भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥
bharata anuja saumitra sametā| paṭhavana cale bhagata kṛta cetā||
aṃgada hṛdayam̐ prema nahiṃ thorā| phiri phiri citava rāma kīṃ orā||
Meaning भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्नजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले। अड्दके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं,॥ १॥
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥
bāra bāra kara daṃḍa pranāmā| mana asa rahana kahahiṃ mohi rāmā||
rāma bilokani bolani calanī| sumiri sumiri socata ham̐si milanī||
Meaning और बार-बार दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें। वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं)॥ २॥
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥
अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥
prabhu rukha dekhi binaya bahu bhāṣī| caleu hṛdayam̐ pada paṃkaja rākhī||
ati ādara saba kapi pahum̐cāe| bhāinha sahita bharata puni āe||
Meaning किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण-कमलोंको रखकर वे चले। अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये॥ ३॥
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥
दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥
taba sugrīva carana gahi nānā| bhām̐ti binaya kīnhe hanumānā||
dina dasa kari raghupati pada sevā| puni tava carana dekhihaum̐ devā||
Meaning तब हनुमान्जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा--हे देव! दस ( कुछ ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा॥ ४॥
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥
punya puṃja tumha pavanakumārā| sevahu jāi kṛpā āgārā||
asa kahi kapi saba cale turaṃtā| aṃgada kahai sunahu hanumaṃtā||
Meaning [सुग्रीवने कहा--] हे पवनकुमार ! तुम पुण्यकी राशि हो [ जो भगवान्ने तुमको अपनी सेवामें रख लिया]। जाकर कृपाधाम श्रीरामजीकी सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अज्भदने कहा--हे हनुमान्! सुनो--॥ ५॥
कहेह दंडवत प्रभु सें तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥ १९ ( क )॥
kaheha daṃḍavata prabhu seṃ tumhahi kahaum̐ kara jori|
bāra bāra raghunāyakahi surati karāehu mori|| 19 ( ka )||
Meaning मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजीको बार-बार मेरी याद कराते रहना॥ १९ (क)॥
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।
तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत॥ १९ (ख )॥
asa kahi caleu bālisuta phiri āyau hanumaṃta|
tāsu prīti prabhu sana kahī magana bhae bhagavaṃta|| 19 (kha )||
Meaning ऐसा कहकर बालिपुत्र अज्द चले, तब हनुमानजी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममय्र हो गये॥ १९ (ख)॥
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥ १९ (ग )॥
kulisahu cāhi kaṭhora ati komala kusumahu cāhi|
citta khagesa rāma kara samujhi parai kahu kāhi|| 19 (ga )||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी ! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और फूलसे भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है ?॥ १९ (ग)॥
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥
puni kṛpāla liyo boli niṣādā| dīnhe bhūṣana basana prasādā||
jāhu bhavana mama sumirana karehū| mana krama bacana dharma anusarehū||
Meaning फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये। [ फिर कहा--] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्मसे धर्मके अनुसार चलना॥ १॥
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥
बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥
tumha mama sakhā bharata sama bhrātā| sadā rahehu pura āvata jātā||
bacana sunata upajā sukha bhārī| pareu carana bhari locana bārī||
Meaning तुम मेरे मित्र हो और भरतके समान भाई हो। अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रोंगें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा॥ २॥
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥
रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥
carana nalina ura dhari gṛha āvā| prabhu subhāu parijananhi sunāvā||
raghupati carita dekhi purabāsī| puni puni kahahiṃ dhanya sukharāsī||
Meaning फिर भगवानूके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियोंको उसने प्रभुका स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजीका यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुखकी राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं॥ ३॥
राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका॥
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥
rāma rāja baiṃṭheṃ trelokā| haraṣita bhae gae saba sokā||
bayaru na kara kāhū sana koī| rāma pratāpa biṣamatā khoī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्टित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता ( आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी॥ ४॥
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।त चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥ २०॥
baranāśrama nija nija dharama nirata beda patha loga|ta calahiṃ sadā pāvahiṃ sukhahi nahiṃ bhaya soka na roga|| 20||
Meaning सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है॥ २०॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
daihika daivika bhautika tāpā| rāma rāja nahiṃ kāhuhi byāpā||
saba nara karahiṃ paraspara prītī| calahiṃ svadharma nirata śruti nītī||
Meaning 'राम-राज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं॥ १॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
cāriu carana dharma jaga māhīṃ| pūri rahā sapanehum̐ agha nāhīṃ||
rāma bhagati rata nara aru nārī| sakala parama gati ke adhikārī||
Meaning धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगतमें परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्रमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं॥ २॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
alpamṛtyu nahiṃ kavaniu pīrā| saba suṃdara saba biruja sarīrā||
nahiṃ daridra kou dukhī na dīnā| nahiṃ kou abudha na lacchana hīnā||
Meaning छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है॥ ३॥
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥
saba nirdaṃbha dharmarata punī| nara aru nāri catura saba gunī||
saba gunagya paṃḍita saba gyānī| saba kṛtagya nahiṃ kapaṭa sayānī||
Meaning सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई ( धूर्तता) किसीमें नहीं है॥ ४॥
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ २१॥
rāma rāja nabhagesa sunu sacarācara jaga māhiṃ|
kāla karma subhāva guna kṛta dukha kāhuhi nāhiṃ|| 21||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये। श्रीरामके राज्यमें जड़, चेतन सारे जगत्में काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख किसीको भी नहीं होते ( अर्थात् इनके बन्धनमें कोई नहीं है)॥ २१॥
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥
bhūmi sapta sāgara mekhalā| eka bhūpa raghupati kosalā||
bhuana aneka roma prati jāsū| yaha prabhutā kachu bahuta na tāsū||
Meaning अयोध्यामें श्रीरघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला ( करधनी ) -वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपोंकी यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है॥ १॥
सो महिमा समुझत प्रभु केरी।
यह बरनत हीनता घनेरी॥
so mahimā samujhata prabhu kerī| yaha baranata hīnatā ghanerī||
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी।
फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥
sou mahimā khagesa jinha jānī| phirī ehiṃ carita tinhahum̐ rati mānī||
Meaning बल्कि प्रभुकी उस महिमाको समझ लेनेपर तो यह कहनेमें [कि वे सात समुद्रोंसे घिरी हुई सप्तद्वीपमयी पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परन्तु हे गरुड़जी ! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीलामें बड़ा प्रेम मानते हैं॥ २॥
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥
sou jāne kara phala yaha līlā| kahahiṃ mahā munibara damasīlā||
rāma rāja kara sukha saṃpadā| barani na sakai phanīsa sāradā||
Meaning क्योंकि उस महिमाको भी जाननेका फल यह लीला (इस लीलाका अनुभव) ही है, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्यकी सुख-सम्पत्तिका वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते॥ ३॥
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥
saba udāra saba para upakārī| bipra carana sevaka nara nārī||
ekanāri brata rata saba jhārī| te mana baca krama pati hitakārī||
Meaning सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपल्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं॥ ४॥
दंड जतिन्ह कर भेद जहें नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र के राज॥ २२॥
daṃḍa jatinha kara bheda jaheṃ nartaka nṛtya samāja|
jītahu manahi sunia asa rāmacaṃdra ke rāja|| 22||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी ' ' के राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें है और भेद नाचनेवालोंके नृत्यसमाजमें है और जीतो शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही सुनायी पड़ता है ( अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदिको दमन करनेके लिये ' साम, ' दान, दण्ड और भेद--ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये जीतो शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसीको नहीं होता; 'दण्ड' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाले दण्डके ' ' लिये ही रह गया है। तथा सभी अनुकूल होनेके कारण भेदनीतिकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी; भेद शब्द केवल सुर-तालके भेदके लिये ही कामों में आता है।)॥ २२॥
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥
phūlahiṃ pharahiṃ sadā taru kānana| rahahi eka sam̐ga gaja paṃcānana||
khaga mṛga sahaja bayaru bisarāī| sabanhi paraspara prīti baṛhāī||
Meaning वनोंमें वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपसभें प्रेम बढ़ा लिया है॥ १॥
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा॥
kūjahiṃ khaga mṛga nānā bṛṃdā| abhaya carahiṃ bana karahiṃ anaṃdā||
sītala surabhi pavana baha maṃdā| gūṃjata ali lai cali makaraṃdā||
Meaning पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँतिके पशुओंके समूह वनमें निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं॥ २॥
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥
latā biṭapa māgeṃ madhu cavahīṃ| manabhāvato dhenu paya stravahīṃ||
sasi saṃpanna sadā raha dharanī| tretām̐ bhai kṛtajuga kai karanī||
Meaning बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेतीसे भरी रहती है। त्रेतामें सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी॥ ३॥
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥
pragaṭīṃ girinha bibidha mani khānī| jagadātamā bhūpa jaga jānī||
saritā sakala bahahiṃ bara bārī| sītala amala svāda sukhakārī||
Meaning समस्त जगत्के आत्मा भगवान्को जगत्का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं॥ ४॥
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥
sāgara nija marajādām̐ rahahīṃ| ḍārahiṃ ratna taṭanhi nara lahahīṃ||
sarasija saṃkula sakala taṛāgā| ati prasanna dasa disā bibhāgā||
Meaning समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्र डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओंके विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ५॥
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३॥
bidhu mahi pūra mayūkhanhi rabi tapa jetanehi kāja|
māgeṃ bārida dehiṃ jala rāmacaṃdra keṃ rāja|| 23||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [ अमृतमयी] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं॥ २३॥
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥
koṭinha bājimedha prabhu kīnhe| dāna aneka dvijanha kaham̐ dīnhe||
śruti patha pālaka dharma dhuraṃdhara| gunātīta aru bhoga puraṃdara||
Meaning प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अध्मेथ यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [ प्रकृतिजन्य सत्त्व, रज और तम,] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्रके समान हैं॥ १॥
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई॥
pati anukūla sadā raha sītā| sobhā khāni susīla binītā||
jānati kṛpāsiṃdhu prabhutāī| sevati carana kamala mana lāī||
Meaning शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुतता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं॥ २॥
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥
jadyapi gṛham̐ sevaka sevakinī| bipula sadā sevā bidhi gunī||
nija kara gṛha paricarajā karaī| rāmacaṃdra āyasu anusaraī||
Meaning यद्यपि घरमें बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली]] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं॥ ३॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥
jehi bidhi kṛpāsiṃdhu sukha mānai| soi kara śrī sevā bidhi jānai||
kausalyādi sāsu gṛha māhīṃ| sevai sabanhi māna mada nāhīṃ||
Meaning कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवाकी विधिको जाननेवाली हैं। घरमें कौसल्या आदि सभी सासुओंकी सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बातका अभिमान और मद नहीं है॥ ४॥
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता।
जगदंबा संततमनिंदिता॥
umā ramā brahmādi baṃditā| jagadaṃbā saṃtatamaniṃditā||
Meaning (शिवजी कहते हैं-- ) हे उमा! जगज्जननी रमा ( सीताजी ) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं॥ ५॥
जासु कृपा कटठाच्छ सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ़॥ २४॥
jāsu kṛpā kaṭaṭhāccha sura cāhata citava na soi|
rāma padārabiṃda rati karati subhāvahi khoi|| 24||
Meaning देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परन्तु वे उनकी ओर देखतीं भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी ) अपने [ महामहिम ] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं॥ २४॥
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥
sevahiṃ sānakūla saba bhāī| rāma carana rati ati adhikāī||
prabhu mukha kamala bilokata rahahīṃ| kabahum̐ kṛpāla hamahi kachu kahahīṃ||
Meaning सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामजीके चरणोंमें उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभुका मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करनेको कहें॥ १॥
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥
rāma karahiṃ bhrātanha para prītī| nānā bhām̐ti sikhāvahiṃ nītī||
haraṣita rahahiṃ nagara ke logā| karahiṃ sakala sura durlabha bhogā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयोंपर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकारकी नीतियाँ सिखलाते हैं। नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ (देवताओंको भी कठिनतासे प्राप्त होने योग्य ) भोग भोगते हैं॥ २॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥
ahanisi bidhihi manāvata rahahīṃ| śrīraghubīra carana rati cahahīṃ||
dui suta sundara sītām̐ jāe| lava kusa beda purānanha gāe||
Meaning वे दिन-रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं। सीताजीके लव और कुश--ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणोंने वर्णन किया है॥ ३॥
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥
dou bijaī binaī guna maṃdira| hari pratibiṃba manahum̐ ati suṃdara||
dui dui suta saba bhrātanha kere| bhae rūpa guna sīla ghanere||
Meaning वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा ), नम्र और गुणोंके धाम हैं और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्रीहरिके प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयोंके हुए, जो बड़े ही सुन्दर, गुणवान् और सुशील थे॥ '४॥
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।
gyāna girā gotīta aja māyā mana guna pāra|
इ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥ २५॥
i saccidānaṃda ghana kara nara carita udāra|| 25||
Meaning जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्द्घन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं॥ २५॥
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥
prātakāla saraū kari majjana| baiṭhahiṃ sabhām̐ saṃga dvija sajjana||
beda purāna basiṣṭa bakhānahiṃ| sunahiṃ rāma jadyapi saba jānahiṃ||
Meaning प्रात:काल सरयूजीमें स्त्रान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते हैं। वसिष्ठजी वेद और पुराणोंकी कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं॥ १॥
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥
anujanha saṃjuta bhojana karahīṃ| dekhi sakala jananīṃ sukha bharahīṃ||
bharata satruhana donau bhāī| sahita pavanasuta upabana jāī||
Meaning वे भाइयोंको साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्दसे भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमानूजीसहित उपवनोंमें जाकर,॥ २॥
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥
būjhahiṃ baiṭhi rāma guna gāhā| kaha hanumāna sumati avagāhā||
sunata bimala guna ati sukha pāvahiṃ| bahuri bahuri kari binaya kahāvahiṃ||
Meaning वहाँ बैठकर श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमानजी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणोंको सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं॥ ३॥
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥
saba keṃ gṛha gṛha hohiṃ purānā| rāmacarita pāvana bidhi nānā||
nara aru nāri rāma guna gānahiṃ| karahiṃ divasa nisi jāta na jānahiṃ||
Meaning सबके यहाँ घर-घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते॥ ४॥
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ २६॥
avadhapurī bāsinha kara sukha saṃpadā samāja|
sahasa seṣa nahiṃ kahi sakahiṃ jaham̐ nṛpa rāma birāja|| 26||
Meaning जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ २६॥
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥
nāradādi sanakādi munīsā| darasana lāgi kosalādhīsā||
dina prati sakala ajodhyā āvahiṃ| dekhi nagaru birāgu bisarāvahiṃ||
Meaning नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्रीरामजीके दर्शनके लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [दिव्य] नगरको देखकर वैराग्य भुला देते हैं॥ १॥
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥
jātarūpa mani racita aṭārīṃ| nānā raṃga rucira gaca ḍhārīṃ||
pura cahum̐ pāsa koṭa ati suṃdara| race kam̐gūrā raṃga raṃga bara||
Meaning [दिव्य] स्वर्ण और रत्नोंसे बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें [ मणि-रत्लोंकी ] अनेक रंगों की सुन्दर ढली हुई फर्शे हैं। नगरके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिसपर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं॥ २॥
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥
महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥
nava graha nikara anīka banāī| janu gherī amarāvati āī||
mahi bahu raṃga racita gaca kām̐cā| jo biloki munibara mana nācā||
Meaning मानो नवग्रहोंने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावतीको आकर घेर लिया हो। पृथ्वी (सड़कों ) पर अनेकों रंगोंके (दिव्य) काँचों (रतों) की गच बनायी (ढाली) गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी मन नाच उठते हैं॥ ३॥
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥
dhavala dhāma ūpara nabha cuṃbata| kalasa manahum̐ rabi sasi duti niṃdata||
bahu mani racita jharokhā bhrājahiṃ| gṛha gṛha prati mani dīpa birājahiṃ||
Meaning उज्वल महल ऊपर आकाशको चूम (छू) रहे हैं। महलॉंपरके कलश [ अपने दिव्य प्रकाशसे। मानो सूर्य, चन्द्रमाके प्रकाशकी भी निन््दा (तिरस्कार) करते हैं। [ महलोंमें] बहुत-सी मणियोंसे रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घरमें मणियोंके दीपक शोभा पा रहे हैं॥ ४॥
मनि दीप राजहिं भवन शभ्राजहिं देहरीं बिदट्रुम रची।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।
प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बह बज़न्हि खचे॥
mani dīpa rājahiṃ bhavana śabhrājahiṃ deharīṃ bidaṭruma racī|
mani khaṃbha bhīti biraṃci biracī kanaka mani marakata khacī||
suṃdara manohara maṃdirāyata ajira rucira phaṭika race|
prati dvāra dvāra kapāṭa puraṭa banāi baha bazanhi khace||
Meaning घरोंमें मणियोंके दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगोंकी बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों (रतों के खम्भे हैं। मरकतमणियों (पन्नों) से जड़ी हुई सोनेकी दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्माने खास तौरसे बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिकके आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वारपर बहुत-से खरादे हुए हीरोंसे जड़े हुए सोनेके किंवाड़ हैं।
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥ २७॥
cāru citrasālā gṛha gṛha prati likhe banāi|
rāma carita je nirakha muni te mana lehiṃ corāi|| 27||
Meaning घर-घरमें सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजीके चरित्र बड़ी सुन्दरताके साथ सँवारकर अड्लित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्तको चुरा लेते हैं॥ २७॥
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई॥
लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई॥
sumana bāṭikā sabahiṃ lagāī| bibidha bhām̐ti kari jatana banāī||
latā lalita bahu jāti suhāī| phūlahiṃ sadā baṃsata ki nāī||
Meaning सभी लोगोंने भिन्न-भिन्न प्रकारकी पुष्पोंकी वाटिकाएँ यत्र करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियोंकी सुन्दर और ललित लताएँ सदा वसंतकी तरह फूलती रहती हैं॥ १॥
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर॥
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥
guṃjata madhukara mukhara manohara| māruta tribidha sadā baha suṃdara||
nānā khaga bālakanhi jiāe| bolata madhura uṛāta suhāe||
Meaning भौरे मनोहर स्वरसे गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहती रहती है। बालकों ने बहुत-से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़नेमें सुन्दर लगते हैं॥ २॥
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥
mora haṃsa sārasa pārāvata| bhavanani para sobhā ati pāvata||
jaham̐ taham̐ dekhahiṃ nija parichāhīṃ| bahu bidhi kūjahiṃ nṛtya karāhīṃ||
Meaning मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंके ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियोंकी दीवारोंमें और छतमें। जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकारसे मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं॥ ३॥
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥
राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू॥
suka sārikā paṛhāvahiṃ bālaka| kahahu rāma raghupati janapālaka||
rāja duāra sakala bidhi cārū| bīthīṃ cauhaṭa rūcira bajārū||
Meaning बालक तोता-मैनाको पढ़ाते हैं कि कहो--' राम' *रघुपति' जनपालक'। राजद्वार सब प्रकारसे सुन्दर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं॥ ४१॥
बाजार रुचिर न बनड़ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
जहँ भूप रमानिवास तहें की संपदा किमि गाइए॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहूँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
bājāra rucira na banaṛa baranata bastu binu gatha pāie|
jaham̐ bhūpa ramānivāsa taheṃ kī saṃpadā kimi gāie||
baiṭhe bajāja sarāpha banika aneka manahūm̐ kubera te|
saba sukhī saba saccarita suṃdara nāri nara sisu jaraṭha je||
Meaning सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी सम्पत्तिका वर्णन कैसे किया जाय ? बजाज ( कपड़ेका व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसेका लेन-देन करनेवाले ) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं।
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥ २८॥
uttara disi sarajū baha nirmala jala gaṃbhīra|
bām̐dhe ghāṭa manohara svalpa paṃka nahiṃ tīra|| 28||
Meaning नगरके उत्तर दिशामें सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारेपर जरा भी कीचड़ नहीं है॥ २८॥
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥
dūri pharāka rucira so ghāṭā| jaham̐ jala piahiṃ bāji gaja ṭhāṭā||
panighaṭa parama manohara nānā| tahām̐ na puruṣa karahiṃ asnānā||
Meaning अलग कुछ दूरीपर वह सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियोंके ठट्ट-के-ठट्ठ जल पिया करते हैं। पानी भरनेके लिये बहुत-से [ जनाने] घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं। वहाँ पुरुष स्त्रान नहीं करते॥ १॥
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥
तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥
rājaghāṭa saba bidhi suṃdara bara| majjahiṃ tahām̐ barana cāriu nara||
tīra tīra devanha ke maṃdira| cahum̐ disi tinha ke upabana suṃdara||
Meaning राजघाट सब प्रकारसे सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णोंके पुरुष स्त्रान करते हैं। सरयूजीके किनारे-किनारे देवताओंके मन्दिर हैं, जिनके चारों ओर सुन्दर उपवन (बगीचे) हैं॥ २॥
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥
तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥
kahum̐ kahum̐ saritā tīra udāsī| basahiṃ gyāna rata muni saṃnyāsī||
tīra tīra tulasikā suhāī| bṛṃda bṛṃda bahu muninha lagāī||
Meaning नदीके किनारे कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजीके किनारे-किनारे सुन्दर तुलसीजीके झुंड-के-झुंड बहुत-से पेड़ मुनियोंने लगा रखे हैं॥ ३॥
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥
देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥
pura sobhā kachu barani na jāī| bāhera nagara parama rucirāī||
dekhata purī akhila agha bhāgā| bana upabana bāpikā taṛāgā||
Meaning नगरकी शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगरके बाहर भी परम सुन्दरता है। श्रीअयोध्यापुरीके दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं। [वहाँ] वन, उपवन, बावलियाँ और तालाब सुशोभित हैं॥ ४॥
बापीं तड़ाग अनूप कृप मनोहरायत सोहहीं।
बहु रंग कंज अनेक खग कृूजहिं मधुप गुंजारहीं।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
bāpīṃ taṛāga anūpa kṛpa manoharāyata sohahīṃ|
bahu raṃga kaṃja aneka khaga kṛूjahiṃ madhupa guṃjārahīṃ|
ārāma ramya pikādi khaga rava janu pathika haṃkārahīṃ||
Meaning अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर [रत्लोंकी। सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनितक मोहित हो जाते हैं। [ तालाबोंमें। अनेक रंगोंके कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी कूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं। [ परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियोंकी [सुन्दर बोलीसे] मानो राह चलनेवालोंको बुला रहे हैं।
रमानाथ जहेँँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाड़॥ २९॥
ramānātha jahem̐m̐ rājā so pura barani ki jāi|
animādika sukha saṃpadā rahīṃ avadha saba chāṛa|| 29||
Meaning स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगरका कहीं वर्णन किया जा सकता है ? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्यामें छा रही हैं॥ २९॥
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥
jaham̐ taham̐ nara raghupati guna gāvahiṃ| baiṭhi parasapara ihai sikhāvahiṃ||
bhajahu pranata pratipālaka rāmahi| sobhā sīla rūpa guna dhāmahi||
Meaning लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो॥ १॥
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥
jalaja bilocana syāmala gātahi| palaka nayana iva sevaka trātahi||
dhṛta sara rucira cāpa tūnīrahi| saṃta kaṃja bana rabi ranadhīrahi||
Meaning कमलनयन और साँवले शरीरवालेको भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवालेको भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करने- वालेको भजो। संतरूपी कमलवनके [खिलानेके] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजीको भजो॥ २॥
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥
kāla karāla byāla khagarājahi| namata rāma akāma mamatā jahi||
lobha moha mṛgajūtha kirātahi| manasija kari hari jana sukhadātahi||
Meaning कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो। निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो। कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो॥ ३॥
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥
जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥
saṃsaya soka nibiṛa tama bhānuhi| danuja gahana ghana dahana kṛsānuhi||
janakasutā sameta raghubīrahi| kasa na bhajahu bhaṃjana bhava bhīrahi||
Meaning संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो। राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्रिको भजो। जन्म-मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजनकी जीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते ?॥ ४॥
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥
मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥
bahu bāsanā masaka hima rāsihi| sadā ekarasa aja abināsihi||
muni raṃjana bhaṃjana mahi bhārahi| tulasidāsa ke prabhuhi udārahi||
Meaning बहुत-सी वासनाओंरूपी मच्छरोंको नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फके ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो। मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीका भार उतारनेवाले और तुलसीदासके उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजीको भजो॥ ५॥
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।
सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥ ३०॥
ehi bidhi nagara nāri nara karahiṃ rāma guna gāna|
sānukūla saba para rahahiṃ saṃtata kṛpānidhāna|| 30||
Meaning इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष श्रीरामजीका गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं॥ ३०॥
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥
jaba te rāma pratāpa khagesā| udita bhayau ati prabala dinesā||
pūri prakāsa raheu tihum̐ lokā| bahutenha sukha bahutana mana sokā||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी ! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकोंमें पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतोंको सुख और बहुतोंके मनमें शोक हुआ॥ १॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥
jinhahi soka te kahaum̐ bakhānī| prathama abidyā nisā nasānī||
agha ulūka jaham̐ tahām̐ lukāne| kāma krodha kairava sakucāne||
Meaning जिन-जिनको शोक हुआ, उन्हें मैं बबानकर कहता हूँ। [सर्वत्र प्रकाश छा जानेसे] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पापरूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये॥ २॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥
मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥
bibidha karma guna kāla subhāū| e cakora sukha lahahiṃ na kāū||
matsara māna moha mada corā| inha kara hunara na kavanihum̐ orā||
Meaning भाँति-भाँतिके [ बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव--ये चकोर हैं, जो [ रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता॥ ३॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥
सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥
dharama taṛāga gyāna bigyānā| e paṃkaja bikase bidhi nānā||
sukha saṃtoṣa birāga bibekā| bigata soka e koka anekā||
Meaning धर्मरूपी तालाबमें ज्ञान, विज्ञान--ये अनेकों प्रकारके कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक--ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये॥ ४॥
यह प्रताप रब जाकें उर जब करड़ प्रकास।
प७छ़िले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१॥
yaha pratāpa raba jākeṃ ura jaba karaṛa prakāsa|
pa7chile bāṛhahiṃ prathama je kahe te pāvahiṃ nāsa|| 31||
Meaning यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाशको प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं॥ ३१॥
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥
सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥
bhrātanha sahita rāmu eka bārā| saṃga parama priya pavanakumārā||
suṃdara upabana dekhana gae| saba taru kusumita pallava nae||
Meaning एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमानूजीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे॥ १॥
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥
jāni samaya sanakādika āe| teja puṃja guna sīla suhāe||
brahmānaṃda sadā layalīnā| dekhata bālaka bahukālīnā||
Meaning सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुझ्, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं। देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके॥ २॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥
rūpa dhareṃ janu cāriu bedā| samadarasī muni bigata bibhedā||
āsā basana byasana yaha tinhahīṃ| raghupati carita hoi taham̐ sunahīṃ||
Meaning मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं॥ ३॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥
राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥
tahām̐ rahe sanakādi bhavānī| jaham̐ ghaṭasaṃbhava munibara gyānī||
rāma kathā munibara bahu baranī| gyāna joni pāvaka jimi aranī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहींसे चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्ि उत्पन्न होती है॥ ४॥
देखि राम मुनि आवत हरघि दंडवत कौन्ह।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहूँ दीन्ह॥ ३२॥
dekhi rāma muni āvata haraghi daṃḍavata kaunha|
svāgata pūm̐chi pīta paṭa prabhu baiṭhana kahūm̐ dīnha|| 32||
Meaning सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभुने [उनके] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया॥ ३२॥
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥
kīnha daṃḍavata tīnium̐ bhāī| sahita pavanasuta sukha adhikāī||
muni raghupati chabi atula bilokī| bhae magana mana sake na rokī||
Meaning फिर हनुमानूजीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छवि देखकर उसीमें मग्र हो गये। वे मनको रोक न सके॥ १॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥
एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥
syāmala gāta saroruha locana| suṃdaratā maṃdira bhava mocana||
ekaṭaka rahe nimeṣa na lāvahiṃ| prabhu kara joreṃ sīsa navāvahiṃ||
Meaning वे जन्म-मृत्यु [ के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं॥ २॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥
tinha kai dasā dekhi raghubīrā| stravata nayana jala pulaka sarīrā||
kara gahi prabhu munibara baiṭhāre| parama manohara bacana ucāre||
Meaning उनकी [प्रेमविह्नलल] दशा देखकर [उन्हींकी भाँति] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे--॥ ३॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥
āju dhanya maiṃ sunahu munīsā| tumhareṃ darasa jāhiṃ agha khīsā||
baṛe bhāga pāiba satasaṃgā| binahiṃ prayāsa hohiṃ bhava bhaṃgā||
Meaning हे मुनीश्वरो ! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनोंहीसे [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है॥ ४॥
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥ ३३॥
saṃta saṃga apabarga kara kāmī bhava kara paṃtha|
kahahiṃ saṃta kabi kobida śruti purāna sadagraṃtha|| 33||
Meaning संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [आदि] सभी सद्ग्न्थ ऐसा कहते हैं॥ ३३॥
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥
suni prabhu bacana haraṣi muni cārī| pulakita tana astuti anusārī||
jaya bhagavaṃta anaṃta anāmaya| anagha aneka eka karunāmaya||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे--हे भगवन्! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपोंमें प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं॥ १॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥
jaya nirguna jaya jaya guna sāgara| sukha maṃdira suṃdara ati nāgara||
jaya iṃdirā ramana jaya bhūdhara| anupama aja anādi sobhākara||
Meaning हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [ अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति ! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले ! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं॥ २॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥
gyāna nidhāna amāna mānaprada| pāvana sujasa purāna beda bada||
tagya kṛtagya agyatā bhaṃjana| nāma aneka anāma niraṃjana||
Meaning आप ज्ञानके भण्डार, [स्वयं] मानरहित और [दूसरोंको] मान देनेवाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं। आप तत्त्वके जाननेवाले, की हुई सेवाको माननेवाले और अज्ञानका नाश करनेवाले हैं। हे निरज्ञन ( मायारहित) ! आपके अनेकों (अनन्त) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात् आप सब नामोंके परे हैं)॥ ३॥
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय॥
sarba sarbagata sarba urālaya| basasi sadā hama kahum̐ paripālaya||
dvaṃda bipati bhava phaṃda bibhaṃjaya| hradi basi rāma kāma mada gaṃjaya||
Meaning आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सबके हृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [ अत: ] आप हमारा परिपालन कीजिये। [ राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्, विपत्ति और जन्म- मृत्युके जालको काट दीजिये। हे रामजी ! आप हमारे हृदयमें बसकर काम और मदका नाश कर दीजिये॥ ४॥
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥ ३४॥
paramānaṃda kṛpāyatana mana paripūrana kāma|
prema bhagati anapāyanī dehu hamahi śrīrāma|| 34||
Meaning आप परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! हमको अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये॥ ३४॥
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि॥
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥
dehu bhagati raghupati ati pāvani| tribidha tāpa bhava dāpa nasāvani||
pranata kāma suradhenu kalapataru| hoi prasanna dījai prabhu yaha baru||
Meaning हे रघुनाथजी ! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकारके तापों और जन्म- मरणके क्लेशोंका नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करनेके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षरूप प्रभो ! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये॥ १॥
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥
मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥
bhava bāridhi kuṃbhaja raghunāyaka| sevata sulabha sakala sukha dāyaka||
mana saṃbhava dāruna dukha dāraya| dīnabaṃdhu samatā bistāraya||
Meaning हे रघुनाथजी ! आप जन्म-मृत्युरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्य मुनिके समान हैं। आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं। हे दीनबन्धो ! मनसे उत्पन्न दारुण दुःखोंका नाश कीजिये और [ हममें] समदृष्टिका विस्तार कीजिये॥ २॥
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥
भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥
āsa trāsa iriṣādi nivāraka| binaya bibeka birati bistāraka||
bhūpa mauli mana maṃḍana dharanī| dehi bhagati saṃsṛti sari taranī||
Meaning आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी ! संसृति ( जन्म-मृत्युके प्रवाह )-रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये॥ ३॥
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥
muni mana mānasa haṃsa niraṃtara| carana kamala baṃdita aja saṃkara||
raghukula ketu setu śruti racchaka| kāla karama subhāu guna bhacchaka||
Meaning हे मुनियोंके मनरूपी मानसरोवरमें निरन्तर निवास करनेवाले हंस ! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादाके रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [-रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं॥ ४॥
तारन तरन हरन सब दूषन।
तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥
tārana tarana harana saba dūṣana| tulasidāsa prabhu tribhuvana bhūṣana||
Meaning आप तरन-तारन (स्वयं तरे हुए और दूसरोंको तारनेवाले) तथा सब दोषोंको हरनेवाले हैं। तीनों लोकोंके विभूषण आप ही तुलसीदासके स्वामी हैं॥ ५॥
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
ब्रहा भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५॥
bāra bāra astuti kari prema sahita siru nāi|
brahā bhavana sanakādi ge ati abhīṣṭa bara pāi|| 35||
Meaning प्रेमसहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रहालोकको गये॥ ३५॥