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(_ __ uttarakāeḍa
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।
पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥ १॥
kekīkaṇṭhābhanīlaṃ suravaravilasadviprapādābjacihnaṃ śobhāḍhyaṃ pītavastraṃ sarasijanayanaṃ sarvadā suprasannam|
pāṇau nārācacāpaṃ kapinikarayutaṃ bandhunā sevyamānaṃ naumīḍyaṃ jānakīśaṃ raghuvaramaniśaṃ puṣpakārūḍharāmam|| 1||
Meaning मोरके कण्ठकी आभाके समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओंमें श्रेष्ठ, ब्राह्मण ( भृगुजी) के चरणकमलके चिह्से सुशोभित, शोभासे पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथोंमें बाण और धनुष धारण किये हुए, वानरसमूहसे युक्त, भाई लक्ष्मणजीसे सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजीके पति, रघुकुलतश्रेष्ठ, पुष्पकविमानपर सवार श्रीरामचन्द्रजीको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ॥ १॥
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥ २॥
kosalendrapadakañjamañjulau komalāvajamaheśavanditau|
jānakīkarasarojalālitau cintakasya manabhṛṅgasaṅginau|| 2||
Meaning कोसलपुरीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं, श्रीजनकीजीके करकमलोंसे दुलराये हुए हैं और चिन्तन करनेवालेके मनरूपी भौरिके नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करनेवालोंका मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलों में बसा रहता है॥ २॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम्॥ ३॥
kundaindudaragaurasundaraṃ ambikāpatimabhīṣṭasiddhidam|
kāruṇīkakalakañjalocanaṃ naumi śaṅkaramanaṅgamocanam|| 3||
Meaning कुन्दके फूल, चन्द्रमा और शज्धके समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजीके पति, वाज्छित फलके देनेवाले, [ दुःखियोंपर सदा] दया करनेवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवसे छुड़ानेवाले, [कल्याणकारी] श्रीशड्टरजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३॥
रहां एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहेँ सोचहिं नारि नर कृूस तन राम बियोग॥
rahāṃ eka dina avadhi kara ati ārata pura loga|
jaham̐ tahem̐ socahiṃ nāri nara kṛूsa tana rāma biyoga||
Meaning [ श्रीरामजीके लौटनेकी] अवधिका एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगरके लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। रामके वियोगमें दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं [कि क्या बात है, श्रीरामजी क्यों नहीं आये]।
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुं फेर॥
saguna hohiṃ suṃdara sakala mana prasanna saba kera|
prabhu āgavana janāva janu nagara ramya cahuṃ phera||
Meaning इतनेमें ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर भी चारों ओरसे रमणीक हो गया। मानो ये सब-के-सब चिह्न प्रभुके [शुभ] आगमनको जना रहे हैं।
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।
आयउ प्रभु श्री अनुजजुत कहन चहत अब कोइ॥
kausalyādi mātu saba mana anaṃda asa hoi|
āyau prabhu śrī anujajuta kahana cahata aba koi||
Meaning कौसल्या आदि सब माताओंके मनमें ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ गये।
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
bharata nayana bhuja dacchina pharakata bārahiṃ bāra|
jāni saguna mana haraṣa ati lāge karana bicāra||
Meaning भरतजीकी दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे-
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥
raheu eka dina avadhi adhārā| samujhata mana dukha bhayau apārā||
kārana kavana nātha nahiṃ āyau| jāni kuṭila kidhauṃ mohi bisarāyau||
Meaning प्राणोंकी आधाररूप अवधिका एक ही दिन शेष रह गया। यह सोचते ही भरतजीके मनमें अपार दु:ख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये ? प्रभुने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया?॥ १॥
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥
ahaha dhanya lachimana baṛabhāgī| rāma padārabiṃdu anurāgī||
kapaṭī kuṭila mohi prabhu cīnhā| tāte nātha saṃga nahiṃ līnhā||
Meaning अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दके प्रेमी हैं ( अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभुने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथने मुझे साथ नहीं लिया!॥ २॥
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥
jauṃ karanī samujhai prabhu morī| nahiṃ nistāra kalapa sata korī||
jana avaguna prabhu māna na kāū| dīna baṃdhu ati mṛdula subhāū||
Meaning [बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ ( असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता। [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं॥ ३॥
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥
mori jiyam̐ bharosa dṛṛha soī| milihahiṃ rāma saguna subha hoī||
bīteṃ avadhi rahahi jauṃ prānā| adhama kavana jaga mohi samānā||
Meaning अतएव मेरे हृदयमें ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [ क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगतमें मेरे समान नीच कौन होगा?॥ ४॥
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ ( क )॥
rāma biraha sāgara maham̐ bharata magana mana hota|
bipra rūpa dhari pavanasuta āi gayau janu pota|| 1 ( ka )||
Meaning श्रीरामजीके विरह-समुद्रमें भरतजीका मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी ब्राह्मणका रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [उन्हें डूबनेसे बचानेके लिये] नाव आ गयी हो॥ १ (क)॥
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कूस गात।
राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात॥ 9 ( ख ))॥
baiṭhe dekhi kusāsana jaṭā mukuṭa kūsa gāta|
rāma rāma raghupati japata stravata nayana jalajāta|| 9 ( kha ))||
Meaning हनुमान्जीने दुर्बलशरीर भरतजीको जटाओंका मुकुट बनाये, राम! राम! रघुपति! जपते और कमलके समान नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका] जल बहाते कुशके आसनपर बैठे देखा॥ १ (ख)॥
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥
dekhata hanūmāna ati haraṣeu| pulaka gāta locana jala baraṣeu||
mana maham̐ bahuta bhām̐ti sukha mānī| boleu śravana sudhā sama bānī||
Meaning उन्हें देखते ही हनुमानजी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका जल बरसने लगा। मनमें बहुत प्रकारसे सुख मानकर वे कानोंके लिये अमृतके समान वाणी बोले--॥ १॥
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥
jāsu biraham̐ socahu dina rātī| raṭahu niraṃtara guna gana pām̐tī||
raghukula tilaka sujana sukhadātā| āyau kusala deva muni trātā||
Meaning जिनके विरहमें आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण-समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुलके तिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियोंके रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये॥ २॥
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥
ripu rana jīti sujasa sura gāvata| sītā sahita anuja prabhu āvata||
sunata bacana bisare saba dūkhā| tṛṣāvaṃta jimi pāi piyūṣā||
Meaning शत्रुको रणमें जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही [ भरतजीको] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःखको भूल जाय॥ ३॥
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥
ko tumha tāta kahām̐ te āe| mohi parama priya bacana sunāe||
māruta suta maiṃ kapi hanumānā| nāmu mora sunu kṛpānidhānā||
Meaning [ भरतजीने पूछा--] हे तात! तुम कौन हो ? और कहाँसे आये हो? [जो] तुमने मुझको [ये] परम प्रिय ( अत्यन्त आनन्द देनेवाले ) वचन सुनाये। [ हनुमानूजीने कहा-- हे कृपानिधान ! सुनिये, मैं पवनका पुत्र और जातिका वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है॥ ४॥
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता॥
dīnabaṃdhu raghupati kara kiṃkara| sunata bharata bheṃṭeu uṭhi sādara||
milata prema nahiṃ hṛdayam̐ samātā| nayana stravata jala pulakita gātā||
Meaning मैं दीनोंके बन्धु श्रीरघुनाथजीका दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदयमें नहीं समाता। नेत्रोंसे [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया॥ ५॥
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥
kapi tava darasa sakala dukha bīte| mile āju mohi rāma pirīte||
bāra bāra būjhī kusalātā| to kahum̐ deum̐ kāha sunu bhrātā||
Meaning [ भरतजीने कहा--] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शनसे मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दु:ःखोंका अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूपमें] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजीने बार-बार कुशल पूछी [और कहा-] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवादके बदलेमें] तुम्हें क्या दूँ?2॥ ६॥
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥
ehi saṃdesa sarisa jaga māhīṃ| kari bicāra dekheum̐ kachu nāhīṃ||
nāhina tāta urina maiṃ tohī| aba prabhu carita sunāvahu mohī||
Meaning इस सन्देशके समान (इसके बदलेमें देने लायक पदार्थ) जगतमें कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिये] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभुका चरित्र (हाल) सुनाओ॥ ७॥
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥
taba hanumaṃta nāi pada māthā| kahe sakala raghupati guna gāthā||
kahu kapi kabahum̐ kṛpāla gosāīṃ| sumirahiṃ mohi dāsa kī nāīṃ||
Meaning तब हनुमान्ूजीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही। [ भरतजीने पूछा-- हे हनुमान् ! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दासकी तरह याद भी करते हैं ?॥ ८॥
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहूँ मम सुमिरन करथो।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि परच्यो॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होड़ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
nija dāsa jyoṃ raghubaṃsabhūṣana kabahūm̐ mama sumirana karatho|
suni bharata bacana binīta ati kapi pulaki tana carananhi paracyo||
raghubīra nija mukha jāsu guna gana kahata aga jaga nātha jo|
kāhe na hoṛa binīta parama punīta sadaguna siṃdhu so||
Meaning रघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं ? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमानजी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मनमें विचारने लगे कि] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुबीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणोंके समुद्र क्यों न हों ?
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हदयें समात॥ २ (क )॥
rāma prāna priya nātha tumha satya bacana mama tāta|
puni puni milata bharata suni haraṣa na hadayeṃ samāta|| 2 (ka )||
Meaning [ हनुमानूजीने कहा--] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हदयमें हर्ष समाता नहीं है॥ २ (क)॥
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयठ कपि राम पहिं।
कही कुसल सब जाइ हरघि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥ २ ( ख )॥
bharata carana siru nāi turita gayaṭha kapi rāma pahiṃ|
kahī kusala saba jāi haraghi caleu prabhu jāna caṛhi|| 2 ( kha )||
Meaning फिर भरतजीके चरणों में सिर नवाकर हनुमानजी तुरंत ही श्रीरामजीके पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमानपर चढ़कर चले॥ २ (ख)॥
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥
haraṣi bharata kosalapura āe| samācāra saba gurahi sunāe||
puni maṃdira maham̐ bāta janāī| āvata nagara kusala raghurāī||
Meaning इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरीमें आये और उन्होंने गुरुजीको सब समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं॥ १॥
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई॥
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥
sunata sakala jananīṃ uṭhi dhāīṃ| kahi prabhu kusala bharata samujhāī||
samācāra purabāsinha pāe| nara aru nāri haraṣi saba dhāe||
Meaning खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजीने प्रभुकी कुशल कहकर सबको समझाया। नगरनिवासियोंने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े॥ २॥
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी॥
dadhi durbā rocana phala phūlā| nava tulasī dala maṃgala mūlā||
bhari bhari hema thāra bhāminī| gāvata caliṃ siṃdhu siṃdhuragāminī||
Meaning [ श्रीरामजीके स्वागतके लिये] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मज़लके मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [उन्हें लेकर] गाती हुई चलीं॥ ३॥
जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥
je jaisehiṃ taisehiṃ uṭi dhāvahiṃ| bāla bṛddha kaham̐ saṃga na lāvahiṃ||
eka ekanha kaham̐ būjhahiṃ bhāī| tumha dekhe dayāla raghurāī||
Meaning जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशामें हैं) वे वैसे ही (वर्हींसे उसी दशामें) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जानेके डरसे] बालकों और बूढ़ोंको कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरेसे पूछते हैं--भाई ! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है ?॥ ४॥
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥
avadhapurī prabhu āvata jānī| bhaī sakala sobhā kai khānī||
bahai suhāvana tribidha samīrā| bhai sarajū ati nirmala nīrā||
Meaning प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयीं ( अर्थात् सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया)॥ ५॥
हरघित गुर परिजन अनुज भूसुर बुंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥ ३ (क )॥
haraghita gura parijana anuja bhūsura buṃda sameta|
cale bharata mana prema ati sanmukha kṛpāniketa|| 3 (ka )||
Meaning गुरु वसिष्टजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणोंके समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मनसे कृपाधाम श्रीरामजीके सामने (अर्थात् उनकी अगवानीके लिये) चले॥ ३ (क)॥
बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥ ३ (ख )॥
bahutaka caṛhīṃ aṭārinha nirakhahiṃ gagana bimāna|
dekhi madhura sura haraṣita karahiṃ sumaṃgala gāna|| 3 (kha )||
Meaning बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ीं आकाशमें विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वरसे सुन्दर मज़लगीत गा रही हैं॥ ३ (ख)॥
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥ ३ (ग)॥
rākā sasi raghupati pura siṃdhu dekhi haraṣāna|
baṛhyo kolāhala karata janu nāri taraṃga samāna|| 3 (ga)||
Meaning श्रीरघुनाथजी पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है [इधर-उधर दौड़ती हुई] स्त्रियाँ उसकी तरज्लोंके समान लगती हैं॥ ३ (ग)॥
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥
ihām̐ bhānukula kamala divākara| kapinha dekhāvata nagara manohara||
sunu kapīsa aṃgada laṃkesā| pāvana purī rucira yaha desā||
Meaning यहाँ (विमानपरसे) सूर्यकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [वे कहते हैं--] हे सुग्रीव ! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण ! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है॥ १॥
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥
jadyapi saba baikuṃṭha bakhānā| beda purāna bidita jagu jānā||
avadhapurī sama priya nahiṃ soū| yaha prasaṃga jānai kou koū||
Meaning यद्यपि सबने वैकुण्ठकी बड़ाई की है--यह वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है। यह बात ( भेद) कोई-कोई (विरले ही) जानते हैं॥ २॥
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥
janmabhūmi mama purī suhāvani| uttara disi baha sarajū pāvani||
jā majjana te binahiṃ prayāsā| mama samīpa nara pāvahiṃ bāsā||
Meaning यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशामें [ जीवोंको ] पवित्र करनेवाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्रान करनेसे मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास ( सामीप्य मुक्ति ) पा जाते हैं॥ ३॥
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥
ati priya mohi ihām̐ ke bāsī| mama dhāmadā purī sukha rāsī||
haraṣe saba kapi suni prabhu bānī| dhanya avadha jo rāma bakhānī||
Meaning यहाँके निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुखकी राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवधकी स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है॥ ४॥
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेड उतरे भूमि बिमान॥ ४ ( क )॥
āvata dekhi loga saba kṛpāsiṃdhu bhagavāna|
nagara nikaṭa prabhu prereḍa utare bhūmi bimāna|| 4 ( ka )||
Meaning कृपासागर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगोंको आते देखा, तो प्रभुने विमानको नगरके समीप उतरनेकी प्रेरणा की। तब वह पृथ्वीपर उतरा॥ ४ (क)॥
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरघषु बिरहु अति ताहु॥ ४ (ख )॥
utari kaheu prabhu puṣpakahi tumha kubera pahiṃ jāhu|
prerita rāma caleu so haraghaṣu birahu ati tāhu|| 4 (kha )||
Meaning विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेरके पास जाओ। श्रीरामजीकी प्रेरणासे वह चला; उसे [ अपने स्वामीके पास जानेका] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी॥ ४ (ख)॥
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा॥
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक॥
āe bharata saṃga saba logā| kṛsa tana śrīraghubīra biyogā||
bāmadeva basiṣṭha munināyaka| dekhe prabhu mahi dhari dhanu sāyaka||
Meaning भरतजीके साथ सब लोग आये। श्रीरघुवीरके वियोगसे सबके शरीर दुबले हो रहे हैं। प्रभुने वामदेव, वसिष्ट आदि मुनिश्रेष्ठांको देखा, तो उन्होंने धनुष-बाण पृथ्वीपर रखकर--॥ १॥
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया॥
dhāi dhare gura carana saroruha| anuja sahita ati pulaka tanoruha||
bheṃṭi kusala būjhī munirāyā| hamareṃ kusala tumhārihiṃ dāyā||
Meaning छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित दौड़कर गुरुजीके चरणकमल पकड़ लिये; उनके रोम-रोम अत्यन्त पुलकित हो रहे हैं। मुनिराज वसिष्टजीने [उठाकर] उन्हें गले लगाकर कुशल पूछी। [प्रभुने कहा--] आपहीकी दयामें हमारी कुशल है॥ २॥
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज॥
sakala dvijanha mili nāyau māthā| dharma dhuraṃdhara raghukulanāthā||
gahe bharata puni prabhu pada paṃkaja| namata jinhahi sura muni saṃkara aja||
Meaning धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामजीने सब ब्राह्मणोंसे मिलकर उन्हें मस्तक नवाया। फिर भरतजीने प्रभुके वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शड्भरजी और ब्रह्माजी [ भी ] नमस्कार करते हैं॥ ३॥
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥
pare bhūmi nahiṃ uṭhata uṭhāe| bara kari kṛpāsiṃdhu ura lāe||
syāmala gāta roma bhae ṭhāṛhe| nava rājīva nayana jala bāṛhe||
Meaning भरतजी पृथ्वीपर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजीने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। [उनके] साँवले शरीरपर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमलके समान नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंके] जलकी बाढ़ आ गयी॥ ४॥
राजीव लोचन स्त्वत जल तन ललित पुलकावलि बनी।
अति प्रेम हदयें लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥
rājīva locana stvata jala tana lalita pulakāvali banī|
ati prema hadayeṃ lagāi anujahi mile prabhu tribhuana dhanī||
prabhu milata anujahi soha mo pahiṃ jāti nahiṃ upamā kahī|
janu prema aru siṃgāra tanu dhari mile bara suṣamā lahī||
Meaning कमलके समान नेत्रोंसे जल बह रहा है। सुन्दर शरीरमें पुलकावली [ अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकीके स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरतजीको अत्यन्त प्रेमसे हृदयसे लगाकर मिले। भाईसे मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और श्रंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त हुए॥ १॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावढ॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥
būjhata kṛpānidhi kusala bharatahi bacana begi na āvaī|
sunu sivā so sukha bacana mana te bhinna jāna jo pāvaḍha||
aba kusala kausalanātha ārata jāni jana darasana diyo|
būṛata biraha bārīsa kṛpānidhāna mohi kara gahi liyo||
Meaning कृपानिधान श्रीरामजी भरतजीसे कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजीने कहा-- हे पार्वती! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजीको मिल रहा था) वचन और मनसे परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [ भरतजीने कहा--] हे कोसलनाथ! आपने आर्त (दुःखी) जानकर दासको दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको कृपानिधानने हाथ पकड़कर बचा लिया!॥ २॥
पुनि प्रभु हरघषि सच्रुहन भेंटे हृदय लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥ ५॥
puni prabhu haraghaṣi sacruhana bheṃṭe hṛdaya lagāi|
lachimana bharata mile taba parama prema dou bhāi|| 5||
Meaning फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगाकर उनसे मिले। तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेमसे मिले॥ ५॥
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥
bharatānuja lachimana puni bheṃṭe| dusaha biraha saṃbhava dukha meṭe||
sītā carana bharata siru nāvā| anuja sameta parama sukha pāvā||
Meaning फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजीसे गले लगकर मिले और इस प्रकार विरहसे उत्पन्न दुःसह दुःखका नाश किया। फिर भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजीने सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया॥ १॥
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥
prabhu biloki haraṣe purabāsī| janita biyoga bipati saba nāsī||
premātura saba loga nihārī| kautuka kīnha kṛpāla kharārī||
Meaning प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोगसे उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गये। सब लोगोंको प्रेमविह्लल [ और मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर] देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया॥ २॥
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला॥
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥
amita rūpa pragaṭe tehi kālā| jathājoga mile sabahi kṛpālā||
kṛpādṛṣṭi raghubīra bilokī| kie sakala nara nāri bisokī||
Meaning उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे [ एक ही साथ] यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब नर-नारियोंको शोकसे रहित कर दिया॥ ३॥
छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥
chana mahiṃ sabahi mile bhagavānā| umā marama yaha kāhum̐ na jānā||
ehi bidhi sabahi sukhī kari rāmā| āgeṃ cale sīla guna dhāmā||
Meaning भगवान् क्षणमात्रमें सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसीने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणोंके धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े॥ ४॥
कौसल्यादि मातु सब धाई।
निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई॥
kausalyādi mātu saba dhāī| nirakhi baccha janu dhenu lavāī||
Meaning कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ी हों॥ ५॥
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहें चरन बन परबस गईं।
दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भं॥
अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥
janu dhenu bālaka baccha taji gṛheṃ carana bana parabasa gaīṃ|
dina aṃta pura rukha stravata thana huṃkāra kari dhāvata bhaṃ||
ati prema prabhu saba mātu bheṭīṃ bacana mṛdu bahubidhi kahe|
gai biṣama bipati biyogabhava tinha haraṣa sukha aganita lahe||
Meaning मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ोंको घरपर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयी हों और दिनका अन्त होनेपर [ बछड़ोंसे मिलनेके लिये] हुंकार करके थनसे दूध गिराती हुई नगरकी ओर दौड़ी हों। प्रभुने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकारके कोमल वचन कहे। वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [ भगवान्से मिलकर और उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।
भेटेड तनय सुमित्रा राम चरन रति जानि।
रामहि मिलत कैकई हदयें बहुत सकुचानि॥ ६ ( क )॥
bheṭeḍa tanaya sumitrā rāma carana rati jāni|
rāmahi milata kaikaī hadayeṃ bahuta sakucāni|| 6 ( ka )||
Meaning सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदयमें बहुत सकुचायीं॥ ६ (क)॥
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।
कैकड़ कहें पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥ ६ ( ख )॥
lachimana saba mātanha mili haraṣe āsiṣa pāi|
kaikaṛa kaheṃ puni puni mile mana kara chobhu na jāi|| 6 ( kha )||
Meaning लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजीसे बार- बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ (रोष) नहीं जाता॥ ६ (ख)॥
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥
sāsunha sabani milī baidehī| carananhi lāgi haraṣu ati tehī||
dehiṃ asīsa būjhi kusalātā| hoi acala tumhāra ahivātā||
Meaning जानकीजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो॥ १॥
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं।
मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥
saba raghupati mukha kamala bilokahiṃ| maṃgala jāni nayana jala rokahiṃ||
Meaning सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं। [नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं, परन्तु] मज़लका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंगें ही रोक रखती हैं। सोनेके थालसे
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥
nānā bhām̐ti nichāvari karahīṃ| paramānaṃda haraṣa ura bharahīṃ||
kausalyā puni puni raghubīrahi| citavati kṛpāsiṃdhu ranadhīrahi||
Meaning अनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं॥ ३॥
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥
hṛdayam̐ bicārati bārahiṃ bārā| kavana bhām̐ti laṃkāpati mārā||
ati sukumāra jugala mere bāre| nisicara subhaṭa mahābala bhāre||
Meaning वे बार-बार हृदयमें विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावणको कैसे मारा ? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान् बली थे॥ ४॥
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥ ७॥
lachimana aru sītā sahita prabhuhi bilokati mātu|
paramānaṃda magana mana puni puni pulakita gātu|| 7||
Meaning लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्दमें मग्र है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है॥७॥
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥
laṃkāpati kapīsa nala nīlā| jāmavaṃta aṃgada subhasīlā||
hanumadādi saba bānara bīrā| dhare manohara manuja sarīrā||
Meaning लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमानजी आदि सभी उत्तम स्वभाववाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये॥ १॥
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती॥
bharata saneha sīla brata nemā| sādara saba baranahiṃ ati premā||
dekhi nagarabāsinha kai rītī| sakala sarāhahi prabhu pada prītī||
Meaning वे सब भरतजीके प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [ त्यागके] व्रत और नियमोंकी अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियोंकी [ प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं॥ २॥
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥
puni raghupati saba sakhā bolāe| muni pada lāgahu sakala sikhāe||
gura basiṣṭa kulapūjya hamāre| inha kī kṛpām̐ danuja rana māre||
Meaning फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनिके चरणोंमें लगो। ये गुरु वसिष्टजी हमारे कुलभरके पूज्य हैं। इन्हींकी कृपासे रणमें राक्षस मारे गये हैं॥ ३॥
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥
e saba sakhā sunahu muni mere| bhae samara sāgara kaham̐ bere||
mama hita lāgi janma inha hāre| bharatahu te mohi adhika piāre||
Meaning [ फिर गुरुजीसे कहा--] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्रमें मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हितके लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये ( अपने प्राणोंतकको होम दिया)। ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं॥ ४॥
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए।
निमिष निमिष उपजत सुख नए॥
suni prabhu bacana magana saba bhae| nimiṣa nimiṣa upajata sukha nae||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्दमें मग्र हो गये। इस प्रकार पल-पलमें उन्हें नये- नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं॥५॥
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन््ह नायउ माथ।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥ ८ ( क )॥
kausalyā ke carananhi puni tinha nāyau mātha|
āsiṣa dīnhe haraṣi tumha priya mama jimi raghunātha|| 8 ( ka )||
Meaning फिर उन लोगोंने कौसल्याजीके चरणों में मस्तक नवाये। कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [और कहा--] तुम मुझे रघुनाथके समान प्यारे हो॥८ (क)॥
सुमन बुष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बूंद॥८ (ख )॥
sumana buṣṭi nabha saṃkula bhavana cale sukhakaṃda|
caṛhī aṭārinha dekhahiṃ nagara nāri nara būṃda||8 (kha )||
Meaning आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महलको चले, आकाश फूलोंकी वृष्टिसे छा गया। नगरके स्त्री- पुरुषोंके समूह अटारियोंपर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं॥ ८ (ख)॥
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥
kaṃcana kalasa bicitra sam̐vāre| sabahiṃ dhare saji nija nija dvāre||
baṃdanavāra patākā ketū| sabanhi banāe maṃgala hetū||
Meaning सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [ मणि-रत्नादिसे] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने- अपने दरवाजोंपर रख लिया। सब लोगोंने मज़लके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं॥ १॥
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई॥
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥
bīthīṃ sakala sugaṃdha siṃcāī| gajamani raci bahu cauka purāī||
nānā bhām̐ti sumaṃgala sāje| haraṣi nagara nisāna bahu bāje||
Meaning सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं। अनेकों प्रकारके सुन्दर मड़ल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से डंके बजने लगे॥ २॥
जहँ तहँ नारि निछावर करहीं।
देहिं असीस हरष उर भरहीं॥
jaham̐ taham̐ nāri nichāvara karahīṃ| dehiṃ asīsa haraṣa ura bharahīṃ||
Meaning स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती
पुर सोभा संपति कल्याना।
निगम सेष सारदा बखाना॥
pura sobhā saṃpati kalyānā| nigama seṣa sāradā bakhānā||
Meaning वे आर्तिहर (दुःखोंको हरनेवाले) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य सरस्वतीजी वर्णन करते हैं--॥ ४॥
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं।
उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥
teu yaha carita dekhi ṭhagi rahahīṃ| umā tāsu guna nara kimi kahahīṃ||
Meaning परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं)। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं॥ ५॥
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।
अस्त भरएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥ ९ ( क )॥
nāri kumudinīṃ avadha sara raghupati biraha dinesa|
asta bharaem̐ bigasata bhaīṃ nirakhi rāma rākesa|| 9 ( ka )||
Meaning स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं]। अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं॥ ९ (क)॥
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान॥ ९ (ख)॥
hohiṃ saguna subha bibidha bidhi bājahiṃ gagana nisāna|
pura nara nāri sanātha kari bhavana cale bhagavāna|| 9 (kha)||
Meaning अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। नगरके पुरुषों और स्थ्रियोंको सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले॥ ९ (ख)॥
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥
prabhu jānī kaikeī lajānī| prathama tāsu gṛha gae bhavānī||
tāhi prabodhi bahuta sukha dīnhā| puni nija bhavana gavana hari kīnhā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्नित हो गयी हैं। [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरिनि अपने महलको गमन किया॥ १॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई॥
kṛpāsiṃdhu jaba maṃdira gae| pura nara nāri sukhī saba bhae||
gura basiṣṭa dvija lie bulāī| āju sugharī sudina samudāī||
Meaning कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री -पुरुष सब सुखी हुए। गुरु वसिष्ट जीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [ और कहा--] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं॥ २॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥
saba dvija dehu haraṣi anusāsana| rāmacaṃdra baiṭhahiṃ siṃghāsana||
muni basiṣṭa ke bacana suhāe| sunata sakala bipranha ati bhāe||
Meaning आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों। वसिष्ट मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे॥ ३॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै॥
kahahiṃ bacana mṛdu bipra anekā| jaga abhirāma rāma abhiṣekā||
aba munibara bilaṃba nahiṃ kīje| mahārāja kaham̐ tilaka karījai||
Meaning वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये॥ ४॥
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत संँवारे जाइ॥ १० (क )॥
taba muni kaheu sumaṃtra sana sunata caleu haraṣāi|
ratha aneka bahu bāji gaja turata saṃm̐vāre jāi|| 10 (ka )||
Meaning तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० (क)॥
जहें तहँं धावन पठड़ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिर नायठ आइ॥ १० (ख )॥
jaheṃ taham̐ṃ dhāvana paṭhaṛa puni maṃgala drabya magāi|
haraṣa sameta basiṣṭa pada puni sira nāyaṭha āi|| 10 (kha )||
Meaning और जहाँ-तहाँ [ सूचना देनेवाले] दूतोंको भेजकर माज़लिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर वसिष्टजीके चरणोंमें सिर नवाया॥ १० (ख)॥
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥
राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥
avadhapurī ati rucira banāī| devanha sumana bṛṣṭi jhari lāī||
rāma kahā sevakanha bulāī| prathama sakhanha anhavāvahu jāī||
Meaning अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्तरान कराओ॥ १॥
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥
sunata bacana jaham̐ taham̐ jana dhāe| sugrīvādi turata anhavāe||
puni karunānidhi bharatu ham̐kāre| nija kara rāma jaṭā niruāre||
Meaning भगवान्के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्त्रान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया॥ २॥
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥
anhavāe prabhu tīniu bhāī| bhagata bachala kṛpāla raghurāī||
bharata bhāgya prabhu komalatāī| seṣa koṭi sata sakahiṃ na gāī||
Meaning तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरचुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्तान कराया। भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ ३॥
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥
puni nija jaṭā rāma bibarāe| gura anusāsana māgi nahāe||
kari majjana prabhu bhūṣana sāje| aṃga anaṃga dekhi sata lāje||
Meaning फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर ख्रान किया। स्रान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अड्ञोंको देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये॥ ४॥
सासुन्ह सादर जानकिहि मजन तुरत कराइ।
दिव्य बसन बर भूषन अंग अंग सजे बनाइ॥ ११ (क )॥
sāsunha sādara jānakihi majana turata karāi|
divya basana bara bhūṣana aṃga aṃga saje banāi|| 11 (ka )||
Meaning [इधर] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्रान कराके उनके आअज्-अआज़में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये (पहना दिये)॥ ११ (क)॥