जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥
jauṃ raghubīra hoti sudhi pāī| karate nahiṃ bilaṃbu raghurāī||
rāmabāna rabi uem̐ jānakī| tama barūtha kaham̐ jātudhāna kī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥
abahiṃ mātu maiṃ jāum̐ lavāī| prabhu āyasu nahiṃ rāma dohāī||
kachuka divasa jananī dharu dhīrā| kapinha sahita aihahiṃ raghubīrā||
Meaning हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [ अत: ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे॥ २॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥
nisicara māri tohi lai jaihahiṃ| tihum̐ pura nāradādi jasu gaihahiṃ||
haiṃ suta kapi saba tumhahi samānā| jātudhāna ati bhaṭa balavānā||
Meaning और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [ सीताजीने कहा--] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से ) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं॥ ३॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
moreṃ hṛdaya parama saṃdehā| suni kapi pragaṭa kīnha nija dehā||
kanaka bhūdharākāra sarīrā| samara bhayaṃkara atibala bīrā||
Meaning अत: मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे !] यह सुनकर हनुमानूजीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु) के आकारका (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था॥ ४॥
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
sītā mana bharosa taba bhayaū| puni laghu rūpa pavanasuta layaū||
Meaning तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमानूजीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६॥
sunu mātā sākhāmṛga nahiṃ bala buddhi bisāla|
prabhu pratāpa teṃ garuṛahi khāi parama laghu byāla|| 16||
Meaning हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है)॥ १६॥
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
mana saṃtoṣa sunata kapi bānī| bhagati pratāpa teja bala sānī||
āsiṣa dīnhi rāmapriya jānā| hohu tāta bala sīla nidhānā||
Meaning भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमानूजीकी वाणी सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय जानकर हनुमानूजीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
ajara amara gunanidhi suta hohū| karahum̐ bahuta raghunāyaka chohū||
karahum̐ kṛpā prabhu asa suni kānā| nirbhara prema magana hanumānā||
Meaning हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेममें मगर हो गये॥ २॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
bāra bāra nāesi pada sīsā| bolā bacana jori kara kīsā||
aba kṛtakṛtya bhayaum̐ maiṃ mātā| āsiṣa tava amogha bikhyātā||
Meaning हनुमानूजीने बार-बार सीताजीके चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा--हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥ ३॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
sunahu mātu mohi atisaya bhūkhā| lāgi dekhi suṃdara phala rūkhā||
sunu suta karahiṃ bipina rakhavārī| parama subhaṭa rajanīcara bhārī||
Meaning हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [ सीताजीने कहा--] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं॥ ४॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥
tinha kara bhaya mātā mohi nāhīṃ| jauṃ tumha sukha mānahu mana māhīṃ||
Meaning [ हनुमानूजीने कहा-- हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें (प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है॥ ५॥
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७॥
dekhi buddhi bala nipuna kapi kaheu jānakīṃ jāhu|
raghupati carana hṛdayam̐ dhari tāta madhura phala khāhu|| 17||
Meaning हनुमानूजीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकी जीने कहा--जाओ। हे तात ! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ॥ १७॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
caleu nāi siru paiṭheu bāgā| phala khāesi taru toraiṃ lāgā||
rahe tahām̐ bahu bhaṭa rakhavāre| kachu māresi kachu jāi pukāre||
Meaning वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार की--॥ १॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
nātha eka āvā kapi bhārī| tehiṃ asoka bāṭikā ujārī||
khāesi phala aru biṭapa upāre| racchaka mardi mardi mahi ḍāre||
Meaning [और कहा--] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया॥ २॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
suni rāvana paṭhae bhaṭa nānā| tinhahi dekhi garjeu hanumānā||
saba rajanīcara kapi saṃghāre| gae pukārata kachu adhamāre||
Meaning यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान्ूजीने गर्जना की। हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
puni paṭhayau tehiṃ acchakumārā| calā saṃga lai subhaṭa apārā||
āvata dekhi biṭapa gahi tarjā| tāhi nipāti mahādhuni garjā||
Meaning फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्ूजीने एक वृक्ष [ हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की॥ ४॥
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८॥
kachu māresi kachu mardesi kachu milaesi dhari dhūri|
kachu puni jāi pukāre prabhu markaṭa bala bhūri|| 18||
Meaning उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़- पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है॥ १८॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
suni suta badha laṃkesa risānā| paṭhaesi meghanāda balavānā||
mārasi jani suta bāṃdhesu tāhī| dekhia kapihi kahām̐ kara āhī||
Meaning पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [ अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा कि--) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा जाय कि कहाँका है॥ १॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
calā iṃdrajita atulita jodhā| baṃdhu nidhana suni upajā krodhā||
kapi dekhā dāruna bhaṭa āvā| kaṭakaṭāi garjā aru dhāvā||
Meaning इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमानूजीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े॥ २॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
ati bisāla taru eka upārā| biratha kīnha laṃkesa kumārā||
rahe mahābhaṭa tāke saṃgā| gahi gahi kapi mardai nija aṃgā||
Meaning उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े- बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमानजी अपने शरीरसे मसलने लगे॥ ३॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
tinhahi nipāti tāhi sana bājā| bhire jugala mānahum̐ gajarājā||
muṭhikā māri caṛhā taru jāī| tāhi eka chana muruchā āī||
Meaning उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [ लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमानूजी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥ ४॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
uṭhi bahori kīnhisi bahu māyā| jīti na jāi prabhaṃjana jāyā||
Meaning फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥५॥
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ १९॥
brahma astra tehiṃ sām̐dhā kapi mana kīnha bicāra|
jauṃ na brahmasara mānaum̐ mahimā miṭai apāra|| 19||
Meaning अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमान्ूजीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
brahmabāna kapi kahum̐ tehi mārā| paratihum̐ bāra kaṭaku saṃghārā||
tehi dekhā kapi muruchita bhayaū| nāgapāsa bām̐dhesi lai gayaū||
Meaning उसने हनुमानूजीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
jāsu nāma japi sunahu bhavānī| bhava baṃdhana kāṭahiṃ nara gyānī||
tāsu dūta ki baṃdha taru āvā| prabhu kāraja lagi kapihiṃ bam̐dhāvā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है ? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमानूजीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
kapi baṃdhana suni nisicara dhāe| kautuka lāgi sabhām̐ saba āe||
dasamukha sabhā dīkhi kapi jāī| kahi na jāi kachu ati prabhutāī||
Meaning बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमानूजीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता ( ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती॥ ३॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥
kara joreṃ sura disipa binītā| bhṛkuṭi bilokata sakala sabhītā||
dekhi pratāpa na kapi mana saṃkā| jimi ahigana mahum̐ garuṛa asaṃkā||
Meaning देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्ूजीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशड्ू खड़े रहे जैसे सर्पोके समूहमें गरुड़ निःशड्भू (निर्भय) रहते हैं॥ ४॥
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥ २०॥
kapihi biloki dasānana bihasā kahi durbāda|
suta badha surati kīnhi puni upajā hṛdayam̐ biṣāda|| 20||
Meaning हनुमानूजीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वंधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया॥ २०॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
kaha laṃkesa kavana taiṃ kīsā| kehiṃ ke bala ghālehi bana khīsā||
kī dhauṃ śravana sunehi nahiṃ mohī| dekhaum̐ ati asaṃka saṭha tohī||
Meaning लड्ापति रावणने कहा-ररे वानर! तू कौन है ? किसके बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना ? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशड्ठू देख रहा हूँ॥ १॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥
māre nisicara kehiṃ aparādhā| kahu saṭha tohi na prāna kai bādhā||
suna rāvana brahmāṃḍa nikāyā| pāi jāsu bala biracita māyā||
Meaning तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है ? [ हनुमानूजीने कहा--] हे रावण! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहों को रचना करती है;॥ २॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
jākeṃ bala biraṃci hari īsā| pālata sṛjata harata dasasīsā||
jā bala sīsa dharata sahasānana| aṃḍakosa sameta giri kānana||
Meaning जिनके बलसे हे दशशीश ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमश: ) सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे सहस्रमुख (फणों ) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं;॥ ३॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
dharai jo bibidha deha suratrātā| tumha te saṭhanha sikhāvanu dātā||
hara kodaṃḍa kaṭhina jehi bhaṃjā| tehi sameta nṛpa dala mada gaṃjā||
Meaning जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खोंको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया॥ ४॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥
khara dūṣana trisirā aru bālī| badhe sakala atulita balasālī||
Meaning जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थे;॥ ५॥
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१॥
jāke bala lavalesa teṃ jitehu carācara jhāri|
tāsu dūta maiṃ jā kari hari ānehu priya nāri|| 21||
Meaning जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ॥ २१॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
jānaum̐ maiṃ tumhāri prabhutāī| sahasabāhu sana parī larāī||
samara bāli sana kari jasu pāvā| suni kapi bacana bihasi biharāvā||
Meaning मैं तुम्हारी प्रभुतताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहुसे तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमानूजीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी॥ १॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
khāyaum̐ phala prabhu lāgī bhūm̐khā| kapi subhāva teṃ toreum̐ rūkhā||
saba keṃ deha parama priya svāmī| mārahiṃ mohi kumāraga gāmī||
Meaning हे [राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके) मालिक ! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट ) राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
jinha mohi mārā te maiṃ māre| tehi para bām̐dheu tanayam̐ tumhāre||
mohi na kachu bām̐dhe kai lājā| kīnha cahaum̐ nija prabhu kara kājā||
Meaning तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ॥ ३॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
binatī karaum̐ jori kara rāvana| sunahu māna taji mora sikhāvana||
dekhahu tumha nija kulahi bicārī| bhrama taji bhajahu bhagata bhaya hārī||
Meaning हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके देखो और शभ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो॥ ४॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥
jākeṃ ḍara ati kāla ḍerāī| jo sura asura carācara khāī||
tāsoṃ bayaru kabahum̐ nahiṃ kījai| more kaheṃ jānakī dījai||
Meaning जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२॥
pranatapāla raghunāyaka karunā siṃdhu kharāri|
gaem̐ sarana prabhu rākhihaiṃ tava aparādha bisāri|| 22||
Meaning खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे॥ २२॥
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
rāma carana paṃkaja ura dharahū| laṃkā acala rāja tumha karahū||
riṣi pulista jasu bimala maṃyakā| tehi sasi mahum̐ jani hohu kalaṃkā||
Meaning तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हदयमें धारण करो और लड़्राका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥ १॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी॥
rāma nāma binu girā na sohā| dekhu bicāri tyāgi mada mohā||
basana hīna nahiṃ soha surārī| saba bhūṣaṇa bhūṣita bara nārī||
Meaning रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़, विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥ २॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥
rāma bimukha saṃpati prabhutāī| jāi rahī pāī binu pāī||
sajala mūla jinha saritanha nāhīṃ| baraṣi gae puni tabahiṃ sukhāhīṃ||
Meaning रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस््रोत नहीं है ( अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥ ३॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
sunu dasakaṃṭha kahaum̐ pana ropī| bimukha rāma trātā nahiṃ kopī||
saṃkara sahasa biṣnu aja tohī| sakahiṃ na rākhi rāma kara drohī||
Meaning हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते॥ ४॥
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३॥
mohamūla bahu sūla prada tyāgahu tama abhimāna|
bhajahu rāma raghunāyaka kṛpā siṃdhu bhagavāna|| 23||
Meaning मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो॥ २३॥
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
jadapi kahi kapi ati hita bānī| bhagati bibeka birati naya sānī||
bolā bihasi mahā abhimānī| milā hamahi kapi gura baṛa gyānī||
Meaning यद्यपि हनुमान्ूजीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!॥ १॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
mṛtyu nikaṭa āī khala tohī| lāgesi adhama sikhāvana mohī||
ulaṭā hoihi kaha hanumānā| matibhrama tora pragaṭa maiṃ jānā||
Meaning रे दुष्ट ! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमानूजीने कहा-- इससे उलटा ही होगा (अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं )। यह तेरा मतिश्रम (बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥ २॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
suni kapi bacana bahuta khisiānā| begi na harahum̐ mūṛha kara prānā||
sunata nisācara mārana dhāe| sacivanha sahita bibhīṣanu āe||
Meaning हनुमानूजीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [और बोला--] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते ? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
nāi sīsa kari binaya bahūtā| nīti birodha na māria dūtā||
āna daṃḍa kachu karia gosām̐ī| sabahīṃ kahā maṃtra bhala bhāī||
Meaning उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा--भाई! यह सलाह उत्तम है॥ ४॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥
sunata bihasi bolā dasakaṃdhara| aṃga bhaṃga kari paṭhaia baṃdara||
Meaning यह सुनते ही रावण हँसकर बोला--अच्छा तो, बंदरको अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥ ५॥
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४॥
kapi keṃ mamatā pūm̐cha para sabahi kahaum̐ samujhāi|
tela bori paṭa bām̐dhi puni pāvaka dehu lagāi|| 24||
Meaning मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर होती है। अत: तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो॥ २४॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
pūm̐chahīna bānara taham̐ jāihi| taba saṭha nija nāthahi lai āihi||
jinha kai kīnhasi bahuta baṛāī| dekheum̐maiṃ tinha kai prabhutāī||
Meaning जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुतता (सामर्थ्य) तो देखूँ!॥ १॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
bacana sunata kapi mana musukānā| bhai sahāya sārada maiṃ jānā||
jātudhāna suni rāvana bacanā| lāge racaiṃ mūṛha soi racanā||
Meaning यह वचन सुनते ही हनुमानजी मनमें मुसकराये [और मन-ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे॥ २॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
rahā na nagara basana ghṛta telā| bāṛhī pūm̐cha kīnha kapi khelā||
kautuka kaham̐ āe purabāsī| mārahiṃ carana karahiṃ bahu hām̐sī||
Meaning [ पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासीलोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानूजीको पैरसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं॥३॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता॥
bājahiṃ ḍhola dehiṃ saba tārī| nagara pheri puni pūm̐cha prajārī||
pāvaka jarata dekhi hanumaṃtā| bhayau parama laghu rupa turaṃtā||
Meaning ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमानूजीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्िको जलते हुए देखकर हनुमानजी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
भई सभीत निसाचर नारीं॥
nibuki caṛheu kapi kanaka aṭārīṃ| bhaī sabhīta nisācara nārīṃ||
Meaning बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास॥ २५॥
hari prerita tehi avasara cale maruta unacāsa|
aṭṭahāsa kari garzā kapi baṛhi lāga akāsa|| 25||
Meaning उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमानजी अट्रहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५॥
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
deha bisāla parama haruāī| maṃdira teṃ maṃdira caṛha dhāī||
jarai nagara bhā loga bihālā| jhapaṭa lapaṭa bahu koṭi karālā||
Meaning देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं॥ १॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
tāta mātu hā sunia pukārā| ehi avasara ko hamahi ubārā||
hama jo kahā yaha kapi nahiṃ hoī| bānara rūpa dhareṃ sura koī||
Meaning हाय बप्पा! हाय मैया ! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा ? [चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है!॥ २॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
sādhu avagyā kara phalu aisā| jarai nagara anātha kara jaisā||
jārā nagaru nimiṣa eka māhīṃ| eka bibhīṣana kara gṛha nāhīṃ||
Meaning साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है। हनुमान्ूजीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया॥ ३॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥
tā kara dūta anala jehiṃ sirijā| jarā na so tehi kārana girijā||
ulaṭi palaṭi laṃkā saba jārī| kūdi parā puni siṃdhu majhārī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! जिन्होंने अग्िको बनाया, हनुमानजी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्िसे नहीं जले। हनुमानूजीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लड़ा जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े॥ ४॥
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ २६॥
pūm̐cha bujhāi khoi śrama dhari laghu rūpa bahori|
janakasutā ke āgeṃ ṭhāṛha bhayau kara jori|| 26||
Meaning पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमानजी श्रीजनकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥ २६॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
mātu mohi dīje kachu cīnhā| jaiseṃ raghunāyaka mohi dīnhā||
cūṛāmani utāri taba dayaū| haraṣa sameta pavanasuta layaū||
Meaning [ हनुमानूजीने कहा-- हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्ूजीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥ १॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
kahehu tāta asa mora pranāmā| saba prakāra prabhu pūranakāmā||
dīna dayāla biridu saṃbhārī| harahu nātha mama saṃkaṭa bhārī||
Meaning [ जानकीजीने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना->हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों ) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ ] अत: उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये॥ २॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
tāta sakrasuta kathā sunāehu| bāna pratāpa prabhuhi samujhāehu||
māsa divasa mahum̐ nāthu na āvā| tau puni mohi jiata nahiṃ pāvā||
Meaning हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे॥ ३॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
kahu kapi kehi bidhi rākhauṃ prānā| tumhahū tāta kahata aba jānā||
tohi dekhi sītali bhai chātī| puni mo kahum̐ soi dinu so rātī||
Meaning हे हनुमान् ! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥ ४॥
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७॥
janakasutahi samujhāi kari bahu bidhi dhīraju dīnha|
carana kamala siru nāi kapi gavanu rāma pahiṃ kīnha|| 27||
Meaning हनुमानूजीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया॥ २७॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥
calata mahādhuni garjesi bhārī| garbha stravahiṃ suni nisicara nārī||
nāghi siṃdhu ehi pārahi āvā| sabada kilakilā kapinha sunāvā||
Meaning चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे। समुद्र लॉघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द (हर्षध्वनि ) सुनाया॥ १॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा॥
haraṣe saba biloki hanumānā| nūtana janma kapinha taba jānā||
mukha prasanna tana teja birājā| kīnhesi rāmacandra kara kājā||
Meaning हनुमानूजीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा। हनुमानूजीका मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि] ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं॥ २॥
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
mile sakala ati bhae sukhārī| talaphata mīna pāva jimi bārī||
cale haraṣi raghunāyaka pāsā| pūm̐chata kahata navala itihāsā||
Meaning सब हनुमानूजीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
taba madhubana bhītara saba āe| aṃgada saṃmata madhu phala khāe||
rakhavāre jaba barajana lāge| muṣṭi prahāra hanata saba bhāge||
Meaning तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे॥ ४॥
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ २८॥
jāi pukāre te saba bana ujāra jubarāja|
suni sugrīva haraṣa kapi kari āe prabhu kāja|| 28||
Meaning उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं॥ २८॥
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
jauṃ na hoti sītā sudhi pāī| madhubana ke phala sakahiṃ ki khāī||
ehi bidhi mana bicāra kara rājā| āi gae kapi sahita samājā||
Meaning यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाज-सहित वानर आ गये॥ १॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
āi sabanhi nāvā pada sīsā| mileu sabanhi ati prema kapīsā||
pūm̐chī kusala kusala pada dekhī| rāma kṛpām̐ bhā kāju biseṣī||
Meaning सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने उत्तर दिया--] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशिष सफलता हुई है)॥ २॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
nātha kāju kīnheu hanumānā| rākhe sakala kapinha ke prānā||
suni sugrīva bahuri tehi mileū| kapinha sahita raghupati pahiṃ caleū||
Meaning हे नाथ! हनुमानने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुप्रीवजी हनुमानूजीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥
rāma kapinha jaba āvata dekhā| kiem̐ kāju mana haraṣa biseṣā||
phaṭika silā baiṭhe dvau bhāī| pare sakala kapi carananhi jāī||
Meaning श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े॥ ४॥
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ २९॥
prīti sahita saba bheṭe raghupati karunā puṃja|
pūm̐chī kusala nātha aba kusala dekhi pada kaṃja|| 29||
Meaning दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [ वानरोंने कहा--] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है॥ २९॥
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
jāmavaṃta kaha sunu raghurāyā| jā para nātha karahu tumha dāyā||
tāhi sadā subha kusala niraṃtara| sura nara muni prasanna tā ūpara||
Meaning जाम्बवानूने कहा--हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥ १॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
soi bijaī binaī guna sāgara| tāsu sujasu treloka ujāgara||
prabhu kīṃ kṛpā bhayau sabu kājū| janma hamāra suphala bhā ājū||
Meaning वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है। प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया॥ २॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
nātha pavanasuta kīnhi jo karanī| sahasahum̐ mukha na jāi so baranī||
pavanatanaya ke carita suhāe| jāmavaṃta raghupatihi sunāe||
Meaning हे नाथ! पवनपुत्र हनुमानूने जो करनी की, उसका हजार मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवानूने हनुमानूजीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये॥ ३॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥
sunata kṛpānidhi mana ati bhāe| puni hanumāna haraṣi hiyam̐ lāe||
kahahu tāta kehi bhām̐ti jānakī| rahati karati racchā svaprāna kī||
Meaning [वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमानूजीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा--हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं ?॥ ४॥
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ ३०॥
nāma pāharu divasa nisi dhyāna tumhāra kapāṭa|
locana nija pada jaṃtrita jāhiṃ prāna kehiṃ bāṭa|| 30||
Meaning ( हनुमानूजीने कहा-- ) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँँ तो किस मार्गसे 2॥ ३०॥
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
calata mohi cūṛāmani dīnhī| raghupati hṛdayam̐ lāi soi līnhī||
nātha jugala locana bhari bārī| bacana kahe kachu janakakumārī||
Meaning चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमानूजीने फिर कहा-- हे नाथ! दोनों नेत्रोंगें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे--॥ १॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
anuja sameta gahehu prabhu caranā| dīna baṃdhu pranatārati haranā||
mana krama bacana carana anurāgī| kehi aparādha nātha hauṃ tyāgī||
Meaning छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दु:खोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्मसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप)ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया ?॥ २॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥
avaguna eka mora maiṃ mānā| bichurata prāna na kīnha payānā||
nātha so nayananhi ko aparādhā| nisarata prāna karihiṃ haṭhi bādhā||
Meaning [हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
biraha agini tanu tūla samīrā| svāsa jarai chana māhiṃ sarīrā||
nayana stravahi jalu nija hita lāgī| jaraiṃ na pāva deha birahāgī||
Meaning विरह अग्रि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [ अग्नि और पवनका संयोग होनेसे। यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥
सीता के अति बिपति बिसाला।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥
sītā ke ati bipati bisālā| binahiṃ kaheṃ bhali dīnadayālā||
Meaning सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा कलेश होगा)॥ ५॥
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१॥
nimiṣa nimiṣa karunānidhi jāhiṃ kalapa sama bīti|
begi caliya prabhu ānia bhuja bala khala dala jīti|| 31||
Meaning हे करुणानिधान ! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है। अत: हे प्रभु ! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंकें दलको जीतकर सीताजीको ले आइये॥ ३१॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
suni sītā dukha prabhu sukha ayanā| bhari āe jala rājiva nayanā||
bacana kām̐ya mana mama gati jāhī| sapanehum̐ būjhia bipati ki tāhī||
Meaning सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंगें जल भर आया [और वे बोले-] मन, वचन और शरीरसे जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्रमें भी विपत्ति हो सकती है ?॥ १॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
kaha hanumaṃta bipati prabhu soī| jaba tava sumirana bhajana na hoī||
ketika bāta prabhu jātudhāna kī| ripuhi jīti ānibī jānakī||
Meaning हनुमान्ूजीने कहा--हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे॥ २॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
sunu kapi tohi samāna upakārī| nahiṃ kou sura nara muni tanudhārī||
prati upakāra karauṃ kā torā| sanamukha hoi na sakata mana morā||
Meaning [ भगवान् कहने लगे-- हे हनुमान् ! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३॥
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥
sunu suta urina maiṃ nāhīṃ| dekheum̐ kari bicāra mana māhīṃ||
puni puni kapihi citava suratrātā| locana nīra pulaka ati gātā||
Meaning हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानूजीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥ ४॥
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ ३२॥
suni prabhu bacana biloki mukha gāta haraṣi hanumaṃta|
carana pareu premākula trāhi trāhi bhagavaṃta|| 32||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा [पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमानजी हर्षित हो गये और प्रेममें विकल होकर 'हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
bāra bāra prabhu cahai uṭhāvā| prema magana tehi uṭhaba na bhāvā||
prabhu kara paṃkaja kapi keṃ sīsā| sumiri so dasā magana gaurīsā||
Meaning प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमानूजीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल हनुमानूजीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्र हो गये॥ १॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
sāvadhāna mana kari puni saṃkara| lāge kahana kathā ati suṃdara||
kapi uṭhāi prabhu hṛdayam̐ lagāvā| kara gahi parama nikaṭa baiṭhāvā||
Meaning फिर मनको सावधान करके शड्भरजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे--हनुमानूजीको उठाकर प्रभुने हदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
kahu kapi rāvana pālita laṃkā| kehi bidhi daheu durga ati baṃkā||
prabhu prasanna jānā hanumānā| bolā bacana bigata abhimānā||
Meaning हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लड्डठा और उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया? हनुमानूजीने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले--॥ ३॥
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा॥
sākhāmṛga ke baṛi manusāī| sākhā teṃ sākhā para jāī||
nāghi siṃdhu hāṭakapura jārā| nisicara gana bidhi bipina ujārā||
Meaning बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लॉँघकर सोनेका नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला,॥ ४॥
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥
so saba tava pratāpa raghurāī| nātha na kachū mori prabhutāī||
Meaning यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी ! आपहीका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥५॥
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥ ३३॥
tā kahum̐ prabhu kachu agama nahiṃ jā para tumha anukula|
taba prabhāvam̐ baṛavānalahiṃ jāri sakai khalu tūla|| 33||
Meaning हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है (अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है)॥ ३३॥