सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥
sanakādika bidhi loka sidhāe| bhrātanha rāma carana siru nāe||
pūchata prabhuhi sakala sakucāhīṃ| citavahiṃ saba mārutasuta pāhīṃ||
Meaning सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। तब भाइयोंने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाया। सब भाई प्रभुसे पूछते सकुचाते हैं। [इसलिये] सब हनुमानूजीकी ओर देख रहे हैं॥ १॥
सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥
suni cahahiṃ prabhu mukha kai bānī| jo suni hoi sakala bhrama hānī||
aṃtarajāmī prabhu sabha jānā| būjhata kahahu kāha hanumānā||
Meaning वे प्रभुके श्रीमुखकी वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमोंका नाश हो जाता है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे--कहो हनुमान्! क्या बात है ?॥ २॥
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥
jori pāni kaha taba hanumaṃtā| sunahu dīnadayāla bhagavaṃtā||
nātha bharata kachu pūm̐chana cahahīṃ| prasna karata mana sakucata ahahīṃ||
Meaning तब हनुमानजी हाथ जोड़कर बोले--हे दीनदयालु भगवान्! सुनिये। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं॥ ३॥
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥
tumha jānahu kapi mora subhāū| bharatahi mohi kachu aṃtara kāū||
suni prabhu bacana bharata gahe caranā| sunahu nātha pranatārati haranā||
Meaning [ भगवानूने कहा--] हनुमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर ( भेद) है ? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [ और कहा--] हे नाथ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले ! सुनिये॥ ४॥
नाथ न मोहि संदेह कछू सपनेहूँं सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६॥
nātha na mohi saṃdeha kachū sapanehūm̐ṃ soka na moha|
kevala kṛpā tumhārihi kṛpānaṃda saṃdoha|| 36||
Meaning हे नाथ! न तो मुझे कुछ सन्देह है और न स्वप्रमें भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनन्दके समूह ! यह केवल आपकी ही कृपाका फल है॥ ३६॥
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥
संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥
karaum̐ kṛpānidhi eka ḍhiṭhāī| maiṃ sevaka tumha jana sukhadāī||
saṃtanha kai mahimā raghurāī| bahu bidhi beda purānanha gāī||
Meaning तथापि हे कृपानिधान ! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं [इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्नका उत्तर देकर सुख दीजिये]। हे रघुनाथजी ! वेद-पुराणोंने संतोंकी महिमा बहुत प्रकारसे गायी है॥ १॥
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥
śrīmukha tumha puni kīnhi baṛāī| tinha para prabhuhi prīti adhikāī||
sunā cahaum̐ prabhu tinha kara lacchana| kṛpāsiṃdhu guna gyāna bicacchana||
Meaning आपने भी अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई की है और उनपर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो ! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपाके समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञानमें अत्यन्त निपुण हैं॥ २॥
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥
saṃta asaṃta bheda bilagāī| pranatapāla mohi kahahu bujhāī||
saṃtanha ke lacchana sunu bhrātā| aganita śruti purāna bikhyātā||
Meaning हे शरणागतका पालन करनेवाले ! संत और असंतके भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिये। [ श्रीरामजीने कहा--] हे भाई! संतोंके लक्षण (गुण) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणों में प्रसिद्ध हैं॥३॥
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥
saṃta asaṃtanhi kai asi karanī| jimi kuṭhāra caṃdana ācaranī||
kāṭai parasu malaya sunu bhāī| nija guna dei sugaṃdha basāī||
Meaning संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [ क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटनेवाली कुल्हाड़ीको ) सुगन्धसे सुवासित कर देता है॥ ४॥
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥ ३७॥
tāte sura sīsanha caṛhata jaga ballabha śrīkhaṃḍa|
anala dāhi pīṭata ghanahiṃ parasu badana yaha daṃḍa|| 37||
Meaning इसी गुणके कारण चन्दन देवताओंके सिरोंपर चढ़ता है और जगत्का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ीके मुखको यह दण्ड मिलता है कि उसको आगमें जलाकर फिर घनसे पीटते हैं॥ ३७॥
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥
biṣaya alaṃpaṭa sīla gunākara| para dukha dukha sukha sukha dekhe para||
sama abhūtaripu bimada birāgī| lobhāmaraṣa haraṣa bhaya tyāgī||
Meaning संत विषयोंमें लम्पट (लिस) नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं। उन्हें पराया दु:ख देखकर दु:ख और सुख देखकर सुख होता है। वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं॥ १॥
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥
सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥
komalacita dīnanha para dāyā| mana baca krama mama bhagati amāyā||
sabahi mānaprada āpu amānī| bharata prāna sama mama te prānī||
Meaning उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनोंपर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्मसे मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं। हे भरत ! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणोंके समान हैं॥ २॥
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥
bigata kāma mama nāma parāyana| sāṃti birati binatī muditāyana||
sītalatā saralatā mayatrī| dvija pada prīti dharma janayatrī||
Meaning उनको कोई कामना नहीं होती। वे मेरे नामके परायण होते हैं। शान्ति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नताके घर होते हैं। उनमें शीतलता, सरलता, सबके प्रति मित्रभाव और ब्राह्मणके चरणोंमें प्रीति होती है, जो धर्मोको उत्पन्न करनेवाली है॥ ३॥
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥
e saba lacchana basahiṃ jāsu ura| jānehu tāta saṃta saṃtata phura||
sama dama niyama nīti nahiṃ ḍolahiṃ| paruṣa bacana kabahūm̐ nahiṃ bolahiṃ||
Meaning हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना। जो शम (मनके निग्रह ), दम (इन्द्रियोंके निग्रह ), नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और मुखसे कभी कठोर वचन नहीं बोलते;॥ ४॥
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज॥ ३८॥
niṃdā astuti ubhaya sama mamatā mama pada kaṃja|
te sajjana mama prānapriya guna maṃdira sukhapuṃja|| 38||
Meaning जिन्हें निन्दा और स्तुति (बड़ाई) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलोंमें जिनकी ममता है, वे गुणोंके धाम और सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं॥ ३८॥
सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई॥
sanahu asaṃtanha kera subhāū| bhūlehum̐ saṃgati karia na kāū||
tinha kara saṃga sadā dukhadāī| jimi kalapahi ghālai harahāī||
Meaning अब असंतों (दुष्टों) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये। उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है। जैसे हरहाई (बुरी जातिकी) गाय कपिला (सीधी और दुधार) गायको अपने संगसे नष्ट कर डालती है॥ १॥
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥
khalanha hṛdayam̐ ati tāpa biseṣī| jarahiṃ sadā para saṃpati dekhī||
jaham̐ kahum̐ niṃdā sunahiṃ parāī| haraṣahiṃ manahum̐ parī nidhi pāī||
Meaning दुष्ठोंके हृदयमें बहुत अधिक संताप रहता है। वे परायी सम्पत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरेकी निन््दा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्तेमें पड़ी निधि (खजाना) पा ली हो॥ २॥
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥
kāma krodha mada lobha parāyana| nirdaya kapaṭī kuṭila malāyana||
bayaru akārana saba kāhū soṃ| jo kara hita anahita tāhū soṃ||
Meaning वे काम, क्रोध, मद और लोभके परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं। वे बिना ही कारण सब किसीसे वैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते हैं॥ ३॥
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा॥
jhūṭhai lenā jhūṭhai denā| jhūṭhai bhojana jhūṭha cabenā||
bolahiṃ madhura bacana jimi morā| khāi mahā ati hṛdaya kaṭhorā||
Meaning उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है (अर्थात् वे लेने-देनेके व्यवहारमें झूठका आश्रय लेकर दूसरोंका हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ोंका दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चनेकी रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजनसे वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातोंमें झूठ ही बोला करते हैं।) जैसे मोर [बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान् विषैले साँपोंको भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपरसे मीठे वचन बोलते हैं [परन्तु हृदयके बड़े ही निर्दयी होते हैं]॥ ४॥
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पॉवर पापमय देह धरें मनुजाद॥ ३९॥
para drohī para dāra rata para dhana para apabāda|
te nara pôvara pāpamaya deha dhareṃ manujāda|| 39||
Meaning वे दूसरोंसे द्रोह करते हैं और परायी स्त्री, पराये धन तथा परायी निन््दामें आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर-शरीर धारण किये हुए राक्षस ही हैं॥ ३९॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥
lobhai oṛhana lobhai ḍāsana| sistrodara para jamapura trāsa na||
kāhū kī jauṃ sunahiṃ baṛāī| svāsa lehiṃ janu jūṛī āī||
Meaning लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात् लोभहीसे वे सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओंके समान आहार और मैथुनके ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुरका भय नहीं लगता। यदि किसीकी बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [दुःखभरी] साँस लेते हैं मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो॥ १॥
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥
jaba kāhū kai dekhahiṃ bipatī| sukhī bhae mānahum̐ jaga nṛpatī||
svāratha rata parivāra birodhī| laṃpaṭa kāma lobha ati krodhī||
Meaning और जब किसीकी विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत्भरके राजा हो गये हों। वे स्वार्थपरायण, परिवारवालोंके विरोधी, काम और लो भके कारण लम्पट और अत्यन्त क्रो धी होते हैं॥ २॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥
mātu pitā gura bipra na mānahiṃ| āpu gae aru ghālahiṃ ānahiṃ||
karahiṃ moha basa droha parāvā| saṃta saṃga hari kathā na bhāvā||
Meaning वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसीको नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [ साथ ही अपने संगसे] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं। उन्हें न संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान्की कथा ही सुहाती है॥ ३॥
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥
avaguna siṃdhu maṃdamati kāmī| beda bidūṣaka paradhana svāmī||
bipra droha para droha biseṣā| daṃbha kapaṭa jiyam̐ dhareṃ subeṣā||
Meaning वे अवगुणोंके समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदोंके निन्दक और जबर्दस्ती पराये धनके स्वामी (लूटनेवाले ) होते हैं। वे दूसरोंसे द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषतासे करते हैं। उनके हृदयमें दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ ऊपरसे] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं॥ ४॥
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेतां नाहिं।
द्वापर कछुक बुंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥ ४०॥
aise adhama manuja khala kṛtajuga tretāṃ nāhiṃ|
dvāpara kachuka buṃda bahu hoihahiṃ kalijuga māhiṃ|| 40||
Meaning ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेतामें नहीं होते। द्वापरमें थोड़े-से होंगे और कलियुगमें तो इनके झुंड-के-झुंड होंगे॥ ४०॥
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥
para hita sarisa dharma nahiṃ bhāī| para pīṛā sama nahiṃ adhamāī||
nirnaya sakala purāna beda kara| kaheum̐ tāta jānahiṃ kobida nara||
Meaning हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय (निश्चित सिद्धान्त) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं॥ १॥
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥
nara sarīra dhari je para pīrā| karahiṃ te sahahiṃ mahā bhava bhīrā||
karahiṃ moha basa nara agha nānā| svāratha rata paraloka nasānā||
Meaning मनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है॥ २॥
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥
अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥
kālarūpa tinha kaham̐ maiṃ bhrātā| subha aru asubha karma phala dātā||
asa bicāri je parama sayāne| bhajahiṃ mohi saṃsṛta dukha jāne||
Meaning हे भाई ! मैं उनके लिये कालरूप ( भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोका [ यथायोग्य ] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [के प्रवाह] को दुः:खरूप जानकर मुझे ही भजते हैं॥ ३॥
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥
tyāgahiṃ karma subhāsubha dāyaka| bhajahiṃ mohi sura nara muni nāyaka||
saṃta asaṃtanha ke guna bhāṣe| te na parahiṃ bhava jinha lakhi rākhe||
Meaning इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं। [ इस प्रकार] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म-मरणके चक्करें नहीं पड़ते॥ ४॥
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥ ४१॥
sunahu tāta māyā kṛta guna aru doṣa aneka|
guna yaha ubhaya na dekhiahiṃ dekhia so abibeka|| 41||
Meaning हे तात ! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है)। गुण (विवेक) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायेँ, इन्हें देखना ही अविवेक है॥ ४१॥
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥
करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥
śrīmukha bacana sunata saba bhāī| haraṣe prema na hṛdayam̐ samāī||
karahiṃ binaya ati bārahiṃ bārā| hanūmāna hiyam̐ haraṣa apārā||
Meaning भगवान्के श्रीमुखसे ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये। प्रेम उनके हृदयोंमें समाता नहीं। वे बार-बार बड़ी विनती करते हैं। विशेषकर हनुमान्ूजीके हृदयमें अपार हर्ष है॥ १॥
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥
बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥
puni raghupati nija maṃdira gae| ehi bidhi carita karata nita nae||
bāra bāra nārada muni āvahiṃ| carita punīta rāma ke gāvahiṃ||
Meaning तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये। इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं। नारद मुनि अयोध्यामें बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजीके पवित्र चरित्र गाते हैं॥ २॥
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥
सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥
nita nava carana dekhi muni jāhīṃ| brahmaloka saba kathā kahāhīṃ||
suni biraṃci atisaya sukha mānahiṃ| puni puni tāta karahu guna gānahiṃ||
Meaning मुनि यहाँसे नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रहमालोकमें जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं--] हे तात! बार-बार श्रीरामजीके गुणोंका गान करो॥ ३॥
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥
सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥
sanakādika nāradahi sarāhahiṃ| jadyapi brahma nirata muni āhahiṃ||
suni guna gāna samādhi bisārī| sādara sunahiṃ parama adhikārī||
Meaning सनकादि मुनि नारदजीकी सराहना करते हैं। यद्यपि वे (सनकादि) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजीका गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधिको भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [रामकथा सुननेके] श्रेष्ठ अधिकारी हैं॥ ४॥
जीवनमुक्त ब्रहापर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
जे हरि कथों न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥ ४२॥
jīvanamukta brahāpara carita sunahiṃ taji dhyāna|
je hari kathoṃ na karahiṃ rati tinha ke hiya pāṣāna|| 42||
Meaning सनकादि मुनि-जैसे जीवन्मुक्त और ब्रहानिष्ठ पुरुष भी ध्यान (ब्रह्म-समाधि) छोड़कर श्रीरामजीके चरित्र सुनते हैं। यह जानकर भी जो श्रीहरिकी कथासे प्रेम नहीं करते, उनके हृदय [सचमुच ही] पत्थर [के समान, हैं॥ ४२॥
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥
eka bāra raghunātha bolāe| gura dvija purabāsī saba āe||
baiṭhe gura muni aru dvija sajjana| bole bacana bhagata bhava bhaṃjana||
Meaning एक बार श्रीरघुनाथजीके बुलाये हुए गुरु वसिष्टजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगरनिवासी सभामें आये। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके जन्म-मरणको मिटानेवाले श्रीरामजी वचन बोले--॥ १॥
सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥
sanahu sakala purajana mama bānī| kahaum̐ na kachu mamatā ura ānī||
nahiṃ anīti nahiṃ kachu prabhutāī| sunahu karahu jo tumhahi sohāī||
Meaning हे समस्त नगरनिवासियो! मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदयमें कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीतिकी बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुत्ता ही है। इसलिये [संकोच और भय छोड़कर, ध्यान देकर] मेरी बातोंको सुन लो और [फिर] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो!॥ २॥
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई॥
soi sevaka priyatama mama soī| mama anusāsana mānai joī||
jauṃ anīti kachu bhāṣauṃ bhāī| tauṃ mohi barajahu bhaya bisarāī||
Meaning वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीतिकी बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना॥ ३॥
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
baṛeṃ bhāga mānuṣa tanu pāvā| sura durlabha saba graṃthinha gāvā||
sādhana dhāma moccha kara dvārā| pāi na jehiṃ paraloka sam̐vārā||
Meaning बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है। सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है (कठिनतासे मिलता है)। यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया,॥ ४॥
सो परत्र दुख पावड़ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि इईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥ ४३॥
so paratra dukha pāvaṛa sira dhuni dhuni pachitāi|
kālahi karmahi iīsvarahi mithyā dosa lagāi|| 43||
Meaning वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [ अपना दोष न समझकर] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है॥ ४३॥
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
ehi tana kara phala biṣaya na bhāī| svargau svalpa aṃta dukhadāī||
nara tanu pāi biṣayam̐ mana dehīṃ| palaṭi sudhā te saṭha biṣa lehīṃ||
Meaning हे भाई! इस शरीरके प्राप्त होनेका फल विषयभोग नहीं है। [इस जगत्के भोगोंकी तो बात ही क्या] स्वर्गका भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्तमें दुःख देनेवाला है। अत: जो लोग मनुष्यशरीर पाकर विषयोंमें मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतको बदलकर विष ले लेते हैं॥ १॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥
tāhi kabahum̐ bhala kahai na koī| guṃjā grahai parasa mani khoī||
ākara cāri laccha caurāsī| joni bhramata yaha jiva abināsī||
Meaning जो पारसमणिको खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [ अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्धिज्] चार खानों और चौरासी लाख योनियोंमें चक्कर लगाता रहता है॥ २॥
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥
phirata sadā māyā kara prerā| kāla karma subhāva guna gherā||
kabahum̐ka kari karunā nara dehī| deta īsa binu hetu sanehī||
Meaning मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणसे घिरा हुआ (इनके वशमें हुआ) यह सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण स्त्रेह करनेवाले ईधर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्यका शरीर देते हैं॥ ३॥
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥
nara tanu bhava bāridhi kahum̐ bero| sanmukha maruta anugraha mero||
karanadhāra sadagura dṛṛha nāvā| durlabha sāja sulabha kari pāvā||
Meaning यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने] के लिये बेड़ा (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनतासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर ( भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं,॥ ४॥
जो न तरे भव सागर नर समाज अस पाइ।
jo na tare bhava sāgara nara samāja asa pāi|
कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥ ४४॥
kṛta niṃdaka maṃdamati ātmāhana gati jāi|| 44||
Meaning जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागरसे न तरे, वह कृतप्न और मन्द-बुद्धि है और आत्महत्या करनेवालेकी गतिको प्राप्त होता है॥ ४४॥
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥
jauṃ paraloka ihām̐ sukha cahahū| suni mama bacana hrṛdayam̐ dṛṛha gahahū||
sulabha sukhada māraga yaha bhāī| bhagati mori purāna śruti gāī||
Meaning यदि परलोकमें और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हदयमें दूढ़तासे पकड़ रखो। हे भाई ! यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदोंने इसे गाया है॥ १॥
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥
gyāna agama pratyūha anekā| sādhana kaṭhina na mana kahum̐ ṭekā||
karata kaṣṭa bahu pāvai koū| bhakti hīna mohi priya nahiṃ soū||
Meaning ज्ञान अगम (दुर्गम) है, [और] उसकी प्रापतिमें अनेकों विश्व हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता॥ २॥
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥
bhakti sutaṃtra sakala sukha khānī| binu satasaṃga na pāvahiṃ prānī||
punya puṃja binu milahiṃ na saṃtā| satasaṃgati saṃsṛti kara aṃtā||
Meaning भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है। परन्तु सत्संग (संतोंके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र)का अन्त करती है॥ ३॥
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥
punya eka jaga mahum̐ nahiṃ dūjā| mana krama bacana bipra pada pūjā||
sānukūla tehi para muni devā| jo taji kapaṭu karai dvija sevā||
Meaning जगतमें पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं। वह है--मन, कर्म और वचनसे ब्राह्मणोंके चरणोंकी पूजा करना। जो कपटका त्याग करके ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं॥ ४॥
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहडउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावड़ मोरि॥ ४५॥
aurau eka guputa mata sabahi kahaḍaum̐ kara jori|
saṃkara bhajana binā nara bhagati na pāvaṛa mori|| 45||
Meaning और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शड्धरजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता॥ ४५॥
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥
kahahu bhagati patha kavana prayāsā| joga na makha japa tapa upavāsā||
sarala subhāva na mana kuṭilāī| jathā lābha saṃtoṣa sadāī||
Meaning कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन-सा परिश्रम है ? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवासकी! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रखे॥ १॥
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥
mora dāsa kahāi nara āsā| karai tau kahahu kahā bisvāsā||
bahuta kahaum̐ kā kathā baṛhāī| ehi ācarana basya maiṃ bhāī||
Meaning मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्योंकी आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है? ( अर्थात् उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है।) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ ? हे भाइयो ! मैं तो इसी आचरणके वशभमें हूँ॥ २॥
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥
अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥
baira na bigraha āsa na trāsā| sukhamaya tāhi sadā saba āsā||
anāraṃbha aniketa amānī| anagha aroṣa daccha bigyānī||
Meaning न किसीसे वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरम्भ (फलकी इच्छासे कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घरमें ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [ भक्ति करनेमें] निपुण और विज्ञानवान् है॥ ३॥
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥
prīti sadā sajjana saṃsargā| tṛna sama biṣaya svarga apabargā||
bhagati paccha haṭha nahiṃ saṭhatāī| duṣṭa tarka saba dūri bahāī||
Meaning संतजनोंके संसर्ग (सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [ भक्तिके सामने] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [ दूसरेके मतका खण्डन करनेकी] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतरकोंको दूर बहा दिया है,॥ ४॥
मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।
ता कर सुख सोइ़ जानइड़ परानंद संदोह॥ ४६॥
mama guna grāma nāma rata gata mamatā mada moha|
tā kara sukha soi jānaiṛa parānaṃda saṃdoha|| 46||
Meaning जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [ परमात्मारूप] परमानन्दराशिको प्राप्त है॥ ४६॥
सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥
जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥
sunata sudhāsama bacana rāma ke| gahe sabani pada kṛpādhāma ke||
janani janaka gura baṃdhu hamāre| kṛpā nidhāna prāna te pyāre||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके अमृतके समान वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये [और कहा--] हे कृपानिधान! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं॥!१॥
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥
असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥
tanu dhanu dhāma rāma hitakārī| saba bidhi tumha pranatārati hārī||
asi sikha tumha binu dei na koū| mātu pitā svāratha rata oū||
Meaning और हे शरणागतके दुःख हरनेवाले रामजी ! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकारसे हित करनेवाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। माता-पिता [हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं] परन्तु वे भी स्वार्थपरायण हैं [इसलिये ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते]॥ २॥
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
hetu rahita jaga juga upakārī| tumha tumhāra sevaka asurārī||
svāratha mīta sakala jaga māhīṃ| sapanehum̐ prabhu paramāratha nāhīṃ||
Meaning हे असुोंके शत्रु ! जगतमें बिना हेतुके (निःस्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं--एक आप, दूसे आपके सेवक। जगतमें [ शेष] सभी स्वार्थके मित्र हैं। हे प्रभो ! उनमें स्वप्रमें भी परमार्थका भाव नहीं है॥ ३॥
सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥
निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥
sabake bacana prema rasa sāne| suni raghunātha hṛdayam̐ haraṣāne||
nija nija gṛha gae āyasu pāī| baranata prabhu batakahī suhāī||
Meaning सबके प्रेमरसमें सने हुए वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी हृदयमें हर्षित हुए। फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुन्दर बातचीतका वर्णन करते हुए अपने-अपने घर गये॥ ४॥
उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।
ब्रह्मा सच्चचिदानंद घन रघुनायक जहं भूपष। 9॥
umā avadhabāsī nara nāri kṛtāratha rūpa|
brahmā saccacidānaṃda ghana raghunāyaka jahaṃ bhūpaṣa| 9||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! अयोध्यामें रहनेवाले पुरुष और स्त्री सभी कृतार्थस्वरूप हैं; जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म श्रीरघुनाथजी राजा हैं॥ ४७॥
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥
eka bāra basiṣṭa muni āe| jahām̐ rāma sukhadhāma suhāe||
ati ādara raghunāyaka kīnhā| pada pakhāri pādodaka līnhā||
Meaning एक बार मुनि वसिष्टजी वहाँ आये जहाँ सुन्दर सुखके धाम श्रीरामजी थे। श्रीरघुनाथजीने उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणामृत लिया॥ १॥
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥
rāma sunahu muni kaha kara jorī| kṛpāsiṃdhu binatī kachu morī||
dekhi dekhi ācarana tumhārā| hota moha mama hṛdayam̐ apārā||
Meaning मुनिने हाथ जोड़कर कहा--हे कृपासागर श्रीरामजी ! मेरी कुछ विनती सुनिये ! आपके आचरणों ( मनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार मोह (भ्रम) होता है॥ २॥
महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥
mahimā amita beda nahiṃ jānā| maiṃ kehi bhām̐ti kahaum̐ bhagavānā||
uparohitya karma ati maṃdā| beda purāna sumṛti kara niṃdā||
Meaning हे भगवन् ! आपकी महिमाकी सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ ? पुरोहितीका कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निन््दा करते हैं॥ ३॥
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥
jaba na leum̐ maiṃ taba bidhi mohī| kahā lābha āgeṃ suta tohī||
paramātamā brahma nara rūpā| hoihi raghukula bhūṣana bhūpā||
Meaning जब मैं उसे (सूर्यवंशकी पुरोहितीका काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजीने मुझे कहा था--हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्यरूप धारण कर रघुकुलके भूषण राजा होंगे॥ ४॥
तब मैं हृदयें बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कहूँ करिअ सो पैहँ धर्म न एहि सम आन॥ ४८॥
taba maiṃ hṛdayeṃ bicārā joga jagya brata dāna|
jā kahūm̐ karia so paiham̐ dharma na ehi sama āna|| 48||
Meaning तब मैंने हृदयमें विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्मसे पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है॥ ४८॥
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥
japa tapa niyama joga nija dharmā| śruti saṃbhava nānā subha karmā||
gyāna dayā dama tīratha majjana| jaham̐ lagi dharma kahata śruti sajjana||
Meaning जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रमके] धर्म, श्रुतियोंसे उत्पन्न (वेदविहित) बहुत- से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह ), तीर्थस्तरान आदि जहाँतक वेद और संतजनोंने धर्म कहे हैं [उनके करनेका]--॥ १॥
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥
तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥
āgama nigama purāna anekā| paṛhe sune kara phala prabhu ekā||
taba pada paṃkaja prīti niraṃtara| saba sādhana kara yaha phala suṃdara||
Meaning [तथा] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुननेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो॥ २॥
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
chūṭai mala ki malahi ke dhoem̐| ghṛta ki pāva koi bāri biloem̐||
prema bhagati jala binu raghurāī| abhiaṃtara mala kabahum̐ na jāī||
Meaning मैलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है ? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है ? [उसी प्रकार। हे रघुनाथजी ! प्रेम-भक्तिरूपी [ निर्मल] जलके बिना अन्त:करणका मल कभी नहीं जाता॥ ३॥
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥
soi sarbagya tagya soi paṃḍita| soi guna gṛha bigyāna akhaṃḍita||
daccha sakala lacchana juta soī| jākeṃ pada saroja rati hoī||
Meaning वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है॥ ४॥
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।
जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटे जनि नेहु॥ ४९॥
nātha eka bara māgaum̐ rāma kṛpā kari dehu|
janma janma prabhu pada kamala kabahum̐ ghaṭe jani nehu|| 49||
Meaning हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु (आप) के चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तरमें भी कभी न घटे॥ ४९॥
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥
हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥
asa kahi muni basiṣṭa gṛha āe| kṛpāsiṃdhu ke mana ati bhāe||
hanūmāna bharatādika bhrātā| saṃga lie sevaka sukhadātā||
Meaning ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठजी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीने हनुमानजी तथा भरतजी आदि भाइयोंको साथ लिया॥ १॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥
देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥
puni kṛpāla pura bāhera gae| gaja ratha turaga magāvata bhae||
dekhi kṛpā kari sakala sarāhe| die ucita jinha jinha tei cāhe||
Meaning और फिर कृपालु श्रीरामजी नगरके बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया॥ २॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥
भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥
harana sakala śrama prabhu śrama pāī| gae jahām̐ sītala avam̐rāī||
bharata dīnha nija basana ḍasāī| baiṭhe prabhu sevahiṃ saba bhāī||
Meaning संसारके सभी श्रमोंको हरनेवाले प्रभुने [ हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें] श्रमका अनुभव किया और [श्रम मिटानेको ] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई ( आमोंका बगीचा) थी। वहाँ भरतजीने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उसपर बेठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे॥ ३॥
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥
mārutasuta taba mārūta karaī| pulaka bapuṣa locana jala bharaī||
hanūmāna sama nahiṃ baṛabhāgī| nahiṃ kou rāma carana anurāgī||
girijā jāsu prīti sevakāī| bāra bāra prabhu nija mukha gāī||
Meaning उस समय पवनपुत्र हनुमानूजी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे-- हे गिरिजे! हनुमानूजीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [स्वयं] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बड़ाई की है॥ ४-५॥
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।
गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥ ५०॥
tehiṃ avasara muni nārada āe karatala bīna|
gāvana lage rāma kala kīrati sadā nabīna|| 50||
Meaning उसी अवसरपर नारद मुनि हाथमें वीणा लिये हुए आये। वे श्रीरामजीकी सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कोर्ति गाने लगे॥ ५०॥
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥
māmavalokaya paṃkaja locana| kṛpā bilokani soca bimocana||
nīla tāmarasa syāma kāma ari| hṛdaya kaṃja makaraṃda madhupa hari||
Meaning कृपापूर्वक देख लेनेमात्रसे शोकके छुड़ानेवाले हे कमलनयन! मेरी ओर देखिये (मुझपर भी कृपादृष्टि कीजिये)। हे हरि! आप नील कमलके समान श्यामवर्ण और कामदेवके शत्रु महादेवजीके हृदयकमलके मकरन्द (प्रेम-रस) के पान करनेवाले शभ्रमर हैं॥ १॥
जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥
jātudhāna barūtha bala bhaṃjana| muni sajjana raṃjana agha gaṃjana||
bhūsura sasi nava bṛṃda balāhaka| asarana sarana dīna jana gāhaka||
Meaning आप राक्षसोंकी सेनाके बलको तोड़नेवाले हैं। मुनियों और संतजनोंको आनन्द देनेवाले और पापोंके नाश करनेवाले हैं। ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये आप नये मेघसमूह हैं और शरणहीनोंको शरण देनेवाले तथा दीन जनोंको अपने आश्रयमें ग्रहण करनेवाले हैं॥ २॥
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥
रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥
bhuja bala bipula bhāra mahi khaṃḍita| khara dūṣana birādha badha paṃḍita||
rāvanāri sukharūpa bhūpabara| jaya dasaratha kula kumuda sudhākara||
Meaning अपने बाहुबलसे पृथ्वीके बड़े भारी बोझको नष्ट करनेवाले, खर-दूषण और विराधके वध करनेमें कुशल, रावणके शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओंगें श्रेष्ठ और दशरथके कुलरूपी कुमुदिनीके चन्द्रमा श्रीरामजी ! आपकी जय हो॥ ३॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥
sujasa purāna bidita nigamāgama| gāvata sura muni saṃta samāgama||
kārunīka byalīka mada khaṃḍana| saba bidhi kusala kosalā maṃḍana||
Meaning आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदोंगें और तन्त्रादि शास्त्रोंमें प्रकट है। देवता, मुनि और संतोंके समुदाय उसे गाते हैं। आप करुणा करनेवाले और झूठे मदका नाश करनेवाले, सब प्रकारसे कुशल (निपुण) श्रीअयोध्याजीके भूषण ही हैं॥ ४॥
कलि मल मथन नाम ममताहन।
तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥
kali mala mathana nāma mamatāhana| tulasīdāsa prabhu pāhi pranata jana||
Meaning आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालनेवाला और ममताको मारनेवाला है। हे तुलसीदासके प्रभु! शरणागतकी रक्षा कीजिये॥ ५॥
प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।
prema sahita muni nārada barani rāma guna grāma|
भासिंधु हदयें धरि गए जहाँ बिधि धाम॥ ५१॥
bhāsiṃdhu hadayeṃ dhari gae jahām̐ bidhi dhāma|| 51||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहों का प्रेमपूर्वक वर्णन करके मुनि नारदजी शोभाके समुद्र प्रभुको हृदयमें धरकर जहाँ ब्रहालोक है वहाँ चले गये॥ ५१॥
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥
राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥
girijā sunahu bisada yaha kathā| maiṃ saba kahī mori mati jathā||
rāma carita sata koṭi apārā| śruti sāradā na baranai pārā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजीके चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते॥ १॥
राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥
rāma anaṃta anaṃta gunānī| janma karma anaṃta nāmānī||
jala sīkara mahi raja gani jāhīṃ| raghupati carita na barani sirāhīṃ||
Meaning भगवान् श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जलकी बूँदें और पृथ्वीके रज-कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजीके चरित्र वर्णन करनेसे नहीं चुकते॥ २॥
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥
bimala kathā hari pada dāyanī| bhagati hoi suni anapāyanī||
umā kahium̐ saba kathā suhāī| jo bhusuṃḍi khagapatihi sunāī||
Meaning यह पवित्र कथा भगवान्के परमपदको देनेवाली है। इसके सुननेसे अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजीने गरुड्जीको सुनायी थी॥ ३॥
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी॥
kachuka rāma guna kaheum̐ bakhānī| aba kā kahauṃ so kahahu bhavānī||
suni subha kathā umā haraṣānī| bolī ati binīta mṛdu bānī||
Meaning मैंने श्रीरामजीके कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ ? श्रीरामजीकी मज़लमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं--॥ ४॥
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी।
सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥
dhanya dhanya maiṃ dhanya purārī| suneum̐ rāma guna bhava bhaya hārī||
Meaning हे त्रिपुरारि! मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्युके भयको हरण करनेवाले श्रीरामजीके गुण (चरित्र) सुने॥ ५॥
तुम्हरी कृपां कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।
जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह॥ ५२ (क )॥
tumharī kṛpāṃ kṛpāyatana aba kṛtakṛtya na moha|
jāneum̐ rāma pratāpa prabhu cidānaṃda saṃdoha|| 52 (ka )||
Meaning हे कृपाधाम ! अब आपकी कृपासे मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु ! मैं सच्चिदानन्दघन प्रभु श्रीरामजीके प्रतापको जान गयी॥ ५२ (क)॥
नाथ तवानन ससि स्त्वत कथा सुधा रघुबीर।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ ( ख )॥
nātha tavānana sasi stvata kathā sudhā raghubīra|
śravana puṭanhi mana pāna kari nahiṃ aghāta matidhīra|| 52 ( kha )||
Meaning हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर ! मेरा मन कर्णपुटोंसे उसे पीकर तृप्त नहीं होता॥ ५२ (ख)॥