नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
nātha bhagati ati sukhadāyanī| dehu kṛpā kari anapāyanī||
suni prabhu parama sarala kapi bānī| evamastu taba kaheu bhavānī||
Meaning हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमानूजीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा॥ १॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
umā rāma subhāu jehiṃ jānā| tāhi bhajanu taji bhāva na ānā||
yaha saṃvāda jāsu ura āvā| raghupati carana bhagati soi pāvā||
Meaning हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती ! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंको भक्ति पा गया॥ २॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
suni prabhu bacana kahahiṃ kapibṛṃdā| jaya jaya jaya kṛpāla sukhakaṃdā||
taba raghupati kapipatihi bolāvā| kahā calaiṃ kara karahu banāvā||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे--कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा-चलनेकी तैयारी करो॥ ३॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥
aba bilaṃbu kehi kārana kīje| turata kapinha kahum̐ āyasu dīje||
kautuka dekhi sumana bahu baraṣī| nabha teṃ bhavana cale sura haraṣī||
Meaning अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत आज्ञा दो। [ भगवान्की] यह लीला (रावणवधकी तैयारी ) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने- अपने लोकको चले॥ ४॥
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥
kapipati begi bolāe āe jūthapa jūtha|
nānā barana atula bala bānara bhālu barūtha||
Meaning वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर-भालुओं के झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥ ३४॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
prabhu pada paṃkaja nāvahiṃ sīsā| garajahiṃ bhālu mahābala kīsā||
dekhī rāma sakala kapi senā| citai kṛpā kari rājiva nainā||
Meaning वे प्रभुके चरणकमलों में सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजीने वानरोंकी सारी सेना देखी। तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥ १॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
rāma kṛpā bala pāi kapiṃdā| bhae pacchajuta manahum̐ giriṃdā||
haraṣi rāma taba kīnha payānā| saguna bhae suṃdara subha nānā||
Meaning रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए॥ २॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
jāsu sakala maṃgalamaya kītī| tāsu payāna saguna yaha nītī||
prabhu payāna jānā baidehīṃ| pharaki bāma am̐ga janu kahi dehīṃ||
Meaning जिनकी कीर्ति सब मज़लोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अड् फड़क- फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं]॥ ३॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा॥
joi joi saguna jānakihi hoī| asaguna bhayau rāvanahi soī||
calā kaṭaku ko baranaiṃ pārā| garjahi bānara bhālu apārā||
Meaning जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥ ४॥
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥
nakha āyudha giri pādapadhārī| cale gagana mahi icchācārī||
keharināda bhālu kapi karahīṃ| ḍagamagāhiṃ diggaja cikkarahīṃ||
Meaning नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षोॉंको धारण किये कोई आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंहके समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गर्जनेसे] दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं॥५॥
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।
cikkarahiṃ diggaja ḍola mahi giri lola sāgara kharabhare|
mana haraṣa sabha gaṃdharba sura muni nāga kinnara dukha ṭare||
kaṭakaṭahiṃ markaṭa bikaṭa bhaṭa bahu koṭi koṭinha dhāvahīṃ|
jaya rāma prabala pratāpa kosalanātha guna gana gāvahīṃ|
Meaning दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चज्नल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के-सब मनमें हर्षित हुए कि [अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। ' प्रबलप्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहों को गा रहे हैं॥ १॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥
sahi saka na bhāra udāra ahipati bāra bārahiṃ mohaī|
gaha dasana puni puni kamaṭha pṛṣṭa kaṭhora so kimi sohaī||
raghubīra rucira prayāna prasthiti jāni parama suhāvanī|
janu kamaṭha kharpara sarparāja so likhata abicala pāvanī||
Meaning उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्ू) सर्पराज शेषजी भी सेनाका बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुन:-पुन: कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे पकड़ते हैं। ऐसा करते ( अर्थात् बार-बार दाँतोंको गड़ाकर कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपकी पीठपर लिख रहे हों॥ २॥
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५॥
ehi bidhi jāi kṛpānidhi utare sāgara tīra|
jaham̐ taham̐ lāge khāna phala bhālu bipula kapi bīra|| 35||
Meaning इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५॥
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
uhām̐ nisācara rahahiṃ sasaṃkā| jaba te jāri gayau kapi laṃkā||
nija nija gṛham̐ saba karahiṃ bicārā| nahiṃ nisicara kula kera ubārā||
Meaning वहाँ (लड्ामें) जबसे हनुमानूजी लड्ठाको जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [का कोई उपाय] नहीं है॥ १॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
jāsu dūta bala barani na jāī| tehi āem̐ pura kavana bhalāī||
dūtanhi sana suni purajana bānī| maṃdodarī adhika akulānī||
Meaning जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगरमें आनेपर कौन भलाई है (हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी॥ २॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु॥
rahasi jori kara pati paga lāgī| bolī bacana nīti rasa pāgī||
kaṃta karaṣa hari sana pariharahū| mora kahā ati hita hiyam̐ dharahu||
Meaning वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली--हे प्रियतम! श्रीहरिसे विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदयमें धारण कीजिये॥ ३॥
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥
samujhata jāsu dūta kai karanī| stravahīṃ garbha rajanīcara dharanī||
tāsu nāri nija saciva bolāī| paṭhavahu kaṃta jo cahahu bhalāī||
Meaning जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको भेज दीजिये॥ ४॥
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥
taba kula kamala bipina dukhadāī| sītā sīta nisā sama āī||
sunahu nātha sītā binu dīnheṃ| hita na tumhāra saṃbhu aja kīnheṃ||
Meaning सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दु:ख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये (लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं हो सकता॥ ५॥
-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३६॥
-rāma bāna ahi gana sarisa nikara nisācara bheka|
jaba lagi grasata na taba lagi jatanu karahu taji ṭeka|| 36||
Meaning श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसोंके समूह मेढकके समान। जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये॥ ३६॥
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
śravana sunī saṭha tā kari bānī| bihasā jagata bidita abhimānī||
sabhaya subhāu nāri kara sācā| maṃgala mahum̐ bhaya mana ati kācā||
Meaning मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [और बोला--] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मज़लमें भी भय करती हो! तुम्हारा मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है॥ १॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
jauṃ āvai markaṭa kaṭakāī| jiahiṃ bicāre nisicara khāī||
kaṃpahiṃ lokapa jākī trāsā| tāsu nāri sabhīta baṛi hāsā||
Meaning यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है॥ २॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
asa kahi bihasi tāhi ura lāī| caleu sabhām̐ mamatā adhikāī||
maṃdodarī hṛdayam̐ kara ciṃtā| bhayau kaṃta para bidhi biparītā||
Meaning रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हदयसे लगा लिया और ममता बढ़ाकर (अधिक स््रेह दर्शाकर ) वह सभामें चला गया। मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल हो गये॥ ३॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
baiṭheu sabhām̐ khabari asi pāī| siṃdhu pāra senā saba āī||
būjhesi saciva ucita mata kahahū| te saba ham̐se maṣṭa kari rahahū||
Meaning ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रुकी सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये ?]। तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाहकी कौन-सी बात है ?)॥ ४॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माही॥
jitehu surāsura taba śrama nāhīṃ| nara bānara kehi lekhe māhī||
Meaning आपने देवताओं और राक्षसोंको जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें हैं ?॥५॥
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३७॥
saciva baida gura tīni jauṃ priya bolahiṃ bhaya āsa|
rāja dharma tana tīni kara hoi begihīṃ nāsa|| 37||
Meaning मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [ अप्रसन्नताके] भय या [लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [ क्रमश: ] राज्य, शरीर और धर्म-- इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ ३७॥
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
soi rāvana kahum̐ bani sahāī| astuti karahiṃ sunāi sunāī||
avasara jāni bibhīṣanu āvā| bhrātā carana sīsu tehiṃ nāvā||
Meaning रावणके लिये भी वही सहायता ( संयोग ) आ बनी है। मन्त्री उसे सुना-सुनाकर ( मुँहपर ) स्तुति करते हैं। [इसी समय] अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाईके चरणोंमें सिर नवाया॥ १॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता॥
puni siru nāi baiṭha nija āsana| bolā bacana pāi anusāsana||
jau kṛpāla pūm̐chihu mohi bātā| mati anurupa kahaum̐ hita tātā||
Meaning फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बेठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले--हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिकि अनुसार आपके हितकी बात कहता हूँ॥ २॥
जो आपन चाहै कल्याना।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
jo āpana cāhai kalyānā| sujasu sumati subha gati sukha nānā||
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के चंद कि नाई॥
so paranāri lilāra gosāīṃ| tajau cauthi ke caṃda ki nāī||
Meaning जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्रीक ललाटको चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे)॥ ३॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥
caudaha bhuvana eka pati hoī| bhūtadroha tiṣṭai nahiṃ soī||
guna sāgara nāgara nara joū| alapa lobha bhala kahai na koū||
Meaning चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवोंसे वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणोंका समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता॥ ४॥
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३८॥
kāma krodha mada lobha saba nātha naraka ke paṃtha|
saba parihari raghubīrahi bhajahu bhajahiṃ jehi saṃta|| 38||
Meaning हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ-ये सब नरकके रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८॥
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
tāta rāma nahiṃ nara bhūpālā| bhuvanesvara kālahu kara kālā||
brahma anāmaya aja bhagavaṃtā| byāpaka ajita anādi anaṃtā||
Meaning हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं॥ १॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
go dvija dhenu deva hitakārī| kṛpāsiṃdhu mānuṣa tanudhārī||
jana raṃjana bhaṃjana khala brātā| beda dharma racchaka sunu bhrātā||
Meaning उन कृपाके समुद्र भगवान्ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य- शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंकें समूहका नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं॥ २॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
tāhi bayaru taji nāia māthā| pranatārati bhaṃjana raghunāthā||
dehu nātha prabhu kahum̐ baidehī| bhajahu rāma binu hetu sanehī||
Meaning वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेध्वर) को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्त्रेह करनेवाले श्रीरामजीको भजिये॥ ३॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥
sarana gaem̐ prabhu tāhu na tyāgā| bisva droha kṛta agha jehi lāgā||
jāsu nāma traya tāpa nasāvana| soi prabhu pragaṭa samujhu jiyam̐ rāvana||
Meaning जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये॥ ४॥
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ ३९ ( क )॥
bāra bāra pada lāgaum̐ binaya karaum̐ dasasīsa|
parihari māna moha mada bhajahu kosalādhīsa|| 39 ( ka )||
Meaning हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मदको त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये॥ ३९ (क)॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥ ३९ ( ख )॥
muni pulasti nija siṣya sana kahi paṭhaī yaha bāta|
turata so maiṃ prabhu sana kahī pāi suavasaru tāta|| 39 ( kha )||
Meaning मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी॥ ३९ (ख)॥
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
mālyavaṃta ati saciva sayānā| tāsu bacana suni ati sukha mānā||
tāta anuja tava nīti bibhūṣana| so ura dharahu jo kahata bibhīṣana||
Meaning माल्यवान् नामका एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और कहा--] हे तात! आपके छोटे भाई नीतिविभूषण ( नीतिको भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान्) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये॥ १॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
ripu utakaraṣa kahata saṭha doū| dūri na karahu ihām̐ hai koū||
mālyavaṃta gṛha gayau bahorī| kahai bibhīṣanu puni kara jorī||
Meaning [ रावणने कहा--] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है ? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे--॥ २॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
sumati kumati saba keṃ ura rahahīṃ| nātha purāna nigama asa kahahīṃ||
jahām̐ sumati taham̐ saṃpati nānā| jahām̐ kumati taham̐ bipati nidānā||
Meaning हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ (सुखकी स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति (दु:ख) रहती है॥ ३॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
tava ura kumati basī biparītā| hita anahita mānahu ripu prītā||
kālarāti nisicara kula kerī| tehi sītā para prīti ghanerī||
Meaning आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसीसे आप हितको अहित और शत्रुको मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुलके लिये कालरात्रि [ के समान] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति है॥ ४॥
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४०॥
tāta carana gahi māgaum̐ rākhahu mora dulāra|
sīta dehu rāma kahum̐ ahita na hoi tumhāra|| 40||
Meaning हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालकके आग्रहको स्त्रेहपूर्वक स्वीकार कीजिये)। श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो॥ ४०॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई॥
budha purāna śruti saṃmata bānī| kahī bibhīṣana nīti bakhānī||
sunata dasānana uṭhā risāī| khala tohi nikaṭa mutyu aba āī||
Meaning विभीषणने पण्डितों, पुराणों और वेदोंद्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणीसे नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है!॥ १॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही॥
jiasi sadā saṭha mora jiāvā| ripu kara paccha mūṛha tohi bhāvā||
kahasi na khala asa ko jaga māhīṃ| bhuja bala jāhi jitā maiṃ nāhī||
Meaning आरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात् मेरे ही अन्नसे पल रहा है), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रुका ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट ! बता न, जगतमें ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओंके बलसे न जीता हो?॥ २॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
mama pura basi tapasinha para prītī| saṭha milu jāi tinhahi kahu nītī||
asa kahi kīnhesi carana prahārā| anuja gahe pada bārahiṃ bārā||
Meaning मेरे नगरमें रहकर प्रेम करता है तपस्वियोंपर। मूर्ख ! उन्हींसे जा मिल और उन्हींको नीति बता। ऐसा कहकर रावणने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषणने (मारनेपर भी ) बार-बार उसके चरण ही पकड़े॥ ३॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
umā saṃta kai ihai baṛāī| maṃda karata jo karai bhalāī||
tumha pitu sarisa bhalehiṃ mohi mārā| rāmu bhajeṃ hita nātha tumhārā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [ बुराई करनेवालेकी ] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजीने कहा--] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है॥ ४॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
saciva saṃga lai nabha patha gayaū| sabahi sunāi kahata asa bhayaū||
Meaning [इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्गमें गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे--॥ ५॥
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४१॥
rāmu satyasaṃkalpa prabhu sabhā kālabasa tori|
mai raghubīra sarana aba jāum̐ dehu jani khori|| 41||
Meaning श्रीरामजी सत्यसंकल्प एवं [सर्वसमर्थ] प्रभु हैं और [हे रावण!] तुम्हारी सभा कालके वश है। अत: मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना॥ ४१॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
asa kahi calā bibhīṣanu jabahīṃ| āyūhīna bhae saba tabahīṃ||
sādhu avagyā turata bhavānī| kara kalyāna akhila kai hānī||
Meaning ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी)। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि (नाश) कर देता है॥ १॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
rāvana jabahiṃ bibhīṣana tyāgā| bhayau bibhava binu tabahiṃ abhāgā||
caleu haraṣi raghunāyaka pāhīṃ| karata manoratha bahu mana māhīṃ||
Meaning रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ २॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
dekhihaum̐ jāi carana jalajātā| aruna mṛdula sevaka sukhadātā||
je pada parasi tarī riṣinārī| daṃḍaka kānana pāvanakārī||
Meaning [वे सोचते जाते थे--] मैं जाकर भगवानूके कोमल और लाल वर्ण्के सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥ ३॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई॥
je pada janakasutām̐ ura lāe| kapaṭa kuraṃga saṃga dhara dhāe||
hara ura sara saroja pada jeī| ahobhāgya mai dekhihaum̐ teī||
Meaning जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [उसे पकड़नेको] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा॥ ४॥
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४२॥
jinha pāyanha ke pādukanhi bharatu rahe mana lāi|
te pada āju bilokihaum̐ inha nayananhi aba jāi|| 42||
Meaning जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा॥ ४२॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
ehi bidhi karata saprema bicārā| āyau sapadi siṃdhu ehiṃ pārā||
kapinha bibhīṣanu āvata dekhā| jānā kou ripu dūta biseṣā||
Meaning इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजीको सेना थी) आ गये। वानरोंने विभीषणको आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रुका कोई खास दूत है॥ १॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
tāhi rākhi kapīsa pahiṃ āe| samācāra saba tāhi sunāe||
kaha sugrīva sunahu raghurāī| āvā milana dasānana bhāī||
Meaning उन्हें [ पहरेपर] ठहराकर वे सुग्रीवके पास आये और उनको सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीवने। श्रीरामजीके पास जाकर] कहा--हे रघुनाथजी ! सुनिये, रावणका भाई [आपसे] मिलने आया है॥ २॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
kaha prabhu sakhā būjhiai kāhā| kahai kapīsa sunahu naranāhā||
jāni na jāi nisācara māyā| kāmarūpa kehi kārana āyā||
Meaning प्रभु श्रीरामजीने कहा--हे मित्र ! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है) ? वानरराज सुग्रीवने कहा--हे महाराज! सुनिये, राक्षसोंकी माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है॥ ३॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
bheda hamāra lena saṭha āvā| rākhia bām̐dhi mohi asa bhāvā||
sakhā nīti tumha nīki bicārī| mama pana saranāgata bhayahārī||
Meaning [जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय। [श्रीरामजीने कहा--] हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी। परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना!॥ ४॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना॥
suni prabhu bacana haraṣa hanumānā| saranāgata bacchala bhagavānā||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हुए [और मन-ही-मन कहने लगे कि] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल (शरणमें आये हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले) हैं॥ ५॥
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४३॥
saranāgata kahum̐ je tajahiṃ nija anahita anumāni|
te nara pāvam̐ra pāpamaya tinhahi bilokata hāni|| 43||
Meaning [ श्रीरामजी फिर बोले--] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है)॥ ४३॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
koṭi bipra badha lāgahiṃ jāhū| āem̐ sarana tajaum̐ nahiṃ tāhū||
sanamukha hoi jīva mohi jabahīṃ| janma koṭi agha nāsahiṃ tabahīṃ||
Meaning जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
pāpavaṃta kara sahaja subhāū| bhajanu mora tehi bhāva na kāū||
jauṃ pai duṣṭahadaya soi hoī| moreṃ sanamukha āva ki soī||
Meaning पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावणका भाई) निश्चय ही दुष्ट हदयका होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥ २॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
nirmala mana jana so mohi pāvā| mohi kapaṭa chala chidra na bhāvā||
bheda lena paṭhavā dasasīsā| tabahum̐ na kachu bhaya hāni kapīsā||
Meaning जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र॒ नहीं सुहाते। यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव ! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है॥३॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥
jaga mahum̐ sakhā nisācara jete| lachimanu hanai nimiṣa mahum̐ tete||
jauṃ sabhīta āvā saranāī| rakhihaum̐ tāhi prāna kī nāī||
Meaning क्योंकि हे सखे! जगत्में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा॥ ४॥
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत॥ ४४॥
ubhaya bhām̐ti tehi ānahu ham̐si kaha kṛpāniketa|
jaya kṛpāla kahi cale aṃgada hanū sameta|| 44||
Meaning कृपाके धाम श्रीरामजीने ' हँसकर कहा--दोनों ही स्थितियोंमें उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी कृपालु श्रीरामकी जय हो' कहते हुए चले॥ ४४॥
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
sādara tehi āgeṃ kari bānara| cale jahām̐ raghupati karunākara||
dūrihi te dekhe dvau bhrātā| nayanānaṃda dāna ke dātā||
Meaning विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रोंको आनन्दका दान देनेवाले (अत्यन्त सुखद) दोनों भाइयोंको विभीषणजीने दूरहीसे देखा॥ १॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
bahuri rāma chabidhāma bilokī| raheu ṭhaṭuki ekaṭaka pala rokī||
bhuja pralaṃba kaṃjāruna locana| syāmala gāta pranata bhaya mocana||
Meaning फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [ मारना] रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान्की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है॥ २॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
siṃgha kaṃdha āyata ura sohā| ānana amita madana mana mohā||
nayana nīra pulakita ati gātā| mana dhari dhīra kahī mṛdu bātā||
Meaning सिंहके-से कंधे हैं, विशाल वक्ष:स्थल (चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित करनेवाला मुख है। भगवान्के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे॥ ३॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥
nātha dasānana kara maiṃ bhrātā| nisicara baṃsa janama suratrātā||
sahaja pāpapriya tāmasa dehā| jathā ulūkahi tama para nehā||
Meaning हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ। हे देवताओंके रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लूको अन्धकारपर सहज स्त्रेह होता है॥ ४॥
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४५॥
śravana sujasu suni āyaum̐ prabhu bhaṃjana bhava bhīra|
trāhi trāhi ārati harana sarana sukhada raghubīra|| 45||
Meaning मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भयका नाश करनेवाले हैं। हे दुखियोंके दुःख दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कौजिये॥ ४५॥
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
asa kahi karata daṃḍavata dekhā| turata uṭhe prabhu haraṣa biseṣā||
dīna bacana suni prabhu mana bhāvā| bhuja bisāla gahi hṛdayam̐ lagāvā||
Meaning प्रभुने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके मनको बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया॥ १॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
anuja sahita mili ḍhiga baiṭhārī| bole bacana bhagata bhayahārī||
kahu laṃkesa sahita parivārā| kusala kuṭhāhara bāsa tumhārā||
Meaning छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले--हे लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी जगहपर है॥ २॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
khala maṃḍalīṃ basahu dinu rātī| sakhā dharama nibahai kehi bhām̐tī||
maiṃ jānaum̐ tumhāri saba rītī| ati naya nipuna na bhāva anītī||
Meaning दिन-रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो। [ ऐसी दशामें] हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती॥ ३॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥
baru bhala bāsa naraka kara tātā| duṣṭa saṃga jani dei bidhātā||
aba pada dekhi kusala raghurāyā| jauṃ tumha kīnha jāni jana dāyā||
Meaning हे तात! नरकमें रहना वर अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा--] हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है॥ ४॥
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४६॥
taba lagi kusala na jīva kahum̐ sapanehum̐ mana biśrāma|
jaba lagi bhajata na rāma kahum̐ soka dhāma taji kāma|| 46||
Meaning तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्रमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता॥ ४६॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
taba lagi hṛdayam̐ basata khala nānā| lobha moha macchara mada mānā||
jaba lagi ura na basata raghunāthā| dhareṃ cāpa sāyaka kaṭi bhāthā||
Meaning लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमरमें तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते॥ १॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
mamatā taruna tamī am̐dhiārī| rāga dveṣa ulūka sukhakārī||
taba lagi basati jīva mana māhīṃ| jaba lagi prabhu pratāpa rabi nāhīṃ||
Meaning ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती है, जबतक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता॥ २॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
aba maiṃ kusala miṭe bhaya bhāre| dekhi rāma pada kamala tumhāre||
tumha kṛpāla jā para anukūlā| tāhi na byāpa tribidha bhava sūlā||
Meaning हे श्रीरामजी ! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु ! आप जिसपर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते॥ ३॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥
maiṃ nisicara ati adhama subhāū| subha ācaranu kīnha nahiṃ kāū||
jāsu rūpa muni dhyāna na āvā| tehiṃ prabhu haraṣi hṛdayam̐ mohi lāvā||
Meaning मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया॥ ४॥
-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज॥ ४७॥
-ahobhāgya mama amita ati rāma kṛpā sukha puṃja|
dekheum̐ nayana biraṃci siba sebya jugala pada kaṃja|| 47||
Meaning हे कृपा और सुखके पुज् श्रीरामजी! मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा॥ ४७॥
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥
sunahu sakhā nija kahaum̐ subhāū| jāna bhusuṃḍi saṃbhu girijāū||
jauṃ nara hoi carācara drohī| āve sabhaya sarana taki mohī||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत्का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय,॥ १॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥
taji mada moha kapaṭa chala nānā| karaum̐ sadya tehi sādhu samānā||
jananī janaka baṃdhu suta dārā| tanu dhanu bhavana suhrada parivārā||
Meaning और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार--॥ २॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
saba kai mamatā tāga baṭorī| mama pada manahi bām̐dha bari ḍorī||
samadarasī icchā kachu nāhīṃ| haraṣa soka bhaya nahiṃ mana māhīṃ||
Meaning इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है॥ ३॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
asa sajjana mama ura basa kaiseṃ| lobhī hṛdayam̐ basai dhanu jaiseṃ||
tumha sārikhe saṃta priya moreṃ| dharaum̐ deha nahiṃ āna nihoreṃ||
Meaning ऐसा सज्जन मेरे हदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसीके निहोरेसे (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता॥ ४॥
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४८॥
saguna upāsaka parahita nirata nīti dṛṛha nema|
te nara prāna samāna mama jinha keṃ dvija pada prema|| 48||
Meaning जो सगुण (साकार) भगवान्के उपासक हैं, दूसरेके हितमें लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं॥ ४८॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
sunu laṃkesa sakala guna toreṃ| tāteṃ tumha atisaya priya moreṃ||
rāma bacana suni bānara jūthā| sakala kahahiṃ jaya kṛpā barūthā||
Meaning हे लड्ठापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजीके वचन सुनकर सब वानरोंके समूह कहने लगे-कृपाके समूह श्रीरामजीको जय हो!॥१॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
sunata bibhīṣanu prabhu kai bānī| nahiṃ aghāta śravanāmṛta jānī||
pada aṃbuja gahi bārahiṃ bārā| hṛdayam̐ samāta na premu apārā||
Meaning प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है॥ २॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
sunahu deva sacarācara svāmī| pranatapāla ura aṃtarajāmī||
ura kachu prathama bāsanā rahī| prabhu pada prīti sarita so bahī||
Meaning [ विभीषणजीने कहा-- हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी ! हे शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले! सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी॥ ३॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
aba kṛpāla nija bhagati pāvanī| dehu sadā siva mana bhāvanī||
evamastu kahi prabhu ranadhīrā| māgā turata siṃdhu kara nīrā||
Meaning अब तो हे कृपालु ! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा॥ ४॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥
jadapi sakhā tava icchā nāhīṃ| mora darasu amogha jaga māhīṃ||
asa kahi rāma tilaka tehi sārā| sumana bṛṣṭi nabha bhaī apārā||
Meaning [ और कहा--] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगतमें मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे पुष्पोंकी आपार वृष्टि हुई॥५॥
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥ ४९ (क )॥
rāvana krodha anala nija svāsa samīra pracaṃḍa|
jarata bibhīṣanu rākheu dīnhehu rāju akhaṃḍa|| 49 (ka )||
Meaning श्रीरामजीने रावणके क्रोधरूपी अग्रिमें, जो अपनी (विभीषणकी ) श्वास (वचन) रूपी पवनसे प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषणको बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया॥ ४९ (क)॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
jo saṃpati siva rāvanahi dīnhi diem̐ dasa mātha|
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥ ४९ ( ख )॥
soi saṃpadā bibhīṣanahi sakuci dīnha raghunātha|| 49 ( kha )||
Meaning शिवजीने जो सम्पत्ति रावणको दसों सिरोंकी बलि देनेपर दी थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बहुत सकुचते हुए दी॥ ४९ (ख)॥