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥
upajai rāma carana bisvāsā| bhava nidhi tara nara binahiṃ prayāsā||
Meaning तथा श्रीरामजीके चरणोंमें विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जाता है॥ ५॥
ऐसिअ प्रस्त्र बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ।
aisia prastra bihaṃgapati kīnhi kāga sana jāi|
सब सादर कहिहडउ सुनहु उमा मन लाइ॥ ५५॥
saba sādara kahihaḍau sunahu umā mana lāi|| 55||
Meaning पक्षिराज गरुड़जीने भी जाकर काकभुशुण्डिजीसे प्राय: ऐसे ही प्रश्न किये थे। हे उमा! मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो॥ ५५॥
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥
maiṃ jimi kathā sunī bhava mocani| so prasaṃga sunu sumukhi sulocani||
prathama daccha gṛha tava avatārā| satī nāma taba rahā tumhārā||
Meaning मैंने जिस प्रकार वह भव (जन्म-मृत्यु) से छुड़ानेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा अवतार दक्षके घर हुआ था। तब तुम्हारा नाम सती था॥ १॥
दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना॥
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा॥
daccha jagya taba bhā apamānā| tumha ati krodha taje taba prānā||
mama anucaranha kīnha makha bhaṃgā| jānahu tumha so sakala prasaṃgā||
Meaning दक्षके यज्में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुमने अत्यन्त क्रोध करके प्राण त्याग दिये थे; और फिर मेरे सेवकोंने यज्ञ विध्वंस कर दिया था। वह सारा प्रसंग तुम जानती ही हो॥ २॥
तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें॥
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥
taba ati soca bhayau mana moreṃ| dukhī bhayaum̐ biyoga priya toreṃ||
suṃdara bana giri sarita taṛāgā| kautuka dekhata phiraum̐ berāgā||
Meaning तब मेरे मनमें बड़ा सोच हुआ और हे प्रिये ! मैं तुम्हारे वियोगसे दुखी हो गया। मैं विरक्तभावसे सुन्दर वन, पर्वत, नदी और तालाबोंका कौतुक (दृश्य) देखता फिरता था॥ ३॥
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी॥
तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए॥
giri sumera uttara disi dūrī| nīla saila eka sundara bhūrī||
tāsu kanakamaya sikhara suhāe| cāri cāru more mana bhāe||
Meaning सुमेरु पर्वतकी उत्तर दिशामें, और भी दूर, एक बहुत ही सुन्दर नील पर्वत है। उसके सुन्दर स्वर्णमय शिखर हैं, [उनमेंसे] चार सुन्दर शिखर मेरे मनको बहुत ही अच्छे लगे॥ ४॥
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला।
बट पीपर पाकरी रसाला॥
tinha para eka eka biṭapa bisālā| baṭa pīpara pākarī rasālā||
Meaning उन शिखरोंमें एक-एकपर बरगद, पीपल, पाकर और आमका एक-एक विशाल वृक्ष है। पर्वतके ऊपर एक सुन्दर तालाब शोभित है; जिसकी मणियोंकी सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है॥ ५॥
सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।
कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भूृंग॥ ५६॥
sītala amala madhura jala jalaja bipula bahuraṃga|
kūjata kala rava haṃsa gana guṃjata maṃjula bhūृṃga|| 56||
Meaning उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है; उसमें रंग-बिरंगे बहुत-से कमल खिले हुए हैं; हंसगण मधुर स्वरसे बोल रहे हैं और भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं॥ ५६॥
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥
tehiṃ giri rucira basai khaga soī| tāsu nāsa kalpāṃta na hoī||
māyā kṛta guna doṣa anekā| moha manoja ādi abibekā||
Meaning उस सुन्दर पर्वतपर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्पके अन्तमें भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक,॥ १॥
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥
rahe byāpi samasta jaga māhīṃ| tehi giri nikaṭa kabahum̐ nahiṃ jāhīṃ||
taham̐ basi harihi bhajai jimi kāgā| so sunu umā sahita anurāgā||
Meaning जो सारे जगतमें छा रहे हैं, उस पर्वतके पास भी कभी नहीं फटकते। वहाँ बसकर जिस प्रकार वह काक हरिको भजता है, हे उमा! उसे प्रेमसहित सुनो॥ २॥
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥
आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥
pīpara taru tara dhyāna so dharaī| jāpa jagya pākari tara karaī||
ām̐ba chāham̐ kara mānasa pūjā| taji hari bhajanu kāju nahiṃ dūjā||
Meaning वह पीपलके वृक्षके नीचे ध्यान धरता है। पाकरके नीचे जपयज्ञ करता है। आमकी छायामें मानसिक पूजा करता है। श्रीहरिकि भजनको छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है॥ ३॥
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥
bara tara kaha hari kathā prasaṃgā| āvahiṃ sunahiṃ aneka bihaṃgā||
rāma carita bicītra bidhi nānā| prema sahita kara sādara gānā||
Meaning बरगदके नीचे वह श्रीहरिकी कथाओंके प्रसज़ कहता है। वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं। वह विचित्र रामचरित्रको अनेकों प्रकारसे प्रेमसहित आदरपूर्वक गान करता है॥ ४॥
सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥
sunahiṃ sakala mati bimala marālā| basahiṃ niraṃtara je tehiṃ tālā||
jaba maiṃ jāi so kautuka dekhā| ura upajā ānaṃda biseṣā||
Meaning सब निर्मल बुद्धिवाले हंस, जो सदा उस तालाबपर बसते हैं, उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक (दृश्य) देखा, तब मेरे हृदयमें विशेष आनन्द उत्पन्न हुआ॥ ५॥
तब कछू काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥ ५७॥
taba kachū kāla marāla tanu dhari taham̐ kīnha nivāsa|
sādara suni raghupati guna puni āyaum̐ kailāsa|| 57||
Meaning तब मैंने हंसका शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्रीरघुनाथजीके गुणोंको आदरसहित सुनकर फिर कैलासको लौट आया॥ ५७॥
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥
अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥
girijā kaheum̐ so saba itihāsā| maiṃ jehi samaya gayaum̐ khaga pāsā||
aba so kathā sunahu jehī hetū| gayau kāga pahiṃ khaga kula ketū||
Meaning हे गिरिजे! मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डिके पास गया था। अब वह कथा सुनो जिस कारणसे पश्षिकुलके ध्वजा गरुड़जी उस काकके पास गये थे॥ १॥
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥
इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥
jaba raghunātha kīnhi rana krīṛā| samujhata carita hoti mohi brīṛā||
iṃdrajīta kara āpu bam̐dhāyo| taba nārada muni garuṛa paṭhāyo||
Meaning जब श्रीरघुनाथजीने ऐसी रणलीला की जिस लीलाका स्मरण करनेसे मुझे लज्जा होती है-- मेघनादके हाथों अपनेको बँधा लिया--तब नारद मुनिने गरुड़को भेजा॥ २॥
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥
baṃdhana kāṭi gayo uragādā| upajā hṛdayam̐ pracaṃḍa biṣādā||
prabhu baṃdhana samujhata bahu bhām̐tī| karata bicāra uraga ārātī||
Meaning सर्पोंके भक्षक गरुड़जी बन्धन काटकर गये, तब उनके हृदयमें बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। प्रभुके बन्धनको स्मरण करके सर्पोंके शत्रु गरुड़जी बहुत प्रकारसे विचार करने लगे--॥ ३॥
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा।
माया मोह पार परमीसा॥
byāpaka brahma biraja bāgīsā| māyā moha pāra paramīsā||
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं।
देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥
so avatāra suneum̐ jaga māhīṃ| dekheum̐ so prabhāva kachu nāhīṃ||
Meaning जो व्यापक, विकाररहित, वाणीके पति और माया-मोहसे परे ब्रह्म परमेश्वर हैं, मैंने सुना था कि जगतमें उन्हींका अवतार है। पर मैंने उस (अवतार) का प्रभाव कुछ भी नहीं देखा॥ ४॥
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
खर्ब निसाचर बाॉँधेड नागपास सोइ राम॥ ५८॥
bhava baṃdhana te chūṭahiṃ nara japi jā kara nāma|
kharba nisācara bāॉm̐dheḍa nāgapāsa soi rāma|| 58||
Meaning जिनका नाम जपकर मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाते हैं उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया॥ ५८॥
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥
nānā bhām̐ti manahi samujhāvā| pragaṭa na gyāna hṛdayam̐ bhrama chāvā||
kheda khinna mana tarka baṛhāī| bhayau mohabasa tumharihiṃ nāī||
Meaning गरुड़जीने अनेकों प्रकारसे अपने मनको समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदयमें भ्रम और भी अधिक छा गया। [सन्देहजनित] दुःखसे दुखी होकर, मनमें कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये॥ १॥
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥
सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥
byākula gayau devariṣi pāhīṃ| kahesi jo saṃsaya nija mana māhīṃ||
suni nāradahi lāgi ati dāyā| sunu khaga prabala rāma kai māyā||
Meaning व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजीके पास गये और मनमें जो सन्देह था, वह उनसे कहा। उसे सुनकर नारदको अत्यन्त दया आयी। [उन्होंने कहा--] हे गरुड़! सुनिये, श्रीरामजीकी माया बड़ी ही बलवती है॥ २॥
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई॥
जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥
jo gyāninha kara cita apaharaī| bariāī bimoha mana karaī||
jehiṃ bahu bāra nacāvā mohī| soi byāpī bihaṃgapati tohī||
Meaning जो ज्ञानियोंके चित्तको भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मनमें जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है॥ ३॥
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥
mahāmoha upajā ura toreṃ| miṭihi na begi kaheṃ khaga moreṃ||
caturānana pahiṃ jāhu khagesā| soi karehu jehi hoi nidesā||
Meaning हे गरुड़! आपके हदयमें बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझानेसे तुरंत नहीं मिटेगा। अत: हे पक्षिराज ! आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँ जिस कामके लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा॥ ४॥
अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान॥ ५९॥
asa kahi cale devariṣi karata rāma guna gāna|
hari māyā bala baranata puni puni parama sujāna|| 59||
Meaning ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजीका गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चले॥ ५९॥
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥
taba khagapati biraṃci pahiṃ gayaū| nija saṃdeha sunāvata bhayaū||
suni biraṃci rāmahi siru nāvā| samujhi pratāpa prema ati chāvā||
Meaning तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजीने श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाया और उनके प्रतापको समझकर उनके अत्यन्त प्रेम छा गया॥ १॥
मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥
हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥
mana mahum̐ karai bicāra bidhātā| māyā basa kabi kobida gyātā||
hari māyā kara amiti prabhāvā| bipula bāra jehiṃ mohi nacāvā||
Meaning ब्रह्माजी मनमें विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान्की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझतकको अनेकों बार नचाया है॥ २॥
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥
aga jagamaya jaga mama uparājā| nahiṃ ācaraja moha khagarājā||
taba bole bidhi girā suhāī| jāna mahesa rāma prabhutāī||
Meaning यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़को मोह होना कोई आश्चर्य [की बात] नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले-- श्रीरामजीकी महिमाको महादेवजी जानते हैं॥ ३॥
बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥
तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥
bainateya saṃkara pahiṃ jāhū| tāta anata pūchahu jani kāhū||
taham̐ hoihi tava saṃsaya hānī| caleu bihaṃga sunata bidhi bānī||
Meaning हे गरुड़! तुम शंकरजीके पास जाओ। हे तात! और कहीं किसीसे न पूछना। तुम्हारे सन्देहका नाश वहीं होगा। ब्रह्माजीका वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये॥ ४॥
परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।
जात रहेउं कुबेर गृह रहिह॒ उमा कैलास॥ ६०॥
paramātura bihaṃgapati āyau taba mo pāsa|
jāta raheuṃ kubera gṛha rahiha umā kailāsa|| 60||
Meaning तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये। हे उमा! उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं॥ ६०॥
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥
tehiṃ mama pada sādara siru nāvā| puni āpana saṃdeha sunāvā||
suni tā kari binatī mṛdu bānī| parema sahita maiṃ kaheum̐ bhavānī||
Meaning गरुड़ने आदरपूर्वक मेरे चरणोंमें सिर नवाया और फिर मुझको अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी ! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा--॥ १॥
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥
तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥
milehu garuṛa māraga maham̐ mohī| kavana bhām̐ti samujhāvauṃ tohī||
tabahi hoi saba saṃsaya bhaṃgā| jaba bahu kāla karia satasaṃgā||
Meaning हे गरुड़! तुम मुझे रास्तेमें मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ ? सब सन्देहोंका तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय॥ २॥
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥
sunia tahām̐ hari kathā suhāī| nānā bhām̐ti muninha jo gāī||
jehi mahum̐ ādi madhya avasānā| prabhu pratipādya rāma bhagavānā||
Meaning और वहाँ (सत्संगमें ) सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियोंने अनेकों प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्तमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं॥ ३॥
नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई॥
जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥
nita hari kathā hota jaham̐ bhāī| paṭhavaum̐ tahām̐ sunahi tumha jāī||
jāihi sunata sakala saṃdehā| rāma carana hoihi ati nehā||
Meaning हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजीके चरणों में अत्यन्त प्रेम होगा॥ ४॥
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होड़ न दूढ़ अनुराग ६१॥
binu satasaṃga na hari kathā tehi binu moha na bhāga|
moha gaem̐ binu rāma pada hoṛa na dūṛha anurāga 61||
Meaning सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥ ६१॥
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥
milahiṃ na raghupati binu anurāgā| kiem̐ joga tapa gyāna birāgā||
uttara disi suṃdara giri nīlā| taham̐ raha kākabhusuṃḍi susīlā||
Meaning बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते। [ अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं॥ १॥
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥
राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥
rāma bhagati patha parama prabīnā| gyānī guna gṛha bahu kālīnā||
rāma kathā so kahai niraṃtara| sādara sunahiṃ bibidha bihaṃgabara||
Meaning वे रामभक्तिके मार्गमें परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणोंके धाम हैं और बहुत कालके हैं। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं॥ २॥
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥
jāi sunahu taham̐ hari guna bhūrī| hoihi moha janita dukha dūrī||
maiṃ jaba tehi saba kahā bujhāī| caleu haraṣi mama pada siru nāī||
Meaning वहाँ जाकर श्रीहरिके गुणसमूहोंको सुनो। उनके सुननेसे मोहसे उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया॥ ३॥
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना॥
tāte umā na maiṃ samujhāvā| raghupati kṛpām̐ maramu maiṃ pāvā||
hoihi kīnha kabahum̐ abhimānā| so khauvai caha kṛpānidhānā||
Meaning हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजीकी कृपासे उसका मर्म ( भेद) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं॥ ४॥
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥
kachu tehi te puni maiṃ nahiṃ rākhā| samujhai khaga khagahī kai bhāṣā||
prabhu māyā balavaṃta bhavānī| jāhi na moha kavana asa gyānī||
Meaning फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही बोली समझते हैं। हे भवानी ! प्रभुकी माया [ बड़ी ही ] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले 2॥५॥
ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।
ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान॥ ६२ (क,)॥
gyānī bhagata siromani tribhuvanapati kara jāna|
tāhi moha māyā nara pāvara karahiṃ gumāna|| 62 (ka,)||
Meaning जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं॥ ६२ (क)॥
सिव बिरंचि कहूँ मोहड़ को है बपुरा आन।
अस जियें जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान॥ ६२ ( ख )॥
siva biraṃci kahūm̐ mohaṛa ko hai bapurā āna|
asa jiyeṃ jāni bhajahiṃ muni māyā pati bhagavāna|| 62 ( kha )||
Meaning यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजीको भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है? जीमें ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस मायाके स्वामी भगवानूका भजन करते हैं॥ ६२ (ख)॥
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥
gayau garuṛa jaham̐ basai bhusuṃḍā| mati akuṃṭha hari bhagati akhaṃḍā||
dekhi saila prasanna mana bhayaū| māyā moha soca saba gayaū||
Meaning गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे। उस पर्वतको देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शनसे ही] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा॥ १॥
करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए॥
kari taṛāga majjana jalapānā| baṭa tara gayau hṛdayam̐ haraṣānā||
bṛddha bṛddha bihaṃga taham̐ āe| sunai rāma ke carita suhāe||
Meaning तालाबमें स्रान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्तसे वटवृक्षके नीचे गये। वहाँ श्रीरामजीके सुन्दर चरित्र सुननेके लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे॥ २॥
कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥
आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥
kathā araṃbha karai soi cāhā| tehī samaya gayau khaganāhā||
āvata dekhi sakala khagarājā| haraṣeu bāyasa sahita samājā||
Meaning भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियोंके राजा गरुड्जीको आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ॥ ३॥
अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥
करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥
ati ādara khagapati kara kīnhā| svāgata pūchi suāsana dīnhā||
kari pūjā sameta anurāgā| madhura bacana taba boleu kāgā||
Meaning उन्होंने पक्षिराज गरुड़जीका बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत (कुशल) पूछकर बैठनेके लिये सुन्दर आसन दिया। फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले--॥ ४॥
नाथ कृतारथ भय में तब दरसन खगराज।
आयसु देहु सो करों अब प्रभु आयहु केहि काज॥ ६३ ( क )॥
nātha kṛtāratha bhaya meṃ taba darasana khagarāja|
āyasu dehu so karoṃ aba prabhu āyahu kehi kāja|| 63 ( ka )||
Meaning हे नाथ! हे पक्षिराज! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें मैं अब वही करूँ। हे प्रभो ! आप किस कार्यके लिये आये हैं 2॥ ६३ (क)॥
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।
जेहि के अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥ ६३ (ख )॥
sadā kṛtāratha rūpa tumha kaha mṛdu bacana khagesa|
jehi ke astuti sādara nija mukha kīnhi mahesa|| 63 (kha )||
Meaning पक्षिराज गरुड़जीने कोमल वचन कहे--आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजीने आदरपूर्वक अपने श्रीमुखसे की है॥ ६३ (ख)॥
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥
देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥
sunahu tāta jehi kārana āyaum̐| so saba bhayau darasa tava pāyaum̐||
dekhi parama pāvana tava āśrama| gayau moha saṃsaya nānā bhrama||
Meaning हे तात! सुनिये, मैं जिस कारणसे आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गये। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, सन्देह और अनेक प्रकारके भ्रम सब जाते रहे॥ १॥
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥
सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥
aba śrīrāma kathā ati pāvani| sadā sukhada dukha puṃja nasāvani||
sādara tāta sunāvahu mohī| bāra bāra binavaum̐ prabhu tohī||
Meaning अब हे तात! आप मुझे श्रीरामजीकी अत्यन्त पवित्र करनेवाली, सदा सुख देनेवाली और दुःखसमूहका नाश करनेवाली कथा आदरसहित सुनाइये। हे प्रभो ! मैं बार-बार आपसे यही विनती करता हूँ॥ २॥
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥
भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥
sunata garuṛa kai girā binītā| sarala suprema sukhada supunītā||
bhayau tāsu mana parama uchāhā| lāga kahai raghupati guna gāhā||
Meaning गरुड़जीकी विनम्र, सरल, सुन्दर प्रेमयुक्त, सुखप्रद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डिजीके मनमें परम उत्साह हुआ और वे श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथा कहने लगे॥ ३॥
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥
पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥
prathamahiṃ ati anurāga bhavānī| rāmacarita sara kahesi bakhānī||
puni nārada kara moha apārā| kahesi bahuri rāvana avatārā||
Meaning हे भवानी ! पहले तो उन्होंने बड़े ही प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक समझाकर कहा। फिर नारदजीका अपार मोह और फिर रावणका अवतार कहा॥ ४॥
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई।
तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥
prabhu avatāra kathā puni gāī| taba sisu carita kahesi mana lāī||
Meaning फिर प्रभुके अवतारकी कथा वर्णन की। तदनन्तर मन लगाकर श्रीरामजीकी बाललीलाएँ कहीं॥ ५॥
बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह।
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह॥ ६४॥
bālacarita kahi bibidhi bidhi mana maham̐ parama uchāha|
riṣi āgavana kahesi puni śrīraghubīra bibāha|| 64||
Meaning मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजीका अयोध्या आना और श्रीरघुवीरजीका विवाह वर्णन किया॥ ६४॥
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥
bahuri rāma abhiṣeka prasaṃgā| puni nṛpa bacana rāja rasa bhaṃgā||
purabāsinha kara biraha biṣādā| kahesi rāma lachimana saṃbādā||
Meaning फिर श्रीरामजीके राज्याभिषेकका प्रसज्भ, फिर राजा दशरथजीके वचनसे राजरस ( राज्याभिषेकके आनन्द)में भड् पड़ना, फिर नगरनिवासियोंका विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मणका संवाद (बातचीत) कहा॥ १॥
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥
बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥
bipina gavana kevaṭa anurāgā| surasari utari nivāsa prayāgā||
bālamīka prabhu milana bakhānā| citrakūṭa jimi base bhagavānā||
Meaning श्रीरामका वनगमन, केवटका प्रेम, गड़ाजीसे पार उतरकर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा॥ २॥
सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥
करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥
sacivāgavana nagara nṛpa maranā| bharatāgavana prema bahu baranā||
kari nṛpa kriyā saṃga purabāsī| bharata gae jaham̐ prabhu sukha rāsī||
Meaning फिर मन्त्री सुमन्त्रजीका नगरमें लौटना, राजा दशरथजीका मरण, भरतजीका [ ननिहालसे अयोध्यामें आना और उनके प्रेमका बहुत वर्णन किया। राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियोंको साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुखकी राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे॥ ३॥
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥
भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥
puni raghupati bahu bidhi samujhāe| lai pādukā avadhapura āe||
bharata rahani surapati suta karanī| prabhu aru atri bheṃṭa puni baranī||
Meaning फिर श्रीरघुनाथजीने उनको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजीकी नन्दिग्राममें रहनेकी रीति, इन्द्रपुत्र जयन्तकी नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजीका मिलाप वर्णन किया॥ ४॥
कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।
बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥ ६५॥
kahi birādha badha jehi bidhi deha tajī sarabhaṃga|
barani sutīchana prīti puni prabhu agasti satasaṃga|| 65||
Meaning जिस प्रकार विराधका वध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजीका प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग-वृत्तान्त कहा॥ ६५॥
कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥
पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥
kahi daṃḍaka bana pāvanatāī| gīdha maitrī puni tehiṃ gāī||
puni prabhu paṃcavaṭīṃ kṛta bāsā| bhaṃjī sakala muninha kī trāsā||
Meaning दण्डकवनका पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजीने गृश्रराजके साथ मित्रताका वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभुने पश्चवटीमें निवास किया और सब मुनियोंके भयका नाश किया,॥ १॥
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥
खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥
puni lachimana upadesa anūpā| sūpanakhā jimi kīnhi kurūpā||
khara dūṣana badha bahuri bakhānā| jimi saba maramu dasānana jānā||
Meaning और फिर जैसे लक्ष्मणजीको अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखाको कुरूप किया, वह सब वर्णन किया। फिर खर-दूषण-वध और जिस प्रकार रावणने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा,॥ २॥
दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥
पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥
dasakaṃdhara mārīca batakahīṃ| jehi bidhi bhaī so saba tehiṃ kahī||
puni māyā sītā kara haranā| śrīraghubīra biraha kachu baranā||
Meaning तथा जिस प्रकार रावण और मारीचकी बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही। फिर मायासीताका हरण और श्रीरघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया॥ ३॥
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥
puni prabhu gīdha kriyā jimi kīnhī| badhi kabaṃdha sabarihi gati dīnhī||
bahuri biraha baranata raghubīrā| jehi bidhi gae sarobara tīrā||
Meaning फिर प्रभुने गिद्ध जटायुकी जिस प्रकार क्रिया की, कबन्धका वध करके शबरीको परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी पंपासरके तीरपर गये, वह सब कहा॥ ४॥
प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।
पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग॥ ६६ (क )॥
prabhu nārada saṃbāda kahi māruti milana prasaṃga|
puni sugrīva mitāī bāli prāna kara bhaṃga|| 66 (ka )||
Meaning प्रभु और नारदजीका संवाद और मारुतिके मिलनेका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणनाशका वर्णन किया॥ ६६ (क)॥
कपिहि तिलक करे प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।
बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास॥ ६६ (ख )॥
kapihi tilaka kare prabhu kṛta saila prabaraṣana bāsa|
baranana barṣā sarada aru rāma roṣa kapi trāsa|| 66 (kha )||
Meaning सुप्रीवका राजतिलक करके प्रभुने प्रवर्षण पर्वतपर निवास किया, वह तथा वर्षा और शरद्का वर्णन, श्रीरामजीका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय आदि प्रसंग कहे॥ ६६ (ख)॥
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥
बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती॥
jehi bidhi kapipati kīsa paṭhāe| sītā khoja sakala disi dhāe||
bibara prabesa kīnha jehi bhām̐tī| kapinha bahori milā saṃpātī||
Meaning जिस प्रकार वानरराज सुग्रीवने वानरोंको भेजा और वे सीताजीकी खोजमें जिस प्रकार सब दिशाओंमें गये, जिस प्रकार उन्होंने बिलमें प्रवेश किया और फिर जैसे वानरोंको सम्पाती मिला, वह कथा कही॥ १॥
सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा॥
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥
suni saba kathā samīrakumārā| nāghata bhayau payodhi apārā||
laṃkām̐ kapi prabesa jimi kīnhā| puni sītahi dhīraju jimi dīnhā||
Meaning संपातीसे सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमानजी जिस तरह अपार समुद्रको लॉँघ गये, फिर हनुमान्जीने जैसे लड्ामें प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजीको धीरज दिया, सो सब कहा॥ २॥
बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥
आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई॥
bana ujāri rāvanahi prabodhī| pura dahi nāgheu bahuri payodhī||
āe kapi saba jaham̐ raghurāī| baidehī ki kusala sunāī||
Meaning अशोकवनको उजाड़कर, रावणको समझाकर, लड्रापुरीको जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्रको लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजीकी कुशल सुनायी,॥ ३॥
सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥
मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥
sena sameti jathā raghubīrā| utare jāi bārinidhi tīrā||
milā bibhīṣana jehi bidhi āī| sāgara nigraha kathā sunāī||
Meaning फिर जिस प्रकार सेनासहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्रके तटपर उतरे और जिस प्रकार विभीषणजी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्रके बाँधनेकी कथा उसने सुनायी॥ ४॥
सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।
गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार॥ ६७ ( क )॥
setu bām̐dhi kapi sena jimi utarī sāgara pāra|
gayau basīṭhī bīrabara jehi bidhi bālikumāra|| 67 ( ka )||
Meaning पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरोंकी सेना समुद्रके पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा॥ ६७ (क)॥
निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।
कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार॥ ६७ (ख )॥
nisicara kīsa larāī baranisi bibidha prakāra|
kuṃbhakarana ghananāda kara bala pauruṣa saṃghāra|| 67 (kha )||
Meaning फिर राक्षसों और वानरोंके युद्धका अनेकों प्रकारसे वर्णन किया। फिर कुम्भकर्ण और मेघनादके बल, पुरुषार्थ और संहारकी कथा कही॥ ६७ (ख)॥
निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥
रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका॥
nisicara nikara marana bidhi nānā| raghupati rāvana samara bakhānā||
rāvana badha maṃdodari sokā| rāja bibhīṣaṇa deva asokā||
Meaning नाना प्रकारके राक्षससमूहोंके मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावणके अनेक प्रकारके युद्धका वर्णन किया। रावणवध, मन्दोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकरहित होना कहकर,॥ १॥
सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी॥
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥
sītā raghupati milana bahorī| suranha kīnha astuti kara jorī||
puni puṣpaka caṛhi kapinha sametā| avadha cale prabhu kṛpā niketā||
Meaning फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजीका मिलाप कहा। जिस प्रकार देवताओंने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरोंसमेत पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरीको चले, वह कहा॥ २॥
जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥
कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका॥
jehi bidhi rāma nagara nija āe| bāyasa bisada carita saba gāe||
kahesi bahori rāma abhiṣaikā| pura baranata nṛpanīti anekā||
Meaning जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर (अयोध्या) में आये, वे सब उज्चल चरित्र काकभुशुण्डिजीने विस्तारपूर्वक वर्णन किये। फिर उन्होंने श्रीरामजीका राज्याभिषेक कहा। [शिवजी कहते हैं--] अयोध्यापुरीका और अनेक प्रकारकी राजनीतिका वर्णन करते हुए--॥ ३॥
कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥
सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥
kathā samasta bhusuṃḍa bakhānī| jo maiṃ tumha sana kahī bhavānī||
suni saba rāma kathā khaganāhā| kahata bacana mana parama uchāhā||
Meaning भुशुण्डिजीने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मनमें बहुत उत्साहित (आनन्दित) होकर वचन कहने लगे--॥ ४॥
गयठउ मोर संदेह सुनेउं सकल रघुपति चरित।
भयडउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक॥ ६८ ( क )॥
gayaṭhau mora saṃdeha suneuṃ sakala raghupati carita|
bhayaḍau rāma pada neha tava prasāda bāyasa tilaka|| 68 ( ka )||
Meaning श्रीरघुनाथजीके सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि ! आपके अनुग्रहसे श्रीरामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम हो गया॥ ६८ (क)॥