तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ॥ ११७ (ख )॥
taba bigyānarūpini buddhi bisada ghṛta pāi|
citta diā bhari dharai dṛṛha samatā diaṭi banāi|| 117 (kha )||
Meaning तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ज्ञानरूपी] निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दियेको भरकर, समताकी दीवट बनाकर, उसपर उसे दूढ़तापूर्वक (जमाकर) रखे॥ ११७ (ख)॥
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥ ११७ ( ग )॥
tīni avasthā tīni guna tehi kapāsa teṃ kāṛhi|
tūla turīya sam̐vāri puni bātī karai sugāṛhi|| 117 ( ga )||
Meaning [ जाग्रतू, स्वप्र और सुषुप्ति] तीनों अवस्थाएँ और [सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रूईको निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे॥ ११७ (ग)॥
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥
ehi bidhi lesai dīpa teja rāsi bigyānamaya|
jātahiṃ jāsu samīpa jarahiṃ madādika salabha saba||
Meaning इस प्रकार तेजकी राशि विज्ञानमय दीपकको जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायँ॥ ११७ (घ)॥
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥
sohamasmi iti bṛtti akhaṃḍā| dīpa sikhā soi parama pracaṃḍā||
ātama anubhava sukha suprakāsā| taba bhava mūla bheda bhrama nāsā||
Meaning 'सोडहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली ) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपककी] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसारके मूल भेदरूपी भ्रमका नाश हो जाता है,॥ १॥
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥
prabala abidyā kara parivārā| moha ādi tama miṭai apārā||
taba soi buddhi pāi um̐jiārā| ura gṛham̐ baiṭhi graṃthi niruārā||
Meaning और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही (विज्ञानरूपिणी ) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाशकों पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़- चेतनकी गाँठको खोलती है॥ २॥
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥
छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥
chorana graṃthi pāva jauṃ soī| taba yaha jīva kṛtāratha hoī||
chorata graṃthi jāni khagarāyā| bighna aneka karai taba māyā||
Meaning यदि वह (विज्ञानरूपिणी बुद्धि) उस गाँठको खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विप्न करती है॥ ३॥
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई॥
कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा॥
riddhi siddhi prerai bahu bhāī| buddhahi lobha dikhāvahiṃ āī||
kala bala chala kari jāhiṃ samīpā| aṃcala bāta bujhāvahiṃ dīpā||
Meaning हे भाई! वह बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजती है, जो आकर बुद्धिको लोभ दिखाती हैं। और वे ऋद्धि-सिद्धियाँ कल (कला), बल और छल करके समीप जाती और आँचलकी वायुसे उस ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देती हैं॥ ४॥
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥
जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥
hoi buddhi jauṃ parama sayānī| tinha tana citava na anahita jānī||
jauṃ tehi bighna buddhi nahiṃ bādhī| tau bahori sura karahiṃ upādhī||
Meaning यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन (ऋद्धि-सिद्धियों) को अहितकर (हानिकर) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं। इस प्रकार यदि मायाके विश्नोंसे बुद्धिको बाधा न हुई, तो फिर देवता उपाधि (विप्न) करते हैं॥५॥
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥
आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी॥
iṃdrīṃ dvāra jharokhā nānā| taham̐ taham̐ sura baiṭhe kari thānā||
āvata dekhahiṃ biṣaya bayārī| te haṭhi dehī kapāṭa ughārī||
Meaning इन्द्रियोंके द्वार हदयरूपी घरके अनेकों झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखेपर) देवता थाना किये (अड्डा जमाकर) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको आते देखते हैं त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं॥ ६॥
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥
jaba so prabhaṃjana ura gṛham̐ jāī| tabahiṃ dīpa bigyāna bujhāī||
graṃthi na chūṭi miṭā so prakāsā| buddhi bikala bhai biṣaya batāsā||
Meaning ज्यों ही वह तेज हवा हृदयरूपी घरमें जाती है, त्यों ही वह विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभवरूप) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवासे बुद्धि व्याकुल हो गयी (सारा किया-कराया चौपट हो गया)॥ ७॥
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥
iṃdrinha suranha na gyāna sohāī| biṣaya bhoga para prīti sadāī||
biṣaya samīra buddhi kṛta bhorī| tehi bidhi dīpa ko bāra bahorī||
Meaning इन्द्रियों और उनके देवताओंको ज्ञान [स्वाभाविक ही] नहीं सुहाता; क्योंकि उनकी विषय- भोगोंमें सदा ही प्रीति रहती है। और बुद्धिको भी विषयरूपी हवाने बावली बना दिया। तब फिर ( दुबारा) उस ज्ञानदीपकको उसी प्रकारसे कौन जलावे ?॥ ८॥
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावढ़ संसृति क््लेस।
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ ( क )॥
taba phiri jīva bibidhi bidhi pāvaṛha saṃsṛti klesa|
hari māyā ati dustara tari na jāi bihagesa|| 118 ( ka )||
Meaning [ इस प्रकार ज्ञानदीपकके बुझ जानेपर] तब फिर जीव अनेकों प्रकारसे संसृति ( जन्म-मरणादि) के क्लेश पाता है। हे पक्षिराज! हरिकी माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहजहीमें तरी नहीं जा सकती॥ ११८ (क)॥
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक।
होड़ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥ ११८ ( ख )॥
kahata kaṭhina samujhata kaṭhina sādhata kaṭhina bibeka|
hoṛa ghunācchara nyāya jauṃ puni pratyūha aneka|| 118 ( kha )||
Meaning ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन, समझनेमें कठिन और साधनेमें भी कठिन है। यदि घुणाक्षरन्यायसे ( संयोगवश ) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर [ उसे बचाये रखनेमें। अनेकों विज्न हैं॥ ११८ (ख)॥
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥
gyāna paṃtha kṛpāna kai dhārā| parata khagesa hoi nahiṃ bārā||
jo nirbighna paṃtha nirbahaī| so kaivalya parama pada lahaī||
Meaning ज्ञानका मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धारके समान है। हे पक्षिराज! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपदको प्राप्त करता है॥ १॥
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई॥
ati durlabha kaivalya parama pada| saṃta purāna nigama āgama bada||
rāma bhajata soi mukuti gosāī| anaicchita āvai bariāī||
Meaning संत, पुराण, वेद और [तन्त्र आदि] शास्त्र [सब] यह कहते हैं कि कैवल्यरूप परमपद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाई! वही [ अत्यन्त दुर्लभ] मुक्ति श्रीरामजीको भजनेसे बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है॥ २॥
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥
jimi thala binu jala rahi na sakāī| koṭi bhām̐ti kou karai upāī||
tathā moccha sukha sunu khagarāī| rahi na sakai hari bhagati bihāī||
Meaning जैसे स्थलके बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकारके उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिये, मोक्षसुख भी श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर नहीं रह सकता॥ ३॥
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥
भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥
asa bicāri hari bhagata sayāne| mukti nirādara bhagati lubhāne||
bhagati karata binu jatana prayāsā| saṃsṛti mūla abidyā nāsā||
Meaning ऐसा विचारकर बुद्धिमान हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं। भक्ति करनेसे संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्र और परिश्रमके (अपने- आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है,॥ ४॥
भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥
असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥
bhojana karia tṛpiti hita lāgī| jimi so asana pacavai jaṭharāgī||
asi haribhagati sugama sukhadāī| ko asa mūṛha na jāhi sohāī||
Meaning जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराय़ि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा ?॥ ५॥
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ ( क )॥
sevaka sebya bhāva binu bhava na taria uragāri|
bhajahu rāma pada paṃkaja asa siddhāṃta bicāri|| 119 ( ka )||
Meaning हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान् मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये॥ ११९ (क)॥
जो चेतन कहेँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य॥ ११९ (ख )॥
jo cetana kahem̐ jaṛa karai jaṛahi karai caitanya|
asa samartha raghunāyakahi bhajahiṃ jīva te dhanya|| 119 (kha )||
Meaning जो चेतनको जड कर देता है और जडको चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं॥ ११९ (ख)॥
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई॥
राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥
kaheum̐ gyāna siddhāṃta bujhāī| sunahu bhagati mani kai prabhutāī||
rāma bhagati ciṃtāmani suṃdara| basai garuṛa jāke ura aṃtara||
Meaning मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कहा। अब भक्तिरूपी मणिकी प्रभुता (महिमा) सुनिये। श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी ! यह जिसके हृदयके अंदर बसती है,॥ १॥
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥
parama prakāsa rūpa dina rātī| nahiṃ kachu cahia diā ghṛta bātī||
moha daridra nikaṭa nahiṃ āvā| lobha bāta nahiṃ tāhi bujhāvā||
Meaning वह दिन-रात [ अपने-आप ही] परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [ इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है]; और [तीसरे] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको बुझा नहीं सकती, [ क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरेकी सहायतासे नहीं प्रकाश करती ]॥ २॥
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥
खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥
prabala abidyā tama miṭi jāī| hārahiṃ sakala salabha samudāī||
khala kāmādi nikaṭa nahiṃ jāhīṃ| basai bhagati jāke ura māhīṃ||
Meaning [ उसके प्रकाशसे] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है। मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते॥ ३॥
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥
ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥
garala sudhāsama ari hita hoī| tehi mani binu sukha pāva na koī||
byāpahiṃ mānasa roga na bhārī| jinha ke basa saba jīva dukhārī||
Meaning उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते॥ '४॥
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥
rāma bhagati mani ura basa jākeṃ| dukha lavalesa na sapanehum̐ tākeṃ||
catura siromani tei jaga māhīṃ| je mani lāgi sujatana karāhīṃ||
Meaning श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदयमें बसती है, उसे स्वप्रमें भी लेशमात्र दु:ख नहीं होता। जगतमें वे ही मनुष्य चतुरोंके शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणिके लिये भली भाँति यत्र करते हैं॥ ५॥
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥
सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे॥
so mani jadapi pragaṭa jaga ahaī| rāma kṛpā binu nahiṃ kou lahaī||
sugama upāya pāibe kere| nara hatabhāgya dehiṃ bhaṭamere||
Meaning यद्यपि वह मणि जगतमें प्रकट (प्रत्यक्ष) है, पर बिना श्रीरामजीकी कृपाके उसे कोई पा नहीं सकता। उसके पानेके उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं॥ ६॥
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥
pāvana parbata beda purānā| rāma kathā rucirākara nānā||
marmī sajjana sumati kudārī| gyāna birāga nayana uragārī||
Meaning वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजीकी नाना प्रकारकी कथाएँ उन पर्वतोंमें सुन्दर खानें हैं। संत पुरुष [उनकी इन खानोंके रहस्यको जाननेवाले] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदनेवाली ] कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य--ये दो उनके नेत्र हैं॥ ७॥
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥
bhāva sahita khojai jo prānī| pāva bhagati mani saba sukha khānī||
moreṃ mana prabhu asa bisvāsā| rāma te adhika rāma kara dāsā||
Meaning जो प्राणी उसे प्रेमके साथ खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजीके दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं॥ ८॥
राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥
rāma siṃdhu ghana sajjana dhīrā| caṃdana taru hari saṃta samīrā||
saba kara phala hari bhagati suhāī| so binu saṃta na kāhūm̐ pāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दनके वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनोंका फल सुन्दर हरिभक्ति ही है। उसे संतके बिना किसीने नहीं पाया॥ ९॥
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा।
राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥
asa bicāri joi kara satasaṃgā| rāma bhagati tehi sulabha bihaṃgā||
Meaning ऐसा विचारकर जो भी संतोंका संग करता है, हे गरुड़जी ! उसके लिये श्रीरामजीकी भक्ति सुलभ हो जाती है॥ १०॥
ब्रहमा पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं।
कथा सुधा मधि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥ १२० ( क )॥
brahamā payonidhi maṃdara gyāna saṃta sura āhiṃ|
kathā sudhā madhi kāṛhahiṃ bhagati madhuratā jāhiṃ|| 120 ( ka )||
Meaning ब्रह्म (वेद) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है॥ १२० (क)॥
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।
जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥ १२० (ख )॥
birati carma asi gyāna mada lobha moha ripu māri|
jaya pāia so hari bhagati dekhu khagesa bicāri|| 120 (kha )||
Meaning वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज ! इसे विचारकर देखिये॥ १२० (ख)॥
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥
नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी॥
puni saprema boleu khagarāū| jauṃ kṛpāla mohi ūpara bhāū||
nātha mohi nija sevaka jānī| sapta prasna kahahu bakhānī||
Meaning पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले--हे कृपालु! यदि मुझपर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्रोंके उत्तर बखानकर कहिये॥ १॥
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥
prathamahiṃ kahahu nātha matidhīrā| saba te durlabha kavana sarīrā||
baṛa dukha kavana kavana sukha bhārī| sou saṃchepahiṃ kahahu bicārī||
Meaning हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है ? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेपमें ही कहिये॥ २॥
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥
saṃta asaṃta marama tumha jānahu| tinha kara sahaja subhāva bakhānahu||
kavana punya śruti bidita bisālā| kahahu kavana agha parama karālā||
Meaning संत और असंतका मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभावका वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है ?॥ ३॥
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥
तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥
mānasa roga kahahu samujhāī| tumha sarbagya kṛpā adhikāī||
tāta sunahu sādara ati prītī| maiṃ saṃchepa kahaum̐ yaha nītī||
Meaning फिर मानस-रोगोंको समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है। [ काकभुशुण्डिजीने कहा--] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेपसे कहता हूँ॥ ४॥
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥
nara tana sama nahiṃ kavaniu dehī| jīva carācara jācata tehī||
naraga svarga apabarga nisenī| gyāna birāga bhagati subha denī||
Meaning मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है॥ ५॥
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥
काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं॥
so tanu dhari hari bhajahiṃ na je nara| hohiṃ biṣaya rata maṃda maṃda tara||
kām̐ca kirica badaleṃ te lehī| kara te ḍāri parasa mani dehīṃ||
Meaning ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीचसे भी नीच विषयोंमें अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणिको हाथसे फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं॥ ६॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥
nahiṃ daridra sama dukha jaga māhīṃ| saṃta milana sama sukha jaga nāhīṃ||
para upakāra bacana mana kāyā| saṃta sahaja subhāu khagarāyā||
Meaning जगतमें दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगतमें सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है॥ ७॥
संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी॥
भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला॥
saṃta sahahiṃ dukha parahita lāgī| paradukha hetu asaṃta abhāgī||
bhūrja tarū sama saṃta kṛpālā| parahita niti saha bipati bisālā||
Meaning संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये। कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं)॥ ८॥
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥
sana iva khala para baṃdhana karaī| khāla kaṛhāi bipati sahi maraī||
khala binu svāratha para apakārī| ahi mūṣaka iva sunu uragārī||
Meaning किन्तु दुष्ट लोग सनकी भाँति दूसरोंको बाँधते हैं और [उन्हें बाँधनेके लिये] अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थके साँप और चूहेके समान अकारण ही दूसरोंका अपकार करते हैं॥ ९॥
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥
दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥
para saṃpadā bināsi nasāhīṃ| jimi sasi hati hima upala bilāhīṃ||
duṣṭa udaya jaga ārati hetū| jathā prasiddha adhama graha ketū||
Meaning वे परायी सम्पत्तिका नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेतीका नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतुके उदयकी भाँति जगतके दुःखके लिये ही होता है॥ १०॥
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥
saṃta udaya saṃtata sukhakārī| bisva sukhada jimi iṃdu tamārī||
parama dharma śruti bidita ahiṃsā| para niṃdā sama agha na garīsā||
Meaning और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है। वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है॥ ११॥
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई॥
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥
hara gura niṃdaka dādura hoī| janma sahastra pāva tana soī||
dvija niṃdaka bahu naraka bhoga kari| jaga janamai bāyasa sarīra dhari||
Meaning शंकरजी और गुरुकी निन््दा करनेवाला मनुष्य (अगले जन्ममें) मेढक होता है और वह हजार जन्मतक वही मेढकका शरीर पाता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत्में कौएका शरीर धारण करके जन्म लेता है॥ १२॥
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥
sura śruti niṃdaka je abhimānī| raurava naraka parahiṃ te prānī||
hohiṃ ulūka saṃta niṃdā rata| moha nisā priya gyāna bhānu gata||
Meaning जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदोंकी निन््दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। संतोंकी निन््दामें लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥ १३॥
सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥
saba ke niṃdā je jaṛa karahīṃ| te camagādura hoi avatarahīṃ||
sunahu tāta aba mānasa rogā| jinha te dukha pāvahiṃ saba logā||
Meaning जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन््दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात ! अब मानस- रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥ १४॥
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
moha sakala byādhinha kara mūlā| tinha te puni upajahiṃ bahu sūlā||
kāma bāta kapha lobha apārā| krodha pitta nita chātī jārā||
Meaning सब रोगोंकी जड़ मोह ( अज्ञान) है। उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥ १५॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥
prīti karahiṃ jauṃ tīniu bhāī| upajai sanyapāta dukhadāī||
biṣaya manoratha durgama nānā| te saba sūla nāma ko jānā||
Meaning यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ ) प्रीति कर लें (मिल जायें) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त (पूर्ण) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं)॥ १६॥
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥
mamatā dādu kaṃḍu iraṣāī| haraṣa biṣāda garaha bahutāī|
para sukha dekhi jarani soi chaī| kuṣṭa duṣṭatā mana kuṭilaī||
Meaning ममता दाद है, ईर्ष्या (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गलेके रोगोंकी अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है॥ १७॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी॥
ahaṃkāra ati dukhada ḍamaruā| daṃbha kapaṭa mada māna neharuā||
tṛsnā udarabṛddhi ati bhārī| tribidha īṣanā taruna tijārī||
Meaning अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥ १८॥
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका।
कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका॥
juga bidhi jvara matsara abibekā| kaham̐ lāgi kahauṃ kuroga anekā||
Meaning मत्सर और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँतक कहूँ॥ १९॥
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥ १२१ (क )॥
eka byādhi basa nara marahiṃ e asādhi bahu byādhi|
pīṛahiṃ saṃtata jīva kahum̐ so kimi lahai samādhi|| 121 (ka )||
Meaning एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं। ये जीवको निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशामें वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे ?॥ १२१ (क)॥
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥ १२१ (ख )॥
nema dharma ācāra tapa gyāna jagya japa dāna|
bheṣaja puni koṭinha nahiṃ roga jāhiṃ harijāna|| 121 (kha )||
Meaning नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों ओषधियाँ हैं, परन्तु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥ १२१ (ख)॥
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥
मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥
ehi bidhi sakala jīva jaga rogī| soka haraṣa bhaya prīti biyogī||
mānaka roga kachuka maiṃ gāe| hahiṃ saba keṃ lakhi biralenha pāe||
Meaning इस प्रकार जगत्में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोगके दुःखसे और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े-से मानस-रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाये हैं कोई विरले ही॥ १॥
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥
jāne te chījahiṃ kachu pāpī| nāsa na pāvahiṃ jana paritāpī||
biṣaya kupathya pāi aṃkure| munihu hṛdayam̐ kā nara bāpure||
Meaning प्राणियोंको जलानेवाले ये पापी (रोग) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाशको नहीं प्राप्त होते। विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियोंके हृदयमें भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥ २॥
राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥
rāma kṛpām̐ nāsahi saba rogā| jauṃ ehi bhām̐ti banai saṃyogā||
sadagura baida bacana bisvāsā| saṃjama yaha na biṣaya kai āsā||
Meaning यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायेँ। सदूरुरूपी वैद्यके वचनमें विश्वास हो। विषयोंकी आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥ ३॥
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥
raghupati bhagati sajīvana mūrī| anūpāna śraddhā mati pūrī||
ehi bidhi bhalehiṃ so roga nasāhīṃ| nāhiṃ ta jatana koṭi nahiṃ jāhīṃ||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है। इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायेँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते॥ ४॥
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥
jānia taba mana biruja gosām̐ī| jaba ura bala birāga adhikāī||
sumati chudhā bāṛhai nita naī| biṣaya āsa durbalatā gaī||
Meaning हे गोसाई! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय॥ ५॥
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥
सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥
bimala gyāna jala jaba so nahāī| taba raha rāma bhagati ura chāī||
siva aja suka sanakādika nārada| je muni brahma bicāra bisārada||
Meaning [ इस प्रकार सब रोगोंसे छूटकर] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्तान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रहमविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं,॥ ६॥
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥
saba kara mata khaganāyaka ehā| karia rāma pada paṃkaja nehā||
śruti purāna saba graṃtha kahāhīṃ| raghupati bhagati binā sukha nāhīṃ||
Meaning हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजीके चरणकमलों में प्रेम करना चाहिये। श्रुति, पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्तिके बिना सुख नहीं है॥७॥
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥
kamaṭha pīṭha jāmahiṃ baru bārā| baṃdhyā suta baru kāhuhi mārā||
phūlahiṃ nabha baru bahubidhi phūlā| jīva na laha sukha hari pratikūlā||
Meaning कछुएकी पीठपर भले ही बाल उग आवें, बाँझका पुत्र भले ही किसीको मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों प्रकारके फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरिसे विमुख होकर जीव सुख नहीं प्रात कर सकता॥ ८॥
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥
अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥
tṛṣā jāi baru mṛgajala pānā| baru jāmahiṃ sasa sīsa biṣānā||
aṃdhakāru baru rabihi nasāvai| rāma bimukha na jīva sukha pāvai||
Meaning मृगतृष्णाके जलको पीनेसे भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर भले ही सींग निकल आें, अन्धकार भले ही सूर्यका नाश कर दे; परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता॥ ९॥
हिम ते अनल प्रगट बरु होई।
बिमुख राम सुख पाव न कोई॥
hima te anala pragaṭa baru hoī| bimukha rāma sukha pāva na koī||
Meaning बर्फसे भले ही अग्रि प्रकट हो जाय (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जाये), परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता॥ १०॥
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥ १२२ ( क)॥
ubāri matheṃ ghṛta hoi baru sikatā te baru tela|
binu hari bhajana na bhava taria yaha siddhāṃta apela|| 122 ( ka)||
Meaning जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [ को पेरने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिकि भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है॥ १२२ (क)॥
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥ १२२ ( ख )॥
masakahi karai biṃraṃci prabhu ajahi masaka te hīna|
asa bicāri taji saṃsaya rāmahi bhajahiṃ prabīna|| 122 ( kha )||
Meaning प्रभु मच्छरको ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचारकर चतुर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजीको ही भजते हैं॥ १२२ (ख)॥
विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥ १२२(ग)॥
viniścitaṃ vadāmi te na anyathā vacāṃsi me|
hariṃ narā bhajanti ye'tidustaraṃ taranti te|| 122(ga)||
Meaning मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ-मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [सहज ही] पार कर जाते हैं॥ १२२ (ग)॥
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा॥
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥
kaheum̐ nātha hari carita anūpā| byāsa samāsa svamati anurupā||
śruti siddhāṃta ihai uragārī| rāma bhajia saba kāja bisārī||
Meaning हे नाथ! मैंने श्रीहरिका अनुपम चरित्र अपनी बुद्धिकि अनुसार कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे कहा। हे सर्पोके शत्रु गरुड़जी! श्रुतियोंका यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये॥ १॥
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥
prabhu raghupati taji seia kāhī| mohi se saṭha para mamatā jāhī||
tumha bigyānarūpa nahiṃ mohā| nātha kīnhi mo para ati chohā||
Meaning प्रभु श्रीरघुनाथजीको छोड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाय, जिनका मुझ-जेसे मूर्खपर भी ममत्व (स्त्रेह) है। हे नाथ! आप विज्ञानरूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझपर बड़ी कृपा की है॥ २॥
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥
सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥
pūchihum̐ rāma kathā ati pāvani| suka sanakādi saṃbhu mana bhāvani||
sata saṃgati durlabha saṃsārā| nimiṣa daṃḍa bhari ekau bārā||
Meaning जो आपने मुझसे शुकदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पतित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ी भरका अथवा पलभरका एक बारका भी सत्संग दुर्लभ है॥ ३॥
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥
सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥
dekhu garuṛa nija hṛdayam̐ bicārī| maiṃ raghubīra bhajana adhikārī||
sakunādhama saba bhām̐ti apāvana| prabhu mohi kīnha bidita jaga pāvana||
Meaning हे गरुड़जी! अपने हृदयमें विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजीके भजनका अधिकारी हूँ ? पक्षियोंमें सबसे नीच और सब प्रकारसे अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होनेपर भी प्रभुने मुझको सारे जगत्को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [ अथवा प्रभुने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया]॥ ४॥
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥ १२३ (क)॥
āju dhanya maiṃ dhanya ati jadyapi saba bidhi hīna|
nija jana jāni rāma mohi saṃta samāgama dīna|| 123 (ka)||
Meaning यद्यपि मैं सब प्रकारसे हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजीने मुझे अपना 'निज जन' जानकर संत-समागम दिया (आपसे मेरी भेंट करायी)॥ १२३ (क)॥
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ॥ १२३ (ख)॥
nātha jathāmati bhāṣeum̐ rākheum̐ nahiṃ kachu goi|
carita siṃdhu raghunāyaka thāha ki pāvai koi|| 123 (kha)||
Meaning हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिकि अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [फिर भी] श्रीरघुवीरके चरित्र समुद्रके समान हैं; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है 2॥ १२३ (ख)॥
सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥
महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥
sumiri rāma ke guna gana nānā| puni puni haraṣa bhusuṃḍi sujānā||
mahimā nigama neti kari gāī| atulita bala pratāpa prabhutāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके बहुत-से गुणसमूहोंका स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदोंने * नेति-नेति' कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व (सामर्थ्य) अतुलनीय है;॥ १॥
सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥
अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥
siva aja pūjya carana raghurāī| mo para kṛpā parama mṛdulāī||
asa subhāu kahum̐ sunaum̐ na dekhaum̐| kehi khagesa raghupati sama lekhaum̐||
Meaning जिन श्रीरघुनाथजीके चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझपर कृपा होनी उनकी परम कोमलता है। किसीका ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अत: हे पक्षिराज गरुड़जी ! मैं श्रीरघुनाथजीके समान किसे गिनूँ (समझूँ) 2॥ २॥
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥
जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥
sādhaka siddha bimukta udāsī| kabi kobida kṛtagya saṃnyāsī||
jogī sūra sutāpasa gyānī| dharma nirata paṃḍita bigyānī||
Meaning साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन (विरक्त), कवि, विद्वान, कर्म [रहस्य] के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी॥ ३॥
तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥
सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥
tarahiṃ na binu seem̐ mama svāmī| rāma namāmi namāmi namāmī||
sarana gaem̐ mo se agha rāsī| hohiṃ suddha namāmi abināsī||
Meaning ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजीका सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरीमजीको बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जानेपर मुझ-जैसे पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अविनाशी श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४॥
जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल।
jāsu nāma bhava bheṣaja harana ghora traya sūla|
कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥ १२४ (क)॥
kṛpāla mohi to para sadā rahau anukūla|| 124 (ka)||
Meaning जिनका नाम जन्म-मरणरूपी रोगकी [अव्यर्थ। औषध और तीनों भयंकर पीड़ाओं ( आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों ) को हरनेवाला है, वे कृपालु श्रीरामजी मुझपर और आपपर सदा प्रसन्न रहें॥ १२४ (क)॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह।
बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह॥ १२४ (ख )॥
suni bhusuṃḍi ke bacana subha dekhi rāma pada neha|
boleu prema sahita girā garuṛa bigata saṃdeha|| 124 (kha )||
Meaning भुशुण्डिजीके मंगलमय वचन सुनकर और श्रीरामजीके चरणोंमें उनका अतिशय प्रेम देखकर सन्देहसे भली भाँति छूटे हुए गरुड़जी प्रेमसहित वचन बोले॥ १२४ (ख)॥
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥
राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥
mai kṛtkṛtya bhayaum̐ tava bānī| suni raghubīra bhagati rasa sānī||
rāma carana nūtana rati bhaī| māyā janita bipati saba gaī||
Meaning श्रीरघुवीरके भक्ति-रसमें सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी नवीन प्रीति हो गयी और मायासे उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी॥ १॥
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥
मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥
moha jaladhi bohita tumha bhae| mo kaham̐ nātha bibidha sukha dae||
mo pahiṃ hoi na prati upakārā| baṃdaum̐ tava pada bārahiṃ bārā||
Meaning मोहरूपी समुद्रमें डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे बहुत प्रकारके सुख दिये (परम सुखी कर दिया)। मुझसे इसका प्रत्युपकार (उपकारके बदलेमें उपकार) नहीं हो सकता। मैं तो आपके चरणोंकी बार-बार वन्दना ही करता हूँ॥ २॥
पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥
संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी॥
pūrana kāma rāma anurāgī| tumha sama tāta na kou baṛabhāgī||
saṃta biṭapa saritā giri dharanī| para hita hetu sabanha kai karanī||
Meaning आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामजीके प्रेमी हैं। हे तात! आपके समान कोई बड़भागी नहीं है। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी-इन सबकी क्रिया पराये हितके लिये ही होती है॥ ३॥
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥
saṃta hṛdaya navanīta samānā| kahā kabinha pari kahai na jānā||
nija paritāpa dravai navanītā| para dukha dravahiṃ saṃta supunītā||
Meaning संतोंका हृदय मक््खनके समान होता है, ऐसा कवियोंने कहा है; परन्तु उन्होंने [ असली बात] कहना नहीं जाना। क्योंकि मक्खन तो अपनेको ताप मिलनेसे पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं॥ ४॥
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ॥
जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर॥
jīvana janma suphala mama bhayaū| tava prasāda saṃsaya saba gayaū||
jānehu sadā mohi nija kiṃkara| puni puni umā kahai bihaṃgabara||
Meaning मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपासे सब सन्देह चला गया। मुझे सदा अपना दास ही जानियेगा। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! पक्षिश्रेष्ठ गरुड्जी बार-बार ऐसा कह रहे हैं॥५॥
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हदयें राखि रघुबीर॥ १२५ ( क )॥
tāsu carana siru nāi kari prema sahita matidhīra|
gayau garuṛa baikuṃṭha taba hadayeṃ rākhi raghubīra|| 125 ( ka )||
Meaning उन ( भुशुण्डिजी) के चरणोंमें प्रेमसहित सिर नवाकर और हदयमें श्रीरघुवीरको धारण करके धीरबुद्धि गरुड्जी तब वैकुण्ठको चले गये॥ १२५ (क)॥
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥ १२५ (ख )॥
girijā saṃta samāgama sama na lābha kachu āna|
binu hari kṛpā na hoi so gāvahiṃ beda purāna|| 125 (kha )||
Meaning हे गिरिजे ! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह (संत-समागम) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं॥ १२५ (ख)॥
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा॥
kaheum̐ parama punīta itihāsā| sunata śravana chūṭahiṃ bhava pāsā||
pranata kalpataru karunā puṃjā| upajai prīti rāma pada kaṃjā||
Meaning मैंने यह परम पवित्र इतिहास कहा, जिसे कानोंसे सुनते ही भवपाश (संसारके बन्धन) छूट जाते हैं और शरणागतोंको [उनके इच्छानुसार फल देनेवाले] कल्पवृक्ष तथा दयाके समूह श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥ १॥
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥
तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥
mana krama bacana janita agha jāī| sunahiṃ je kathā śravana mana lāī||
tīrthāṭana sādhana samudāī| joga birāga gyāna nipunāī||
Meaning जो कान और मन लगाकर इस कथाको सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थयात्रा आदि बहुत-से साधन, योग, वैराग्य और ज्ञानमें निपुणता,--॥ २॥
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥
भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥
nānā karma dharma brata dānā| saṃjama dama japa tapa makha nānā||
bhūta dayā dvija gura sevakāī| bidyā binaya bibeka baṛāī||
Meaning अनेकों प्रकारके कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेकों संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरुकी सेवा; विद्या, विनय और विवेककी बड़ाई [आदि]--॥ ३॥
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरि भगति भवानी॥
jaham̐ lagi sādhana beda bakhānī| saba kara phala hari bhagati bhavānī||
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई।
राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥
so raghunātha bhagati śruti gāī| rāma kṛpām̐ kāhūm̐ eka pāī||
Meaning जहाँतक वेदोंने साधन बतलाये हैं, हे भवानी ! उन सबका फल श्रीहरिकी भक्ति ही है। किन्तु श्रुतियों में गायी हुई वह श्रीरघुनाथजीकी भक्ति श्रीरामजीकी कृपासे किसी एक (विरले) ने ही पायी है॥ ४॥
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास।
जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥ १२६॥
muni durlabha hari bhagati nara pāvahiṃ binahiṃ prayāsa|
je yaha kathā niraṃtara sunahiṃ māni bisvāsa|| 126||
Meaning किन्तु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस मुनिदुर्लभ हरिभक्तिको प्राप्त कर लेते हैं॥ १२६॥
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥
soi sarbagya gunī soi gyātā| soi mahi maṃḍita paṃḍita dātā||
dharma parāyana soi kula trātā| rāma carana jā kara mana rātā||
Meaning जिसका मन श्रीरामजीके चरणोंमें अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जाननेवाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वीका भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुलका रक्षक है॥ १॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
nīti nipuna soi parama sayānā| śruti siddhāṃta nīka tehiṃ jānā||
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
soi kabi kobida soi ranadhīrā| jo chala chāṛi bhajai raghubīrā||
Meaning जो छल छोड़कर श्रीरघुबीरका भजन करता है, वही नीतिमें निपुण है, वही परम बुद्धिमान् है। उसीने वेदोंके सिद्धान्तको भली भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान तथा वही रणधीर है॥ २॥