राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि॥ ११ (ख )॥
rāma bāma disi sobhati ramā rūpa guna khāni|
dekhi mātu saba haraṣīṃ janma suphala nija jāni|| 11 (kha )||
Meaning श्रीरामके बायीं ओर रूप और गुणोंकी खान रमा ( श्रीजानकीजी) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं॥ ११ (ख)॥
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बुंद।
चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद॥ ११ (ग)॥
sunu khagesa tehi avasara brahmā siva muni buṃda|
caṛhi bimāna āe saba sura dekhana sukhakaṃda|| 11 (ga)||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान्के दर्शन करनेके लिये आये॥ ११ (ग)॥
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥
रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥
prabhu biloki muni mana anurāgā| turata dibya siṃghāsana māgā||
rabi sama teja so barani na jāī| baiṭhe rāma dvijanha siru nāī||
Meaning प्रभुको देखकर मुनि वसिष्टजीके मनमें प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्यके समान था। उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणोंको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उसपर विराज गये॥ १॥
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई॥
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे॥
janakasutā sameta raghurāī| pekhi praharaṣe muni samudāī||
beda maṃtra taba dvijanha ucāre| nabha sura muni jaya jayati pukāre||
Meaning श्रीजानकीजीके सहित श्रीरघुनाथजीको देखकर मुनियोंका समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण किया। आकाशमें देवता और मुनि 'जय हो, जय हो' ऐसी पुकार करने लगे॥ २॥
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा।
पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥
prathama tilaka basiṣṭa muni kīnhā| puni saba bipranha āyasu dīnhā||
Meaning [सबसे] पहले मुनि वसिष्ठतजीने तिलक किया। फिर उन्होंने सब ब्राह्मणोंको [तिलक करनेकी] आज्ञा दी। पुत्रको राजसिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुई और उन्होंने बार-बार
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥
सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं॥
bipranha dāna bibidha bidhi dīnhe| jācaka sakala ajācaka kīnhe||
siṃghāsana para tribhuana sāī| dekhi suranha duṃdubhīṃ bajāīṃ||
Meaning उन्होंने ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये और सम्पूर्ण याचकोंको अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। त्रिभुवनके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको [ अयोध्याके] सिंहासनपर [विराजित] देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये॥ ४॥
नभ दुंदुभी बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।
नाचहिं अपछरा बंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥
भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।
गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥
nabha duṃdubhī bājahiṃ bipula gaṃdharba kiṃnara gāvahīṃ|
nācahiṃ apacharā baṃda paramānaṃda sura muni pāvahīṃ||
bharatādi anuja bibhīṣanāṃgada hanumadādi sameta te|
gaheṃ chatra cāmara byajana dhanu asi carma sakti birājate||
Meaning आकाशगमें बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराओंके झुंड-के- झुंड नाच रहे हैं। देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी, विभीषण, अज्द, हनुमान् और सुग्रीव आदिसहित क्रमश: छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये हुए सुशोभित हैं॥ १॥
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छवि सोहई।
नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥
मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे।
अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥
śrī sahita dinakara baṃsa bhūṣana kāma bahu chavi sohaī|
nava aṃbudhara bara gāta aṃbara pīta sura mana mohaī||
mukuṭāṃgadādi bicitra bhūṣana aṃga aṃganhi prati saje|
aṃbhoja nayana bisāla ura bhuja dhanya nara nirakhaṃti je||
Meaning श्रीसीताजीसहित सूर्यवंशके विभूषण श्रीरामजीके शरीरमें अनेकों कामदेवोंकी छवि शोभा दे रही है। नवीन जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर श्याम शरीरपर पीताम्बर देवताओंके मनको भी मोहित कर रहा है। मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अज्भ-अज्में सजे हुए हैं। कमलके समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं; जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं॥ २॥
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ़ खगेस।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥ १२ (क )॥
vaha sobhā samāja sukha kahata na banai khagesa|
baranahiṃ sārada seṣa śruti so rasa jāna mahesa|| 12 (ka )||
Meaning हे पक्षिराज गरुड़जी ! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। सरस्वतीजी, शेषजी और वेद निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनन्द) महादेवजी ही जानते हैं॥ १२ (क)॥
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहेँँ श्रीराम॥ १२ (ख )॥
bhinna bhinna astuti kari gae sura nija nija dhāma|
baṃdī beṣa beda taba āe jahem̐m̐ śrīrāma|| 12 (kha )||
Meaning सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोकको चले गये। तब भाटोंका रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आये जहाँ श्रीरामजी थे॥ १२ (ख)॥
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।
लखेउ न काहूँ मरम कछू लगे करन गुन गान॥ १२ ( ग)॥
prabhu sarbagya kīnha ati ādara kṛpānidhāna|
lakheu na kāhūm̐ marama kachū lage karana guna gāna|| 12 ( ga)||
Meaning कृपानिधान सर्वज्ञ प्रभुने। उन्हें पहचानकर] उनका बहुत ही आदर किया। इसका भेद किसीने कुछ भी नहीं जाना। वेद गुणगान करने लगे॥ १२ (ग)॥
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥
jaya saguna nirguna rūpa rūpa anūpa bhūpa siromane|
dasakaṃdharādi pracaṃḍa nisicara prabala khala bhuja bala hane||
avatāra nara saṃsāra bhāra bibhaṃji dāruna dukha dahe|
jaya pranatapāla dayāla prabhu saṃjukta sakti namāmahe||
Meaning हे सगुण और निर्गुणरूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त ! हे राजाओंके शिरोमणि ! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरोंको अपनी भुजाओंके बलसे मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसारके भारको नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखोंको भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रभो ! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी )-सहित शक्तिमानू आपको नमस्कार करता हूँ॥ १॥
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥
tava biṣama māyā basa surāsura nāga nara aga jaga hare|
bhava paṃtha bhramata amita divasa nisi kāla karma gunani bhare||
je nātha kari karunā biloke tribidhi dukha te nirbahe|
bhava kheda chedana daccha hama kahum̐ raccha rāma namāmahe||
Meaning हे हरे! आपकी दुस्तर मायाके वशीभूत होनेके कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल, कर्म और गुणोंसे भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव ( आवागमन) के मार्गमें भटक रहे हैं। हे नाथ! इनमेंसे जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टिसे ) देख लिया, वे [मायाजनित] तीनों प्रकारके दुःखोंसे छूट गये। हे जन्म-मरणके श्रमको काटनेमें कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं॥ २॥
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥
je gyāna māna bimatta tava bhava harani bhakti na ādarī|
te pāi sura durlabha padādapi parata hama dekhata harī||
bisvāsa kari saba āsa parihari dāsa tava je hoi rahe|
japi nāma tava binu śrama tarahiṃ bhava nātha so samarāmahe||
Meaning जिन्होंने मिथ्या ज्ञानके अभिमानमें विशेषरूपसे मतवाले होकर जन्म-मृत्यु [ के भय] को हरनेवाली आपको भक्तिका आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ (देवताओंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदिके) पदको पाकर भी हम उस पदसे नीचे गिरते देखते हैं। [ परन्तु ] जो सब आशाओंको छोड़कर आपपर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागरसे तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥ ३॥
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी॥
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥
je carana siva aja pūjya raja subha parasi munipatinī tarī|
nakha nirgatā muni baṃditā treloka pāvani surasarī||
dhvaja kulisa aṃkusa kaṃja juta bana phirata kaṃṭaka kina lahe|
pada kaṃja dvaṃda mukuṃda rāma ramesa nitya bhajāmahe||
Meaning जो चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणोंकी कल्याणमयी रजका स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषिकी पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणोंके नखसे मुनियों द्वारा वन्दित, त्रेलोक्यको पवित्र करनेवाली देवनदी गड़ाजी निकलीं और ध्वजा, व्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नोंसे युक्त जिन चरणोंमें वनमें फिरते समय कॉँटे चुभ जानेसे घट्टे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलोंको नित्य भजते रहते हैं॥ ४॥
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥
abyaktamūlamanādi taru tvaca cāri nigamāgama bhane|
ṣaṭa kaṃdha sākhā paṃca bīsa aneka parna sumana ghane||
phala jugala bidhi kaṭu madhura beli akeli jehi āśrita rahe|
pallavata phūlata navala nita saṃsāra biṭapa namāmahe||
Meaning वेद-शास्त्रोंने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है; जो [प्रवाहरूपसे ] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत-से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकारके फल लगे हैं; जिसपर एक ही बेल है, जो उसीके आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसारवृक्षस्वरूप (विश्वरूपमें प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥ ५॥
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥
je brahma ajamadvaitamanubhavagamya manapara dhyāvahīṃ|
te kahahum̐ jānahum̐ nātha hama tava saguna jasa nita gāvahīṃ||
karunāyatana prabhu sadagunākara deva yaha bara māgahīṃ|
mana bacana karma bikāra taji tava carana hama anurāgahīṃ||
Meaning ब्रह्मा अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभवसे ही जाना जाता है और मनसे परे है--जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणाके धाम प्रभो ! हे सद्गुणोंकी खान ! हे देव ! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्मसे विकारोंको त्यागकर आपके चरणोंमें ही प्रेम करें॥ ६॥
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥ १३ (क )॥
saba ke dekhata bedanha binatī kīnhi udāra|
aṃtardhāna bhae puni gae brahma āgāra|| 13 (ka )||
Meaning वेदोंने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मललोकको चले गये॥ १३ (क)॥ .
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर॥ १३ (ख )॥
bainateya sunu saṃbhu taba āe jaham̐ raghubīra|
binaya karata gadagada girā pūrita pulaka sarīra|| 13 (kha )||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी! सुनिये, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ श्रीरघुवीर थे और गदूद वाणीसे स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावलीसे पूर्ण हो गया--॥ १३ (ख)॥
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥
jaya rāma ramāramanaṃ samanaṃ| bhava tāpa bhayākula pāhi janaṃ||
avadhesa suresa ramesa bibho| saranāgata māgata pāhi prabho||
Meaning हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकान्त) ! हे जन्म-मरणके संतापका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो; आवागमनके भयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कौजिये। हे अवधपति! हे देवताओंके स्वामी ! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये॥ १॥
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥
dasasīsa bināsana bīsa bhujā| kṛta dūri mahā mahi bhūri rujā||
rajanīcara bṛṃda pataṃga rahe| sara pāvaka teja pracaṃḍa dahe||
Meaning हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणका विनाश करके पृथ्वीके सब महान् रोगों (कष्टों को दूर करनेवाले श्रीरामजी ! राक्षससमूहरूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्िके प्रचण्ड तेजसे भस्म हो गये॥ २॥
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं॥
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी॥
mahi maṃḍala maṃḍana cārutaraṃ| dhṛta sāyaka cāpa niṣaṃga baraṃ||
mada moha mahā mamatā rajanī| tama puṃja divākara teja anī||
Meaning आप पृथ्वीमण्डलके अत्यन्त सुन्दर आभूषण हैं; आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किये हुए हैं। महान्ू मद, मोह और ममतारूपी रात्रिके अन्धकारसमूहके नाश करनेके लिये आप सूर्यके तेजोमय किरणसमूह हैं॥ ३॥
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे॥
manajāta kirāta nipāta kie| mṛga loga kubhoga sarena hie||
hati nātha anāthani pāhi hare| biṣayā bana pāvam̐ra bhūli pare||
Meaning कामदेवरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हदयमें कुभोगरूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। हे नाथ! हे [पाप-तापका हरण करनेवाले] हरे! उसे मारकर विषयरूपी वनमें भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवोंकी रक्षा कीजिये॥ ४॥
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते॥
bahu roga biyoganhi loga hae| bhavadaṃghri nirādara ke phala e||
bhava siṃdhu agādha pare nara te| pada paṃkaja prema na je karate||
Meaning लोग बहुत-से रोगों और वियोगों (दुःखों ) से मारे हुए हैं। ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं। जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं॥ ५॥
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥
ati dīna malīna dukhī nitahīṃ| jinha ke pada paṃkaja prīti nahīṃ||
avalaṃba bhavaṃta kathā jinha ke| priya saṃta anaṃta sadā tinha keṃ||
Meaning जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं। और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥ ६॥
नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥
nahiṃ rāga na lobha na māna madā| tinha keṃ sama baibhava vā bipadā||
ehi te tava sevaka hota mudā| muni tyāgata joga bharosa sadā||
Meaning उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद। उनको सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है। इसीसे मुनिलोग योग (साधन) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥ ७॥
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ॥
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही॥
kari prema niraṃtara nema liem̐| pada paṃkaja sevata suddha hiem̐||
sama māni nirādara ādarahī| saba saṃta sukhī bicaraṃti mahī||
Meaning वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं॥ ८॥
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥
muni mānasa paṃkaja bhṛṃga bhaje| raghubīra mahā ranadhīra aje||
tava nāma japāmi namāmi harī| bhava roga mahāgada māna arī||
Meaning हे मुनियोंके मनरूपी कमलके श्रमर ! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर ! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)। हे हरि! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरणरूपी रोगकी महान् औषध और अभिमानके शत्रु हैं॥ ९॥
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥
guna sīla kṛpā paramāyatanaṃ| pranamāmi niraṃtara śrīramanaṃ||
raghunaṃda nikaṃdaya dvaṃdvaghanaṃ| mahipāla bilokaya dīna janaṃ||
Meaning आप गुण, शील और कृपाके परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन ! [ आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि] द्वन्द्ध-समूहोंका नाश कीजिये। हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन् ! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये॥ १०॥
बार बार बर मागडउे हरघि देह श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥ १४ ( क )॥
bāra bāra bara māgaḍauे haraghi deha śrīraṃga|
pada saroja anapāyanī bhagati sadā satasaṃga|| 14 ( ka )||
Meaning मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सज्भ सदा प्राप्त हो। हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये॥ १४ (क)॥
लरनि उमापति राम गुन हरघि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास॥ १४ ( ख )॥
larani umāpati rāma guna haraghi gae kailāsa|
taba prabhu kapinha divāe saba bidhi sukhaprada bāsa|| 14 ( kha )||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये। तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये॥ १४ (ख)॥
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी॥
महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका॥
sunu khagapati yaha kathā pāvanī| tribidha tāpa bhava bhaya dāvanī||
mahārāja kara subha abhiṣekā| sunata lahahiṃ nara birati bibekā||
Meaning हे गरुड़जी ! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [ दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [ निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं॥ १॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥
je sakāma nara sunahiṃ je gāvahiṃ| sukha saṃpati nānā bidhi pāvahiṃ||
sura durlabha sukha kari jaga māhīṃ| aṃtakāla raghupati pura jāhīṃ||
Meaning और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगतमें देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं॥ २॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई॥
खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी॥
sunahiṃ bimukta birata aru biṣaī| lahahiṃ bhagati gati saṃpati naī||
khagapati rāma kathā maiṃ baranī| svamati bilāsa trāsa dukha haranī||
Meaning इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [ क्रमश: ] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखको हरनेवाली है॥ ३॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी॥
नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी॥
birati bibeka bhagati dṛṛha karanī| moha nadī kaham̐ suṃdara taranī||
nita nava maṃgala kausalapurī| haraṣita rahahiṃ loga saba kurī||
Meaning यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [ पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरीमें नित-नये मज़लोत्सव होते हैं। सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं॥ ४॥
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज॥
मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए॥
nita nai prīti rāma pada paṃkaja| sabakeṃ jinhahi namata siva muni aja||
maṃgana bahu prakāra pahirāe| dvijanha dāna nānā bidhi pāe||
Meaning श्रीरामजीके चरणकमलोंमें--जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं-- सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्चुकोंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये॥ ५॥
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।
जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥ १५॥
brahmānaṃda magana kapi saba keṃ prabhu pada prīti|
jāta na jāne divasa tinha gae māsa ṣaṭa bīti|| 15||
Meaning वानर सब ब्रह्मानन्दमें मग्र हैं। प्रभुके चरणोंमें सबका प्रेम है! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [बात-की-बातमें] छः महीने बीत गये॥ १५॥
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही॥
तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥
bisare gṛha sapanehum̐ sudhi nāhīṃ| jimi paradroha saṃta mana māhī||
taba raghupati saba sakhā bolāe| āi sabanhi sādara siru nāe||
Meaning उन लोगोंको अपने घर भूल ही गये। [ जाग्रतूकी तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्रमें भी घरकीो सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदरसहित सिर नवाया॥ १॥
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥
parama prīti samīpa baiṭhāre| bhagata sukhada mṛdu bacana ucāre||
tumha ati kīnha mori sevakāī| mukha para kehi bidhi karauṃ baṛāī||
Meaning बड़े ही प्रेमसे श्रीरामजीने उनको अपने पास बेठाया और भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे--तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ 2॥ २॥
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥
अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥
tāte mohi tumha ati priya lāge| mama hita lāgi bhavana sukha tyāge||
anuja rāja saṃpati baidehī| deha geha parivāra sanehī||
Meaning मेरे हितके लिये तुमलोगोंने घरों को तथा सब प्रकारके सुखोंको त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र--॥ ३॥
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥
सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥
saba mama priya nahiṃ tumhahi samānā| mṛṣā na kahaum̐ mora yaha bānā||
saba ke priya sevaka yaha nītī| moreṃ adhika dāsa para prītī||
Meaning ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभीको प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) है। [पर] मेरा तो दासपर [स्वाभाविक ही ] विशेष प्रेम है॥ ४॥
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दूढ़ नेम।
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहू अति प्रेम॥ १६॥
aba gṛha jāhu sakhā saba bhajehu mohi dūṛha nema|
sadā sarbagata sarbahita jāni karehū ati prema|| 16||
Meaning हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना॥ १६॥
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥
एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥
suni prabhu bacana magana saba bhae| ko hama kahām̐ bisari tana gae||
ekaṭaka rahe jori kara āge| sakahiṃ na kachu kahi ati anurāge||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्र हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं ? यह देहकी सुध भी भूल गयी। वे प्रभुके सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते॥ १॥
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा॥
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥
parama prema tinha kara prabhu dekhā| kahā bibidha bidhi gyāna biseṣā||
prabhu sanmukha kachu kahana na pārahiṃ| puni puni carana saroja nihārahiṃ||
Meaning प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञानका उपदेश दिया। प्रभुके सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं॥ २॥
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥
taba prabhu bhūṣana basana magāe| nānā raṃga anūpa suhāe||
sugrīvahi prathamahiṃ pahirāe| basana bharata nija hātha banāe||
Meaning तब प्रभुने अनेक रंगोंके अनुपम और सुन्दर गहने-कपड़े मँगवाये। सबसे पहले भरतजीने अपने हाथसे सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये॥ ३॥
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥
prabhu prerita lachimana pahirāe| laṃkāpati raghupati mana bhāe||
aṃgada baiṭha rahā nahiṃ ḍolā| prīti dekhi prabhu tāhi na bolā||
Meaning फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीने विभीषणजीको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगहसे हिलेतक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया॥ '४॥
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ।
हियें धरि राम रूप सब चले नाइ़ पद माथ॥ १७ (क )॥
jāmavaṃta nīlādi saba pahirāe raghunātha|
hiyeṃ dhari rāma rūpa saba cale nāi pada mātha|| 17 (ka )||
Meaning जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयोंमें श्रीरामचन्द्रजीके रूपको धारण करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले॥ १७ (क)॥
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहूँ प्रेम रस बोरि॥ १७ ( ख )॥
taba aṃgada uṭhi nāi siru sajala nayana kara jori|
ati binīta boleu bacana manahūm̐ prema rasa bori|| 17 ( kha )||
Meaning तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंगें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले॥ १७ (ख)॥
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥
मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥
sunu sarbagya kṛpā sukha siṃdho| dīna dayākara ārata baṃdho||
maratī bera nātha mohi bālī| gayau tumhārehi koṃcheṃ ghālī||
Meaning हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आरततोंके बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था॥ १॥
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥
asarana sarana biradu saṃbhārī| mohi jani tajahu bhagata hitakārī||
moreṃ tumha prabhu gura pitu mātā| jāum̐ kahām̐ taji pada jalajātā||
Meaning अत: हे भक्तोंके हितकारी ! अपना अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ 7॥ २॥
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥
tumhahi bicāri kahahu naranāhā| prabhu taji bhavana kāja mama kāhā||
bālaka gyāna buddhi bala hīnā| rākhahu sarana nātha jana dīnā||
Meaning हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है ? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये॥ ३॥
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥
nīci ṭahala gṛha kai saba karihaum̐| pada paṃkaja biloki bhava tarihaum̐||
asa kahi carana pareu prabhu pāhī| aba jani nātha kahahu gṛha jāhī||
Meaning मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [और बोले--] हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये। हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा॥ ४॥
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।
प्रभु उठाइ उर लायउठ सजल नयन राजीव॥ १८ (क )॥
aṃgada bacana binīta suni raghupati karunā sīṃva|
prabhu uṭhāi ura lāyauṭha sajala nayana rājīva|| 18 (ka )||
Meaning अद्भदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें। प्रेमाश्रुओोंका] जल भर आया॥ १८ (क)॥
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ़।
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥ १८ ( ख )॥
nija ura māla basana mani bālitanaya pahirāi|
bidā kīnhi bhagavāna taba bahu prakāra samujhāi|| 18 ( kha )||
Meaning तब भगवान्ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि (रत्नोंके आभूषण) बालि-पुत्र अड़दको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की॥ १८ (ख)॥