धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
dhanya desa so jaham̐ surasarī| dhanya nāri patibrata anusarī||
dhanya so bhūpu nīti jo karaī| dhanya so dvija nija dharma na ṭaraī||
Meaning वह देश धन्य है जहाँ श्रीगज़ाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत-धर्मका पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्मसे नहीं डिगता॥ ३॥
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
so dhana dhanya prathama gati jākī| dhanya punya rata mati soi pākī||
dhanya gharī soi jaba satasaṃgā| dhanya janma dvija bhagati abhaṃgā||
Meaning वह धन धन्य है जिसकी पहली गति होती है (जो दान देनेमें व्यय होता है)। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मणकी अखण्ड भक्ति हो॥ ४॥ [ धनकी तीन गतियाँ होती हैं--दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धनकी तीसरी गति होती है।]
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥ २२७॥
so kula dhanya umā sunu jagata pūjya supunīta|
śrīraghubīra parāyana jehiṃ nara upaja binīta|| 227||
Meaning हे उमा! सुनो। वह कुल धन्य है, संसारभरके लिये पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्रीरघुवीरपरायण ( अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हो॥ १२७॥
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥
mati anurūpa kathā maiṃ bhāṣī| jadyapi prathama gupta kari rākhī||
tava mana prīti dekhi adhikāī| taba maiṃ raghupati kathā sunāī||
Meaning मैंने अपनी बुद्धिकि अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसको छिपाकर रखा था। जब तुम्हारे मनमें प्रेमकी अधिकता देखी तब मैंने श्रीरघुनाथजीकी यह कथा तुमको सुनायी॥ १॥
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥
yaha na kahia saṭhahī haṭhasīlahi| jo mana lāi na suna hari līlahi||
kahia na lobhihi krodhahi kāmihi| jo na bhajai sacarācara svāmihi||
Meaning यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभावके हों और श्रीहरिकी लीलाको मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामीको, जो चराचरके स्वामी श्रीरामजीको नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये॥ २॥
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥
राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी॥
dvija drohihi na sunāia kabahūm̐| surapati sarisa hoi nṛpa jabahūm̐||
rāma kathā ke tei adhikārī| jinha keṃ satasaṃgati ati pyārī||
Meaning ब्राह्मणोंके द्रोहीको, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा कभी न सुनानी चाहिये। श्रीरामकी कथाके अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है॥३॥
गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई॥
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥
gura pada prīti nīti rata jeī| dvija sevaka adhikārī teī||
tā kaham̐ yaha biseṣa sukhadāī| jāhi prānapriya śrīraghurāī||
Meaning जिनकी गुरुके चरणोंमें प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणोंके सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं, और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देनेवाली है, जिसको श्रीरघुनाथजी प्राणके समान प्यारे हैं॥ ४॥
राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान।
भाव सहित सो यह कथा करड श्रवन पुट पान॥ १२८॥
rāma carana rati jo caha athavā pada nirbāna|
bhāva sahita so yaha kathā karaḍa śravana puṭa pāna|| 128||
Meaning जो श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृतको प्रेमपूर्वक अपने कानरूपी दोनेसे पिये॥ १२८॥
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥
संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥
rāma kathā girijā maiṃ baranī| kali mala samani manomala haranī||
saṃsṛti roga sajīvana mūrī| rāma kathā gāvahiṃ śruti sūrī||
Meaning हे गिरिजे! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मलको दूर करनेवाली रामकथाका वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोगके [ नाशके] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं॥ १॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई।
पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥
ati hari kṛpā jāhi para hoī| pāum̐ dei ehiṃ māraga soī||
Meaning इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। जिसपर श्रीहरिकी अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्गपर पैर रखता है॥ २॥
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥
mana kāmanā siddhi nara pāvā| je yaha kathā kapaṭa taji gāvā||
kahahiṃ sunahiṃ anumodana karahīṃ| te gopada iva bhavanidhi tarahīṃ||
Meaning जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मन:कामनाकी सिद्धि पा लेते हैं। जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसाररूपी समुद्रको गौके खुरसे बने हुए गड़ेकी भाँति पार कर जाते हैं॥ ३॥
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥
suni saba kathā hṛdayam̐ ati bhāī| girijā bolī girā suhāī||
nātha kṛpām̐ mama gata saṃdehā| rāma carana upajeu nava nehā||
Meaning [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] सब कथा सुनकर श्रीपार्वतीजीके हृदयको बहुत ही प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं--स्वामीकी कृपासे मेरा सन्देह जाता रहा और श्रीरामजीके चरणोंमें नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया॥ ४॥
मैं कृतकृत्य भड़उँं अब तब प्रसाद बिस्वेस।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस॥ १२९॥
maiṃ kṛtakṛtya bhaṛaum̐ṃ aba taba prasāda bisvesa|
upajī rāma bhagati dṛṛha bīte sakala kalesa|| 129||
Meaning हे विश्वनाथ! आपकी कृपासे अब मैं कृतार्थ हो गयी। मुझमें दृढ़ रामभक्ति उत्पन्न हो गयी और मेरे सम्पूर्ण क्लेश बीत गये (नष्ट हो गये)॥ १२९॥
यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा॥
भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥
yaha subha saṃbhu umā saṃbādā| sukha saṃpādana samana biṣādā||
bhava bhaṃjana gaṃjana saṃdehā| jana raṃjana sajjana priya ehā||
Meaning शम्भु-उमाका यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करनेवाला और शोकका नाश करनेवाला है। जन्म-मरणका अन्त करनेवाला, सन्देहोंका नाश करनेवाला, भक्तोंको आनन्द देनेवाला और संत पुरुषोंको प्रिय है॥ १॥
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं॥
रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥
rāma upāsaka je jaga māhīṃ| ehi sama priya tinha ke kachu nāhīṃ||
raghupati kṛpām̐ jathāmati gāvā| maiṃ yaha pāvana carita suhāvā||
Meaning जगतमें जो (जितने भी ) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथाके समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धिकि अनुसार गाया है॥ २॥
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥
ehiṃ kalikāla na sādhana dūjā| joga jagya japa tapa brata pūjā||
rāmahi sumiria gāia rāmahi| saṃtata sunia rāma guna grāmahi||
Meaning [ तुलसीदासजी कहते हैं--] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये॥ ३॥
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥
jāsu patita pāvana baṛa bānā| gāvahiṃ kabi śruti saṃta purānā||
tāhi bhajahi mana taji kuṭilāī| rāma bhajeṃ gati kehiṃ nahiṃ pāī||
Meaning पतितोंको पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है--ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं-'रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज। श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी ?॥ ४॥
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥
pāī na kehiṃ gati patita pāvana rāma bhaji sunu saṭha manā|
ganikā ajāmila byādha gīdha gajādi khala tāre ghanā||
ābhīra jamana kirāta khasa svapacādi ati agharūpa je|
kahi nāma bāraka tepi pāvana hohiṃ rāma namāmi te||
Meaning अरे मूर्ख मन! सुन, पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परमगति नहीं पायी ? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्रपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १॥
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै॥
raghubaṃsa bhūṣana carita yaha nara kahahiṃ sunahiṃ je gāvahīṃ|
kali mala manomala dhoi binu śrama rāma dhāma sidhāvahīṃ||
sata paṃca caupāīṃ manohara jāni jo nara ura dharai|
dāruna abidyā paṃca janita bikāra śrīraghubara harai||
Meaning जो मनुष्य रघुवंशके भूषण श्रीरामजीका यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनके मलको धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजीके परम धामको चले जाते हैं। [अधिक क्या] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर [ अथवा रामायणकी चौपाइयोंको श्रेष्ठ पंच ( कर्तव्याकर्तव्यका सच्चा निर्णायक) जानकर उनको] हृदयमें धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकारकी अविद्याओंसे उत्पन्न विकारोंको श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। ( अर्थात् सारे रामचरित्रकी तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी समझकर उनका अर्थ हृदयमें धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे कलेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं)॥ २॥
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
suṃdara sujāna kṛpā nidhāna anātha para kara prīti jo|
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ
so eka rāma akāma hita nirbānaprada sama āna ko||
jākī kṛpā lavalesa te matimaṃda tulasīdāsahūm̐|
pāyo parama biśrāmu rāma samāna prabhu nāhīṃ kahūm̐
Meaning [परम] सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाधथोंपर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्रीरामचन्द्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करनेवाला (सुहदू) और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है ? जिनकी लेशमात्र कृपासे मन्दबुद्धि तुलसीदासने भी परम शान्ति प्राप्त कर ली, उन श्रीरामजीके समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं॥ ३॥
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥ १३०(क)॥
mo sama dīna na dīna hita tumha samāna raghubīra|
asa bicāri raghubaṃsa mani harahu biṣama bhava bhīra|| 130(ka)||
Meaning हे श्रीरघुवीर ! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनोंका हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरणके भयानक दुःखका हरण कर लीजिये॥ १३० (क)॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ १३०(ख)॥
kāmihi nāri piāri jimi lobhahi priya jimi dāma|
timi raghunātha niraṃtara priya lāgahu mohi rāma|| 130(kha)||
Meaning जैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है. और लोभीको जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी ! हे रामजी! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये॥ १३० (ख)॥
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्॥ १॥
yatpūrvaṃ prabhuṇā kṛtaṃ sukavinā śrīśambhunā durgamaṃ śrīmadrāmapadābjabhaktimaniśaṃ prāptyai tu rāmāyaṇam|
matvā tadraghunāthanāmanirataṃ svāntastamaḥśāntaye bhāṣābaddhamidaṃ cakāra tulasīdāsastathā mānasam|| 1||
Meaning श्रेष्ठ कवि भगवान् श्रीशंकरजीने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायणकी, श्रीरामजीके चरणकमलोंमें नित्य-निरन्तर [अनन्य] भक्ति प्राप्त होनेके लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायणको श्रीरघुनाथजीके नाममें निरत मानकर अपने अन्त:करणके अन्धकारको मिटानेके लिये तुलसीदासने इस मानसके रूपमें भाषाबद्ध किया॥ १॥
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥ २॥
puṇyaṃ pāpaharaṃ sadā śivakaraṃ vijñānabhaktipradaṃ māyāmohamalāpahaṃ suvimalaṃ premāmbupūraṃ śubham|
śrīmadrāmacaritramānasamidaṃ bhaktyāvagāhanti ye te saṃsārapataṅgaghorakiraṇairdahyanti no mānavāḥ|| 2||
Meaning यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापोंका हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्तिको देनेवाला, माया, मोह और मलका नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जलसे परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवरमें गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्यकी अति प्रचण्ड किरणोंसे नहीं जलते॥ २॥